Sunday, March 26, 2006

आधुनिक हिन्दी कविता क्यूँ है भूली बिसरी ?

अगर हास्य कवियों की बात छोड दी जाए तो आधुनिक हिन्दी कविता के इस युग में इक आध ही ऐसे कवि हैं जिन्हें सुनने में असीम आनंद की अनुभूति होती हो । क्यूँ है ऐसी हालत इस युग की कविता की ? इस दुर्दशा का एक कारण तो ये भी रहा है कि आज के कवियों ने कविता के नये स्वरूप में सिर्फ विचारों को अहमियत दी और लय को तुकबंदी का नाम दे के उसकी सर्वथा उपेछा की ।

मेरा ये मानना है कि अगर भावना में कविता के प्राण बसते हैं तो उसकी लय में उसका शरीर। शब्दों को लय की वेणी से गुथा जाए तो उसके भाव संगीत की लहर पैदा कर आत्मा तक पहुँचते हैं । आत्मा कितनी पवित्र क्यूँ ना हो, शरीर के बिना उसका शिल्प अधूरा है।

इसलिये अगर आप से कोई ये कहे कि हिन्दी कविता सुनाओ तो यकीनन आप आज की पत्र पत्रिकाओं में छपने वाली नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ी गयी कोई कविता ही सुनाएँगे । क्यूँकि उस वक्त की कविता दिल में बसती थी और आज की कागज के पन्नों पर ।

इसलिये आज भी अगर कबीर और रहीम के दोहों में आप सही दिशा खोज पाते हों .....आज भी अगर दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान की कृतियाँ याद कर ही आपके खून में गर्मी आ जाती हो........ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की भाव प्रवणता देख के आज भी आपकी आखें नम हो जाती हों ....मैथलीशरण गुप्त कि यशोधरा और बच्चन की मधुशाला का प्रतिबिम्ब आज भी आपकी यादों में विद्यमान हो.... तो आगे की कड़ियों में आपकी भागीदारी चाहूँगा१

इस ब्लॉग की पहली वर्षगांठ जो अगले महिने आ रही है उसी पुरानी हिन्दी कविता को समर्पित रहेगी। शुरूआत करूँगा मैं गोपाल दास नीरज से जो आज के युग से ताल्लुक रखने के बावजूद उसी पुरानी काव्य शैली का निर्वहन करते आये हैं। कविता लिखने के साथ साथ उसे लयबद्ध तरीके से गाने में उनका कोई सानी नहीं है । इस मायने में उन्होंने बच्चन की विरासत को आगे बढ़ाया है.....
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12 comments:

Jitendra Chaudhary on March 30, 2006 said...

मनीष भाई, आपका हिन्दी चिट्ठाकारों के परिवार मे हार्दिक स्वागत है। किसी भी प्रकार की सहायता के लिये हम आपके एक ईमेल की दूरी पर है।

Pankaj Bengani on March 30, 2006 said...

आपका स्वागत है. आशा है आप निरंतर लिखते रहेंगे.

Pratik on March 30, 2006 said...

मनीष भाई, हिन्दी चिट्ठा जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। आखिरकार आपने देवनागरी में लिखना आरम्भ कर ही दिया। बढिया है... :)

Manish on March 30, 2006 said...

जीतेन्द्र जी, पंकज जी एवं प्रतीक जी हिन्दी ब्लाग जगत मैं स्वागत करने का बेहद शुक्रिया ! आशा है आप लोगों का साथ यहाँ अच्छा बीतेगा !:)

Anonymous said...

very good

Manish on April 23, 2006 said...

शुक्रिया गुमनाम ! इस बारे में आप क्या सोचते हैं वो भी व्यक्त करते तो मुझे खुशी होती ।

rachana on July 09, 2006 said...

namaste manish ji, aadhunik hindi kavita ke bare me aapake vicharo se mai puri tarah sahmat hun..jaisa ki aapne bataya purani hindi kavitaye aaj bhi hamare jehan me hai... mai ye kahan chahati hun..
"ek din maine ek nayi kavita padhi,shirshak samaz na payi fir bhi aage badhi.
atpate shabd the aur anjani si bhasha,kanhi kuch arth hoga man me thi ye aasha.
pata nahi kaunse yug ki katha thi,har pankti ki apani ek alag vyatha thi.
pata nahi kavi kaun se ras me the,shayad wo bahut hi asmanjas me the.
ho sakta hai meri samaz kamjor ho,lekin aakhir kavita ka kanhi to ore chchore ho!!!"
halanki ye panktiyan maine ek eng kavita padhne ke baad likhi thi,,lekin kai aadhunik hindi kavitaon ko padhane ke baad bhi muze aisa hi lagata hai.......

Manish on July 10, 2006 said...

रचना जी आप भी इस विषय पर ऍसा महसूस करती हैं जानकर बेहद खूशी हुई। और जो कविता लिखी आपने बहुत कुछ आज की हिन्दी कविता का दर्द बयां कर जाती है।

अटपटे शब्द थे और अनजानी सी भाषा
कहीं कुछ अर्थ होगा मन में थी आशा

पता नहीं कवि कौन से रस में थे
शायद वो बहुत असमंजस में थे :)


बहुत खूब लिखा है आपने। इस कविता को यहाँ बांटने का शुक्रिया !

anoop said...

मुझे लक्ता है कि हिन्दी कविता कि यह दर्दनाक हालत इसलिए है कि कोई भी हिन्दी में गर्व महसूस नहीं करता. विद्यार्थी लोग हिन्दी में नम्बर कम आने पर दुःख मनाने के बजाये, इस बात का गर्व से प्रदर्शन करते हैं. लाखों लोग एक भाषा में गर्व से बात करें टू एक अच्छा कवि निकल कर आता है. हिन्दी में गर्व करने वालों कि संख्या प्रतिदिन घटती जा रही है तो अच्छी कविता कहाँ से आएगी.

Manish on January 27, 2008 said...

अनूप भाई आपकी बात हिंदी भाषा की सामान्य बदहाली के लिए बिलकुल सही है. जब तक आप नौकरी की जरूरतों में हिंदी ज्ञान रखने का उपयोग नहीं रखेंगे तब तक ये हालत बनी रहेगी।

पर हिंदी कविता के आज के स्वरूप ने जिस तरह से आम जनता को अपने से दूर किया है उसकी जिम्मेवारी हमारे इस युग प्रगतिशील साहित्यकारों की भी है और इसी बात को मैंने इस प्रविष्टि के जरिए रेखांकित करने की कोशिश की है।

अपनी राय देने का शुक्रिया !

झारखंडी आदमी on April 18, 2010 said...

harivansh ji ki is viswavayapi soochna sanchar jaal main talash thi moti dhoondh raha tha heeron ki khan mill gayee is chadm digital duniya ka navsakchar hoon par jigyasa ke karan aapni maribhasa main gahe bagahe likh leta hoon is blog ko kaise design karte hain kripa kar baatahyen,ek behatareen pryas ke liye sadhuwaad

MUFLIS on July 25, 2010 said...

आपके विचारों से
सहमत हूँ

 

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