बुधवार, अगस्त 04, 2010

यादें किशोर दा की : पेश है उनके जन्मदिन पर किशोर दा लेखमाला के संकलित और संपादित अंश

आज किशोर दा का जन्म दिन है। 2007अगस्त में मैंने खंडवा की इस महान विभूति के जीवन के कई पहलुओं से जुड़ी बातों पर नौ भागों में एक लंबी सिरीज की थी जिसे आप सब ने काफी सराहा था। उनके जन्म दिन के अवसर पर आज पेश है उन्हीं नौ कड़ियो के संकलित और संपादित अंश
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किसने जाना था कि एक छोटे से शहर 'खंडवा' मे पैदाइश लेने वाला 'आभास कुमार गाँगुली' नाम का बालक भारतीय संगीत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। १९४८ में खेमचंद्र प्रकाश की संगीत निर्देशित फिल्म जिद्दी में अपना पहला गीत 'मरने की दुआएँ क्यूँ मागूँ' से लेकर अक्टूबर १९८७ में 'वक़्त की आवाज़' में आशा जी के साथ गाए गीत 'गुरु ओ गुरु..' तक अपने चालीस साल के संगीत सफ़र में किशोर दा ने संगीत प्रेमी करोड़ों भारतीयों का दिल जीता और आज भी जीत रहे हैं। किशोर कुमार को जब उनके बड़े भाई अशोक कुमार एक अभिनेता बनाने के लिए मुंबई लाए तो किशोर दा, मन ही मन कोई ख़ास उत्साहित नहीं थे। उनका तो सपना अपने उस वक़्त के प्रेरणास्रोत के एल सहगल से मिलने का था जो दुर्भाग्यवश पूरा नहीं हो पाया क्योंकि इनके मुंबई आगमन के कुछ ही दिन पश्चात सहगल चल बसे।

अपने शुरुआती दिनों में के एल सहगल के अंदाज का अनुकरण करने वाले किशोर दा की गायिकी में एक ख़ूबसूरत मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एस डी बर्मन साहब से हुई। ये भी एक संयोग ही था कि बर्मन सीनियर, अशोक कुमार जी के घर पहुँचे और किशोर को बाथरूम में गुनगुनाते सुन कर ठिठक गए और उनसे मिल कर जाने का ही निश्चय किया। उन्होंने ही किशोर को गायन की अपनी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। किशोर दा की जिस आवाज़ के हम सब क़ायल हैं, वो पचास के उत्तरार्ध में एस डी बर्मन के सानिध्य का ही परिणाम रहा है।

अग़र बाकी गायकों की अपेक्षा किशोर दा के योगदान पर विचार करूँ तो यही पाता हूँ कि जहाँ रफी ने गायिकी में अपनी विविधता से सबका मन जीता, वहीं किशोर दा ने हिंदी फिल्म संगीत की गायिकी को आम जनता के होठों तक पहुँचाया। उनकी गायिकी का तरीका ऍसा था कि जिसे गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए अपेक्षाकृत अधिक सहज है। दरअसल किशोर, मुकेश और हेमंत दा सरीखे गायकों ने अपनी आवाज़ के बलबूते पर ही संगीतप्रेमी जनमानस को अपना दीवाना बना लिया। मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायक दिलकश आवाज़ के मालिक तो थे ही, पर साथ-साथ वे शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के बाद हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत देने आए थे। किशोर दा के पास ऍसी काबिलियत नहीं थी फिर भी इसकी कमी उन्होंने महसूस नहीं होने दी और अपने मधुर गीतों को हमें गुनगुनाने पर मज़बूर करते रहे।

पचास का दशक किशोर के लिए बतौर गायक काफी मुश्किल वाला समय रहा। इस दौरान उन्होंने कई फिल्में की जिनमें 'नौकरी', 'मिस माला', 'बाप रे बाप', 'आशा', 'दिल्ली का ठग' और 'चलती का नाम गाड़ी' चर्चित रहीं। नौकरी फिल्म में एक गीत था 'छोटा सा घर होगा...' जिसे संगीतकार सलिल चौधरी, हेमंत दा से गवाना चाहते थे। किशोर दा ने जब इसे खुद गाने की पेशकश की तो सलिल दा का सीधा सा जवाब था ...

"जब मैंने तुम्हें कभी सुना ही नहीं तो ये गीत तुमसे कैसे गवा लूँ। "

बड़े मान-मुनौवल के बाद सलिल दा राजी हुए। ये वाक़या इस बात को स्पष्ट करता है कि वो समय ऍसा था जब ज्यादातर संगीत निर्देशक किशोर की आवाज़ को गंभीरता से नहीं लेते थे।

बतौर नायक किशोर कुमार का ये समय ज्यादा बेहतर रहा। १९५६ में जे के नंदा की फिल्म 'ढ़ाके का मलमल' में पहली बार वो और मधुबाला साथ साथ देखे गए। शायद इसी वक़्त उनके प्रेम की शुरुआत हुई। १९५८ में फिल्म 'चलती का नाम गाड़ी' इस जोड़ी की सबसे सफल फिल्म रही। इस जोड़ी पर फिल्माए गीत 'इक लड़की भीगी भागी सी...' और 'पाँच रुपैया बारह आना....' इसी फिल्म से थे। १९६१ में अपनी पहली पत्नी रूमा गुहा के रहते हुए किशोर ने मधुबाला से शादी की और इसके लिए मुस्लिम धर्म को अपनाते हुए अपना नाम अब्दुल करीम रख लिया। ज़ाहिर है ये सारी क़वायद दूसरी शादी करने में कानूनी पचड़ों से बचने के लिए की गई थी।


वापस बढ़ते हैं किशोर दा के संगीत के सफ़र पर। संगीतकार एस. डी. बर्मन पहले ऐसे संगीतकार थे जिन्होंने ये समझा कि किस तरह के गानों के लिए किशोर की आवाज सबसे ज्यादा उपयुक्त है। उन्हीं की वज़ह से साठ के दशक में किशोर, देव आनंद की आवाज़ बने। बरमन सीनियर द्वारा संगीत निर्देशित 'गाइड' और 'जेवल थीफ' में उनके गाए गीतों ने उनके यश को फैलने में मदद की।

पर किशोर की गायिकी के लिए मील का पत्थर साबित हुई १९६९ में बनी फिल्म 'अराधना'।

एस डी बर्मन साहब इस फिल्म के गीत रफी साहब से गवाने का मन बना चुके थे। पर धुनें बना चुकने के बाद वो बीमार पड़ गए और इसके संगीत को पूरा करने की जिम्मेवारी पंचम दा पर आन पड़ी। उन्होने इन धुनों को गाने के लिए किशोर दा को चुना और उसके बाद जो रच कर बाहर निकला वो इतिहास बन गया। इस फिल्म के गीत 'रूप तेरा मस्ताना...' के लिए किशोर दा को पहली बार फिल्मफेयर एवार्ड से नवाज़ा गया।

सत्तर के दशक की शुरुआत किशोर दा के लिए जबरदस्त रही। एस. डी. बर्मन के संगीत निर्देशन में 'शर्मीली' और 'प्रेम पुजारी' के गीत चर्चित हुए। वहीं 'अराधना', 'कटी पतंग' और 'अमर प्रेम' की अपार सफलता के बाद किशोर दा पर्दे पर राजेश खन्ना की स्थायी आवाज़ बन गए।

सत्तर का दशक किशोर कुमार की गायिकी के लिए स्वर्णिम काल था। इस दशक में गाए हुए गीतों में से कुछ को छांटना बेहद दुष्कर कार्य है। कटी पतंग (1970), अमर प्रेम (1971),बुढ्ढा मिल गया(1971), मेरे जीवन साथी (1972), परिचय (1972), अभिमान(1973), कोरा कागज़(1974), मिली(1975), आँधी(1975), खुशबू(1975) में गाए किशोर के गीत मुझे खास तौर से प्रिय हैं।

पहले देव आनंद और फिर राजेश खन्ना को अपनी आवाज़ देने के बाद इस दशक में वो अमिताभ को भी अपनी आवाज़ देते नज़र आए। किशोर हर अभिनेता की आवाज़ के हिसाब से अपनी वॉयस माडुलेट करते थे। इस दौर में किशोर ने बड़े संगीतकारों में बर्मन सीनियर, पंचम, कल्याण जी-आनंद जी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ काम करते हुए फिल्म जगत को कई अनमोल गीत दिए।

चाहे वो 'बुढ्ढा मिल गया 'का रूमानी गीत 'रात कली इक ख़्वाब में...' हो या यूडलिंग में उनकी महारत दिखाता 'मेरे जीवन साथी ' का 'चला जाता हूँ किसी की धुन में...' या फिर दर्द में डूबा 'मिली' में गाया हुआ 'बड़ी सूनी सूनी है..... ' या 'आए तुम याद मुझे, गाने लगी हर धड़कन....' सब के सब किशोर दा की गायन प्रतिभा में विद्यमान हर रंग की उपस्थिति को दर्ज कराते हैं।

किशोर दा के सबसे सुरीले गीत एस. डी. बर्मन और पंचम दा के साथ हैं। पंचम को जब भी अपनी किसी फिल्म के लिए किशोर दा से गाना गवाना पड़ता था तो उसके दो दिन पहले उस गीत की धुन का टेप वो उनके यहाँ भिजवा देते थे। वे कहते थे कि इससे किशोर को गीत को महसूस करते हुए जज़्ब करने में सहूलियत होती थी और वास्तविक रिकार्डिंग का परिणाम बेहतरीन आता था।


फिल्म उद्योग में ये बात आम है कि किशोर का व्यवहार या मैनरिज्म अपने मिलने वाले लोगों से बहुधा अज़ीब तरह का होता था। ऍसा वो कई बार जानबूझ कर करते थे पर कहीं न कहीं उनका दिल, शरारती बच्चे की तरह था जो उनके दिमाग में नए-नए खुराफातों को जन्म देता था। अक्सर उनके इस नटखटपन का शिकार, उनके क़रीबी हुआ करते थे। आइए रूबरू होते हैं उनके ऍसे ही कुछ कारनामों से..

एक बार की बात है, किशोर के घर एक इंटीरियर डेकोरेटर पधारा। वो सज्जन तपती गर्मी में भी थ्री पीस सूट में आए, और आते ही अपने अमेरिकी लहजे के साथ शुरु हो गए किशोर को फंडे देने कि उनके घर की आंतरिक साज सज्जा किस तरह की होनी चाहिए। किशोर ने किसी तरह आधे घंटे उन्हें झेला और फिर अपनी आवश्यकता उन्हें बताने लगे।

अब गौर करें किशोर दा ने उन से क्या कहा....

"मुझे अपने कमरे में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। बस चारों तरफ कुछ फीट गहरा पानी हो और सोफे की जगह छोटी-छोटी संतुलित नावें, जिसे हम चप्पू से चला कर इधर-उधर ले जा सकें। चाय रखने के लिए ऊपर से टेबुल को धीरे धीरे नीचे किया जा सके ताकि हम मज़े में वहाँ से कप उठा चाय की चुस्कियाँ ले सकें।...."

इंटीरियर डेकोरेटर के चेहरे पर अब तक घबड़ाहट की रेखाएँ उभर आईं थीं पर किशोर कहते रहे...

"....आप तो जानते ही हैं कि मैं एक प्रकृति प्रेमी हूँ, इसलिए अपने कमरे की दीवार की सजावट के लिए मैं चाहता हूँ कि उन पर पेंटिंग्स की बजाए लटकते हुए जीवित कौए हों और पंखे की जगह हवा छोड़ते बंदर... "

किशोर का कहना था कि ये सुनकर वो व्यक्ति बिल्कुल भयभीत हो गया और तेज कदमों से कमरे से बाहर निकला और फिर बाहर निकलकर एकदम से गेट की तरफ़, विद्युत इंजन से भी तेज रफ़्तार से दौड़ पड़ा।

ये बात किशोर दा ने प्रीतीश नंदी को १९८५ में दिए गए साक्षात्कार में बताई थी। प्रीतीश नंदी ने जब पूछा कि क्या ये उनका पागलपन नहीं था? तो किशोर का जवाब था कि अगर वो शख्स उस गर्म दुपहरी में वूलेन थ्री पीस पहनने का पागलपन कर सकता हे तो मैं अपने कमरे में जिंदा काँव-काँव करते कौओं को लटकाने का विचार क्यूँ नहीं ला सकता ? ऐसे ही कुछ और किस्से आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

आखिर क्या सोचते थे किशोर, अपने समकालीनों के बारे में ?

लड़कपन से ही किशोर के. एल. सहगल के दीवाने थे। बचपन मे वे अपनी पॉकेटमनी से सहगल साहब के रिकार्ड खरीदा करते थे। सही मायने में वो उनको अपना गुरु मानते थे।जब उन्होंने खुद बतौर गायक काफी ख्याति अर्जित कर ली तो एक संगीत कंपनी ने उनके सामने सहगल के गीतों को गाने का प्रस्ताव रखा। किशोर ने साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था....

" मैं उनके गीतों को और बेहतर गाने की कोशिश क्यूँ करूँ ? कृपया उन्हें हमारी यादों में बने रहने दें। उनके गाये गीत, उनके ही रहने दें। मुझे ये किसी एक शख्स से भी नहीं सुनना कि किशोर ने सहगल से भी अच्छा इस गीत को गाया। "

सहगल का विशाल छायाचित्र हमेशा उनके घर के पोर्टिको की शोभा बढ़ाता रहा। और उसी तसवीर के बगल में रफी साहब की तसवीर भी लगी रहती थी। किशोर, रफी की काबिलियत को समझते थे और उसका सम्मान करते थे। सत्तर के दशक में जब किशोर दा की तूती बोल रही थी, तो उनके एक प्रशंसक ने कह दिया....

"किशोर दा , आपने तो रफी की छुट्टी कर दी।..."

उस व्यक्ति को प्रत्त्युत्तर एक चाँटे के रूप में मिला। किशोर और रफी के फैन आपस में एक दूसरे की कितनी खिंचाई कर लें, वास्तविक जिंदगी में कभी इन महान गायकों के बीच आपसी सद्भाव की दीवार नहीं टूटी।

किशोर और लता जी के युगल गीत काफी चर्चित रहे हैं। इतने सालों के बाद आज भी 'आँधी', 'घर', 'हीरा पन्ना', 'सिलसिला' और 'देवता' जैसी फिल्मों के गीत को सुनने वालों की तादाद में कमी नहीं आई है।
किशोर, लता को अपना सीनियर मानते थे और इसीलिए किसी गीत के लिए उन्हें जितना पैसा मिलता वो उससे एक रुपया कम लेते।
और लता जी, साथ शो करतीं तो तारीफ़ों के पुल बाँध देतीं। हमेशा किशोर को किशोर दा कह कर संबोधित करतीं। ये अलग बात थी कि उम्र में किशोर लता से मात्र एक महिना चौबीस दिन ही बड़े थे।

किशोर और आशा जी को पंचम की धुनों में सुनने का आनंद ही अलग है। अपने एक साक्षात्कार में आशा जी ने कहा था कि
"किशोर एक जन्मजात गायक थे जो गाते समय आवाज़ में नित नई विविधता लाने में माहिर थे। इसीलिए उनके साथ युगल गीत गाने में मुझे और सजग होना पड़ता था, गायिकी में उनकी हरकतों को पकड़ने के लिए।"

किशोर दा भी मानते थे कि उनके चुलबुले अंदाज को कोई मिला सकता है तो वो थीं आशा। इसीलिए कहा करते

"She is my match at mike. "

किशोर कुमार की निजी जिंदगी

किशोर कुमार की पारिवारिक जिंदगी, उनकी शख्सियत जितनी ही पेचीदा रही।
बात १९५१ की है। उस वक्त किशोर मुंबई फिल्म उद्योग में एक अदाकार के तौर पर पाँव जमाने की कोशिश कर रहे थे। इसी साल उन्होंने रूमा गुहा ठाकुरता से शादी की। १९५२ में अमित कुमार जी की पैदाइश हुई। ये संबंध १९५८ तक चला। रूमा जी का अपना एक आकर्षक व्यक्तित्व था। एक बहुआयामी कलाकार के रूप में बंगाली कला जगत में उन्होंने बतौर अभिनेत्री, गायिका, नृत्यांगना और कोरियोग्राफर के रुप में अपनी पहचान बनाई। पर उनका अपने कैरियर के प्रति यही अनुराग किशोर को रास नहीं आया। किशोर ने खुद कहा है कि

"...वो एक बेहद गुणी कलाकार थीं। पर हमारा जिंदगी को देखने का नज़रिया अलग था। वो अपना कैरियर बनाना चाहती थीं और मैं उन्हें एक घर को बनाने वाली के रूप में देखना चाहता था। अब इन दोनों में मेल रख पाना तो बेहद कठिन है। कैरियर बनाना और घर चलाना दो अलग अलग कार्य हैं। इसीलि॓ए हम साथ नहीं रह पाए और अलग हो गए।..."


१९५८ में ये संबंध टूट गया। इससे पहले १९५६ में मधुबाला, किशोर की जिंदगी में आ चुकी थीं। पाँच साल बाद दोनों विवाह सूत्र में बँध तो गए पर किशोर दा के माता-पिता इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं पाए। बहुतेरे फिल्म समीक्षक इस विवाह को 'Marriage of Convenience' बताते हैं। दिलीप कुमार से संबंध टूटने की वजह से मधुबाला एक भावनात्मक सहारे की तालाश में थीं और किशोर अपनी वित्तीय परेशानियों से निकलने का मार्ग ढ़ूंढ़ रहे थे।

पर इस रिश्ते में प्यार बिलकुल नहीं था ये कहना गलत होगा। गौर करने की बात है कि मधुबाला ने नर्गिस की सलाह ना मानते हुए, भारत भूषण और प्रदीप के प्रस्तावों को ठुकरा कर किशोर दा से शादी की। तो दूसरी ओर किशोर ने ये जानते हु॓ए भी कि उनकी होने वाली पत्नी, एक लाइलाज रोग (हृदय में छेद) से ग्रसित हैं, उनसे निकाह रचाया। पर शुरुआती प्यार अगले ९ सालों में मद्धम ही पड़ता गया।
किशोर ने Illustrated Weekly को दिए अपने साक्षात्कार में कहा था...

"...मैंने उन्हें अपनी आँखों के सामने मरते देखा। इतनी खूबसूरत महिला की ऍसी दर्दभरी मौत....! वो अपनी असहाय स्थिति को देख झल्लाती, बड़बड़ाती और चीखती थीं। कल्पना करें इतना क्रियाशील व्यक्तित्व रखने वाली महिला को नौ सालों तक चारदीवारी के अंदर एक पलंग पर अपनी जिंदगी बितानी पड़े तो उसे कैसा लगेगा? मैं उनके चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का अंतिम समय तक प्रयास करता रहा। मैं उनके साथ हँसता और उनके साथ रोता रहा। ..."

पर मधुबाला की जीवनी लिखने वाले फिल्म पत्रकार 'मोहन दीप' अपनी पुस्तक में उनके इस विवाह से खास खुशी ना मिलने का जिक्र करते हैं। सच तो अब मधुबाला की डॉयरी के साथ उनकी कब्र में दफ़न हो गया, पर ये भी सच हे कि किशोर उनकी अंतिम यात्रा तक उनके साथ रहे और जिंदगी के अगले सात साल उन्होंने एकांतवास में काटे। अगर गौर करें तो उनके लोकप्रिय उदासी भरे नग्मे इसी काल खंड की उपज हैं।

१९७६ में उन्होंने योगिता बाली से शादी की पर ये साथ कुछ महिनों का रहा। किशोर का इस असफल विवाह के बारे में कहना था....

"...ये शादी एक मज़ाक था। वो इस शादी के प्रति ज़रा भी गंभीर नहीं थी। वो तो बस अपनी माँ के कहे पर चलती थी। अच्छा हुआ, हम जल्दी अलग हो गए।..."

वैसे योगिता कहा करती थीं कि किशोर ऍसे आदमी थे जो सारी रात जग कर नोट गिना करते थे। ये बात किशोर ने कभी नहीं मानी और जब योगिता बाली ने मिथुन से शादी की, किशोर ने मिथुन के लिए गाना छोड़ दिया। इस बात का अप्रत्यक्ष फ़ायदा बप्पी दा को मिला और मिथुन के कई गानों में उन्होंने अपनी आवाज़ दी।

१९८० में किशोर ने चौथी शादी लीना चंद्रावरकर से की जो उनके बेटे अमित से मात्र दो वर्ष बड़ी थीं। पर किशोर, लीना के साथ सबसे ज्यादा खुश रहे। उनका कहना था..

'...मैंने जब लीना से शादी की तब मैंने नहीं सोचा था कि मैं दुबारा पिता बनूँगा। आखिर मेरी उम्र उस वक़्त पचास से ज्यादा थी। पर सुमित का आना मेरे लिए खुशियों का सबब बन गया। मैंने हमेशा से एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था। लीना ने वो सपना पूरा किया।...

... वो एक अलग तरह की इंसान है । उसने दुख देखा है..आखिर अपने पति की आँख के सामने हत्या हो जाना कम दुख की बात नहीं है। वो जीवन के मूल्य और छोटी-छोटी खुशियों को समझती है। इसीलिए उसके साथ मैं बेहद खुश हूँ।
..."

किशोर को मुंबई की फिल्मी दुनिया और उसके लोग कभी रास नहीं आए। १९८५ में संन्यास का मन बना चुकने के बाद उन्होंने कहा था...

"......कौन रह सकता है इस चालबाज, मित्रविहीन दुनिया में, जहाँ हर पल लोग आपका दोहन करने में लगे हों। क्या यहाँ किसी पर विश्वास किया जा सकता है? क्या कोई भरोसे का दोस्त मिल सकता है यहाँ? मैं इस बेकार की प्रतिस्पर्धा से निकलना चाहता हूँ। कम से कम अपने पुरखों की ज़मीन खंडवा में तो वैसे ही जी सकूँगा जैसा मैं हमेशा चाहता था। कौन इस गंदे शहर में मरना चाहेगा ?......."


दरअसल इस कथन का मर्म जानने के लिए फिर थोड़ा पीछे जाना होगा। किशोर की ये कड़वाहट उनके फिल्म जगत में बिताए शुरु के दिनों की देन है। वे कभी अभिनेता नहीं बनना चाहते थे। चाहते थे तो सिर्फ गाना पर बड़े भाई दादा मुनि का कहना टाल भी नहीं पाए। अभिनय में गए तो सफलता भी हाथ लगी पर गायक के रूप में ज्यादातर संगीत निर्देशकों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। खुद किशोर ने अपनी लाचारी और अपने अजीबोगरीब व्यवहार के बारे में ये सफाई पेश की है...

"...मैं सिर्फ गाना चाहता था। कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि मुझे अभिनय की दुनिया में आना पड़ा। मुझे अभिनय में बिताया अपना का हर एक पल नागवार गुजरा। मैंने कौन-कौन से तरीके नहीं अपनाए इस दुनिया से पीछा छुड़ाने के लिए...अपने संवाद की पंक्तियाँ गलत बोलीं, पागलपन का नाटक किया, बाल मुंडवाए, गंभीर दृश्यों के बीच यूडलिंग शुरु कर दी। मीना कुमारी के सामने वो संवाद बोले, जो किसी दूसरी फिल्म में बीना रॉय को बोलने थे..........पर फिर भी उन्होंने मुझे नहीं छोड़ा और आखिरकार एक सफल नायक बना ही दिया।...."

किशोर ने यहाँ कोई अतिश्योक्ति नहीं की थी। उनके अज़ीबोगरीब हरकतों के कुछ किस्से तो पहले भी यहाँ लिखे जा चुके हैं, अब कुछ की बानगी और लें...

भाई-भाई की शूट में निर्देशक रमन के द्वारा अपने ५००० रुपए देने के लिए अड़ गए। अशोक कुमार के समझाने पर अनिच्छा पूर्वक वो दृश्य करने को तैयार हुए। छोटे से शाँट में उन्हें सिर्फ बड़बड़ाना था और थोड़ी चहलकदमी करनी थी।

तो किशोर ने क्या किया, कुछ दूर चलते ..कलाबाजी खाते और जोर से कहते पाँच हजार रुपया। ऐसी कलाबाजियाँ खाते-खाते वो कमरे के दूसरी तरफ पहुँचे जहाँ एक पहिया गाड़ी खड़ी थी. किशोर उस पर होते हुए सीधे बाहर पहुँचे और एक छलाँग मार कर अपनी गाड़ी पर सवार होकर चलते बने । बाद में रमन ने स्वीकार किया कि वो किशोर को पैसा चुका पाने की हालत में नहीं थे।

एक निर्माता को तो उन्होंने इतना परेशान किया कि वो उनके खिलाफ़ कोर्ट से सम्मन ले आए कि किशोर उनके आदेशानुसार ही काम करेंगे।
नतीजा ये हुआ कि सेट पर अपनी कार से उतरने के पहले भी वो निर्माता का आदेश मिलने के बाद ही उतरते। एक बार वो शूटिंग के दौरान गाड़ी को लेते हुए खंडाला चले गए, तुर्रा ये कि डॉयरेक्टर ने शॉट के बाद 'कट' नहीं बोला तो मैं क्या करता...

पर ये सब उन्होंने सिर्फ फिल्मी दुनिया से निकलने के लिए किया ऐसा भी नहीं था। कुछ बचपना कह लें और कुछ उनके खुराफाती दिमाग का फ़ितूर, अपनी निजी जिंदगी में उन्होंने अपनी इमेज को ऍसा ही बनाए रखा।

उनसे जुड़ी कहानियाँ खत्म होने का नाम नहीं लेतीं। शयनकक्ष में खोपड़ी की आँखों से निकलती लाल रोशनी, ड्राइंग रूम में उल्टी पड़ी कुर्सियाँ, मेहमानों पर उनके इशारों पर भौंकते कुत्ते, गौरीकुंज के अपने आवास के बाहर लगा बोर्ड,

Beware of Kishore Kumar !

उनके मिज़ाज की गवाही देता है।

पर इतना सब जानते हुए भी उनके करीबी उनके बारे में अलग ही राय रखते थे। साथी कलाकार महमूद का कहना था

"....वो ना तो सनकी थे ना ही कंजूस, जैसा कि कई लोग सोचते हैं। वास्तव में वो एक जीनियस थे। वो राज कपूर के बड़बोले रुप थे, एक हरफनमौला जिसे सिनेमा के हर पहलू की जानकारी थी और जिसे हो हल्ला मचाकर लोगों की नज़रों में बने रहने का शौक था।....."


वहीं अभिनेत्री तनुजा का मानना था
"......मुझे समझ नहीं आता कि वो पागलपन का मुखौटा क्यूँ लगाए रहते थे?
शायद, एक आम इंसान की तरह वो दुनिया से अपने अक़्स का कुछ हिस्सा छुपाना चाहते थे। जब वो अच्छे मूड में रहते तो अपने चुटकुलों से हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देते थे। ...."

संगीत निर्देशक कल्याण का कहना था

"....किशोर मूडी इंसान थे, पर मैं समझता हूँ कि किसी कलाकार को ये छूट तो आपको देनी ही होगी। उनसे कुछ करवाने के लिए मुझे बच्चों जैसा व्यवहार करना पड़ता था। सो मैं जो उनसे चाहता ठीक उसका उलटा बोलता।...."

किशोर के जीवन वृत को पत्रकार कुलदीप धीमन ने एक अच्छा सार दिया है। कुलदीप कहते हैं...

".....शुरुआती दौर में अपनी बतौर गायक पहचान बनाने के क्रम में मिली दुत्कार ने उनके दिल में वो ज़ख्म किए जो वक़्त के साथ भर ना पाए और जिन्होंने उन्हें एकाकी बना डाला। पर उनके अंदर का खुराफ़ाती बच्चा कभी नहीं मरा। यही वज़ह रही कि प्रशंसक और दोस्तों को उनकी कोई स्पष्ट छवि बनाने में दुविधा हुई। सामान्यतः हम जीवन में श्वेत श्याम किरदार देखने के आदि हैं पर किशोर की जिंदगी में स्याह रंग की कई परते थीं जिन्होंने उनके चरित्र को जटिल बना दिया था.... "

१९८७ में हृदयगति रुक जाने की वजह से उनकी मृत्यु हो गई।

वैसे तो इस श्रृंखला के दौरान मैंने आपको किशोर के अपने दस पसंदीदा उदासी भरे नग्मे सुनाए थे। आज उनमें से एक गीत है १९६५ की फिल्म "श्रीमान फंटूश" का जिसके बोल लिखे आनंद बख्शी ने और धुन बनाई लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की जोड़ी ने।

ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना ज़माना
मैं हूँ एक पागल प्रेमी, मेरा दर्द न कोई जाना

मुझे ये गाना बेहद पसंद है और इसका मुखड़ा तो कुछ-कुछ किशोर दा के जीवन की कहानी कह देता है। क्या गायिकी थी और कितनी मीठी धुन कि वर्षों पहले सुने इस गीत को गाते वक्त मन खुद-बा-खुद उदास हो जाता है।


किशोर दा की आवाज़ में आप इस मधुर गीत को यहाँ सुन सकते हैं।


इस श्रृंखला को छोटी छोटी प्रविष्टियों में आप यहाँ पढ़ सकते हैं....

  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़
  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार
  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'
  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है
  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना
  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में
  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त

सोमवार, जुलाई 26, 2010

लता ,ख़य्याम, नक़्श ल्यालपुरी की त्रिवेणी से निकला फिल्म दर्द का बेमिसाल संगीत... Ahl E Dil Yun Bhi Nibha Lete Hain..

बात अस्सी के दशक के शुरुआत की है जब राजेश खन्ना और हेमा जी की एक फिल्म आई थी नाम था दर्द। फिल्म के संगीतकार थे ख़य्याम साहब और इसके गीतों के बोल लिखे थे नक्श ल्यालपुरी ने। वैसे तो पूरी फिल्म का संगीत लोकप्रिय हुआ था पर आज इस पोस्ट में अपनी पसंद के दो गीतों या यूँ कहें कि एक गीत व एक ग़ज़ल का जिक्र करना चाहूँगा जिन्हें सुनना हमेशा से मन में एक अलग सा जादू जगाता रहा है।।


खासकर प्रेम के रंग से रससिक्त इस गीत की तो बात ही निराली है। मुखड़े या इंटरल्यूड्स में ख़य्याम साहब का म्यूजिकल अरेंजमेंट,लता की नर्म,सुरीली और भावों में डूबती आवाज़ या फिर नक्श ल्यालपुरी के खूबसूरत बोल हों सब मिल कर इस गीत को एक अलग ही धरातल पर ले जाते हैं। इस गीत को मैं लता जी द्वारा अस्सी के दशक में गाए नायाब गीतों में शुमार करता हूँ।

एक संगीतकार के रूप में ख़य्याम साहब ने चालिस साल से ऊपर के अपने कैरियर में मात्र पचास से कुछ ज्यादा फिल्में कीं पर संगीत की गुणवत्ता से कभी कोई समझौता नहीं किया। अपनी फिल्मों के लिए वो अक्सर ऐसे गीतकारों को लेते थे जिनमें काव्यात्मक प्रतिभा भरी हो। इसलिए उनकी फिल्मों में गीतकार के रूप में आप किसी नामी कवि या शायर को ही पाएँगे। अब इसी फिल्म दर्द को लें जिसके गीत उन्होंने नक़्श ल्यालपुरी से लिखवाए।

ये वही नक़्श ल्यालपुरी हैं जिन्होंने फिल्म घरौंदा का गीत मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है (जो मुझे बहुत बहुत पसंद है) लिखा था। वैसे उनके नाम से ये तो ज़ाहिर है कि वे ल्यालपुर से ताल्लुक रखते थे जो पाकिस्तान के पूर्वी पंजाब में पड़ता था। पर उनका असली नाम नक़्श ल्यालपुरी ना होकर जसवंत राय था। रेडिओ पर अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि उनके उर्दू शिक्षक, पुस्तिकाओं के पीछे लिखी उनकी शायरी से इतने प्रभावित थे कि पिछली कक्षा की सारी पुस्तिकाओं को अपने पास रखवा लेते थे। आज़ादी के बाद वे लखनऊ आ गए और कुछ सालों वहाँ बिताने के बाद मुंबई में डाक तार विभाग में नौकरी कर ली। पर एक शायर का मन दिन भर रजिस्ट्री करने में कहा रमता। सो मित्रों की मदद से पहले उन्होंने नाटकों में लिखना शुरु किया और फिर फिल्मों में चले आए।

तो आइए सुनें नक्श साहब वल्द 'जसवंत राय' का लिखा और लता का गाया ये प्यारा सा नग्मा


न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया
खिला गुलाब की तरह मेरा बदन
निखर निखर गई, सँवर सँवर गई
निखर निखर गई, सँवर सँवर गई
बना के आईना तुझे, ऐ जानेमन

न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया

बिखरा है काजल फिज़ा में, भीगी भीगी है शामे
बूँदो की रिमझिम से जागी आग ठंडी हवा में
आ जा सनम, यह हसीं आग हम ले दिल में बसा
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया, खिला गुलाब...

न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया...
आँचल कहाँ, में कहाँ हूँ, ये मुझे होश क्या है
यह बेखुदी तूने दी है, प्यार का यह नशा है
सुन ले ज़रा साज़ ऐ दिल गा रहा है नग्मा तेरा
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया, खिला गुलाब...
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया...

कलियों की ये सेज महके, रात जागे मिलन की
खो जाए धड़कन में तेरी, धड़कनें मेरे मॅन की
आ पास आ, तेरी हर साँस में, मैं जाऊँ समा
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया.....जानेमन
न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया...

ख़य्याम साहब ने इस फिल्म में नक़्श ल्यालपुरी से एक नहीं बल्कि दो शीर्षक गीत लिखवाए। जहाँ गीत प्यार का दर्द है मीठा मीठा प्यारा प्यारा.. फिल्म के नौजवान किरदारों पर फिल्माया गया वहीं दूसरा गीत जिसे फिल्मी ग़ज़ल कहना ज्यादा उपयुक्त होगा पुरानी पीढ़ी के किरदारों पर फिल्माया गया। और कमाल की बात ये कि दोनों ही गीत लोकप्रिय हुए। पर इन दोनों नग्मों में मुझे ये ग़ज़ल ज्यादा पसंद आती है। इस ग़ज़ल के दो टुकड़े हैं एक में लता जी का स्वर है तो दूसरे में भूपेंद्र का। जब भी इस ग़ज़ल को सुनता हूँ लता जी की आवाज़ की कशिश और नक़्श ल्यालपुरी के सहज बोल एक बार फिर समा बाँध देते हैं।

 

अहले दिल यूँ भी निभा लेते हैं
दर्द सीने में छुपा लेते हैं

दिल की महफ़िल में उजालों के लिये
याद की शम्मा जला लेते हैं

जलते मौसम में भी ये दीवाने
कुछ हसीं फूल खिला लेते हैं

अपनी आँखों को बनाकर ये ज़ुबाँ
कितने अफ़साने सुना लेते हैं

जिनको जीना है मोहब्बत के लिये
अपनी हस्ती को मिटा लेते हैं

वहीं भूपेंद्र गीत के मूड को दो और अशआरों में बरकरार रखते हैं..

जख्म जैसे भी मिले जख़्मों से
दिल के दामन को सजा लेते हैं

अपने कदमों पे मोहब्बतवाले
आसमानों को झुका लेते हैं

तो आइए सुनें भूपेंद्र की आवाज़ में इस गीत का ये टुकड़ा....




आप जरूर सोच रहे होंगे कि आजकल नक़्श ल्यालपुरी जी क्या कर रहे हैं । आज का तो पता नहीं पर उन्होंने अंतिम बार 2005 में नौशाद की आखिरी फिल्म ताजमहल के लिए कुछ गीत लिखे थे। फिल्मों में अब वे काम करना नहीं चाहते क्यूँकि वे मानते हैं कि अब उनके लायक काम आता ही नहीं। कुछ साल पहले तक वे टीवी सीरियल की पटकथाओं को लिखकर अपना काम चला रहे थे।

बुधवार, जुलाई 21, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़लों का सफ़र भाग 5 : आरंभिक दौर, दि अनफॉरगेटेबल और अमीर मीनाई की वो यादगार ग़ज़ल ...

जगजीत सिंह ने ग़ज़ल गायिकी में जिस मुकाम को छुआ वो उन्हें आसानी से मिला हो ऐसी बात नहीं है। एक बेहद बड़े परिवार से ताल्लुक रखने वाले जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह धीमन एक सरकारी मुलाज़िम थे और वे चाहते थे कि उनका पुत्र प्रशासनिक सेवा में जाए। पर जगजीत जी को संगीत में बचपन से ही रुचि थी। पिता उनकी इस रुचि में आड़े नहीं आए। श्री गंगानगर में श्री छगनलाल शर्मा से आरंभिक शिक्षा लेने के बाद जगजीत जी ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद ज़माल खाँ से ली।


विज्ञान से इंटर करने के बाद वो जालंधर चले आए। यहीं कॉलेज के कार्यक्रमों में वो हिस्सा लेने लगे। जगजीत जी के साक्षात्कारों में मैंने उन्हें ये कहते सुना है कि ऐसे ही एक कार्यक्रम में जब उन्होंने गाना खत्म किया तो लोग उनकी गायिकी से इतने अभिभूत हो गए कि उन्हें रोक कर पैसे देने लगे। उन छोटे छोटे नोटों को जगजीत जी शायद ही कभी भूल पाएँ क्यूँकि श्रोताओं से मिले इस प्यार ने उनके मन में एक ऍसे सपने का संचार कर दिया था जिसको पूरा करने के लिए उन्होंने काफी मेहनत की।

1965 में वो मुंबई पहुँचे। शुरुआती दिन बड़े कठिनाई भरे थे। विज्ञापनों के जिंगल, शादियों और फिल्मी पार्टियों में जहाँ भी गाने के लिए उन्हें न्यौता मिला उन्होंने अस्वीकार नहीं किया। संघर्ष के इन ही दिनों में उनकी मुलाकात चित्रा जी से हुई और 1969 में उन्होंने उनसे विवाह कर लिया। सत्तर के दशक में जब भी कोई ग़ज़लों की बात करता था, सब की जुबाँ पर नूरजहाँ, बेगम अख़्तर, के एल सहगल, तलत महमूद और महदी हसन जैसे कलाकारों का नाम आता था। तब ग़ज़ल गायिकी का अपना एक अलग शास्त्रीय अंदाज़ हुआ करता था पर ये भी था कि तबकी ग़ज़ल गायिकी आम अवाम से कहीं दूर कुछ निजी महफ़िलों की शोभा बनकर ही सीमित हो गई थी।

जगजीत सिंह की दूरदर्शिता का ही ये कमाल था कि उन्होंने इस दूरी को समझा और ग़जलों के साथ एक नए तरह के संगीत, हल्के बोलों और ग़ज़लों में मेलोडी का पुट भरने की कोशिश की और उसे जनता ने हाथों हाथ लिया। 1976 में उनका रिलीज़ हुए एलबम The Unforgettable का नीले रंग का कैसेट कवर मुझे आज तक याद है। यूँ तो इस एलबम की तमाम ग़ज़लें और नज़्में चर्चित हुई थीं। पर इस एलबम को यादगार बनाने में मुख्य भूमिका रही थी अमीर मीनाई की ग़ज़ल सरकती जाए है रुख से.. और एक उतनी ही संवेदनशील नज़्म से।

पर इनकी बात करने से पहले बातें इस एलबम की कुछ अन्य ग़ज़लों की जिनके कुछ अशआरों को गुनगुनाने में अब भी वही आनंद आता है जो तब आया करता था। मिसाल के तौर पर जिग़र मुरादाबादी की इस ग़ज़ल को लें। क्या दिल का दर्द जुबाँ तक आता नहीं महसूस होता आपको?

दर्द बढ कर फुगाँ1 ना हो जाये
ये ज़मीं आसमाँ ना हो जाये
1. आर्तनाद

दिल में डूबा हुआ जो नश्तर2
है
मेरे दिल की ज़ुबाँ ना हो जाये
2. खंजर

फिर तारिक़ बदायुँनी के कलाम को चित्रा ने इस करीने से गाया है कि कानों में संगीत की शमा खुद ब खुद जल उठती है

इक ना इक शम्मा अँधेरे में जलाए रखिए
सुबह होने को है माहौल बनाए रखिए


जिन के हाथों से हमें ज़ख्म-ए-निहाँ 3पहुँचे हैं

वो भी कहते हैं के ज़ख्मों को छुपाये रखिये

3. छुपे हुए जख़्म

चित्रा जी की गाई सुदर्शन फाक़िर की ग़ज़ल के ये अशआर भी मुझे हमेशा याद रहते हैं

किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझको अहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


मेरे रुकने से मेरी साँस भी रुक जाएँगी

फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


पर जब बात सरकती जाए.... की आती है तो मूड पहले चाहे जैसा भी रहे एकदम से बदल जाता है। जगजीत जी की ये ग़ज़ल उनके एलबम में तो थी ही, अपनी कान्सर्ट्स में भी वो इसे बड़ी तबियत से गाते थे। मेरे पास उनका रॉयल अलबर्ट हॉल में गाया हुआ वर्सन भी है जिसमें वो अमीर मीनाई की ग़ज़ल की शुरुआत के पहले ये प्यारा सिलसिला शुरु करते थे...

मज़ारे कैस पर जब रुह-ए-लैला एक दिन आई
तो अरमानों के मुरझाए हुए कुछ फूल भी लाई

लगी जब फूल रखने तो कब्र से आवाज़ ये आई

चढ़ाना फूल जानेमन मगर आहिस्ता आहिस्ता


और उसके बाद शुरु होती थी अमीर मीनाई साहब की ग़ज़ल जिसके चार अशआरों को गाकर ही जगजीत मन में ऐसा जादू जगाते थे कि दिल सचमुच में बाग बाग हो जाता था। जगजीत खुद मानते हैं कि ये पहली ग़ज़ल थी जिसकी वज़ह से लोग उन्हें पहचानने लगे।



सरकती जाये है रुख़4 से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता

निकलता आ रहा है आफ़ताब5 आहिस्ता आहिस्ता

4. चेहरे, 5. सूरज

जवाँ होने लगे जब वो तो हमसे कर लिया परदा
हया यकलख़्त6 आई और शबाब आहिस्ता आहिस्ता

6. तुरंत

शब-ए-फ़ुर्क़त7 का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब, आहिस्ता आहिस्ता

7. वियोग की रात

लाइव कानसर्ट में जगजीत ने इस मक़ते के एक अलग ही मिज़ाज का जिक्र किया था। जगजीत का कहना था कि दूसरे मिसरे में 'हुज़ूर' और 'जनाब' के प्रयोग में वही अंतर है जो कि लखनऊ और पंजाब के अदब में। जगजीत ने जिस अंदाज़ में ये अंतर गाकर समझाया है उसे सुनकर आप मुस्कुराया बिना नहीं रह पाएँगे..

वो बेदर्दी से सर काटें ‘अमीर’ और मैं कहूँ उनसे
हुज़ूर आहिस्ता आहिस्ता जनाब आहिस्ता आहिस्ता



इस ग़ज़ल में अमीर मीनाई के चंद शेर और हैं जिन्हें जगजीत जी ने गाया नहीं है।

सवाल-ए-वस्ल8 पे उनको उदू9 का खौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

8.मिलने की बात पर, 9. प्रतिद्वंदी


हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क है इतना
इधर तो जल्दी-जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता


वैसे इस ग़ज़ल से तो आप वाकिफ़ होंगे ही पर ये बताएँ कि इसके शायर अमीर मीनाई के बारे में आप कितना जानते हैं? अक्सर हम इन लाज़वाब ग़जलों को लिखने वालों को अपनी याददाश्त से निकाल देते हैं। पर अगर ऐसी ग़ज़लें लिखी ही नहीं जातीं तो जगजीत जैसे महान फ़नकार हम तक इन्हें पहुँचाते कैसे? तो चलिए जानें अमीर साहब के बारे में।

अमीर मीनाई की पैदाइश 1826 में लखनऊ में हुई थी । जनाब मुजफ्फर अली असीर की शागिर्दी में उनकी काव्यात्मक प्रतिभा का विकास हुआ। 1857 के विद्रोह के बाद वे रामपुर चले गए जहाँ पहले वे नवाब यूसुफ अली खाँ और फिर कलब अली खाँ के दरबार में रहे। उनकी अधिकांश कृतियाँ इसी कालखंड की हैं।

अमीर मीनाई की शायरी को जितना मैंने पढ़ा है उसमें मुझे मोहब्बत और रुसवाई का रंग ही ज्यादा नज़र आया है। उनके लिखे कुछ अशआर पे गौर करें

जब़्त कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी ना सकूँ

बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझको

ये वो किस्मत का लिखा है कि मिटा भी ना सकूँ

ऐसा ही कुछ रंग यहाँ भी दिखता है

कह रही है हस्र में वो आँख शरमाई हुई
हाए कैसे इस भरी महफिल में रुसवाई हुई

मैं तो राज ए दिल छुपाऊँ पर छिपा रहने भी दे
जान की दुश्मन ये ज़ालिम आँख ललचाई हुई

गर्द उड़ी आशिक़ की तुरबत से तो झुँझला के कहा
वाह सर चढ़ने लगी पाँव की ठुकराई हुई

अमीर साहब की शायरी के दो संकलन 'मराफ़ उल गजब' और 'सनम खान ए इश्क़' बताए जाते हैं। उन्होंने एक उर्दू शब्दकोष भी बनाया जो किसी वज़ह से प्रकाशित नहीं हो पाया। रामपुर के नवाबों के इंतकाल के बाद अमीर, हैदराबाद में निज़ाम के दरबार में चले गए। पर हैदराबाद की आबोहवा उन्हें रास नहीं आई और 1900 में वे चल बसे।

जगजीत की जिस दूसरी पेशकश की वज़ह से ये एलबम कभी ना भूलने वाला बन गया है उसकी चर्चा करेंगे अगली पोस्ट में...

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

'एक शाम मेरे नाम' पर प्रस्तुत कविताओं से जुड़ी प्रविष्टियों की लिंकित सूची

इस चिट्ठे पर प्रस्तुत लेखों को आप सुगमता से खोज सकें इसके लिए एक सिलसिला जारी है - विषय आधारित प्रविष्टियों की एक लिंकित सूची बनाने का। आज इस कड़ी में बारी है इस चिट्ठे पर प्रस्तुत कविताओं से जुड़ी प्रविष्टियों की।

मेरी पसंद की कविताओं को समर्पित इस पृष्ठ की शुरुआत के लिए मुझे गोपाल दास 'नीरज' की इन पंक्तियों से बेहतर कोई पंक्ति नहीं लगती..

कविता एक चिड़िया है
जो अपना घोंसला तो
पेड़ की ऊँची से ऊँची शाख पर बनाती है
लेकिन जो अपना भोजन
धरती के गन्दे से गन्दे कोने में खोजती है !

इसलिए,
हे संसार के महापुरुषों !
कविता मत करो
क्योंकि सृजन के लिए
उसके साथ
तुम्हें भी जमीन की
गंदगियों में उतरना पड़ेगा।

काव्य चर्चा



मेरी प्रिय कविताएँ

  1. आँख का आँसू.....अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिओध (Aankh ka Aansoo by Ayodhya Singh Upadhyay 'Hariodh')'
  2. अमौसा का मेला .. कैलाश गौतम (Amousa Ka Mela... by Kailash Goutam)
  3. आराम करो...गोपाल प्रसाद व्यास (Aaraam Karo... by Gopal Prasad Vyas)
  4. इक जरा छींक ही दो तुम...गुलज़ार (Ek Jara Cheenk Hi Do Tum... by Gulzar)
  5. इंतजार, इंतजार, बोलो कब तक करूँ मैं इंतजार ?...प्रसून जोशी (Intezar..Intezar... by Prasoon Joshi)
  6. इस बार नहीं ..प्रसून जोशी (Is Baar Nahin by Prasoon Joshi)
  7. एक दीपक किरण-कण हूँ...डा. राम कुमार वर्मा (Ek Deepak Kiran Kan Hoon by Dr. Ram Kumar Verma)
  8. क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?...हरिवंशराय बच्चन (Kya Karoon Samvedna Le Kar Tumhari by 'Bachchan'
  9. कौन सा मौसम लगा है ..दर्द भी लगता सगा है....अज्ञात (Koun sa Mousam Laga Hai... by Unknown)***
  10. कविराजा कविता के मत अब कान मरोड़ो कवि भरत व्यास उनके ख़ुद के स्वर में (Kavita ke Ab Mat Kaan Marodo... by Bharat Vyas)
  11. खोलो प्रियतम खोलो द्वार... डा. राम कुमार वर्मा (Kholo Priytam Kholo Dwar... by Dr. Ram Kumar Verma)
  12. चार विचार...गोपालदास 'नीरज ' (Char Vichaar by Gopaldas 'Neeraj')
  13. छिप छिप अश्रु बहाने वाले...गोपालदास 'नीरज' (Chip Chip Ashru Bahane Wale.. by Gopaldas 'Neeraj')
  14. जले तो जलाओ गोरी..इब्ने इंशा (Jale To Jalao Gori by Ibne Insha)
  15. जो तुम आ जाते एक बार ! ...महादेवी वर्मा (Jo Tum Aaa Jate Ek Baar... by Mahadevi Verma )
  16. तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन.....जयशंकर प्रसाद, स्वर आशा भोंसले (Tumul Kolahal.. ....by Jayshankar Prasad)
  17. दीवट(दीप पात्र) पर दीप....बालकवि बैरागी (Deevat par Deep.... by Balkavi Bairagi)
  18. नर हो ना निराश करो मन को... मैथलीशरण गुप्त (Nar Ho Na Nirash Karo Man Ko by Maithilisharan Gupt
  19. फिर क्या होगा उसके बाद ? ....बालकृष्ण राव (Phir Kya Hoga Uske Baad... by Balkrishna Rao
  20. बीती विभावरी जाग री! ...जयशंकर प्रसाद (Beeti Vibhavri Jaag Ree.... by Jayshankar Prasad
  21. ब्रह्म से कुछ लिखा भाग्य में...रामधारी सिंह 'दिनकर'(Brahma Se Kuch Likha Bhagya Mein... by 'Dinkar')
  22. मधुशाला की चंद रुबाइयाँ ..हरिवंशराय बच्चन, स्वर - मन्ना डे भाग १ , भाग २ (Madhushala by 'Bachchan')
  23. मैं एक अघोषित पागल हूँ..रामदत्त जोशी (Main Ek Aghoshit Pagal Hoon by Ramdutt Joshi)
  24. मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़...हरिवंशराय बच्चन, स्वर - अमिताभ बच्चन (Main Hoon Unke Sath Khadi... by 'Bachchan')
  25. मोड़ पर देखा है वो बूढ़ा सा पेड़ कभी.. गुलज़ार (Humdum by Gulzar)
  26. ये गजरे तारों वाले?...डा. राम कुमार वर्मा (Ye Ghazre Taron Wale.... by Dr. Ram Kumar Verma)
  27. रेलयात्रा..प्रदीप चौबे (Railyatra by Pradeep Choubey)
  28. सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी...कैलाश गौतम (Ganhi Jee.... by Kailash Goutam)
  29. हिमालय मेरे नगपति ! मेरे विशाल !..... रामधारी सिंह दिनकर (Himalaya by 'Dinkar')

कभी कभी जब कलम चलाता हूँ मैं


  1. कल्पना और यथार्थ
  2. शाम...

सोमवार, जुलाई 12, 2010

जगजीत सिंह की गाई ग़ज़लों का सफर भाग 4 :आइए मिलवायें आपको कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' की शायरी से

जगजीत जी की ग़ज़लों की इस श्रृंखला का अगला मुकाम यूँ तो उनका पहला एलबम दि अनफॉरगेटेबल (The Unforgettable) था पर कल जब उस एलबम की एक चहेती ग़ज़ल को दोबारा सुन रहा था तो उसके शायर का नाम मुझे अनजाना सा लगा। सहज उत्सुकता जगी कि उनकी लिखी कुछ और ग़ज़लें सुनी और पढ़ी जाएँ। अंतरजाल पर उनके क़लाम सुने तो उर्दू जुबाँ पर उनकी पकड़ और मंच पे शेर पढ़ने के सलीके ने इस क़दर प्रभावित किया कि लगा कि मेरी अगली पोस्ट तो सिर्फ उन पर लिखी जा सकती है खासकर तब जबकि अंतरजाल पर उनकी शायरी के बारे में ज्यादा कुछ लिखा नहीं गया है। ये शायर थे जनाब कुँवर मोहिंदर सिंह बेदी 'सहर' ।

बेदी साहब दिल्ली की प्रशासनिक सेवा में एक आला अफ़सर थे। सत्तर और अस्सी के दशक और उसके बाद भी मुशायरों के संचालन में वो सिद्धस्थ माने जाते थे। जगजीत सिंह ने अपने एलबमों में उनकी हल्की फुल्की पर असरदार ग़ज़लों का ही इस्तेमाल किया है। इन ग़ज़लों की भाषा बिल्कुल सहज है और आसानी से बिना किसी उर्दू ज्ञान के समझ आती है। यही कारण है अस्सी के दशक जब तेरह चौदह साल का रहा हूँगा तो पहली बार उनकी ये ग़ज़ल जगजीत चित्रा की प्यारी आवाज़ में सुनी थी । क्या संगीत क्या गायिकी सब कुछ मन में रच बस गया था।



आए हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग

दैर-ओ-हरम1 में चैन जो मिलता
क्यूं जाते मैखाने2 लोग

1. मंदिर मस्जिद, 2. शराबखाना

जान के सब कुछ कुछ भी ना जाने
हैं कितने अनजाने लोग

वक़्त पे काम नहीं आते हैं
ये जाने पहचाने लोग

अब जब मुझको होश नहीं है
आए हैं समझाने लोग

बेदी साहब की लिखी ग़ज़लों से दूसरी मुलाकात सन 2002 में तब हुई जब जगजीत जी ने उनकी लिखी ग़ज़लों को एलबम के तौर पर पेश कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने इस एलबम का नाम 'Forget Me Not' रखा था। ये नाम बेदी जी की यादों से जुड़ा तो था ही पर साथ ही जगजीत जी ने इसे इसलिए भी चुना कि पहाड़ों पर इसी नाम का एक खूबसूरत फूल भी पाया जाता है। एलबम का मूड रोमांटिक था। एलबम की आठ ग़ज़लों में दो मुझे खास पसंद आई थीं। जगजीत की आवाज़ में जरूर सुना होगा इसे आपने

तुम हमारे नही तो क्या गम है
हम तुम्हारे तो हैं यह क्या कम है

मुस्कुरा दो ज़रा ख़ुदा के लिए,
शाम-ए-महफिल में रौशनी कम है,

पर रूमानियत का पूरा तड़का बेदी साहब की इस ग़ज़ल में उभर कर आया था। आप भी गौर फ़रमाइए ना लफ़्ज़ों की इस मुलायमियत पर

अभी वो कमसिन उभर रहा है, अभी है उस पर शबाब आधा
अभी जिगर में ख़लिश है आधी, अभी है मुझ पर एतमाद1 आधा

मेरे सवाल-ए-वस्ल2 पर तुम नज़र झुका कर खड़े हुए हो
तुम्हीं बताओ ये बात क्या है, सवाल पूरा, जवाब आधा

कभी सितम है कभी करम है, कभी तवज़्जह3 कभी तगाफ़ुल4
ये साफ ज़ाहिर है मुझ पे अब तक, हुआ हूँ मैं कामयाब आधा
1. विश्वास, 2. मिलने की बात पर, 3.ध्यान देना , 4. उपेक्षा

पर जगजीत की इन रूमानी ग़ज़लों से दूर मुशायरों में बेदी साहब को जो रूप उभर कर सामने आता है वो सर्वथा अलग है। उनकी मुशायरों की रिकार्डिंग सुन कर आपको ऐसा लगेगा मानो मुगले आज़म में जनाब पृथ्वीराज कपूर को सुन रहे हों। गहरी आवाज़ के साथ उर्दू और फारसी जुबाँ का उनका उच्चारण मन को मोहता तो था ही, मंच पर उनका हास्य बोध देखते ही बनता था। अब उनकी इस ग़ज़ल को देखिए। जहाँ भी मुशायरों में वो इसका मकता पढ़ते , मंच और श्रोता में हँसी की लहर दौड़ जाती..



मोहब्बत अब रुह -ए-ख़मदार* भी है

ये एक चलती हुई तलवार भी है
*झुकी हुई

मोहब्बत एक ऐवान*-ए-तमन्ना
मगर गिरती हुई दीवार भी है
* भव्य इमारत

दीवाना इश्क़ किंच-ए-गराँ है
इसी से गर्मी-ए-बाज़ार भी है

अज़ब तुरफ़ा* तमाशा है'सहर' भी
वो शायर है मगर सरदार भी है
*विलक्षण


पर इस अज़ीम शायर का ये हास्य बोध मंच तक सीमित ना था। बेदी साहब ने मज़ाहिया शायरी भी लिखी हैं। कल ही हम सबने विश्व जनसंख्या दिवस मनाया। बढ़ती आबादी की इस समस्या पर बेदी साहब की कलम हल्के मूड में ही सही पर खूब चली है। मुझे यक़ीन है कि उनकी इस नज़्म को पढ़ कर आपके चेहरे पे एक मुस्कान जरूर खिल उठेगी और साथ ही साथ जो संदेश वो देना चाहते हैं वो भी आप तक पहुँचेगा...


ऐ नौजवान बज़ा कि जवानी का दौर है
रंगीन सुबह शाम सुहानी का दौर है
ये भी बज़ा कि प्रेम कहानी का दौर है
लेकिन रहे ये याद गरानी1 का दौर है
1.मँहगाई

जाँ का उबाल बशर्ते औलाद बन ना जाए
तादे शबाब आपकी बेज़ार1 बन ना जाए
वो जो अधेड़ उम्र हैं उनसे भी है ख़िताब2
बच्चे हैं एक दो तो ठहर जाइए ज़नाब
बेबा नहीं है आप को मसनूई3 आबो‍-ताब4
जब ढल चुका शबाब तो बेकार है खिज़ाब5
करते हैं आप पेश ये उलटी मिसाल क्यूँ
बासी कढ़ी को आया अब आख़िर उबाल क्यूँ

1.दुख, 2.संबोधन,3.बनावटी, 4. शान-ओ-शौकत 5. बालो को रँगना

ह्व्वा की बेटियाँ भी सुने मेरी बात को
मुमकिन नहीं कि पाल सकें पाँच सात को
जन्म भी लिए तो रोएँगे वो दाल भात को
तरक़ीब इस लिए सुनें जब भी रात को
देखे बुरी नज़र से मियाँ आपकी तरफ़
सो जाएँ आप फेर के मुँह दूसरी तरफ़

अच्छा है जो हो बीवी और शौहर में तालमेल
लेकिन ना इस क़दर कि हो बच्चों की रेलपेल
हर साल नौनिहाल की डालो ना दाग़ बेल
आख़िर अगर हो वक़्त तो खेलो कुछ और खेल
इस बात पर किया है कभी तुमने गौर भी
मर्दानगी दिखाने के मैदाँ हैं और भी

बेदी साहब ने इबादत और राजनीतिक मसलों को भी अपनी शायरी का विषय बनाया। वे मुशायरों में अक्सर 'नात' भी सुनाते थे।


लोग प्रश्न करते थे कि एक सरदार होकर भी ये पैगंबर मोहम्मद की इबादत में शायरी क्यूँ कर रहा है? बेदी साहब का जवाब होता।

इश्क़ हो जाए किसी से कोई चारा तो नहीं
सिर्फ मुस्लिम का मोहम्मद से इजारा* तो नहीं
*अधिकार

ज़ाहिर है गंगा जमुनी तहज़ीब में पले बढ़े बेदी साहब को हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आपसी संबंधों की खटास का दुख हमेशा सालता रहा। दोनों देशों के लोगों के दिलों को जोड़ने के लिए उन्होंने एक लंबी नज़्म लिखी जो बेहद मशहूर हुई थी। पूरी नज़्म तो आप वीडिओ में देख सकते हैं।



पर इसकी कुछ पंक्तियाँ जो मुझे बेहद पसंद हैं आप तक पहुँचा रहा हूँ

जंग हम कहते हैं जिसको ये ख़ुदा की मार है
जंग करना हर तरह बेसूद है बेकार है
दोस्त दुश्मन सब से बेगाना बना देती है जंग
मुल्क है क्या चीज़ तहज़ीबें मिटा देती हैं जंग

जंग करना है करें हम मिल के बेकारी से जंग
झूठ से मकरुरिया से, चोरबाज़ारी से जंग
क़ैद से, सैलाब से, तूफाँ से, बीमारी से जंग
भूख से, .... से, ग़ुरबत1 से, नादारी2 से जंग
पूछना होगा ये मुझको हिंदो पाकिस्तान से
पेट भूखों का भरेंगे जंग के सामान से
1.पराधीनता,2.गरीबी,

आओ दिल से दूर कर दें हम शरार1-ए-इंतकाम
आओ फिर दुनिया को पहुँचा दें मोहब्बत का पयाम2
रह सके अमनों सुकूँ से शाद3 हो अपने अवाम4
ऐसे वीराने करम पहुँचे तुम्हे मेरा सलाम
हाल ओ मुस्तक़्बिल5 हो अपना ताबदार6 और तामनाक
हिन्द ओ पाइन्दाबाद है सरजमीने हिंदोपाक
1.चिंगारी, 2.संदेश,3.सुखी 4.आम जन, .5.भविष्य , 6. चमकदार

जगजीत सिंह साहब का अहसानमंद हूँ जिनकी वज़ह से कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी की शायरी के ख़जाने तक पहुँच सका। आप में से बहुत लोग ऐसे होंगे जो बेदी साहब की शायरी को और करीब से जानते होंगे। आशा है आप उन्हें हम सब के साथ यहाँ साझा करेंगे।

सोमवार, जुलाई 05, 2010

जगजीत सिंह की गाई ग़ज़लों का सफ़र भाग 3 : कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?

पिछली पोस्ट में बात हुई जगजीत जी के एलबम विजन के पहले भाग की। विज़न का दूसरा भाग मुझे पहले से भी ज्यादा प्रिय है। इस हिस्से की एक ग़ज़ल 'आप आए जनाब बरसों में' की बात मैं पहले ही कर चुका हूँ। जगजीत जी की सफलता का राज ग़ज़लों को चुनने की उनकी प्रक्रिया थी। अपने साक्षात्कारों में वो अक्सर कहा करते कि उन्होंने इस बात पर उतना ध्यान नहीं दिया कि कोई ग़ज़ल किस शायर ने लिखी है। उनका सारा ध्यान ग़ज़लों के भावों, उसमें प्रयुक्त शब्दों की सरलता पर रहता था। उन्हें इस बात पर हमेशा विश्वास रहा कि अगर ऐसी ग़ज़लों को एक अच्छी मेलोडी के साथ श्रोताओं तक पहुँचाया जाए तो वो निश्चय ही बेहद लोकप्रिय होंगी।

इसीलिए उनकी गाई ग़ज़लों में कुछ ऐसे शायरों के नाम आए जिनकी शायरी के बारे में लोगों ने पहले ज्यादा नहीं सुना था। वाज़िदा तबस्सुम, राणा सहरी, रुस्तम सहगल वफ़ा, ज़ाहिद, ख़ालिद कुवैतवी जैसे ग़ज़लकार इसी श्रेणी में थे जिनकी ग़ज़लों को जगजीत ने विज़न के इस भाग में समाहित किया और इनमें से कई काफी लोकप्रिय भी हुईं।

इन्हीं ग़ज़लकारों में एक नाम था जनाब अज़ीज़ क़ैसी साहब का। हैदराबाद के फलक़नुमा में जन्मे अज़ीज़ मोहम्मद खाँ यानि अज़ीज़ क़ैसी, मुंबईया फिल्म उद्योग में एक शायर से ज्यादा पटकथा लेखक के रूप में जाने गए। पर फिल्म उद्योग में आने के पहले साहित्यिक जगत में वे एक कहानीकार और शायर के रूप में मुकाम बना चुके थे। जगजीत सिंह ने इस एलबम में उनकी लिखी जिस रूमानी ग़ज़ल का प्रयोग किया उसका मतला जल्द जुबाँ चढ़ने वाला तो था ही

आपको देखकर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया

उसके बाद का ये शेर तो मन को लाजवाब कर जाता था

उनकी आँखो से कैसे छलकने लगा
मेरे होठों पे जो माज़रा रह गया

वैसे यहाँ ये बताना उपयुक्त होगा कि अज़ीज़ क़ैसी साहब की प्रतिनिधि शायरी आदमी और उसके चारों ओर तेजी से बदलती दुनिया के संघर्ष को व्यक्त करने के लिए जानी जाती है।उनकी ये ग़ज़ल जो साहित्यिक हलके में बेहद मशहूर हुई थी के चंद अशआरों पर गौर फरमाएँ.. महानगरीय ज़िदगी की हक़ीकत बयाँ करते हुए अज़ीज़ साहब कहते हैं

हर शाम जलते जिस्मों का गाढा धुआँ है शहर
मरघट कहाँ है कोई बताओ कहाँ है शहर

फुटपाथ पर जो लाश पड़ी है उसी की है
जिस गाँव को यकीं था कि रोज़ी राशन है शहर

अज़ीज़ साहब की ग़ज़ल से आगे बढ़ते ही आप रूबरू होते हैं राणा सहरी की लिखी ग़ज़ल से। ग़ज़ल के लफ़्ज़ों से कहीं ज्यादा यहाँ जगजीत की गायिकी का अंदाज़ मन को छू जाता है। शब्दों में छुपा दर्द एकदम से बाहर आता दिखता है

कोई दोस्त है ना रकीब है
तेरा शहर कितना अजीब है

वो जो इश्क था वो जुनून था
ये जो हिज्र है ये नसीब है

राणा सहरी के बाद श्रोताओं को सुनने को मिलती है वाज़िदा तबस्सुम की ये ग़ज़ल
कुछ ना कुछ तो जरूर होना है,
सामना आज उनसे होना है।

तोडो फेंको रखो, करो कुछ भी,
दिल हमारा है क्या खिलौना है?

इन तीनों ग़ज़लों के कुछ टुकड़ों को जगजीत की मखमली आवाज़ में मैंने एक साथ पिरोया है इस फाइल में जिसे मैं अक़सर सुना करता हूँ। ये झलकी जरूर आपको इस एलबम के जादू में खोने पर विवश करेगी।

विज़न के इस भाग में लोकप्रिय शायर बशीर बद्र का कलाम भी है। हालांकि उनकी ये ग़ज़ल मुझे सुनने से ज्यादा पढ़ने में लुत्फ़ देती है

सर झुकाएगो तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा

पर बशीर बद्र की जिस ग़ज़ल से विजन के इस भाग का आग़ाज़ होता है वो इस पूरे एलबम की मुझे सबसे बेहतरीन ग़ज़ल लगती है। जगजीत की गायिकी ने बद्र साहब की इस ग़ज़ल में चार चाँद लगा दिए हैं। तो आइए सुनिए इस एलबम की मेरी सबसे पसंदीदा ग़ज़ल




कौन आया रास्ते आईनाख़ाने हो गए
रात रौशन हो गई दिन भी सुहाने हो गए

क्यों हवेली के उजड़ने का मुझे अफ़सोस हो
सैकड़ों बेघर परिंदों के ठिकाने हो गए

ये भी मुमकिन है कि मैंने उसको पहचाना न हो
अब उसे देखे हुए कितने ज़माने हो गए

जाओ उन कमरों के आईने उठाकर फेंक दो
वो अगर ये कह रहें हैं हम पुराने हो गए

मेरी पलकों पर ये आँसू प्यार की तौहीन हैं
उसकी आँखों से गिरे मोती के दाने हो गए

और जनाब आज जब ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ तो बाहर मौसम का नज़ारा देखने लायक है। मानसून ने मेरे शहर में दस्तक तो दे ही दी है, आपको भी ये भिंगो ही रहा होगा ऐसी उम्मीद है। तो क्यूँ ना ज़ाहिद की लिखी और एलबम में शामिल इस नज़्म की इन पंक्तियों से इस पोस्ट का समापन किया जाए।

फिर से मौसम बहारों का आने को है
फिर से रंगी ज़माना बदल जाएगा
अबकि बज़्मे चरागां सजा लेंगे हम
ये भी अरमां दिल का निकल जाएगा

आप करदे जो मुझपे निगाहे करम
मेरी उलफत का रह जाएगा भरम
यूँ फ़साना तो मेरा रहेगा वही
सिर्फ उन्वान उसका बदल जाएगा (उन्वान : शीर्षक)

अगर आपने ये एलबम नहीं सुना तो जरूर सुनें। इसे आप यहाँ से भी खरीद सकते हैं।
जगजीत सिंह खी ग़ज़लों का ये सफ़र आगे भी चलता रहेगा। आशा है आप साथ बने रहेंगे।

शनिवार, जून 26, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़लों का सफ़र भाग 2 : एक कमी थी ताज महल में, हमने तेरी तस्वीर लगा दी !

पिछली पोस्ट में मैंने जगजीत साहब की गाई जिस ग़ज़ल का जिक्र किया था वो उनके एलबम 'Visions' से ली गई थी। अपने एलबमों के नाम जगजीत हमेशा अंग्रेजी में ही रखा करते थे। 1976 से ये सिलसिला चला तो 1998 में जावेद अख्तर के साथ किए गए उनके एलबम 'सिलसिला' पे जाकर रुका। इसके बाद उनके एलबम्स के नाम उर्दू में होने लगे। ख़ैर मैं बात कर रहा था 1992 में आए उनके एलबम 'Visions' (विजन्स) की।

टिप्स (tips) द्वारा रिलीज़ इस दोहरे कैसेट एलबम को मैंने कितनी दफ़ा सुना होगा ये याद नहीं। याद रह गई़ तो इसकी ग़ज़लें। सोलह ग़ज़लों के इस गुलदस्ते की शुरुआत जगजीत साहब ने की थी कैफ़ भोपाली के कलाम से। इस ग़ज़ल का संगीत संयोजन अद्भुत था और छोटे बहर की इस बेहतरीन ग़ज़ल के आनंद को दूना कर देता था।


झूम के जब रिंदों ने पिला दी
शेख़ ने चुपके चुपके दुआ दी

एक कमी थी ताज महल में
हमने तेरी तस्वीर लगा दी

आप ने झूठा वादा कर के
आज हमारी उम्र बढ़ा दी

तेरी गली में सज़दे कर के
हमने इबादतगाह बना दी
जगजीत के इस एलबम के पहले भाग में जो ग़ज़लें चुनीं उनमें से ज्यादातर शराब व साकी से जुड़ीं थीं। उनमें से अगर नज़र नज़र से मिलाकर... और ये पीनेवाले..को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकी मन में मस्ती का ऐसा ख़ुमार जगाती थीं की क्या कहें। अब रुस्तम सहगल 'वफ़ा' के लिखे इस मतले पर गौर करें

तेरे निसार साकिया, जितनी पियूँ पिलाऐ जा....
मस्त नज़र का वास्ता, तू मस्त मुझे बनाऐ जा !

वफ़ा ए बदनसीब को बख्शा है तूने दर्द जो
है कोई इसकी भी दवा इतना ज़रा बताए जा


बेख़ुद देहलवी के इन अशआरों की बेख़ुदी के क्या कहने !

ना कह साक़ी बहार आने के दिन हैं
ज़िगर के दाग छिल जाने के दिन हैं


अदा सीखो अदा आने के दिन हैं

अभी तो दूर, शर्माने के दिन हैं

और फिर रही सही कसर आरज़ू लखनवी साहब पूरी कर देते हैं ये कह कर

किसने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी,
झूम कर आई घटा, टूट के बरसा पानी

कोई मतवाली घटा थी, के जवानी की उमंग,

जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी

इन ग़ज़लों के शब्द विन्यास में भले कोई अनूठापन ना हो पर सहजता से कही इन प्यारी बातों को जब जगजीत बेहतरीन मेलोडी के साथ गाते हैं तो गुनगुनाए बिना रहा भी तो नहीं जाता।


पर विज़न्स के पहले हिस्से की दो ग़ज़ले मस्ती के आलम से आपको निकालती हुई वास्तविक दुनिया में ला पटकती हैं। कई बार क्या ऐसा नहीं होता कि सब कुछ जानते बूझते हम उन बातों को दूसरों को समझाने लगते हैं जिनकी विश्वसनीयता पर हमें खुद भी संदेह रहता है। इसीलिए तो निदा फाज़ली साहब कहते हैं

कभी कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है


हमसे पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हमने भी इस शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है

वहीं बेखुद 'देहलवी' का ये कलाम भी मन को छूता निकलता है...
दर्द-ए-दिल में कमी न हो जाए
दोस्ती दुश्मनी न हो जाए


अपनी खू-ए-वफ़ा से डरता हूँ
आशिकी बंदगी न हो जाए

वैसे भरतपुर राजस्थान से ताल्लुक रखने वाले बेख़ुद 'देहलवी' का वास्तविक नाम सैयद वहीदुद्दीन अहमद था। वो जाने माने शायर दाग देहलवी के प्रिय शिष्य थे। कहते हैं दाग साहब से जब पूछा गया कि उनकी शायरी का उत्तराधिकारी कौन होगा तो उन्होंने कहा था 'बेखुदें'। उनका इशारा अपने शिष्यों बेखुद 'देहलवी' और बेखुद 'बदायुँनी' की तरफ़ था। बेखुद देहलवी साहब के ग़ज़ल संग्रह गुफ़्तार ए बेख़ुद और सहसवार ए बेख़ुद के नाम से जाने जाते हैं।






अगली पोस्ट में आपको ले चलेंगे इस एलबम के दूसरे हिस्से की तरफ़ जो इतना ही खूबसूरत है...
अगर आपने ये एलबम नहीं सुना तो जरूर सुनें। इसे आप यहाँ से भी खरीद सकते हैं।

सोमवार, जून 21, 2010

जगजीत सिंह की ग़ज़लों का सफ़र भाग 1 : वो याद आए जनाब बरसों में...

'एक शाम मेरे नाम' पर अक्सर आप मेरी पसंद के नए पुराने गीत व ग़ज़लें सुनते रहे हैं और साथ ही उनसे जुड़े कलाकारों के बारे में भी पढ़ते रहे हैं। ग़ज़ल गायिकी हो या हिंदी फिल्म संगीत, हमारे देश ने एक से एक दिग्गज गायक दिए हैं जिन्हें हम सभी महान गायकों की श्रेणी में रखते हैं। अक्सर होता ये है कि ज़िंदगी के एक काल खंड में किसी कलाकार ने आपको ज्यादा प्रभावित किया हो और समय के साथ आप उसके आलावा औरों को भी पसंद करने लगे हों। किसी व्यक्ति की गीत संगीत में पसंदगी नापसंदगी का मापदंड इस बात से भी निर्धारित होता है कि वो किस दौर में पैदा हुआ और किन लोगों के बीच रहकर संगीत के प्रति रुचि बढ़ी। अपने बारे में तो जैसा मैं सदा से कहता आया हूँ ये रुझान क्रमशः किशोर दा, जगजीत सिंह और गुलज़ार साहब की वज़ह से पैदा हुआ।

पिछले चार सालों में इस चिट्ठे पर जहाँ मैंने किशोर दा पर एक लंबी श्रृंखला की वहीं गुलज़ार साहब की अपनी पसंदीदा रचनाओं से आपको रूबरू कराता रहा हूँ। रह गए तो जगजीत सिंह साहब जिनके बारे में मेरी कलम उतनी नहीं चली जितनी चलनी चाहिए थी। खास तौर पर तब, जब कॉलेज जीवन में संगीत को दिए गए समय का सबसे बड़ा हिस्सा उन की झोली में गया हो। बीच में सुदर्शन फक़ीर साहब का देहान्त हुआ तो उनकी लिखी ग़ज़लों पर लेख लिखा। फिर गुलज़ार साहब के साथ उनका एलबम 'कोई बात चले' आया तो लिखना लाज़िमी हो गया पर इसके आलावा उन पर विशेष कुछ नहीं लिख पाया। इसकी कई वज़हें रहीं।

सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशक में जगजीत की गाई ग़ज़लों को हमने और हमारी पीढ़ी ने इतना सुना,गुनगुनाया कि उसके बारे में लिखना मन में उत्साह नहीं जगा पाता था। सोचते थे इनके बारे में तो सबको पता ही होगा। और नब्बे के उत्तरार्ध से जगजीत साहब के ऐसे एलबम आने लगे जिसका संगीत उनकी चिर परिचित पुरानी धुनों से मेल खाता था और इक्का दुक्का ग़ज़लों को छोड़ दें तो बाकी कोई खास असर भी नहीं छोड़ पाती थीं।। इससे मैंने उनके नए एलबमों में दिलचस्पी लेनी बंद कर दी। पर उनके सबसे अच्छे दौर की यादें हमेशा मन में समाई रही और साथ ही दिल में ये इच्छा भी कि उनकी गाई पसंदीदा ग़ज़लों के बारे में कुछ लिखूँ और आज इसी वज़ह से मैं इस श्रृंखला की शुरुआत कर रहा हूँ।


उर्दू का बेहद थोड़ा ज्ञान रखने वाली भारतीय जनता को ग़ज़ल की विधा के प्रति आकर्षित करने में जगजीत जी का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। आज भी अगर कोई युवा मुझसे पहले पहल ग़ज़ल सुनने के लिए किसी एलबम का नाम पूछता है तो में उसे जगजीत जी के किसी एलबम का ही नाम बताता हूँ।

दरअसल जगजीत जी की ग़ज़लों की खासियत इसी बात में थी कि उन्होंने ज्यादातर ऐसे शायरों की ग़ज़लें गाने के लिए चुनीं जिनमें उर्दू के भारी भरकम शब्द तो नहीं थे पर भावनाओं की गहराई थी। अगर कोई ग़ज़ल इस मामले में थोड़ी कमज़ोर भी रहती तो जगजीत की आवाज़ का जादू उसकी वो कमी भी ढ़क लेता।

जगजीत ने पहली बार अपनी ग़ज़लों में परंपरागत भारतीय वाद्य यंत्रों तबला,सितार,संतूर, सरोद और बाँसुरी के साथ पाश्चात्य वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल किया। ग़ज़लों की डिजिटल रिकार्डिंग भी उनके एलबमों से ही शुरु हुई। ग़ज़ल गायिकी को उन्होंने सेमी क्लासकिल संगीत की परिधि से बाहर निकाला। लिहाज़ा वो परंपरागत ग़जल ग़ायिकी के प्रशंसकों की आलोचना के भी पात्र बने। पर जगजीत जी के ये नए प्रयोग, आम जनता को खूब भाए। जगजीत ना केवल देश के सबसे लोकप्रिय ग़ज़ल गायक बने बल्कि उन्होंने भारत में ग़ज़लप्रेमियों की एक नई ज़मात पैदा की।

जगजीत की गाई ग़ज़लों के माध्यम से बशीर बद्र, सुदर्शन फक़ीर, निदा फाज़ली,राजेश रेड्डी जैसे प्रतिभावान शायरों को एक विशाल पाठक वर्ग तक पहुँचने में मदद मिली। शायरों के आलावा जगजीत ने तलत अजीज़, घनश्याम वासवानी, अशोक खोसला जैसे कई प्रतिभावान ग़ज़ल गायकों को जनता के सामने लाने में मदद की। जगजीत सिंह एक ऐसे प्रकाश स्तंभ है जिसकी रोशनी के बिना भारतीय ग़ज़ल गायिकी की चमक फीकी पड़ जाती है। यूँ तो जगजीत ने अपने कैरियर की शुरुआत से अभी तक तकरीबन पचास के करीब एलबम्स निकाले हैं पर जगजीत से जुड़ी ये श्रृंखला उन एलबमों और ग़ज़लों से जुड़ी रहेगी जो मुझे खासे प्रिय रहे हैं।

तो आइए ग़ज़लों की इस श्रृंखला का आगाज़ करें उनके एक बेहतरीन एलबम की एक ग़ज़ल से। इसे लिखा था जनाब रुस्तम सहगल 'वफ़ा' ने। जगजीत जी ने जिस प्यार और आवाज़ की मुलायमित से ये ग़ज़ल गाई है वो सुनते ही बनती है। अपने किसी मीत से बरसों बाद मिलने का अहसास दिल को कितना गुदगुदाता है वो इस ग़ज़ल को सुनकर महसूस कर सकते हैं

आप आए जनाब बरसों में
हमने पी है शराब बरसों में

फिर से दिल की कली खिली अपनी
फिर से देखा शबाब बरसों में

तुम कहाँ थे कहाँ रहे साहिब,
आज होगा हिसाब बरसों में

पहले नादाँ थे अब हुए दाना*
उनको आया आदाब बरसों में
*बुद्धिमान

इसी उम्मीद पे मैं जिंदा हूँ
क्या वो देंगे जवाब बरसों में



इस श्रृंखला की अगली कड़ी में आपसे बाते होंगी इस एलबम की कुछ बेहतरीन ग़ज़लों के बारे में। वैसे क्या आपको याद आया कि कौन सा एलबम था ये जगजीत जी का?


इस श्रृंखला में अब तक

  1. जगजीत सिंह : वो याद आए जनाब बरसों में...
  2. Visions (विज़न्स) भाग I : एक कमी थी ताज महल में, हमने तेरी तस्वीर लगा दी !
  3. Visions (विज़न्स) भाग II :कौन आया रास्ते आईनेखाने हो गए?
  4. Forget Me Not (फॉरगेट मी नॉट) : जगजीत और जनाब कुँवर महेंद्र सिंह बेदी 'सहर' की शायरी
  5. जगजीत का आरंभिक दौर, The Unforgettables (दि अनफॉरगेटेबल्स) और अमीर मीनाई की वो यादगार ग़ज़ल ...
  6. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 1
  7. जगजीत सिंह की दस यादगार नज़्में भाग 2
  8. अस्सी के दशक के आरंभिक एलबम्स..बातें Ecstasies , A Sound Affair, A Milestone और The Latest की

सोमवार, जून 14, 2010

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया :साहिर, रवि व महेंद्र कपूर की यादगार सौगात.!.......

कल जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल की तलाश में यू ट्यूब पे निकला था कि भटकते-भटकते ये गीत सामने आ गया। अब इसे सुने एक अर्सा हो गया था। दोबारा सुना तो इसकी गिरफ़्त से निकलना मुश्किल था। आजकल कितने गीतों में ये माद्दा है कि वो पाँच मिनट के अंदर ही दर्शकों को नायक नायिका के प्रेम, बेवफाई और विरह की पूरी कहानी कह जाएँ। पर अगर गीतकार कोई और नहीं, साहिर लुधयानवी जैसा संज़ीदा शायर हो तो उनके लिए ये ज़रा भी मुश्किल काम नहीं रहा होगा। गुमराह फिल्म के यूँ तो सारे गीत ही चर्चित हुए थे, पर रेडिओ पर बाकी गीतों की तुलना में महेंद्र कपूर का गाया ये गीत कम ही बजा है। संगीतकार रवि के संगीत निर्देशन में महेंद्र कपूर के गाए गीत हमेशा से ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं। गीत के आरंभ का संगीत संयोजन का अंदाज़ा आप गीत के वीडियो से भी लगा सकते हैं। 
महेंद्र कपूर और साहिर जैसे कलाकारों के बारे में तो पहले भी आपको बताता रहा हूँ। पर आज कुछ बातें इस नग्मे के संगीतकार रवि के बारे में। वैसे इस गीत के संगीतकार रवि यानि 'रवि शंकर शर्मा' आज भी हमारे बीच हैं। गुमराह के अलावा चौंदवीं का चाँद, हमराज, वक़्त, नीलकमल जैसी फिल्मों का गीत देने वाले रवि ने 1970 के बाद से हिंदी फिल्मों के लिए संगीत देना छोड़ दिया। 1982 में ये सिलसिला फिल्म 'निकाह' में उनके द्वारा संगीत निर्देशित करने से टूटा। पर इसी दशक में उन्होंने ये निर्णय लिया कि वो सिर्फ मलयालम फिल्मों के लिए बांबे रवि के नाम से संगीत निर्देशित करेंगे। अपनी प्रतिभा के बल पर रवि मलयालम फिल्मों में दिए अपने संगीत से भी छा गए। 

आज भी पुराने ज़माने की तरह रवि पहले गीतकारों द्वारा लिखे गीतों को सुनकर ही उसके अनुरूप संगीत देते हैं। विधिवत संगीत की शिक्षा ना लेते हुए भी रवि जी ने अपने लिए जो मुकाम बनाया है वो उनके लिए क्या किसी भी संगीतकार के लिए गर्व का विषय हो सकता है। फिलहाल तो महेंद्र कपूर के गाए इस गीत की रूमानियत में डूबिए और शाबासी दीजिए साहिर, रवि और कपूर साहब की इस तिकड़ी को जिनके सम्मिलित प्रयास से ये गीत इतना जानदार बन पड़ा है। पर उसके पहले मेरी आवाज़ में सुनिए इस गीत के मुखड़े और अंतरे की गुनगुनाहट... 

आप आए तो खयाल ए दिले नाशाद आया 
कितने भूले हुए जख़्मों का पता याद आया  
('दिल‍- ए- नाशाद' का मतलब हैं दिल का दुखी, अप्रसन्न होना) 

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था 
शोख नज़रों-सी मुहब्बत का सलाम आया था 
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था 
आपको देख के वो अहदे वफ़ा याद आया 
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया 

रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दीये 
कैसे दीवाने थे हम, आपको पाने के लिए 
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने ऐहसान किए 
पर जो माँगे से ना पाया वो सिला याद आया 
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया 

आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है 
मेरे हिस्से में ये हल्की-सी मुलाकात तो है 
ग़ैर का होके भी ये हुस्न मेरे साथ तो है 
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया 

वो युग था प्रत्यक्ष यानि लाइव रिकार्डिंग का। अब क्या किसी गीत की रिकार्डिंग के पहले वाइलिन, सितार और बाँसुरी वादकों का समूह दिखता है जैसा कि इस गीत के वीडियो के आरंभ में दिखाया गया है।

 

फिल्म गुमराह में ये गीत फिल्माया गया है सुनील दत्त, माला सिन्हा व अशोक कुमार पर। सुनील दत्त गीत को गा तो रहे हैं पर माला सिन्हा ने भी गीत के भावों को अपनी चेहरे की भाव भंगिमाओं से जिस खूबसूरती से उभारा है वो देखते ही बनता है।
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
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