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बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 7 क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'? Kyun Re..

वार्षिक संगीतमाला के साल के दस बेहतरीन गीतों की फेरहिस्त में जो गीत सबसे ज्यादा ग़मगीन कर देता है वो हैं क्यूँ रे...। बच्चे किसे प्यारे नहीं होते। उनका निर्मल मन, उनकी खिलखिलाती हँसी, उनकी शरारतें हमारे हृदय को पुलकित करती रहती हैं। ऐसे में वे अचानक से ही ज़िदगी से बेहरमी से अलग कर दिए जाएँ तो असहनीय पीड़ा होती है। फिल्म Te3n का ये गीत एक बुजुर्ग की ऐसी ही वेदना को व्यक्त करता है जो उनकी अपहृत पोती के हत्यारों की तलाश में है। 

विद्या बालन, अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे शानदार कलाकारों से परिपूर्ण ये फिल्म सिनेमाघरों में ज्यादा दिन तक तो टिक नहीं पाई पर फिल्म का गीत संगीत अपनी छाप अवश्य छोड़ गया। इस फिल्म के गीत हक़ है मुझे से आप पहले ही इस संगीतमाला में रूबरू हो चुके हैं। आज बारी है इसी फिल्म के एक दूसरे गीत की जिसे अमिताभ बच्चन ने ख़ुद अपनी आवाज़ दी है।



अमिताभ की आवाज़ का तो सारा देश दीवाना है और मैं भी उनकी आवाज़ के जादू से अछूता नहीं हूँ। अब तक नई पुरानी तीस से ज्यादा फिल्मों में अमिताभ अपनी आवाज़ का परचम लहरा चुके हैं। अमिताभ बच्चन ने अपने चिर परिचित मजाकिया अंदाज़ में इस फिल्म का संगीत जनता के सामने रखते हुए इस गीत से जुड़े कुछ प्रसंगों का उल्लेख किया था। अमिताभ का कहना था। .
"पहली बार जब मैंने ये गाना गाया तो इन लोगों ने उसे बेकार कह के नकार दिया। फिर किसी ने कहा क्लिंटन को बुलवा दें। अब बताइए जिन हजरात को आप बचना चाहते हो उन्हीं को आपके छः इंच पर बैठा दिया जाए तो मेरे जैसे शख़्स की, जो गायक नहीं है क्या हालत हुई होगी। सच पूछिए तो मैंने बिल्कुल बेसुरा गाया। अब ये लोग हैं ना बेसुरी आवाज़ को भी मशीन में डालकर और उसमें कोरस और संगीत से अच्छा बना देते हैं। सो जो आप सुनेंगे वो मेरी नहीं मशीनी आवाज़ होगी।"
जब अमिताभ बोल रहे थे तो उनके साथ बैठे क्लिंटन की हँसी रुक नहीं पा रही थी। क्लिंटन का कहना था कि अमिताभ की गहरी आवाज़ का इस्तेमाल हम सब एक दूसरे रूप में करना चाहते थे। उनके द्वारा निभाए किरदार जॉन बिश्वास की आवाज़ एक टूटे हुए इंसान की थी जो वक़्त के हाथों लाचार हो गया था। इसलिए हमने उन्हें उसी चरित्र को अपनी आवाज़ में ढालने को कहा। वाकई अमिताभ बच्चन ने अमिताभ भट्टाचार्य के बोलों के पीछे भावनाओं को हूबहू आवाज़ में तब्दील कर दिया। 



संगीतकार क्लिंटन ने इस साल संगीतमाला में शामिल में अपने चार  गीतों डिगी डिगी डुग, महरम हक़ है और क्यूँ रे  गिटार का जिस तरह इस्तेमाल किया है वो काबिलेतारीफ़ है। ये सारे गीत शब्द प्रधान हैं और सबमें संगीत नाममात्र का ही है। अमिताभ भट्टाचार्य का हँसी के लिए जलतरंग की उपमा का इस्तेमाल मन को सोहता है। दोनो अंतरों से गुजरते गुजरते आँखे नम हो जाती है। ऐसा लगता है मानों कोई अपना ही ज़िंदगी से बिछुड़ गया हो...


जलतरंग सी हँसी तेरी, सुनायी दे आज भी
खुशबू तेरी रह गयी तेरे जाने के बाद भी
घर का वो कोना तेरा, सूना बिछौना तेरा
तेरी गैर मौजूदगी में भी, लगे होना तेरा
क्यूँ रे, क्यूँ रे, कर गया तनहा मुझे ऐसे
क्यूँ रे, क्यूँ रे काँच के लमहों के रह गए
रह गए चूरे

तेरी चीजें अब भी वैसे ही रखता हूँ
बैठा सन्नाटे में उनको  तकता हूँ
जब लौटेगी तब तक रस्ता देखूँगा
इसके आलावा कर भी क्या सकता हूँ
ऊँगली से मुझको फिर से, सुलझाने दे ना अपने
गुच्छे घुंघरैले बालों के भूरे
क्यूँ रे, क्यूँ रे कर गया तनहा मुझे ऐसे
क्यूँ रे, क्यूँ रे काँच के लमहों के रह गए
रह गए चूरे


मासूम सा में आपने एक पिता के दिल की करुण पुकार सुनी थी आज सत्तर वर्षीय उस बुजुर्ग की सुनिए जो बड़ी कातरता से एक प्रश्न कर रहा है कि ये सब हुआ तो क्यूँ हुआ...


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

सोमवार, फ़रवरी 20, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #8 क्या है कोई आपका भी 'महरम'? Mujhe Mehram Jaan Le...

हर साल फिल्मी गीत कुछ अप्रचलित शब्दों को हमारी बोलचाल की भाषा में डाल ही देते हैं। बहुधा ऐसा निर्माता निर्देशक गीतों में एक नवीनता लाने के लिए करते रहे हैं। पिछले कुछ सालों में अम्बरसरिया, ज़हनसीब, आयत, कतिया करूँ जैसे शब्दों ने गीत के प्रति लोगों का आरंभिक जुड़ाव बनाने में काफी मदद की थी। अब महरम (जिसे मेहरम की तरह भी उच्चारित किया जाता है) को ही लीजिए, फिल्मी गीतों के लिए अनजाना तो नहीं पर कम प्रयुक्त होने वाला तो लफ़्ज़ है ही ये। मुझे याद पड़ता है कि आज से पाँच साल पहले गीतकार स्वानंद किरकिरे ने फिल्म ये साली ज़िंदगी के गीत में महरम शब्द का प्रयोग कुछ यूँ किया था

कैसे कहें अलविदा, महरम
कैसे बने अजनबी, हमदम

भूल जाओ जो तुम, भूल जाएँगे हम
ये जुनूँ ये प्यार के लमहे...... नम

जावेद अली द्वारा गाया बड़ा प्यारा नग्मा था वो भी !


वैसे कहाँ से आया है ये "महरम'? इस्लाम के धार्मिक नज़रिए से देखें तो महरम वैसे सगे संबंधियों को कहते हैं जिनसे आपकी शादी नहीं हो सकती। पर साहित्य या फिल्मी गीतों में अरबी से उर्दू में आए इस शब्द का प्रयोग एक अतरंग, एक बेहद घनिष्ठ मित्र के तौर पर होता रहा है। इस मित्रता को भी आप प्रेम ही मान सकते हैं। पर जब ये प्रेम पाने से ज्यादा कुछ देने के लिए हो, उसकी बातों का राजदार बनने के लिए हो, दुख व परेशानियों में उसके साथ खड़े रहने के लिए हो.... तो आप सच में किसी के महरम बन जाते हैं।

यही वज़ह थी कि कहानी 2 में जब अरुण व दुर्गा के किरदारों के आपसी रिश्ते को एक शब्द से बाँधने की क़वायद में अमिताभ भट्टाचार्य निकले तो उनकी खोज महरम पर जा कर समाप्त हुई। अमिताभ द्वारा लिखा गीत का मुखड़ा महरम को कुछ यूँ परिभाषित कर गया ..तेरी ऊँगली थाम के, तेरी दुनिया में चलूँ...मेरे रंग तू ना रंगे, तो तेरे रंग में मैं ढलूँ...मुझे कुछ मत दे, बस रख ले मेरा नज़राना..बिन शर्तों के, हाँ तुझसे मेरा याराना

कहानी 2 के इस गीत को संगीत से सँवारा है क्लिंटन सेरेजो ने। क्लिंटन की इस संगीतमाला की है ये तीसरी संगीतबद्ध रचना है। इस गीत में प्राण फूँकने में सचिन मित्रा के साथ उनके बजाए गिटार और अरिजीत की आवाज़ का कम योगदान नहीं है। अरिजीत सिंह भले इस साल सलमान खाँ द्वारा दुत्कारे गए हों पर फिर वो साल के सबसे लोकप्रिय गायक के रूप में उभरे हैं। ऊँचे सुरों पर उनका आधिपत्य रहा है और ये गीत उसी कोटि का है इसलिए इसे वे बड़ी आसानी व मधुरता से निभा जाते हैं। तो चलिए इस गीत का पहले और फिर वीडियो



तेरी ऊँगली थाम के, तेरी दुनिया में चलूँ
मेरे रंग तू ना रंगे, तो तेरे रंग में मैं ढलूँ
मुझे कुछ मत दे, बस रख ले मेरा नज़राना
बिन शर्तों के, हाँ तुझसे मेरा याराना

मुझे महरम महरम महरम मुझे महरम जान ले
 
मुझे महरम महरम महरम मुझे महरम जान ले
मेरी आँखों में तेरी सूरत पहचान ले
मुझे महरम महरम महरम मुझे महरम मुझे महरम जान ले

खुल के ना कह सके, कानों में बोल दे
अपना हर राज़ तू आ मुझ पे खोल दे
मेरे रहते.. भला किस बात का है घबराना
अब से तेरा.. हाफ़िज़ है मेरा याराना
मुझे महरम महरम महरम....जान ले

तेरे हिस्से का नीला आसमान, होगा न कभी बादल में छुपा
तुझपे आँच ना, कोई आएगी, तकलीफें कभी छू ना पाएँगी
मुझे ये वादा है जीते जी पूरा कर जाना
बिन शर्तो के.. हाँ तुझसे मेरा याराना
मुझे महरम महरम महरम....जान ले



वैसे अब तो बताइए क्या आपकी ज़िंदगी में भी कोई महरम है?
 

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 10 : आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg

वार्षिक संगीतमाला में अब बारी है साल के दस शानदार गीतों की। मुझे विश्वास है कि इस कड़ी की पहली पेशकश को सुन कर आप मुसाफ़िरों वाली मस्ती में डूब जाएँगे। ये गीत है फिल्म जुगनी से जो पिछले साल जुगनुओं की तरह तरह टिमटिमाती हुई कब पर्दे से उतर गयी पता ही नहीं चला। इस गीत को लिखा शैली उर्फ शैलेंद्र सिंह सोढ़ी ने और संगीतबद्ध किया क्लिंटन सेरेजो ने जो बतौर संगीतकार दूसरी बार कदम रख रहे है इस संगीतमाला में। इस गीत से जुड़ी सबसे रोचक बात ये कि विशाल भारद्वाज ने पहली बार किसी दूसरे संगीतकार के लिए अपनी आवाज़ का इस्तेमाल किया है।


पहले तो आपको ये बता दें कि ये शैली हैं कौन? अम्बाला से आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने वाले शैली के पिता हिम्मत सिंह सोढ़ी ख़ुद कविता लिखते थे और एक प्रखर बुद्धिजीवी  थे। उनके सानिध्य में रह कर शैली गा़लिब, फ़ैज़ और पाश जैसे शायरों के मुरीद हुए। शिव कुमार बटालवी के गीतों ने भी उन्हें प्रभावित किया। चंडीगढ़ से स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल करने के बाद आज 1995 में वो गुलज़ार के साथ काम करने  मुंबई आए पर बात कुछ खास बनी नहीं। हिंदी फिल्मों में पहली सफलता उन्हें 2008 में देव डी के गीतों को लिखने से मिली। इसके बाद भी छोटी मोटी फिल्मों के लिए लिखते रहे हैं। पिछले साल उड़ता पंजाब के गीतों के कारण वो चर्चा में रहे और जुगनी के लिए तो ना केवल उन्होंने गीत लिखे बल्कि संवाद लेखन का भी काम किया।

चित्र में बाएँ से शेफाली, शैली, जावेद बशीर व क्लिंटन
शैली को फिल्म की निर्देशिका शेफाली भूषण ने बस इतना कहा था कि फिल्म के गीतों में लोकगीतों वाली मिठास होनी चाहिए। इस गीत के लिए क्लिंटन ने शैली से पहले बोल लिखवाए और फिर उसकी धुन बनी। क्लिंटन को हिंदी के अटपटे बोलों को समझाने के लिए शैली को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। पर जब क्लिंटन ने उनके बोलों को कम्पोज़ कर शैली के पास भेजा तो वो खुशी से झूम उठे और तीन घंटे तक उसे लगातार सुनते रहे।

क्लिंटन के दिमाग में गीत बनाते वक़्त विशाल की आवाज़ ही घूम रही थी। जब उन्होंने ये गीत विशाल के पास भेजा तो विशाल की पहली प्रतिक्रिया थी कि गाना तो तुम्हारी आवाज़ में जँच ही रहा है तब तुम मुझे क्यूँ गवाना चाहते हो? पर क्लिंटन के साथ विशाल के पुराने साथ की वज़ह से उनके अनुरोध को वो ठुकरा नहीं सके। गीत में जो मस्ती का रंग उभरा है उसमें सच ही विशाल की आवाज़ का बड़ा योगदान है।

शैली चाहते थे कि इस गीत के लिए वो कुछ ऐसा लिखें जिसमें उन्हें गर्व हो और सचमुच इस परिस्थितिजन्य गीत में उन्होंने ये कर दिखाया है। ये गीत पंजाब की एक लोक गायिका की खोज करती घुमक्कड़ नायिका के अनुभवों का बड़ी खूबसूरती से खाका खींचता है । गिटार और ताल वाद्य के साथ मुखड़े के पहले क्लिंटन का बीस सेकेंड का संगीत संयोजन मन को मोहता है और फिर तो विशाल की फुरफराहट हमें गीत के साथ उड़ा ले जाती है उस मुसाफ़िर के साथ।

हम जब यात्रा में होते हैं तो कितने अनजाने लोग अपनी बात व्यवहार से हमारी यादों का अटूट अंग बन जाते हैं। शैली एक यात्री की इन्हीं यादों को आवभगत में मुस्कानें,फुर्सत की मीठी तानें..भांति भांति जग लोग दीवाने, बातें भरें उड़ानें ...राहें दे कोई फकर से, कोई खुद से रहा जूझ रे ....एक चलते फिरते चित्र की भांति शब्दों में उतार देते हैं। निर्देशिका शेफाली भूषण की भी तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने इस गीत का फिल्मांकन करते वक़्त गीत के बोलों को अपने कैमरे से हूबहू व्यक्त करने की बेहतरीन कोशिश की। तो आइए  हम सब साथ साथ हँसते मुस्कुराते गुनगुनाते हुए ये डुगडुगी बजाएँ


फुर्र फुर्र फुर्र नयी डगरिया
मनमौज गुजरिया
रनझुन पायलिया नजरिया
मंन मौज गुजरिया

ये वास्ते रास्ते झल्ले शैदां, रमते जोगी वाला कहदा
आवभगत में मुस्कानें,फुर्सत की मीठी तानें
दायें का हाथ पकड़ के, बाएँ से पूछ के
ओये ओये होए डुग्गी डुग्गी डुग्ग
ओये ओये होए डुग्गी डुग्गी डुग्ग 
ओये ओये होए डुग्गी डुग्गी डुग्ग डुग्गी डुग्ग डुग्गी डुग्ग

फिर फिर फिर राह अटरिया 
सुर ताल साँवरिया
साँझ की बाँहों नरम दोपहरिया
सुर ताल सँवरिया
परवाज़ ये आगाज़ ये है अलहदा
रौनक से हो रही खुशबू पैदा
भांति भांति जग लोग दीवाने, बातें भरें उड़ानें
राहें दे कोई फकर से, कोई खुद से रहा जूझ रे
ओये ओये  होए ...   डुग्ग ,

बहते हुए पानी से, इस दुनिया फानी से ,
है रिश्ता खारा, रंग चोखा हारा ,
और जो रवानी ये,
धुन की पुरानी है ये नाता अनोखा
हाँ कूबकु के माने, दहलीज़  लांघ  के  जाने ,
दायें का हाथ पकड़ के, बाएँ से पूछ के
ओये ओये होए डुग्गी डुग्गी डुग्ग


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 

शुक्रवार, जनवरी 20, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #19 : हक़ है मुझे जलने का...हक़ है मुझे जीने का Haq Hai

वार्षिक संगीतमाला 2016 में साल के पच्चीस शानदार गीतों की श्रंखला में अगली पेशकश से जुड़ी हैं ऐसी दो शख़्सियत जिन्होंने पिछले साल अपने गीत और संगीत से आम और खास सबका दिल जीता है। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार एवम गायक  क्लिंटन सेरेजो की । अगर आप वर्षों से इस संगीतमाला के साथ हैं तो बतौर गीतकार अमिताभ के लिखे कई गीतों से रूबरू हो चुकेंगे। पर बतौर संगीतकार क्लिंटन सेरेजो का वार्षिक संगीतमालाओं में ये पहला कदम है।


साथ  ही ये बता दूँ कि इस साल के प्रथम दस गीतों में क्लिंटन के संगीतबद्ध दो नग्मे हैं। क्लिंटन सेरेजो वैसे तो एक दशक में भी ज्यादा से बॉलीवुड में सक्रिय रहे हैं, पर गायक के रूप में बीड़ी, यारम या सूरज की बाहों में जैसे गीतों को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं आता उनकी आवाज़ ने ज्यादा लोकप्रियता हासिल की हो। पर गायिकी के आलावा जबसे उन्होंने संगीत संयोजन, निर्माण और वादन में भी अपना दखल बढ़ाया है, उनकी प्रतिभा के नए रंग श्रोताओं तक पहुँचे हैं।

मुंबई के पोद्दार कॉलेज के छात्र रहे क्लिंटन के मध्यम वर्गीय परिवार का संगीत से दूर दूर तक कोई नाता नहीं था। पिता एक निजी कंपनी में इंजीनियर थे तो माँ फ्रेंच भाषा की प्रोफेसर। बाकी भाई बहन भी पढ़ाई लिखाई में अव्वल रहे।  ऐसे हालातों में में संगीत के प्रति रुचि जागृत करना और बाद में क्लिंटन का उसे अपनी जीविका का ज़रिया  बना लेना उनके परिवार  के लिए  किसी अजूबे से कम नहीं था। 

क्लिंटन सेरेजो व अमिताभ भट्टाचार्य
क्लिंटन के संगीतबद्ध TE3N के जिस गीत की बात मैं आपसे आज करने जा रहा हूँ उसमें एक गहरा दुख है पर साथ में एक उम्मीद भी। ये गीत एक ऐसे शख़्स की कहानी कहता है जो बुरी तरह टूट चुका है और जीवन में  लाचारियों के दौर से गुजरा रहा  है...  जिसकी ज़िंदगी की  खुशियों से दूर दूर तक का नाता नहीं है पर फ़िर  भी उम्मीद के एक कतरे की रोशनी उसे  जिलाए हुए है।

अमिताभ भट्टाचार्य ने कमाल के बोल रचे हैं फिल्म के किरदार की इन मनोभावनाओं को व्यक्त करने के लिए। रौशनी की इक बूँद पर जिंदा रहने की बात हो या हौसले की कुछ तीलियों को पकडे रहने की, उनके बिंब गीत की उदासी में भी आशा की ज्योत जला देते हैं। क्लिंटन का संगीत संयोजन गीत के उदास मूड को आत्मसात करता हुआ बोलों के पीछे मंद मंद बहता है। प्रील्यूड हो या इंटरल्यूड पियानो, गिटार और हल्के ताल वाद्यों के माध्यम से क्लिंटन गीत का माहौल रचते हैं । हक़ है तक पहुँचते पहुँचते वे द्रुत लय और कोरस का बेहतरीन प्रयोग करते हैं। संगीत संयोजन और गायन के आलावा गीत में जो मजीरा बजता है वो क्लिंटन ने ख़ुद बजाया है।




घोर अँधेरा, कहता रहा, हार जा
एक सितारा माना नहीं, ना डरा
रौशनी की इक बूँद पे, जिंदा रहा वो, जिंदा रहा वो
ज़िन्दगी की कुछ डोरियों को जकड़े हुए, कहता रहा
हक़ है मुझे जलने का
हक़ है मुझे जीने का
हक़ है मेरा अम्बर पे, ले के रहूँगा हक़ मेरा
ले के रहूँगा हक़ मेरा, करता हूँ वादा

मेरे लहू का क़तरा अभी गर्म है, एक अधूरा मेरा अभी कर्म है
दिन महीने हर साल की गिनता रहा वो, गिनता रहा वो
हौसले की कुछ तीलियों को पकड़े हुए, कहता रहा
हक़़ है मुझे जलने का.....

मैं जानता हूँ मुझे आख़िर एक ना एक दिन, मरना है
पर जब तलक भी जीऊँ वो जीना कैसा, तय करना है
मिटटी की काया में लोहे का है इरादा
हक़ है मुझे जलने का.....

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक
 

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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