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बुधवार, जनवरी 20, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 17 : ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. O Sathi Mere..

वर्षिक संगीतमाला का सफ़र अब मुड़ रहा हैं थिरकते, मुस्कुराते गीतों से अपेक्षाकृत गंभीर और रूमानी गीतों की तरफ़ और इस कड़ी की पहली पेशकश है सत्रहवीं पायदान पर बैठा तनु वेड्स मनु रिटर्न का ये नग्मा। संगीतकार क्रस्ना सोलो व गीतकार राजशेखर की जोड़ी इससे पहले 2011 में वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत यानि शीर्ष पर रहने का तमगा हासिल कर चुकी है। ज़ाहिर है जब इस फिल्म का सीक्वेल आया तो इस जोड़ी के मेरे जैसे प्रशंसक को थोड़ी निराशा जरूर हुई।

पिछली फिल्म में शर्मा जी के प्यार का भोलापन पहली फिल्म में राजशेखर से कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े और रंगरेज़ जैसे गीत लिखा गया था। पर सीक्वेल में चरित्र बदले परिवेश बदला उसमें गीतकार संगीतकार के लिए पटकथा ने कुछ ज्यादा गंभीर व प्यारा करने लायक छोड़ा ही ना था। लिहाजा गीत संगीत फिल्म की परिस्थितियों के अनुरूप लिखे गए जो देखते समय तो ठीक ही ठाक लगे पर कानों में कोई खास मीठी तासीर नहीं छोड़ पाए। फिल्म देखने के बाद जब इस एलबम के गीतों को फिर से सुना तो एक गीत ऐसा मिला जिसे मैं फिल्म की कहानी से जोड़ ही नहीं पाया क्यूँकि शायद इसका फिल्म में चित्रांकन तो किया ही नहीं गया था। अब जब नायिका के तेवर ऐसे हों कि शर्मा जी हम बेवफ़ा क्या हुए आप तो बदचलन हो गए तो फिर शर्मा जी क्या खाकर बोल पाते कि ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. हाथों की अब गिरह दी ऐसे की टूटे ये कभी ना..


बहरहाल गीत की परिस्थिति फिल्म में भले ना बन पाई हो राजशेखर के लिखे बेहतरीन बोलों और सोनू निगम की गायिकी ने इस गीत का दाखिला संगीतमाला में करा ही दिया। बिहार के मधेपुरा के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले हुनरमंद राजशेखर के मुंबई पहुँचने की कहानी तो आपको यहाँ मैं पहले ही बता चुका हूँ। पिछले साल बिहार के चुनावों में बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो का उनका गीत खासा लोकप्रिय हुआ। बचपन में माँ पापा से नज़रे बचाकर पन्द्रह  सोलह घंटे रेडियो सुनने वाले इस बालक के लिखे गाने लोग उसी रेडियो पर बड़े चाव से सुन रहे हैं।

ज़िदगी का खट्टा मीठा सफ़र अपने प्रियतम के साथ गुजारने की उम्मीद रखते इस गीत की सबसे प्यारी पंक्तियाँ मुझे वो लगती हैं जब राजशेखर कहते हैं..

हम जो बिखरे कभी
तुमसे जो हम उधड़े कहीं
बुन लेना फिर से हर धागा
हम तो अधूरे यहाँ
तुम भी मगर पूरे कहाँ
करले अधूरेपन को हम आधा

सच अपने प्रिय से ऐसी ही उम्मीद तो दिल में सँजोए रखते हैं ना हम !

संगीतकार क्रस्ना सोलो का नाम अगर आपको अटपटा लगे तो ये बता दूँ कि वो ये उनका ख़ुद का रचा नाम है ताकि जब वो अपने विश्वस्तरीय संगीतज्ञ बनने का सपना पूरा कर लें तो लोगों को उनके नाम से ख़ुद को जोड़ने में दिक्कत ना हो। वैसे माता पिता ने उनका नाम अमितव सरकार रखा था। क्रस्ना ने इस गीत की जो धुन रची है वो सामान्य गीतों से थोड़ी हट के है और इसीलिए उसे मन तक उतरने में वक़्त लगता है। मुखड़े के बाद का संगीत संयोजन गीत के बोलों जितना प्रभावी नहीं है। रही गायिकी की बात तो कठिन गीतों को चुनौती के रूप में स्वीकार करना सोनू निगम की फितरत रही है। इस गीत में बदलते टेम्पो को जिस खूबसूरती से उन्होंने निभाया है वो काबिले तारीफ़ है। तो आइए सुनें ये गीत..

 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..
हाथों की अब गिरह दी ऐसे
की टूटे ये कभी ना..

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे
छूटे ना फिर भी धरती से पाँव रे
आग और पानी से फिर लिख दें वो वादे सारे
साथ ही में रोए हँसे, संग धूप छाँव रे
ओ साथी मेरे..

हम जो बिखरे कभी
तुमसे जो हम उधड़े कहीं
बुन लेना फिर से हर धागा
हम तो अधूरे यहाँ
तुम भी मगर पूरे कहाँ
कर ले अधूरेपन को हम आधा
जो भी हमारा हो मीठा हो या खारा हो
आओ ना कर ले हम सब साझा
ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे ..

 गहरे अँधेरे या उजले सवेरे हों
ये सारे तो हैं तुम से ही
आँख में तेरी मेरी उतरे इक साथ ही
दिन हो पतझड़ के रातें या फूलों की
कितना भी हम रूठे पर बात करें साथी
मौसम मौसम यूँ ही साथ चलेंगे हम
लम्बी इन राहों में या फूँक के फाहों से
रखेंगे पाँव पे तेरे मरहम

आओ मिले हम इस तरह
आए ना कभी विरह
हम से मैं ना हो रिहा
हमदम तुम ही हो
हरदम तुम ही हो
अब है यही दुआ
साथी रे उम्र के सलवट भी साथ तहेंगे हम
गोद में ले के सर से चाँदी चुनेंगे हम
मरना मत साथी पर साथ जियेंगे हम
ओ साथी मेरे..  

वार्षिक संगीतमाला 2015

सोमवार, फ़रवरी 03, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 10 : भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए (Bhagan Ke Rekhan ki...)

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर एक बार फिर गीत है फिल्म इसक का।  पर इस गीत की प्रकृति एक पॉयदान पहले आए गीत झीनी झीनी से सर्वथा अलग है। इस गीत में प्यार की फुहार नहीं बल्कि शादी के बाद अपने घर से विदा होती एक बिटिया का दर्द छुपा है।  जहाँ लोक गायिका मालिनी अवस्थी इस दर्द को अपनी सधी आवाज़ से जीवंत कर देती हैं वहीं रघुबीर यादव अपने गाए अंतरे में शादी के माहौल को हमारे सामने रचते नज़र आते हैं। 


बनारस की सरज़मीं पर रची इस प्रेम गाथा में निर्देशक इस विदाई गीत को आंचलिक रूप देना चाहते थे। यही वज़ह है कि इसके लिए गीत की भाषा में भोजपुरी के कई शब्द लिये गए और गीतकार भी ऐसा चुना गया जो इस बोली से भली भांति वाकिफ़ हो। गीतकार के रूप में अनिल पांडे चुन लिए गए तो गायक गायिका की खोज़ शुरु हुई। अब बात भोजपुरी की हो तो NDTV Imagine रियालटी शो जुनून कुछ कर दिखाने का से बतौर लोकगायिका अपनी पहचान बनाने वाली मालिनी अवस्थी को चुनाव लाज़िमी था। जहाँ तक रघुबीर यादव का सवाल है तो उनकी गायिकी में हमेशा ज़मीन की मिट्टी की सी सोंधी खुशबू से भरपूर रही है। 


अनिल पांडे ने एक लड़की के भाग्य में आते उतार चढ़ाव के लिए "बँहगी" का रूपक चुना। बँहगी का शाब्दिक अर्थ भार ढोने वाले उस उपकरण से लिया जाता है जिसमें  एक लम्बे बाँस के टुकड़ें के दोनों सिरों पर रस्सियों के बडे बड़े  दौरे लटका दिये जाते हैं और जिनमें बोझ रखा जाता है। जब कोई श्रमिक इस बँहगी को ले कर चलता है तो बँहगी  लचकती चलती है। इसीलिए अनिल लिखते हैं भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए ...

इसक फिल्म के इस गीत को संगीतबद्ध किया है क्रस्ना ने। ये वही क्रस्ना हैं जिन्होंने तनु वेड्स मनु के गीतों के माध्यम से दो साल पहले वार्षिक संगीतमाला की सर्वोच्च पॉयदान पर अपना कब्जा जमाया था। पहली बार मैंने जब इस गीत की आरंभिक पंक्तियाँ सुनी तो मुझे आश्चर्य हुआ कि क्रस्ना ने छठ की पारम्परिक धुन को गीत के मुखड़े में क्यूँ प्रयुक्त किया। क्रस्ना इस बारे में अपने जालपृष्ठ पर लिखते हैं

"बहुत से लोग ये समझेंगे कि ये एक परम्परागत लोक गीत है। पर पहली दो पंक्तियों की धुन को छोड़ दें  तो मैंने इसे अपनी तरह से विकसित किया है। हालांकि मैं चाहता तो छठ की इस धुन के बिना भी इस गीत को बना सकता था पर कई बार बरसों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा से लोग जल्दी जुड़ जाया करते हैं। इस मुद्दे पर मेरी फिल्म के निर्देशक जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं से काफी बहस हुई पर उनके आग्रह पर मैंने शुरुआत उस धुन से कर एक दूसरे रूप में गाने को आगे बुना। मुझे लगता है कि मालिनी अवस्थी और रघुबीर यादव ने गाने के बारे में मेरी सोच को अपनी गायिकी के माध्यम से परिपूर्ण कर दिया है।"

सच मालिनी जी ने इस तरह  भावनाओं में डूबकर इस नग्मे को निभाया  है कि इसे सुन एकबारगी आँखें नम हो उठती हैं। यकीन नहीं होता तो आप भी सुन कर देखिए...



भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए 
भेजो रे काहे बाबा हमका पीहर से
बिटिया से बन्नी बनके कहाँ पहुँचाए
सहा भी ना जाए ओ का करें हाए
कहाँ ख़ातिर चले रे कहरिया
बँहगी कहाँ पहुँचाए ? बँहगी कहाँ पहुँ...चाए

बचपन से पाले ऐसन बिटिया काहे
बहियन के पालना झुलाए
खुसियन के रस मन में काहे रे
बाबा तुमने बरतिया लीओ बुलवाए
काहे डोली बनवाए अम्मा मड़वा छवाए
चले सिलवा हरदी त पिस पिस जाए

(सिलवा - सिल,  हरदी - हल्दी, बरतिया - बाराती, खुसियन - खुशी, बहियन -बाँह)

सूरज सा चमकेगा मोर मुकुट पहनेगा, राजा बनके चलेगा बन्ना हमारा रे
जीजा को ना पूछेगा. ओ हो ,अरे फूफा को ना लाएगा ओ हो
मामा को लूटेगा, चाचा खिसियाएगा, बहनों को ठुमका लगाता लाएगा
काला पीला टेढ़ा मेढ़ा बन्ना बाराती ऐसा लाया रे
का करें हाए कहाँ चली जाए, बन्नो शरम से मर मर जाए...बन्नो शरम से मर मर जाए...
भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए

सोनवा स पीयर बिटिया सुन ले, तोरे निकरत ही निकरे ना जान
बिटिया के बाबा से ना पूछले , मड़वा के कइसन होला बिहान
चले चलेंगे कहार मैया असुवन की धार
बन्नी रो रो के हुई जाए है तार तार
भागन के रेखन की बँहगिया, बँहगी लचकत जाए

जिन्हें भोजपुरी बिल्कुल नहीं समझ आती उनके लिए बता दूँ कि इस अंतरे में कहा जा रहा है सोने सी गोरी (यहाँ पीयर यानि पीला रंग गौर वर्ण को इंगित कर रहा है) बिटिया सुनो, शायद तुम्हारे इस घर से विदा होते ही हमारी जान ना निकल जाए। ये बेटी के बाबू का दिल ही जानता है कि शादी की अगली सुबह कितनी पीड़ादायक होती है। कहार चलने को तैयार हो रहे हैं। माँ की आँखों से आँसू की वैतरणी बह चली है और बिटिया तो रो रो के बेहाल है ही।

गुरुवार, अगस्त 01, 2013

कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े : क्या आप 'शर्मा जी' जैसा बनना नहीं चाहेंगे?

पिछले हफ्ते टीवी पर तनु वेड्स मनु दोबारा देखी। फिल्म तो ख़ैर दोबारा देखने पर भी उतनी ही मजेदार लगी जितनी पहली बार लगी थी पर 'शर्मा जी (माधवन)' का चरित्र इस बार दिल में कुछ और गहरे बैठ गया। कितनी दुत्कार, कितनी झिड़कियाँ सहते रहे पर हिम्मत नहीं हारी उन्होंने।  कोशिश करते रहे, नाकामयाबी हाथ लगी तो उसे ही समय का तकाज़ा मान कर ना केवल स्वीकार कर लिया पर अपने रकीब की सहायता करने को भी तैयार हो गए। मन के अंदर हाहाकार मचता रहा पर प्रकट रूप में अपने आप को विचलित ना होने दिया। पर शर्मा जी एकदम से दूध के धुले भी नहीं हैं वक़्त आया तो कलम देने से कन्नी काट गए।  आखिर शर्मा जी इंसान ही थे, धर्मराज युधिष्ठिर तक अश्वथामा का इतिहास भूगोल बताए बगैर उसे दुनिया जहान से टपका गए थे। अब इतना तो बनता है ना 'इसक' में ।


दिक्कत यही है कि आज कल की ज़िदगी में 'शर्मा जी' जैसे चरित्र मिलते कहाँ हैं? आज की पीढ़ी प्यार में या परीक्षा में नकारे जाने को खुशी खुशी स्वीकार करने को तैयार दिखती ही नहीं है। अब आज के अख़बार की सुर्खियाँ देखिए। प्रेम में निराशा क्या हाथ लगी  चल दिए हाथ में कुल्हाड़ी लेकर वो भी जे एन यू जैसे भद्र कॉलेज में। इंतज़ाम भी तिहरा था। कुल्हाड़ी से काम ना बना तो पिस्तौल और छुरी तो है ही।

आजकल हो क्या रहा है इस समाज को? जब मर्जी आई एसिड फेका, वो भी नहीं तो अगवा कर लिया। क्या इसे प्रेम कहेंगे ? इस समाज को जरूरत है शर्मा जी जैसी सोच की। उनके जैसे संस्कार की। नहीं तो वक़्त दूर नहीं जब प्रेम कोमल भावनाओं का प्रतीक ना रह कर घिन्न और वहशत का पर्यायी बन जाएगा।

दरअसल 'शर्मा जी' का जिक्र छेड़ने के पीछे  मेरा एक और प्रयोजन था। आपको तनु वेड्स मनु के उस खूबसूरत गीत को सुनवाने का जिसे मेरे पसंदीदा गीतकार राजशेखर ने लिखा था। लिखा क्या था 'शर्मा जी' के दिल के मनोभावों को हू बहू काग़ज़ पर उतार दिया था।

संगीतकार कृष्णा जिन्हें 'क्रस्ना' के नाम से भी जाना जाता है और राजशेखर की जोड़ी के बारे में तो आपको यहाँ बता ही चुका हूँ। सनद रहे कि ये वही राजशेखर हैं जो आजकल फिल्म 'इसक' में ऐनिया ओनिया रहे हैं यानि सब एन्ने ओन्ने कर रहे हैं। 

गीत में क्रस्ना बाँसुरी का इंटरल्यूड्स में बेहतरीन इस्तेमाल करते हैं। मोहित चौहान रूमानी गीतों को निभाने में वैसे ही माहिर माने जाते हैं पर यहाँ तो एकतरफा प्रेम के दर्द को भी वो बड़े सलीके से अपनी आवाज़ में उतार लेते हैं। 


कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े
वैसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूँढ़ ली अपनी ख़ुशी
तू जो गर हाँ कहे तो बात होगी और ही
दिल ही रखने को कभी, ऊपर-ऊपर से सही, कह दे ना हाँ
कह दे ना हाँ, यूँ ही
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

कितने दफ़े हैराँ हुआ मैं ये सोचके
उठती हैं इबादत की ख़ुशबुएँ क्यूँ मेरे इश्क़ से
जैसे ही मेरे होंठ ये छू लेते हैं तेरे नाम को
लगे कि सजदा किया कहके तुझे शबद के बोल दो
ये ख़ुदाई छोड़ के फिर आजा तू ज़मीं पे
और जा ना कहीं, तू साथ रह जा मेरे
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

कितने दफ़े मुझको लगा, तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानों से ढूँढ़ के पिघला दूँ मैं चाँद ये
तुम्हारे इन कानों में पहना भी दूँ बूँदे बना
फिर ये मैं सोच लूँ समझेगी तू, जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ अभी, न ये तू पूछे कहीं, क्यूँ लाए हो ये
क्यूँ लाए हो ये, यूँ ही
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

वैसे भी ये गीत उन सबको अच्छा लगेगा जिनमें शर्मा जी के चरित्र का अक़्स है। मुझमें तो है और आपमें?

गुरुवार, मार्च 01, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 :सरताज गीत - ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है !

वार्षिक संगीतमाला 2011 के सफ़र में दो महिने साथ चलते चलते वक़्त आ गया है सरताज गीत की घोषणा का। इस गीत का दारोमदार सँभाल रही है एक युवा संगीतकार और गीतकार की जोड़ी जिन्होंने अपने पहले प्रयास में वो कर दिखाया है,जिसे करने में मँजे हुए कलाकारों को वर्षों लगेंगे। इस फिल्म के गीत संगीत को मिल रही मक़बूलियत का अंदाज़ा शायद उन्हें भी इसे बनाते वक़्त ना रहा हो। ये गीत है फिल्म तनु वेड्स मनु का जिसे लिखा है राजशेखर ने और जिसकी धुन बनाई है कृष्णा ने। इस गीत के दो रूप हैं जिसमें एक में स्वर है वडाली बंधुओं का और दूसरा वर्जन जो फिल्म में प्रयुक्त हुआ है उसे आवाज़ दी है कृष्णा ने। तो आइए जानते हैं पहले इन दोनों प्रतिभावान गीतकार संगीतकार की जोड़ी के बारे में। 


इस गीत के सिलसिले में राजशेखर से मेरी लंबी बातचीत हुई और सच बताऊँ बड़ा अच्छा लगा उत्तर बिहार में मधेपुरा के एक किसान परिवार में जन्मे इस कलाकार से बात कर। जैसा कि बिहार में आमतौर पे होता है राजशेखर को भी हाईस्कूल करने के बाद इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए पटना भेजा गया। राजशेखर उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैलकुलस के सवाल देखते ही उनका दिमाग शून्य हो जाया करता था। कोचिंग आने जाने से ज्यादा उन्हें रास्ते में हिंदी किताबों की दुकानों पर बैठ कर साहित्यिक पुस्तकों के पन्ने पलटना अच्छा लगता। एक दिन पिता से साफ साफ कह दिया कि ये पढ़ाई अब मेरे से नहीं होगी और जा पहुँचे दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज। वहीं से हिंदी में एमए किया। कॉलेज में रहते ही उन्हें रंगमंच का चस्का लगा और केएमसी की नाट्य संस्था “द प्लेयर्स” से बतौर अभिनेता और निर्देशक बने। कुछ दिनों तक NDTV में नौकरी भी की पर वो भी उन्हें रास नहीं आई। दिल्ली से मुंबई जाने की कहानी के बारे में वे कहते हैं  
"दोस्तों के बहकावे में आकर 2004 के एक बेनाम दिन मुँह उठाए और एक बैग लिए मुंबई आए। जाने माने निर्देशकों को एसिस्ट करने के नाम पर क्लर्की कबूल नहीं की और फिल्म लेखन की दुनिया में आ गए। बीच-बीच में ‘अनवर’ और ऐसी ही दूसरी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर दोस्तों को अपने मुंबई में रहने और स्ट्रगल करने का भान कराते रहे। 2011 में अपनी शादी इसलिए नहीं की क्योंकि तन्नू और मन्नू की शादी के गीत लिखने थे।"
राजशेखर की मुलाकात तनु वेड्स मनु के निर्देशक आनंद राय से उनके एक मित्र व फिल्म के पटकथा लेखक हिमांशु ने करवाई। फिल्म के लिए वैसे तो पहला गीत उन्होंने 'मन्नू भैया का करिहें' लिखा जो आनंद को पसंद आ गया। पर जब उन्होने आनंद को रंगरेज़ सुनाया तो वे एकदम से सन्न रह गए और फिर उन्होंने राजशेखर को गले से लगा लिया। गीतों का चुनाव तो हो चुका था अब खोज थी एक अदद संगीतकार की जो की कृष्णा के रूप में पूरी हुई।

राजशेखर की तरह ही कृष्णा को गीत संगीत विरासत में नहीं मिला था। अहमदाबाद के NID से फिल्म और वीडिओ कम्यूनिकेशन पढ़ने वाले कृष्णा अपने सांगीतिक हुनर का श्रेय गुरु जवाहर चावड़ा को देते हैं। मुंबई में अपने शुरुआती दौर में कृष्णा विज्ञापन फिल्मों, डाक्यूमेंट्री में संगीत देने का काम करते रहे और साथ ही गुरु से संगीत की शिक्षा भी लेते रहे। राजशेखर के ज़रिए आनंद से हुई मुलाकात ने उन्हें फिल्म संगीतकार बनने का पहला मौका दिला दिया।

राजशेखर और कृष्णा से तो आप मिल लिए आइए अब जानते हैं कि रंगरेज़ को अपने गीत कें केंद्रबिंदु में रखने का ख्याल राजशेखर को आया कैसे? राजशेखर इस बारे में कहते हैं..

" जब मैं कॉलेज में था तो अक्सर लड़कियों को बेरंगी चुन्नियों को रंगवाने पास के कमला नगर मार्केट ले जाते देखता था। मुझे तभी से रंगरेज़ की शख्सियत से एक तरह का फैसिनेशन यानि लगाव हो गया था। जब आनंद ने मुझे गीत की परिस्थितियाँ बतायीं  तो मन की तहों में दबे उस रंगरेज़ का चेहरा मेरे फिर सामने आ गया।"
राजशेखर के बोल तो लाजवाब हैं ही कृष्णा की सांगीतिक समझ की भी दाद देनी होगी कि जिस तरह से इस मुश्किल से गीत को कम्पोज किया। कृष्णा इस बारे में कहते हैं

"मुझे पता था कि ये गीत एक ऐसे प्रेमी के दिल के हाल को व्यक्त कर रहा है जो पूरी तरह अपनी प्रेमिका पर आसक्त होने के बावजूद भी अपने दिल की बात नहीं कह पा रहा। जब जब व्यक्ति अपने हृदय को ऐसे चक्रवात में फँसा पाता है तो  प्रेम प्रेम नहीं रह जाता वो उससे ऊपर उठता हुआ निष्काम भक्ति का रूप ले लेता है। कव्वाली और सूफ़ियाना संगीत ऐसी भावनाओं को उभारने के लिए सबसे सटीक माध्यम हैं। बतौर संगीतकार इस गीत में मैंने मुखड़े और अंतरों के बँधे बँधाए ढर्रे से अलग कुछ करने की कोशिश की है। इस गीत को सुनने वालों ने जरूर ध्यान दिया होगा मुखड़ा शुरु के बाद फिर एकदम आख़िर में बजता है। मैं नहीं चाहता था कि राजशेखर के शब्दों का प्रवाह इंटरल्यूड्स के संगीत से टूट जाए।"
कृष्णा कितना सही कह रहे हैं ये आपको गीत सुनकर ही समझ आ जाएगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है आप पर गीत का सुरूर छाने लगता है। गीत सुनते वक़्त मुझे तो ऐसा लगता है कि ख़ुदा की इबादत कर रहा हूँ। गीत का टेम्पो जैसे जैसे बढ़ता है मन पूर्ण समर्पण और भक्ति के पृथक संसार में जा पहुँचता है। संगीत के रूप में भारतीय वाद्यों के  साथ में ताली की उत्तरोत्तर गति पकड़ती थाप मन पर जादू सा असर करती है। तो आइए सुनें कृष्णा की आवाज़ में ये गीत !



ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे
ये बात बता रंगरेज़ मेरे
ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
कि दिल बन गया सौदाई
मेरा बसंती चोला है, मेरा बसंती चोला है
अब तुम से क्या मैं शिकवा करूँ
मैने ही कहा था ज़िद कर के
रंग दे चुनरी पी के रंग में
रंग रंग दे रंग दे चुनरी पी के रंग में
पर मुए कपास पे रंग ना रुके
रंग इतना गहरा तेरा कि जान-ओ-जिगर तक को भी रंग दे
जिगर रंग दे....

रंगरेज़ तूने अफ़ीम क्या है खा ली
जो मुझसे तू यह पूछे कि कौन सा रंग
रंगों का कारोबार है तेरा
ये तू ही तो जाने कौन सा रंग
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग
मेरा फाग़न रंग, मेरा सावन रंग
पल पल रंगते रंगते मेरे आठों पहर मनभावन रंग

इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई तू
इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई मेरे सातों समंदर जाए रंग
मेरी हद भी रंग, सरहद भी रंग दे
बेहद रंग दे, अनहद भी रंग दे
मंदिर, मस्जिद, मैकद रंग

रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
रंगरेज़ मेरे दो घर क्यूँ रहे
एक ही रंग में दोनो घर रंग दे, दोनो रंग दे
पल पल रंगते रंगते, रंगते रंगते
नैहर पीहर का आँगन रंग
पल पल रंगते रंगते रंगते रंगते
मेरे आठों पहर मनभावन रंग

नींदे रंग दे, करवट भी रंग
ख़्वाबों पे पड़े सलवट भी रंग
यह तू ही है, हैरत रंग दे
आ दिल में समा हसरत रंग दे
आजा हर वसलत रंग दे
जो आ ना सके तो फुरक़त रंग दे

दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में,
दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में, दर्द ए, मैं ज़िंदा रहूँ
मैं ज़िंदा रहूँ, ज़ुररत रंग दे
रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
तेरा क्या है अस्ल रंग अब तो यह दिखला दे


मेरा पिया भी तू, मेरी सेज भी तू
मेरा रंग भी तू, रंगरेज़ भी तू
मेरी नैया भी तू, मँझधार भी
तुझ में डूबू, तुझ में उभरूँ
तेरी हर एक बात सर आँखों पे
मेरा मालिक तू, मेरा साहिब तू
मेरी जान, मेरी जान तेरे हाथों में
मेरा क़ातिल तू, मेरा मुनसिफ़ तू
तेरे बिना कुछ सूझे ना, तेरे बिना कुछ सूझे ना
मेरी राह भी तू, मेरा रहबर तू
मेरा सरवर तू, मेरा अकबर तू
मेरा मशरिक़ तू, मेरा मगरिब तू
ज़ाहिद भी मेरा, मुर्शिद भी तू

अब तेरे बिना मैं जाऊँ कहाँ, जाऊँ कहाँ
तेरे बिना अब जाऊँ कहाँ, तेरे बिना अब मैं जाऊँ कहाँ

तेरे बिना, तेरे बिना …..

ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे... मेरा बसंती चोला है
वडाली बंधुओं ने भी अपने गायन से इस गीत को एक अलग ऊँचाइयाँ दी हैं। वडाली बंधुओं इस गीत में इतना रमे कि गीत की रिकार्डिंग खत्म होने में बारह घंटे लग गए। बीच में जब उन्हें कृष्णा ने विराम लेने के लिए पूछा तो उनका जवाब था

"बेटा जब हम स्टेज पर चढ़ते हैं तो दुनिया भूल जाते हैं और आज अगर गाते गाते चौबीस घंटे भी हो जाएँ तो हम गाकर ही उठेंगे।"
तो आइए सुनते हैं पूरनचंद और प्यारेलाल वडाली द्वा गाया ये गीत...


कंगना और माधवन पर फिल्माए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं..


इसी के साथ वार्षिक संगीतमाला 2011 की ये यात्रा यहीं समाप्त हुई। जो लोग इस सफ़र में साथ बने रहे उनका मैं हृदय से आभारी हूँ। पिछले छः वर्षों से चल रहे सिलसिले के प्रति आपका प्रेम ही मेरा प्रेरणास्रोत रहा है।

 

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स्पष्टीकरण

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