जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं पायदान पर एक बार फिर विराजमान है फिल्म मेरी क्रिसमस का एक दूसरा गीत। इससे पहले इसी फिल्म में अंतरा मित्रा और अरिजीत का गया गीत मैने आपको सुनवाया था।
प्रीतम के संगीत निर्देशन में बनी इस फिल्म के सारे गीत औसत से तो बेहतर ही थे। पर इस गीतमाला में आज इस फिल्म का वो गीत है जिसे गाया है सुनिधि चौहान ने और इस गीत के बोल लिखे हैं वरुण ग्रोवर ने।
वरुण ग्रोवर एक बेहतरीन गीतकार हैं हालाँकि मुझे लगता है की अभी भी उनको उतने गीत लिखने को नहीं मिले हैं जितनी प्रतिभा उनमें है।जोर लगा के हइशा में उनका लिखा मोह मोह के धागे या मसान में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से प्रेरित तू किसी रेल से गुजरती है आज भी लोगों द्वारा बड़े मन से गुनगुनाए जाते हैं। फिल्म गैंग्स आफ वासेपुर और सुई धागा में भी उमका काम बेहतरीन था।
प्रीतम के साथ काम करने का वरुण के लिए ये पहला मौका था। इस फिल्म के लिए गीत लिखने के अनुभव के बारे में वरूण का कहना था
श्रीराम राघवन की फिल्मों का अनूठा पहलू यह है कि उनकी फिल्मों के गाने पटकथा से सीधे तौर पर जुड़े होते हैं। यह मेरे लिए कहानी और मूड के सार को पकड़ने का मौका तो देता ही है, साथ ही फिल्म के संदर्भ से इतर भी कुछ मनोरंजक रचने का अवसर प्रदान करता है। बिना इसकी पटकथा जाने हुए भी लोगों ने इस फिल्म के गीतों को पसंद किया है।
सच तो ये है कि मैंने भी मेरी क्रिसमस नहीं देखी पर इसके बावज़ूद भी इसके गीत मेरी गीतमाला का हिस्सा बने हैं।
ये फिल्म क्रिसमस के आस पास रिलीज़ हुयी थी। इसका जो ये शीर्षक गीत है वो इसी त्योहार की मौज मस्ती की तरंग को अपने अंदर समाता हुआ सा बहता है। वरुण के शब्द और सुनिधि की प्यारी गायिकी इस खुशनुमा माहौल को धनात्मक उर्जा और प्रेम के रंगों से भर देते हैं। सुनिधि की गायिकी कितनी शानदार है वो आप इस गीत के ऐश किंग वाले वर्सन को सुन कर समझ सकते हैं। प्रीतम ने अपने इस गीत में ट्रम्पेट का बेहतरीन इस्तेमाल किया है जिसे आप गीत के बोलों के आगे पीछे इस गीत में बारहा सुनेंगे।
मन में फूटा Rum Cake सा
हर कोई लगता नेक सा दिन बड़ा ये ख़ास है, प्यार आस-पास है छाया है जादू एक सा
Cherry और Sherry का समाँ नेमत बरसाता आसमाँ सात रंग शाम के, नाचें हाथ थाम के बातें भी बन जाएँ दुआ
बस, ये ख़ुमार मुझपे थोड़ा-सा, थोड़ा-सा, थोड़ा-सा आने दे बस, एक बार मुझे गहरे समंदर में गुम हो जाने दे ओ, बस, ये ख़ुमार मुझपे थोड़ा-सा, थोड़ा-सा, थोड़ा-सा आने दे बस, एक बार मुझे गहरे समंदर में गुम हो जाने दे,
रोशन तारों की रात है हम दिल-हारों की रात है प्यार है, जुनून है, और इक सुकून है सब रस्ते आते हैं यहाँ
प्रीतम एक प्रतिभाशाली संगीतकार हैं । अपने संगीत को माँजने में अक्सर बड़ी मेहनत करते हैं। उनके बारे में मशहूर है कि गीत रिलीज़ होने के एक दिन पहले तक वो अपने संगीत संयोजन में परिवर्तन करते रहते हैं। उनके सहायक के रूप में कई नए चेहरे आए जो बाद में ख़ुद एक संगीतकार बन गए और कुछ गायक। उनमें एक हमारे अरिजीत सिंह भी हैं जिन्हें आज का युवा अपने सिर आँखों पर बिठाकर रखता है।
पर 2024 में यही प्रीतम कुछ खास कमाल नहीं दिखा सके। उनके जो कुछ गीत थोड़े बजे भी उनकी धुनों में मुझे एक दोहराव सा प्रतीत हुआ। साल 2024 की शुरुआत में उनकी एक फिल्म आई थी मेरी क्रिसमस। इस थ्रिलर के निर्देशक थे श्रीराम राघवन। प्रीतम ने इन्हीं के साथ 2012 में भी एक फिल्म की थी जिसका नाम था Agent Vinod। इस फिल्म का एक गीत था राब्ता। वार्षिक संगीतमाला की 25 वीं पायदान पर मैंने जिस गीत को रखा है वो मुझे राब्ता की याद दिला देता है। क्यूँ दिला देता है वो इस गीत को सुन कर देखियेगा। बहरहाल अरिजीत और अंतरा मित्रा की जोड़ी के साथ वरुण के बोलों ने इस गीत को इतना कर्णप्रिय जरूर बना दिया है कि वो इस संगीतमाला का हिस्सा बन पाए।
प्रीतम ज्यादातर अमिताभ भट्टाचार्य और इरशाद कामिल जैसे गीतकारों के साथ काम करते रहे हैं पर इस बार उन्होने इस फिल्म के लिए अपनी जोड़ी बनाई वरुण ग्रोवर के साथ। वरुण ग्रोवर ने बातचीत के अंदाज़ में कुछ प्यारे से बोल लिखे हैं..
रात अकेली थी तो बात निकल गई
तन्हा शहर में वो तन्हा सी मिल गई
मैंने उससे पूछा, "हम पहले भी मिले हैं कहीं क्या?"
फिर?
उसकी नज़र झुकी, चाल बदल गई
ज़रा सा क़रीब आई, और सँभल गई
हौले से जो बोली, मेरी जान बहल गई, हाँ
क्या बोली?
हाँ, हम मिले हैं १००-१०० दफ़ा
मैं धूल हूँ, तू कारवाँ
इक-दूसरे में हम यूँ लापता
मैं धूल हूँ, तू कारवाँ
क्या आपने इस फिल्म के बाकी गाने सुने हैं? इस फिल्म का एक और गीत है मेरी इस संगीतमाला में। उसे बाद में सुनवाता हूँ । फिलहाल इसे सुन लीजिए।
अगर संगीतमाला की चौथी पायदान पर पापोन की गायिकी आपके दिल को सहला गयी थी तो आज वही काम तीसरी पायदान पर अरिजीत सिंह की आवाज़ कर रही है फिल्म सोनचिड़िया के इस गीत में जिसकी धुन बनाई विशाल भारद्वाज ने और बोल लिखे वरुण ग्रोवर ने। विशाल अपनी फिल्मों में अरिजीत की आवाज़ का बखूबी इस्तेमाल करते आए हैं। हैदर, रंगून पटाखा और अब सोनचिड़िया के गीत इसकी मिसाल हैं। हाँ ये जरूर है कि विशाल अक्सर गुलज़ार के साथ काम करते हैं पर इस फिल्म के लिए उन्होंने वरूण को चुना जो आज के दौर के एक काबिल गीतकार हैं।
चंबल के डाकुओं से जुड़ी कई कहानियाँ फिल्मी पर्दे का हिस्सा बन चुकी है। नब्ने के बाद की बात करूँ तो पान सिंह तोमर या फिर Bandit Queen जैसी सफलता तो सोनचिड़िया के हाथ नहीं लगी पर फिल्म को समीक्षकों द्वारा सराहा जरूर गया था।
इस गीत को समझने के लिए मुझे आपको इस फिल्म की कहानी से रूबरू कराना पड़ेगा। अपने सरदार के मारे जाने के बाद पुलिस से भागते गिरोह को एक महिला के साथ घायल बच्ची मिलती है जिसकी जान के पीछे उसी के परिवार वाले पड़े हैं। गिरोह उस बच्ची की मदद करते हुए उसे अस्पताल पहुँचाने के लिए तैयार हो जाता है। गिरोह के द्वारा एक बार गलती से कुछ बच्चों की हत्या हो गयी थी। उनके मन में ये धारणा भी है कि ये पाप तभी कटेगा जब वो किसी बच्ची रूपी सोनचिड़िया को बचाएँगे।
इसी क्रम में ये गीत फिल्म में आता है। वरुण एक ऐसे गीतकार हैं जिनके शब्दों में एक गहराई होती है। उसकी तहों तक पहुँचने के लिए एक श्रोता को गीत की भावनाओं में डूबना होता है। अब इसी गीत को देखिए। रुआँ रुआँ एक आशा का, एक नए जीवन के संचार का गीत है। नायक द्वारा अपनी बीती हुई ज़िदगी के कलुष को धोने की चेष्टा की तुलना इस गीत में वरुण ने एक ऐसे पंक्षी से की है जो अँधेरी रातों से निकल वक़्त की पुरानी गाँठों को खोलते हुए एक नए आकाश, एक नई सुबह की ओर उड़ चला है। ऐसे करते हुए उसका रोयाँ रोयाँ पुलकित है। नायक की सदाशयता के इस नूर ने पूरे मन रूपी कुएँ को मीठा कर दिया है इसलिए वरूण ने लिखा
पंछी चला, उस देस को है जहाँ, रातों में, सुबह घुली पंछी चला, परदेस को कि जहाँ, वक्त की, गाँठ खुली रुआँ रुआँ, रौशन हुआ धुआँ धुआँ, जो तन हुआ रुआँ रुआँ... हाँ नूर को, ऐसे चखा मीठा कुआँ, ये मन हुआ रुआँ रुआँ...
नायक की ज़िदगी के इस दुखद चरण के समापन और एक नए की शुरुआत की बात कुछ अन्य बिंबों के साथ वरुण दूसरे अंतरे में भी करते हैं। माटी के मैले घड़े के टूटकर कंचन होने की उनकी सोच वाकई लाजवाब है।
गहरी नदी, में डूब के आखिरी साँस का, मोती मिला सदियों से था, ठहरा हुआ हाँ गुज़र ही गया, वो काफ़िला पर्दा गिरा, मेला उठा खाली कोई, बर्तन हुआ माटी का ये, मैला घड़ा टूटा तो फिर, कंचन हुआ रुआँ रुआँ...
विशाल ने इस गीत में गिटार और सीटी का बेहतरीन इस्तेमाल किया है। गीत के बोलों के साथ गिटार की टुनटुनाहट इस बारीकी से गूँथी गयी है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। इस गीत में मधुर गिटार बजाया है अंकुर मुखर्जी ने।
विशाल भारद्वाज व वरुण ग्रोवर
गीत की शुरुआत में अरिजीत की रुआँ रुआँ की गूँज आपको एक अलग मूड में ले आती है और फिर तो उनकी गायिकी शब्द और संगीत के साथ ऐसे घुलती मिलती है कि आप गीत खत्म होने तक उसके मोहपाश से अपने आप को अलग नहीं कर पाते। तो आइए सुनते हैं सोनचिड़िया का ये बेहद भावपूर्ण नग्मा। गीत में जो नदी नज़र आ रही है वो देश की सबसे साफ सुथरी नदियों में से एक चंबल नदी है।
संगीतमाला की आज की कड़ी में है अनु मलिक द्वारा संगीत निर्देशित सुरीला युगल गीत चाव लागा जो इस साल इतना बजा और सराहा गया है कि आप इससे भली भांति परिचित होंगे। इसके पहले जब शरद कटारिया, अनु मलिक, वरुण ग्रोवर, पापोन की चौकड़ी दम लगा के हइसा में साथ आई थी तो मोह मोह के धागे सा यादगार गीत बना था।
मोह मोह के धागे एकल गीत था जिसे पापोन और मोनाली ठाकुर ने अलग अलग गाया था जबकि इस बार अनु मलिक ने सुई धागा के इस गीत को पापोन और रोंकिनी के युगल स्वर में गवाया। रोंकिनी की सधी हुई गायिकी तो आपने 2017 में रफ़ूऔर पिछले साल तू ही अहम में सुनी ही होगी। पापोन तो ख़ैर इस संगीतमाला में दो बार पहली बार बर्फी के गीत क्यूँ ना हम तुम और दूसरी बार मोह मोह के धागे के लिए सरताज गीत का गौरव प्राप्त कर ही चुके हैं।
सुई धागा की कथा एक निम्म मध्यम वर्गीय परिवार की है जिसका चिराग यानि नायक कोई नौकरी करने के बजाए हुनर के बलबूते पर अपने लिए एक अलग मुकाम बनाना चाहता है। उसकी ज़िंदगी तब खुशनुमा रंग ले लेती है जब उसकी नई नवेली पत्नी पूरे जोशो खरोश से उसके सपने को अपना लेती है।
पति पत्नी के पनप रहे इस नए रिश्ते में कभी खराशें आती हैं तो कभी मुलायमियत के पल और इसी को ध्यान में रखते हुए वरुण ग्रोवर ने गीत का मुखड़ा लिखा कभी शीत लागा कभी ताप लागा तेरे साथ का है जो श्राप लागा.. तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा।
गीत में शीत और ताप.. चाव और घाव.. नींद और जाग की उनकी जुगलबंदी तो कमाल की थी। एक दूसरे को समझते बूझते ये साथी इन प्यार भरी राहों में हल्के हल्के कदम भरना चाहते हैं और इसीलिए कह उठते हैं रास्ते आस्ते चल ज़रा।
वैसे मुखड़े में "साथ का श्राप" थोड़ी ज़्यादा तीखी अभिव्यक्ति हो गयी ऐसा मुझे महसूस हुआ। इसी तरह शहर बिगाड़ने वाली पंक्तियाँ भी उतनी प्रभावी नहीं लगीं। इसीलिए मुझे गीत के दो अंतरों में दूसरा वाला अंतरा ज्यादा बेहतर लगा। वैसे क्या आपको पता है कि वरुण ने इस गीत के लिए एक तीसरा अंतरा भी रचा था। पहले अंतरे की जगह अगर वो इस्तेमाल हो जाता तो ये गीत और निखर उठता। देखिए कितना प्यारा लिखा था वरुण ने
इकटक तुझपे, मन ये टिका है बाँध ले चाहे, खुल जाने दे आज मिलावट, थोड़ी कर के ख़ुद में मुझको घुल जाने दे तुझपे ही खेला दाँव रे, दाँव रे तेरा चाव लागा, जैसे कोई घाव लागा
रोकिनी व पापोन
गिटार की टुनटुनाहट के बीच रोंकिनी के मधुर आलाप से गीत का आगाज़ होता है और फिर गीत पापोन की मुलायम और रोंकिनी के शास्त्रीय रंग में रँगी आवाज़ों में घुलता मिलता आगे बढ़ जाता है। जब मैंने पहली बार ये गीत सुना था तो रोंकिनी जब रास्ते... आस्ते चले ज़रा गाती हैं तो किशोर कुमार का गाया एक गीत जेहन में कौंध उठा था जिसे मैं याद नहीं कर पा रहा था। बाद में मैंने जब रोंकिनी से ये प्रश्न किया तो उन्होंने बताया कि वो हिस्सा उन्हें भी मैं शायर बदनाम की याद दिलाता है।
अनु मलिक के संगीत संयोजन में गिटार और बाँसुरी इस गीत में प्रमुखता से बजती है। पहले इंटरल्यूड में गिटार पर अंकुर मुखर्जी की धुन सुनकर मन झूम उठता है वहीं दूसरे में बाँसुरी पर नवीन कुमार की बजाई धुन कानों में मिश्री घोलती है। अचरज ना होगा गर इस गीत की लोकप्रियता इसे फिल्मफेयर एवार्ड के गलियारों तक पहुँचा दे।
कभी शीत लागा कभी ताप लागा तेरे साथ का है जो श्राप लागा मनवा बौराया.. तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा रह जाएँ चल यहीं घर हम तुम ना लौटें ढूँढें कोई ना आज रे तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा रास्ते, आस्ते चले ज़रा , रास्ते..., आस्ते चले ज़रा तेरा चाव लागा .... संग में तेरे लागे नया सा काम पुराना लोभ पुराने दिन में ही आ जा शहर बिगाड़ें जो भी सोचे लोग पुराने तू नीदें तू ही जाग रे जाग रे तेरा चाव लागा ... देख लिहाज़ की चारदीवारी फाँद ली तेरे एक इशारे प्रीत की चादर, छोटी मैली हमने उस में पैर पसारे
वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं सीढ़ी पर एक कव्वाली थी तो 11वीं पायदान पर है एक भजन फिल्म सुई धागा का जिसे संगीतबद्ध किया है अनु मलिक ने, बोल हैं वरुण ग्रोवर के और आवाज़ रोंकिनी गुप्ता की।
किसी देखी हुई फिल्म का एलबम सुनते वक़्त अचानक से कोई गीत अच्छा लगता है और फिर हम सोचते हैं कि अरे ये फिल्म में कहाँ था? कई बार कुछ गीत फिल्मों में संपादन के दौरान ही हट जाते हैं या उनकी कुछ हिस्सा ही फिल्म में शूट होता है। सुई धागा के इस सुरीले भजन को तो मैं फिल्म में देख नहीं पाया पर हो सकता है मेरे ध्यान से रह गया हो या सिर्फ इसकी कुछ पंक्तियाँ इस्तेमाल हुई हों। इस गीत का प्रमोशन भी फिल्म के बाकी गीतों की तरह नहीं किया गया। इसलिए मुझे यकीन है कि आपमें से ज्यादातर लोगों के लिए ये मीठा सा भजन अनसुना होगा।
इस गीत की चर्चा शुरु करते हैं गीतकार वरुण ग्रोवर से। तीन साल पहले अनु मलिक के साथ मिलकर उन्होंने मोह मोह के धागे लिखकर श्रोताओं को अपने मोह जाल में फाँस लिया था। उसी साल मसान में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से प्रेरित उनका गीत तू किसी रेल सी गुजरती है मुझे बेहद पसंद आया था। वरुण ग्रोवर का नाम मैं जब भी किसी फिल्म की क्रेडिट में देखता हूँ तो मन पहले से ही खुश हो जाता है कि चलो अब कुछ सार्थक गहरे बोलों से मुलाकात होने वाली है। तू ही अहम के मुखड़े को ही को ही देख लीजिए। इस भजन के पीछे की सोच किसी ऐसे इंसान की है जिसके मन में भगवान के होने के प्रति पहले कुछ शंका (वहम) थी पर उसका आभास होने से वो एक गौरव, एक शक्ति (अहम) में बदल गयी है। अब उस शक्ति से जुड़ाव हो गया है तो ये भरोसा हो चला है कि आगे का मार्ग भी वही दिखलाएगा। मुझे शब्दों के लिहाज से इस गीत का दूसरे अंतरा सबसे प्रिय है जिसमें वरुण माया मोह में पड़े इंसान की मनोवृतियों को वे खूबसूरत बिंबों से सामने रखते नज़र आते हैं।
अनु मालिक व वरुण ग्रोवर
कुछ साल के अज्ञातवास के बाद जबसे अनु मलिक ने दम लगा कर हइसा के संगीत से वापसी की है तबसे उनके गीतों में मेलोडी लौट आई है। पिछले साल की फिल्मों में सुई धागा के साथ साथ जे पी दत्ता की फिल्म पलटन में भी उनका काम सराहनीय था। अगर तू ही अहम की बात करूँ तो प्रील्यूड व पहले इंटरल्यूड में गिटार की तरंगों के बीच उभरता रोंकिनी का आलाप, बोलों के पीछे बार बार उभरती बाँसुरी मन को सुकून से भर देती है। दूसरे इंटरल्यूड में बाँसुरी की मोहक तान का तो कहना ही क्या!
इन सब के आलावा अनु मलिक की तारीफ़ इसलिए भी करनी होगी कि उन्होंने इस शास्त्रीयता के रंग में डूबे इस गीत के लिए एक ऐसी गायिका को चुना जो इस तरह के गीत के साथ पूरी तरह न्याय कर सकती थीं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ रोंकिनी गुप्ता की जिनके तुम्हारी सुलू के गीत रफ़ू ने पिछले साल इस गीतमाला का सरताज बनने का गौरव प्राप्त किया था।
रोंकिनीगुप्ता
जो लोग बतौर गायिका रोंकिनी के सांगीतिक सफ़र से परिचित नहीं हैं वो उनके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। तुम्हारी सुलु का गीत गाते वक़्त सहायक निर्देशक मनन ने (जो सुई धागा में भी सहायक निर्देशन का काम कर रहे थे) रोकिनी का नाम फिल्म के निर्देशक शरत कटारिया को सुझाया। अनु मलिक चाहते थे कि उनके संगीतबद्ध गीतों को कोई संगीत सीखी हुई तैयार गायिका मिले जिसकी आवाज़ का स्वाद कुछ अलग सा हो। रोंकिनी इन मापदंडों में बिल्कुल खरी उतरीं। शास्त्रीय गायिकी पर उनकी पकड़ तो सर्वविदित है इसलिए उनके गीतों में संगीतकार कोई ना कोई आलाप डाल ही देते हैं। नतीजा ये कि आप इस आलाप के साथ ही गीत से बँधने लगते हैं। इस गीत में जब वो परबत तोड़ धरम का ... या मुक्ति जो ये चाहे... गाती हैं तो उनकी आवाज़ का उतार चढ़ाव देखते ही बनता है। इस साल गायिकाओं के गाए बेहतरीन एकल गीतों में इस गीत का नाम भी मन में स्वाभाविक रूप से उठता है।
तो आइए सुनते हैं ये भजन उनकी आवाज़ में।
तू ही अहम, तू ही वहम तू ही अहम, तू ही वहम तुझसे जुड़ा वास्ता हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता घाट तू ही पानी तू ही प्यास है तू ही चुप्पी तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम हमको तू ना माने, हम मानेंगे तुझको घोर अंधेरे में भी पहचानेंगे तुझको परबत तोड़ धरम का हम पायेंगे तुझको तू रंग भी बेरंग भी तू रंग भी बेरंग भी शंका तू ही आस्था हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता घाट तू ही.. तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम तन ये भोग का आदी, मन ये कीट पतंगा झूठ के दीवे नाचे, झूठा बने ये मलंगा मुक्ति जो ये चाहे, तो मारे मोह अड़ंगा तू ही सदा से दूर था तू ही सदा से दूर था तू ही सदा पास था हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता घाट तू ही.. तू अरदास है तू ही अहम.... तू ही वहम
दो महीनों की इस संगीत यात्रा के बाद बारी है आज वार्षिक संगीतमाला 2015 के सरताजी बिगुल को बजाने की। संगीतमाला की चोटी पर गाना वो जिसके साथ संगीतकार अनु मलिक ने की है हिंदी फिल्म जगत में शानदार वापसी। शिखर पर एक बार फिर हैं वरुण ग्रोवर के प्यारे बोल जो पापोन व मोनाली ठाकुर की आवाज़ के माध्यम से दिल में प्रीत का पराग छोड़ जाते हैं। यानि ये कहना बिल्कुल अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वो होगा ज़रा पागल जिसने इसे ना चुना :)। तो चलिए आज इस आपको बताते हैं इस गीत की कहानी इसे बनाने वाले किरदारों की जुबानी।
अनु मलिक का नाम हिंदी फिल्म संगीत में लीक से हटकर बनी फिल्मों के साथ कम ही जुड़ा है। पर जब जब ऐसा हुआ है उन्होंने अपने हुनर की झलक दिखलाई है। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं के एक दशक से लंबे इतिहास में उमराव जान के गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो के लिए वो ये तमगा पहले भी हासिल कर चुके हैं। पर इस बात का उन्हें भी इल्म रहा है कि अपने संगीत कैरियर का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने बाजार की जरूरतों को पूरा करने में बिता दिया। इतनी शोहरत हासिल करने के बाद भी उनके अंदर कुछ ऐसा करने की ललक बरक़रार है जिसे सुन कर लोग लंबे समय याद रखें। उनकी इसी भूख का परिणाम है फिल्म दम लगा के हईशा का ये अद्भुत गीत !
अनु मलिक ने गीत के मुखड़ा राग यमन में बुना जो आगे जाकर राग पुरिया धनश्री में मिश्रित हो जाता है। इंटरल्यूड्स में एक जगह शहनाई की मधुर धुन है तो दूसरे में बाँसुरी की। पर अनु मलिक की इस रचना की सबसे खूबसूरत बात वो लगती है जब वो मुखड़े के बाद तू होगा ज़रा पागल से गीत को उठाते हैं। पर ये भी सच है की उनकी इतनी मधुर धुन को अगर वरुण ग्रोवर के लाजवाब शब्दों का साथ नहीं मिला होता तो ये गीत कहाँ अमरत्व को प्राप्त होता ?
वरुण ग्रोवर और अनु मलिक
वैसे इसी अमरत्व की चाह, कुछ अलग करने के जुनून ने IT BHU के इस इंजीनियर को मुंबई की माया नगरी में ढकेल दिया। यूपी के मध्यम वर्गीय परिवार में पले बढ़े वरुण ग्रोवर का साहित्य से बस इतना नाता रहा कि उन्होंने बचपन में बालहंस नामक बाल पत्रिका के लिए एक कहानी भेजी थी। हाँ ये जरूर था कि घर में पत्र पत्रिकाएँ व किताबें के आते रहने से उन्हें पढ़ने का शौक़ शुरु से रहा। वरुण कहते हैं कि छोटे शहरों में रहकर कई बार आप बड़ा नहीं सोच पाते। लखनऊ ने उन्हें अपने सहपाठियों की तरह इंजीनियरिंग की राह पकड़ा दी। बनारस गए तो पढ़ाई के साथ नाटकों से जुड़ गए और बतौर लेखक उनके मन में कुछ करने का सपना पलने लगा था। पुणे में नौकरी करते समय उन्होंने सोचा था कि दो तीन साल काम कर कुछ पैसे जमा कर लेंगे और फिर मुंबई की राह पकड़ेंगे। पर ग्यारह महीनों में सॉफ्टवेयर जगत में काम करते हुए उनका अपनी नौकरी से मोह भंग हो गया।
लेखक के साथ वरुण को चस्का था कॉमेडी करने का तो मुंबई की फिल्मी दुनिया में उन्हें पहला काम ग्रेट इ्डियन कॉमेडी शो लिखने का मिला। बाद में वो ख़ुद ही स्टैंड अप कॉमेडियन बन गए पर साथ साथ वो फिल्मों में लिखने के लिए अवसर की तलाश कर रहे थे। जिन लोगों के साथ वो काम करना चाहते थे वहाँ पटकथा लिखने का तो नहीं पर गीत रचने का मौका था। सो वो गीतकार बन गए। नो स्मोकिंग के लिए गाना लिखा पर वो उसमें इस्तेमाल नहीं हो सका। फिर अनुराग कश्यप ने उन्हें दि गर्ल इन येलो बूट्स में मौका दिया पर वरुण पहली बार लोगों की नज़र में आए गैंग्स आफ वासीपुर के गीतों की वजह से। फिर दो साल पहले आँखो देखी आई जिसने उनके काम को सराहा गया और आज देखिए इस वार्षिक संगीतमाला की दोनों शीर्ष पायदानों पर उनके गीत राज कर रहे हैं।
अनु मलिक ने अपने इस गीत के लिए जब पापोन को बुलाया तो वो तुरंत तैयार हो गए। अनु कहते हैं कि पहली बार ही गीत सुनकर पापोन का कहना था कि ये गाना जब आएगा ना तो जान ले लेगा।
मोनाली ठाकुर और पापोन
जब गीत का फीमेल वर्सन बनने लगा तो अनु मलिक को मोनाली ठाकुर की
आवाज, की याद आई। ये वही मोनाली हैं जिन्होंने सवार लूँ से कुछ साल पहले
लोगों का दिल जीता था। मोनाली ने इंडियन आइडल में जब हिस्सा लिया था तो
अनु जी ने उनसे वादा किया था कि वो अपनी फिल्म में उन्हें गाने का एक मौका जरूर
देंगे। अनु मलिक को ये मौका देने में सात साल जरूर लग गए पर जिस तरह के गीत
के लिए उन्होंने मोनाली को चुना उसके लिए वो आज भी उनकी शुक्रगुजार हैं। पापोन व मोनाली दोनों ने ही अपने अलग अलग अंदाज़ में इस गीत को बेहद खूबसूरती से निभाया है।
वरुण ने क्या प्यारा गीत लिखा है। सहज शब्दों में इक इक पंक्ति ऐसी जो लगे कि अपने लिए ही कही गई हो। अब बताइए मोह के इन धागों पर किसका वश चला है? एक बार इनमें उलझते गए तो फिर निकलना आसान है क्या? फिर तो हालत ये कि आपका रोम रोम इक तारा बन जाता है जिसकी चमक आप उस प्यारे से बादल में न्योछावर कर देना चाहते हों । अपनी तमाम कमियों और अच्छाइयों के बीच जब कोई आपको पसंद करने लगता है, आपकी अनकही बातों को समझने लगता है तो फिर व्यक्तित्व की भिन्नताएँ चाहे दिन या रात सी क्यूँ ना हों मिलकर एक सुरमयी शाम की रचना कर ही देती हैं। इसीलिए गीत में वरुण कहते हैं.
हम्म... ये मोह मोह के धागे,तेरी उँगलियों से जा उलझे
कोई टोह टोह ना लागे, किस तरह गिरह ये सुलझे
है रोम रोम इक तारा..
है रोम रोम इक तारा ,जो बादलों में से गुज़रे..
ये मोह मोह के धागे....
तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना
तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना
कैसे तूने अनकहा, तूने अनकहा सब सुना
तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना
तू दिन सा है, मैं रात आना दोनों मिल जाएँ शामों की तरह
बिना आगे पीछे सोचे अपने प्रिय के साथ बस यूं ही समय बिताना बिना किसी निश्चित मंजिल के भले ही एक यूटोपियन अहसास हो पर उस बारे में सोचकर ही मन कितना आनंदित हो जाता है...नहीं ?
ये मोह मोह के धागे....
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था
चिट्ठियों को जैसे मिल गया ,जैसे इक नया सा पता
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था
खाली राहें, हम आँख मूंदे जाएँ
पहुंचे कहीं तो बेवजह
ये मोह मोह के धागे। ...
अनु जी की धुन पर वरुण ने ये गीत पहले पापोन वाले वर्सन के लिए लिखा। मोनाली ठाकुर वाले वर्सन में गीत का बस दूसरा अंतरा बदल जाता है।
कि तेरी झूठी बातें मैं सारी मान लूँ आँखों से तेरे सच सभी सब कुछ अभी जान लूँ तेज है धारा, बहते से हम आवारा आ थम के साँसे ले यहाँ
तो बताइए कैसा लगा आपको ये सरताज नग्मा ? पिछले साल के गीत संगीत की विभिन्न विधाओं में अव्वल रहे कलाकारों की चर्चा के साथ लौटूँगा इस संगीतमाला के पुनरावलोकन में।
हिंदी फिल्मों में गीतकार पुराने दिग्गज़ों की कालजयी कृतियों से प्रेरणा लेते रहे हैं और जब जब ऐसा हुआ है परिणाम ज्यादातर बेहतरीन ही रहे हैं। पिछले एक दशक के हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे प्रयोगों से जुड़े दो बेमिसाल नग्मे तो तुरंत ही याद आ रहे हैं। 2007 में एक फिल्म आई थी खोया खोया चाँदऔर उस फिल्म में गीतकार स्वानंद ने मज़ाज लखनवी की बहुचर्चित नज़्म आवारा से जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ... का बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया था। फिर वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म गुलाल में पीयूष मिश्रा ने फिल्म प्यासा में साहिर के लिखे गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.. को अपने लिखे गीत ओ री दुनिया... में उतना ही सटीक प्रयोग किया था।
वार्षिक संगीतमाला के इस साल का रनर्स अप का खिताब जीता है एक ऐसे ही गीत ने जिसके बारे में मैं पहले भी इस ब्लॉग पर लिख चुका हूँ। इस गीत की ख़ास बात ये भी है कि इसे लिखा एक गीतकार ने और गाया एक दूसरे गीतकार ने। इंडियन ओशन बैंड द्वारा संगीतबद्ध फिल्म मसान के इस गीत को आवाज़ दी है स्वानंद किरकिरे ने और इसे लिखा है वरुण ग्रोवर ने जो इस फिल्म के पटकथा लेखक भी हैं।
दरअसल इस तरह के गीतों को फिल्मों के माध्यम से आम जनता और खासकर आज की नई पीढ़ी तक पहुँचाने के कई फायदे हैं। एक तो जिस कवि या शायर की रचना का इस्तेमाल हुआ है उसके लेखन और कृतियों के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ जाती है। दूसरी ओर गायक, गीतकार और संगीतकार ऐसे गीतों पर पूरी ईमानदारी से मेहनत करते हैं ताकि मूल रचना पर किसी तरह का धब्बा ना लगे। यानि दोनों ओर से श्रोताओं की चाँदी !
वरुण ने मसान के इस गीत के लिए हिंदी के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार की रचना का वो शेर लिया है जिसे लोग अनोखे बिंबो के लिए हमेशा याद रखते हैं यानि तू किसी रेल सी गुज़रती है,..मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
पर इस गीत के लिए वरुण के दिमाग में दुष्यन्त साहब की ग़ज़ल का मतला आया कैसे इसकी भी एक लंबी दास्तान है। वरुण ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था
जब मैं लखनऊ में दसवीं में पढ़ रहा था तो मेरे सपनों का भारत पर निबंध लिखते समय मैंने पहली बार दुष्यन्त कुमार के मशहूर शेर कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता....एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों का इस्तेमाल किया था। उन स्कूली दिनों में दुष्यन्त कुमार के शेर वाद विवाद प्रतियोगिता का अहम हिस्सा हुआ करते थे। आगे के सालों में दुष्यन्त जी की कविताओं से साथ छूट गया। पर लखनऊ में ही एक दोस्त की शादी ने उनकी कविता से फिर मुलाकात करा दी। मेरे दोस्त के पिता ने वहाँ उनकी ग़ज़ल सुनाई मैं जिसे ओढ़ता बिछाता हूँ.....जिसमें ये तू किसी रेल सी गुजरती है वाला शेर भी है। तभी से ये ग़ज़ल और खासकर ये शेर मेरे ज़ेहन में बस गया।
अजीब रूपक था ये एक लड़की का रेल की तरह गुजरना और उसके प्रेमी का उसे देख पुल की तरह थरथराना। देखने से कितना सूखा सा बिंब लगता है। यंत्रवत चलती ट्रेन और लोहे का पुल। पर मेरे ये लिए हिन्दी कविताओं में प्रायः इस्तेमाल किये जाने वाले बिंबों से एक दम अलग था। जरा दूसरे नज़रिए से सोचिए, इंजन और रेल का ये रोज का क्षणिक पर दैहिक मिलन कितना नर्म, मादक अहसास जगाता है मन में उस चित्र के साथ जिसमें हम सभी पल बढ़ के बड़े हुए हैं।
मसान के लिए जब निर्देशक नीरज घायवान से वरूण की फिल्म के संगीत को लेकर बात हुई तो उन्होंने ये निर्णय लिया कि फिल्म के गीत काव्यात्मक होने चाहिए क्यूँकि नायिका शालू का चरित्र एक कविता प्रेमी का है जिसने ग़ालिब, बशीर बद्र, निदा फ़ाजली जैसे धुरंधरों को अच्छी तरह पढ़ रखा है। उदय प्रकाश के मुक्त छंद से लेकर उन्होंने फ़ैज़ और बद्र साहब की ग़ज़ले पढ़ीं पर तभी वरुण के दिमाग में दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल का मिसरा वापस लौट आया। गीत रचने में वरुण के समक्ष चुनौती थी सहज ज़मीनी शब्दों से वो वैसे रूपक रचें जो दुष्यन्त कुमार के शेर की सी ऊँचाइयाँ लिये हुए हों और ये काम उन्होंने बखूबी कर भी दिखाया।
बनारस की गलियों में दो भोले भाले दिलों के बीच पनपते इस फेसबुकिये प्रेम को जब वरुण अपने शब्दों के तेल से छौंकते हैं तो उसकी झाँस से सच ये दिल रूपी पुल थरथरा उठता है। वो फिर या तो उसका नाम हर वक़्त बुदबुदाने की बात हो या सफ़र में उसकी यादों का अलाव जलाने की।
पर मन सिर्फ मन जीतने से थोड़े ही मान जाता है। उसे तो तन भी चाहिए। सो दूसरे अंतरे में बदमाशी भरे लहजे में गीतकार काठ के तालों को इशारों की चाभियों से तोड़ने की बात भी करते हैं। गीत के बोलों में छुपी शरारत खूबसूरत रूपकों के ज़रिए उड़ा ले जाती है प्रेम के इस बुलबुले को उसकी स्वाभाविक नियति के लिए.
तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ तू भले रत्ती भर ना सुनती है... मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ..
किसी लंबे सफर की रातों में तुझे अलाव सा जलाता हूँ काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं उनमें इशारों की चाभियाँ लगा रात जो बाकी है, शाम से ताकी है नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा.. खराबियाँ लगा..
मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है.....थरथराता हूँ
बतौर गायक स्वानंद की आवाज़ को मैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी, परीणिता, खोया खोया चाँद जैसी फिल्मों में गाये उनके गीतों से पसंद करता आया हूँ। इस बार भी पार्श्व में गूँजती उनकी दमदार आवाज़ मन में गहरे पैठ कर जाती है। इंडियन ओशन ने भी गीत के बोलों को न्यूनतम संगीत संयोजन से दबने नहीं दिया है। तो आइए सुनते हैं नए कलाकारों श्वेता त्रिपाठी और विकी कौशल पर फिल्माए ये नग्मा..
हिंदी फिल्मों में गीतकार पुराने दिग्गज़ों की कालजयी कृतियों से प्रेरणा लेते रहे हैं और जब जब ऐसा हुआ है परिणाम ज्यादातर बेहतरीन ही रहे हैं। पिछले एक दशक के हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे प्रयोगों से जुड़े दो बेमिसाल नग्मे तो तुरंत ही याद आ रहे हैं। 2007 में एक फिल्म आई थी खोया खोया चाँदऔर उस फिल्म में गीतकार स्वानंद ने मज़ाज लखनवी की बहुचर्चित नज़्म आवारा से जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ... का बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया था। फिर वर्ष 2009 में प्रदर्शित फिल्म गुलाल में पीयूष मिश्रा ने फिल्म प्यासा में साहिर के लिखे गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है.. को अपने लिखे गीत ओ री दुनिया... में उतना ही सटीक प्रयोग किया था। इसी कड़ी में कल जुड़ा है इसी महीने के अंत में प्रदर्शित होने वाली फिल्म मसान का ये प्यारा नग्मा जिसके बोल लिखे हैं नवोदित गीतकार वरुण ग्रोवर ने।
ये वही वरूण ग्रोवर हैं जिन्होंने कुछ ही महीने पहले फिल्म दम लगा के हैस्सा में अपने लिखे गीत ये मोह मोह के धागे... के माध्यम से हम सभी संगीतप्रेमियों के दिल में अपनी जगह बना ली थी। दरअसल इस तरह के गीतों को फिल्मों के माध्यम से आम जनता और खासकर आज की नई पीढ़ी तक पहुँचाने के कई फायदे हैं। एक तो जिस कवि या शायर की रचना का इस्तेमाल हुआ है उसके लेखन और कृतियों के प्रति लोगों की उत्सुकता बढ़ जाती है। दूसरी ओर गायक, गीतकार और संगीतकार ऐसे गीतों पर पूरी ईमानदारी से मेहनत करते हैं ताकि मूल रचना पर किसी तरह का धब्बा ना लगे। यानि दोनों ओर से श्रोताओं की चाँदी !
वरुण ने मसान के इस गीत के लिए हिंदी के सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार दुष्यन्त कुमार की रचना का वो शेर इस गीत के लिए लिया है जिसे लोग अनोखे बिंबो के लिए हमेशा याद रखते हैं यानि तू किसी रेल सी गुज़रती है,..मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
बनारस की गलियों में दो भोले भाले दिलों के बीच पनपते इस फेसबुकिये प्रेम को जब वरुण अपने शब्दों के तेल से छौंकते हैं तो उसकी झाँस से सच ये दिल रूपी पुल थरथरा उठता है। गीत के बोलों में छुपी शरारत खूबसूरत रूपकों के ज़रिए उड़ा ले जाती है प्रेम के इस बुलबुले को उसकी स्वाभाविक नियति के लिए.
तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ तू भले रत्ती भर ना सुनती है... मैं तेरा नाम बुदबुदाता हूँ..
किसी लंबे सफर की रातों में तुझे अलाव सा जलाता हूँ काठ के ताले हैं, आँख पे डाले हैं उनमें इशारों की चाभियाँ लगा रात जो बाकी है, शाम से ताकी है नीयत में थोड़ी खराबियाँ लगा.. खराबियाँ लगा..
मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा तुझे सोचूँ तो फूट जाता हूँ
तू किसी रेल सी गुज़रती है.....थरथराता हूँ
बतौर गायक स्वानंद की आवाज़ को मैं हजारों ख्वाहिशें ऐसी, परीणिता, खोया खोया चाँद जैसी फिल्मों में गाये उनके गीतों से पसंद करता आया हूँ। इस बार भी पार्श्व में गूँजती उनकी दमदार आवाज़ मन में गहरे पैठ कर जाती है। इंडियन ओशन ने भी गीत के बोलों को न्यूनतम संगीत संयोजन से दबने नहीं दिया है। तो आइए सुनते हैं नए कलाकारों श्वेता त्रिपाठी और विकी कौशल पर फिल्माए ये नग्मा..
गीत तो आपने सुन लिया पर दुष्यन्त कुमार की मूल ग़ज़ल का उल्लेख ना करूँ तो बात अधूरी ही रह जाएगी। जानते हैं पूरी ग़ज़ल में कौन सा मिसरा मुझे सबसे ज्यादा पसंद है? ना ना पुल और रेल नहीं बल्कि ग़ज़ल का मतला एक जंगल है तेरी आँखों में..मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ.. :)। ना जाने इसे गुनगुनाने हुए मन इतना खुश खुश सा क्यूँ महसूस करता है। वैसे भी आँखों के समंदर में डूबना कौन नहीं पसंद करता पर यहाँ तो खुला समंदर नहीं पर गहराता जंगल है जिसके अंदर के अदृश्य पर घने राजों को जानने के लिए मन भटकने को तैयार बैठा है।
दुष्यन्त कुमार की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से सँवारा था पटियाला में जन्मी पार्श्व गायिका मीनू पुरुषोत्तम ने। फिल्म ताज महल से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली मीनू ने बात एक रात की, ये रात फिर ना आएगी, दाग, हीर राँझा, दो बूँद पानी आंदोलन जैसी फिल्मों में गाने गाए। तो आइए उनकी आवाज़ में इस ग़जल को भी सुन लिया जाए..
एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ मैं तुझे भूलने की कोशिश में आज कितने क़रीब पाता हूँ तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ हर तरफ एतराज़ होता है मैं अगर रोशनी में आता हूँ एक बाज़ू उखड़ गया जबसे और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
वैसे ''साये में धूप'' जो दुष्यंत जी की ग़ज़लों का संकलन है में कुछ और अशआर हैं, एक तो मतला
मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
और दूसरा आखिरी शेर..
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ
वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं सीढ़ी पर जो गाना है वो एक सामान्य हिंदी फिल्म गीतों से थोड़ा हट कर है। पहली बार सुनने पर ये आपके कानों को अटपटा लग सकता है पर यही इसका मजबूत पहलू भी है। इस गीत की संगीतकार हैं स्नेहा खानवलकर। इंदौर में पली बढ़ी तीस वर्षीय स्नेहा की माँ का परिवार शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर घराने से ताल्लुक रखता है। पहले एनीमेशन और फिर कला निर्देशिका का काम करने वाली स्नेहा को पहली बार 2005 में फिल्म 'कल: Yesterday and Tomorrow' के शीर्षक गीत को संगीतबद्ध का मौका मिला पर हिंदी फिल्मो में पहला बड़ा ब्रेक उन्हें राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'Go' में मिला। वर्ष 2008 में स्नेहा ओए लक्की लक्की ओए से संगीत जगत में चर्चा में आयीं। स्नेहा खानवलकर की खासियत ये है वे अपनी फिल्मों में कहानी की पृष्ठभूमि के हिसाब से गीतों में आंचलिक गायकों और वहाँ की ध्वनियों को स्थान देती हैं। स्नेहा का मानना है कि..
हर शहर हर कस्बे की अपनी एक खूबी होती है। वहाँ के लोगों का सोचने का नज़रिया या बोलने का तरीका, बड़े शहरों से सर्वथा भिन्न होता है। इसलिए मेरे लिए ये जानना जरूरी है कि वहाँ के लोग किस तरह गाते हैं? कैसे संगीत रचते हैं? किसी जगह की संस्कृति से जुड़ी इन बारीकियों को जानकर ही हम उनकों गीतों में ढाल सकते हैं। अगर निर्देशक एक फिल्म में कहानी के परिवेश और चरित्र को अपनी सूझबूझ से गढ़ सकता है तो मैं भी अपने संगीत के साथ वही करने का प्रयास करती हूँ।
ओए लक्की.. के संगीत के लिए जहाँ स्नेहा पंजाब और हरियाणा के गाँवों में घूमी वहीं 'Gangs of वासेपुर' के लिए बिहार के संगीत को उन्होंने वहाँ जाकर करीब से सुना। मजे की बात ये है कि GOW में अधिकांश गायक गायिकाओं को भी उन्होंने फिल्म के परिवेश के हिसाब से बिहार और यूपी से चुना पर ठेठ उत्तर भारतीय आवाज़ की तलाश उन्हें एक ऐसी गायिका तक ले गई जिसकी मातृभाषा हिंदी ना हो कर तेलगु है। जी हाँ ये गायिका थीं आंध्र प्रदेश की दुर्गा ! 12 वर्षीय दुर्गा मुंबई की ट्रेनों में गाती थीं। आपने अक्सर देखा होगा कि ट्रेनों में गाने वाले बच्चे ज्यादातर ऊँचे सुरों और बुलंद आवाज़ में गाते हैं। दुर्गा की इसी खासियत को आनंद सुरापुर ने देखा और उन्हें एक एलबम में गाने का न्योता दिया। उनका एलबम तो अभी बाजार में नहीं आया पर इसी बीच स्नेहा को उन्हें सुनने का मौका मिला और अनुराग कश्यप की इस छीछालेदर के लिए उन्होंने उनकी आवाज़ को उपयुक्त पाया।
इस गीत की संगीतकार और गायिका के बारे में
तो आपने जान लिया अब ये मजेदार गीत कैसे बना ये जानना भी आपके लिए रोचक
होगा। फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप बताते हैं
छीछालेदर
शब्द बहुत समय से मेरे दिमाग में था। वो डॉयलाग में भी इस्तेमाल हुआ था
Dev D में। इमोशनल अत्याचार के बाद एक छीछालेदर करना था। बस इतनी लाइन थी
मेरे दिमाग में मेरा जूता वाइट लेदर (अभी तो फेक हो गया) दिल है छीछालेदर वो
हमसे पूछी Whether I like the weather ? Whether I like the weather हमारा
बनारस का बहुत पुराना joke है weather के ऊपर। वो टीचर क्लॉस में आकर
बोलते हैं Open the window let the climate come in.:)
तो
अनुराग के रचित मुखड़े को इस गीत में ढाला गीतकार वरुण ग्रोवर ने। जैसा कि
आपको पता है GOW-II की कहानी धनबाद के कोल माफिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई
पर आधारित है। फिल्म में ये गीत पार्श्व में बजता हुआ हिंसा और प्रतिहिंसा
के बीच जान बचाने की क़वायद में एक आपराधिक ज़िदगी की छीछालेदर को चित्रित
करता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को
मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
वो हमसे पूछा whether I like the weather
चमचम वाली गॉगल भूल के सर मुँह भागे
मखमल वाला मफलर छोड़ के सर मुँह भागे
तेरे नाम के राधे भइया
नज़र कटीली लेजर
मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
हेदर बेदर हेदर बेदर दिल छीछालेदर
वैसे ऊपर गाने में जिन राधे भइया का जिक्र हुआ है वो इस फिल्म के नहीं बल्कि इंडस्ट्री के सबसे बड़े भैया सल्लू भइया के फिल्म तेरे नाम के निभाए हुए किरदार के लिए है। अगर आपकी दिलचस्पी इस गीत की किशोर गायिका के बारे में और जानने की है तो ये वीडिओ देख लीजिए..
नाको झील: किन्नौर का एक खूबसूरत पड़ाव
-
नाको, जो कभी एक छोटा सा गाँव था, आज एक कस्बे का रूप ले चुका है। पर्यटन के
लिहाज़ से देखा जाए तो किन्नौर जिले का आखिरी छोर होने की वजह से, जो भी
रिकांगपिओ स...
इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।