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रविवार, जुलाई 14, 2019

सूनी सूनी साँस के सितार पर ...नीरज की एक कविता जो बन गयी गीत Sooni Sooni Sanson Ke Sitar Par...

आधुनिक हिंदी कविता के प्रशंसकों में शायद ही कोई ऐसा हो जो गोपाल दास नीरज के गीतों, मुक्तक, दोहों और कविताओं से दो चार नहीं हुआ होगा। नीरज हिंदी फिल्मों में भी साठ और सत्तर के दशक में सक्रिय रहे और करीब पाँच दशकों बाद भी उनके गीत आज भी बड़े चाव से गाए व गुनगुनाए जाते हैं। नीरज जी के लिखे सबसे शानदार गीत सचिन देव बर्मन और शंकर जयकिशन जैसे संगीतकारों की झोली में गए। पर हिंदी फिल्म जगत में नीरज की पारी ज्यादा दिन नहीं चल सकी। सचिन दा और जयकिशन की मृत्यु और संगीत के बदलते परिवेश ने फिल्मी गीत लेखन से उनका मन विमुख कर दिया। 


उनके सफल दर्जन भर गीतों की बानगी लें तो उसमें हर रस के गीत मौज़ूद थे। प्रेम, (लिखे जो खत तुझे... रँगीला रे..., जीवन की बगिया महकेगी....) शोखी, (ओ मेरी ओ मेरी शर्मीली...., रेशमी उजाला है मखमली अँधेरा....) उदासी, (दिल आज शायर है, कैसे कहें हम..., खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को...., मेघा छाए आधी रात....) भक्ति, (राधा ने माला जपी श्याम की....) और हास्य (धीरे से जाना खटियन में खटमल...., ऐ भाई ज़रा देख के चलो...) जैसे सारे रंग मौज़ूद तो थे उनकी लेखनी में।

कवियों ने जब जब गीतकार की कमान सँभाली है तो अपनी कविताओं को गीतों में पिरोया है। धर्मवीर भारती की लिखी कविता  ये शामें सब की सब शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं.... याद आती है जिसका आांशिक प्रयोग सूरज का सातवाँ घोड़ा में हुआ था। नीरज ने कई बार अपनी कविताओं को गीत में ढाला। उनकी अमर रचना कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे को फिल्म "नए उमर की नई फ़सल " में हूबह लिया गया। नीरज की एक और कविता थी जिसका कुछ हिस्सा इस्तेमाल हुआ शंकर जयकिशन की  फिल्म लाल पत्थर के एक गीत सूनी सूनी साँस के  सितार ..  में गीत के अंतरे तो फिल्म के लिहाज से सहज बना दिए गए पर आज उनके उस गीत को सुनवाने से पहले वो कविता सुन लीजिए जो प्रेरणा थी उस गीत की।

नीरज की इस कविता में एक आध्यात्मिक सोच है जिस पर उदासी का मुलम्मा चढ़ा है। वे कहते हैं कि जीवन में कभी भी आपके चारों ओर सब कुछ धनात्मक उर्जा से भरा नहीं होता। जब एक ओर कुछ रिश्ते प्रगाढ़ होते रहते हैं तो वहीं किसी दूसरे संबंध में दरारें पड़ने लगती हैं। कहीं सृजन हो रहा होता है तो साथ ही कई विनाश गाथा रची जा रही होती है। कहीं प्रेम का ज्वार फूट रहा होता है तो कहीं उसी प्रेम को घृणा की दीवार तहस नहस करने को आतुर रहती है।  

वैसे भी इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है। सुख दुख के इन झोंकों के बीच हम जीवन की नैया खेते रहना ही शायद अमिट सत्य है जिसे जितनी जल्दी हम स्वीकार कर लें उतना ही बेहतर..। 

सूनी-सूनी साँस के सितार पर
गीले-गीले आँसुओं के तार पर
एक गीत सुन रही है ज़िन्दगी
एक गीत गा रही है ज़िन्दगी।
चढ़ रहा है सूर्य उधर, चाँद इधर ढल रहा
झर रही है रात यहाँ, प्रात वहाँ खिल रहा
जी रही है एक साँस, एक साँस मर रही
इसलिए मिलन-विरह-विहान में
इक दिया जला रही है ज़िन्दगी
इक दिया बुझा रही है ज़िन्दगी।
रोज फ़ूल कर रहा है धूल के लिए श्रंगार
और डालती है रोज धूल फ़ूल पर अंगार
कूल के लिए लहर-लहर विकल मचल रही
किन्तु कर रहा है कूल बूंद-बूंद पर प्रहार
इसलिए घृणा-विदग्ध-प्रीति को
एक क्षण हँसा रही है ज़िन्दगी
एक क्षण रूला रही है ज़िन्दगी।
एक दीप के लिए पतंग कोटि मिट रहे
एक मीत के लिए असंख्य मीत छुट रहे
एक बूंद के लिए गले-ढले हजार मेघ
एक अश्रु से सजीव सौ सपन लिपट रहे
इसलिए सृजन-विनाश-सन्धि पर
एक घर बसा रही है ज़िन्दगी
एक घर मिटा रही है ज़िन्दगी।
सो रहा है आसमान, रात हो रही खड़ी
जल रही बहार, कली नींद में जड़ी पड़ी
धर रही है उम्र की उमंग कामना शरीर
टूट कर बिखर रही है साँस की लड़ी-लड़ी
इसलिए चिता की धूप-छाँह में
एक पल सुला रही है ज़िन्दगी
एक पल जगा रही है ज़िन्दगी।
जा रही बहार, आ रही खिजां लिए हुए
जल रही सुबह बुझी हुई शमा लिए
रो रहा है अश्क, आ रही है आँख को हँसी
राह चल रही है गर्दे-कारवां लिए हुए
इसलिए मज़ार की पुकार पर
एक बार आ रही है ज़िन्दगी
एक बार जा रही है ज़िन्दगी।

उनकी कविता में  कहीं आशा का चढ़ता सूरज है कहीं निराशा की ढलती साँझ है। कहीं फूल धूल पर बिछने को तैयार बैठा है और वही धूल उस फूल की सुंदरता नष्ट करने पर तुली है। लहरें किनारों से मिलने के लिए उतावली हैं और किनारा पास आती लहरों पर प्रहार करने से भी नहीं सकुचा रहा। करोड़ों पतंगे एक दीप की चाह में अपने जीवन की कुर्बानियाँ दे रहे हैं। इष्ट मीत के प्रेम को पाने के लिए हम कितनों के प्रणय निवेदन को अनदेखा कर रहे हैं। इन सोते जागते पलों और बदलते जीवन में कहीं हँसी की खिलखिलाहट है तो कहीं रुदन का विलाप



नीरज ने फिल्म में अपनी कविता का मूल भाव और मुखड़ा वही रखते हुए अंतरों का सरलीकरण कर दिया। शंकर जयकिशन के साझा सांगीतिक सफ़र का वो आखिरी साल था। दिसंबर 1971 में इस फिल्म के प्रदर्शित होने के तीन महीने पहले जयकिशन लिवर की बीमारी की वजह से दुनिया छोड़ चुके थे। शास्त्रीय रचनाओं में प्रवीण ये संगीत रचना भी संभवतः शंकर की ही होगी। उन्होंने इस गीत को राग जयजयवंती पर आधारित किया था। 

शुरुआत और अंत में आशा जी के आलाप गीत को चार चाँद लगाते हैं। उनकी शानदार गायिकी की वज़ह से उस साल के फिल्मफेयर में ये गीत नामित हुआ था। गीत के इंटरल्यूड्स में सितार का बेहतरीन प्रयोग मन को सोहता है।

इस गीत को फिल्माया गया था राखी पर। दृश्य था कि राखी मंच पर अपना गायन प्रस्तुत कर रही हैं और उनके पीछे विभिन्न वाद्य यंत्र लिए वादक मंच पर बैठे हैं। मजे की बात ये कि गीत में पीछे दिखते वाद्यों में शायद ही किसी का प्रयोग हुआ है। बज तबला और सितार रहा है पर वो दिखता नहीं है। अपने पुराने प्रेम को भूलते हुए ज़िदगी में नायिका का नए सिरे से रमना कितना कठिन है। इसलिए नीरज गीत में कहते हैं कि एक सुर मिला रही है ज़िंदगी...एक सुर भुला रही है ज़िंदगी

सूनी सूनी साँस के सितार पर
भीगे भीगे आँसुओं के तार पर
एक गीत सुन रही है ज़िंदगी
एक गीत गा रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर ...

प्यार जिसे कहते हैं
खेल है खिलौना है
आज इसे पाना है कल इसे खोना है
सूनी सूनी ...... तार पर
एक सुर मिला रही है ज़िंदगी
एक सुर भुला रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर ...

कोई कली गाती है
कोई कली रोती है
कोई आँसू पानी है
कोई आँसू मोती है
सूनी सूनी ....... तार पर
किसी को हँसा रही है ज़िंदगी
किसी को रुला रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर .

   

राखी के आलावा इस फिल्म में थे राज कुमार और विनोद मेहरा और साथ ही थीं हेमा मालिनी एक विलेन के किरदार में

गुरुवार, अक्टूबर 19, 2017

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना..अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए Jalao Diye Par Rahe Dhyan Itna

दीपावली एक ऐसा पर्व है जिसे अकेले मनाने का मन नहीं होता। दीपावली के पहले की सफाई से लेकर उस दिन एक साथ पूजा करना, बड़ों से आशीर्वाद लेना ,बच्चों की खुशियों में साझेदार बनना मुझे हमेशा से बेहद पसंद रहा है।  खुशकिस्मत हूँ की मेरा कार्य मुझे ऐसे दीपावली मना पाने की सहूलियत देता है। पर सेना, पुलिस , अस्पताल और अन्य जरुरी सेवाओं में लगे लोगों को देखता हूँ तो मन में यही ख्याल आता है कि  काश  जंग ही नहीं होती, अपराध नहीं होते , लोग आपस में खून खराबा नहीं करते तो इन आकस्मिक और जरुरी सेवाओं की फेरहिस्त भी छोटी हो जाती। दरअसल एक साथ जुटने , खुशियों को बांटने के अलावा ये प्रकाशोत्सव  हमें मौका देता है की हम अपनी उन आंतरिक त्रुटियों को दूर करें ताकि घृणा , वैमनस्य, हिंसा जैसी भावनाएँ हमारे पास भी न भटकें।

आख़िर दीपावली में हम अपने घर भर में उजाला क्यों करते हैं? इसीलिए ना कि बाहर फैली रौशनी की तरह हमारा अंतर्मन भी प्रकाशित हो। हम सब के अंदर का कलुष रूपी तमस दीये की लौ के साथ जलकर  सदविचार में तब्दील हो सके। हिंदी के प्रखर कवि  गोपाल दास नीरज की एक कविता याद आ रही है जिसमें उन्होंने इसी विचार को अपने ओजपूर्ण शब्दों से संवारा था ।




जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,
उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए

इस कविता के माध्यम से कवि ये कहना चाहते हैं कि दीपावली में दीपक जलाकर रोशनी करना तो उत्सव का एक रूप है जो कि रात तक सिमट जाता है। पर वास्तव हमें ये पर्व ये संदेश देता है कि असली दीवाली तब मनेगी जब इस संपूर्ण संसार के लोगों के हृदय अंदर से जगमग हो जाएँ। ये तभी संभव हो पाएगा हर मानव के अंदर सदाचार, ईमानदारी व कर्मठता का दीप जल उठेगा।


दीपावली का ये मंगल पर्व एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशिया लाए  और हम  सब को एक बेहतर मानव बनने को प्रेरित कर सके इन्हीं आशाओं  और शुभकामनाओं के साथ!

शुक्रवार, जून 19, 2015

मैं क्यों प्यार किया करता हूँ? : गोपाल दास नीरज Main kyun pyar kiya karta hoon Gopal Das Neeraj

आदमी को आदमी बनाने के लिए
जिंदगी में प्यार की कहानी चाहि
और कहने के लिए कहानी प्यार की
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए...


गोपाल दास नीरज की इन पंक्तियों से कौन नहीं वाकिफ़ होगा। बिल्कुल सही कहा नीरज ने अगर हममें प्रेम का भाव नहीं हो तो फिर हम इंसान ही नही है। सच मानिए ज़िदगी का जितना हिस्सा इस भाव में डूबा रहे हम उतने ही स्नेहिल, खुशमिजाज़ व उर्जावान हो जाते हैं।  ऐसे में आप अपने से ज्यादा दूसरों के बारे में सोचते हैं। स्वार्थ की परछाई आपको छू भी नहीं पाती। संसार में आपके वज़ूद को एक वजह मिल जाती है। ये स्थिति आपको अपनी परिपूर्णता का अहसास दिलाती है। ऐसी अवस्था में दुखों से घिरा होने के बावजूद आप उसके प्रभावों से मुक्त रहते हैं ।

दूसरी ओर ये भी सच है कि प्रेम में हों तो  पीड़ा भी होती है। पर ये वो पीड़ा है जो आपको अश्रुविगलित करते हुए भी आपके मन आँगन को धो डालती है। आप उस व्यथा से गुजर कर अपने मन को पहले से अधिक निर्मल पाते हैं। सो प्रेम में पड़िए और बार बार पड़िए चाहे वो 
प्रेम बच्चों, नाते रिश्तादारों, संगी साथियों, सहचरों या जरूरतमंदों से ही की क्यूँ ना हो। 

हो सकता है आपको अब भी मेरे तर्क कुछ खास जम नहीं रहें हों कोई बात नहीं मेरी नहीं मानते ना सही गोपाल दास नीरज की बात तो मानेंगे ना आप तो चलिए आज उनका ये प्यारा सा गीत ही सुनवा देता हूँ। आवाज़ जरूर मेरी है..




सर्वस देकर मौन रुदन का क्यों व्यापार किया करता हूँ?
भूल सकूँ जग की दुर्घातें उसकी स्मृति में खोकर ही
जीवन का कल्मष धो डालूँ अपने नयनों से रोकर ही
इसीलिए तो उर-अरमानों को मैं छार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


कहता जग पागल मुझको, पर पागलपन मेरा मधुप्याला
अश्रु-धार है मेरी मदिरा, उर-ज्वाला मेरी मधुशाला
इससे जग की मधुशाला का मैं परिहार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


कर ले जग मुझसे मन की पर, मैं अपनेपन में दीवाना
चिन्ता करता नहीं दु:खों की, मैं जलने वाला परवाना
अरे! इसी से सारपूर्ण-जीवन निस्सार किया करता हूँ


मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?


उसके बन्धन में बँध कर ही दो क्षण जीवन का सुख पा लूँ
और न उच्छृंखल हो पाऊँ, मानस-सागर को मथ डालूँ
इसीलिए तो प्रणय-बन्धनों का सत्कार किया करता हूँ


 मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?

 (उर : दिल,  सर्वस : सर्वस्व,  कल्मष : मैल,  परिहार  : त्यागने की क्रिया )

गुरुवार, जून 30, 2011

गोपाल दास 'नीरज' कुछ पसंदीदा मुक्तक

गोपाल दास नीरज की कविताओं और उनकी कुछ पसंदीदा ग़ज़लों को पहले भी पेश कर चुका हूँ। पर नीरज का काव्य संसार उनकी कविताओं और ग़ज़लों तक ही सीमित नहीं है। उर्दू रुबाइयों के अंदाज में उन्होंने जो चंद पंक्तियाँ लिखीं उन्होंने उसको 'मुक्तक' का नाम दिया। और क्या कमाल के मुक्तक लिखे हैं गोपाल दास नीरज जी ने..

प्रसिद्ध काव्य समीक्षक शेरजंग गर्ग नीरज के मुक्तकों की लोकप्रियता के बारे में लिखते हैं..

नीरज के मुक्तक बेहिसाब सराहे गए। इसका एक कारण नीरज की मिली जुली गंगा जमुनी भाषा थी। जिसे समझने के लिए शब्दकोष उलटने की जरूरत नहीं थी। इसमें हिंदी का संस्कार था तो उर्दू की ज़िंदादिली। इन दोनों खूबियों के साथ नीरज के अंदाजे बयाँ ने अपना हुनर दिखाया और उनके मुक्तक भी गीतिकाओं के समान यादगार और मर्मस्पर्शी बन गए।

आज नीरज के लिखे अपने पसंदीदा मुक्तकों से आपका परिचय कराता हूँ। आशा है ये आप को भी उतने ही पसंद आएँगे जितने मुझे आते हैं...


(1)
कफ़न बढ़ा तो किस लिए नज़र तू डबडबा गई?
सिंगार क्यों सहम गया बहार क्यों लजा गई?
न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ बस इतनी सिर्फ बात है ‌
किसी की आँख खुल गई, किसी को नींद आ गई।

(2)
खुशी जिसने खोजी वह धन ले के लौटा,
हँसी जिसने खोजी चमन ले के लौटा,
मगर प्यार को खोजने जो चला वह
न तन ले के लौटा, न मन ले के लौटा।

(3)
रात इधर ढलती तो दिन उधर निकलता है
कोई यहाँ रुकता तो कोई वहाँ चलता है
दीप औ पतंगे में फ़र्क सिर्फ इतना है
एक जलके बुझता है, एक बुझके जलता है

(4)
बन गए हुक्काम वे सब जोकि बेईमान थे,
हो गए लीडर की दुम जो कल तलक दरबान थे,
मेरे मालिक ! और भी तो सब हैं सुखी तेरे यहाँ,
सिर्फ़ वे ही हैं दुखी जो कुछ न बस इंसान थे।

(5)
छेड़ने पर मौन भी वाचाल हो जाता है, दोस्त !
टूटने पर आईना भी काल हो जाता है दोस्त
मत करो ज्यादा हवन तुम आदमी के खून का
जलके काला कोयला भी लाल हो जाता है दोस्त !

चलते चलते गोपाल दास नीरज द्वारा अपनी काव्य रचनाओं पर लिखी बात उद्धृत करना चाहूँगा
जब लिखने के लिए लिखा जाता है तब जो कुछ लिखा जाता है उसका नाम है गद्य। पर जब लिखे बिना न रहा जाए और जो खुद खुद लिख जाए तो उसका नाम है कविता। मेरे जीवन में कविता लिखी नहीं गई। खुद लिख लिख गई है, ऐसे ही जैसे पहाड़ों पर निर्झर और फूलों पर ओस की कहानी।

शुक्रवार, मई 21, 2010

गोपालदास 'नीरज' का जीवन दर्शन : उनके चार विचारों के साथ !

जिंदगी को देखने और महसूस करने के हमारे मापदंड समय और हमारी सोच में हो रहे निरंतर विस्तार से बदलते रहते हैं। वक़्त से आगे देख पाने की सोच, एक आम मानव की प्रकृति में नहीं है। दरअसल हमारे अपने जीवन में जो घटित होता रहता है उसे ही जीवन का सच मानने के लिए हम तैयार बैठे रहते हैं।



पर जिस जीवन दर्शन को समझ पाने में शायद हम अपनी पूरी जिंदगी निकाल दें उसे गोपाल दास नीरज जैसा सक्षम कवि चंद पंक्तियों में कैसे व्यक्त कर देता है ये कविता इसका एक सुंदर उदाहरण है।

इस कविता के माध्यम से नीरज इस बात को सरल सहज शब्दों में पुरजोर तरीके से रखते हैं कि किसी मनुष्य के लिए जीवन की परिभाषा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अब तक जिंदगी के किन रंगों का स्वाद चखा है?

तो आइए जीवन के प्रति नीरज के अनुभवो से रूबरू होते हैं उनकी इस कविता चार विचार में...

(1)
जो पुण्य करता है वह देवता बन जाता है,
जो पाप करता है वह पशु बन जाता है,

और जो प्रेम करता है वो आदमी बन जाता है


(2)
जब मैंने प्रेम किया तो मुझे लगा जीवन आकर्षण है,
जब मैंने भक्ति की तब मुझे लगा जीवन समर्पण है,

किंतु जब से मैंने सेवाव्रत लिया
तब
मुझे पता चला कि जीवन सबसे पहले सर्जन है

(3)
जब मैं बैठा था तो समझता था कि जीवन उपस्थिति है,
जब मैं खड़ा था तब समझता था कि जीवन स्थिति है,

किंतु जब मैं चलने लगा तब लगने लगा, "जीवन गति है"


(4)
जब तक मैं पुकारता रहा
तब तक समझता रहा कि जीवन तुम्हारी आवाज़ है

और जब मैं स्वयम् को पुकारने लगा

तो कहने लगा जीवन अपनी ही आवाज़ है

किंतु जिस दिन मैंने संसार को पुकारना शुरु किया है

उस दिन से मुझे लगने लगा है

कि जीवन मेरी और तुम्हारी नहीं

उन सबकी आवाज़ है
जिनकी कि कोई आवाज़ ही नहीं है.....

पता नहीं आपने जीवन के किन रूपों का अब तक अनुभव किया है । हो सकता है आपका नज़रिया भिन्न हो? पर सारे नज़रियों को मिला कर देखें तो शायद सबमें ही जीवन का कोई ना कोई सच छुपा बैठा मिले।

अब ऊपर के चित्र को ही लें। किसी को वो खरगोश नज़र आया होगा तो किसी को बत्तख! पर वास्तविकता तो ये है कि चित्र में ये दोनों ही रूप विद्यमान है। शायद जिंदगी भी ऐसा ही एक चित्र है जिसमें कई सारे चित्र समाए बैठे हैं...क्यूँ है ना?

मंगलवार, अगस्त 25, 2009

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए, जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए : 'नीरज' की कविता उन्हीं के स्वर में..

गोपाल दास नीरज की कविताएँ मुझे हमेशा से भाती रही हैं। दरअसल स्कूल की किताबों का साथ छूटने के साथ ही हिंदी कविता से अपना नाता टूट ही जाता गर टीवी के कवि सम्मेलनों में नीरज को नहीं सुना होता। रोमन हिंदी से हिंदी चिट्ठे की शुरुआत करने पर मुझे सबसे पहले नीरज ही याद आए थे। नीरज की ओजवान वाणी में उनके प्रवाहपूर्ण और रससिक्त गीतों को सुनना अपने आप में एक अनुभव हुआ करता था।

चाहे आज के आलोचक और हिंदी साहित्य के कर्णधार माने ना माने पर इस बात में दो राय नहीं कि आम जन तक हिंदी कविताओं को लोकप्रिय बनाने में तुकान्त कविताओं का मुक्त छंद की कविताओं से कहीं ज्यादा हाथ रहा है। खुद नीरज ने एक साक्षात्कार में कहा था

हमारे ज़माने में हम कविता को लिखने और उसे तराशने में काफी मेहनत किया करते थे। हर एक शब्द सोच समझकर कविता का अंग बनता था। आजकल तो ज्यादातर मुक्त छंद लिखा जा रहा है जिसे मैं कविता नहीं मानता।
मुक्त छंद को कविता ना मानने की बात तो शायद वो तल्ख़ी में कह गए होंगे जिससे शायद बहुत कम ही लोग सहमत होंगे। पर जब मैं कवियों से ये सुनता हूँ कि उनकी रचना इसलिए लौटा दी गई कि वो तुकांत थी बड़ा विस्मय होता है। कोई आश्चर्य नहीं की हिंदी कविता का पाठक वर्ग दिनों दिन सिकुड़ता रहा है। मेरा ये मानना है कि छंदबद्ध या मुक्त छंद दोनों ही तरह से लिखी कविताओं को बिना किसी भेदभाव के उन में कही हुई बातों के आधार पर संपादकों को चुनना चाहिए।

नीरज को इधर दूरदर्शन पर सुने एक अर्सा हो गया था। बहुत दिनों से मैं उनकी आवाज़ में कोई रिकार्डिंग ढूँढने की जुगत में लगा था कि मुझे उनका ये आडिओ नेट पर नज़र आया जिसे शायद ही कोई नीरज प्रेमी कवि सम्मेलनों में नहीं सुन पाया होगा। नीरज़ के अंदाजे बयाँ से हम सभी भली भांति वाकिफ़ हैं। तो क्यूँ ना उनका वही पुराना अंदाज आज इस प्रविष्टि में दोहरा जाएएएएएए..


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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमे इंसान को इंसान बनाया जाए


जिसकी ख़ुशबू से महक जाए पड़ोसी का घर
फूल इस किस्म का हर सिमत खिलाया जाए


आग बहती है यहाँ गंगा में भी ज़मज़म में भी
कोई बतलाये कहाँ जा के नहाया जाए
(ज़मज़म : मक्का में स्थित कुएँ का नाम जिसके जल को मुस्लिम उतना ही पवित्र मानते हैं जैसे हिंदू गंगा जल)

मेरा मक़सद है ये महफिल रहे रौशन यूँ ही
खून चाहे मेरा दीपो में जलाया जाए

मेरे दुःख-दर्द का तुम पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुमसे भी ना खाया जाए

जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसा
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए

गीत गुमसुम है, ग़ज़ल चुप है, रुबाई है दुखी
ऐसा माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए

नीरज की इस ग़ज़ल का हर शेर लाज़वाब है। भला कोई भी संवेदनशील श्रोता क्यों न उन्हें सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाए। सरल भाषा में भी लेखनी की धार के पैनेपन से कोई समझौता नहीं। इसीलिए मन में बार बार यही बात उठती है

गीत हो, कविता हो, मुक्तक हो या हो ग़ज़ल
नीरज को दिल से ना भुलाया जाएएएएएए..

शुक्रवार, मई 01, 2009

कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में..हर शख़्स जिंदा लाश है इस तेज धूप में

चुनावों के चरण दर चरण खत्म होते जा रहे हैं। पर नक्सलियों के आतंक से ज्यादा सूर्य देवता ही अपना रौद्र रूप दिखलाकर मतदाताओं को बाहर निकलने से रोक रहे हैं। मई महिना शुरु होने के पहले ही गर्मी ये रंग दिखाएगी इसकी शायद चुनाव आयोग ने भी कल्पना नहीं की होगी। अपनी कहूँ तो इस जलती तपती गर्मी में घर या आफिस के अंदर दुबके रहने की इच्छा होती है। फिर भी खाने के समय स्कूटर पर बिताए वो दस मिनट ही आग सदृश बहती लपटों से सामना करा देते हैं।


ऍसे में अगर और भी गर्म इलाकों का दौरा करना पड़े तो इससे बदकिस्मती क्या होगी। पर पिछले हफ्ते कार्यालय के काम से छत्तिसगढ़, झारखंड और उड़ीसा के गर्मी से बुरी तरह झुलसते इलाकों से होकर गुजरना पड़ा। रास्ते भर खिड़की की शीशे से सुनसान खेतों और सड़कों का नज़ारा दिखता रहा।

पानी की तलाश में सुबह से ही मटकियाँ भर कर ले जाती औरते हों या गाँव की कच्ची सड़कों पर साइकिल से स्कूल जाते बच्चे सब के सब मौसम की इस मार से त्रस्त दिखे। कम से कम हम लोगों को तो कार्यालय का वातानुकूलित वातावरण गर्मी से राहत दिला देता है, पर जिन्हें दो वक्त की रोटी जुगाड़ने और रोज़मर्रा के कामों के लिए बाहर निकलना ही है उनके लिए इस धूप को झेलने के आलावा और चारा ही क्या है।

मुझे याद आती है गोपाल दास 'नीरज' जी एक एक हिंदी ग़ज़ल जो गर्मी की इस तीव्र धूप से झुलसते हुए एक दिन के हालातों को बखूबी अपनी पंक्तियों में समेटती है। आप भी पढ़े ये ग़ज़ल जिसमें नीरज गर्मी से बदहवास शहर की व्यथा चित्रित करते करते अपने समाज की आर्थिक विषमता को भी रेखांकित कर गए हैं...

कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में
हर शख़्स जिंदा लाश है इस तेज धूप में


हारे थके मुसाफ़िरों आवाज़ दो उन्हें
जल की जिन्हें तलाश है इस तेज़ धूप में


दुनिया के अमनो चैन के दुश्मन हैं वही तो
अब छाँव जिनके पास है इस तेज़ धूप में


नंगी हरेक शाख हरेक फूल है यतीम
फिर भी सुखी पलाश है इस तेज़ धूप में


पानी सब अपना पी गई खुद हर कोई नदी
कैसी अज़ीब प्यास है इस तेज़ धूप में


बीतेगी हाँ बीतेगी दुख की घड़ी जरूर
नीरज तू क्या उदास है इस तेज़ धूप में..


इस चिट्ठे पर प्रस्तुत ग़ज़लों और नज़्मों की सूची आप यहाँ देख सकते हैं।

गुरुवार, मार्च 30, 2006

छिप छिप अश्रु बहाने वालों ........

जिन्दगी में छोटी बड़ी मायूसी तो आती जाती रहती हैं । उन्हें कितने दिनों कोई अपने ऊपर हावी होने देता रहे । नीरज की ये कविता उन लोगों पर एक तीखा कटाक्ष है जो सपनों के टूटने और किसी के जुदा होने का मातम इस तरह मनाते हैं जैसे उसके आलावा उनकी जिन्दगी के कोई मायने ही ना हों ।
ये कविता हमें प्रेरित करती है गम के अंधेरों से बाहर निकलने की ...
और इस कठोर यथार्थ को समझने की, कि संगी साथी, सपने सब छूट जायें भी तो ये जीवन चलता रहता है,.बिना रुके बिना थमें...
तो क्यूँ ना हम बिखरे हुये तिनकों को जोड़ें और चल पड़ें जीवन रुपी पर्व का हर्षोल्लास से स्वागत करने!:)

रविवार, मार्च 26, 2006

आधुनिक हिन्दी कविता क्यूँ है भूली बिसरी ?

अगर हास्य कवियों की बात छोड दी जाए तो आधुनिक हिन्दी कविता के इस युग में इक आध ही ऐसे कवि हैं जिन्हें सुनने में असीम आनंद की अनुभूति होती हो । क्यूँ है ऐसी हालत इस युग की कविता की ? इस दुर्दशा का एक कारण तो ये भी रहा है कि आज के कवियों ने कविता के नये स्वरूप में सिर्फ विचारों को अहमियत दी और लय को तुकबंदी का नाम दे के उसकी सर्वथा उपेछा की ।

मेरा ये मानना है कि अगर भावना में कविता के प्राण बसते हैं तो उसकी लय में उसका शरीर। शब्दों को लय की वेणी से गुथा जाए तो उसके भाव संगीत की लहर पैदा कर आत्मा तक पहुँचते हैं । आत्मा कितनी पवित्र क्यूँ ना हो, शरीर के बिना उसका शिल्प अधूरा है।

इसलिये अगर आप से कोई ये कहे कि हिन्दी कविता सुनाओ तो यकीनन आप आज की पत्र पत्रिकाओं में छपने वाली नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ी गयी कोई कविता ही सुनाएँगे । क्यूँकि उस वक्त की कविता दिल में बसती थी और आज की कागज के पन्नों पर ।

इसलिये आज भी अगर कबीर और रहीम के दोहों में आप सही दिशा खोज पाते हों .....आज भी अगर दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान की कृतियाँ याद कर ही आपके खून में गर्मी आ जाती हो........ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की भाव प्रवणता देख के आज भी आपकी आखें नम हो जाती हों ....मैथलीशरण गुप्त कि यशोधरा और बच्चन की मधुशाला का प्रतिबिम्ब आज भी आपकी यादों में विद्यमान हो.... तो आगे की कड़ियों में आपकी भागीदारी चाहूँगा१

इस ब्लॉग की पहली वर्षगांठ जो अगले महिने आ रही है उसी पुरानी हिन्दी कविता को समर्पित रहेगी। शुरूआत करूँगा मैं गोपाल दास नीरज से जो आज के युग से ताल्लुक रखने के बावजूद उसी पुरानी काव्य शैली का निर्वहन करते आये हैं। कविता लिखने के साथ साथ उसे लयबद्ध तरीके से गाने में उनका कोई सानी नहीं है । इस मायने में उन्होंने बच्चन की विरासत को आगे बढ़ाया है.....
 

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