शनिवार, अप्रैल 26, 2008

तमाम फिक्र ज़माने की टाल देता है - सुनिए शोमा बनर्जी की बेहतरीन ग़ज़ल गायिकी को

आज छुट्टी का दिन था। अपनी केरल की यात्रा के बारे में आगे लिखने की सोच रहा था। पर कुछ मूड नहीं बन पाया। मन कुछ गाने और सुनने का कर रहा था। अपनी पसंदीदा गज़लों की किताब खोली तो ये ग़ज़ल सामने थी जो शायद आपमें से बहुतों ने नहीं सुनी होगी। इसे बहुत दिनों से आप सब से बाँटने की इच्छा थी। पर मामला किसी ना किसी वज़ह से टल रहा था। ग़ज़लों का असली लुत्फ़ उठाया तभी जा सकता है, जब आप थोड़ी फुर्सत में हों ।

जो सुनने बैठा इसे तो ना जाने कितनी बार फिर से सुना। दिल को छूते शब्द, खूबसूरत संगीत, मन गुनगुना उठा


तमाम फिक्र ज़माने की टाल देता है
ये कैसा कैफ़ तुम्हारा ख़याल देता है


आप सबने ये कभी गौर किया है तमाम परेशानियों से भरी इस जिंदगी में किसी ख़ास का ख्याल आता है और मन अंतरनिर्मित उर्जा से आनंदित हो उठता है। उन अनमोल क्षणों में सारी फिक्र, सारी परेशानियाँ काफ़ूर हो जाती हैं। इन्ही भावनाओं को लफ्जों में समाकर शायरा इंदिरा वर्मा ने इस ग़ज़ल का मतला रचा है जो इस ग़ज़ल के मूड को बना देता है।

इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ से संवारा है शोमा बनर्जी ने। ग़ज़ल गायिकी के लिए शोमा की आवाज़ बिलकुल उपयुक्त लगती है। इस ग़ज़ल को जिस ठहराव के साथ उन्होंने अपना स्वर दिया हे वो काबिले तारीफ है। शोमा बनर्जी का नाम बतौर गायिका के रूप में आपने ज्यादा ना सुना हो पर AIR और दूरदर्शन के लिए उन्होंने कई कार्यक्रम किए हैं। खैर वहाँ पर तो नहीं पर फिल्म ताल में इनका गाया हुआ दिल ये बेचैन है ....और फिर साथियाँ में छलका छलका रे कलसी का पानी.... तो आपने जरूर सुना होगा।

इस ग़ज़ल को लिखा है इंदिरा वर्मा ने। पेशेवर तौर पर वो पर्यटन उद्योग से जुड़ी रही हैं पर दिल्ली में गज़ल गायिकी से जुड़े लोगों में एक शायरा के रूप में उन्होंने अपनी पहचान बनाई है। ये ग़ज़ल उनकी किताब 'हम उम्र ख़याल' से ली गई है जो उनकी ६४ ग़ज़लों का संग्रह है। इन ग़जलों में से ८ को संग्रहित कर म्यूजिक टुडे ने इसी नाम से करीब तीन चार साल पहले एक एलबम निकाला था जिसकी सीडी आप यहाँ से खरीद सकते हैं।
तो आइए सुनें ये खूबसूरत ग़ज़ल


तमाम फिक्र ज़माने की टाल देता है
ये कैसा कैफ़1 तुम्हारा खयाल देता है

1.नशा, आनंद

हमारे बंद किवाड़ों पे दस्तकें दे कर
शब-ए-फ़िराक2 में वहम-ए-विसाल3 देता है

2.वियोग भरी रात 3 मिलन

उदास आँखों से दरिया का तस्किरा कर के
ज़माना हमको हमारी मिसाल देता है

बिछुड़ के तुमसे यकीं हो चला है ये मुझको
कि ये इश्क़ लुत्फ़-ए-सजा बेमिसाल देता है।


तो बताइए कैसी लगी आपको ये ग़ज़ल ?

मंगलवार, अप्रैल 15, 2008

मौला मेरे ले ले मेरी जान...सुनिए सलीम मर्चेंट का गाया ये संवेदनशील नग्मा..

आज एक गीत कुछ सूफियाना अंदाज का जिसे मैंने पिछले RMIM पुरस्कारों के दौरान नामित गीतों में होने की वज़ह से सुना था और एक बार सुनकर ही लगा था कि इसमें कुछ अलग बात है। इस गीत को फिल्म के कहानी के परिदृश्य में देखा जाए तो गीत की भावनाओं को समझने में आसानी होती है। गीत के पीछे का प्रसंग कुछ इस तरह से है ...

अपने देश के प्रति सब कुछ उत्सर्ग के के भी जब पूरी टीम की गलती का ठीकरा एक गोलकीपर पर फूटता है और अलग मज़हब होने की वजह से उसे जगह जगह गद्दार की उपाधि से विभूषित किया जाता है तो वो सोचने पर मजबूर हो जाता है। उसे लगता है कि भाई शुरु से तो मैं इसी मिट्टी का रहा, यहीं खेला, पला बढ़ा, । खुशियों के पल साथ साथ बाँटे। इसकी आन को अपना माना तो फिर आज ये सब क्यूँ सुनना पड़ा मुझे? क्या गलती हुई मुझसे। इस जलालत से तो मौत ही बेहतर थी...

इस गीत को गाया सलीम मर्चेंट के साथ कृष्णा ने । सलीम और उनके भाई सुलेमान चक दे इंडिया फिल्म से लिए गए गीत के संगीतकार हैं। सलीम सुलेमान नए संगीतकारों की जमात में एक उभरता नाम हैं। पिछले साल फिल्म डोर के लिए इनका लिखा नग्मा ये हौसला कैसे झुके काफी सराहा गया था।

इस गीत को लिखा है, जयदीप साहनी ने जो गीतकार से ज्यादा एक पटकथा लेखक की हैसियत से ज्यादा जाने जाते हैं। 'खोसला का घोसला' से लेकर 'चक दे इंडिया' में अपने पटकथा लेखन से इस कम्प्यूटर इंजीनियर ने बहुत वाहावाही लूटी है। पर इस दिल को छूने वाले गीत में उन्होंने दिखा दिया की उनकी प्रतिभा बहुआयामी है.

तो आईए सुनें ये मर्मस्पर्शी गीत...

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तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान

तेरे संग खेली होली
तेरे संग की दीवाली
तेरे आँगनों की छाया
तेरे संग सावन आया
फेर ले तू चाहें नज़रें, चाहे चुरा ले
अब के तू आएगा रे शर्त लगा ले
तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान

मिट्टी मेरी भी तू ही
वही मेरे घी और चूरी
वही रांझे मेरे वही हीर
वही सेवईयाँ वही खीर
तुझसे ही रूठना रे मुझे ही मनाना
तेरा मेरा नाता कोई दूजा ना जाना

तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान

शुक्रवार, अप्रैल 11, 2008

'मुझे चाँद चाहिए' : रंगमंच की दुनिया को करीब से देखती सुरेंद्र वर्मा की पठनीय कृति

पिछले कुछ सालों से कई बार ये प्रश्न मुझसे पूछा जाता रहा कि क्या आपने 'मुझे चाँद चाहिए' पढ़ी है। जब मेरा जवाब नकरात्मक होता तो इसे जल्द पढ़ने की सलाह दी जाती थी। इंटरनेट पर मैंने बहुत लोगों को इसे अपनी पसंदीदा किताब की सूची में देखा था और मन ही मन ये हीन ग्रंथी भी विकसित हो चली थी कि शायद मैं ही एक रह गया हूँ इस किताब को न पढ़ने वाला। इसलिए जब ये किताब नई खरीदी गई पुस्तकों की सूची में पुस्तकालय में दिखी तो मैंने इसे लेने में ज़रा भी देर नहीं की। पर १९९६ में साहित्य अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत इस किताब के आवरण पर उर्मिला मातोंडकर का चित्र देख कर उन सनीसनीखेज पॉकेटबुक्सों की याद आ गई जो रेलवे की बुक स्टॉलों पर धड़ल्ले से बिका करती हैं। दिल्ली के राधाकृष्ण प्रकाशन ने इस पुस्तक से काफी पैसे बनाए हैं पर ५७० पृष्ठों वाली १९५ रुपये की इस किताब में कहीं लेखक के संबंध में दो शब्द लिखने की जरूरत नहीं समझी गई।

खैर चलिए कुछ बातें कर लें इस उपन्यास के बारे में। सुरेंद्र वर्मा अपनी इस किताब की शुरुवात प्रसिद्ध रोमन सम्राट जूलियस सीजर यानि कालिगुला की इन पंक्तियों से करते हैँ
"...अचानक मुझमें असंभव के लिए आकांक्षा जागी। अपना यह संसार काफी असहनीय है, इसलिए मुझे चंद्रमा, या खुशी चाहिए-कुछ ऐसा, जो वस्तुतः पागलपन-सा जान पड़े। मैं असंभव का संधान कर रहा हूँ...देखो, तर्क कहाँ ले जाता है-शक्ति अपनी सर्वोच्च सीमा तक, इच्छाशक्ति अपने अंतर छोर तक ! शक्ति तब तक संपूर्ण नहीं होती, जब तक अपनी काली नियति के सामने आत्मसमर्पण न कर दिया जाये। नहीं, अब वापसी नहीं हो सकती। मुझे आगे बढ़ते ही जाना है... .."


वर्मा जी ने इन पंक्तियों का चुनाव शायद इसलिए किया कि पुस्तक के केंद्रीय चरित्र वर्षा वशिष्ठ भी कुछ ऍसे ही जज़्बातों को जीवन पथ में लेकर आगे ही बढ़ती गई। पर कौन थी ये वर्षा वशिष्ठ? कैसा था उसका पारिवारिक परिवेश। सुरेंद्र वर्मा अपनी पुस्तक की नायिका का परिचय अपने पाठकों से कुछ इस तरह कराते हैं..

"किशनदास शर्मा प्राइमरी स्कूल में संस्कृत के अध्यापक थे। शहर के पुराने, निम्नमध्य वर्गीय इलाके में सँकरी, ऊबड़खाबड़ गलियों और बदबूदार नालियों के बीच उनका पंद्रह रुपया महीना किराये का आधा कच्चा, आधा पक्का दुमंजिला मकान था। बड़ा बेटा महादेव स्टेट रोडवेज में क्लर्क था। दो साल पहले उसका तबादला पीलीभीत हो गया था। बड़ी बेटी गायत्री माँ पर गयी थी-गोरी, आकर्षक। पढ़ाई के नाम से उसे रुलाई आती थी, इसलिए इंटरमीडिएट के बाद उसने विवाह के शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा कर घर सँभाल लिया। इससे माँ को बहुत राहत मिली, क्योंकि ‘जिंदगी भर कोल्हू में जुते रहने के बाद अब बचा-खुचा समय तो सीताराम-सुमिरन में लगे।’ सबसे छोटी नौ वर्ष की गौरी उर्फ झल्ली थी। उसके ऊपर तेरह वर्ष का किशोर और बीचों-बीच की साँवली, लंबी-छरहरी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली सिलबिल उर्फ यशोदा शर्मा। "

ये उपन्यास शाहजहाँपुर की एक आम निम्नमध्य वर्गीय किशोरी सिलबिल के अपने छोटे शहर के दकियानूसी परिवेश से निकल दिल्ली के रंगमंच और फिर मुंबई के सिने जगत में एक काबिल और स्थापित अभिनेत्री बनने की संघर्ष गाथा है।

सिलबिल के चरित्र के कई आयाम हैं। सिलबिल अपने जीवन की नियति से दुखी है। अपने परिवेश से निकलने की छटपटाहट है उसमें। नहीं तो वो घरवालों से बिना पूछे अपना नाम यशोदा शर्मा से वर्षा वशिष्ठ क्यूँ करवाती? अपनी शिक्षिका की मदद से रंगमंच से जुड़ने वाली सिलबिल, अपने पहले मंचन में सफलता का स्वाद चख इसे ही अपनी मुक्ति का मार्ग मान लेती है और अपनी सारी शक्ति अपनी अभिनय कला को और परिपक्व और परिमार्जित करने में लगा देती है।

जीवन के नए अनुभवों से गुजरने में वर्षा वशिष्ठ को कोई हिचकिचाहट नहीं, चाहे वो उसके बचपन और किशोरावस्था के परिवेश और मूल्यों से कितना अलग क्यूँ ना हो। बल्कि इनका आनंद लेने की एक उत्कंठा है उसमें। पर उसके व्यक्तित्व की विशेषता ही यही है कि ये अनुभव उसे अपने अंतिम लक्ष्य से कभी नहीं डिगा पाते।

अपने केंद्रिय चरित्र के माध्यम से इस उपन्यास में सुरेंद्र वर्मा ने समाज, रंगमंच और सिने जगत से जुड़े विभिन्न पहलुओं को छूने की कोशिश की है। पर जब वो रंगमच से जुड़ी बारीकियों को विश्लेषित करते हैं तो उनकी लेखनी सबसे सशक्त जान पड़ती है। शायद ये इसलिए भी है कि रंगमंच उनका कार्यक्षेत्र रहा है। सुरेंद्र वर्मा ने रंगमंच के जिस परिदृश्य को उभारा है वो आज भी बहुत कुछ वैसा ही है। कितने ही नौजवान और नवयुवतियाँ देश के कोने कोने से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में आते हैं तो इस जोश और समर्पण के साथ कि कला के इस माध्यम में अपनी चुनी हुई विधा में वे एक अलग पहचान बना सकें और जिससे उनका जीवन भर का एक अटूट रिश्ता बना रहे। पर ये समर्पण धीरे-धीरे तब घटता चला जाता है जब वो इस क्रूर सत्य से मुखातिब होते हैं कि इस क्षेत्र में की गई अथक मेहनत एक कलात्मक संतोष तो दे पाती है पर वो जीवकोपार्जन के लिए पर्याप्त नहीं होती। और इस सत्य ने कलात्मक रंगमंच को सिने जगत और निजी चैनलों के धारावाहिकों में जाने का ज़रिया भर बना दिया है।

सिने और धारावाहिक जगत की फार्मूलाप्रियता सच्चे और मँजे कलाकारों को किस तरह समझौतों का गुलाम बना देती है इस बात को भी लेखक ने कथानक के माध्यम से उकेरा है।

सुरेंद्र वर्मा की लेखन शैली में हास्य के पुट ज्यादा नहीं है जो कभी कभी उपन्यास के कुछ अंशों को बोझिल कर देते हैं। । कुछ हद तक तो इसके लिए कथानक जिम्मेवार है। पर कुछ हिस्सों में उनकी लेखनी गंभीर घटनाक्रम में हल्के फुलके लमहे दे जाती है। अब यहीं देखिए सिलबिल और उसके घर के तोते अनुष्टुप के संबंधों को सुरेंद्र वर्मा किस रूप में पेश करते हैं


सिलबिल के साथ अनुष्टुप का संबंध वैसा ही था, जैसे बाघिन का हिरनी से होता है। जैसे ही सिलबिल सामने आती, अनुष्टुप की टोकाटाकी शुरू हो जाती, ‘‘सिलबिल धीरे बोलो,’’ ‘‘सिलबिल, तुलसी में पानी नहीं दिया ?’’ ‘सिलबिल, देर लगा दी। ’’
सिलबिल की पहली रणनीति अनुष्टुप को अपनी ओर फोड़ने की बनी। उसने मीठा ग्राइपवाटर पिलाया, सर्दी से पिंजरा धूप में रखा, मिश्री की डली खिलायी। पर जब इस पर भी अनुष्टुप ने अपने छंद का मूल-भाव नहीं छोड़ा, तो उसने गोबरभरी हरी मिर्च पिंजरे की कटोरी में रख दी। इस पर अनुष्टुप ने ‘सिलबिल कपटी है’(उसका शब्द-चयन रीतिकाल के निकट पड़ता था और जीवन-दृष्टि भक्ति काल के !) की रट लगा कर माँ की डाँट की भूमिका बना दी।


सुरेंद्र वर्मा ने इतने मोटे उपन्यास की रोचकता को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है और इसमें वो सफल भी हुए हैं, पर कई बार नाटको से संबधित शब्दावली से उनका अतिशय प्रेम खटकता है। जब जब कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है वो अपने पात्रों के वार्तालाप के पहले 'नाटकीय समक्षता' शब्द को दोहराना नहीं भूलते जो बार बार पढ़ने में बड़ा अज़ीब सा लगता है। खैर एक मज़ेदार बात ये रही कि इस उपन्यास ने मेरा इतना ज्ञान जरूर बढ़ाया है कि अब मैं समझ सकता हूँ कि प्रमोद सिंह के चिट्ठे के नाम में जो अज़दक आता है वो वास्तव में क्या बला है। उपन्यास में इस बात का जिक्र आता है कि नाटक खड़िया का घेरा (The Caucasian Chalk Circle) का मुख्य किरदार 'अज़दक' था। मेरी एक ब्लॉगमित्र के निक सिलबिल का रहस्य भी मुझे ये किताब पढ़ने के बाद ही उद्घाटित हुआ। :)

ये तो नहीं कहूँगा कि ये किताब मेरी सबसे पसंदीदा किताबों की फेरहिस्त में आ गई है पर फिर भी इसके लगभग छः सौ पृष्ठों से गुजरना कुल मिलाकर एक अच्छा अनुभव था।

इस किताब को आप यहाँ या यहाँ से खरीद सकते हैं।


इस चिट्ठे पर आप इन पुस्तकों के बारे में भी पढ़ सकते हैं
असंतोष के दिन, गुनाहों का देवता, कसप, गोरा, महाभोज, क्याप, एक इंच मुस्कान, लीला चिरंतन, क्षमा करना जीजी, मर्डरर की माँ, दो खिड़कियाँ, हमारा हिस्सा, मधुशाला

सोमवार, अप्रैल 07, 2008

शहर के दुकानदारों कारोबार-ए-उलफ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है, तुम न जान पाओगे...जावेद और नुसरत साहब की आवाज़ों में

शहर के दुकानदारों ...जावेद अख्तर की नज़्मों में मेरी पसंदीदा रही है। आज की दुनिया में पैसों के बल पर कुछ लोग भावनाओं को भी बिकाऊ समझने लगे हैं। पर क्या भावनाएँ बिक सकती हैं ? क्या धन के सिलबट्टे से उन्हें तौला जा सकता है? हर संवेदनशील इंसान की प्रतिक्रिया यही होगी - नहीं, हरगिज नहीं। जावेद साहब ने भी अपनी इस खूबसूरत नज़्म में यही बात रखनी चाही है।

कुछ नज़्में सुनने से ज्यादा पढ़ने में आनंद देती हैं और मेरे लिए ये नज़्म, इसी तरह की नज़्म है। इसे पढ़ते पढ़ते आवाज़ खुद-ब-खुद ऊँची हो जाती है, रक्त का प्रवाह बढ़ जाता है और मन एक अलग से जोश मिश्रित आनंद में डूब जाता है। यूँ तो नज़्म का हर हिस्सा हृदय को छूता है पर नज़्म की आखिरी चार पंक्तियाँ मेरी जुबां हर वक़्त रहा करती हैं।

जानता हूँ कि तुम को जौक-ए-शायरी भी है
शख्सियत सजाने में इक ये माहिरी भी है
फिर भी हर्फ चुनते हो, सिर्फ लफ़्ज सुनते हो
इनके दरमियाँ क्या हैं, तुम ना जान पाओगे


जावेद साहब ने इस नज़्म को अपने एलबम 'तरकश' में अपनी आवाज से सँवारा है। 'तरकश' जावेद अख्तर की ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह है जो १९९५ में बाजार में आया। इसकी CD आप यहाँ से खरीद सकते हैं। मुझे लगा कि जावेद साहब पूरी नज़्म पढ़ने में थोड़ा और वक़्त लगाते तो शब्दों का असर और गहरा होता..



शहर के दुकाँदारों कारोबार-ए-उलफ़त में
सूद क्या ज़ियाँ1 क्या है, तुम न जान पाओगे
दिल के दाम कितने हैं ख़्वाब कितने मँहगे हैं
और नकद-ए-जाँ2 क्या है तुम न जान पाओगे


1-हानि 2- आत्मा की पूँजी

कोई कैसे मिलता है, फूल कैसे खिलता है
आँख कैसे झुकती है, साँस कैसे रुकती है
कैसे रह निकलती है, कैसे बात चलती है
शौक की ज़बाँ क्या है तुम न जान पाओगे

वस्ल1 का सुकूँ क्या हैं, हिज्र2 का जुनूँ क्या है
हुस्न का फुसूँ3 क्या है, इश्क के दुरूँ4 क्या है
तुम मरीज-ए-दानाई5, मस्लहत के शैदाई6
राह ए गुमरहाँ क्या है तुम ना जान पाओगे


1- मिलन, 2-विरह, 3-जादू 4 - अंदर, 5- जिसे सोचने समझने का रोग हो, 6- कूटनीति पसंद करने वाला

ज़ख़्म कैसे फलते हैं, दाग कैसे जलते हैं
दर्द कैसे होता है, कोई कैसे रोता है
अश्क़ क्या है नाले* क्या, दश्त क्या है छाले क्या
आह क्या फुगाँ** क्या है, तुम ना जान पाओगे


* दर्दभरी आवाज़ ** फरियाद


नामुराद दिल कैसे सुबह-ओ-शाम करते हैं
कैसे जिंदा रहते हैं और कैसे मरते हैं
तुमको कब नज़र आई ग़मज़र्दों* की तनहाई
ज़ीस्त बे-अमाँ** क्या है तुम ना जान पाओगे

* दुखियारों ** असुरक्षित जीवन

जानता हूँ कि तुम को जौक-ए-शायरी* भी है
शख्सियत सजाने में इक ये माहिरी भी है
फिर भी हर्फ चुनते हो, सिर्फ लफ़्ज सुनते हो
इनके दरमियाँ क्या हैं, तुम ना जान पाओगे


* शायरी का शौक

सूफी गायिकी के बादशाह स्वर्गीय नुसरत फतेह अली खाँ साहब ने जावेद अख्तर साहब के साथ एक एलबम किया था जिसका नाम था 'संगम' और जो HMV पर निकला था। ये नज्म इस एलबम का भी हिस्सा है। इसकी CD यहाँ उपलब्ध है। नुसरत ने इस नज़्म को एक अलग ही अंदाज में गाया है जो कि धीरे-धीरे आपके ज़ेहन में उतरता है। इसलिए इसे जब भी सुनें पर्याप्त समय लेकर सुनें और इसका लुत्फ़ उठाएँ।

गुरुवार, मार्च 27, 2008

सुनिए रूना लैला को : तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है मुझे प्यार तुम से नहीं है नहीं है..

बात सत्तर के दशक के उत्तरार्ध की है जब गर्मी की तपती दुपहरी में हमारा परिवार दो रिक्शों में सवार होकर पटना के 'वैशाली सिनेमा हाल' मे अमोल पालेकर और जरीना बहाव की फिल्म 'घरौंदा' देखने गया था। सभी को फिल्म बहुत पसंद आई थी। भला कौन सा मध्यमवर्गीय परिवार एक बड़े मकान का सपना नहीं देखता । इसलिए जब फिल्म में इन सपनों को बनते बनते टूटता दिखाया गया तो वो ठेस कलाकारों के माध्यम से सहज ही हम दर्शकों के दिल में उतर ही गई थी। उस वक्त जो गीत सिनेमा हाल के बाहर तक हमारे साथ आया वो था दो दीवाने शहर में...रात को और दोपहर में इक आबोदाना ढूंढते हैं.. गायक ने 'आबोदाना' की जगह मकान क्यों नहीं कहा, ये प्रश्न बहुत दिनों तक बालमन को मथता रहा था। अब आबोदाना यानी भोजन पानी का रहस्य तो बहुत बाद में जाकर उदघाटित हुआ।

दिन बीतते गए और जब कॉलेज के समय गीत सुनने की नई-नई लत लगी तो कैसेट्स की नियमित खरीददारी शुरु हुई। पहली बार तभी ध्यान गया कि अरे इस घरौंदा के कुछ गीत तो गुलज़ार ने लिखे हैं और ये भी पता चला कि १९७७ में दो दीवाने शहर में.... के लिए गुलज़ार फिल्मफेयर एवार्ड से सम्मानित हुए थे। सारे गीत बार बार सुने गए और इस बार जो गीत दिल में बैठ सा गया वो रूना लैला जी का गाया ये गीत था। पर इस गीत यानी 'तुम्हें हो ना हो....' को नक़्श लायलपुरी  (Naqsh Lyallpuri) ने लिखा था। क्या कमाल के लफ़्ज दिये थे नक़्श साहब ने।

दिल और दिमाग की कशमकश को बिल्कुल सीधे बोलों से मन में उतार दिया था उन्होंने.. ....अब दिमाग अपने अहम का शिकार होकर लाख मना करता रहे कि वो प्रेम से कोसों दूर है पर बेचैन दिल की हरकतें खुद बा खुद गवाही दे जाती हैं।

इस गीत को संगीतबद्ध किया था जयदेव ने। गौर करें की इस गीत में धुन के रूप में सीटी का कितना सुंदर इस्तेमाल हुआ है। इस गीत की भावनाएँ, गीत में आते ठहरावों और फिर अनायास बढती तीव्रता से और मुखर हो कर सामने आती है। जहाँ ठहराव दिल में आते प्रश्नों को रेखांकित करते हैं वहीं गति दिल में प्रेम के उमड़ते प्रवाह का प्रतीक बन जाती है। इस गीत को फिल्म में एक बार पूरे और दूसरी बार आंशिक रूप में इस्तेमाल किया गया है। तो पहले सुनिए पूरा गीत



तुम्हें हो ना हो, मुझको तो, इतना यकीं है
मुझे प्यार, तुम से, नहीं है, नहीं है



मुझे प्यार, तुम से, नहीं है, नहीं है

मगर मैंने ये राज अब तक ना जाना
कि क्यूँ, प्यारी लगती हैं, बातें तुम्हारीं
मैं क्यूँ तुमसे मिलने का ढूँढू बहाना
कभी मैंने चाहा, तुम्हे् छू के देखूँ
कभी मैंने चाहा तुम्हें पास लाना
मगर फिर भी...
मगर फिर भी इस बात का तो यकीं है.
मुझे प्यार, तुम से, नहीं है, नहीं है

फिर भी जो तुम.. दूर.. रहते हो.. मुझसे
तो रहते हैं दिल पे उदासी के साये
कोई, ख्वाब ऊँचे, मकानों से झांके
कोई ख्वाब बैठा रहे सर झुकाए
कभी दिल की राहों.. में फैले अँधेरा..
कभी दूर तक रोशनी मुस्कुराए
मगर फिर भी...
मगर फिर भी इस बात का तो यकीं है.
मुझे प्यार तुम से नहीं है, नहीं है

तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है
मुझे प्यार तुम से नहीं है, नहीं है
तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है



जैसा मैंने पिछली पोस्ट में भी कहा कि रूना लैला का हिंदी फिल्मों में गाया ये मेरा सबसे प्रिय गीत है। रूना जी की आवाज गीत के उतार चढ़ाव को बड़ी खूबसूरती से प्रकट करती चलती है। जब नायक सपनों के टूटने से उपजी खीज से मोदी को सफलता (कहानी का एक पात्र) की सीढ़ी बनाने की बात करता है तो नायिका को लगने लगता है कि मैंने सच,ऍसे शख्स से प्रेम नहीं किया था और गीत के दूसरे रूप में यहीं भावना उभरती है। रूना जी की आवाज की गहराई यहाँ आँखों को नम कर देती है..

आप बताएँ ये गीत आपको कैसा लगता है?

बुधवार, मार्च 26, 2008

आइए सुनें रूना लैला को: दिल की हालत को कोई क्या जाने, या तो हम जाने या ख़ुदा जाने..


पिछले दो हफ्तों से मियादी बुखार यानि Typhoid से संघर्ष करने के बाद अब लग रहा है कि शीघ्र ही इसके चुंगल से निकल पाऊँगा। इस वज़ह से होली तो फीकी रही ही, ब्लागिंग पर भी विराम लग गया। दवाओं की जितनी मात्रा पिछले दो हफ्तों में गटकनी पड़ी उतनी पिछले दो तीन सालों में नहीं खाईं थीं। खैर अब बुखार काबू में है, पर एंटीबॉयटिक्स के हेवी डोज ने शरीर का बाजा बजा दिया है तो अभी भी डॉक्टरी सलाह अनुसार विश्राम कर रहा हूँ।


तो आज बात रूना लैला जी की क्योंकि आज इनकी ही एक गैर फिल्मी उदास नज़्म आपको सुनवा रहा हूँ जो मैंने नब्बे के दशक में सुनी थी। आपको तो पता ही होगा की रूना लैला बाँगलादेश से हैं। बेहद छोटी उम्र से उन्होंने उस्ताद हबीबद्दीन खाँ से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेनी शुरु की। मात्र छः साल की आयु में उन्होंने बतौर गायक अपना जनता के सामने अपना पहला कार्यक्रम दिया।

१२ साल की उम्र में उनके गीत पाकिस्तानी फिल्म 'जुगनू' में शामिल हुए। पर ये मौका भी उन्हें अचानक हाथ लगा। गाने के लिए चुनाव उनकी बड़ी बहन दीना का हुआ था पर जिस दिन उन्हें गाना था उनका गला खराब हो गया और रूना को उनकी जगह गाने को कहा गया। नन्ही रूना को उस वक़्त तानपूरा भी पकड़ने नहीं आता था सो तिरछा ना रख कर सीधा रख कर रूना ने एक 'खयाल' गाया जो लोगों को बेहद पसंद आया। उसके बाद तो उनका कैरियर ग्राफ ऊपर ही चलता गया।

रूना बाँगलादेश, पाकिस्तान और भारत में समान रूप से लोकप्रिय हुईं। खासकर 'दमा दम मस्त कलंदर' की लोकप्रियता के बाद रूना लैला हिंदुस्तान के कोने कोने में जानी जाने लगीं थी। पाँच हजार से अधिक गीत गाने वालीं रूना, १७ भाषाओं का ज्ञान रखती हैं। कई हिंदी फिल्मों में अपनी आवाज़ दे चुकी हैं जिनमें घरौंदा फिल्म के लिए गाए उनके गीत तो मुझे बेहद प्रिय हैं। आज भी रूना विश्व के कोने कोने में अपने स्टेज शो करती रहती हैं।

मुझे रूना जी की आवाज़ हमेशा से पसंद है। और जब जब दिल में मायूसी और बेचैनी का पुट ज्यादा हो जाता हैं तो उनकी इस नज़्म को सुनना अच्छा लगता है।

ये कैसा ऐ निखरते बादलों तुम पर शबाब आया
कोई ईमान खो बैठा, कोई ईमान ले आया
फरिश्तों की इबादत से बताओ दुश्मनी क्यों है
किसी के वास्ते कोई तड़प कर जान दे आया

दिल की हालत को कोई क्या जाने
दिल की हालत को कोई क्या जाने
या तो हम जाने या ख़ुदा जाने

सुबह के साथ हैं हसीं किरणें
रात सज जाए चाँद तारों से
सुबह के साथ हैं हसीं किरणें
रात सज जाए चाँद तारों से
एक हम हैं कि क्या मुकद्दर है
कोई रिश्ता नहीं बहारों से
काश दे दें हाए ~ ~ ~
काश दे दें सुकून वीराने
दिल की हालत को कोई क्या जाने
या तो हम जाने या ख़ुदा जाने

क्या सितम है कि मोतिया बूँदें
कच्चे जख्मों को गुदगुदाती हैं
इन घटाओं का क्या करे कोई
जो सदा खून ही रुलाती हैं
अब कहाँ जाएँ हाए ~ ~ ~
अब कहाँ जाएँ दिल को बहलाने


दिल की हालत को कोई क्या जाने
या तो हम जाने या ख़ुदा जाने


इस नज्म को संगीतबद्ध किया था मशहूर संगीतकार स्वर्गीय ओ. पी. नैयर ने और इसे लिखा था नूर देवासी साहब ने। ये नज्म एलबम 'लव्स आफ रूना लैला' में है जिसे आप यहाँ से खरीद सकते हैं.







अगली पोस्ट मे रूना जी का गाया मेरा मनपसंद गीत आपके सामने होगा।

मंगलवार, मार्च 18, 2008

आइए झांके हृदय गवाक्ष के अंदर और मिलें कंचन सिंह चौहान से..

आज आपको मिलवाते हैं हमारी साथी महिला चिट्ठाकार कंचन सिंह चौहान से जिनसे २९ फरवरी को मेरी मुलाकात लखनऊ में हुई थी। कंचन चौहान से पहला संपर्क आरकुट के गोपाल दास नीरज समूह पर हुआ था।वहाँ से मैं उनकी प्रोफाइल पर गया था तो ये पंक्तियाँ पढ़कर मंत्रमुग्ध हो गया था


नित्य समय की आग में जलना,
नित्य सिद्ध सच्चा होना है,
माँ ने दिया नाम जब कंचन,
मुझको और खरा होना है 

मुझे जीवन में अक्सर ऍसे लोग अच्छे लगे हैं जिनमें अपने हुनर के प्रति आत्मविश्वास हो और अपने इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए धैर्य और परिश्रम से परहेज ना हो। ऍसा इसलिए भी है कि ऍसे लोगों की संगत आपको भी उत्प्रेरित करती है अपनी कर्मठता बनाए रखने की। और इन पंक्तियों के पीछे मुझे ऍसे ही इंसान की हल्की छाया जरूर दिखी।

उनकी चिट्ठे की प्रोफाइल पर आज जो तसवीर है ,वही उस वक्त आरकुट पर थी पर ये बात मैंने कभी गौर नहीं की कि चित्र में वो व्हील चेयर पर बैठीं हैं। जब मुझे ये बात कंचन से पता चली कि वो बचपन से पोलियो की समस्या से पीड़ित हैं तो मैं स्तब्ध रह गया। ये कंचन की जीवटता का ही कमाल है कि बिना व्हील चेयर के ये लड़की स्कूल और कॉलेज की सीढ़ियां घिसट घिसट कर चढ़ती रही, गिरती रही, दबती रही फिर भी अपनी हताशा पर काबू पाकर इन विषम परिस्थितियों को कभी पढ़ाई के बीच नहीं आने दिया।

कंचन के पिता की ख्वाहिश थी की बिटिया कॉलेज में अंग्रेजी विषय जरूर चुने। पिता तो नहीं रहे पर उनकी इच्छा को पूर्ण करने के लिए कंचन ने पहले अंग्रेजी में परास्नातक किया और फिर अपनी इच्छा के विषय हिंदी में भी। कंचन, फिलहाल एक सरकारी महकमे में हिंदी अनुवादक के पद पर कार्यरत हैं। पर कृतिदेव में अनेकों पांडुलिपियों को लिखने के बाद भी ये इस बात से अनिभिज्ञ थीं कि यूनीकोड भी कोई चीज होती है। इन्हें मैंने परिचर्चा में जाने की सलाह दी कि वहाँ बहुत सारे लोग आपको यूनीकोड में टाइप करने के औजार और गुर सिखा देंगे। पर उनकी यूनीकोड सीखने की लगन और उनकी कविताओं की गुणवत्ता को देखने के बाद मैंने मन ही मन निश्चय किया कि कंचन की प्रतिभा को सही रूप में ज्यादा लोगों तक एक चिट्ठे के माध्यम से पहुँचाया जा सकता है। कंचन परिचर्चा में तो नियमित रूप से कविता लिखती रहीं पर अपना चिट्ठा बनाने की जब भी बात होती उनकी स्वास्थ समस्याएँ आड़े आ जातीं। खैर , वो अस्वस्थता के दौर से बाहर निकलीं और फिर हृदय गवाक्ष अस्तित्व में आया। इतने कम समय में भी चिट्ठाकारों और पाठकों का जो प्रेम उन्हें मिला है वो उनकी लेखन प्रतिभा का प्रमाण है।

ऍसे में लखनऊ एक शादी में जाने का कार्यक्रम बना तो मैंने कंचन को अपने कार्यक्रम की सूचना दी। जब मैंने ये पाया कि इनके घर से मेरे रहने के स्थान की दूरी २० किमी है तो मैंने कहा कि आपको वहाँ तक पहुँचने या मुझे लिवा लाने में समस्या आएगी। अब बोलने में कंचन कम उस्ताद नहीं है, तुरंत कह बैठीं

"..आप चिंता क्यों करते हैं? आपको बस निर्दिष्ट स्थान तक पहुँचना है, वहाँ से आपको उठवा लिया जाएगा।..."

खैर, मुझे स्टेशन तक पहुँचने को कहा गया। निर्धारित समय पर पहुँच गए। अगला आदेश आया कि अब रानी कलर की कमीज पहने युवक आपको स्टेशन पर रिसीव करेगा। जब बीस पचीस मिनट गुजर गए तो मैंने चहलकदमी करनी शुरु कर दी। इसी बीच दो तीन रानी कलर कमीज वाले नजर भी आए जिनके आमने सामने से मैं दो तीन बार आशा भरी निगाहों से गुजरा पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब प्रतीक्षा करते करते ४० - ४५ मिनट गुजर गए तो ख़बर आई कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों से आपको लाने वाले दूत को बदल दिया गया है।

थोड़ी ही देर बाद अवधेश मेरे सामने थे। वे मुझे लखनऊ का दर्शन कराते हुए गंतव्य स्थान पर ले गए। हमलोग पहले पहुँच गए थे इसलिए अवधेश से उनके कैरियर संबधित बातचीत हुई। फिर कंचन आईं अपने भांजे विजू के साथ। अगले दो घंटे खालिस गपशप में बीते। कंचन व्यक्तिगत रूप से मुझे मिलनसार और हँसमुख (इसका प्रमाण आप इनके चित्रों को देख कर कर सकते हैं)इंसान लगीं। परिवार के सारे बड़े छोटों की वो चहेती रही हैं। बड़े छोटों में नेह बाँटना इन्हें बखूबी आता है। इस बात से इनकी लिखी ये कविता याद आती है..

तुम अपनी परिभाषा दे लो, वो अपनी परिभाषा दें लें,
मेरे लिये नेह का मतलब केवल नेह हुआ करता है।

वही नेह जो गंगा जल सा सारे कलुष मिटा जाता है,
वही नेह जो आता है तो सारे द्वेष मिटा जाता है।

वही नेह जो देना जाने लेना कहाँ उसे भाता है,
वही नेह जो बिना सिखाए खुद ही त्याग सिखा जाता है।

वही नेह जो बिन दस्तक के चुपके से मन में आता है,
वही नेह जो साधारण नर में देवत्व जगा जाता है।


पर बालकों ने ये भी बताया कि घर में इनकी निरंकुश सत्ता चलती है:)। जिद पर आ जाएँ तो बात वात करना बंद कर दें तब इन्हें मनाने के कई पुराने नुस्खे अपनाने पड़ते हैं, जिसमें अक्सर कामयाबी मिल ही जाती है।
कंचन संयुक्त परिवार में पली बढ़ी हैं और समाज में नारी के किरदार की उनकी एक सोच है जिनके कुछ बिंदुओं पर मेरी उनसे कई बार बहस हो चुकी है। वही चर्चा यहाँ भी खिंच गई कि क्या लड़के और लड़कियों के लालन-पालन में हम आज भी क्या एक मापदंड को अपनाते हैं? सबने अपने अपने अनुभव बाँटे। फिर विजू ने बताया कि उसे जोधा अकबर में क्या अच्छा लगा। साहित्य और संगीत में कंचन की खासी अभिरुचि रही है और मैंने सोचा था कुछ उनकी पसंदीदा किताबों के बारे में भी उनकी राय लूँगा पर घड़ी की सुईयाँ तेजी से आगे बढ़ रहीं थीं। १.३० बज रहे थे और मुझे वापसी की ट्रेन पकड़नी थी इसलिए कंचन और विजू से विदा लेकर मैं अवधेश के साथ वापस स्टेशन की ओर चल पड़ा।

अब देखिए इस मौके पर ली गई कुछ तसवीरें और हाँ कंचन जी की शिकायत है कि मेरे कैमरे ने उन्हें 20% extra dark दिखाया है। मैंने उनकी शिकायत सोनी कंपनी तक पहुँचा दी है पर फिलहाल तो मैं यहीं कह सकता हूँ कि आप लोग चित्र देखते समय इस हिसाब से आवश्यक फिल्टरेशन कर ही उनकी कोई छवि मन में बनाइएगा  :)।





ये हम तीनों के व्यक्तित्व का कमाल था कि कंचन चित्र लेते समय अंदर से बाहर तक हिल गईं

वैसे इस मुलाकात की कुछ और तसवीरें आप यहाँ भी देख सकते हैं

शुक्रवार, मार्च 14, 2008

एक मुलाकात सुर प्रेमी 'मीत' से....

'मीत' यानि अमिताभ से मेरा कोई पुराना परिचय नहीं रहा। मुझे इनके बारे में सबसे पहले पारुल जी ने बताया था कि एक सज्जन है जो अच्छी ग़ज़ल कह लेते हैं, मेरी तरह सेल (SAIL) में हैं.... फिलहाल 'कोलकाता' में पाए जाते हैं और वो उन्हें चिट्ठा बनाने में मदद भी कर रही हैं। दो तीन दिनों बाद जब अपने कार्यालय के गलियारे में टहल रहा था कि कार्मिक विभाग के मेरे सहकर्मी का इशारा हुआ कि उनके मोबाईल पर मुझे याद किया जा रहा है। उधर लाइन पर अमिताभ थे..कुशल प्रेम के बाद उन्होंने समस्या बताई "बॉस ब्लॉगवाणी वाले रजिस्टर नहीं कर रहे हैं "। मैंने कहा मैथिली जी से बात कर देखता हूँ। मैथिली जी ने तत्काल उत्तर दिया की व्यस्तता की वज़ह से पंजीयन नहीं हो रहा था। खैर अमिताभ जी का काम हो गया। पर इस बातचीत के बाद नई जानकारी ये मिली कि अमिताभ एक ज़माने में राँची में काम कर चुके हैं।

मैंने सोचा कि तब तो हमारे मित्र गणों में कई इन्हें बखूबी जानते होंगे। तुरंत हमने जाँच पड़ताल शुरु की। तहकीकात के बाद पता चला कि जनाब हमारे कार्यालय के सामने वाले G Block के बाशिंदे रह चुके हैं। उनके मित्र अभी भी चाव से उन दिनों की कहानियाँ सुनाते हैं। कहानियों का सार ये ही रहा कि संगीत और सुरापान पर उनकी अनन्य भक्ति थी और शायद ही उनकी कोई रात इसके बिना गुजरती थी। पर ये बातें बारह साल पुरानी हो चुकीं थीं । मन ही मन सोचा कि जब उनसे मुलाकात होगी तो देखूँगा उनके स्वरूप में कितना बदलाव आया है।

फरवरी के अंतिम सप्ताह की बात है। शाम के साढ़े छः बजने वाले थे। मैं अभी ओफिस में ही था कि मोबाइल की घंटी बज उठी। आवाज़ सुनते ही समझ आ गया कि उधर कौन सी बला :) है। पता चला हुजूर हमारे कार्यालय के बगल में स्थित ट्रेंनिंग सेंटर में पधारे हैं। मैं अपने काम निबटा कर सवा सात के करीब उनके कक्ष में पहुँच गया।

कमरे में मद्धम प्रकाश जल रहा था। दूर किनारे वाली कुर्सी पर अमिताभ बैठे मिले..दाँयी तरफ क़ाग़ज में लिपटी बोतल और हाथ में जाम। कुशल प्रेम पूछने के बाद तुरंत ही पूछा

...लोगे?

मैंने नकारा तो कह उठे कि कहीं औपचारिकतावश तो ऍसा नहीं कह रहे। मैंने कहा नहीं अमिताभ साहब मैं नहीं पीता। छूटते ही जवाब आया

तो फिर जीते कैसे हो? :)

खैर, हमारी बातें शुरु हुईं रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताओं से। दिनकर से अमिताभ जी के परिवार का अर्से से जुड़ाव रहा है। दिनकर की जिंदगी के सुखद और दुखद पहलुओं से जुड़ी बातें हुईं। मीत बताने लगे कि किस तरह उन्होंने दिनकर को खुद करीब से काव्य पाठ करते सुना है और तकरीबन उनकी सारी पुस्तकें पढ़ी हैं। हाल ही में उन्होंने अपने चिट्ठे पर दिनकर की कविताओं का सस्वर पाठ कर एक नायाब श्रृंखला शुरु की है। अभी तक चिट्ठाजगत में पॉडकॉस्ट पर जितनी कविताओं को सुना है उनमें मीत का अंदाजे बयाँ मुझे सबसे अनूठा लगता है। मीत एक बुलंद आवाज़ के मालिक तो हैं ही, साथ ही अपनी आवाज़ में वो कविता की भावनाओं को हूबहू उतारने में सबसे सक्षम नज़र आते हैं।

सूफ़ी या भक्ति संगीत की बात चली । हम दोनों ने इस बात से सहमत थे कि जब आबिदा परवीन, नुसरत, पंडित जसराज और कैलाश खेर जैसे कलाकार गाते हैं तो लगता है कहीं ना कहीं ऊपरवाले तक बात पहुँच रही है। मीत के भाई कैलाश खेर के काफी नजदीकी रहे हैं। कैलाश अपनी निजी जिंदगी में सादगी और संगीत के प्रति पूर्ण समर्पण रखते हैं, इससे जुड़ी बातें मीत ने बताईं।

फिल्म संगीत के मामले में हमलोगों की पसंद और विचार एक जैसे नहीं हैं। मीत को पचास और साठ के बीच ही का संगीत ही भाता है जबकि मेरी पसंद के गीतों की फेरहिस्त में पुराने से लेकर नया संगीत भी शामिल है। मेरा मानना है कि अच्छे गीतों की संख्या में कमी भले आई हो पर वे विलुप्त किसी काल में नहीं हुए। वैसे संगीत के बारे में चर्चा गुलज़ार से शुरु हुई। मीत कहने लगे कि गुलज़ार से उन्हें खासी नाराजगी है। गुलज़ार मेरे पसंदीदा गीतकार हैं इसलिए उत्सुकता हुई कि मीत का अभिप्राय क्या है? मीत ने पहला गोला दागा

"क्या जरूरत थी गालिब की ज़मीन से उस शख्स को दिल ढूंढ़ता है फुरसत के रात दिन लिखने की... जबकि वो इतना talented है कि ऍसे कितनी रचनाएँ स्वयम् कर सकता है?"

मैंने कहा कि गालिब की शायरी से प्रेरित होकर किसी गीत की रचना करना कोई गलती नहीं है, हाँ इस बात का जिक्र गीत की credits में अवश्य होना चाहिए था और अगर ऍसा नहीं किया गया तो वो ग़लत था। रही talented होने की बात तो हुनरमंद होने का मतलब ये नहीं कि आप किसी से प्रेरित होकर कुछ रचने का अधिकार भी खो दें। शायरी जगत में ऍसे बहुतेरे उदहारण मौजूद हैं। इस पोस्ट को लिखते वक्त मुझे फ़ैज की वो ग़ज़ल याद आ रही है जो मोइनुद्दीन मखलूम की गजल से प्रेरित होकर उन्होंने लिखी थी

आपकी याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

पर क्या आपकी सारी नाराज़गी सिर्फ इसी वज़ह से है? मीत कुछ और खुले
गुलज़ार ने बाज़ार के सामने अपने आप को बेच दिया है।
सही कहूँ तो मुझे उनकी बात समझ नहीं आई। सत्तर के दशक की हमारी पीढ़ी को लेकर चालिस साल बाद आज की पीढ़ी को भी अपने गीतों से प्रभावित करने वाले गुलज़ार एक ऍसे गीतकार हैं जिन्होंने बाजार की प्रतिबद्धताऔं के बाद भी अपनी पहचान क़ायम रखी है.

मीत ने दूसरा सवाल संख्या का उठाया कि गुलज़ार ने अब तक कितने गीतों की रचना की है सत्तर से लेकर आज तक। उनके कहने का अभिप्राय था कि इस हिसाब से शौकत जयपुरी भी गुलज़ार से कहीं आगे ठहरेंगे। यही तर्क उन्होंने रफी और मुकेश की तुलना में लगाया। मैंने कहा कि इस हिसाब से तो आप मन्ना डे को भी घटिया गायक साबित कर देंगे।

मुझे तो एक कलाकार की दूसरे कलाकार से तुलना और कौन ज्यादा महान की बहस व्यर्थ की क़वायद लगती है। इसीलिए मैंने कहा कि ये हिसाब किताब मुझे नहीं रुचता। क्या बेहतर ये नहीं कि इन्होंने जो भी अच्छा रचा है उसी में हम अपना सुकून खोंजें। मीत भी सहमत दिखे। इस पूरी बात चीत में दो घंटे निकल चुके थे और मीत की रात की महफिल जहाँ जमने वाली थी वहां से फोन आने लगे थे। सो हमारी बहस वहीं खत्म हो गई।

अगले दिन भी उनसे मुलाकात की मंशा थी पर कार्यालय की व्यस्तता और लखनऊ जाने के कार्यक्रम की वजह से ये पूरी ना हो पाई। खैर, मीत चिट्ठाजगत में संगीत और कविता की स्वरलहरियाँ छेड़ते रहेंगे ऍसी आशा है...

(अगली कड़ी में बात होगी कंचन चौहान की जिनसे लखनऊ से लौटते वक्त मुलाकात हुई।)

मंगलवार, मार्च 11, 2008

असंतोष के दिन : मुंबई दंगों की पृष्ठभूमि में लिखा स्व. डां राही मासूम रज़ा का धारदार उपन्यास

'राही मासूम रज़ा' की लिखी ग़ज़लों , फिल्मी पटकथाओं से तो मेरा पूर्व परिचय था, पर एक उपन्यासकार के रूप में मैंने उन्हें पहले नहीं पढ़ा था। उनके निधन पर चिट्ठाजगत में उनके साहित्यिक जीवन की झांकी जरूर पढ़ने को मिली थी और ये भी पता चला था कि 'आधा गाँव' उनकी एक प्रसिद्ध रचना है। इसलिए अपने पुस्तकालय में मोटे-मोटे ग्रंथों के बीच दबी सहमी जब यह पुस्तक अपना असंतोष ज़ाहिर करती दिखी तो इसे पढ़ने की उत्सुकता हुई।

राही का ये उपन्यास अस्सी के दशक में मुंबई में हुए भीषण दंगो की पृष्ठभूमि में लिखा गया है। दंगों की भयावहता और उसके पीछे की छिछली राजनीति से व्यथित 'राही' बिना किसी लाग लपेट के धारदार भाषा में अपनी बात कहते हैं जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। महाराष्ट्र में आज जिस तरह की राजनीति हो रही है उसके बीज अस्सी के दशक में विभिन्न क्षेत्रीय दल पहले ही बो चुके थे। जिन प्रश्नों को राही मासूम रज़ा साहब ने अपनी इस किताब में उठाया था, उसका उत्तर पाने के लिए हम सभी आज भी जूझ रहे हैं। मिसाल के तौर पर राही के इन सवालों पर गौर करें..

"...श्री बाल ठाकरे "आमची मुंबई कहते हैं। परंतु 'आमची' की परिभाषा क्या है? उसकी सीमाएँ क्या हैं! और यदि बम्बई आमची' है तो हिंदुस्तान किसका है?

बम्बई श्री बाल ठाकरे की है। तमिलनाडु DMK या AIDMK का है । आन्ध्र NTR का है।....पंजाब भिण्डरवाले का है। बनारस भगवान शंकर का है। अजमेर ख्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती का है! UP एटा के डाकुओं का है और राजस्थान चंबल के डाकुओं का.....पर मुझे कोई सारे ज़हाँ से अच्छा जो हिंदुस्तान है उसकी पोस्टल एड्रेस नहीं बताता। यह नहीं बताता की हिदुस्तान का दाख़िल खारिज किसके नाम है?
ऐ लावारिस मुल्क तू मेरा है। ......."

दंगों के इतिहास में पुलिस की कार्यप्रणाली पर हमेशा प्रश्नचिन्ह उठते आए हैं। दंगों में पुलिस के व्यवहार, उसकी मानसिकता को खुले शब्दों में व्यक्त करते हुए वो कहते हैं

"...तुम मराठे इतना टची क्यूँ होते हो?" अब्बास ने पूछा। "अरे भैया UP में भी पुलिस मुसलमानों को मारती है। यहाँ पुलिस में मराठे ज्यादा है। जो कर्नाटक महाराष्ट्र की सीमा पर कर्नाटक के ब्राह्मणों और मराठों के बीच लड़ाई होगी तो वह कर्नाटक के ब्राह्मणों को भी मारेगी। उत्तर प्रदेश की PAC में कान्यकुब्ज ब्राह्मण ज्यादा हैं तो वह ठाकुरों, हरिजनों और मुसलमानों को मारती है। पुलिस में हमीं तुम होते हैं ना। हम अपने मुहल्लों, अपने गावों,अपने कस्बों के सारे डर, वहाँ की सारी नफ़रतें, सारे तनाव लेकर पुलिस क्वाटर्स में जाते हैं। पुलिस में मुसलमान ज्यादा होंगे तो पुलिस हिंदुओं को मारेगी।......."

एक सौ ग्यारह पन्ने की इस किताब में राही द्वारा रचित चरित्र उतने महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण है तो इन चरित्रों का सामाजिक परिवेश और उनके इर्द गिर्द पनपती समस्याएँ। उपन्यास के पात्रों का प्रयोग राही मुंबई या एक तरह से कहें तो पूरे देश के सामाजिक ढांचे में फैली गरीबी, अशिक्षा, जातिवाद, सांप्रदायिकता और ओछी राजनीति के चक्रव्यूह का पर्दाफाश करने में करते हैं। अब यहीं देखिए मुंबई की स्लम में रहते और पनपते परिवारों की दशा दिशा का कितना जीवंत चित्रण किया है रज़ा साहब ने

".....खाते पीते गरीब वह है जो वास्तव में गरीब नहीं हैं। जब बम्बई आए तो वो अवश्य गरीब थे। कोठरी भी न ले सके तो कहीं सरकारी जमीन पर इलाके के दादा की इजाजत से झोपड़ी डाल के रहने लगे।
यह झोपड़ी प्रेमचंद की कहानियों सी झोपड़ी नहीं होती। इसे झोपड़ी इसलिए कहते हैं कि इसका नामाकरण नहीं किया जा सका है। यह तीन चार फीट ऊँची एक चीज होती है जिसकी दीवारें सड़े गले पैकिंग के बक्से की होती हैं। ऊपर फटी हुई तिरपाल या प्लास्टिक का टुकड़ा, न दरवाजा, ना खिड़की। लोग उनसे रेंगकर अंदर जाते हैं और रेंगकर बाहर जाते हैं।..यह ईमानदार कामगारों की झोपड़ियाँ हैं फिर इन्हीं झोपड़ियों में हरी लाल झंडियाँ लगा कर दुल्हन ले जायी जाती है। फिर इन्हीं झोपड़ियों में बच्चे होते हैं...फिर उन बच्चों में कोई जेबकतरा हो जाता है। कोई कच्ची दारु के धंधे में लग जाता है...कोई किसी दादा के साथ लगकर किसी तस्करी या MP, MLA की छत्र छाया में चला जाता है। फिर घर में थोड़ा पैसा आने लगता है। झोपड़ी का ज़रा क़द निकल आता है। दरवाजा लग जाता है। खिड़कियाँ बन जाती हैं। टीन की छत पड़ जाती है। फिर इधर उधर की जमीन जुड़ जाती है। कभी कभी एक मंजिल ओर चढ़ जाती है और छत टाइल की हो जाती है।..."

राही का मन अखंड भारत, अनेकता में एकता, धर्मनिरपेक्षता जैसे जुमलों को ज़मीनी हक़ीकत से बहुत दूर मानता है। उनके दिल की नाराज़गी इस क़दर है कि वो बड़े बड़े राजनेताओं को भी नहीं बख्शते..

"...लोग कहते हैं पंडित मोतीलाल की मुसलमान पत्नी थी..हाँ भई तो पत्नी थी ना !और प्रियदर्शनी ने जो फ़ीरोज गाँधी से शादी की...फ़ीरोज गाँधी पारसी थे जो वह मुसलमान होते तो गाँधीजी यह शादी कभी ना होने देते।...."

किताब सिर्फ राजनेताओं पर तंज़ नहीं कसती.. साथ ही अली सरदार जाफ़री और मजरूह सुलतानपूरी जैसे प्रगतिशील और दिमागी शायर रज़ा साहब की लेखनी की चपेट में आ जाते हैं।

पर जब वो कहते हैं कि इस देश में

"....धर्मनिरपेक्षता की ज़मीन बहुत कमजोर है। कुदाल फावड़े की जरूरत नहीं है, नाखून से जरा सा खुरचें तो धर्मनिरपेक्षता काग़ज़ की तरह फट जाती है और कोई शाही इमाम,, कोई देवरस, कोई भिंडरवाले, कोई बाल ठाकरे निकल आता है। सांप्रदायिकता का प्रेत हमारे अंदर दिलों कि किसी गली में छुप कर बैठा है और जब किसी तरह से रोशनी आने लगती है तो ये प्रेत उठकर दिल के दरवाजे खिड़कियाँ बंद कर देता है। ...."

तो मेरा दिल भी उनके ज़ज़्बातों की गवाही देता है। जैसा कि किताब के आरंभ में प्रकाशक के नोट में कहा गया है कि

"इस कृति की माँग है कि इन सवालों से जूझा और टकराया जाए। इसी समय इसके उत्तर तालाश किए जाएँ अन्यथा मनुष्य के अस्तित्व की कोई गारंटी नहीं रहेगी।"

पुस्तक के बारे में
नाम : असंतोष के दिन
लेखक: स्व.डा. राही मासूम रज़ा
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
प्रथम संस्करण: १९८६

इस चिट्ठे पर आप इन पुस्तकों के बारे में भी पढ़ सकते हैं
गुनाहों का देवता, कसप, गोरा, महाभोज, क्याप, एक इंच मुस्कान, लीला चिरंतन, क्षमा करना जीजी, मर्डरर की माँ, दो खिड़कियाँ, हमारा हिस्सा, मधुशाला

शनिवार, मार्च 08, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : 'सरताज गीत'- यूँ तो मैं दिखलाता नहीं तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ..

प्रतीक्षा के पल समाप्त हुए। वक्त आ पहुँचा है वार्षिक संगीतमाला के सरताजी बिगुल के बजने का..बात पिछले नवंबर की है। मैं अपनी इस संगीतमाला के लिए पसंदीदा गीतों की फेरहिस्त तैयार करने में जुटा था। पर 15-16 गीतों की सूची तैयार करने के बाद भी अपनी प्रथम दो स्थानों के लायक मुझे कोई गीत लग ही नहीं रहा था। 



पर तब तक मैंने तारे जमीं पर के गीतों को नहीं सुना था। टीवी पर भी शुरुआत में सिर्फ शीर्षक गीत की कुछ पंक्तियाँ दिखाई जा रही थीं। दिसंबर का अंतिम सप्ताह आने वाला था और पहली पॉयदान की जगह अभी तक खाली थी। और तभी एक दिन किसी एफ एम चैनल से इस गीत की पहली दो पंक्तियाँ उड़ती उड़ती सुनाई दीं....

मैं कभी बतलाता नहीं पर अँधेरे से डरता हूँ मैं माँ
यूँ तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ..
.

हृदय जैसे थम सा गया। तुरंत इंटरनेट पर जाकर ये गीत सुना और गीत की भावनाएँ इस कदर दिल को छू गईं कि आँखें नम हुए बिना नहीं रह सकीं।

कुछ गीत झूमने पर विवश करते हैं...
कुछ की मेलोडी मन को बहा ले जाती है...
वहीं कुछ के शब्द हृदय को मथ डालते हैं, सोचने पर विवश करते हैं।


'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमालाओं में मैंने ऍसे ही तीसरी कोटि के गीतों को हमेशा से साल के 'सरताज गीत' का तमगा पहनाया है और शायद इसलिए आप में से बहुतों ने मेरी पसंद के सरताज गीत की सही पहचान की है।

जिंदगी में अपने नाते रिश्तेदारों के स्नेह को बारहा हम 'Taken for Granted' ले लेते हैं। हम भी उनसे उतना ही प्रेम करते हैं पर व्यक्त करने में पीछे रह जाते हैं। ऍसे रिश्तों में ही सबसे प्रमुख होता है माँ का रिश्ता ...
ये गीत मुझे याद दिलाता है ...

माँ के हाथ से खाए उन कौरों के स्वाद का.....
बुखार में तपते शरीर में सब काम छोड़ चिंतित चेहरे के उस ममतामयी स्पर्श का... अपनी परवाह ना करते हुए भी अपने बच्चों की खुशियों को तरज़ीह देने वाली उस निस्वार्थ भावना का....

तारे जमीं पर मैंने अंततः फरवरी में जाकर देखी और  प्रसून का गीत तो माँ के बिना अपने आप को मानसिक रूप से असुरक्षित महसूस करते बच्चे की कहानी कहता है, पर सुनने वाला बच्चे का दर्द महसूस करते करते अपने बचपन में लौट जाता है और इसी वज़ह से गीत से अपने आप को इतना ज्यादा जुड़ा महसूस करता है।

वार्षिक संगीतमाला 2006  के सरताज गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजे को लिखने वाले जावेद अख्तर साहब इस गीत के बारे में कहते हैं

"........यूँ तो तारे जमीं के सारे गीत स्तरीय हैं पर वो गीत जो मुझे हृदय की तह को छूता है वो माँ...ही है। आलमआरा के बाद सैकड़ों गीत माँ को याद करते हुए लिखे गए हैं पर फिर भी ये गीत अपनी सादी सहज भावनाओं से हृदय के तारों को झंकृत सा करता चला जाता है। गीत के शब्द, इसकी धुन और बेहतरीन गायिकी इस गीत को इतना प्रभावशाली बनाने में मदद करती है। बस इतना ही कह सकता हू् कि गीत की अंतिम पंक्तियों को सुनते सुनते मेरी आँखें सूखी नहीं रह गईं थीं।...."
शंकर एहसान लॉए की सबसे बड़ी काबिलयित इस बात में है कि वो बखूबी समझते हैं कि गीत के साथ संगीत का पुट उतना ही होना चाहिए जिस से उसकी प्रभावोत्पादकता कम ना हो। बातें बहुत हो गईं अब स्वयं महसूस कीजिए इस गीत को



मैं कभी बतलाता नहीं पर अँधेरे से डरता हूँ मैं माँ
यूँ तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ
तुझे सब है पता, है ना माँ......मेरी माँ

भीड़ में यूँ ना छोड़ो मुझे, घर लौट के भी आ ना पाऊँ माँ
भेज ना इतना दूर मुझको तू, याद भी तुझको आ ना पाऊँ माँ
क्‍या इतना बुरा हूँ मैं माँ, क्‍या इतना बुरा.............मेरी माँ

जब भी कभी पापा मुझे जोर ज़ोर से झूला झुलाते हैं माँ
मेरी नज़र ढूँढे तुझे, सोचूँ यही तू आके थामेगी माँ
तुमसे मैं ये कहता नहीं, पर मैं सहम जाता हूँ माँ

चेहरे पे आने देता नहीं, दिल ही दिल में घबराता हूँ माँ
तुझे सब है पता, है ना माँ......मेरी माँ

मैं कभी बतलाता नहीं, पर अंधेरे से डरता हूँ मैं माँ
यूं तो मैं दिखलाता नहीं, तेरी परवाह करता हूँ मैं माँ
तुझे सब है पता, है ना माँ......मेरी माँ


इसी गीत का एक टुकड़ा गीत के थोड़ी देर बाद आता है, (जो सामान्यतः इंटरनेट या चिट्ठों पर नहीं दिखाई देता) बच्चे की संवेदनहीन त्रासद स्थिति तक पहुँचने की कथा कहता है

आँखें भी अब तो गुमसुम हुईं
खामोश हो गई है ये जुबां
दर्द भी अब तो होता नहीं
एहसास कोई बाकी हैं कहाँ
तुझे सब है पता, है ना माँ

मेरे लिए ये अपार हर्ष की बात है कि ये गीत इस साल के फिल्मफेयर और अपने RMIM पुरस्कारों के लिए भी सर्वश्रेष्ठ गीत के रूप में चुना गया है।

दोस्तों दो महिने से चलती आ रही इस वार्षिक संगीतमाला के सफ़र पर आप सब मेरे साथ रहे इसका मैं शुक्रगुजार हूँ। ये समय कार्यालय के लगातार आते कामों की वज़ह से मेरे लिए अतिव्यस्तता वाला रहा इसलिए ये श्रृंखला फरवरी में खत्म होने के बजाए मार्च तक खिंच गई। आशा है गीतमाला में पेश किए गए गीतों में से ज्यादातर आपके भी पसंदीदा रहे होंगे। तो ये सफ़र समाप्त करने के पहले एक पुनरावलोकन हो जाए इस संगीतमाला के प्रथम बीस गीतों का


इस संगीतमाला के सारे गीत

रविवार, मार्च 02, 2008

वार्षिक संगीतमाला 2007 :रनर्स अप - खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..

वार्षिक संगीतमाला 2007 के रनर्स अप यानि उपविजेता का खिताब गीतकार प्रसून जोशी संगीतकार शंकर-एहसान-लॉए और गायक शंकर महादेवन के सम्मिलित प्रयासों से फलीभूत 'तारे जमीं पर' के शीर्षक गीत को जाता है।

बच्चों की दुनिया कितनी उनमुक्त, कितनी सरल कितनी मोहक होती है ये हम सभी जानते हैं। फिर भी हमारा सारा प्यार अपने करीबियों तक ही सीमित रह जाता है। अपनी-अपनी जिंदगियों में फँसे हम उससे ज्यादा दूर तक देख ही नहीं पाते। पर बिना किसी पूर्वाग्रह के जब आप किसी भी बच्चे की हँसते खेलती जिंदगी में झांकते हैं तो मन पुलकित हुए बिना नहीं रह पाता।

पर सारे बच्चे इतने भाग्यशाली नहीं होते। जीवन की परिस्थितियाँ वक़्त के पहले उनसे उनका बचपन छीन लेती हैं। क्या हम बेवक़्त अपनी जिंदगियों से जूझते इन बच्चों से अपना कोई सरोकार ढूँढ पाते हैं। नहीं...क्यूँकि बहुत कुछ देखते हुए भी हमने अपने आप को भावशून्य बना लिया है। वो इस लिए भी कि इस भागती दौड़ती जिंदगी के तनावों के साथ साथ अगर जब ये सब सोचने लगें तो हमारी खीझ बढ़ जाती है। खुद से और इस समाज से भी। पर मन ही मन हम भी जानते हैं कि हमारा ये तौर तरीका सही नहीं। ये गीत हमें एक सामाजिक संवेदनशील प्राणी की हैसियत से अपनी जिम्मेदारी का अहसास दिलाता है।

प्रसून जोशी ने इस गीत में जो कमाल किया है उसके बारे में जावेद अख्तर साहब ने अपनी हाल ही में अंग्रेजी वेब साइट पर की गई संगीत समीक्षा में लिखा है...

".....खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर.. एक बेहद भावनात्मक और प्रभावशाली गीत है। इस गीत की ईमानदारी और सहजता को जिस तरीके से शंकर महादेवन ने अपनी गायिकी में उतारा है वो आपको इसके हर शब्द पर विश्वास करने पर मजबूर करता है। प्रसून ने अपनी सृजनात्मक प्रतिभा का परिचय देते हुए बेमिसाल रूपकों का प्रयोग किया है। गीत के बोल आपको हर रूपक की अलग-अलग विवेचना करने को नहीं कहते पर वे आपके इर्द-गिर्द एक ऍसा माहौल तैयार करते हैं जिससे आप प्यार, कोमलता और दया की इंद्रधनुषी भावनाओं में बहे चले जाते हैं। ये गीत एक धमाके की तरह खत्म नहीं होता ..बस पार्श्व में धीरे धीरे डूबता हुआ विलीन हो जाता है..कुछ इस तरह कि आप इसे सुन तो नहीं रहे होते पर इसकी गूंज दिलो दिमाग में कंपन करती रहती है।...."

प्रसून जोशी के गीत को अपने संगीत से दिल तक पहुँचाया है शंकर-एहसान-लॉए की तिकड़ी ने। ये कहने में मुझे कोई संदेह नहीं कि मेरे लिए इस साल का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार, यही तिकड़ी रही है। गीत के मूड को समझते हुए उसी तरीके का संगीत देना उनकी खासियत है। तो चलिए सुनते हैं ये प्यारा सा नग्मा...





देखो इन्हें ये हैं
ओस की बूँदें
पत्तों की गोद में ये
आस्मां से कूदें
अंगड़ाई लें फिर
करवट बदल कर
नाज़ुक से मोती
हँस दे फिसल कर
खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..

यह तो हैं सर्दी में
धूप की किरणें
उतरें जो आँगन को
सुनहरा सा करने
मॅन के अँधेरों को
रौशन सा कर दें
ठिठुरती हथेली की
रंगत बदल दें
खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..

जैसे आँखों की डिबिया में निंदिया
और निंदिया में मीठा सा सपना
और सपने में मिल जाये फरिश्ता सा कोई
जैसे रंगों भरी पिचकारी
जैसे तितलियाँ फूलों की क्यारी
जैसे बिना मतलब का प्यारा रिश्ता हो कोई
यह तो आशा की लहर है
यह तो उम्मीद की सहर है
खुशियों की नहर है

खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..

देखो रातों के सीने पे ये तो
झिलमिल किसी लौ से उगे हैं
यह तो अम्बिया की खुशबू हैं बागों से बह चले
जैसे काँच में चूड़ी के टुकड़े
जैसे खिले खिले फूलों के मुखड़े
जैसे बंसी कोई बजाए पेड़ों के तले
यह तो झोंके हैं पवन के
हैं ये घुँघरू जीवन के
यह तो सुर हैं चमन के

खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..


मोहल्ले की रौनक
गलियाँ हैं जैसे
खिलने की जिद पर
कलियाँ हैं जैसे
मुट्ठी में मौसम की
जैसे हवाएँ
यह हैं बुजुर्गों के दिल की दुआएँ..

खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..

कभी बातें जैसे दादी नानी
कभी छलके जैसे मम्मम पानी
कभी बन जाएं भोले सवालों की झड़ी
सन्नाटे में हँसी के जैसे
सूने होठों पे ख़ुशी के जैसे
यह तो नूर हैं बरसे गर तेरी किस्मत हो बड़ी
जैसे झील में लहराए चन्दा
जैसे भीड़ में अपने का कन्धा
जैसे मन मौजी नदिया झाग उडाये कुछ कहीं
जैसे बैठे बैठे मीठी से झपकी
जैसे प्यार की धीमी सी थपकी
जैसे कानों में सरगम हरदम बजती ही रहे..

खो न जाएँ ये..तारे ज़मीं पर..


इस श्रृंखला की समापन किश्त में सुनना ना भूलिएगा वार्षिक संगीतमाला 2007 का सरताज गीत...

बुधवार, फ़रवरी 27, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ पायदान संख्या ३ हीरे मोती मैं ना चाहूँ, मैं तो चाहूँ संगम तेरा.... कैलाश खेर

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी सुरक्षित है एक ऍसी आवाज़ के लिए जो अपने आप में दिव्य है। एक ऍसा कलाकार जो जब अपनी पूरी लय में डूबा होता है तो ऍसा लगता है कि परम पिता परमेश्वर तक उसके गायन की गूँज पहुँच रही होगी। जी हाँ मैं कैलाश खेर की बात कर रहा हूँ। मेरठ की गलियों से दिल्ली और फिर अँधेरी के प्लेटफार्म से काली होंडा सिटी की सवारी करने वाले कैलाश के सांगीतिक सफ़र की दास्तां तो मैं पहले यहाँ सुना ही चुका हूँ।

कैलाश की गायिकी में उनके बचपन के ग्रामीण परिवेश और पिता के अध्यात्म प्रेम का सीधा असर है। कैलाश कहा करते हैं, कि बचपन से उनके घर में संतों, फकीरों का आना जाना लगा रहता था। एकतारे पर गाते हुए जब कैलाश उन्हें देखते तो उनकी बातों का पूर्ण अर्थ ना समझते हुए उसे गाने लगते। लोक धुनों के प्रति कैलाश का झुकाव भी इसी परिवेश की उपज रहा है। कैलाश का मानना है जो गीत जीवन और प्रकृति के सत्यों को उद्घाटित करे वो ही मन को सबसे ज्यादा सुकून देता है और वो इसी बात को मन में रखकर अपने गीतों का ताना बाना बुनते हैं।


इस श्रृंखला का ये एकमात्र गैर फिल्मी गीत है। तीसरी पायदान का ये गीत कैलाश के इस साल रिलीज हुए एलबम झूमो रे से लिया गया है। यूँ तो सलाम-ए-इश्क में कैलाश खेर का गीत या रब्बा..... भी मुझे बेहद पसंद है पर मैं उसे इसलिए इस गीतमाला में शामिल नहीं कर सका कि गुरु की तरह सलाम- ए-इश्क का संगीत भी पिछले साल ही रिलीज हो गया था और दुर्भाग्यवश मै उसे उस वक्त सुन नहीं पाया था।

कैलाश खेर के लिखे इस गीत की धुन बनाने में सहयोग दिया है उनके बैंड के सदस्य प्रकाश कामथ और नरेस कामथ ने। इन तीनों ने मिलकर इस गीत के लिए अद्भुत संगीत रचा है। मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करता है अंतरे के बीच ताली और सेतार का प्रयोग। सेतार इरान का वो वाद्ययंत्र है जिससे भारतीय सितार विकसित हुआ। इस गीत में सेतार बजाने के लिए कैलाश ने इरान के सेतार वादक तहमुरेज़ को बुलाया था।

तो आइए पढ़ें प्रेम में पूरी तरह अपने आप को समर्पित करने वाली प्रेयसी की अपने सैयाँ के लिए ये प्रणय निवेदन...

हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं तो तेरी सैयाँ.. तू है मेरा
सैयाँ सैयाँ....


तू जो छू ले प्यार से, आराम से, मर जाऊँ
आ जा चंदा बाहों में, तुझ में ही गुम हो जाऊँ मैं
तेरे नाम में खो जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


मेरे दिन खुशी से झूमें गाएँ रातें
पल पल मुझे डुबाएँ रातें जागते
तुझे जीत जीत हारूँ, ये प्राण प्राण वारूँ
हाए ऍसे मैं निहारूँ, तेरी आरती उतारूँ
तेरे नाम से जुड़े हैं सारे नाते
सैयाँ सैयाँ.......


बनके माला प्रेम की तेरे तन पे झर झर जाऊँ
मैं हूँ नैया प्रीत की संसार से हर जाऊँ मैं
तेरे प्यार से तर जाऊँ
सैयाँ सैयाँ.......


ये नरम नरम नशा है बढ़ता जाए
कोई प्यार से घूँघटिया देता उठाए
अब बावरा हुआ मन, जग हो गया है रौशन
ये नई नई सुहागन, हो गई है तेरी जोगन
कोई प्रेम की पुजारन मंदिर सजाए
सैयाँ सैयाँ.......


हीरे मोती मैं ना चाहूँ
मैं तो चाहूँ संगम तेरा
मैं ना जानूँ तू ही जाने
मैं तो तेरी, तू है मेरा




(चित्र साभार हिंदुस्तान टाइम्स)

रविवार, फ़रवरी 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान संख्या ४ - पूछ रहे हैं स्वानंद कि क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल ?

वार्षिक संगीतमाला की चौथी कड़ी समर्पित है गीतकार, गायक और संवाद लेखक, रंगमंच कर्मी स्वानंद किरकिरे को जिन्होंने 'परिणिता 'और 'हजारों ख्वाहिशें ऍसी' के गीतों से मेरे दिल में पिछले तीन सालों से एक विशेष जगह बना ली थी। खोया खोया चाँद के इस गीत को जब मैंने उड़ते उड़ते सुना तो मैं आवाक रह गया कि इन्होंने तो मज़ाज लखनवी की नज़्म आवारा की पंक्तियाँ ही इस्तेमाल कर ली हैं। उस वक्त ये ध्यान नहीं रहा कि गीत की अगली पंक्ति में बकायदा स्वानंद ने 'मज़ाज' की प्रेरणा को चिन्हित किया था। वैसे तो मुझे पूरा गीत ही भाता है पर इसका ये हिस्सा मेरे लिए बेहद खास है ,लगता है अपनी ही भावनाओं को शब्द मिल गए हैं

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल

और जब कोई लेखक या गीतकार बार-बार ये एहसास दिलाते रहे कि वो आपकी बात कर रहा है तो दिल में उसकी जगह विशिष्ट हो जाती है। चाहे वो रात हमारी तो चाँद की सहेली हो..... या फिर बावरा मन देखने चला एक सपना..... स्वानंद ने हमेशा मेरी अनुभूतियों को छुआ है। आखिर स्वानंद में ये खासियत कहाँ से आई? चलिए ढ़ूंढ़ते हैं इस जवाब का हल उन्ही के कथ्यों द्वारा.. ..

क्या आपको पता है कि स्वानंद वाणिज्य के स्नातक हैं और उनके माता पिता खुद कुमार गंधर्व के शिष्य रहे हैं। पर स्वानंद का कहना है कि उन्होंने कभी संगीत के क्षेत्र में जाने का सपना नहीं देखा था। युवावस्था में वो यही सोचा करते कि माता पिता तो संगीत से जुड़े हैं ही, मैं कुछ नया क्यूँ ना करूँ ? उनकी ये सोच उन्हें ले गई नेशनल स्कूल आफ ड्रामा में। आज जिस बहुमुखी प्रतिभा का जौहर वो दिखा रहे हैं वो बहुत कुछ रंगमंच से जुड़े उनके दिनों की देन हैं। वो खुद कहते है कि नाटक में तो हमें सब करना होता था। धारावाहिक की कहानियों से लेकर संवाद लेखन तक, निर्देशन से गीतकार तक का ये सफ़र स्वानंद के लिए अपने विरासत मे मिले संस्कारों की तरफ बढ़ना भर है।

हाल ही में स्वानंद ने अपने एक साक्षात्कार में कहा
" मैं अभी भी बोलचाल की भाषा और दैनिक जीवन में दिखने वाले बिंबों का प्रयोग करता हूँ। नए जमाने के गीतकार की हैसियत से मैं सिर्फ तितलियों और नदी जैसे रुपकों का इस्तेमाल बारहा नहीं कर सकता। एक लेखक मूलतः अपने लिए लिखता है पर व्यवसायिक बंदिशों की वज़ह से ऐसा हमेशा नहीं हो पाता। आप भले ही खाना अच्छा बनाते हों पर एक खानसामे की हैसियत से ये भी जरूरी हे कि अगर आप ५ व्यंजन अपने ग्राहकों को खिलाएँ तो सात अपनी ओर से भी परोसें।"

गुलज़ार की तरह उनका मानना है कि गीत ऍसे ना हों जिनमें सब स्पष्ट हो, कुछ ऍसा भी होना चाहिए जो सुनने वाले को सोचने को मज़बूर करे उसे बार बार उस गीत को सुनने के लिए विवश करे। स्वानंद गीतकार का किरदार किसी भी हालत में संगीतकार से कम नहीं मानते। वो कहते हैं कि मैं खुद एक गीतकार बना क्यूंकि गाने सुनते वक्त मेरा ध्यान सबसे ज्यादा गीत के बोलों पर रहता था। आखिर सही तो कहते हें वो, ज्यादातर गीत जो हमें याद रह जाते हैं वो उनके बोलों की वज़ह से।

तो चलिए अब सुनते हैं ये गीत 

आज शब जो चाँद ने है रूठने की ठान ली,
गर्दिशों में है सितारे बात हमने मान ली!
अंधेरी स्याह जिंदगी को सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

जिंदगी सवालों के जवाब ढूँढ़ने चली,
जवाब में सवालों की इक लंबी सी लड़ी मिली।
सवाल ही सवाल हैं सूझती नही गली,
कि आज हाथ थाम लो इक हाथ की कमी खली!

जी में आता है, मुर्दा सितारे नोच लूँ
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
एक दो का ज़िक्र क्या मैं सारे नोच लूँ !
इधर भी नोच लूँ, उधर भी नोच लूँ !
सितारे नोच लूँ मैं सारे नोच लूँ

क्यूँ तू आज इतना वहशी है, मिज़ाज में मज़ाज़ है ऐ गम ए दिल
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,

दिल को समझाना कह दो क्या आसान है,
दिल तो फ़ितरत से सुन लो ना बेईमान है
ये खुश नही है जो मिला, बस माँगता ही है चला
जानता है हर लगी का, दर्द ही है बस इक सिला।
जब कभी ये दिल लगा, दर्द ही हमें मिला,
दिल की हर लगी का सुन लो दर्द ही है इक सिला !
क्यूँ नये नये से दर्द की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
क्यूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोए खोए चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,
कयूँ अपने आप से खफा-खफा ज़रा ज़रा सा नाराज़ है दिल
ये मंजिलें भी खुद ही तय करे,
ये फासले भी खुद ही तय करे
क्यूँ तो रास्तों पे फिर सहम सहम सम्हल सम्हल के चलता है ये दिल
क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल,


खोया खोया चाँद के इस गीत की धुन बनाई शान्तनु मोइत्रा ने और स्वानंद के साथ सहयोगी स्वर है उनके पुराने जोड़ीदार अजय झींगरन
 


इस संगीतमाला के पिछले गीत



  • पायदान १८ - हलके हलके रंग छलके ..... गीत - जावेद अख्तर संगीत - विशाल‍-शेखर चलचित्र - हनीमून ट्रैवल्स प्राइवेट लिमिटेड
  • पायदान १९ - लमहा ये जाएगा कहाँ..... गीत - प्रशांत पांडे संगीत - अग्नि चलचित्र - दिल दोस्ती ईटीसी
  • पायदान २० - जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए... गीत - सईद क़ादरी संगीत - मिथुन चलचित्र - दि ट्रेन
  • शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2008

    सुदर्शन फ़ाकिर सहज शब्दों में गहरी बात कहने वाला बेमिसाल शायर :मेरी श्रृद्धांजलि

    कल यूनुस के चिट्ठे पर सुदर्शन फ़ाकिर के ना रहने की खबर पढ़ कर कलेजा धक से रह गया। सुदर्शन उन शायरों में से थे जिसने मेरे जैसे आम संगीत प्रेमी को ग़ज़ल से जोड़ा। उर्दू की ज्यादा जानकारी ना रखने वालों को भी गज़लों की ओर मुखातिब करने में उनका योगदान कोई भुला नहीं सकता। पिछले एक साल से उन पर आधारित एक श्रृंखला शुरु करने की मेरी मंशा थी पर ये पता ना था कि मैं अपनी ये इच्छा पूरी करूँ उससे पहले ही ये महान शायर दुनिया से रुखसत हो जाएगा।

    सुदर्शन साहब ने अपने जीवन का एक अहम हिस्सा पंजाब के शहर जालंधर में बिताया। जालंधर के डी ए वी कॉलेज से राजनीति शास्त्र और अंग्रेजी में परास्नातक की डिग्री प्राप्त करने वाले फ़ाकिर ७३ साल की उम्र में एक लंबी बीमारी के बाद गत सोमवार को अपना शहर छोड़ गए। युवावस्था से फ़ाकिर को रंगमंच और शायरी का शौक था। कॉलेज के जमाने में मोहन राकेश का लिखा नाटक 'आषाढ़ का एक दिन' का उन्होंने निर्देशन किया और वो जनता द्वारा काफी सराहा भी गया। कुछ दिनों तक उन्होंने रेडिओ जालंधर में काम किया और फिर मुंबई चले आए।

    अस्सी के दशक में जगजीत-चित्रा की जोड़ी को जो सफलता मिली उसमें सुदर्शन फा़किर की लिखी नायाब ग़ज़लों का एक अहम हिस्सा था। वो कागज़ की कश्ती.. इश्क़ ने गैरते जज़्बात..और पत्‍थर के ख़ुदा पत्‍थर के सनम पत्‍थर के ही इंसां पाए हैं... का जिक्र तो यूनुस अपनी पोस्ट में कर ही चुके हैं । सुदर्शन साहब की जो नज़्में और ग़ज़लें मेरे दिल के बेहद करीब रहीं हैं उनका एक छोटा सा गुलदस्ता मैं अपनी इस प्रविष्टि के माध्यम से श्रृद्धांजलि स्वरूप उन्हें अर्पित करना चाहता हूँ....

    बात १९९४ की है जब इनकी ये ग़ज़ल सुनी थी और इसका नशा वर्षों दिल में छाया रहता था । आज भी जब इनकी ये ग़ज़ल गुनगुनाता हूँ तो वही मस्ती मन में समा जाती है।



    चराग़-ओ-आफ़ताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी
    शबाब की नक़ाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    मुझे पिला रहे थे वो कि ख़ुद ही शम्मा बुझ गयी
    गिलास ग़ुम शराब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    लिखा था जिस किताब में, कि इश्क़ तो हराम है
    हुई वही किताब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी

    लबों से लब जो मिल गये, लबों से लब जो सिल गये
    सवाल ग़ुम जवाब ग़ुम, बड़ी हसीन रात थी


    जगजीत जी ने इस ग़ज़ल को गाया भी बड़ी खूबसूरती से है।
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    फ़ाकिर ने कुछ फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। फिल्म यलगार के संवाद लेखन भी उन्होंने किया। NCC कैम्पस में गाया जाने वाला समूह गान उन्हीं का रचा हुआ है। पर असली शोहरत उन्हें अपनी ग़ज़लों से ही मिली। सीधे सहज शब्दों से गहरी बात कहने का हुनर उनके पास था। अब इन्हीं शेरों पर गौर करें मरी मरी सी जिंदगी को ढ़ोने की मजबूरी पर क्या तंज कसे हैं उन्होंने बिना किसी कठिन शब्द का सहारा लिए हुए


    किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
    मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    मेरे रुकने से मेरी साँसे भी रुक जायेंगी
    फ़ासले और बढ़ा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    ज़हर पीने की तो आदत थी ज़मानेवालो
    अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

    चलती राहों में यूँ ही आँख लगी है 'फ़ाकिर'
    भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी


    आइए सुने इस ग़ज़ल को चित्रा सिंह की आवाज़ में
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    सुदर्शन फ़ाकिर ने ना केवल अपनी ग़जलों से कमाल पैदा किया बल्कि कई खूबसूरत नज़्में भी लिखीं। उनकी ये नज़्म मुझे सरहद पार के एक मित्र से करीब दस वर्षों पहले पढ़ने को मिली और ये तभी से मेरी प्रिय नज़्मों में एक है।

    ये शीशे ये सपने ये रिश्ते ये धागे
    किसे क्या ख़बर है कहाँ टूट जायें
    मुहब्बत के दरिया में तिनके वफ़ा के
    न जाने ये किस मोड़ पर डूब जायें

    अजब दिल की बस्ती अजब दिल की वादी
    हर एक मोड़ मौसम नई ख़्वाहिशों का
    लगाये हैं हम ने भी सपनों के पौधे
    मगर क्या भरोसा यहाँ बारिशों का

    मुरादों की मंज़िल के सपनों में खोये
    मुहब्बत की राहों पे हम चल पड़े थे
    ज़रा दूर चल के जब आँखें खुली तो
    कड़ी धूप में हम अकेले खड़े थे

    जिन्हें दिल से चाहा जिन्हें दिल से पूजा
    नज़र आ रहे हैं वही अजनबी से
    रवायत है शायद ये सदियों पुरानी
    शिकायत नहीं है कोई ज़िन्दगी से


    फ़ाकिर की एक और खूबसूरत ग़ज़ल है शायद मैं ज़िन्दगी की सहर जिसे गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है..


    शायद मैं ज़िन्दगी की सहर ले के आ गया
    क़ातिल को आज अपने ही घर लेके आ गया

    ता-उम्र ढूँढता रहा मंज़िल मैं इश्क़ की
    अंजाम ये कि गर्द-ए-सफ़र लेके आ गया

    नश्तर है मेरे हाथ में, कांधों पे मैक़दा
    लो मैं इलाज-ए-दर्द-ए-जिगर लेके आ गया

    "फ़ाकिर" सनमकदे में न आता मैं लौटकर
    इक ज़ख़्म भर गया था इधर लेके आ गया


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    फ़ाकिर के बारे में उनके मित्र कहते हैं कि वो अपने आत्मसम्मान पर कभी आंच नहीं आने देते थे। छोटी छोटी बातों पर वे कभी समझौता नहीं करते थे। फ़ाकिर ने अपनी शायरी में जिंदगी और समाज के अनेक पहलुओं को छुआ चाहे वो बचपन की यादें हो, युवावस्था के स्वप्निल दिन, समाज की असंवेदनशीलता हो या बढ़ती सांप्रदायिकता। मिसाल के तौर पर उनकी ये ग़ज़ल देखें..

    आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है
    ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है

    जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है
    फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है

    अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी
    अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है

    ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब "फ़ाकिर"
    वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है

    फ़ाकिर आज हमारे बीच नहीं हैं पर उनकी भाषाई क्लिष्टता से मुक्त सीधे दिल तक पहुँचने वाली शायरी हमेशा हमारे साथ रहेगी।

    सुदर्शन साहब की ग़जलों का संग्रह आप कविताकोश में पढ़ सकते हैं
    (सुदर्शन फ़ाकिर के बारे में व्यक्तिगत जानकारी पंजाब के अंग्रेजी अखबार 'दि ट्रिब्यून' से साभार)
     

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    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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