याद है ना गर्मी के दिनों की वो रातें जो आपने छत पर अकेले किसी का इंतज़ार करते हुई बिताई थीं। पर ये इंतज़ार किसका ? सबसे अज़ीब बात तो यही होती थी कि हमें ख़ुद पता नहीं होता था कि हम आख़िर हैं किसकी प्रतीक्षा में ? पर उस इंतज़ार की कैफ़ियत दिल में तारी रहती थी। बस बुनते रहते थे मन में हम उस अनजाने अज़नबी की शख्सियत। चाँद तारों में खोजा करते थे उस चेहरे का अक्स। चारों ओर फैली शून्यता में भी सुनाई देती थीं उनकी सदाएँ।
पर ये तो उन बीते लमहों की बाते हैं। ये सब मैं आज आपसे क्यूँ कह रहा हूँ? क्या करूँ कैफ़ भोपाली का लिखा ये नग्मा उन अहसासों की याद ताजा़ जो कर रहा है। भोपाल के अज़ीम शायर कैफ़ भोपाली का ये गीत फिल्म शंकर हुसैन का है जो 1977 में आई थी। संगीत रचना थी ख़य्याम की।

कैफ़ साहब ने इस गीत के लिए जो बोल लिखे वो अपने आप में कमाल थे। अब इन पंक्तियों को देखिए कितना मखमली अहसास जगाती हैं दिल में
एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी
या फिर इसे सुन कर कौन संवेदनशील हृदय रससिक्त ना हो उठेगा
जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है
संगीतकार ख़य्याम ने गीतकार के लफ्ज़ों की इसी गहराई को ध्यान में रखकर नाममात्र का संगीत दिया। नतीजा ये कि गीत सुनते वक़्त आपका ध्यान बोलों से हट ही नहीं सकता। और अगर आपको भटकने की बीमारी भी हो तो कोकिलकंठी लता की भावपूर्ण स्वरलहरी आपको भटकने नहीं देगी। दरअसल सितार की आरंभिक धुन के बाद लता जी की आवाज़ कानों तक छन छन कर कैफ़ भोपाली के शब्दों को इस तरह पहुँचाती है कि मन गीत की भावनाओं के साथ हिचकोले लेने लगता है। ये गीत इस बात का सबूत है कि अगर गीत के बोलों और गायिकी में दम हों तो संगीत का किरदार गौण हो जाता है।
तो आइए सुनते हैं लता जी के गाए इस गीत को
अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..
एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी
बिन किसी की याद आए, दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियाँ खनकती हैं
अपने आप.. अपने आप..
कोई पहले दिन जैसे घर किसी-के जाता हो
जैसे खुद मुसाफ़िर को रास्ता बुलाता हो
पाँव जाने किस जानिब, बे-उठाए उठते हैं
और छम-छमा-छमछम पायलें झनकती हैं
अपने आप.. अपने आप रातों में
जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसकी बाहों से बिजलियाँ लपकती हैं
अपने आप . ..
अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..
वैसे तो पाकीज़ा और रजिया सुल्तान के अपने लोकप्रिय गीतों के आलावा कैफ़ भोपाली साहब ने कई ग़ज़लें भी कहीं। उनमें से कुछ को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ में गाकर आम जन तक पहुँचाया । पर उन ग़ज़लों की बात कभी और कर लेंगे। अभी तो इस गीत को सुनने से बने मूड में कुछ और सुनवाकर आपका मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहता।




















