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शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 14 : सुबह की वो पहली दुआ या फूल रेशम का, मासूम सा Masoom Sa

हिंदी फिल्म संगीत में माँ और बच्चे के बीत का वातसल्य तो कई गीतों में झलका है पर एक पिता के अपने पुत्र या पुत्री से प्रेम को नग्मों के माध्यम से व्यक्त करने के अवसर फिल्मों में कम ही आए हैं। दो साल पहले एक बच्ची का अपने गुम पिता को याद करता बेहद संवेदनशील गीत क्या वहाँ दिन है अभी भी, पापा तुम रहते जहाँ हो...ओस बन के मैं गिरूँगी, देखना, तुम आसमाँ हो इस संगीतमाला का सरताज बना था। वहाँ एक बच्ची के  जीवन से पिता हमेशा हमेशा के लिए गुम हो गए थे। यहाँ उसके ठीक उलट एक बेटा पिता की ज़िंदगी से अनायास  ही  छीन लिया  गया है। वार्षिक संगीतमाला की चौदहवीं पॉयदान पर फिल्म मदारी का ये गीत असमय हुए पुत्र विछोह का दर्द बयाँ करता है। 


इस गीत को संगीतबद्ध किया है सनी और इन्दर बावरा की जोड़ी ने। बठिंडा से ताल्लुक रखने वाले इन भाइयों का असली नाम इन्दरजीत सिंह बावरा और परमजीत सिंह बावरा है। बावरा खानदान में संगीत की परंपरा तीन पीढ़ियों से थी। बठिंडा से आरंभिक शिक्षा लेने के बाद जहाँ इन्दर भारतीय संगीत की बारीकियों को मुंबई जाकर रवींद्र जैन, एन आर पवन और सुरेश वाडकर से सीखते रहे वहीं उनके छोटे भाई पश्चिमी संगीत में महारत हासिल करने के लिए लंदन जा पहुँचे। विगत कुछ वर्षों में इस जोड़ी ने टीवी धारावाहिकों में ही अपना  ज्यादातर संगीत दिया है ।  

वैसे पिछले साल फिल्म रॉकी हैंडसम में उनका गीत रहनुमा काफी सराहा गया था। जहाँ तक मासूम सा की बात  है, गीत की प्रकृति को देखते हुए बावरा बंधुओं ने संगीत  को शांति से शब्दों के पीछे बहने दिया है। पहले व दूसरे अंतरे के बीच बाँसुरी और सेलो जो वॉयलिन जाति का ही एक वाद्य है का संगीत संयोजन गीत की उदासी को और विस्तार देता है।

सुखविंदर की आवाज़ का प्रयोग अक़्सर संगीतकार ऊँचे सुरों के लिए करते रहे हैं। पिता पुत्र की आपसी संवेदनाओं को उभारते इस गीत में सुखविंदर मुलयामियत के साथ गीत की व्यथा को अपनी आवाज़ में शामिल कर पाए हैं। पर इस गीत का सबसे मजबूत पक्ष है, इसके दिल को छू लेने वाले बोल। इरशाद क़ामिल ने इस अलग से विषय को भी अपने रूपको से इस तरह आत्मसात किया है कि गीत सुनते सुनते पलकें नम हो जाती हैं। इस गीत के आख़िरी अंतरे में क़ामिल की  ये पंक्तियाँ दिल पर गहरा असर करती हैं जब कामिल कहते हैं.. मेरी ऊँगली को पकड़ वो चाँद चलता शहर में, ज़िन्दगी की बेहरम सी धूप में, दोपहर में..मैं सुनाता था उसे अफ़साने रंगीन शाम के.. ताकि  वो चलता रहे, चलता रहे और ना थके... 

 

पालने में चाँद उतरा खूबसूरत ख़्वाब जैसा
गोद में उसको उठाता तो मुझे लगता था वैसा
सारा जहान मेरा हुआ, सारा जहान मेरा हुआ
सुबह की वो पहली दुआ या फूल रेशम का
मासूम सा मासूम सा, मेरे आस पास था मासूम सा
मेरे आस पास था मासूम सा, हो मासूम सा

एक कमरा था मगर सारा ज़माना था वहाँ
खेल भी थे और ख़ुशी थी, दोस्ताना था वहाँ
चार दीवारों में रहती थी हजारों मस्तियाँ
थे वही पतवार भी, सागर भी थे और कश्तियाँ

थे वही पतवार भी, सागर भी थे और कश्तियाँ
मेरी तो वो पहचान था, मेरी तो वो पहचान था
या यूँ कहो की जान था वो चाँद आँगन का
मासूम सा मासूम सा, मेरे आस पास था मासूम सा
मेरे आस पास था मासूम सा, हो मासूम सा

मेरी ऊँगली को पकड़ वो चाँद चलता शहर में
ज़िन्दगी की बेहरम सी धूप में, दोपहर में
मैं सुनाता था उसे अफ़साने रंगीन शाम के
ताकि वो चलता रहे, चलता रहे और ना थके

ताकि वो चलता रहे, चलता रहे और ना थके
ना मंजिलो का था पता, ना मंजिलो का था पता
थी ज़िन्दगी इक रास्ता, वो साथ हर पल था
मासूम सा मासूम सा, मेरे आस पास था मासूम सा
मेरे आस पास था मासूम सा, हो मासूम सा


फिल्म के मुख्य अभिनेता इरफान खाँ कहते हैं कि जब भी मैं ये गीत सुनता हूँ तो मुझे अपने पिता याद आते हैं। आशा है इसे सुनने के बाद आप सब की यही स्थिति होगी।

zxc

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 

मंगलवार, जनवरी 05, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान #24 : मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी है, पतली गली आना Patli Gali Aana

वार्षिक संगीतमाला 2015 की पिछली पायदान पर अपने हवाईज़ादे तुर्रम खाँ की मस्तियों का आनंद जरूर उठाया होगा। अगली पॉयदान पे जो गीत है उसमें मस्ती के वो तेवर बरक़रार हैं पर इन अगर आप सिर्फ इस अटपटे से गीत के बाहरी स्वरूप तक अपने आप को सीमित रखेंगे तो उस पतली गली तक बिल्कुल नहीं पहुँच पाएँगे जहाँ ये गीत आपको ले जाना चाहता है। दरअसल फिल्म तलवार के लिए गुलज़ार का लिखा ये गीत सहज शब्दों के बीच ढेर सारे  ऐसे प्रतीकों को समेटे हुए है जो हमारे आस पास के समाज का हिस्सा हैं। 

आरुषि तलवार केस की बुनियाद पर बनाई फिल्म तलवार में संगीत के लिए अलग से जगह नहीं थी। फिल्म के सारे गीत पार्श्व से ही उठते हैं पात्रों की आंतरिक व्यथा को व्यक्त करने के लिए। पर फिल्म के गंभीर गीतों के बीच गुलज़ार को एक जगह मिली अपने व्यंग्यात्मक तीर चलाने के लिए। आरुषि तलवार के केस में शुरुआती जाँच में पुलिस और उसकी सहयोगी संस्थाओं से जो गफ़लत हुई उसको अपने निशाने पे लेते हुए गुलज़ार साहब ने व्यंग्य की धार पर इस गीत को कसा और विशाल भारद्वाज के संगीत और सुखविंदर की गायिकी ने उन शब्दों में जैसे जान सी डाल दी।


फिल्म देखने के बाद मुझे तो यही लगा कि जिस पतली गली की बात गुलज़ार कर रहे हैं उसका अभिप्राय एक आम आदमी के पुलिस, कोर्ट कचहरी व मीडिया के चक्कर में फँसने से है। इसीलिए इस पतली गली में आकर आपकी मूँछ यानि इज्ज़त बन भी सकती है या उसका पलीदा भी निकल सकता है। अगर आप पाक साफ भी हो तो सिस्टम के अंदर की काई और फिसलन के सामने आपका  दामन शायद ही बदरंग होने से बच पाए। इस गली में आना है तो रसूख़दार मामुओं की रस्सियाँ खरीदनी होगी। बिना अपने काम की समझ रखने वालों के हाथों अपने भविष्य को गिरवी रखना होगा।

गुलज़ार ने आख़िरी अंतरे में एक ही पंक्ति में जिस तरह 'आम' शब्द का प्रयोग उसके दोनों अर्थों यानि साधारण जन व एक फल के रूप में किया है वो काबिलेतारीफ़ है। आप भी ज़रा गौर फ़रमाएँ

गुठली से रह जाते हैं, जो पूरे आते हैं
आम लोग इस गली में, अक्सर चूस लिये जाते हैं

इस तरह के बिना एक मीटर के गीत को निभा पाना बेहद कठिन है पर विशाल भारद्वाज जानते हैं कि जब तक सुखविंदर हैं उन्हें इसकी चिंता नहीं करनी है। विशाल भारद्वाज ने ताल वाद्यों और हारमोनियम की मदद से जो गीत की लय बनाई है वो श्रोताओं को सहज अपनी ओर खी्च लेती हें। हाँ इंटरल्यूड्स कुछ और  बेहतर हो सकते थे।

तो अब और देर करना ठीक नहीं चलते हैं पतली गली के इस सफ़र पर..

 

धार लगानी, तलवार चलानी
हो कि चक्की पिसानी हो
पतली गली आना
मूँछ बनानी हो कि मूँछ कटानी है
दुकान पुरानी  अरे पतली गली आना

पतली गली में फिसलन है, अरे काई भरी है सीलन है
हो ज़रा पैंचे उठा के आना, आना जी ज़रा पैंचे उठा के आना...
आना जी ज़रा पैंचे उठा के आना ओ ज़रा पैंचे उठा के आना
पतली गली आना..

पतली गली में सारे गंजे, कंघियाँ बेच रहे हैं
अरे फाँसी गले में डाल के मामू, रस्सियाँ बेच रहे हैं
गंजे कंघियाँ बेच रहे हैं, मामू रस्सियाँ बेच रहे
गर्म हवा का झोंका, गली में कोई भौंका
है भौंका ज़रा, दुम दबा के आना...
मूँछ बनानी हो ..पतली गली आना...

गुठली से रह जाते हैं, जो पूरे आते हैं
आम लोग इस गली में, अक्सर  चूस लिये जाते हैं
बासी हो या ताज़ा
बाअदब बामुलाहिज़ा
पतली गली आना


संगीतमाला का अगला गीत भी थोड़ा बोलों के मामले में अटपटा है और मुझे यकीन है कि पिछले साल उसे आप सबने सुना होगा तो इंतज़ार कीजिए कल तक का संगीतमाला की अगली पॉयदान पर चढ़ने के लिए।

वार्षिक संगीतमाला 2015

सोमवार, अप्रैल 06, 2015

नैना नीर बहाए.. राग भटियार पर आधारित एक मर्मस्पर्शी गीत Naina Neer

हिंदी फिल्मों में भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत बनाए जाते रहे हैं और वे बेहद लोकप्रिय भी हुए हैं। विगत कुछ दशकों में अगर ये संख्या घटी है तो इसका एक कारण संगीतकारों को ऐसी कहानियों का ना मिल पाना है जिसमें ऐसे गीतों को फिल्म की परिस्थिति के साथ जोड़ा जा सके।  फिर भी हर साल ऐसे इक्के दुक्के गीत बनते ही रहते हैं। वर्ष 2007 में दीपा मेहता की एक फिल्म आई थी वॉटर, संगीतकार थे ए आर रहमान। इस फिल्म में रहमान साहब ने राग भटियार पर आधारित एक बेहद खूबसूरत धुन रची थी। शास्त्रीयता अपने साथ एक गंभीरता, एक गहराई लाती है जिसमें डूबे बगैर उसके अंदर बहते रस का स्वाद नहीं लिया जा सकता। रहमान की इस सांगीतिक रचना में आप अगर एक बार डूबे तो सच मानिए आपको जल्दी किनारा नहीं मिलेगा या दूसरे शब्दों में कहूँ तो आप जल समाधि से बाहर नहीं निकलना चाहेंगे।


फिल्म का ये गीत था नैना नीर बहाए..  जिसे आवाज़ दी थी साधना सरगम ने। आज भी इसे साधना सरगम के गाए बेहतरीन गीतों में से एक माना जाता है। साधना सरगम जिनका मूल नाम साधना घाणेकर वैसे तो मराठी हैं पर आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि वसंत देसाई और पंडित जसराज जैसे गुरुओं के सानिध्य में शास्त्रीय और सुगम संगीत सीखने वाली ये गायिका हमारे देश की 27 भाषाओं के पन्द्रह हजार के लगभग गीत गा चुकी है। हिंदी फिल्मों में वैसे तो साधना ने सैकड़ों गीत गाए हैं पर जाबांज का हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार.. फिर तेरी कहानी याद आई का तेरे दर पर सनम..... , जुर्म का जब कोई बात बिगड़ जाए.... और फिल्म सपने के चंदा रे..... जैसे गीतों से आम जनता के बीच खासी मक़बूलियत मिली। पर मुझे तो वो हमेशा याद रहीं जो जीता वो सिंकदर के गीत पहला नशा पहला ख़ुमार.... और विश्वात्मा के गीत सात समंदर पार से...। मुझे अच्छी तरह याद है कि इंजीनियरिंग कॉलेज के उस पहले साल में हम इस गीत को बारहा सुना और गुनगुनाया करते थे। पर इन सब गीतों पर साथिया में उनका गाए गीत चुपके से.... भारी पड़ता है। वो गीत मुझे इस लिए भी अजीज़ हैं क्यूँकि उसकी भावनाओं को मेरी पूरी पीढ़ी ने दिल से जिया है। दरअसल ए आर रहमान के लिए किया उनका काम उन्हें बतौर पार्श्व गायिका एक अलग ही धरातल पर ला खड़ा करता है।

अब Water के इस गीत को ही लें। जैसा कि मैंने पहले जिक्र किया कि ये नग्मा राग भटियार पर आधारित है। राग भटियार पौ फटने की बेला के ठीक पहले यानि रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाने वाला राग है। लोग ऐसा मानते हैं कि ये राग अँधेरे से निकल कर एक नई सुबह आने की उम्मीद का राग है। विरह की पीड़ा का दंश झेलती नायिका को राधा और मीरा के दृष्टांत ये विश्वास दिलाते हैं कि उसने सामाजिक प्रताड़ना का जो विष निगला है उसे प्रेम की शक्ति अमृत बना देगी। नायिका का दर्द हृदय की गहराइयों से उठता हुआ आँखों की कोर तक तो पहुँचता अवश्य है पर झर झर गिरती अश्रु धारा एक ऐसी वैतरणी का रूप लेती है जो प्रेम के सात सुरों को साथ पाकर अपने अराध्य की ओर उन्मुख हो जाती है़। 

सुखविंदर सिंह के लिखे बोलों में अंतरनिहित भावनाओं को ए आर रहमान ने एक ऐसी मधुर धुन में परिवर्तित किया है जिसे सुनकर व्यथित मन पर भी एक सुकून सा तारी होने लगता है। चित्त को शांत करती संतूर की तरंग के साथ बहती साधना सरगम की आवाज़ इंटरल्यूड्स में बाँसुरी और मृदंगम का साथ पा कर और प्रभावी हो जाती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...




नैना नीर बहाए 
मुझ बिरहन का दिल साजन संग
झूम झूम कर गाए
नैना नीर बहाए

विष का प्याला काम ना आया
मीरा ने पी के दिखलाया
प्रेम तो है गंगा जल इसमें
विष अमृत बन जाए

प्रेम है गिरिधर की बाँसुरिया
प्रेम है राधा की साँवरिया
ये है सात सुरों का दरिया
झर झर बहता जाए

चलते चलते रहमान की इस संगीतबद्ध रचना का आनंद फिर लीजिए विजय कानन द्वारा बाँसुरी पर बजाई इस गीत की धुन के माध्यम से..


बुधवार, फ़रवरी 26, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 6 :जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके (Piya Milenge)

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर है एक बार फिर ए आर रहमान और इरशाद क़ामिल की जोड़ी, फिल्म रांझणा के नग्मे के साथ। तुम तक की तरह प्रेम का रंग यहाँ भी है पर फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ बात ईश्वरीय प्रेम की हो रही है। रहमान ज़रा सी भी गुंजाइश रहने पर अपनी संगीतबद्ध हर फिल्म में एक सूफ़ी गीत जरूर डालते हैं। फिल्म जोधा अकबर का गीत ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा और रॉकस्टार का नग्मा कुन फाया कुन इसकी दो बेहतरीन मिसालें हैं। 

इरशाद क़ामिल ने इस गीत के लिए कबीर की पंक्तियों घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया मिलेंगे से प्रेरणा ली। कबीर की इस कृति को 1950 में फिल्म जोगन में गीता दत्त ने अपनी आवाज़ से सँवारा था। पर इरशाद ने इस Catch line के इर्द गिर्द जो गीत बुना उसे अगर सुखविंदर सिंह की बेमिसाल गायिकी के साथ शांति से सुनें और गुनें तो इसमें कोई शक़ नहीं कि आप ईश्वर को अपने और करीब पाएँगे।



सुखविंदर जैसे ही शानदार मुखड़े को गाते हुए अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …तक आते हैं मन गीत की लय को आत्मसात कर लेता है। रहमान ने गीत में सुखविंदर के साथ चेन्नई में अपने कॉलेज KM Music Conservatory (KMMC) में सूफी गायन से जुड़े छात्रों को भी गाने का मौका दिया है। दरअसल ये समूह पहले भी कव्वाल शौक़त अली के मार्गदर्शन में रहमन रचित कव्वालियों की प्रस्तुति देता आया है। इस गीत के अंतरों के बीच की सुरीली सरगम और समूह गान को खूबसूरती से निभा कर KMMC Sufi Ensemble इस गीत में और निखार ला दिया है।

यूँ तो इरशाद क़ामिल के बोल सहज पर दिल पे सीधे असर करने वाले हैं। पर इस गीत की शुरुआत में उन्होंने एक अप्रचलित शब्द तुपके तुपके का इस्तेमाल किया है। उन्होंने लिखा है तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके ! आप जानना चाह रहे होंगे कि इसका मतलब क्या है? यहाँ क़ामिल कहना चाह रहे हैं जब कि तू तो भगवन को पाने की प्यास में इधर उधर की छोटी मोटी बूँदे खोज़ता फिर रहा है, अरे मूरख तू क्या नहीं जानता कि तेरे अंदर तो पूरा समंदर बह रहा है। जरूरत है उसमें झाँकने की, उस तक पहुँचने की, उसके दिए संकेत समझने की।

तो आइए सुनें इस नग्मे को..


नि नि सा सा ...नि सा नि सा नि सा
जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है भीतर छुपके
तेरे अंदर एक समन्दर क्यूँ ढूँढे तुपके तुपके
अकल के परदे पीछे कर दे घूँघट के पट खोल रे
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
सा सा सा... ....पा नि सा रे सा

पा के खोना खो के पाना होता आया रे
संग साथी सा है वो तो वो है साया रे
झाँका तूने ही ना बस जी से जी में रे
बोले सीने में वो तेरे धीमे धीमे रे
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … जिसको ढूँढे बाहर बाहर...

जो है देखा वो ही देखा तो क्या देखा है
देखो वो जो औरों ने ना कभी देखा है
नैनो से ना ऐसा कुछ देखा जाता है
नैना मींचो तो वोह सब दिख जाता है
तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे … 
उसी को पाना उसी को छूना
कहीं पे वो ना कहीं पे तू ना
जहां पे वो ना वहाँ पे सूना
यहाँ पे सूना...
तोहे पिया, पिया.. तोहे पिया मिलेंगे मिलेंगे …  

गुरुवार, जनवरी 23, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 15 : स्लो मोशन अँग्रेज़ा.. (Slow Motion angreza) आख़िर ये वुलुमुलु क्या है?

वार्षिक संगीतमाला की पन्द्रहवीं पायदान का गीत अब तक प्रस्तुत गीतों से अलग एक भिन्न कोटि का गीत है।  अगर आपको अपने तन मन को तरंगित करना हो तो बस इस गीत की एक खुराक ही काफी होगी। शंकर एहसान लॉय द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को लिखा प्रसून जोशी ने और इसे आपनी बेशकीमती आवाज़ से बख्शा है सुखविंदर सिंह ने। वैसे गायिकी में उनका साथ दिया है लॉय मेन्डोसा और शंकर महादेवन ने। 

इस गीत में एक तरह की शोख़ी और शरारत है जो आपको ना केवल झूमने पर मज़बूर करती है बल्कि साथ आपके मूड को भी तरोताज़ा कर देती है। फिल्म भाग मिल्खा भाग के इस गीत को मिल्खा सिंह के मेलबर्न ओलंपिक के परिपेक्ष्य में फिल्माना था। इस गीत के संगीत  संयोजन के बारे में लॉय मेन्डोसा कहते हैं..
हमें ये पता लगाना था कि पचास और साठ के दशक में किस तरह का आस्ट्रेलियाई संगीत प्रचलित था। अपने अनुसंधान से हमें लगा कि इस गीत के संगीत में Country और Western संगीत का मिश्रण करना होगा। शंकर ने कहा कि मुखड़े में किसी ध्यान खींचने वाले जुमले की जरूरत है और हमारी खोज वुलुमुलु पर खत्म हुई। दरअसल इसी नाम की एक स्ट्रीट सिडनी में भी है। जब हम सिडनी गए तो वहाँ से भी गुजरे और वो जगह हमें बेहद पसंद आई।

इस गीत की शुरुआत की पंक्तियाँ ख़ुद
I just met a girl
And she is from wulu-mulu wulu-mulu wonder
I can dance and she can sing
We can rock the whole night longer

लॉय मेंडोसा ने गायी हैं और इतना ही नहीं अगर आपने फिल्म देखते हुए ध्यान दिया हो वो ख़ुद ही इस गीत को गाते हुए भी दिखाई दिए हैं। पर गीत में अपनी बेमिसाल गायिकी से जान डालने वाले सुखविंदर सिंह की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। गीत में पंजाबी तड़का लगाने पहुँचे सुखविंदर अपनी गायिकी से इसके शब्दों में वो मस्ती ले आते हैं कि तन मन थिरक उठता है और जब तक वो पीने दे रज के... तक आते हैं शरीर को स्थिर रखना बड़ा मुश्किल हो जाता है।। प्रसून के शब्द गीत के मूड के हिसाब से लिखे गए हैं इसीलिए गीत के असर से लहरें भी टल्ली हो रही हैं ।

हो स्लो मोशन अँग्रेज़ा, हुन क्यों टाइम गँवाए
सीधे बाहों में भर ले, सरसरी क्यों बढ़ाए
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए, तू मैनू चढ़ गयी मेरी सोनिए
रोको ना टोको ना, हो.. मुझको पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल लौंडा घुल मिल घुल मिल
घुल मिल घुल मिल लौंडा घुल मिल घुल मिल
सिंग..वुलु मुलु वुलु मुलु वंडर, वुलु मुलु वुल मुलु..
.

रात बढ़ती जो जाए, हाथ क्या क्या टटोले
झूठ बोले ज़ुबान भी, धरम ईमान डोले हाए..
तू जो दरिया में उतरे, सारा पानी गुलाबी हाए..
हो तू जो दरिया में उतरे सारा पानी गुलाबी
टल्ली टल्ली हों लहरें, मछलियाँ भी शराबी
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए....पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल................

हो काँच सी है तू नाज़ुक,
काँच सी है तू नाज़ुक, साँस लेना संभल के
टूट जाए कहीं ना, बस करवट बदल के

तुझको मेरी ज़रूरत, आ मैं तुझको उठा लूँ
तुझको मेरी ज़रूरत, आ मैं तुझको उठा लूँ
धीरे धीरे से चलना, अपनी आदत बना लूँ
मेरी व्हिस्कीए मेरी ठर्रिए....पीने दे रज के
घुल मिल घुल मिल................





ये तो सब जानते हैं कि इस गीत को फरहान अख़्तर पर फिल्माया गया है और सच पर्दे पर उनकी उर्जात्मक प्रस्तुति के क्या कहने ! पर क्या आपको पता है कि इस गाने में फरहान का साथ किसने निभाया ? फरहान अख्तर के साथ फिल्मी पर्दे पर दिखने वाली अभिनेत्री रिबेका ब्रीड्स (Rebecca Breeds) हैं जो आस्ट्रेलिया से ताल्लुक रखती हैं।

रविवार, जनवरी 31, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 17 - भँवरा भँवरा आया रे, कान में इतर का फाहा रे

वार्षिक संगीतमाला 2009 का एक महिने का सफ़र तय करते हुए आज हम आ पहुँचे हैं 17 वीं पॉयदान पर। पिछली पॉयदान पर आपने देखा की किस तरह पीयूष मिश्रा ने अपने गीत को तत्कालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों को जनता के सामने पेश करने का माध्यम बनाया था। आज का ये युगल गीत राजनीतिक नहीं पर एक सामाजिक संदेश जरूर दे रहा है और वो भी इस अंदाज़ में जिसे सुनने का मन बार बार करता है।

इस युगल गीत के साथ पहली बार इस गीतमाला में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं आज के युग के दो बेमिसाल गायक सुखविंदर सिंह और कैलाश खेर। इन दोनों महारथियों को एक साथ सुनना किसी भी संगीतप्रेमी के लिए सोने पर सुहागा जैसी बात होती है। वैसे तो इन गायकों की खासियत रही हे कि आम से गीत को भी अपनी अदाएगी से खास बना दें पर जब बोल गुलज़ार के हों और धुन विशाल भारद्वाज की तो उनका काम और आसान हो जाता है।


कमीने फिल्म के इस गीत ने जितनी चुनौती गायकों के लिए थी उससे कहीं ज्यादा गीतकार संगीतकार की जोड़ी के लिए। गीत लिखना था एक ऐसी स्थिति पर जिसमें नायक जो एक सामाजिक कार्यकर्ता है , घूम घूम कर रेड लाइट एरिया में कंडोम का वितरण कर रहा है और साथ ही लोगों को एड्स के खतरे के बारे में बता रहा है। किसी भी गीतकार के लिए इस विषय को बिना उपदेशात्मक हुए कविता में बाँधना एक टेढ़ी खीर थी। पर गुलज़ार ने इस काम को बड़े सलीके से अंजाम दिया। वहीं विशाल का संगीत संयोजन और फटाक शब्द का गीत की लय के साथ बेहतरीन इस्तेमाल श्रोताओं का ध्यान सहज ही आकर्षित कर लेता है।

तो आइए सुनें कैलाश और सुखविंदर की आवाज़ में ये नग्मा



कि भँवरा भँवरा आया रे फटाक फटाक
गुन गुन करता आया रे
सुन सुन करता गलियों से
अब तक कोई ना भाया रे


सौदा करे सहेली का
सर पर तेल चमेली का
कान में इतर का फाहा रे
कि भँवरा भँवरा आया रे फटाक फटाक.. ..

गिनती ना करना इसकी यारों में
आवारा घूमे गलियारों में
ये चिपकू हमेशा सताएगा
ये जाएगा फिर लौट आएगा
खून के मैले कतरे हैं
जान के सारे खतरे ...
कि आया रात का जाया रे..फटाक ...

जितना भी झूठ बोले थोड़ा है
कीड़ों की बस्ती का मकौड़ा है
ये रातों का बिच्छू है काटेगा
ये ज़हरीला है ज़हर चाटेगा
दरवाजे में कुन्दे दो
दफ़ा करो ये गुंडे ये शैतान का साया रे फटाक फटाक..

ये इश्क़ नहीं आसान, अजी AIDS का खतरा है
पतवार पहन जाना ये आग का दरिया है

ये नैया डूबे ना ये भँवरा काटे ना
ये नैया डूबे ना ये भँवरा काटे ना ...




और हाँ गीत सुनने के साथ बगल की साइड बार में चल रही वोटिंग में अपनी पसंद का इज़हार जरूर कीजिए।

मंगलवार, नवंबर 03, 2009

क्या होगा जब श्रेया घोषाल और सुखविंदर दिखलाएँ आपको जीवन की डगर ?

पिछले साल जब वार्षिक संगीतमाला के अपने पसंदीदा गीतों का चयन कर चुका था, तब ये गीत मुझे सुनने को मिला। लिहाज़ा ये मेरी वार्षिक संगीतमाला 2008 का हिस्सा नहीं बन पाया था। ये गीत था फिल्म ब्लैक एंड व्हॉइट (Black and White) का। अगर आपको इस फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा तो इसमें आपका कोई क़सूर नहीं। फिल्म सिनेमाघर के पर्दे की शोभा ज्यादा दिनों तक नहीं बढ़ा सकी थी। वैसे विशुद्ध व्यवसायिक फिल्म बनाने वाले सुभाष घई ने इस फिल्म के ज़रिए वास्तविक ज़िंदगी के करीब आने की कोशिश की थी। पर सुभाष घई जैसी भी फिल्में बनाएँ अपनी फिल्मों के संगीत के चयन के प्रति बेहद सजग रहे हैं। इस हट के बनाई गई फिल्म के संगीतकार के तौर पर उन्होंने चुना था लोकप्रिय गायक सुखविंदर सिंह को। और आज जिस गीत की बात मैं आपसे कर रहा हूँ उसमें सुखविंदर जी के हुनर का क़माल साफ दिखाई देता है...


चिड़ियों की चहचहाट, गायिका का मधुर आलाप, चलती रेल की आवाज़ के साथ सम्मोहित करती आरंभिक धुन के साथ इस गीत से आप रूबरू होते हैं। जब तक आप इस आरंभिक सम्मोहन से निकलें श्रेया घोषाल की खनकती आवाज़ और इब्राहिम अश्क़ के बोल ज़िदगी की राहों में साथ साथ चलने पर मज़बूर कर देते हैं। शुरुआती धुन को इंटरल्यूड्स में बरक़रार रख कर सुखविंदर इस गीत का मज़ा दूना कर देते हैं। तो आइए पहले सुनें कोकिल कंठी श्रेया घोषाल के स्वर में ये गीत..



मैं चली मैं चली
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

हँसती हैं तितलियाँ, मुस्कुराए ज़मीं
बादलों की हँसी गुनगुनाए कहीं
दिल की धड़कन चले, वक़्त की छाँव में
दर्द की मस्तियाँ नाचती पाँव में..

इस गली उस गली
इस डगर उस डगर, ऍ मेरे हमसफ़र
मैं चली मैं चली
सारी दुनिया से मैं हो गई बेख़बर
साथ मेरे चले जिंदगी का सफ़र...


मेरी पायल में हैं बोल सब प्यार के
चूड़ियों में भी हैं लफ़्ज़ इक़रार के
मेरे होठों पे हैं गीत इज़हार के
ख़्वाब आँखों में है तेरे दीदार के
है यही तो मेरे प्यार की रहगुज़र
मैं चली मैं चली..मैं चली मैं चली


वैसे इस गीत का एक और वर्सन है जिसे सुखविंदर ने अपनी आवाज़ से सँवारा है। श्रेया वाले वर्सन में गीत का मूड जहाँ रोमांटिक हैं वहीं सुखविंदर के इस वर्सन में गीतकार फिलासफिकल नज़रिए से जिंदगी के बदलते रास्तों से हमें ले जाते हैं। इस बार अंतरे में पिआनो की धुन भी कर्णप्रिय लगती है। तो सुखविंदर जी के गाए इस गीत को सुनिए ..



मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ
अज़नबी रास्ते, अज़नबी है ज़हाँ
मैं कहाँ से कहाँ आ गया हूँ यहाँ.......
सात रंगों की है तेरी दुनिया हसीं
है उजाला कहीं तो है अँधेरा कहीं
है कहीं शाम तो क्यूँ कहीं है सहर
मैं चला मैं चला...

कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े ये कैसे जज़्बात हैं
कैसी हैं उलझनें कैसे हालात हैं
दिल में उमड़े हुए कैसे जज़्बात हैं.......
है धुआँ ही धुआँ रास्तों के निशां
हर क़दम पर मेरे हौसले है जवाँ
मेरी मंजिल मुझे आ रही है नज़र

मैं चला मैं चला
इस गली उस गली
इस डगर उस डगर
इस तरफ़ उस तरफ़
साथ मेरे चले ज़िंदगी का सफ़र...

शनिवार, जनवरी 31, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 13 : जानिए हौले हौले हवा चलती है के रचित होने के पीछे की सोच

तो आ गई है वार्षिक संगीतमाला के बीचों बीच की 13 वीं पायदान और यहाँ गीत वो जो पूरे देश को अपने लफ़्जों के बल पर हौले हौले झुमा रहा है। तो किसने लिखा ये गीत? एक समय तो मीडिया में ये खबरें भी आ गईं कि इसे लिखने वाले कोई और हैं और उन सज्जन ने टीवी पर इस गीत से सुसज्जित इक किताब भी दिखा डाली जो उनके हिसाब से कई साल पहले ही छप गई थी। खैर मीडिया की कई कहानियों की तरह वो स्टोरी भी आई गई हो गई। खैर, मैं तो यही मान कर चलूँगा कि ये गीत जयदीप साहनी का ही लिखा है जो इससे पहले चक दे इंडिया के गीतों को लिख कर चर्चा में आ चुके हैं।

वेसे क्या आप बता सकते हैं कि जयदीप और जावेद अख्तर में क्या समानता है? भई इन दोनों ने फिल्म जगत मं अपने कैरियर की शुरुआत बतौर पटकथा लेखक से की। ये अलग बात है कि जावेद साहब अब गीतों की रचना में ही वक़्त लगाते हैं जबकि जयदीप अभी भी पटकथा लेखक के तौर पर ज्यादा जाने जाते हैं।

जयदीप के बारे में आपको कुछ और बताएँगे आगे की पायदानों में पर अभी तो ये जानिए कि क्या कहना है गीतकार जयदीप साहनी का इस गीत के बारे में..
संध्या अय्यर को हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में जयदीप ने बताया कि "...ये गीत फिल्म के मुख्य पात्र सूरी की मनोदशा कहने का प्रयास करता है कि दिल से जुड़े मसलों के बारे में वो कैसे सोचता है। मेरा ये गीत एक ऐसे चरित्र की बात करता है जो खुद को विश्वास दिलाना चाहता है कि सब्र करने से काम अंत में जाकर बनता है। पर ये काम सूरी के लिए आसान नहीं क्योंकि उसी के दिल के दूसरे हिस्से की सोच बिल्कुल अलग है। यानि एक ओर सब्र तो दूसरी ओर लक्ष्य पाने की जल्दी। अब ना तो सूरी स्टाइलिश है, ना कोई प्रखर वक्ता और ना ही चुम्बकीय व्यक्तित्व का स्वामी। वो तो एक आम आदमी है, विद्युत विभाग का अदना सा कर्मचारी, जो वो जुमले बोल भी नहीं सकता जो भारतीय फिल्मों के नायक अक्सर प्रेम में पड़ने के बाद बोलते हैं। पर सूरी के पास एक खूबी तो है ही और वो है उसकी लगन और सच्चाई और वो अपनी इसी ताकत को खुद को बता रहा है। और इसी सोच पर मैंने इस गीत को रचा है।...."

शायद गीत की यही सच्चाई है जिसने इसे आम जन और समीक्षकों दोनों में इसे लोकप्रिय बनाया है। जयदीप साहनी के बोलों के साथ सलीम सुलेमान का संगीत पूरी तरह न्याय करता है। सुखविंदर सिंह ने हौले हौले चलने वाले नग्मे की खूबसूरत अदाएगी कर ये जतला दिया है कि उनका हुनर सिर्फ ऊँचे सुरों वाले डॉन्स नंबर तक ही सीमित नहीं।
तो आइए पहले चलें रब ने बना दी जोड़ी के इस गीत की शब्द यात्रा पर


हौले-हौले से हवा लगती है,
हौले-हौले से दवा लगती है,
हौले-हौले से दुआ लगती है, हाँ......

हाए ! हौले-हौले चंदा बढ़ता है,
हौले-हौले घूँघट उठता है,
हौले-हौले से नशा चढ़ता है... हाँ.......

तू सब्र तो कर मेरे यार
ज़रा साँस तो ले दिलदार
चल फिक्र नूँ गोली मार
यार है दिन जिंदड़ी दे चार
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया

इश्क ए दी गलियाँ तंग हैं
शरमो शर्मीले बंद हैं
खुद से खुद की कैसी ये जंग है
पल पल ये दिल घबराए
पक पल ये दिल शरमाए
कुछ कहता है और कुछ कर जाए
कैसी ये पहेली मुआ.दिल मर जाना
इश्क़ में जल्दी बड़ा जुर्माना
तू सब्र........हौले.....प्यार

रब दा ही तब कोई होणा, करें कोई यूँ जादू टोणा
मन जाए मन जाए हाए मेरा सोणा
रब दे सहारे चल दे, ना है किनारे चल दे
कोई है ना कहारे चल दे
क्या कह के गया था शायर वो सयाना
आग का दरिया डूब के जाना
तू सब्र........हौले.....प्यार


गीत तो आप ने सुन लिया अब आइए जानते हैंइस रोचक वीडिओ में सलीम सुलेमान, जयदीप, शाहरुख, वैभवी आदि से कि कैसे बना ये गीत! (वैभवी मर्चेंट इस गीत की कोरियोग्राफर हैं।)

मंगलवार, जनवरी 27, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 15 : दिल हारा रे..सुखविंदर सिंह की उर्जात्मक प्रस्तुति !

वार्षिक संगीतमाला २००८ में अब बचे हैं चोटी के पन्द्रह गीत। अब तक पेश निचली पायदानों के दस गीतों में पाँच ए. आर रहमान और तीन विशाल शेखर के द्वारा संगीत निर्देशित रहे हैं। १४ वीं पायदान का ये गीत एक बार फिर विशाल शेखर की झोली में है। टशन फिल्म के इस गीत को गाया आजकल के बहुचर्चित गायक सुखविंदर सिंह ने, गीत के बोल लिखे बहुमुखी प्रतिभा के धनी पीयूष मिश्रा ने।

वैसे तो ये गीत इस संगीतमाला के तीन झूमने झुमाने वाले गीतों में से एक है। इस कोटि का एक गीत आप २५ वीं पायदान पर सुन चुके हैं और इसी तरह की मस्ती और उर्जा से भरपूर एक गीत आपको पहली पाँच पायदानों के अंदर सुनने को मिलेगा। तो जब तक आप सोचे विचारें वो गीत कौन सा हो सकता है , तब तक इस गीत के बारे में कुछ बात कर ली जाए

१४ वीं पायदान का गीत उनके लिए है जो जीवन को बेफिक्री के साथ मस्तमौला अंदाज़ में जीते हैं। जिनके सिर पर ना तो बीते कल का बोझ है और ना ही आने वाले कल की चिंता। जो ना सामने आने वाले खतरों की परवाह करते हैं और ना ही याद रखते हैं अपने अतीत को। पर जिंदगी की इस दौड़ में अगर ये हारे हैं तो बस अपने दिल से...
भारतीय नाट्य संस्थान से स्नातक, अभिनेता और गीतकार पीयूष मिश्रा ने गीत में इन भावों को तो खूबसूरती से पिरोया है। विशाल शेखर का संगीत गीत के साथ थिरकने पर मजबूर करता है। सुखविंदर सिंह की आवाज़ इस तरह के उर्जात्मक गीतों के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। इसलिए तो गीत सुनते ही श्रोताओं के मुँह से ये सहज निकलता है कि इन्होंने तो समा ही बाँध दिया..

तो आइए डालें इस गीत के बोलों पर इक नज़र


कैसे भागे रे, पागल मनवा
ताबड़ तोड़ नाच लूँ , नाच लूँ, नाच लूँ, नाच लूँ, रे
हो हो छप्पन तारे तोड़ नाच लूँ
सूरज चंदा मोड़ नाच लूँ
अब तो ताबड़ तोड़ नाच लूँ
मैं तो बंजारा रे

बन के आवारा मैं किस मेले में पहुँच गया हूँ
कोई तो रोको खो जाऊँ रे
मस्ती का मारा, ये क्या बोलूँ मैं, किसे कहूँ मैं
दिल का मैं हारा हो जाऊँ रे
दिल हारा रे.....
दिल हारा हारा, दिल हारा हारा, मैं हारा
ओ यारा रे...दिल हारा हारा, दिल हारा हारा, मैं हारा दिल हारा रे....

आज अकेले हर हालात से आगे
जुबानी बात से आगे चला आया
हर तारे की आँख में आँखें डाले
चाँदनी रात से आगे चला आया
किसको बोलूँ मैं, कैसे बोलूँ मैं
कोई मुझको बता के जाए, कोई तो बता जाए
दिल हारा रे.........

हो..रस्ता बोला, रे कि थक जाएगा
बीच में रुक जाएगा, अभी रुक जा
अरे आगे जा के, गरज के आँधी होगी
गरज के तूफाँ होगा, अभी रुक जा
मैं तो दीवाना, बोला आ जाना
दोनों संग में चलेंगे हाँ
आ भी जा तू आ जा रे
दिल हारा रे.........


रविवार, फ़रवरी 11, 2007

वार्षिक संगीतमाला गीत # 6 : जब जलती है 'बीड़ी' गाँव की नौटंकी में !

शहर की चमक दमक से दूर गाँव की दुपहरी और शामें अपनी एकरूपता लिये होती हैं। अँधेरे का आगमन हुआ नहीं कि घर के बाहर की सारी गतिविधियाँ ठप्प । यानि महानगरीय माहौल से एकदम उलट जहाँ अँधेरे के साथ रात जवाँ होती है। पर मनोरंजन की जरूरत तो सब को है। और इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए सामाजिक उत्सवों पर नौटंकी और नाच का आयोजन गाँवों की परम्परा रही है ।

ऐसा ही माहौल दिया विशाल भारद्वाज ने गुलजार को अपनी फिल्म ओंकारा में और फिर गंवई मिट्टी की सुगंध ले कर जो गीत निकला उसका जाएका भारत के आम जनमानस की जिह्वा पर बहुत दिनों तक चढ़ा रहा ।

विशाल भारद्वाज ने ओंकारा के इस गीत को अपने जबरदस्त संगीत से जो उर्जा दी है, उसे सुखविंदर सिंह और सुनिधि चौहान की मस्त गायिकी ने और उभारा है। हालांकि इस गीत के लिए स्क्रीन संगीत अवार्ड में श्रेष्ठ गीतकार चुने जाने से गुलजार बहुत खुश नहीं थे। कारण ये नहीं कि उन्हें अपना ये गीत पसंद नहीं बल्कि ये कि इस गीत को रचने से ज्यादा संतोष उन्हें इस फिल्म के अन्य गीतों को लिखने में हुआ है । गुलजार की राय से मैं पूरी तरह सहमत हूँ । इसी फिल्म का एक और गीत इसी कारण से मैंने भी ऊपर की एक सीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा है ।

पर जब मूड धमाल और मौज मस्ती करने का हो तो ये गीत एक जबरदस्त उत्प्रेरक का काम करता हे और इसी वजह से ये यहाँ विराजमान है । तो दोस्तों चलें ६ ठी पायदान के इस गीत के साथ थिरकने ।

ना गिलाफ, ना लिहाफ
ठंडी हवा भी खिलाफ ससुरी
इतनी सर्दी है किसी का लिहाफ लइ ले
ओ जा पड़ोसी के चूल्हे से आग लइ ले
बीड़ी जलइ ले, जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है...

धुआँ ना निकारी ओ लब से पिया, अह्हा
धुआँ ना निकारी ओ लब से पिया
ये दुनिया बड़ी घाघ है
बीड़ी जलइ ले, जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है...

ना कसूर, ना फतूर
बिना जुलुम के हुजूर
मर गई, हो मर गई,
ऐसे इक दिन दुपहरी बुलाई लियो रे
बाँध घुंघरू कचहरी लगाइ लियो रे
बुलाई लियो रे बुलाई लियो रे
लगाई लियो रे कचहरी
अंगीठी जरई ले, जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है....

ना तो चक्कुओं की धार
ना दराती ना कटार
ऐसा काटे कि दाँत का निशान छोड़ दे
जे कटाई तो कोई भी किसान छोड़ दे
ओ ऐसे जालिम का छोड़ दे मकान छोड़ दे
रे बिल्लो, जालिम का छोड़ दे मकान छोड़ दे

ना बुलाया, ना बताया
मारे नींद से जगाया हाए रे
ऐसा चौंकी की हाथ में नसीब आ गया
वो इलयची खिलई के करीब आ गया

कोयला जलइ ले, जिगर से पिया
जिगर मा बड़ी आग है





पिछले साल इसी जगह पर था बंटी और बबली का प्यारा सा नग्मा
छुप चुप के..चोरी पे चोरी।
 

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