कल जब राँची के दैनिक प्रभात खबर के मुख पृष्ठ पर छपी देश के एक पुराने नेता स्व.रामदत्त जोशी की कविता देखी तो आज के नेताओं के गिरते नैतिक स्तर पर बेहद रोष आया। आजकल के इस चुनावी माहौल में ये कविता बेहद प्रासंगिक है। पर इससे पहले कि आप रामदत्त जोशी जी की ये व्यंग्यात्मक कविता पढ़ें, थोड़ी जानकारी जोशी जी के बारे में आपसे बाँटता चलूँ जो इस अखबार और अंतरजाल के माध्यम से मुझे मिली है।
रामदत्त जोशी साहब साठ के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे। वे दो बार तब के उत्तरप्रदेश और आज के उत्तराखंड की काशीपुर विधानसभा सीट से विधानसभा के लिए चुने गए। १९६७ के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस के बड़े नेता और उत्तराखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को भी हरा दिया था। जोशी साहब की एक और कविता 'नैनीताल की शाम' भी बेहद चर्चित हुई थी। आज जब राजनीति, परिवारवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के दलदल में फँसती जा रही है, जोशी जी का सहज शब्दों में गिरते नैतिक मूल्यों पर ये कटाक्ष दिल को झकझोर जाता है। तो आइए पढ़ें और सुनें इस कविता को और संकल्प लें कि जहाँ तक हो सके हमारा वोट स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों के हक में ही पड़े
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जो बीत गया मैं वो कल हूँ
कलांतर ने परिभाषाएँ, शब्दों के अर्थ बदल डाले
सिद्धांतनिष्ठ तो सनकी है, खब्ती हैं नैतिकतावाले
नहीं धन बोटरने का शऊर, ज्यों बंद अकल के हैं ताले
ईमानदार हैं बेवकूफ, वह तो मूरख हैं मतवाले
आदर्शवाद है पागलपन, लेकिन मैं उसका कायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
निर्वाचित जनसेवक होकर भी मैंने वेतन नहीं लिया
जो फर्स्ट क्लॉस का नकद किराया भी मिलता था नहीं लिया
पहले दरजे में रेल सफ़र की फ्री सुविधा को नहीं लिया
साधारण श्रेणी में जनता के साथ खुशी से सफ़र किया
जो व्यर्थ मरुस्थल में बरसा मैं एक अकेला बादल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जनता द्वारा परित्यक्त विधायक को पेंशन के क्या माने
है एक डकैती कानूनी, जनता बेचारी क्या जाने ?
कानून बनाना जनहित में जिनका कर्तव्य वही जाने
क्यों अपने ही ऐश्वर्य वृद्धि के नियम बनाते मन माने
आँसू से जो धुल जाता है, दुखती आँखों का काजल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
सादा जीवन ऊँचे विचार, यह सब ढकोसलाबाजी है
अबके ज्यादातर नेतागण झूठे , पाखंडी पाजी हैं
कोई वैचारिक वाद नहीं, कोई सैंद्धांतिक सोच नहीं
सर्वोपरि कुर्सीवाद एक, जिसका निंदक मैं पागल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जन प्रतिनिधियों का जीवन स्तर, साधारण के ही समान
है लोकतंत्र में आवश्यक, समुचित है नैतिक संविधान
कोई कोरा उपदेश नहीं, गाँधीजी का कीर्तिमान
लंदन के राजमहल में भी, भारत के प्रतिनिधि ने महान
चरितार्थ किया आदर्शों को, जिनका मैं मन से कायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
कड़ियाँ, ईटों की छत दीवारें, दरकीं बिना पलस्तर की
टूटे उखड़े हैं फर्श और हैं फटी चादरें बिस्तर की
घर की न मरम्मत करा सका, दो बार विधायक रह कर भी
मैं एक खंडहरवासी हूँ, खुश हूँ इस बदहाली में भी
लाखों जनसाधारण हैं बेघर, उनकी पीड़ा से घायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
रामदत्त जोशी साहब साठ के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नेता थे। वे दो बार तब के उत्तरप्रदेश और आज के उत्तराखंड की काशीपुर विधानसभा सीट से विधानसभा के लिए चुने गए। १९६७ के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस के बड़े नेता और उत्तराखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी को भी हरा दिया था। जोशी साहब की एक और कविता 'नैनीताल की शाम' भी बेहद चर्चित हुई थी। आज जब राजनीति, परिवारवाद, भ्रष्टाचार और अपराधीकरण के दलदल में फँसती जा रही है, जोशी जी का सहज शब्दों में गिरते नैतिक मूल्यों पर ये कटाक्ष दिल को झकझोर जाता है। तो आइए पढ़ें और सुनें इस कविता को और संकल्प लें कि जहाँ तक हो सके हमारा वोट स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवारों के हक में ही पड़े
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जो बीत गया मैं वो कल हूँ
कलांतर ने परिभाषाएँ, शब्दों के अर्थ बदल डाले
सिद्धांतनिष्ठ तो सनकी है, खब्ती हैं नैतिकतावाले
नहीं धन बोटरने का शऊर, ज्यों बंद अकल के हैं ताले
ईमानदार हैं बेवकूफ, वह तो मूरख हैं मतवाले
आदर्शवाद है पागलपन, लेकिन मैं उसका कायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
निर्वाचित जनसेवक होकर भी मैंने वेतन नहीं लिया
जो फर्स्ट क्लॉस का नकद किराया भी मिलता था नहीं लिया
पहले दरजे में रेल सफ़र की फ्री सुविधा को नहीं लिया
साधारण श्रेणी में जनता के साथ खुशी से सफ़र किया
जो व्यर्थ मरुस्थल में बरसा मैं एक अकेला बादल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जनता द्वारा परित्यक्त विधायक को पेंशन के क्या माने
है एक डकैती कानूनी, जनता बेचारी क्या जाने ?
कानून बनाना जनहित में जिनका कर्तव्य वही जाने
क्यों अपने ही ऐश्वर्य वृद्धि के नियम बनाते मन माने
आँसू से जो धुल जाता है, दुखती आँखों का काजल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
सादा जीवन ऊँचे विचार, यह सब ढकोसलाबाजी है
अबके ज्यादातर नेतागण झूठे , पाखंडी पाजी हैं
कोई वैचारिक वाद नहीं, कोई सैंद्धांतिक सोच नहीं
सर्वोपरि कुर्सीवाद एक, जिसका निंदक मैं पागल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
जन प्रतिनिधियों का जीवन स्तर, साधारण के ही समान
है लोकतंत्र में आवश्यक, समुचित है नैतिक संविधान
कोई कोरा उपदेश नहीं, गाँधीजी का कीर्तिमान
लंदन के राजमहल में भी, भारत के प्रतिनिधि ने महान
चरितार्थ किया आदर्शों को, जिनका मैं मन से कायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ
कड़ियाँ, ईटों की छत दीवारें, दरकीं बिना पलस्तर की
टूटे उखड़े हैं फर्श और हैं फटी चादरें बिस्तर की
घर की न मरम्मत करा सका, दो बार विधायक रह कर भी
मैं एक खंडहरवासी हूँ, खुश हूँ इस बदहाली में भी
लाखों जनसाधारण हैं बेघर, उनकी पीड़ा से घायल हूँ
मैं एक अघोषित पागल हूँ



















