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शनिवार, जनवरी 24, 2015

वार्षिक संगीतमाला 2014 पायदान # 14 : मैं ढूँढने को ज़माने में जब वफ़ा निकला.. पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला

वार्षिक संगीतमाला की पिछली पायदान पर के गीत के उलट आज जिस गीत को आप सबसे मिलवाने जा रहा हूँ वो शायद ही आपने पहले सुना होगा। ये गीत है पिछले साल फरवरी में प्रदर्शित हुई फिल्म Heartless का। इस संगीतमाला में बतौर संगीतकार आप एक डॉक्टर अर्को प्रावो मुखर्जी से मिल चुके हैं, आज मिलिए IIM Ahemdabad से MBA करने वाले गौरव डागोनकर से। आज से ठीक तीन साल पहले फिल्म लंका के लिए सीमा सैनी द्वारा लिखे गीत शीत लहर है, भींगे से पर हैं थोड़ी सी धूप माँगी है ने गौरव की प्रतिभा से मेरा पहला परिचय करवाया था। 

एक उच्च मध्यम वर्गीय पढ़े लिखे परिवार से जुड़े गौरव ने अपनी डिग्री, पैसे सब को अपने पहले प्रेम संगीत के प्रति न्योछावर कर दिया। पर फिल्म उद्योग में सिर्फ प्रतिभा होना ही काफी नहीं, आपको सही मौके भी मिलने चाहिए। पिछले तीन सालों में गौरव की झोली में कुछ ज्यादा गीत नहीं आए और यही वज़ह है कि अपना समय उन्होंने अपने बैंड Synchronicity को दिया जिसके वो मुख्य गायक भी हैं। फ्यूजन के इस युग में उन्होंने हिंदी के कई गीतों को मशहूर अंग्रेजी गीतों के साथ जोड़ा और ये गीत इंटरनेट पर काफी सराहे भी गए। कुछ दिनों पहले उन्होंने श्रीलंका की सिंहला भाषा में भी गीत गाया जो वहाँ काफी लोकप्रिय हुआ। 


पर जहाँ तक हिंदी फिल्म संगीत की बात है 2014 की शुरुआत में फिल्म Heartless का संगीत देने का मौका उन्हें जरूर मिला। Heartless ज्यादा नहीं चली और यही वज़ह रही कि फिल्म में अरिजित सिंह का गाया ये शानदार नग्मा मैंने फिल्म प्रदर्शित होने के कई महीने बाद सुना। इस गीत के बोल लिखे हैं अराफ़ात महमूद ने। महमूद साहब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं। अपने लिखे इस गीत के बारे में उनका कहना है

कई गीतों को लिखने के बाद ऐसा एक गीत बाहर आता है जो कि आपके लिखे हजार गानों पर भारी पड़ता है। ऐसी सिर्फ मेरी राय नहीं बल्कि सबकी राय थी। अरिजित जब इस गाने को गा रहे थे तो वो बेहद खुश थे कि देखो क्या गाना मिल गया है।
वैसे गौरव ने जब इस गीत हे बारे में शेखर सुमन को बताया तब तक फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी थी और फिल्म में इसे रखने की जगह नहीं बची थी। शेखर ने तब फिल्म के Promotional Song की तरह इसका इस्तेमाल किया। वार्षिक संगीतमाला के गीतों को चुनते समय पहली बार जब मैंने गीत का मुखड़ा सुना तो मेरे दिल से सीधे वाह वाह निकली... मैं ढूँढने को ज़माने में जब वफ़ा निकला.. पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला। प्यार की राह में टूटे दिलों की दास्तान को इन दो पंक्तियों में किस सहजता से उभार लाए महमूद साहब। मुखड़े का ये आकर्षण गीत के अगले दो अंतरों में भी वे जस का तस बनाए रखने में सफल रहे हैं।

गीत पियानो की मधुर धुन से शुरु होता है और फिर लहराती हुई अरिजित की आवाज़ गीत के जानदार मुखड़े से आपका तआरुफ कराती है। बोलों से दर्द की छुअन आप महसूस कर ही रहे होते हैं कि वॉयलिन से सजा संगीत संयोजन उसे और प्रगाढ़ कर जाता है।  आराफ़ात साहब जब जब गीत गीत में वफ़ा, ख़ुदा और जीने की वज़ह ढूँढने को निकलते हैं मन की कचोट कुछ और गहरी हो उठती है।

तो आइए सुनते हैं ये गीत..





मैं ढूँढने को ज़माने में जब वफ़ा निकला
पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला
आ हा...

जिसके आने से मुकम्मल हो गई थी ज़िदगी
दस्तकें खुशियों ने दी थी, मिट गई थी हर ग़मी
क्यूँ बेवज़ह दी ये सज़ा, क्यूँ ख्वाब दे के वो ले गया
जियें जो हम, लगे सितम, अज़ाब ऐसे वो दे गया
मैं ढूँढने को उसके दिल में जो ख़ुदा निकला
पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला आ हा...
मैं ढूँढने को ज़माने में वफ़ा निकला..

ढूँढता था एक पल में दिल जिसे ये सौ दफ़ा
है सुबह नाराज उस बिन, रूठी शामें, दिन ख़फा
वो आएँ ना ले जाएँ ना
हाँ उसकी यादे जो हैं यहाँ
ना रास्ता, ना कुछ पता
मैं उसको ढूँढूगा अब कहाँ
मैं ढूँढने जो कभी जीने की वज़ह निकला
पता चला कि गलत ले के मैं पता निकला आ हा...

वार्षिक संगीतमाला 2014

सोमवार, जनवरी 23, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 14 : शीत लहर है,भीगे से पर हैं, थोड़ी सी धूप माँगी है...

वार्षिक संगीतमाला के दो हफ्तों का सफ़र पूरा करके हम आ पहुँचे हैं चौदहवीं पॉयदान पर जहाँ पर गीत है पिछले महिने ही प्रदर्शित हुई फिल्म 'लंका' का। गीत की गायिका हैं एक बार फिर श्रेया घोषाल। पर आज मैं बात करूँगा इस नग्मे की नवोदित युवा गीतकार‍‍-संगीतकार जोड़ी के बारे में जिनकी हिंदी फिल्म संगीत में आने की कहानी ना केवल दिलचस्प है बल्कि इस बात को पुख़्ता भी करती है कि अगर हमें अपने हुनर पर विश्वास हो तो उससे जुड़ी विधा में मुकाम बनाने के लिए भले ही संघर्ष करना पड़े पर अंततः सफलता मिलती ही है।

तो चलिए पहले बात करते हैं गीतकार सीमा सैनी की। भोपाल से ताल्लुक रखने वाली सीमा पेशे से सिविल इंजीनियर हैं। कॉलेज के समय से ही उन्हें कविताएँ लिखने का शौक़ था। कॉलेज में उन्होंने नाटकों के लिए भी काम किया।  अब इंजीनियरिंग पूरी की, तो नौकरी भी करनी थी। शुरुआत उन्होंने एक आर्किटेक्ट फर्म में काम करने से की पर दिल था कि एक अलग ही ख़्वाब बुन रहा था.... मुंबई जाने और वहाँ के फिल्म उद्योग में पाँव जमाने का ख़्वाब। माता पिता पहले अनिच्छुक थे पर बेटी की खुशियों के लिए उसे मुंबई ले जाने के लिए तैयार हो गए। नौकरी छोड़कर वर्ष 2005 में सीमा मुंबई जा पहुँची। बहुत मुश्किल से संगीतकार इस्माइल दरबार के 'दरबार' में पहुँचने का मौका मिला पर इस्माइल को उनके गीतों में कुछ खास बात नहीं दिखी। सीमा के लिए यह गहरा झटका था। वो कुछ दिन और कोशिश कर वापस भोपाल लौट आयीं।

हताशा और निराशा के इस दौर से उबरने में सीमा को तीन साल और लगे पर अंत में उन्होंने अपने दिल की बात मानी और वर्ष 2008 में अपनी किस्मत आज़माने वे एक बार फिर मुंबई जा पहुँची। कुमार शानू के एक गैर फिल्मी एलबम में  वर्ष 2009 में पहली बार उन्हें गीतकार बनने का मौका मिला। पर इससे अच्छी बात सीमा के लिए हुई वो थी एक मित्र के ज़रिए नवोदित संगीतकार गौरव डागोनकर के साथ मुलाकात।

29 वर्षीय गौरव डागोनकर अंगर आज फिल्म लंका के लिए संगीत रचना नहीं दे रहे होते तो लाखों की मासिक पगार पर वो किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के वरीय प्रबंधक होते। भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद जैसे प्रतिष्ठित कॉलेज से 2006 में MBA की डिग्री लेने वाले गौरव ने जब संगीत के क्षेत्र में कूदने की सोची तो वे चारों ओर चर्चा के पात्र बन गए। MBA की डिग्री की वज़ह से गौरव को फिल्म जगत ने पहले गंभीरता से नहीं लिया। पर दो सालों के प्रयास के बाद जब उनका एलबम College Days बाजार में आया तो लोगों को उन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया। वैसे तो सीमा के साथ गौरव दो तीन फिल्मों में काम कर रहे हैं पर इस जोड़ी की सबसे पहले प्रदर्शित फिल्म है लंका

सीमा लंका के इस गीत के बारे में बताती हैं कि..

"फिल्म में ये गीत एक ऐसी लड़की पर फिल्माया गया है जिसे शहर का दबंग नेता उसके घर से उठवा कर ले जाता है और जबरन अपने साथ रखता है। मैंने जब इस किरदार के मनोभावों को समझना चाहा तो मेरे मन में एक ऐसे पंक्षी की कल्पना जागी जिसके पर बर्फीले पानी से इस तरह तर बतर हैं कि वो चाह कर भी उड़ नहीं पा रहा है और इसीलिए मैंने लिखा..

शीत लहर है,भीगे से पर हैं
थोड़ी सी धूप माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है..."
कितना सजीव चित्रण किया है सीमा ने इन परिस्थितियों के बीच फँसी एक असहाय स्त्री का! गीत के अंतरों में यह एहसास पुरज़ोर होता चला जाता है। अंतरों के बीच सीमा द्वारा रचे भावों को गौरव ने कोरस के रूप में बखूबी इस्तेमाल किया है। गीत कै दौरान जब
तिनका तिनका रात उधेड़ो, दिन आज़ाद है कह दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना


का स्वर गूँजता है तो हृदय में उदासी की चादर सी बिछ जाती है। मुखड़े के पहले और इंटरल्यूडंस में गौरव का दिया संगीत गीत के मूड से आपको निकलने नहीं देता। रही श्रेया की गायिकी तो वो दिन पर दिन नए आयामों को छू रही है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को दर्द में डूबे श्रेया के स्वर में..........


शीत लहर है,भीगे से पर हैं
थोड़ी सी धूप माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है
शीत लहर है....

सुनसान राहों पे क्यूँ शर्मसार साये हैं
बददुआ सी लगती है क्यूँ, कोसती हवाएँ हैं
हमसे क्या गुनाह हुआ है, कैसी ये सज़ाएँ हैं
भीगी नज़र है, शाम ओ सहर है
थोड़ी सी ख़ैर माँगी है
आँखो भर है नीला गगन और
ठहरा हुआ कुछ पानी है
शीत लहर है....

तिनका तिनका रात उधेड़ो, दिन आज़ाद है कह दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना
थोड़े थोड़े पर हैं भोले, कुछ आकाश भी दे दो ना
भीतर भीतर कितनी उमस है, थोड़ी साँसें दे दो ना, थोड़ी साँसें दे दो ना

गुमसुम पहाड़ों पे जब सूरज ये ढलता है
खारे खारे आँसुओ से जख़्म और जलता है
तैरता है रास्तों पर, इक धुआँ सा खलता है
लंबा सफ़र है, बिसरी डगर है
थोड़ी सी राह माँगी है
शीत लहर है....



(चलते चलते मैं हृदय से आभारी हूँ सीमा सैनी का जिन्होंने 'एक शाम मेरे नाम' के लिए इस गीत, अपने संगीतिक सफ़र और आज के गीत संगीत के बारे चर्चा के लिए वक़्त निकाला।)
 

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