सोमवार, जून 07, 2010

साली से जब पूछनीं, काहो दूल्हा कतहूँ सेट भइल, कहली उ मुस्कात, खोजाइल बाटे इंटरनेट पर !

मनोज भावुक की लिखी किताब 'तस्वीर जिंदगी के' के बारे में पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया था कि इस किताब की अधिकांश ग़ज़लों में उनके आस पास का समाज झलकता है। ज़ाहिर है कोई भी ग़ज़लकार अपनी जिंदगी से जो अनुभव समेटता है वही अपनी ग़ज़लों में उड़ेलता है।

खुद मनोज अपने एक शेर में कहते हैं..

दुख दरद या हँसी या खुशी, जे भी दुनिया से हमरा मिलल
ऊहे दुनिया के सँउपत हईं, आज देके ग़ज़ल के सकल

सामाजिक समस्याओं पर उनके अशआरों की चर्चा तो मैं पहले कर ही चुका हूँ पर गरीबों की हालत पर अपने इस संकलन में एक पूरी गज़ल लिखी है। दीन दुखियों के दर्द को अपनी इस छोटी बहर की ग़ज़ल में वो कुछ यूँ व्यक्त करते हैं..

डँसे उम्र भर, डेग डेग पर
बन के करइत साँप गरीबी

हीत मीत के दर्शन दुर्लभ
जब से लेलस छाप गरीबी

जन्म कर्ज में मृत्यु कर्ज में
अइसन चँपलस चाँप गरीबी

हम सभी अपनी जिंदगी में कभी हताशा के दौर से गुजरते हैं तो कभी दिन हँसते खेलते निकल जाते हैं। मनोज की शायरी में ये दोनो मनःस्थितियाँ उजागर हुई हैं। कभी जिंदगी को वो बोझ की तरह वो खींचता सा अनुभव करते हैं

कुछुओ कहाँ बा आपन, झूठो के बा भरम
साँसो उधार जइसन लागे कबो कबो,

डोली ई देह लागे, दुल्हिन ई आत्मा
जिनगी कहार जइसन लागे कबो कबो

तो कभी उसे वो प्रेम के रंग से सराबोर पाते हैं..

अब त हर वक़्त संग तहरे बा
दिल के क़ागज, पर रंग तहरे बा

तोहसे अलगा बला दहब कैसे
धार तहरे, पतंग तहरे बा

पर ये जरूर गौर करने की बात है कि जिंदगी की जो तस्वीर मनोज ने अपनी इस पुस्तक में दिखाई है उसमें प्यार का रंग बाकी रंगों की तुलना में फीका है। हाँ, ये जरूर है कि मनोज की ग़ज़लें सिर्फ सामाजिक असमानता का आईना भर नहीं हैं पर साथ ही साथ वो उनसे लड़ने का हौसला भी दिलाती हैं। मिसाल के तौर पर उनके लिखे इन अशआरों पर गौर कीजिए.. क्या जोश जगाती हैं इक आम जन के मन में !

होखे अगर जो हिम्मत कुछुओ पहार नइखे
मन में ज ठान लीं कहँवाँ बहार नइखे

कुछ लोग नीक बाटे तबहीं तिकल बा धरती
कइसे कहीं की केहू पर ऐतबार नैखे

या फिर हमें जीवन में जुझारू होने का का संदेश देती इन पंक्तियों को देखें..

हर कदम जीये मरे के बा इहाँ
साँस जबले बा लड़े के बा इहाँ

जिंदगी तूफान में एगो दिया
टिमटिमाते हीं जरे के बा इहाँ

उहे आग सबका जिगर में बा, पर राह बा सबका जुदा
केहू कर रहल बा धुआँ धुआँ, केहू दे रहल बा रोशनी

तो कहीं वो संवाद के रास्ते आपसी संशय को मिटाने की बात कहते हैं..
भेद मन के मन में राखब कब ले अँइसे जाँत के
आज खुल के बात कुछ रउरो कहीं कुछ हमहूँ कहीं

घर बसल अलगे अलग, बाकिर का ना ई हो सके
रउरा दिल में हम रहीं और हमरा में रउरा रहीं

मनोज की लेखनी आज की जीवन शैली और खासकर इंटरनेट पर हमारी बढ़ती निर्भरता पर बड़ी खूबसरती से चली है। उर्दू की मज़ाहिया शायरी के अंदाज में उन्होंने 'इंटरनेट' पर जो भोजपुरी ग़ज़ल कही है उसके कुछ शेर तो वाकई कमाल के हैं। कुछ अशआरों की बानगी देखिए..

कइसन कइसन काम नधाइल बाटे इंटरनेट पर
माउस धइले लोग धधाइल बाटे इंटरनेट पर

बेदेखल बेजानल चेहरा से भी प्यार मोहब्बत अब
अजबे गजबे मंत्र मराइल बाटे इंटरनेट पर

जहाँ ऊपर का शेर सोशल नेटवर्किंग के प्रति हमारे बढ़ते खिंचाव को दिखाता है तो वहीं ये शेर इंटरनेट की सामाजिक स्वीकृति को मज़े मज़े में पूरी कामयाबी से उभारता है

साली से जब पूछनीं, काहो दूल्हा कतहूँ सेट भइल
कहली उ मुस्कात, खोजाइल बाटे इंटरनेट पर

इस ग़ज़ल के अपने सभी पसंदीदा अशआरों को बोल कर पढ़ने का आनंद ही कुछ और है। तो लीजिए सुनिए इसे पढ़ने का मेरा ये प्रयास..



अस्सी पृष्ठों के इस ग़ज़ल संग्रह में मनोज भावुक की 72 ग़जलें हैं। और जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में भी कहा कि अगर आप एक ग़ज़ल प्रेमी हैं और भोजपुरी भाषा की जानकारी रखते है तो मात्र 75 रुपये की ये पुस्तक आपके लिए है। इसे हिंद युग्म ने उत्कृष्ट छपाई के साथ बाजार में उतारा है। इस पुस्तक को खरीदने के लिए आप sampadak@hindyugm.com पर ई मेल कर सकते हैं या मोबाइल पर +91 9873734046 और +91 9968755908 पर संपर्क कर सकते हैं।

और हाँ आपको ये पुस्तक चर्चा कैसी लगी ये जरूर बताइएगा।

मंगलवार, जून 01, 2010

मनोज भावुक का पठनीय भोजपुरी ग़ज़ल संग्रह 'तस्वीर जिंदगी के' : आदमी के स्वप्न के खेल कुछ अजीब बा,जी गइल त जिंदगी, मर गइल तो ख्वाब हऽ

भोजपुरी में ग़ज़लों की किताब, सुनने में कुछ अज़ीब लगता है ना ? मुझे भी लगा था जब दो महिने पहले हिन्द युग्म के संचालक शैलेश भारतवासी ने दिल्ली में मुलाकात के दौरान इस पुस्तक हाथ में पकड़ाते हुए कहा था कि इसे पढ़िएगा जरूर आपको पसंद आएगी। वेसे तो शैलेश ने कविताओं की कई और किताबें पढ़ने को दी थीं पर जहाँ बाकी पुस्तकों के कुछ पन्नों तक जाकर ही पढ़ने का उत्साह जाता रहा, वहीं मनोज भावुक द्वारा लिखा ये भोजपुरी संग्रह 'तस्वीर जिंदगी के' ऐसा मन में रमा कि इसकी कई ग़ज़लों को बार बार पढ़ना मन को बेहद सुकून दे गया।

34 वर्षीय मनोज भावुक भोजपुरी साहित्य जगत में एक चिरपरिचित नाम हैं। सीवान, बिहार में जन्मे और रेणुकूट में पले बढ़े मनोज, भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार प्रसार में हमेशा से सक्रिय रहे हैं। एक आंचलिक भाषा में ग़ज़ल कहना अपने आप में एक गंभीर चुनौती है और मुझे ये कहने में कोई संदेह नहीं कि मनोज अपने इस प्रयास में पूर्णतः सफल रहे हैं। शायद यही वज़ह है कि मनोज को इस पुस्तक के लिए वर्ष 2006 का भारतीय भाषा परिषद सम्मान दिया गया और वो भी गिरिजा देवी व गुलज़ार साहब की उपस्थिति में। किसी भी नवोदित गज़लकार के लिए ये परम सौभाग्य की बात हो सकती है।


मनोज की ग़ज़लों में जहाँ भावनाओं की गहराई है वही भोजपुरी के ठेठ शब्दों के प्रयोग से उपजा माधुर्य भी है। मनोज अपनी ग़ज़लों में हमारे आंतरिक मनोभावों, हमारी अच्छी व बुरी वृतियों को बड़ी सहजता से व्यक्त करते दीखते हैं। मिसाल के तौर पर उनके इन अशआरों को देखिए

अगर जो प्यार से मिल जा त माँड़ो भात खा लीले
मगर जो भाव ना होखे, मिठाई तींत लागेला

दुख में ढूँढ लऽ न राह भावुक सुख के जीये के
दरद जब राग बन जा ला त जिनगी गीत लागेला

जमीर चीख के सौ बार रोके टोके ला
तबो त मन ई बेहाया गुनाह कर जाला

बहुत बा लोग जे मरलो के बाद जीयत बा
बहुत बा लोग जे जियते में यार, मर जाला

अपने इस ग़ज़ल संग्रह में मनोज ने भारतीय गाँवों की पुरानी पहचान खत्म होने पर कई जगह अपने दिल के मलाल को शब्द दिए हैं

कहहीं के बाटे देश ई गाँवन के हऽ मगर
खोजलो प गाँव ना मिली अब कवनो भाव में

लोर पोंछत बा केहू कहाँ
गाँव अपनो शहर हो गइल

बदलाव के उठत बा अइसन ना तेज आन्ही
कहवाँ ई गोड़ जाता कुछुओ बुझात नइखे

पर पूरी पुस्तक में मनोज अपनी ग़ज़लों में सबसे ज्यादा हमारी ग्रामीण व कस्बाई जिंदगी की समस्याओं की बात करते हैं। भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक व आर्थिक विषमता इन सारी समस्याओं को उनकी लेखनी बार बार हमारा ध्यान आकृष्ट करती है। मिसाल के तौर पर इन अशआरों में उनकी लेखनी का कमाल देखिए

पानी के बाहर मौत बा, पानी के भीतर जाल बा
लाचार मछली का करो जब हर कदम पर काल बा

संवेदना के लाश प कुर्सी के गोड़ बा
मालूम ना, ई लोग का कइसे सहात बा

एह कदर आज बेरोजगारी भइल
आदमी आदमी के सवारी भइल

आम जनता बगइचा के चिरई नियन
जहँवाँ रखवार हीं बा शिकारी भइल

ना रहित झाँझर मड़इया फूस के
घर में आइत कैसे घाम पूस के

आज उ लँगड़ो दारोगा हो गईल
देख लीं सरकार जादू घूस के

रोशनी आज ले भी ना पहुँचल जहाँ
केहू उहँवो त दियरी जरावे कबो

सब बनलके के किस्मत बनावे इहाँ
केहू बिगरल के किस्मत बनावे कबो

यूँ तो इस पूरी किताब के ऐसे कई शेर मन में गहरी छाप छोड़ते हैं पर एक ग़ज़ल जो मुझे इस पूरी पुस्तक में सबसे ज्यादा रोमंचित कर गई, को आपको सुनाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ।


वैसे गर सुन ना भी पाएँ तो इन अशआरों पर जरूर गौर फरमाएँ

देह बा मकान में ,दृष्टि बा बागान में
होश में रहे कहाँ, मन तो इ नवाब हऽ

आदमी के स्वप्न के खेल कुछ अजीब बा
जी गइल त जिंदगी, मर गइल तो ख्वाब हऽ

हीन मत बनल करऽ दीन मत बनल करऽ
आदमी के जन्म तऽ खुद एगो खिताब हऽ

वाह वाह क्या बात कही है मनोज ने!

अगर आप एक ग़ज़ल प्रेमी हैं और भोजपुरी भाषा की जानकारी रखते है तो मात्र 75 रुपये की पुस्तक आपके लिए है। इसे हिंद युग्म ने उत्कृष्ट छपाई के साथ बाजार में उतारा है। इस पुस्तक को खरीदने के लिए आप sampadak@hindyugm.com पर ई मेल कर सकते हैं या मोबाइल पर +91 9873734046 और +91 9968755908 पर संपर्क कर सकते हैं।

और अगर आप अब भी आश्वस्त ना हो पाएँ हो इस किताब को खरीदने के बारे में तो इंतज़ार कीजिए इस पुस्तक यात्रा की दूसरी किश्त का जहाँ मनोज भावुक की शायरी के कुछ अन्य रंगों से रूबरू होने का आपको मौका मिलेगा..

शुक्रवार, मई 21, 2010

गोपालदास 'नीरज' का जीवन दर्शन : उनके चार विचारों के साथ !

जिंदगी को देखने और महसूस करने के हमारे मापदंड समय और हमारी सोच में हो रहे निरंतर विस्तार से बदलते रहते हैं। वक़्त से आगे देख पाने की सोच, एक आम मानव की प्रकृति में नहीं है। दरअसल हमारे अपने जीवन में जो घटित होता रहता है उसे ही जीवन का सच मानने के लिए हम तैयार बैठे रहते हैं।



पर जिस जीवन दर्शन को समझ पाने में शायद हम अपनी पूरी जिंदगी निकाल दें उसे गोपाल दास नीरज जैसा सक्षम कवि चंद पंक्तियों में कैसे व्यक्त कर देता है ये कविता इसका एक सुंदर उदाहरण है।

इस कविता के माध्यम से नीरज इस बात को सरल सहज शब्दों में पुरजोर तरीके से रखते हैं कि किसी मनुष्य के लिए जीवन की परिभाषा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने अब तक जिंदगी के किन रंगों का स्वाद चखा है?

तो आइए जीवन के प्रति नीरज के अनुभवो से रूबरू होते हैं उनकी इस कविता चार विचार में...

(1)
जो पुण्य करता है वह देवता बन जाता है,
जो पाप करता है वह पशु बन जाता है,

और जो प्रेम करता है वो आदमी बन जाता है


(2)
जब मैंने प्रेम किया तो मुझे लगा जीवन आकर्षण है,
जब मैंने भक्ति की तब मुझे लगा जीवन समर्पण है,

किंतु जब से मैंने सेवाव्रत लिया
तब
मुझे पता चला कि जीवन सबसे पहले सर्जन है

(3)
जब मैं बैठा था तो समझता था कि जीवन उपस्थिति है,
जब मैं खड़ा था तब समझता था कि जीवन स्थिति है,

किंतु जब मैं चलने लगा तब लगने लगा, "जीवन गति है"


(4)
जब तक मैं पुकारता रहा
तब तक समझता रहा कि जीवन तुम्हारी आवाज़ है

और जब मैं स्वयम् को पुकारने लगा

तो कहने लगा जीवन अपनी ही आवाज़ है

किंतु जिस दिन मैंने संसार को पुकारना शुरु किया है

उस दिन से मुझे लगने लगा है

कि जीवन मेरी और तुम्हारी नहीं

उन सबकी आवाज़ है
जिनकी कि कोई आवाज़ ही नहीं है.....

पता नहीं आपने जीवन के किन रूपों का अब तक अनुभव किया है । हो सकता है आपका नज़रिया भिन्न हो? पर सारे नज़रियों को मिला कर देखें तो शायद सबमें ही जीवन का कोई ना कोई सच छुपा बैठा मिले।

अब ऊपर के चित्र को ही लें। किसी को वो खरगोश नज़र आया होगा तो किसी को बत्तख! पर वास्तविकता तो ये है कि चित्र में ये दोनों ही रूप विद्यमान है। शायद जिंदगी भी ऐसा ही एक चित्र है जिसमें कई सारे चित्र समाए बैठे हैं...क्यूँ है ना?

शनिवार, मई 15, 2010

गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ और उनका लिखा ये प्यारा नग्मा ' इक हसीन शाम को..'

राजा मेंहदी अली खाँ, जब भी ये नाम सुना तो लगा भला इतने रईस खानदान के चराग़ को गीत लिखने का शौक कैसे हो गया? गोकि ऍसा भी नहीं कि हमारे राजे महाराजे इस हुनर से महरूम रहे हों। तुरंत ही जनाब वाज़िद अली शाह का ख्याल ज़ेहन में उभरता है। पर उनकी मिल्कियत दिल्ली और अवध तक फैली हुई थी पर राजा साहब को क्या सूझी कि वो अपने बाप दादाओं की जमीदारी छोड़कर मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बन बैठे?
राजा साहब के बारे में जानने की इच्छा बहुत दिनों तक बनी रही पर उनके अनमोल गीतों और संगीतकार मदनमोहन के साथ उनकी अनुपम जोड़ी के किस्सों के आलावा कुछ ज्यादा हाथ नहीं लगा।

कुछ दिनों पहले फिल्म 'दुल्हन एक रात की' का अपना एक पसंदीदा नग्मा गुनगुना रहा था कि याद आया कि अरे ये गीत भी तो राजा साहब का ही लिखा हुआ है। राजा साहब के बारे में मेरा पुराना कौतुहल, फिर जाग उठा। इस बार उन पर लिखे कुछ लेख हाथ लगे। पता चला कि राजा साहब, अविभाजित भारत के करमाबाद की पैदाइश हैं। पिता बचपन में ही गुजर गाए और माता हेबे जी के संरक्षण में मेंहदी अली खाँ पले बढ़े। माँ अपने ज़माने उर्दू की क़ाबिल शायरा के रूप में जानी गयीं। चालिस के दशक में जब वो आकाशवाणी दिल्ली में काम कर रहे थे तो मुंबई से उन्हें सदात हसन मंटो का बुलावा आ गया। मंटों ने तब हिंदी फिल्मों में काम करना शुरु किया था।

पर राजा साहब ने आते ही अपनी शायरी के जलवे दिखाने शुरु कर दिये ऐसा भी नहीं था। आपको जानकर हैरानी होगी कि राजा साहब की फिल्म उद्योग में शुरुआत बतौर पटकथा लेखक के हुई। और तो और उन्होंने एक फिल्म के लिए छोटा सा रोल भी किया। पर पटकथालेखन और अभिनय उन्हें ज्यादा रास नहीं आया। 1947 की फिल्म दो भाई में राजा साहब को पहली बार गीत लिखने का मौका मिला । इस फिल्म का गीत "मेरा सुंदर सपना टूट गया..." बेहद चर्चित रहा। विभाजन और दंगों की आग में जल रहे देश में डटे रहने का फ़ैसला भी राजा साहब के भारत के प्रति प्रेम को दर्शाता है। और फिर फिल्म शहीद (1950) में देशप्रेम से ओतप्रोत उनके लिखे उस गीत को भला कौन भूल सकता है 'वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो'.. '

पचास का दशक राजा मेंहदी अली खाँ के उत्कर्ष का दशक था। दशक की शुरुआत में संगीतकार मदनमोहन के साथ फिल्म 'मदहोश' में उनकी जो सफल जोड़ी बनी वो 'अनपढ़', 'मेरा साया', 'वो कौन थी', 'नीला आकाश', 'दुल्हन एक रात की' आदि फिल्मों में और पोषित पल्लवित होती गई।

राजा मेंहदी अली खाँ के लिखे गीतों पर नज़र रखने वाले फिल्म समीक्षकों का मानना है कि राजा ने ही फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। मसलन उनके लिखे इन गीतों को याद करें... 'आप की नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे...' या 'जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई आप क्यूँ रोए ' , 'आपने अपना बनाया मेहरबानी आपकी...'। मदन मोहन के आलावा राजा साहब ने ओ पी नैयर व सी रामचंद्र के संगीत निर्देशन में भी बेहतरीन नग्मे दिये। वैसे क्या आपको पता है कि 'मेरे पिया गए रंगून वहाँ से किया है टेलीफून.. ' भी राजा साहब का ही लिखा हुआ गीत है।

साठ के दशक के मध्य में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ 'अनीता' और 'जाल' जैसी फिल्में उनके फिल्मी सफ़र की आखिरी फिल्में थी। जुलाई 1996 में राजा साहब इस दुनिया से कूच कर गए। पर उनके रचे गीतों से आज भी वे हमारे मन में समाए हैं। आज की ये पोस्ट उस गीत के जिक्र बिना अधूरी रह जाएगी जिसकी वज़ह से राजा साहब की याद पुनः मन में आ गई।

फिल्म 'दुल्हन एक रात की' फिल्म का ये गीत मुझे बेहद पसंद है और क्यूँ ना हो 'शामों' से मेरे लगाव की बात क्या आप सब से छिपी हे। और फिर जहाँ गीत में ऐसी ही किसी शाम को अपने हमसफ़र की यादों में गोता लगाने का जिक्र हो तो वो गीत क्या दिलअज़ीज नहीं बन जाएगा ?

मदनमोहन द्वारा मुखड़े की आरंभिक धुन कमाल की है। यही कारण हे कि इस गीत के मुखड़े को गुनगुनाना मेरा प्रिय शगल रहा है। आज सोचा मोहम्मद रफ़ी साहब की मखमली आवाज़ में गाए पूरे गीत को गुनगुनाने की कोशिश करूँ। रफ़ी साहब ने जिस मस्ती से इस गीत को गाया है कि सुन कर ही मन झूम उठता है और होठ थिरकने लगते हैं।


इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया
पहले अपना, हुआ करता था, अब किसी का... हो गया

मुद्दतों से.., आ..रजू थी, जिंदगी में.. कोई आए
सूनी सूनी, जिंदगी में. कोई शमा.. झिलमिलाए
वो जो आए तो रौशन ज़माना हो गया
इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया

मेरे दिल के, कारवाँ को ले चला है.. आज कोई
शबनमी सी. जिसकी आँखें, थोड़ी जागी.. थोड़ी सोई
उनको देखा तो मौसम सुहाना हो गया
इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया
पहले अपना, हुआ करता था, अब किसी का... हो गया

मुझे झेल लिया है ! ठीक है जनाब अब रफ़ी की आवाज़ में भी इस गीत को सुनवाए देते हैं। वैसे फिल्म में इस गीत को फिल्माया गया था धर्मेंद्र व नूतन पर..


मंगलवार, मई 11, 2010

तुम ना मानो मगर हक़ीकत है, इश्क़ इंसान की जरूरत है...

अस्सी का दशक मेरे लिए हमेशा नोस्टालजिया जगाता रहा है। फिल्म संगीत के उस पराभव काल ने ग़ज़लों को जिस तरह लोकप्रिय संगीत का हिस्सा बना दिया वो अपने आप में एक अनूठी बात थी। उस दौर की सुनी ग़ज़लें जब अचानक ही ज़ेहन में उभरती हैं तो मन आज भी एकदम से पच्चीस साल पीछे चला जाता है। बहुत कुछ था उस समय दिल में महसूस करने के लिए, पर साथ ही बड़े कम विकल्प थे मन की भावनाओं को शब्द देने के लिए।

पहले भी आपको मैं अपनी इन्हीं पुरानी यादों के सहारे राजकुमार रिज़वी, राजेंद्र मेहता, अनूप जलोटा व पीनाज़ मसानी की गाई अपनी पसंदीदा ग़ज़लों से मिलवाता रहा हूँ। इसी क्रम में आज बारी है उस दशक के लोकप्रिय ग़ज़ल गायक पंकज उधास की। उस दशक में पंकज जी की लोकप्रियता का आलम ये था कि उनके गाए गीत व ग़ज़लें मिसाल के तौर पर 'चाँदी जैसा रंग है तेरा', 'इक तरफ तेरा घर इक तरफ मैकदा..', 'घुँघरू टूट गए..' गली नुक्कड़ों पर ऐसे बजा करते थे जैसे आज के हिट फिल्मी गीत।


इतना होते हुए भी पंकज उधास मेरे पसंदीदा ग़ज़ल गायक कभी नहीं रहे। पर इस नापसंदगी का वास्ता मुझे उनकी आवाज़ से कम पर उनके द्वारा चुनी हुई ग़ज़लों से ज्यादा रहा है। पंकज उधास ने ग़ज़लों के चुनाव से अपनी एक ऐसी छवि बना ली जिससे उनकी गाई हर ग़ज़ल में 'शराब' का जिक्र होना लाज़िमी हो गया। ग़ज़लों का दौर मंदा होने पर पंकज ने कुछेक फिल्मी गीतों में भी अपनी आवाज़ दी और बीच बीच में ग़ज़ल के इक्का दुक्का एलबम निकालते रहे।

वर्ष 2006 में ग़ज़ल गायिकी के 25 साल पूरे होने पर उन्हें पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया। हाल फिलहाल में पंकज उधास अपनी उस पुरानी छवि को धोने का प्रयास कर रहे हैं। 2004 में उन्होंने मीर तकी 'मीर' की ग़ज़लों से जुड़ा एलबम निकाला और आजकल वो दाग 'देहलवी' की ग़ज़लों से जुड़े एलबम को निकालने की तैयारी में हैं।

ख़ैर लौटते हैं आज की ग़ज़ल पर जिसका मुखड़ा अनायास ही पिछले हफ्ते मेरे होठों पर आ गया.. क़ाबिल अजमेरी की लिखी इस ग़ज़ल को यूँ तो इकबाल बानो ने भी गाया है पर पंकज उधास का अंदाज़ कहीं ज्यादा दिलकश है। तो आइए गुनगुनाते ते हैं पंकज उधास के साथ इस ग़ज़ल को



तुम ना मानो मगर हक़ीकत है
इश्क़ इंसान की जरूरत है

हुस्न ही हुस्न जलवे ही जलवे
सिर्फ एहसास की जरूरत है


उस की महफिल में बैठ के देखो
ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है

जी रहा हूँ इस ऍतमाद* के साथ
ज़िंदगी को मेरी जरूरत है

*विश्वास

पर पंकज जी ने क़ाबिल अजमेरी साहब की पूरी ग़ज़ल नहीं गाई है। इसके बाकी अशआरों से रूबरू होने से पहले इस अनजान से शायर के बारे में कुछ बातें। क़ाबिल अज़मेरी, मोहसीन भोपाली, अख़्तर अंसारी अकबराबादी व हिमायत अली शायर के समकालीन थे। साठ के दशक में क़ाबिल का नाम पाकिस्तान के साहित्यिक परिदृश्य में उभरा। पर फलक़ पर ये तारा ज्यादा दिनों तक चमक ना सका और इकतिस साल की कम उम्र में ही टीबी की बीमारी से पीड़ित होने की वज़ह से वो चल बसे। अपने समय के शायरों की आपसी प्रतिद्वंदिता और उनकी बीमारी ने उन्हें जीवन भर परेशान रखा। फिर भी जिंदगी के प्रति उनकी आस्था खत्म नहीं हुई और शायद इसीलिए उन्होंने लिखा।

जी रहा हूँ इस ऍतमाद के साथ
ज़िंदगी को मेरी जरूरत है


कुछ साल पहले पाकिस्तान में उनका एक काव्य संकलन छपा था जिसका नाम उनकी इसी मशहूर ग़ज़ल के नाम पर 'इश्क़ इंसान की जरूरत है' रखा गया है। तो आइए पढ़ें इस ग़ज़ल के बाकी अशआर

कुछ तो दिल मुब्तला ए वहशत* है
कुछ तेरी याद भी क़यामत है
* डरा सहमा सा

मेरे महबूब मुझसे झूठ ना बोल
झूठ सूरत ए गर सदाक़त* है
* गवाही

उस के वादे पे नाज़ थे क्या क्या
अब दरो ओ बाम से नदामत* है
* शर्मिन्दगी

रास्ता कट ही जाएगा क़ाबिल
शौक़ ए मंजिल अगर सलामत है

गुरुवार, मई 06, 2010

पटना, मौर्य लोक और मिलना गौतम राजरिशी से : भाग 2

पिछली दफ़ा आपने पढ़ा गौतम से पटना में हुई मुलाकात का पहला भाग। आज बात को वहीं से आगे बढ़ाते हैं जहाँ से वो पिछली बार खत्म हुई थी...


वो पुणे चले गए पर प्रेम का जज़्बा भी बना रहा। बस मुलाकात की जगह बदल गई.. शहर बदल गया...पर एक कठिन पर रोमांचकारी जीने की ख्वाहिश रखने वाले गौतम को अपनी निजी जिंदगी की प्रेरणा को हक़ीकत में तब्दील करने में भी उतने ही कठिन मानसिक संघर्ष से होकर गुजरना पड़ा। घर वाले उनके प्रेम पर विवाह की मुहर लगाने के लिए तैयार नहीं थे वही गौतम भी ठान चुके थे कि दिल एक बार दिया तो वो उसी का हो गया। इसीलिए मोहब्बत के हसीन पलों की याद दिलाने के साथ जब गौतम विरह की वेला का खाका खींचते हैं तो उनकी कलम ग़ज़ब का प्रभाव छोड़ती है..

एक सवेरा इक तन्हा तकिये पर आँखें मलता है
मीलों दूर कहीं इक छत पर सूनी शाम टहलती है

यादें तेरी, तेरी बातें साथ हैं मेरे हर पल यूँ
इस दूरी से लेकिन अब तो इक-इक साँस बिखरती है

चांद को मुंडेर से "राधा" लगाये टकटकी
इश्क के बीमार को दिखता है कोई दाग क्या


एक तो काम की कठिन परिस्थितियाँ और दूसरी ओर मन का तनाव, गौतम के स्वास्थ पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा। इन पंक्तियों पर गौर करें क्या ये उन दिनों के गौतम का मन नहीं टटोलतीं

कटी रात सारी तेरी करवटों में
कि ये सिलवटों की निशानी कहे है


"रिवाजों से हट कर नहीं चल सकोगे"
कि जड़ ये मेरी ख़ानदानी कहे है


आखिर बेटे की हालत और हठ को देखकर उनके परिवारवालों को उनकी इच्छा के आगे झुकना पड़ा। इस रज़ामंदी में गौतम के कुछ मित्रों ने भी महत्त्वपूर्ण किरदार निभाया। गौतम कहते हैं को वो दौर उनके लिए बेहद कठिन था और खुशी की बात ये है कि इतना सब होने के बाद आज के दिन 'घर की ये बहू' सबकी चहेती बन गई है।


(चित्र साभार)


मेरा मानना है कि ज़िदगी के इस कठिन अनुभव ने गौतम की शायरी पर महत्त्वपूर्ण असर डाला है। पर गौतम की शायरी में इश्क़, विरह के आलावा भी कुछ और रंग बराबर उभरे हैं और इनमें से एक अहम हिस्सा है, सिपाही के रूप में जिंदगी से बटोरा उनका अनुभव। उनके लिखे इन अशआरों पर गौर कीजिए आप मेरी बात खुद ब खुद समझ जाएँगे

लिखती हैं क्या किस्से कलाई की खनकती चूडि़याँ
सीमाओं पे जाती हैं जो उन चिट्ठियों से पूछ लो

होती है गहरी नींद क्या, क्या रस है अब के आम में
छुट्टी में घर आई हरी इन वर्दियों से पूछ लो

जब से सीमा पर हरी वर्दी पहन कर वो गये
घर में "सूबेदारनी" के क्या दिवाली फाग क्या


कहाँ वो लुत्फ़ शहरों में भला डामर की सड़कों पर
मज़ा देती है जो घाटी कोई पगडंडियों वाली

बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शह्‍र की ‘गौतम’
चलो चल कर चखें फिर धूल वो रणभूमियों वाली


चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से
गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से


मुट्ठियाँ भीचे हुये कितने दशक बीतेंगे और
क्या सुलझता है कोई मुद्दा कभी हथियार से

गौतम को ब्लागिंग शुरु किए हुए डेढ़ साल से ऊपर हो गया है। सच बताऊँ तो जब पिछले साल के शुरु में पहली बार जब उनके चिट्ठे पर पहुँचा था तो उनका लिखा मुझे खास प्रभावित नहीं कर पाया था। पर पिछले एक साल में उनकी ग़ज़लों में और निखार आया है। गौतम का कहना है कि इसमें गुरु सुबीर जी का महती योगदान है।

मुझे लगता है कि छोटी बहरों की ग़ज़लों में गौतम और पैनापन ला सकते हैं। गौतम ने हाल ही में उपन्यास के किरदारों को अपनी ग़ज़ल के अशआरों में बड़ी खूबसूरती से पिरोया था। मुझे उनकी ये पेशकश बेहद नायाब लगी थी। उनकी इस ग़ज़ल के इन अशआरों पर गौर कीजिए कमाल का असर डालते हैं


जल चुकी है फ़स्‍ल सारी पूछती अब आग क्या
राख पर पसरा है "होरी", सोचता निज भाग क्या

ड्योढ़ी पर बैठी निहारे शह्‍र से आती सड़क
"बन्तो" की आँखों में सब है, जोग क्या बैराग क्या


क्लास में हर साल जो आता था अव्वल "मोहना"
पूछता रिक्शा लिये, ‘चलना है मोतीबाग क्या’


गौतम से बातों का ये क्रम इतनी तन्मयता से चल रहा था कि कब दिन के बारह बज गए हमें पता ही नहीं चला। हमें लगा कि अब कहीं चल कर कम से कम चाय कॉफी पीनी चाहिए।

थोड़ी दूर पर एक दुकान मिली। हमे अपने लिए जगह बनाई और बातों का क्रम फिर चल पड़ा। गौतम से मैंने कश्मीर के ज़मीनी हालातों के बारे में पूछा। गौतम विस्तार से वहाँ के हालातों और सेना के किरदार के बारे में बताने लगे। बातों ही बातों में ये भी पता चला कि गौतम एक्शन पैक्ड कंप्यूटर गेम्स खेलने में उतनी ही दिलचस्पी रकते हैं जितनी हथियार चलाने में। उनके चिट्ठे को पढ़ने वालों को ये तो पता है ही कि वे कॉमिक्स पढ़ने के कितने शौकीन रहे हैं। फिर ब्लॉग जगत के कुछ किरदारों, दिल्ली में हिंद युग्म के समारोह में शिरकत, अनुराग से श्रीनगर में मुलाकात, आदि प्रसंगों से जुड़ी बातचीत ज़ारी रही।


इतनी देर में हम तीन बार कॉफी पी चुके थे और दुकान वाला हमारी बतकूचन से परेशान हो गया था। उसकी चेहरे की झल्लाहट को पढ़ते हुए हम वहाँ से भी निकल गए।

वैसे भी हमने बातें करते करते आराम से चार घंटे का समय बिता लिया था। दिन के दो बज रहे थे। गौतम को भी अपनी 'प्रेरणा' जो अब 'हक़ीकत' बन गई हैं, को 'मोना' में सिनेमा दिखाना था । वैलेंटाइन डे के दिन किए गए उनके इस वादे में बिना कोई और बाधा उत्पन्न किए हम दोनों ने एक दूसरे से विदा ली।

तो चलते-चलते उनके लिखे कुछ और अशआरों से रूबरू कराना चाहूँगा जो मुझे बेहद पसंद हैं..

खिली-सी धूप में भी बज उठी बरसात की रुन-झुन
उड़ी जब ओढ़नी वो छोटी-छोटी घंटियों वाली

दुआओं का हमारे हाल होता है सदा ऐसा
कि जैसे लापता फाइल हो कोई अर्जियों वाली


बहुत है नाज़ रुतबे पर उन्हें अपने, चलो माना
कहाँ हम भी किसी मगरूर का अहसान लेते हैं

तपिश में धूप की बरसों पिघलते हैं ये पर्वत जब
जरा फिर लुत्फ़ नदियों का ये तब मैदान लेते हैं


कुछ नए चेहरों से मुलाकात दिल्ली में भी हुई पर उसका ब्योरा फिर कभी।

सोमवार, मई 03, 2010

पटना, मौर्य लोक और मिलना गौतम राजरिशी से : भाग 1

वक्त आ गया है अपनी पिछली से पिछली पोस्ट में किए अपने वायदे को पूरा करने का यानि गौतम राजरिशी से पटना में हुई मुलाकात का लेखा जोखा प्रस्तुत करने का। लखनऊ से पटना तो दस फरवरी की शाम को मैं आ गया। गौतम भी वहाँ चौदह को ट्रेन से पहुँचने वाले थे। चौदह की रात को मुझे वापस राँची आना था। पर गौतम चौदह की बजाए तेरह को ही राँची आ गए और शाम को फोन पर बातचीत के बाद तय हुआ कि अगली सुबह पटना के मौर्य लोक में मुलाकात की जाए। डाक बँगला रोड के पास बना मौर्य लोक किसी अन्य राजधानी के शॉपिंग मॉल की तरह भव्य तो नहीं पर शहर की चहल पहल का मुख्य केंद्र जरूर है।


दस बजे मिलने का वक़्त तय था पर मैं घर से इसके बीस मिनट पहले ही निकल सका। निकलने के बाद ख्याल आया ये कोई सिविलियन मीट तो है नहीं, एक फौजी से मिलने जा रहा हूँ वक़्त का ध्यान रखना चाहिए था। गौतम जरूर वक़्त के मुताबिक दस बजे पहुँच चुके होंगे। करीब पंद्रह बीस मिनट बाद मौर्य लोक के परिसर में कदम रखे तो दूर से ही गौतम मोबाइल पर बात करते दिखे। जैसी की आशा थी वो दस बजे से पहले ही वहाँ पहुँच चुके थे। पता चला की वो दिल की बात वाले अनुराग को शादी की सालगिरह की शुभकामनाएँ दे रहे थे। शादी की सालगिरह और वो भी वैलेंटाइन डे के दिन..मन ही मन सोचा खूब दिन ढूँढ कर ब्याह रचाया अनुराग ने।

कहने को वो वैलेंटाइन डे था पर मौर्य लोक में कोई रौनक दिख नहीं रही थी। दिखती भी कैसे? रविवार होने की वज़ह से सारी दुकानें बंद थीं। हम घूमते टहलते बैठ कर बातें करने की जगह तलाशने लगे। परिसर के अंदर ही चाउमिन की दुकान के सामने कुछ खाली कुर्सियाँ दिखाई दीं। सोचा चाय का आर्डर देकर गप्पे हाँकने का काम शुरु किया जाए। पता चला वहाँ चाय कॉफी का कोई इंतज़ाम नहीं है। अब बैठ गए थे तो सोचा बैठे ही रहा जाए। वहीं से बातों का सिलसिला शुरु हुआ। मैंने गौतम को अपनी कॉलेज की जिंदगी व फरीदाबाद में अपनी नौकरी के संस्मरणों और किस्सों के बारे में बताया।

फिर जो बात मेरे मन में घूम रही थी उसी को प्रश्न बना कर मैंने दाग दिया। कविताएँ /ग़जलें उनकी जिंदगी में पहले आईं या फिर सेना में काम करने का जज़्बा? (वैसे मुझे बाद में पता चला कि मेरा मूल प्रश्न ही गलत था :)। इन दो बातों के बीच में गौतम की जिंदगी में और भी बहुत कुछ आया जिसने उनके इन दोनों पहलुओं को निखारने में मदद की।)


जिस तरह मुझमें गीत संगीत व साहित्य में रुचि अंकुरित करने का श्रेय मैं अपनी बड़ी बहन और माँ को देता हूँ वैसे ही गौतम को ग़ज़लों और कविताओं में रुचि जाग्रत करने में उनके पिता का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। गौतम ने बताया कि किस तरह उनके पिता मँहदी हसन और गुलाम अली की ग़ज़लों को सुनवाकर उनका भावार्थ बताते थे। संयुक्त परिवार में पले बढ़े गौतम को किताबें पढ़ने का शौक भी लड़कपन से हो गया और शायद हाईस्कूल के आस पास ही उन्होंने अपनी पहली कविता भी लिखी।

जैसा कि एक आम उत्तर भारतीय और खासकर बिहार जैसे राज्य में होता रहा है मैट्रिक के बाद इंजीनियर डॉक्टर बनाने वाले के लिए माता पिता बच्चों को कोचिंग के लिए राज्य की राजधानी भेज देते हैं। गौतम को भी इसी वज़ह से पटना भेज दिया गया। अब डाक्टर पिता को अपने होनहार पुत्र को पटना भेजते समय उसकी काव्यात्मकता के बारे में जानकारी थी या नही ये तो पता नहीं, पर पुत्र ने पटना की धरती पर उतरते और कोचिंग का माहौल देखने समझने के बाद शीघ्र ही ये निर्णय ले लिया यह भूमि ही उसके काव्य की कर्म भूमि होगी..

आप समझ ही गए होंगे कि हमारे 'कवि' को उसकी 'प्रेरणा' मिल गई थी। पर उस प्रेरणा को अभी भी इस बात पर पर्याप्त संदेह था कि उसे सच्चा कवि मिला है या रोड साइड रोमियो :)। पर कवि अपने कावित्य कौशल से प्रेरणा को समझाने बुझाने में लगा रहा। शायद वो पंक्तियाँ कुछ इस तरह की रही हों जिसे आप व मैं पहले भी पढ़ चुके हैं

तुम हमें चाहो न चाहो, ये तुम्हारी मर्ज़ी
हमने साँसों को किया नाम तुम्हारे यूँ तो

ये अलग बात है तू हो नहीं पाया मेरा
हूँ युगों से तुझे आँखों में उतारे यूँ तो

'प्रेरणा' ने गौतम को पूरी तरह अनुमोदित तो नहीं किया पर उनकी लेखनी को एक संवेदनशील पाठक जरूर मिल गया। गौतम इतने से ही खुश थे। अपनी पाठिका को प्रेमिका की मंजिल तक पहुँचाने में उनकी लेखनी उनका अवश्य साथ देगी, ऐसा उनका भरोसा था। लिहाज़ा गौतम की शायरी में इश्क़ का ख़ुमार चढ़ता रहा। बहुत कुछ उनके इन खूबसूरत अशआरों की तरह

हर लम्हा इस मन में इक तस्वीर यही तो सजती है
तू बैठी है सीढ़ी पर, छज्जे से धूप उतरती है

एक हवा अक्सर कंधे को छूती रहती "तू" बनकर
तेरी गंध लिये बारिश भी जब-तब आन बरसती है

हमने देखा है अक्सर हर पेड़ की ऊँची फुनगी पर
हिलती शाख तेरी नजरों से हमको देखा करती है

अब बताइए भला ऐसे अशआरों को पढ़ और महसूस कर किसका हृदय नहीं पिघलेगा सो 'प्रेरणा' का भी पिघला। पर इधर गौतम ने एक और गुल खिलाया। इंजीनियरिंग से ज्यादा दिलचस्पी उन्हें एक रोमंचकारी ज़िंदगी जीने में थी। माता पिता को खुश रखने के लिए इंजीनियरिंग का पर्चा भरा पर साथ ही NDA में दाखिला के लिए भी परीक्षा दी। IIT की परीक्षा में रैंक नीचे आई,पर उसके बारे में घर पर बिना बताए NDA में दाखिला ले लिया। वो पुणे चले गए पर प्रेम का जज़्बा भी बना रहा। बस मुलाकात की जगह बदल गई.. शहर बदल गया...

और क्या बदला गौतम की जिंदगी में ये जानते हैं इस मुलाकात की अगली किश्त में...



इस चिट्ठे पर इनसे भी मिलिए


बुधवार, अप्रैल 28, 2010

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं,चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं...

याद है ना गर्मी के दिनों की वो रातें जो आपने छत पर अकेले किसी का इंतज़ार करते हुई बिताई थीं। पर ये इंतज़ार किसका ? सबसे अज़ीब बात तो यही होती थी कि हमें ख़ुद पता नहीं होता था कि हम आख़िर हैं किसकी प्रतीक्षा में ? पर उस इंतज़ार की कैफ़ियत दिल में तारी रहती थी। बस बुनते रहते थे मन में हम उस अनजाने अज़नबी की शख्सियत। चाँद तारों में खोजा करते थे उस चेहरे का अक्स। चारों ओर फैली शून्यता में भी सुनाई देती थीं उनकी सदाएँ।

पर ये तो उन बीते लमहों की बाते हैं। ये सब मैं आज आपसे क्यूँ कह रहा हूँ? क्या करूँ कैफ़ भोपाली का लिखा ये नग्मा उन अहसासों की याद ताजा़ जो कर रहा है। भोपाल के अज़ीम शायर कैफ़ भोपाली का ये गीत फिल्म शंकर हुसैन का है जो 1977 में आई थी। संगीत रचना थी ख़य्याम की।


कैफ़ साहब ने इस गीत के लिए जो बोल लिखे वो अपने आप में कमाल थे। अब इन पंक्तियों को देखिए कितना मखमली अहसास जगाती हैं दिल में

एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी


या फिर इसे सुन कर कौन संवेदनशील हृदय रससिक्त ना हो उठेगा

जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है


संगीतकार ख़य्याम ने गीतकार के लफ्ज़ों की इसी गहराई को ध्यान में रखकर नाममात्र का संगीत दिया। नतीजा ये कि गीत सुनते वक़्त आपका ध्यान बोलों से हट ही नहीं सकता। और अगर आपको भटकने की बीमारी भी हो तो कोकिलकंठी लता की भावपूर्ण स्वरलहरी आपको भटकने नहीं देगी। दरअसल सितार की आरंभिक धुन के बाद लता जी की आवाज़ कानों तक छन छन कर कैफ़ भोपाली के शब्दों को इस तरह पहुँचाती है कि मन गीत की भावनाओं के साथ हिचकोले लेने लगता है। ये गीत इस बात का सबूत है कि अगर गीत के बोलों और गायिकी में दम हों तो संगीत का किरदार गौण हो जाता है।

तो आइए सुनते हैं लता जी के गाए इस गीत को

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..

एक अजनबी आहट आ रही है कम-कम-सी
जैसे दिल के परदों पर गिर रही हो शबनम-सी
बिन किसी की याद आए, दिल के तार हिलते हैं
बिन किसी के खनकाए चूडियाँ खनकती हैं
अपने आप.. अपने आप..

कोई पहले दिन जैसे घर किसी-के जाता हो
जैसे खुद मुसाफ़िर को रास्‍ता बुलाता हो
पाँव जाने किस जानिब, बे-उठाए उठते हैं
और छम-छमा-छम‍छम पायलें झनकती हैं
अपने आप.. अपने आप रातों में

जाने कौन बालों में उँगलियाँ पिरोता है
खेलता है पानी से, तन बदन भिगोता है
जाने किसके हाथों से गागरें छलकती हैं
जाने किसकी बाहों से बिजलियाँ लपकती हैं
अपने आप . ..

अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं
चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं
अपने आप.. अपने आप..


वैसे तो पाकीज़ा और रजिया सुल्तान के अपने लोकप्रिय गीतों के आलावा कैफ़ भोपाली साहब ने कई ग़ज़लें भी कहीं। उनमें से कुछ को जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ में गाकर आम जन तक पहुँचाया । पर उन ग़ज़लों की बात कभी और कर लेंगे। अभी तो इस गीत को सुनने से बने मूड में कुछ और सुनवाकर आपका मज़ा किरकिरा नहीं करना चाहता।

शनिवार, अप्रैल 24, 2010

लखनऊ डॉयरी : रेल का उलटफेर, ब्लॉगरों की साजिश और एक छोटी सी मुलाकात...

बात फरवरी की है। लखनऊ में एक रिश्तेदार की शादी में जाना था। शादी का दिन चूंकि बहुत पहले से तय था लिहाज़ा मैंने दो महिने पूर्व ही रिजर्वेशन करवा रखा था। पर चाहे कितनी भी तैयारी आप क्यूँ ना कर लें जब तक ऊपरवाले के यहाँ से अर्जी पास ना हो, हम जैसे तुच्छ मानवों द्वारा बनाई गई योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं। ज्योंही फरवरी का दूसरा हफ्ता शुरु हुआ झारखंड में नक्सलियों ने बहत्तर घंटे के बंद का ऐलान कर दिया। अक्सर ऐसे अवसरों पर सबसे पहले रद्द होने वाली ट्रेन वही होती है जिसमें मैंने आरक्षण करवाया था। तीन दिन पहले से ही राम का सुमिरन करते रहे कि भगवन इतने पहले से बनाए कार्यक्रम का यूँ ना बंटाढ़ार करो। पर भगवन का दिल ना पसीजना था, ना पसीजा।

यात्रा के एक दिन पहले तक बंद के बावज़ूद बाकी की ट्रेने दूसरे मार्ग से चलती रहीं। 8 फरवरी की शाम को मुझे प्रस्थान करना था। आठ की सुबह बिस्तर से चिपके पड़े ही थे कि एक सहकर्मी का फोन आ गया। उधर से सूचना दी गई कि भई सुबह के अखबार में मेरी ट्रेन के रद्द होने की खबर है। नींद तो ये सुनते ही काफ़ूर हो गई। भागते दौड़ते स्टेशन पहुँचे। शीघ्रता से टिकट रद्द कराया। संयोग से नक्सलियों के बंद की वज़ह से दूसरी ट्रेन में जगह मिल गई और मेरा लखनऊ जाने का कार्यक्रम बर्बाद होते होते बच गया।

राँची में हल्की-हल्की ठंड ज़ारी थी। गर्म कपड़े किस अनुपात में रखे जाएँ इसके लिए लखनऊ में कंचन से फोन पर मौसम का हाल पूछा गया। रिपोर्ट दी गई कि आसमान साफ है। दिन में अपने आप को जवान समझने वाले लोग हॉफ स्वेटर भी नहीं पहन रहे हैं। मैंने मन ही मन विचार किया शादी का मामला है स्वेटर ना भी ले जाएँ पर कोट ले चलना ठीक रहेगा। वैसे भी ब्लॉगरों का क्या भरोसा एक दूसरे को परेशान करने के लिए आए दिन नए नए जुगाड़ सोचते हैं।:) और देखिए मेरी शंका निर्मूल साबित नहीं हुई। सुबह गाड़ी से जैसे ही कानपुर स्टेशन पहुँचा साफ आसमान और सुनहरी धूप के बजाए बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। बारिश से बचते बचाते स्टेशन के शेड में पहुँच कर फोन घुमाया तो उधर से स्पष्टीकरण आया कि आपसे फोन पर बात होने के बाद ही बादलों ने अपना रंग बदल लिया !

खैर मैं एक के घंटे के अंदर लखनऊ की ओर निकल लिया। गंगा पुल पर गाड़ियों का जाम लगा था। लिहाज़ा डाइवर ने गाड़ी रोक दी। पर रुकी कार के अंदर भी हिलने डुलने का अहसास हुआ। घर पर रहते हुए तो भूकंप के झटके तो पहले भी महसूस कर चुका हूँ पर यूँ सफ़र में और वो भी पुल पर... ड्राइवर से पूछा कि भई माज़रा क्या है? बताया गया कि ये पुल तो गाड़ियों के वज़न से यूँ ही हिलता डुलता है। खैर ज्यादा देर तक हिलना डुलना नहीं पड़ा और करीब बारह बजे तक मैं लखनऊ पहुँच गया।

कंचन ने बताया था कि अगले दिन यानि दस फरवरी को गौतम राजरिशी साहब भी लखनऊ तशरीफ़ ला रहे हैं। पर उनके साथ मिलने का कार्यक्रम वहाँ पहुँच कर बातचीत के बाद तय होना था। पर लखनऊ की धरती पर पहुँचते ही मेरे मोबाइल की हृदय गति मंद पड़ गई। सिगनल कुछ सेकेंड के लिए आकर घंटों गायब हो जाता। चार बजे दूसरे मोबाइल से कंचन से संपर्क हो पाया। पता चला कि गौतम अगले दिन ग्यारह बजे स्टेशन पर पधार रहे हैं। मेरे पास उनसे मिलने के लिए तीन घंटे का ही समय पास था क्यूँकि अगले दिन तीन बजे लखनऊ से पटना निकलना था।

रात को शादी और अगली सुबह विदाई निपटाकर कर अगली सुबह मैं स्टेशन जाने को तैयार हो गया। कंचन ने कहा कि वो स्टेशन साढ़े दस तक पहुँच जाएँगी। मुझे भी वहाँ ग्यारह बजे तक आने का आदेश मिला। दस पचास पर मैं जब स्टेशन पहुँचा तो देखा ना हमारी 'होस्ट' का पता है और ना ही उस गाड़ी का जो तथाकथित रूप से मात्र दस मिनट में आने वाली थी। पता चला कंचन जी अपने कुनबे के साथ स्टेशन से अभी भी तीन चार किमी की दूरी पर हैं। पूछताछ के कांउटर पर जैसे ही मैंने पूछा कि दिल्ली से आने वाली शताब्दी की प्लेटफार्म एनाउंसमेंट क्यूँ नहीं हो रही, काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने आँखें तरेरते हुए कहा कि भई आप भी अज़ीब बात करते हैं। गाड़ी के आने का समय बारह के बाद है तो अभी से क्या उद्घोषणा करें। करीब पन्द्रह बीस मिनट बाद कंचन जी के दर्शन हुए तो हमने सवाल दागा कि भई ये किस साजिश के तहत मुझे गुमराह किया गया? जवाब मिला कि ये टाइमिंग तो वीर जी ने ही बताई थी। मैंने मन ही मन सोचा ओह तो इस साजिश में 'वीर जी' भी शामिल हैं :)।


अगले डेढ़ घंटे का समय कंचन, अवधेश व विज़ू से बात चीत करते बीता। इन लोगों से मेरी ये दूसरी मुलाकात थी। बीच बीच में गौतम को फोन कर उनकी गाड़ी की स्थिति की जानकारी भी ली जा रही थी। गौतम के बारे में ब्लॉग के आलावा कंचन से ही सुना था। जानने की उत्सुकता थी कि सेना में काम करने का जज़्बा और साथ ही ग़ज़ल कहने का शौक उन्हें एक साथ कैसे हो गया? यह रहस्य उस दिन तो नहीं पर एक हफ्ते बाद खुला। फोन पर पहली बातचीत में यही कहा कि दर्शनार्थियों की भीड़ स्टेशन पर आपका बेसब्री से इंतज़ार कर रही है जल्द ही ट्रेन को अपने कमांड में लेकर लखनऊ पहुँचे। पर भारतीय रेल पर किसका बस चला है? स्टेशन पर रेल के लगते लगते बारह चालीस हो गए। गौतम को वहाँ से लखनऊ कैंट में अपने मित्र के यहाँ जाना था। अब बस हमारे पास इतना ही समय था कि गाड़ी में साथ साथ कैंट तक जाएँ और फिर वहाँ से विदा ले लें।

किया भी यही। थोड़ी बहुत बातें हुईं। घर जाकर जल्दी जल्दी चाय पी गई, आनन-फानन में फोटो खींचे गए और मैंने कंचन और गौतम से विदा ली। इसी दौरान ये पता चला कि तीन चार दिन बाद गौतम भी पटना आ रहे हैं और वहाँ मुलाकात का फिर से कार्यक्रम बनाया जा सकता है। संयोग से वो कार्यक्रम बना भी और हमने करीब तीन चार घंटे साथ बिताए। क्या किया हमने उन तीन चार घंटों में ये जानिएगा अगली पोस्ट में...




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बुधवार, अप्रैल 21, 2010

मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी? - प्रकृति से हमारे रिश्तों की पड़ताल करते गुलज़ार

अप्रैल का मौसम कभी इतनी कड़ी धूप का तलबदार ना था। खासकर उस प्रदेश में जिसका नामाकरण ही जंगल और झाड़ियों के नाम पर किया गया हो। पहले देश का सर्वाधिक तापमान देखने के लिए राजस्थान के शहरों के तापमान पर नज़र दौड़ानी होती थी पर अब तो इतनी मशक्क़त करने की ज़रा सी भी जरूरत नहीं। बोकारो धनबाद से लेकर देवघर और जमशेदपुर तक पूरा झारखंड अप्रैल के महिने में ही 45 से 47 डिग्री की चिलचिलाती धूप में झुलस रहा है।

वैसे तो कमोबेश पूरे भारत की यही स्थिति होगी पर प्राकृतिक संपदा से परिपूरित इस प्रदेश का ये हाल चौंकाने वाला जरूर है। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही है कि कहीं ना कहीं हम सभी अपने आस पास की प्रकृति को नष्ट होते देख के भी संवेदनहीन हुए जा रहे हैं।

आर्थिक विकास की इस दौड़ में कंक्रीट के जंगलों के बीच वो पुरानी आबो हवा कहीं खो सी गई है। क्या हम भूल गए उन पेड़ों को, जिनकी छाँव ने हर गर्मी में तपते सूरज की इन झुलसाती किरणों का रास्ता रोका। जिनकी विशालकाय मोटी शाखें बचपन में हमारे झूलों का अवलंब बनीं। जिनके तनों पर चढ़ उतर कर हमने ना जाने कितनी मस्तियाँ की।


घर के आँगन या अहाते में पलते बढ़ते ये वृक्ष भी हमारे साथ ही बढ़ते गए और साथ ही उनके सीने में समाती गईं वे आनंददायक स्मृतियाँ। बचपन बीता, ठिकाने बदलते रहे और वो पेड़.... वो तो अब आस पास रहे ही नहीं। सो उनसे जुड़ी यादें तो क्षीण होनी ही थीं। पर जब जब हम अपने पुराने आशियाने में वापस लौटे, उन पेड़ पौधों को देख वो यादें इस तीव्रता से वापस आ गयीं जेसे कभी गई ही ना हों। आखिर क्यूँ हुआ ऐसा !

दरअसल हमें एहसास हो ना हो अनजाने में ही हम अपनी आस-पास की प्रकृति से एक रिश्ता बना लेते हैं। एक ऐसा मज़बूत रिश्ता जिसकी गिरहें कटने से हमें वैसी ही पीड़ा होती है जैसे किसी इंसानी रिश्ते के टूटने पर होती है।

गुलज़ार साहब की लिखी एक कविता याद आ रही है जो ऐसे ही एक रिश्ते की कहानी कहती है। गुलज़ार ने जिस खूबी से अपने जिंदगी के सबसे हसीन लमहों को गली के किनारे खड़े उस पेड़ से जोड़ा है, वो आप इस कविता को पढ़ कर ही महसूस कर सकते हैं। इस कविता को बोलते हुए पढ़ना एक पूरे अनुभव से गुजरने जैसा है। तो आइए मेरे साथ पढ़िए इस कविता को...



मोड़ पे देखा है वह बूढ़ा-सा इक पेड़ कभी?
मेरा वाक़िफ़ है, बहुत सालों से मैं उसे जानता हूँ

जब मैं छोटा था तो इक आम उड़ाने के लिए
परली दीवार से कंधे पर चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख़ से जा पाँव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर

मेरी शादी पे मुझे याद है शाख़ें देकर
मेरी वेदी का हवन गर्म किया था उसने
और जब हामिला थी 'बीबा' तो दोपहर में हर दिन
मेरी बीवी की तरफ कैरियां फेंकी थीं इसी ने

वक्त के साथ सभी फूल, सभी पत्ते गए
तब भी जल जाता था जब मुन्ने से कहती 'बीबा'
'हाँ उसी पेड़ से आया है तू, पेड़ का फल है'
अब भी जल जाता हूँ, जब मोड़ गुजरते में कभी
खाँसकर कहता है, 'क्यों सर के सभी बाल गए?'

सुबह से काट रहे हैं वो कमेटी वाले
मोड़ तक जाने की हिम्मत नहीं होती मुझको...


क्या आपको नहीं लगता कि जिस प्रकृति के बीच हम पले बढ़े हैं, उसके साथ बने रिश्तों ने हमारे जीवन में जैसे अनमोल पल दिए हैं वैसा ही कुछ अपने बच्चों को भी हम उपलब्ध कराएँ?

शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

आइए भ्रमण करें संवेदना के संसार में : एक मुलाकात रंजना जी के साथ!

बात पिछली चौदह जनवरी यानि तीन महिने पहले की है। दोपहर का समय रहा होगा कि अचानक ही मोबाइल की घंटी घनघना उठी। नंबर जाना हुआ ना था सो मैंने सोचा जरूर किसी साथी चिट्ठाकार का ही फोन होगा जिसने जन्मदिन की मुबारकबाद देने के लिए फोन किया हो। फोन कनेक्ट हुआ तो उधर से एक महिला स्वर उभरा कि मनीष जी कैसे हैं?

अक्सर ऐसी कॉल्स में (जहाँ आप जानते हों कि सामनेवाला है तो जान पहचान का पर पकड़ में नहीं आ रहा) बातों का रुख ऐसा रखना पड़ता है हाँ ठीक हूँ, आप कैसी हैं और कैसा चल रहा है सब कुछ वैगेरह वैगेरह। बातों के इन आवरण में आवाज़ के लहज़े पर ध्यान देते हुए याददाश्त की गाड़ी फुल स्पीड पर दौड़ानी होती है ताकि जब तक बंदा हमारा हाल भाँपते हुए पूछे कि पहचान रहे हो या यूँ ही गपिया रहे हो तब तक हम सही जवाब के साथ तैयार हो जाएँ। पहचानने में पहली दिक्कत ये थी कि सामने वाला हमें बर्थडे विश भी नहीं कर रहा था। दूसरी विकट समस्या ये थी कि गर कहीं गलती से अंतरजालीय जान पहचान वाली दूसरी मित्रों का नाम मुँह से निकला तो सामनेवाले से खिंचाई की पूरी गारंटी है

पर एक मिनट की बात के पहले ही मैं समझ चुका था कि हो ना हो ये संवेदना संसार वाली रंजना जी हैं। दरअसल वो अपने बिजनेस के सिलसिले में राँची और वो भी हमारे कार्यालय के समीप आने वाली थीं और इसी की सूचना देने के लिए उन्होंने मुझे फोन किया था। इससे पहले रंजना जी से मेरी मुलाकात राँची ब्लॉगर मीट के दौरान हुई थी। मीट के बाद सारे पत्रकार तो चले गये थे पर बाकी सारे लोगों ने कॉवेरी में साथ बैठकर चाय पी थी। उस मीट में तो नहीं पर उसके बाद मुझे पता चला कि मेरे एक सहकर्मी रंजना जी को पारिवारिक रूप से जानते हैं और उनकी कंपनी सेल के राँची स्थित कुछ उपक्रमों का कम्प्यूटर मेंटेनेंस का काम देखती है।

उस दिन फोन पे बात के कुछ ही दिनों बाद मेरे कार्यालय में उनका अपने व्यवसाय के सिलसिले में आना हुआ। दो ढाई घंटे चली उस मुलाकात में बहुत सारी बातें हुईं। दरअसल अगर आप संवेदना संसार में रंजना जी को पढ़ेंगे तो आपके सामने उनकी परिमार्जित हिंदी लेखन शैली और अद्भुत तर्कशीलता देख कर टीचर प्रोफेसर टाइप वाली छवि उभरेगी। पर इसके विपरीत प्रकट में वो काफी मिलनसार और हँसमुख प्रवृति की महिला हैं।

बातचीत की शुरुआत हमने अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमियों के आदान प्रदान से की। रंजना जी ने बताया कि पिताजी की नौकरी ऐसी थी कि बचपन दूर दराज़ के इलाकों में बीता। धीरे धीरे पढ़ने लिखने में रुचि जगी। जो विषय उन्हें पसंद आता उसमें गहराई तक जाने में ही उन्हें संतोष मिलता। पर इसका नतीजा ये होता की परीक्षा में मन लायक प्रश्न आ जाता तो उसके उत्तर में रंजना जी इतनी कापियाँ भरती चली जातीं कि कई बार बाकी प्रश्नों के उत्तर छूट जाते। पर जितने प्रश्न भी उन्होंने किए होते उसी में परीक्षक इतना प्रसन्न हो जाता कि उन्हें कुल मिलाकर अच्छे मार्क्स ही मिलते।

पढ़ने लिखने के साथ रंजना जी को संगीत में भी काफी रुचि है और उन्होंने कई दिनों तक संगीत सीखा भी। मैंने भी अपने संगीत प्रेम से जुड़ी कई बातें साझा कीं। रंजना जी ने बताया कि लिखने पढ़ने के सिलसिले को बीच में जो विराम लगा वो अब ब्लॉगिंग की दुनिया में आने के बाद से फिर चालू हुआ है। उनसे बातें कर के मुझे लगा ब्लॉगिंग के बारे में मेरी और उनकी सोच एक सी है। बाद में मैंने उनके ब्लॉग पर भी इस सोच को प्रतिध्वनित पाया। ब्लागिंग में हुए अपने अनुभवों और इस माध्यम से अपनी अपेक्षाओं को रंजना जी समय समय पर अपने लेखों में शब्द देती रही हैं। अपनी ब्लागिंग के शुरुआती दौर में उन्होंने लिखा

यदि हम समकालीन हिन्दी ब्लोगिंग को देखेंगे तो परिणाम काफ़ी उत्साहजनक हैं.अब प्रतिक्रिया सांख्यिकी पर न जायें,अधिकांश लोग हैं जो केवल पढने में अभिरुचि रखते हैं,टिप्पणियां देने में नही.इस से रचना या रचनाकार विशेष का महत्व कम नही हो जाता.और पाठक बेवकूफ भी नही होता उसे ठीक पता है कि रचना और रचनाकार का बौद्धिक/साहित्यिक स्तर क्या है.और उसी अनुसार अपना पाठ्य चयन कर लेता है.कुछ ब्लाग/विषय सनसनीखेज सामग्रियां परोस उबलते पानी के बुलबुले से क्षणिक प्रसिद्धि भले पा जायें पर इससे सम्मानजनक स्तर नही पा सकते. दीर्घजीवी नही हो सकते......... मेरा मत है कि लेखन को सर्वोच्च दायित्व मानकर व्यक्ति समाज देश और दुनिया के लिए जो लिखेगा या लिखा जाता है,लेखन निसंदेह नैसर्गिक साहित्य ही है और रचनाकार साहित्यकार.बिना विवाद में फंसे अपने धर्म का सतत पालन ही हमारा कर्तव्य होना चाहिए,तभी हम आंशिक रूप से अपनी मातृभाषा के क़र्ज़ का एकांश मोल चुका पाएंगे.
वहीं फरवरी 2009 में हुई राँची ब्लॉगर मीट के अनुभव के बाद उन्होंने लिखा

आज ब्लाग अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत डायरी के परिष्कृति परिवर्धित रूप में देखा जा रहा है, परन्तु यह डायरी के उस रूप में नही रह जाना चाहिए जिसमे सोने उठने खाने पीने या ऐसे ही महत्वहीन बातों को लिखा जाय और महत्वहीन बातों को जो पाठकों के लिए भी कूड़े कचड़े से अधिक न हो प्रकाशित किया जाय. इस अनुपम बहुमूल्य तकनीकी माध्यम का उपयोग यदि हम सृजनात्मक /रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए करें तो इसकी गरिमा निःसंदेह बनी रहेगी और कालांतर में गरिमामय महत्वपूर्ण स्थान पाकर ही रहेगी. केवल अपने पाठन हेतु निजी डायरी में हम चाहे जो भी लिख सकते हैं,परन्तु जब हम सामग्री को सार्वजानिक स्थल पर सर्वसुलभ कराते हैं, तो हमारा परम कर्तव्य बनता है कि वैयक्तिकता से बहुत ऊपर उठकर हम उन्ही बातों को प्रकाशित करें जिसमे सर्वजन हिताय या कम से कम अन्य को रुचने योग्य कुछ तो गंभीर भी हो.

रंजना जी के ईमानदार सरोकार आज की हिंदी ब्लॉगिंग के परिपेक्ष्य में कितने प्रासंगिक है ये सिर्फ ब्लॉगवाणी की सबसे ज्यादा पसंदीदा या पढ़े जाने वाली पोस्ट की फेरहिस्त को पढ़कर ही लगाया जा सकता है। आजकल लिखी जा रही सामग्री को देखकर उन्हें इस बात का अफ़सोस होता है उनके अपने शहर में उससे कही ज्यादा प्रतिभावान लेखक कंप्यूटर ना जानने की वज़ह से इस माध्यम तक नहीं आ पा रहे हैं। रंजना जी ऐसे लोगों के निःशुल्क कंप्यूटर प्रशिक्षण के बारे में गंभीरता से विचार कर रही हैं।

अपने चिट्ठे पर रंजना जी कहानियाँ भी लिखती हैं और कभी कभी कविताएँ भी। पौराणिक कथाओं से आध्यात्मिक चिंतन, गंभीर लेखन से नुकीले व्यंग्य बाण तक इनकी लेखनी से निकलते रहते है। मैंने उनसे उनकी शुद्ध पर थोड़ी क्लिष्ट हिंदी की शैली के बारे में पूछा तो रंजना जी का जवाब था कि हिंदी के इस रूप को आगे तक की पीढ़ियों तक पहुँचाने की जिम्मेवारी भी किसी को तो लेनी चाहिए और मैं वही करने का प्रयास कर रही हूँ।

रंजना जी के दो प्यारे बच्चे हैं। उनकी बेटी से हम सभी ब्लॉगर मीट के दौरान मिल चुके हैं। बेटे की तस्वीर तो उनके ब्लॉग पर मौजूद है ही। रही बात पतिदेव की तो उनके बारे में मेरे कुछ कहने से अच्छा ये रहेगा कि आप उनके बारे में उन्हीं की लिखी ये पंक्तियाँ पढ़ लें...




"नयनों में पलते स्वप्न तुम्ही,तुमसे ही आदि अंत मेरा.
जीवन पथ के संरक्षक तुम,निष्कंटक करते पंथ सदा .
तुमने जो ओज भरा मुझमे, दुष्कर ही नही कोई कर्म बचा.
जितने भी नेह के नाते हैं,तुममे हर रूप को है पाया.
आरम्भ तुम्ही अवसान भी तुम,प्रिय तुमसे है सौभाग्य मेरा..
"

तो ये था लेखा जोखा रंजना जी से मेरी मुलाकात का... अगली पोस्ट में लें चलेंगे आपको लखनऊ ये बताने के लिए किस तरह आपके इस नाचीज़ को दो साथी चिट्ठाकारों की आपसी मिलीभगत से परेशान किया गया !



इस चिट्ठे पर इनसे भी मिलिए


सोमवार, अप्रैल 12, 2010

अमौसा का मेला : सुनिए एक मेले की कहानी स्व. कवि कैलाश गौतम की जुबानी !

भारत की ग्रामीण और कस्बाई संस्कृति में मेलों का एक प्रमुख स्थान है। और अगर वो मेला कुंभ जैसे मेले सा वृहद हो तो फिर उसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। फिलहाल हरिद्वार की पवित्र नगरी में कुंभ मेला चल रहा है और परसों यानि 14 अप्रैल को मेष संक्रांति के अवसर पर लाखों की संख्या में आम जन प्रमुख शाही स्नान में हिस्सा लेंगे। लाखों लोगों का इस धार्मिक महोत्सव में अपने गाँव, कस्बों और शहरों से पलायन करना और फिर एक जगह इकठ्ठा होना अपने आप में एक बड़ी सामाजिक सांस्कृतिक घटना है।
साहित्यकार और गीतकार इन मेलों को अपनी लेखनी का विषय बनाते रहे हैं। पर कुंभ मेले पर बनारस के समीप स्थित चँदौली में जन्मे कवि कैलाश गौतम की इस आंचलिक रचना का मेरे हृदय में एक विशेष स्थान है।

इसकी वज़ह ये है कि जिस माहौल, जिन घटनाओं को कैलाश जी ने अपनी इस कविता में उतारा है वो इतनी आस पास की, इतनी सजीव दिखती हैं कि कवि की इन छोटी छोटी घटनाओं को सूक्ष्मता से पकड़ने की क्षमता पर दिल बाग बाग हो उठता है।
अब मेले में कंधे पर चलने वाली गठरी मुठरी के अंदर के अनिवार्य सामानों की चर्चा हो चाहे नई नवेली दुल्हन के चाल ढाल की, दो सहेलियों की आत्मीय बातचीत के झगड़े में बदलने की दास्तान हो या अटैची के ताले के मोलाने या ड्रामा देख कर भौजी के उछलने की बात हो..हर जगह अपने सूक्ष्म अवलोकन, आंचलिक बोली के ठेठ शब्दों के प्रयोग व प्रवाहपूर्ण शैली से कैलाश गौतम पाठकों को सम्मोहित करते चलते हैं।

कवि सम्मेलन की एक रिकार्डिंग में कैलाश गौतम खुद इस कविता के बारे में कहते हैं
विश्व का सबसे बड़ा मेला इलाहाबाद में सम्पन्न होता है कभी कुंभ के रूप में कभी अर्ध कुंभ के रूप में। हर साल माघ मेले के नाम से ये ढाई महिने का मेला लगता है। मैंने बचपन में अपने अपने दादा दादी को, अपने माता पिता को इस मेले में आने की तैयारी करते हुए देखा है। रेडिओ में होने के नाते, इलाहाबाद में होने के नाते लगभग 38 वर्षों तक उस मेले का एक हिस्सा होता रहा। सन 1989 के कुंभ में ये कविता लिखी गई थी। चूंकि अमावस्या के स्नान पर्व पर सर्वाधिक भीड़ होती हे इसलिए इस कविता का नाम ही मैंने 'अमौसा का मेला' रखा। 

हर बड़े मेले में भीड़ का चेहरा एक सा ही होता है। कभी कभी इस भीड़ के चलते बड़ी दुर्घटनाएं हो जाती हैं। दो तीन घटनाओं में मैं खुद शामिल रहा हूँ चाहे वो हरिद्वार का कुंभ हो या नासिक का कुंभ रहा हो। 1954 के कुंभ में भी कई हजार लोग मरे। पर मैंने इस कविता में बड़ी छोटी छोटी घटनाओं को पकड़ा, जहाँ जिंदगी है मौत नहीं है जहाँ हँसी है दुख नहीं है...
इस रचना की भाषा यूँ तो भोजपुरी है पर ये वो भोजपुरी नहीं जो भोजपुर इलाके (आरा बलिया छपरा के सटे इलाके) में बोली जाती है। दरअसल बनारस से इलाहाबाद की ओर बढ़ने से भोजपुरी बोलने के तरीके और कुछ शब्दों में बदलाव आ जाता है पर जो भोजपुरी की मिठास है वो वैसे ही बनी रहती है। तो आइए इस मिठास को महसूस करें कैलाश जी की आवाज़ में इस हँसाती गुदगुदाती कविता में


कि भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा
धरम में करम में सनल गाँव देखा
अगल में बगल में सगल गाँव देखा
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा

एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा
अ कान्ही पे बोरी, कपारे पे बोरा
अ कमरी में केहू, रजाई में केहू
अ कथरी में केहू, दुलाई में केहू
कि आजी रंगावत हईं गोड़ देखा
हँसत ह‍उवैं बब्बा तनी जोड़ देखा
घुँघुटवै से पूछै पतोहिया कि अ‍इया
गठरिया में अब का रखाई बत‍इहा
एहर ह‍उवै लुग्गा ओहर ह‍उवै पूड़ी
रमायन के लग्गे हौ मड़ुआ के ढूँढ़ी
ऊ चाउर अ चिउरा किनारे के ओरी
अ नयका चपलवा अचारे के ओरी

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

मचल ह‍उवै हल्ला चढ़ावा उतारा
खचाखच भरल रेलगाड़ी निहारा
एहर गुर्री-गुर्रा ओहर लोली-लोला
अ बिच्चे में ह‍उवै सराफत से बोला
चपायल है केहू, दबायल है केहू
अ घंटन से उप्पर टँगायल है केहू
केहू हक्का-बक्का केहू लाल-पीयर
केहू फनफनात ह‍उवै कीरा के नीयर
अ बप्पा रे बप्पा, अ द‍इया रे द‍इया

तनी हम्मैं आगे बढ़ै दे त भ‍इया

मगर केहू दर से टसकले न टसकै
टसकले न टसकै, मसकले न मसकै
छिड़ल हौ हिताई नताई के चरचा
पढ़ाई लिखाई कमाई के चरचा
दरोगा के बदली करावत हौ केहू
अ लग्गी से पानी पियावत हौ केहू


अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

जेहर देखा ओहरैं बढ़त ह‍उवै मेला
अ सरगे के सीढ़ी चढ़त ह‍उवै मेला
बड़ी ह‍उवै साँसत न कहले कहाला
मूड़ैमूड़ सगरों न गिनले गिनाला
एही भीड़ में संत गिरहस्त देखा
सबै अपने अपने में हौ ब्यस्त देखा
अ टाई में केहू, टोपी में केहू
अ झूँसी में केहू, अलोपी में केहू
अखाड़न के संगत अ रंगत ई देखा
बिछल हौ हजारन के पंगत ई देखा
कहीं रासलीला कहीं परबचन हौ
कहीं गोष्ठी हौ कहीं पर भजन हौ
केहू बुढ़िया माई के कोरा उठावै
अ तिरबेनी म‍इया में गोता लगावै
कलपबास में घर क चिन्ता लगल हौ
कटल धान खरिहाने व‍इसै परल हौ

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

गुलब्बन के दुलहिन चलैं धीरे-धीरे
भरल नाव ज‍इसे नदी तीरे-तीरे

सजल देह ज‍इसे हो गौने का डोली
हँसी हौ बताशा शहद ह‍उवै बोली
अ देखेलीं ठोकर बचावैलीं धक्का
मनै मन छोहारा मनै मन मुनक्का

फुटेहरा नियर मुस्किया-मुस्किया के
निहारे लैं मेला सिहा के चिहा के
सबै देवी देवता मनावत चलैंलीं
अ नरियर पे नरियर चढ़ावत चलैलीं
किनारे से देखैं इशारे से बोलैं
कहीं गांठ जोड़ैं कहीं गांठ खोलैं
बड़े मन से मन्दिर में दरसन करैलीं
अ दूधे से शिवजी क अरघा भरैलीं
चढ़ावैं चढ़ावा अ गोठैं शिवाला
छुवल चाहे पिन्डी लटक नाहीं जाला

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

एही में चम्पा चमेली भेट‍इलीं
अ बचपन के दूनो सहेली भेंट‍इलीं
ई आपन सुनावैं ऊ आपन सुनावैं
दूनों आपन गहना गदेला गिनावैं
असो का बनवलू असो का गढ़वलू
तू जीजा के फोटो न अब तक पठवलू
न ई उन्हैं रोकैं न ऊ इन्हैं टोकैं
दूनौ अपने दुलहा क तारीफ झोकैं
हमैं अपनी सासू के पुतरी तू जान्या
अ हम्मैं ससुर जी के पगरी तू जान्या
शहरियों में पक्की देहतियो में पक्की
चलत ह‍उवै टेम्पो चलत ह‍उवै चक्की
मनैमन जरै अ गड़ै लगलीं दूनों
भयल तू-तू मैं-मैं लड़ै लगली दूनों
अ साधू छोड़ावैं सिपाही छोड़ावै
अ हलुवाई ज‍इसे कराही छोड़ावैं

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

कलौता के माई का झोरा हेरायल
अ बुद्धू का बड़का कटोरा हेरायल
टिकुलिया को माई टिकुलिया के जो है
बिजुलिया को माई बिजुलिया के जो है
मचल ह‍उवै मेला में सगरो ढुंढाई
चमेला का बाबू चमेला का माई
गुलबिया सभत्तर निहारत चलैले
मुरहुवा मुरहुवा पुकारत चलैले
अ छोटकी बिटिउवा के मारत चलैले
बिटिउवै पर गुस्सा उतारत चलैले

गोबरधन के सरहज किनारे भेंट‍इलीं
गोबरधन के संगे प‍उँड़ के नह‍इलीं
घरे चल ता पाहुन दही-गुड़ खियाइत
भतीजा भयल हौ भतीजा देखाइत
उहैं फेंक गठरी पर‍इलैं गोबरधन
न फिर-फिर देख‍इलैं धर‍इलैं गोबरधन

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...

केहू शाल सुइटर दुशाला मोलावै
केहू बस अटैची के ताला मोलावै
केहू चायदानी पियाला मोलावै
सोठ‍उरा के केहू मसाला मोलावै
नुमाइस में जातैं बदल ग‍इलीं भ‍उजी
अ भ‍इया से आगे निकल ग‍इलीं भ‍उजी
आयल हिंडोला मचल ग‍इलीं भ‍उजी
अ देखतै डरामा उछल ग‍इलीं भ‍उजी

अ भ‍इया बेचारू जोड़त ह‍उवैं खरचा
भुल‍इले न भूलै पकौड़ी के मरचा
बिहाने कचहरी कचहरी के चिन्ता
बहिनिया का गौना मसहरी का चिन्ता
फटल ह‍उवै कुरता फटल ह‍उवै जूता
खलित्ता में खाली केराया के बूता
तबौ पीछे-पीछे चलत जात ह‍उवन
गदेरी में सुरती मलत जात ह‍उवन

अमौसा का मेला अमौसा का मेला...


(गैर भोजपुरी पाठकों की सुविधा के लिए शब्दार्थ : झोरा - झोला, कपार - सिर, गोड़ - पैर, चपायल - किसी के ऊपर पैर रखना, कीरा - कीड़ा, नीयर - की तरह, फनफनाना -बिलबिलाना, चपलवा - चप्पल, लुग्गा - साड़ी, चाउर - चावल, चिउरा - चूड़ा, पीयर - पीला, टसकना - हिलना, परबचन - प्रवचन, तिरबेनी - त्रिवेणी, नरियर - नारियल, पक्की - पक्का मकान, हेरायल - गुम हो जाना, सगरो - हर तरफ, मोलाना -दाम पूछना, मसहरी - मच्छरदानी)

 कैलाश गौतम को जी को खुद सस्वर इस कविता का पाठ करते देखना चाहें तो ये रहा वीडिओ



और चलते चलते मेरे दो पाठक मित्रों का नाम लेना चाहूँगा जिनकी वज़ह से ये कविता आप तक पहुँच सकी। एक तो मंजुल जी जिन्होंने 2008 अक्टूबर में गाँधी जी पर लिखी कैलाश गौतम की कविता पर मेरी प्रस्तुति के जवाब में इस कविता के बारे में मुझे पहली बार बताया और दूसरे राधा चमोली जिन्होंने इस कविता की रिकार्डिंग मेरे साथ शेयर कर इस कविता के बारे में पुनः स्मरण कराया।

बुधवार, अप्रैल 07, 2010

'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए अपने चार साल और दो लाख पेजलोड्स !

लगभग दस दिन पहले यानि २६ मार्च को एक शाम मेरे नाम के हिंदी संस्करण ने अपने चार साल पूरे कर लिये। साथ ही पिछले हफ्ते ही इस चिट्ठे के दो लाख पेजलोड्स भी पूरे हो गए।



अगर आप स्टैटकांउटर द्वारा दिए गए आंकड़ों पर ध्यान देंगे तो पाएँगे कि प्रथम दो सालों तक ब्लॉग पर हिट्स मिलने का सिलसिला बड़ी मंथर गति से हुआ था पर उत्तरोत्तर ये बढ़ता गया।


पिछले साल औसतन महिनावार हिट्स (Average Monthly Hits) 6500 रहीं यानि पिछले साल प्रतिदिन औसतन दो सौ से ज्यादा हिट्स इस ब्लॉग को मिलती रहीं। इस आँकड़े को आप नीचे के चार्ट में देख सकते हैं।


अब तक इस चिट्ठे पर चार सौ दस (410) पोस्ट लिखी गई हैं यानि प्रति पोस्ट 490 की औसत से पढ़ी गई हैं। पिछले साल ये आँकड़ा 350 पेजलोड्स प्रति पोस्ट था। इस ब्लॉग के हिंदी और रोमन हिंदी संस्करणों की सब्सक्राइबर संख्या में भी इज़ाफा हुआ है और ये संख्या पिछले साल के 450 से बढ़कर 825 तक जा पहुँची है।


वहीं रोमन हिंदी ब्लॉग Ek Shaam Mere Naam पर हिट्स की संख्या लगभग पहले जैसी ही है।

अपने अनुभवों से इतना कह सकता हूँ कि जैसे जैसे आप अपने विषय वस्तु यानि कान्टेंट में विस्तार करते जाते हैं, कुल पाठकों की संख्या में तो वृद्धि होती है पर उसमें एग्रगेटर से आनेवाले पाठकों का हिस्सा कम होता जाता है। इसलिए सनसनी या बिना मतलब के पचड़ों में पड़ने के बजाए अपने मन की बात कहें और पूरी मेहनत के साथ कहें। इस बात का भी अंदाजा लगाएँ कि पाठकों को हमारे लेखन का कौन सा अंदाज़ ज्यादा भाता है। इससे आपको अपने मजबूत पक्ष और कमियों का अंदाज़ा मिलेगा। सच पूछिए तो खुद एक परिपक्व ब्लॉग लेखक को इस बात की सबसे ज्यादा समझ होती है कि उसके द्वारा परोसी सामग्री कितनी बेहतर या बेकार है।

पिछले एक साल में पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए 'एक शाम मेरे नाम' के स्वरूप में मैंने काफी बदलाव किए थे। ऊपर मेनू बार की जगह को गज़ल, मनभावन गीत, वार्षिक संगीतमाला, कविता, पुस्तक चर्चा, ब्लागिंग और अपनी बात के अलग अलग खंडों में बाँटना उसी का एक हिस्सा था। ग़जलों और मनभावन गीत मेन टैब क्लिक करने से आप सीधे उन पृष्ठों पर पहुँचते हैं जहाँ इस ब्लॉग पर पेश गीतों और ग़ज़लों की लिंकित सूची दी हुई है। हाँ, लाइफलॉगर के बंद हो जाने से पुराने पृष्ठों में कई जगह आडिओ फाइल गायब हो गई हैं। पिछले कुछ दिनों में मैंने ऐसी कई पोस्टों को दुरुस्त किया है, पर इस कार्य को पूर्ण होने में अभी और समय लगेगा। वेसे पाठकों से गुजारिश है कि जब भी ऐसी कोई पोस्ट सामने आए, उसकी तरफ मेरा ध्यान दिलाएँ।

हिंदी फिल्म संगीत से जुड़े अपने खास पसंदीदा कलाकार या शायर से जुड़े लेखों तक पहुँचने के लिए ग़जल और गीत के मुख्य मेनू बार में सब मेनू दिए गए हैं। मसलन अगर आप सिर्फ गुलज़ार से जुड़ी पोस्ट देखना चाहते हैं तो टैग क्लाउड में ढूँढने के बजाए सीधे मनभावन गीत -- गीतकार -- गुलज़ार पर क्लिक कर सकते हैं।

कभी कभी 'मुसाफ़िर हूँ यारों' और 'एक शाम मेरे नाम' पर एक साथ निरंतरता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है पर फिर आपका स्नेह व साथ मुझे बीच बीच में होती थकान से उबारता है। ब्लागिंग के इस नए साल में मेरा ये प्रयास होगा कि कुछ अच्छा आपके सामने लिख और परोस सकूँ। एक बार फिर इस चिट्ठे को इस मुकाम तक पहुँचाने के लिए आप सभी जाने अनजाने पाठकों का हार्दिक आभार!

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 सरताज गीत - क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले, इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले ..

तीन महिनों के इस सफ़र को पूरा करते हुए वक़्त आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला 2009 के सरताजी बिगुल के बजने का। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पाँचों गीत का आपसी फ़ासला बेहद मामूली था। साल के सरताज गीत के आसन पर मैंने उस गीत को बैठाया जो मेरे दिल को अपेक्षाकृत ज्यादा करीब से छू गया।

वैसे ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा कि मेरे सबसे चहेते गीतकार और प्रिय संगीतकार के होते हुए भी, संगीतमाला की पहली पॉयदान पर पिछले छः सालों पर पहली बार इस गीतकार-संगीतकार की जोड़ी का कब्जा हो रहा है। इससे पहले वर्ष 2006 में इस जोड़ी ने तीसरी पॉयदान तक का सफ़र तय किया था।

तो कौन है वो जोड़ी? गीतकार का नाम तो आप समझ ही गए होंगे जी हाँ वही हरदिलअज़ीज़ गुलज़ार साहब (जिन्हें इस चिट्ठे पर पिछले महिने कराए गए चुनाव में सबसे ज्यादा मत आप लोगों ने दिए हैं) और चोटी पर खड़े इस गीत में उनका साथ दे रहे गायक व संगीतकार विशाल भारद्वाज। फिल्म कमीने का ये गीत जब मैंने पहली बार सुना था तो मैं इसकी गिरफ़्त में आ गया था। पर आखिर क्या बात है इस गीत में?

जीवन में अपने लक्ष्यों को पूरा करने में मिली सफलताओं का श्रेय हम अक्सर अपनी मेहनत और लगन को देते हैं और वहीं जब विफलताएँ हमारा रास्ता काटती हैं तो सारा दोषारोपण अपनी फूटी किस्मत और अपने आसपास के लोगों के मत्थे मढ़ देते हैं।

पर ये धोखा अपने आप को कोई शख़्स कब तक देता रहेगा? फुर्सत के उन एकाकी लमहों में जब हम अपने आत्मावलोकन के लिए मजबूर होते हैं तब हमें लगता हैं कि ख़ुद हमारे चुने रास्ते, हमारी छिछली सोच और हमारे कर्म भी इन हालातों के लिए कम जिम्मेवार नहीं। दरअसल ज़िंदगी के इतने विस्तृत कैनवास में हमारा मन कितनी बार कमीनेपन की इन हदों को पार करता है इसका अंदाज़ा समय रहते हम कई बार नहीं लगा पाते।

हमारे इसी मन का खाका खींचती, साथी चिट्ठाकार विश्व दीपक 'तनहा' की इन पंक्तियों पर ज़रा गौर करें जो उन्होंने हाल फिलहाल में कही हैं..

"....यह जो मेरा अगम-अगोचर-
अलसाया-सा अद्भुत मन है.......

मुझे संवारे, मुझे निखारे
मुझको मेरा सच बतला दे
ऐसा कहाँ कोई दर्पण है..

और क्या कहूँ,
यही बहुत है..
मुझे जानने वाले कहते
कभी राम
तो कभी विभीषण
और कभी मुझमें रावण है..
...."

गुलज़ार साहब ने हर व्यक्ति में अपने मन और कर्मों को टटोलने के लिए चलते इस मौन वार्तालाप को इस गीत में इस संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया है कि आप इन शब्दों को सुनकर एकबारगी सोचने पर मजबूर जरूर हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर गीत के मुखड़े पर गौर करें

क्या करे ज़िन्दगी, इसको हम जो मिले
इसकी जाँ खा गये, रात दिन के गिले
रात दिन गिले...
मेरी आरज़ू कमीनी, मेरे ख्वाब भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी, ये हुज़ूर भी कमीने......


क्या ये सच नहीं कि ज़िंदगी से हमारी अपेक्षाएँ अपने कर्मों के प्रतिफल से कहीं आगे चली जाती हैं? एक सफलता मिली नहीं कि दूसरी के पीछे भागना शुरु। इंसान की इसी मनोवृति को गुलज़ार साहब, अपने चिरपरिचित बिंबों के आइने में कुछ यूँ पेश करते हैं...

कभी ज़िंदगी से माँगा
पिंजरे में चाँद ला दो
कभी लालटेन ले के
कहा आसमाँ पे टाँगो

जीने के सब करीने
थे हमेशा से कमीने
कमीने...कमीने..कमीने
मेरी दास्तां कमीनी

मेरे रास्ते कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने

और चूँकि हम ऐसे हैं तो अपने दोस्तों और अपने समाज से क्या उम्मीद रखें...

जिसका भी चेहरा छीला
अन्दर से और निकला
मासूम सा कबूतर,
नाचा तो मोर निकला
कभी हम कमीने निकले,
कभी दूसरे कमीने
मेरी दोस्ती कमीनी,
मेरे यार भी कमीने
इक दिल से दोस्ती थी
ये हुज़ूर भी कमीने





विशाल भारद्वाज ने गीत के कैफ़ियत के हिसाब से संगीत रचना तो की ही है, साथ ही फिल्म के इस सबसे बेहतरीन गीत को गाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए हैं। पर कुल मिलाकर मुझे लगता है कि आज के इस युग में हम, आप यानि कि हम सभी इस गीत को अपनी अपनी ज़िंदगी से जोड़ के देख सकते हैं। ये गीत हमें अपने अंदर झाँकने और अपना मूल्यांकन करने पर मजबूर करता है।

इस गीत से ना मुझे बेहद प्यार है बल्कि गुलज़ार स्वयम् इसे कमीने की बेहतरीन रचना मानते हैं। गीत में 'कमीने' शब्द के प्रयोग के बारे में गुलज़ार कहते हैं

हम अपने जीवन में कमीने शब्द का प्रयोग बतौर गाली के कम और एक अपनत्व से दी हुई झिड़की के तौर पर ज्यादा करते हैं। मुझे तो ओम पुरी की बात याद पड़ती है जिसने मेरे यहाँ अपना पसंदीदा नाश्ता करने के बाद ये कहा कि आपने मुझे आज एक बार भी 'कमीना' नही कहा। मेरी समझ से तो कमीना कहना किसी के कंधे पर आत्मीयता से थपथपाने या फिर हल्की सा मूक चपत लगाने जैसा है जो ये इंगित करता है कि ये चपत भी इसलिए है कि मुझे अभी भी तुम्हारी फिक्र है।
गुलज़ार, विशाल के संगीत में वही चमक पाते हैं जो एक ज़माने में उन्होंने पंचम के साथ काम करते हुए महसूस की थी। खुशी तो तब हुई जब इस गीत के बारे में मेरी भावनाएँ गुलज़ार के एक साक्षात्कार में प्रतिध्वनित हुई। अंग्रेजी दैनिक को दिए साक्षात्कार में गुलज़ार ने कहा

जब भी मैं विशाल के साथ काम करता हूँ हम दोनों मिल कर हिंदी फिल्म संगीत के नए आयामों को तलाशने की कोशिश करते हैं। कमीने में भी मैंने कुछ नया लिखने की कोशिश की है। इतना स्पष्ट कर दूँ की 'धन ता नान' मेरा इस फिल्म का पसंदीदा गीत नहीं है। ये अलग बात है कि आजकल तेज रिदम पर आधारित गीत ही ज्यादा चलते हैं। मुझे तो विशाल का गाया हुआ फिल्म का शीर्षक गीत ही सबसे प्यारा लगता है क्यूँकि वहाँ मैंने जिन शब्दों का चयन किया है उन्हें सुनकर श्रोताओं के मन में एक सोच तो पैदा होगी ही। पर ये भी है कि आजकल शब्दों को ध्यान से सुनता कौन है?
दिल की बात कह दी गुलज़ार साहब ने...

वार्षिक संगीतमालाओं के माध्यम से आज के संगीत में जो कुछ सुनने और चर्चा करने योग्य हो रहा है उसे आप तक पहुँचाने की कोशिश करता रहा हूँ। वर्ष 2004 से लेकर आज 2009 तक वार्षिक संगीतमालाओं के छः अंक हो चुके हैं। मुझे विश्वास है कि वार्षिक संगीतमाला 2009 में पिछले तीन महिनों में प्रस्तुत गीतों ने संगीत, गायिकी और बोलों की दृष्टि से आपका मन जीता होगा। यक़ीन मानिए साल के ये शुरु के तीन महिने ब्लागिंग की दृष्टि से मेरे लिए बेहद श्रमसाध्य होते हैं। तीन महिनों के इस लंबे सफ़र को कायम रखने के लिए आपका प्रेम एक उत्प्रेरक के रूप में काम करता रहा है। शुरु से आखिर तक प्रस्तुत गीतों पर अपनी राय देने के लिए मैं रंजना जी, हिमांशु, प्रियंक जैन, सुशील, समीर जी, गौतम, अभिषेक, कंचन, अपूर्व, सागर, राज भाटिया व अन्य साथियों का हार्दिक आभारी हूँ ! इन्हीं शब्दों के साथ संगीतमाला की इस लंबी श्रृंखला का समापन करने की इज़ाजत दीजिए।

 

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