जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
वार्षिक संगीतमाला में आज जो युगल गीत है उसे गाया है अभय जोधपुरकर के साथ मधुश्री ने। दक्षिण के संगीतकार अक्सर मधुश्री को अपनी फिल्मों में गवाते रहे हैं। हिंदी फिल्मों मे उन्होंने जितने भी गीत गाए हैं उनमें सबसे बड़ा हिस्सा ए आर रहमान के साथ है। मधुश्री की आवाज़ की बनावट और मिठास एक अलग तरह की है जिसकी वज़ह से उनके गाए गीतों को सहज ही पहचाना जा सकता है। फिल्म युवा में उनका गाया कभी नीम नीम कभी शहद शहद या फिर रंग दे वसंती का तू बिन बताए भला कौन भूल सकता है।
रहमान, एम एम क्रीम के बाद इस कड़ी में नाम जुड़ा है जस्टिन प्रभाकरन का जिन्होंने मधुश्री को मौका दिया फिल्म मीनाक्षी सुंदरेश्वर में।
मीनाक्षी सुंदरेश्वर दो ऐसे युवाओं की कथा है जिन्हें शादी के बाद अलग अलग रहना पड़ता है। पति पत्नी अलग अलग हैं फिर भी कोशिश कर रहे हैं कि उनके रिश्ते में जो प्रेम की लौ जल पड़ी है उसकी आँच को कम ना होने दें। राजशेखर की लेखनी के प्याले से हर पंक्ति में ये प्रेम छलका जाता है। मन केशर केशर में राजशेखर ने जो शब्दों के दोहराव का जो प्रयास किया था उसकी झलक इस गीत में भी दिखलाई देती है।
राजशेखर बिहार के एक किसान परिवार से आते हैं। बचपन में वे देखा करते कि उनके पिता दिन भर की बातें माँ को शाम को इकठ्ठे बताया करते थे। ये बात वैसे खेती किसानी क्या हर कामकाजी परिवेश परिवारों के लिए ये आज भी सही है। अंतर सिर्फ इतना हो गया है कि अगर आप आमने सामने ना भी हों तो फोन कॉल या चैटिंग के ज़रिए संवाद होता रहता है। इसलिए गीत के अंतरे में उन्होंने लिखा हमें सुबह से इसका इंतज़ार है कि जल्दी जल्दी शाम हो...कि पूरे दिन के क़िस्से हम बताएँगे तसल्लियों से रात को।
राजशेखर की माहिरी तब नज़र आती है जब वो लिखते हैं..जुगनू-जुगनू बन के, साथ-साथ जागे...जादू-जादू सब ये, जादुई सा लागे...टिमटिमा के देखो, हँस रहा वो तारा...क्या सुना लतीफ़ा, उसने फिर हमारा।
शब्दों का दोहराव और रूमानियत वाले भाव तो अपनी जगह पर टिमटिमा के देखने से लेकर तारों तक अपना लतीफा पहुँचाने की उनकी सोच मुझे तो बेहद पसंद आई। वैसे तो ये युगल गीत है पर मधुश्री की आवाज़ की छाप पूरे गीत में दिखाई देती है तो आइए पहले सुनते हैं ये गाना
तू यहीं है, आँखों के कोने में जगने सोने में, यहीं है तू तू यहीं है, हर पल रुसाने मुझको मनाने, यहीं है तू ये दूरी है दिल का वहम, संग मेरे है तू हरदम दम दम दम
तू यहीं है, होने, ना होने में ख़ुद को खोने में, यहीं है तू
हमें सुबह से इसका इंतज़ार है कि जल्दी जल्दी शाम हो कि पूरे दिन के क़िस्से हम बताएँगे तसल्लियों से रात को जुगनू-जुगनू बन के, साथ-साथ जागे जादू-जादू सब ये, जादुई सा लागे टिमटिमा के देखो, हँस रहा वो तारा क्या सुना लतीफ़ा, उसने फिर हमारा
जहाँ मिलते हैं रात और दिन वहीं चुपके से मिल लेंगे हम हम हम तू यहीं है, आँखों के कोने में....यहीं है तू. तू यहीं है, होने, ना होने में... यहीं है तू ये दूरी है...
इस गीत को फिल्माया गया है सान्या मल्होत्रा और मैंने प्यार किया वाली भाग्यश्री के बेटे अभिमन्यु पर
गीतों की मेरी सालाना रैंकिंग बताने का वक़्त पास आ रहा है। पर उससे पहले आप इन गीतों में अपनी पसंद का क्रम भी सजा लीजिए एक इनामी प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए।
अतरंगी रे की ही तरह मीनाक्षी सुंदरेश्वर बतौर एलबम मुझे काफी पसंद आया और इसीलिए इस फिल्म के भी कई गीत इस वार्षिक संगीतमाला में शामिल हैं। आज इसके जिस गीत की बात मैं करने जा रहा हूँ उसे आप Long Distance Relationship पर बनी इस फिल्म का आज की शब्दावली में ब्रेक अप सॉन्ग कह सकते हैं। ये गीत है रत्ती रत्ती रेज़ा रेज़ा, जो है तेरा ले जाना.....।
मन केसर केसर का जिक्र करते हुए मैंने आपको बताया था कि इस फिल्म के संगीतकार जस्टिक प्रभाकरन तमिल हैं और हिंदी फिल्मों में संगीत देने का ये उनका पहला मौका था। आप ही सोचिए कहाँ हिंदी पट्टी से आने वाले खालिस बिहारी राजशेखर और कहाँ जस्टिन (जिन्हें तमिल और अंग्रेजी से आगे हिंदी का क, ख, ग भी नहीं पता) ने आपस में मिलकर इतना बेहतरीन गीत संगीत रच डाला।
मैं इनके बीच की कड़ी ढूँढ ही रहा था कि राजशेखर का एक साक्षात्कार सुना तो पता चला कि वो सेतु थे फिल्म के युवा निर्देशक विवेक सोनी। फिल्म के गीत संगीत पर तो लॉकडाउन में काम चलता रहा पर स्थिति सुधरने के बाद ये तिकड़ी साथ साथ ही सिटिंग में बैठती रही। राजशेखर बताते हैं कि उन्हें बड़ी दिक्कत होती थी जस्टिन को गीतों के भाव समझाने में।
राजशेखर का हाथ अंग्रेजी में तंग था और जस्टिन अंग्रेजी के शब्दों का उच्चारण भी तमिल लहजे में करते थे। जब राजशेखर ने रत्ती रत्ती रेज़ा रेज़ा मुखड़ा रचा तो उसे सुनकर जस्टिन का मासूम सा सवाल था What ..meaning ? अब राजशेखर अगर शाब्दिक अनुवाद bits & pieces बताएँ तो शब्दों के पीछे की भावनाएँ गायब हो जाती थीं तो वे ऐसे मौकों पर चुप रह जाते। ऐसे में विवेक दुभाषिए का रोल अदा करते थे।
जस्टिन प्रभाकरन , विवेक सोनी और राजशेखर
फिल्म के गीतों पर काम करते करते जस्टिन को राजशेखर ने हिंदी के तीन चार शब्द तो रटवा ही दिए। एक मज़ेदार बात उन्होने ये सिखाई कि जस्टिन If someone asks you about lyrics you have to just say बहुत अच्छा 😀😀।
फिल्म की कथा शादी के बाद अलग अलग रह रहे नवयुगल के जीवन से जुड़ी है। वो कहते हैं ना कि जिनसे प्यार होता है उनसे उतनी जल्दी नाराज़गी भी हो जाती है। पास रहें तो थोड़ी नोंक झोंक के बाद मामला सलट जाता है पर दूरियाँ कभी कभी कई ऐसी गलतफहमियों को जन्म देती हैं जो नए नवेले रिश्ते की नर्म गाँठ को तार तार करने में ज्यादा वक़्त नहीं लगाती।
एक बार मन टूट जाए फिर उस शख़्स से लड़ने की भी इच्छा नहीं होती। इसलिए राजशेखर लिखते हैं
जाना अगर है तो जा, मुझे कुछ नहीं कहना ना यकीं हो रहा, संग हम दोनो का था बस इतना ही क्या क्या ही कहें, क्या ही लड़ें जब प्यार ही ना रहा
गीत का मुखड़ा तो क्या खूब लिखा है राजशेखर ने
रत्ती रत्ती रेज़ा रेज़ा, जो है तेरा ले जाना यादें बातें दिन और रातें, सब ले जा तू
और अंतरे में बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले की तर्ज पर जीवन में move on करने की बात करते हैं।
क्या करें कि जल्दी-जल्दी, तुझे भूल जाएँ अब साथ वाली सारी शामें, याद फिर ना आए अब छोटी-छोटी यादों में हम अटके रहें क्यूँ पीछे जाती सड़कों पे भटके रहें क्यूँ जो धागा-धागा उधड़ा है -क्या ही है बचा जो रेशा रेशा पकड़ा है - कर दे ना रिहा रत्ती रत्ती..सब ले जा तू
जस्टिन गीत की शुरुआत एक उदास करती धुन से करते हैं। गीत में मुख्यतः बाँसुरी और गिटार का प्रयोग हुआ है। इस युगल गीत को गाया है अभय जोधपुरकर और श्रेया घोषाल की जोड़ी ने। श्रेया तो संगीतप्रेमियों के लिए किसी परिचय का मोहताज नहीं। जहाँ तक अभय का सवाल है वे शाहरुख की फिल्म ज़ीरो के गीत मेरे नाम तू में अपनी गायिकी के लिए काफी सराहे गए थे। उस वक्त मैंने यहाँ उनके बारे में लिखा भी था।
अगर आप सोच रहे हों कि मैंने हर साल की तरह इस गीत की रैंक क्यूँ नहीं बताई तो वो इसलिए कि इस साल परिवर्तन के तौर पर गीत किसी क्रम में नहीं बजेंगे और गीतों की मेरी सालाना रैंकिंग सबसे अंत में बताई जाएगी।
हिंदी फिल्म संगीत में शंकर जयकिशन की जोड़ी को ये श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने फिल्मी गानों में आर्केस्ट्रा का वृहत पैमाने पर इस्तेमाल सिर्फ फिलर की तरह नहीं बल्कि गीत के भावों का श्रोताओं तक संप्रेषण करने मे भी किया। उनके गीतों में संगीत संयोजन की एक शैली होती थी जिसे आप सुन के पहचान सकते थे कि ये गीत शंकर जयकिशन का है। मराठी फिल्मों से अब हिंदी फिल्मों में पाँव पसारने वाले अजय अतुल नए ज़माने के संगीतकारों में एक ऐसे संगीतकार हैं जिनकी धुनों को आप उनके आर्केस्ट्रा आधारित संगीत से ही पकड़ सकते हैं।
अजय अतुल के संगीत में दो चीजें बड़ी प्रमुखता से आती हैं एक तो पश्चिमी वाद्यों वॉयलिन का कोरस और पियानो के स्वर और दूसरे हिंदुस्तानी ताल वाद्यों की धमक के साथ बाँसुरी की सुरीली तान। इस साल उनका संगीत धड़क, ठग आफ हिंदुस्तान, तुम्बाड और ज़ीरो में सुनाई पड़ा। धड़क के गीत तो इस गीतमाला में बज ही चुके हैं। आज वार्षिक संगीतमाला की दूसरी पॉयदान पर बज रहा है उनकी फिल्म ज़ीरो का गीत।
अजय व अतुल
इस गीत के पीछे की जो चौकड़ी है, मुझे नहीं लगता कि पहले कभी साथ आई है। अजय अतुल ज्यादातर अमिताभ भट्टाचार्य के साथ काम करते थे पर यहाँ गीत लिखने का जिम्मा मिला इरशाद कामिल को। अभय जोधपुरकर का तो ये हिंदी फिल्मों का पहला गीत था। शाहरुख भी अक़्सर विशाल शेखर या प्रीतम जैसे बड़े नामों के साथ ज्यादा दिखे हैं पर इस बार उन्होंने अजय अतुल को चुना। इस गीत की सफलता में संगीत संयोजन, बोल और गायिकी तीनों का हाथ रहा है और यही वज़ह है कि ये गीत मेरी गीतमाला का रनर्स अप गीत बन पाया है।
अभय जोधपुरकर
सबसे पहले तो आपकी उत्सुकता इस नयी आवाज़ अभय जोधपुरकर के बारे में जानने की होगी। अभय संगीत की नगरी इंदौर में पले बढ़े। चेन्नई में बॉयोटेक्नॉलजी का कोर्स करने गए और वहीं शौकिया तौर पर ए आर रहमान के संगीत विद्यालय में सीखने लगे। रहमान ने दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों में उन्हें गाने का मौका दिया। उनका पहला सबसे सफल गीत मणिरत्नम की फिल्म कदाल से था। 27 वर्षीय अभय ने कुछ साल पहले अजय अतुल की फिल्म का एक कवर गाया जिस पर अतुल की नज़र पड़ी। उन्हें उनकी आवाज़ पसंद आई और फिर ब्रदर के गीत सपना जहाँ को गाने के लिए उन्होंने अभय को बुलाया। अभय तब तो मुंबई नहीं जा पाए पर पिछले अक्टूबर में जब अतुल ने उन्हें एक बार फिर ज़ीरो के लिए संपर्क तो वो अगले ही दिन मुंबई जा पहुँचे।
स्टूडियो में अजय के आलावा, इरशाद कामिल और निर्देशक आनंद एल राय पहले से ही मौज़ूद थे। अभय से कुछ पंक्तियाँ अलग अलग तरह से गवाई गयीं और फिर पूरा गीत रिकार्ड हुआ। गीत की आधी रिकार्डिंग हो चुकी थी जब अभय और निर्देशक आनंद राय को भूख लग आई पर अजय ने विराम लेने से ये कह कर मना कर दिया कि अभी तुम्हारी आवाज़ में जो चमक है वो खाने के बाद रहे ना रहे। नतीजा ये हुआ कि अभय को इस गीत का एक हिस्सा खाली पेट ही रिकार्ड करना पड़ा जिसमेंके ऊँचे सुरों वाला दूसरा अंतरा भी था। ये गीत जितना मधुर बना पड़ा है उससे तो अब यही कहा जा सकता है कि उन्होंने "भूखे भजन ना होए गोपाला" वाली उक्ति को गलत साबित कर दिया।😀
गीत की शुरुआत वरद कथापुरकर द्वारा बजाई बाँसुरी की मोहक धुन से होती है। उसके बाद बारी बारी से पियानो और वायलिन का आगमन होता है। इरशाद कामिल के लिखे प्यारे मुखड़े के बीच भी वॉयलिन का कोरस सिर उठाता रहता है। मेरा नाम तू आते आते ताल वाद्य भी अपनी गड़गड़ाहट से अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। अजय अतुल के आर्केस्ट्रा में संगीत का बरबस उतार चढ़ाव दृश्य की नाटकीयता बढ़ाने में सहायक होता है। यहाँ भी इंटरल्यूड्स में वैसे ही टुकड़े हैं। खास बात ये कि गीत का दूसरा अंतरा पहले अंतरे की तरह शुरु नहीं होता और अभय की आवाज़ को ऊँचे सुरों पर जाना पड़ता है।
गीत की रूमानियत अंतरों में भी बरक़रार रहती है। वैसे तो गीत के पूरे बोल ही मुझे पसंद हैं पर ये पंक्ति खास अच्छी लगती है जब कामिल कहते हैं टुकड़े कर चाहे ख़्वाबों के तू मेरे ..टूटेंगे भी तू रहने हैं वो तेरे। अभय की आवाज़ में येसूदास की आवाज़ का एक अक्स दिखाई पड़ा। बड़े दिल ने उन्होंने इस गीत को निभाया है। तो चलिए इसे एक बार और सुन लें अगर आपने इसे पहले ना सुना हो।
वो रंग भी क्या रंग है मिलता ना जो तेरे होठ के रंग से हूबहू वो खुशबू क्या खुशबू ठहरे ना जो तेरी साँवरी जुल्फ के रूबरू तेरे आगे ये दुनिया है फीकी सी मेरे बिन तू ना होगी किसी की भी अब ये ज़ाहिर सरेआम है, ऐलान है जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू जब तक जहान में मेरा नाम है तब तक मेरे नाम तू उलझन भी हूँ तेरी, उलझन का हल भी हूँ मैं थोड़ा सा जिद्दी हूँ, थोड़ा पागल भी हूँ मैं बरखा बिजली बादल झूठे झूठी फूलों की सौगातें सच्ची तू है सच्चा मैं हूँ सच्ची अपने दिल की बातें दस्तख़त हाथों से हाथों पे कर दे तू ना कर आँखों पे पलकों के परदे तू क्या ये इतना बड़ा काम है, ऐलान है जब तक जहान ... मेरे नाम तू मेरे ही घेरे में घूमेगी हर पल तू ऐसे सूरज के घेरे में रहती है धरती ये जैसे पाएगी तू खुदको ना मुझसे जुदा तू है मेरा आधा सा हिस्सा सदा टुकड़े कर चाहे ख़्वाबों के तू मेरे टूटेंगे भी तू रहने हैं वो तेरे तुझको भी तो ये इल्हाम है, ऐलान है
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