Monday, January 16, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 20 :जब गुलज़ार ने देखा साहिबा को इक नदी के रूप में.. Ek Naadi Thi

वार्षिक संगीतमाला 2016 के सफ़र को तय करते हुए हम आ पहुँचे हैं संगीतमाला के प्रथम बीस गीतों की तरफ़ और बीसवीं पायदान पर गाना वो जिसे लिखा है गुलज़ार ने, संगीतबद्ध किया शंकर अहसान लॉय ने और अपनी आवाज़ दी हे नूरा बहनों के साथ के. मोहन ने। 

साढ़े तीन मिनट के इस गाने में सच पूछिए तो गुलज़ार ने एक भरी पूरी कहानी छुपा रखी है जिसे आप तब तक नहीं समझ सकते जब तक आपकी मुलाकात साहिबा से ना करा दी जाए। पंजाब की तीन मशहूर प्रेम कहानियों में हीर रांझा, सोहनी महीवाल के बाद मिर्जा साहिबा की जोड़ी का नाम आता है। इसी मिर्जा साहिबा की प्रेम कहानी से प्रेरित होकर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने मिर्जया बनाई। मिर्जा साहिबा की कहानी बहुत लंबी है पर उसके अंतिम प्रसंग का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा क्यूँकि उसका सीधा संबंध इस गीत से है।


साहिबा के परिवार वालों के यहाँ से मिर्ज़ा उसकी शादी के दिन भगाकर बहुत दूर ले जाता है। जब  सफर की थकान से चूर हो कर मिर्ज़ा रास्ते में विश्राम करते हुए सो जाता है तो साहिबा उसके तरकश के तीर तोड़ देती है। उसे लगता है कि भाई उसकी हालत को देख उन दोनों पर दया करेंगे और अगर ये तीर रहने दिए तो यहाँ व्यर्थ का खून खराबा होगा। पर ऐसा कुछ होता नहीं है। साहिबा के भाई वहाँ पहुँचते ही मिर्जा पर आक्रमण कर देते हैं और जैसे ही वो अपने धनुष की ओर हाथ बढ़ाता है टूटे तीरों को देखकर साहिबा को अचरज से देखता है। तीरों की बौछार अब साहिबा अपने ऊपर लेती है और दोनों ही मारे जाते हैं।

फिल्म बनाने के दौरान राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने पटकथा लेखक गुलज़ार से यही सवाल किया था कि आख़िर साहिबा ने वो तीर क्यूँ तोड़े ? गुलज़ार ने स्क्रिप्ट के लिए उस समय मन में जो खाका खींचा उसी ने बाद में गीत की शक़्ल ले ली। क्या करती साहिबा ? एक साथ दो नावों में सवार जो थी एक ओर मिर्जा क प्यार तो दूसरी ओर घर परिवार का मोह। गुलज़ार की कल्पना ने साहिबा को एक नदी का रूप दे दिया और उन्होंने  के बारे  में लिखा

इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी
इक नदी थी...
इक नदी थी कोई किनारा छोड़ ना सकती थी
इक नदी थी ..

तोड़ती तो सैलाब आ जाता
तोड़ती तो सैलाब आ जाता
करवट ले तो सारी ज़मीन बह जाती
इक नदी थी..
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी, इक नदी थी....

आज़ाद थी जब झरने की तरह
झरने की तरह..
आज़ाद थी जब झरने की तरह
झरने की तरह.., झरने की तरह.. झरने की तरह..

एम्म.. आज़ाद थी जब झरने की तरह
चट्टानो पे बहती थी
इक नदी थी.. इक नदी थी..
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी, इक नदी थी...

हाँ . दिल इक ज़ालिम
हाकिम था वो
उसकी ज़ंजीरों में रहती थी
इक नदी थी..

इक नदी थी दोनो किनारे...इक नदी थी...



शंकर अहसान लॉय ने इस गीत में नाममात्र का संगीत संयोजन रखा है। चुटकियों, तालियों के बीच गिटार की टुनटुनाहट के आलावा कोई वाद्य यंत्र बजता नज़र नहीं आता। बजे भी क्यूँ? नूरा बहनों और मोहन की बुलंद आवाज़ के बीच पूरे गीत में चतुराई से प्रयुक्त कोरस (जिसमें शंकर महादेवन ने ख़ुद भी योगदान दिया है।) उसकी जरूरत ही महसूस नहीं होने देता। गुलज़ार के शब्द दिल को छूते हैं क्यूँकि हम सभी साहिबा की तरह कभी ना कभी जीवन में दो समानांतर धाराओं के बीच अपनी भावनाओं को घिरा पाते हैं। ना किसी के पास जा पाते हैं ना किसी को छोड़ सकते हैं। इनसे सामंजस्य बिठाना दिल के लिए बड़ा तकलीफ़देह होता है। ये गीत सुनते हुए साहिबा की मजबूरी और दिल की पीड़ा बड़ी अपनी सी लगने लगती है। शायद आपको भी लगे...

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

Sunday, January 15, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #21 : तेरे बिना जी ना लगे..जब एक राजनीतिज्ञ ने थामी गीत की डोर Tere Bina Jee Na Lage...

शोरगुल इस फिल्म का नाम आपने सुना क्या? सुनें भी तो कैसे? अपने लचर निर्देशन की वज़ह से देश के अधिकतर भागों में ये फिल्म पहले हफ्ते से ज्यादा का सफ़र तय नहीं कर पाई थी। पर वार्षिक संगीतमाला की इक्कीसवीं सीढ़ी पर जो गीत खड़ा है वो  इसी फिल्म का है । 



वैसे इस गीत से जुड़ी दो बातें आपको चौंकने पर मजबूर कर देंगी। पहली तो इसके गीतकार का नाम और दूसरी इसके संगीतकार द्वारा बजाया जाने वाला एक अनूठा वाद्य यंत्र। इस गीत को रचा है कपिल सिब्बल ने। जी आपने ठीक सुना वही सिब्बल साहब जो कांग्रेस सरकार में केन्द्रीय मंत्री का पद सँभाल रहे थे। एक धुरंधर वकील और राजनीतिज्ञ से ऐसे रूमानी गीत के लिखे जाने की कल्पना कम से कम मैंने तो नहीं की थी। कपिल साहब को कविताएँ लिखने का भी शौक़ है और जब उन्हें इस फिल्म के गीतों को लिखने का अवसर मिला तो उन्होंने खुशी खुशी हामी भर दी।

नीलाद्रि कुमार
इस गीत को रचने के लिए कपिल सिब्बल ने मशहूर सितार वादक नीलाद्रि कुमार जो इस फिल्म के संगीतकार भी हैं और कपिल के चहेते वादक भी के साथ नौ महीने का वक़्त लिया। नीलाद्रि कुमार संगीत की दुनिया में उभरता हुआ नाम हैं और अपने द्वारा विकसित किए गए वाद्य यंत्र जिटार के लिए वे काफी चर्चा में रहे थे। आप सोच रहे होंगे कि आख़िर ये जिटार क्या बला है? दरअसल जिटार एक इलेक्ट्रिक सितार है। जिटार को विकसित करने में नीलाद्रि की सोच के पीछे दो कारण थे। पहले तो सितार के प्रति विश्व के संगीतज्ञों का ध्यान आकर्षित करना और दूसरे ताल वाद्यों के शोर में से सितार की ध्वनि को मुखरित करना । नीलाद्रि कहते हैं कि जिटार का एक अपना मुकाम है और इसे सितार और गिटार का संकर नहीं मानना चाहिए।

नीलाद्रि ने इस गीत में पियानो की धुन के बीच उभरते कोरस के साथ गीत की शुरुआत की है।  यूँ तो जिटार गीत के पार्श्व में जब तब अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है पर गीत में डेढ़ मिनट के बाद इसकी आवाज़ आप स्पष्टता से सुन सकते हैं। ज़िंदगी में बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो आपके आस पास तो नहीं रहते पर जिनसे दिल का नाता बरसों का रहता है। कपिल ऐसे ही एक किरदार के दिल की बेचैनी को गीत में व्यक्त करते हैं।  प्रेम और विरह की बातें बड़े सहज शब्दों में कहते इस गीत को अरिजीत सिंह अपनी गायिकी के शास्त्रीय अंदाज़ से खास बना देते हैं।

तेरे बिना जी ना लगे , तेरे बिना जी ना लगे

नज़रों में भी तू ही दिखे, तुम ना मिले रातों जगे
ख़ामोशी में सब कह गए हैं, जहां मिल गया, जब तुम मिले
आगे बढ़े सब जान के, तेरे लिए हम जी रहे

है याद मुझे तेरी हर अदा, तेरी बातों में नशा ही नशा
खयालों में मैं तेरे खो गया, रहूँ न रहूँ तेरा हो गया
साथी बना साया ही रहा, दूरी में भी करीब ही रहा
मिलने पे भी जी ना भरा, तुम ना रहे सब खो गया
तेरे बिना जी ना लगे , तेरे बिना जी ना लगे


हाँ चलते चलते इस गीत से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य। गीत के कोरस में समाज के वंचित वर्गों के बच्चों को प्रशिक्षित कर उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया गया है। पानी के अंदर गीत के एक बड़े हिस्से को फिल्माया गया है तुर्की की मशहूर मॉडल और इस फिल्म की नायिका सूहा पर !

Saturday, January 07, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #22 : टुक टुक टुक टुक करती चलती, मीठी थारी ज़िंदगी Tuk Tuk

संगीतकार विशाल शेखर के लिए साल 2015 कोई बहुत अच्छा नहीं रहा था। पर इस साल फिल्म सुल्तान के लिए दिया गया उनका संगीत औसत से बेहतर था। प्रेम की बाती में भींगा राहत फतेह अली खाँ का गाया जग घूमेया, सुखविंदर का जोश दिलाता सुल्तान का  शीर्षक गीत और नूरा बहनों की आवाज़ में ज़िदगी की टुक टुक से रूबरू कराता नग्मा मुझे इस एलबम के कुछ खास नगीने लगे थे ।  पर इन गीतों में 22वीं पॉयदान पर अपनी जगह बनाने में कामयाब हुआ है नूरा बहनों का गाया ये नग्मा। नूरा बहनों के  सांगीतिक सफ़र के बारे में यहाँ  पहले भी लिख चुका हूँ। 
 


दो साल पहले पटाखा गुड्डी से अपना पहला पटाखा फोड़ने वाली जालंधर की नूरा बहनें ने इस साल तीन नामी फिल्मों मिर्जया, दंगल और सुल्तान में अपनी दमदार आवाज़ श्रोताओं तक पहुंचाई है। नूरा बहनों का बिंदास अंदाज़ मुझे हाइवे में उनके गाए गीत में इतना फबा था कि उसने सीधे साल के दस बेहतरीन गीतों में जगह बना ली थी। इस बार भी नूरा बहनों के गाए दो गीत इस संगीतमाला में हैं।

विशाल शेखर को संगीत में नए नए प्रयोग करने में हमेशा आनंद आता रहा है। हालांकि मुझे विशाल की हर गीत में घुसायी जाने वाली रॉक  रिदम उतनी पसंद नहीं आती पर संगीत संयोजन में उनके नित नए प्रयोग कई बार मेलोडी से भरपूर होते हैं। टुक टुक के संगीत संयोजन के लिए विशाल शेखर अलग से नहीं बैठे। मीका के गाने चार सौ चालीस वोल्ट के संगीत को अंतिम रूप देने के पहले अचानक ही शेखर को टुक टुक की आरंभिक धुन सूझी और फिर  कुछ घंटों में ही इस  गीत ने अपनी शक्ल ले ली ।

गीत का आरंभिक संगीत संयोजन जहाँ मन में मस्ती का मूड ले आता है वहीं गायिकाओं का हो.. सजके दिखाएगी....  हो.. हँस के बुलाएगी कहना बड़ा प्यारा लगता है। अलग से सुनते वक़्त  विशाल का रैप खाने में कंकड़ की तरह लगता है पर फिल्म देखते समय लगा कि वो पश्चिमी रंग में रँगे हुए एक शहरी किरदार के लिए शायद गीत की जरूरत बन गया हो। फिल्म में ये गीत पार्श्व से आता है जब दर्शकों को निर्देशक हरियाणा के कस्बों देहातों से मिलवा रहे होते हैं।

इरशाद कामिल
इरशाद कामिल के लिए पंजाब हरियाणा की भूमि एक 'होम टर्फ' की तरह है जिसकी जुबान, ठसक, लोक रंग सबसे वो भली भांति परिचित हैं। इसलिए उनके बोल ज़मीन से जुड़े हुए दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि आप अपनी जड़ों से कटकर आसमान नहीं छू सकते। कम से कम कामिल में आसमान छूने की काबिलियत पूरी तरह से है। ज़िदगी के फलसफ़े के बारे में इरशाद क़ामिल ने सहजता के साथ कितनी प्यारी पंक्तियाँ रची हैं। ज़रा गौर फरमाइए ओ पारे जैसी चंचल है, रेशम है या मलमल है...या फिर गहरी दलदल है, ज़िंदगी या रा रा रा…दिन दिन घटती जाती है, फसल ये कटती जाती है..नज़र से हटती जाती है, ज़िंदगी या रा रा रा… 


दूरी दर्द, मिलन है मस्ती, दुनिया मुझको देख के हँसती
इश्क़ मेरा बदनाम हो गया, करके तेरी हुस्न परस्ती

कोई जोगी, कोई कलंदर, रहता है अपणे में
कोई भुला हुआ सिकंदर, रहता है अपणे में

हो.. सजके दिखाएगी. हो.. हँस के बुलाएगी
हो.. रज्ज के नचाएगी, टुक टुक टुक करती चलती
थारी म्हारी ज़िंदगी, रे बोले, रे बोले ढोला ढोल धड़क धिन, धड़क धिन, धड़क धिन
रे टुक टुक टुक टुक करती चलती, मीठी थारी ज़िंदगी
रे बोले, रे बोले ढोला ढोल धड़क धिन, धड़क धिन, धड़क धिन

अपनी मर्ज़ी से बणती बिगड़ती, बणती बिगड़ती
धुआँ नही, आग नही फिर भी है जलती
ओये होये, ओये होये, ओये होये, ओये…

ओ पारे जैसी चंचल है, रेशम है या मलमल है
या फिर गहरी दलदल है, ज़िंदगी या रा रा रा…
दिन दिन घटती जाती है, फसल ये कटती जाती है
नज़र से हटती जाती है, ज़िंदगी या रा रा रा…

दिल समझे नही पतंदर, रहता है अपने में
बस बनता फिरे धुरंधर रहता है अपने में
हो.. सजके दिखाएगी. हो.. हँस के बुलाएगी...धड़क धिन

तो ज़िदगी का ये गीत आप भी गुनगुनाइए मेरे साथ..

Wednesday, January 04, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 23 : पत्ता पत्ता जानता है, इक तू ही ना जाने हाल मेरा Tu Hi Na Jaane..

पिछले साल हमारा फिल्म उद्योग क्रिकेटरों पर बड़ा मेहरबान रहा। एक नहीं बल्कि दो दो फिल्में बनी हमारे भूतपूर्व क्रिकेट कप्तानों पर। हाँ भई अब तो अज़हर के साथ हमारे धोनी भी तो भूतपूर्व ही हो गए। बॉलीवुड ने इन खिलाड़ियों की जीवनियाँ तो पेश की हीं साथ ही साथ इनके व्यक्तित्व को भी बेहद रोमांटिक बना दिया। 

अब हिंदी फिल्मों में जहाँ रोमांस होगा तो वहाँ ढेर सारे गाने भी होंगे। सो इन दोनों फिल्मों के नग्मे  रूमानियत से भरपूर रहे। ऐसा ही एक गीत विराजमान है वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं सीढ़ी पर फिल्म अज़हर से। पूरे एलबम के  लिहाज़ से अज़हर फिल्म का संगीत  काफी मधुर रहा। अमल मलिक का संगीतबद्ध और अरमान मलिक का गाया गीत बोल दो तो ना ज़रा मैं किसी से कहूँगा नहीं और अतिथि संगीतकार प्रीतम की मनोज यादव द्वारा लिखी रचना इतनी सी बात है मुझे तुमसे प्यार है खूब सुने और सराहे  गए।


मुझे भी ये दोनों गीत अच्छे लगे पर सोनू निगम की आवाज़ में अमल मलिक की उदास करती धुन दिल से एक तार सा जोड़ गई। काश इस गीत को थोड़े और अच्छे शब्दों और गायिका का साथ मिला होता तो इससे आपकी मुलाकात कुछ सीढ़ियाँ ऊपर होती। सोनू निगम की आवाज़ इस साल भूले भटके ही सुनाई दी। इस गीत के आलावा फिल्म वज़ीर के गीत  तेरे बिन में वो श्रेया के साथ सुरों का जादू बिखेरते रहे। समझ नहीं आता उनकी आवाज़ का इस्तेमाल संगीतकार और क्यों नहीं करते  ?

सदियों पहले मीर तक़ी मीर ने एक बेहतरीन ग़ज़ल कही थी जिसका मतला था पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने ना जाने गुल ही ना जाने बाग़ तो सारा जाने है। इस मतले का गीत के मुखड़े के रूप में मज़रूह सुल्तानपूरी ने आज से करीब 35 वर्ष पूर्व फिल्म एक नज़र में प्रयोग  किया था। लता और रफ़ी की आवाज़ में वो गीत  बड़ा मशहूर हुआ था। 

गीतकार कुमार की प्रेरणा भी वही ग़ज़ल रही और सोनू ने क्या निभाया इसे। जब वो पत्ता पत्ता जानता है, इक तू ही ना जाने हाल मेरा तक पहुँचते हैं दिल में मायूसी के बादल और घने हो जाते हैं। सोनू अपनी आवाज़ से उस प्रेमी की बेबसी को उभार लाते हैं जो अपने प्रिय के स्नेह की आस में छटपटा रहा है, बेचैन है।

अमल मालिक और सोनू निगम
रही बात प्रकृति कक्कड़ की तो अपना अंतरा तो उन्होंने ठीक ही गाया है पर मुखड़े के बाद की पंक्ति में इक तेरे पीछे माही का उनका उच्चारण बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। इस गीत को सुनते हुए अमल मलिक के बेहतरीन संगीत संयोजन  पर ध्यान दीजिए। गिटार और बाँसुरी के प्रील्यूड के साथ गीत शुरु होता है। इटरल्यूड्स में रॉक बीट्स के साथ बजता गिटार और फिर पंजाबी बोलों के बाद सारंगी (2.10) का बेहतरीन इस्तेमाल मन को सोहता है। अंतिम अंतरे के पहले गिटार, बाँसुरी और अन्य वाद्यों का मिश्रित टुकड़ा (3.30-3.45) को सुनकर भी आनंद आ जाता  है।

समंदर से ज्यादा मेरी आँखों में आँसू
जाने ये ख़ुदा भी है ऐसा क्यूँ

तुझको ही आये ना ख़्याल मेरा
पत्ता पत्ता जानता है
इक तू ही ना जाने हाल मेरा
पत्ता पत्ता जानता है
इक तू ही ना जाने हाल मेरा

नित दिन नित दिन रोइयाँ मैं, सोंह रब दी ना सोइयाँ मैं
इक तेरे पीछे माही, सावन दियां रुतां खोइयाँ मैं

दिल ने धडकनों को ही तोड़ दिया,
टूटा हुआ सीने में छोड़ दिया
हो दिल ने धडकनों को ही तोड़ दिया
टूटा हुआ सीने में छोड़ दिया

खुशियाँ ले गया, दर्द  कितने दे गया
ये प्यार तेरा..पत्ता पत्ता ...

मेरे हिस्से आई तेरी परछाईयां
लिखी थी लकीरों में तनहाइयाँ
हाँ मेरे हिस्से आई तेरी परछाईयां
लिखी थी लकीरों में तनहाइयाँ

हाँ करूँ तुझे याद मैं
है तेरे बाद इंतज़ार तेरा..., पत्ता पत्ता ...

Tuesday, January 03, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 24 : माया ठगनी नाच नचावे Maya Thagni Nach Nachave

वार्षिक संगीतमाला की साल के बेहतरीन पच्चीस गीतों की अगली कड़ी में है फिल्म जय गंगाजल का गीत। संगीतकार सलीम सुलेमान और गीतकार मनोज मुन्तसिर तो हिंदी फिल्म संगीत में किसी परिचय के मुहताज नहीं पर इस गीत के यहाँ होने का सेहरा बँधता है इस गीत के गायक प्रवेश मलिक के सिर। खासकर इसलिए भी कि ये गीत हिंदी फिल्मों में गाया उनका पहला गीत है।

प्रकाश झा की फिल्में हमेशा से हमारे आस पास के समाज से जुड़ी होती हैं। समाज की अच्छाइयों बुराइयों का यथार्थ चित्रण करने का हुनर उनकी फिल्मों में दिखता रहा है। पर अगर फिल्म के गीत भी समाज का आइना दिखलाएँ तो उसका आनंद ही कुछ अलग होता है। वार्षिक संगीतमाला की 24 वीं पॉयदान के गीत का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है। समाज के तौर तरीकों पर व्यंग्य के तीर कसते गीत कम ही सही पर पिछले सालों में भी बने हैं और एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं का हिस्सा रहे हैं। मूँछ मुड़ानी हो तो पतली गली आना...... , पैर अनाड़ी ढूँढे कुल्हाड़ी....., सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है...... जैसे गीत इसी कोटि के थे।


इस फिल्म का संगीत रचते समय सलीम सुलेमान को निर्देशक प्रकाश झा से एक विशेष चुनौती मिली। चुनौती ये थी कि फिल्म के नाटकीय दृश्यों पर अमूमन  दिये जाने वाले  पार्श्व संगीत के बदले उसे चित्रित करता हुआ गीत लिखा जाएगा। माया ठगनी भी इसी प्रकृति का गीत है जो फिल्म के आरंभ  में आता है और  दर्शकों को कथानक की पृष्ठभूमि से रूबरू कराता है। वैसे जीवन दर्शन से रूबरू कराते इसी फिल्म के गीत सब धन माटी में मनोज की शब्द रचना भी बेहतरीन है।

गीतकार मनोज मुन्तसिर ने गीत के बोलों में जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धांत पर चलते इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी पर अपने व्यंग्य बाण कसे हैं।  ये उल्टी पुल्टी व्यवस्था  एक डर भी जगाती है और साथ चेहरे पर एक विद्रूप मुस्कान भी खींच देती है । 

संगीतकार व निर्देशक को इस गीत के लिए ऐसे गायक की जरूरत थी जो लोकसंगीत में अच्छी तरह घुला मिला हो और प्रवेश ने उनकी वो जरूरत बखूबी पूरी कर दी। लोकधुन और पश्चिमी संगीत के फ्यूज़न में रचे बसे इस गीत को अगर प्रवेश ने अपनी देशी आवाज़ की ठसक नहीं दी होती तो ये गीत इस रूप में खिल नहीं पाता।

प्रवेश मलिक
नेपाल के जनकपुर धाम के एक मैथिल परिवार में जन्मे प्रवेश मलिक को अपने पिता से कविता और भाइयों से लोकगीत गायिकी का माहौल बचपन से मिला। बिहार और नेपाल में संगीत की शुरुआती शिक्षा के बाद प्रवेश ने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में परास्नातक की डिग्री भी हासिल की। अनेक गैर फिल्मी एलबमों में संगीत संयोजन से लेकर गायिकी तक करने वाले प्रवीण सूफी रॉक बैंड सानिध्य से भी जुड़े रहे हैं। माया ठगनी में बाँसुरी की धुन के साथ जब प्रवीण की आवाज़ ए य ऐ .. ए य ऐ. करती हुई लहराती है तो मन बस उस सोंधी मिठास में झूम उठता है।

 इस ज्यूकबॉक्स का पहला गीत ही माया ठगनी है। यहाँ आप पूरा गीत सुन पाएँगे।

 

माया ठगनी नाच नचावे , माया ठगनी नाच नचावे
इहे ज़माना चाले रे. अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे

डंका उसका बोलेगा,, डंडा जिसके हाथ में
घेर के पहले मारेंगे,बात करेंगे बाद में
हवा बदन में सेंध लगावे......, हवा बदन में सेंध लगावे
इहे ज़माना चाले रे, अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे

कोयल हुई रिटायर, कौवे गायें दरबारी
कौवे गाये दरबारी, कौवे गायें  दरबारी
आ…., दरबारी
कोयल हुई रिटायर, कौवे गायें  दरबारी

बिल्ली करती है भैया, यहाँ दूध की चौकीदारी
यहाँ दूध की चौकीदारी, यहाँ दूध की चौकीदारी
भोले का डमरू मदारी बजावे....., भोले का डमरू मदारी बजावे
इहे ज़माना चाले रे, अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे
 

और ये है गीत का संक्षिप्त वीडियो वर्सन

Sunday, January 01, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #25 : ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए Titli ne sare rang bech diye

स्वागत है आप सब का एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के इस ग्यारहवें संस्करण में जिसकी पहली पेशकश है फिल्म बॉलीवुड डायरीज़ से। पिछले साल फरवरी 2016 में प्रदर्शित बॉलीवुड डायरीज़ फिल्म अपने यथार्थ को छूते कथानक के लिए सराही गयी थी। इस गीत के संगीतकार हैं विपिन पटवा और गीत के बोल लिखे हैं डा. सागर ने। विपिन पटवा का संगीत और सागर द्वारा रचे बोल इस फिल्म के लिए  निश्चय ही ज्यादा सुर्खियाँ बटोरने की ताकत रखते थे। पर फिल्म और उसका संगीत ज्यादा ध्यान खींचे बिना ही सिनेमाघर के पर्दों से बाहर हो गया।


उत्तर प्रदेश के एक व्यापारी परिवार से जन्मे विपिन को बचपन से ही शास्त्रीय संगीत में रुचि थी। पंडित हरीश तिवारी से आरंभिक शिक्षा लेने वाले विपिन स्नातक करने के बाद कुछ दिनों तक आकाशवाणी के लिए काम करते रहे। सात आठ साल पहले उन्होंने मायानगरी में कदम रखा और तीन चार छोटी मोटी फिल्में भी कीं। पर बॉलीवुड डायरीज़ मेरी समझ से उनका संगीत निर्देशित अब तक का सबसे बेहतर एलबम है। तितली के आलावा इस फिल्म के अन्य गीत  मनवा बहरुपिया और मन का मिरगा ध्यान आकर्षित करते हैं। मनवा बहरुपिया सुनकर मुझे कभी अलविदा ना कहना के चर्चित गीत मितवा कहे धड़कनें तुझसे क्या की याद आ गयी।

विपिन पटवा
तो बात करते हैं तितली की। दरअसल ये फिल्म मुंबई की फिल्मी दुनिया में पहुँचने की हसरत लिए तीन अलग अलग किरदारों की कहानी है जिनके सपनों के तार उन्हें एक दूसरे से जोड़ देते हैं। इन सपनों को पूरा करने के लिए वे क्या कुछ खोते हैं इसी व्यथा को व्यक्त करता है पच्चीसवीं पॉयदान का ये गीत। डा. सागर जिनकी शिक्षा दिक्षा जे एन यू से हुई है ने इस गीत के लिए जो बोल लिखे हैं उनमें ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए वाली पंक्ति मन को सीधे कचोट जाती है। 

बाहर से ये दुनिया हमें जितनी रंग बिरंगी दिखती है उतनी अंदर से होती नहीं। पर जब तक उसके इस रूप का दर्शन होता है हम बहुत कुछ दाँव पर लगा देते हैं। उस दलदल को पार करना ही एक रास्ता बचता है वापस लौटना नहीं। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति अंदर ही अंदर घुलता जाता है पर कुछ कह नहीं पाता। सागर इन मनोभावों को गीत के अंतरे में बखूबी व्यक्त करते हैं।

पियानो और सारंगी के मधुर संगीत संयोजन से गीत के मुखड़े की शुरुआत होती है। इंटरल्यूड्स में भी विपिन भारतीय वाद्यों सारंगी और सरोद का खूबसूरत इस्तेमाल करते हैं। पापोन की शुरुआती तान गीत की पीड़ा को सामने ले आती है। वैसे इस गीत को एलबम में सोमेन चौधरी ने भी गाया है पर पापोन अपनी गायिकी से कहीं ज्यादा प्रभावित करते हैं।

कैसा ये कारवाँ, कैसे हैं रास्ते
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

सारा सुकूँ हैं खोया खुशियों की चाहत में
दिल ये सहम सा जाए छोटी सी आहट में
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

अलफ़ाज़ साँसों में ही आ के बिखरते जाए
खामोशियों में बोले ये आँखे बेजुबान
परछाइयाँ हैं साथी, चलता ही जाए राही
कोई ना देखे अब तो ज़ख्मों के निशान
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

ना रौशनी हैं कोई, आशाएँ खोयी खोयी
टूटा फूटा हैं ये उम्मीदों का ज़हाँ
ना बेकरारी कोई, बंदिश रिहाई कोई
अब तो निगाहों में ना कोई इंतज़ार
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...



Tuesday, December 27, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2016 वो गीत जो संगीतमाला में दस्तक देते देते रह गए Part II

साल की आख़िरी पोस्ट में हाज़िर हूँ छः और नग्मों के साथ जो मूल्यांकन की दृष्टि से अंतिम पाँच पॉयदानों के आसपास थे। इनमें से तीन शायद आपने ना सुने हों पर वक़्त मिले तो सुनिएगा।

आज का पहला गीत मैंने लिया है फिल्म Parched से जो Pink के आस पास ही प्रदर्शित हुई थी। अपने अंदर की आवाज़ को ढूँढती निम्न मध्यम वर्ग की महिलाओं से जुड़ी एक संवेदनशील फिल्म थी Parched ! इसी फिल्म का एक गीत है माई रे माई जिसे लिखा स्वानंद किरकिरे ने और धुन बनाई हितेश सोनिक ने। स्वानंद कोई गीत लिखें और उसमें काव्यात्मकता ना हो ऐसा हो सकता है भला.. गीत का मुखड़ा देखिए 

माई रे माई , मैं बादल की बिटिया.. 
माई रे माई , मैं सावन की नदिया 
दो पल का जोबन, दो पल ठिठोली, 
बूँदों सजी है ,चुनर मेरी चोली 

इस गीत को गाया है नीति मोहन और हर्षदीप कौर ने..

  

प्रकाश झा अपनी फिल्मों के संगीत रचने में संगीतकारों को अच्छी खासी आज़ादी देते हैं। ख़ुद तो संगीत के पारखी हैं ही। जय गंगाजल में सलीम सुलेमान का रचा संगीत वाकई विविधता लिए हुए है। फिल्म का एक गीत राग भैरवी पर आधारित है जिसे शब्द दिए हैं मनोज मुन्तसिर ने। मनोज की शब्द रचना जीवन के सत्य को  हमारे सामने कुछ यूँ खोलती है

मद माया में लुटा रे कबीरा
काँच को समझा कंचन हीरा
झर गए सपने पाती पाती
आँख खुली तो सब धन माटी

शायद नोटबंदी के बाद भी कुछ लोगों को ये गीत याद आया होगा। इस गीत को अरिजीत ने भी गाया है और दूसरे वर्जन में अमृता फणनवीस ने उनका साथ दिया है जो ज्यादा बेहतर बन पड़ा है।
  

ऊपर के दो गीतों जैसा ही तीसरा अनसुना गीत है फिल्म धनक से जिसे नागेश कुकनूर ने बनाया है। राजस्थान की पृष्ठभूमि में एक भाई बहन की कहानी कहती इस फिल्म में एक प्यारा सा गीत रचा है मीर अली हुसैन ने। देखिए इस  गीत में हुसैन  क्या हिदायत दे रहे हैं इन बच्चों को

ख़्वाबों में अपने तू घुल कर खो जा रे
पलकों पे सपने मल कर सो जा रे
होगी फिर महक तेरे हाथो में
और देखेगा तू धनक रातो में


तापस रेलिया के संगीत निर्देशन में इस गीत को अपनी आवाज़ से सँवारा है मोनाली ठाकुर ने.


तो ये थी अनसुने गीतों की बात। आगे के तीनों गीत इस साल खूब बजे हैं और इन्हें आपने टीवी या रेडियो पर बारहा सुना होगा। फिल्म वज़ीर में शान्तनु मोइत्रा ने बड़ी ही मधुर पर अपनी पुरानी धुनों से मिलती जुलती धुन रची। परिणिता के गीत याद हैं ना आपको।ये गीत उसी फिल्म के संगीत की याद दिलाता है। ख़ैर सोनू निगम और श्रेया ने इस गीत में जान फूँक दी वो भी विधु विनोद चोपड़ा के बोलों पर जो एक अंतरे से ज्यादा नहीं जा पाए।



सुल्तान बतौर एलबम साल के शानदार एलबम में रहा। विशाल शेखर का संगीत और इरशाद क़ामिल के बोलों ने खूब रंग ज़माया। अब उनकी इन पंक्तियों में पहलवान क्या आम आदमी का ख़ून भी गर्म हो उठेगा

ख़ून में तेरे मिट्टी, मिट्टी में तेरा ख़ून
ऊपर अल्लाह नीचे धरती, बीच में तेरा जूनून...ऐ सुल्तान..

सुखविंदर सिंह की सधी आवाज़ तन मन में जोश भर देती है..



वैसे तो इस साल के झूमने झुमाने वाले गीतों में काला चश्मा, बेबी को बेस पसंद है और ब्रेकअप सांग खूब चले पर मेरा मन जीता बागी फिल्म की इस छम छम ने। तो इस छम छम के साथ आप भी छम छम कीजिए और मुझे दीजिए विदा। अगले साल वार्षिक संगीतमाला 2016 के साथ पुनः प्रस्तुत हूँगा


Saturday, December 24, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2016 वो गीत जो संगीतमाला में दस्तक देते देते रह गए Part I

वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पच्चीस गीतों का सिलसिला तो जनवरी के पहले हफ्ते से शुरु हो ही जाएगा पर उसके पहले आपको मिलवाना चाहूँगा उन दर्जन भर गीतों से जो मधुर होते हुए भी संगीतमाला  से थोड़ा दूर रह गए। अब इसकी एक वज़ह तो ये है कि आजकल संगीतकार गीतकार लगभग एक ही जैसी धुनें और बोल थोड़ा जायक़ा बदल कर अलग अलग थालियों में परोस रहे हैं। लिहाज़ा मीठी चाशनी में सने इन गीतों में कई बार वो नयापन नहीं रह पाता जिसकी मेरे जैसे श्रोता को उम्मीद रहती है।

पर ऊपर वाली बात सारे गीतों पर लागू नहीं होती जिन्हें मैं सुनाने जा रहा हूँ। कुछ को तो मुझे संगीतमाला में जगह ना दे पाने का अफ़सोस हुआ पर कहीं तो लकीर खींचनी थी ना सो खींच दी।

तो सबसे पहले बात एयरलिफ्ट के इस गीत की जिसे लिखा गीतकार कुमार ने और धुन बनाई  अमल मलिक ने। सच कहूँ तो अमल की धुन बड़ी प्यारी है। रही कुमार साहब के बोलों की बात तो पंजाबी तड़का लगाने में वो हमेशा माहिर रहे हैं। बस अपने प्रियके बिन रहने में कुछ सोच ना सकूँ की बजाए कुछ गहरा सोच लेते तो मज़ा आ जाता। ख़ैर आप तो सुनिए इस गीत को..



पंजाबी माहौल दूर ही नहीं हो पा रहा क्यूँकि हम आ गए हैं कपूरों के खानदान में। कपूर एंड संस के इस गीत को सुन कर शायद आप भी बोल ही उठें, उनसे जिनसे नाराज़ चल रहे थे अब तक। कम से कम गीतकार देवेन्द्र क़ाफिर की तो यही कोशिश है। संगीतकार के रूप में यहाँ हैं पंचम के शैदाई युवा तनिष्क बागची। तनिष्क का सफ़र तो अभी शुरु ही हुआ है। आगे भी उम्मीद रहेगी उनसे। तो आइए सुनते हैं अरिजीत सिंह और असीस कौर के गाए इस युगल गीत को



जान एब्राहम गठे हुए शरीर के मालिक हैं। इस बात का इल्म उन्हें अच्छी तरह से है तभी तो अपनी फिल्म का नाम रॉकी हैंडसम रखवाना नहीं भूलते 😀। अगला गीत उनकी इसी फिल्म का है जिसमें वो रहनुमा बने हैं श्रुति हासन के। संगीतकार की कमान सँभाली है यहाँ इन्दर और सनी बावरा ने।। गीत को लिखा मनोज मुन्तसिर और सागर लाहौरी ने। ये साल श्रेया घोषाल के लिए उतना अच्छा नहीं रहा। बहुत सारे ऐसे गीत जो उनकी आवाज़ को फबते नयी गायिका पलक मुच्छल या फिर तुलसी कुमार की झोली में चले गए। ये उनकी निज़ी व्यस्तता का नतीज़ा था या फिर कुछ और ये तो वक़्त ही बताएगा। फिलहाल तो वो इस नग्मे में रूमानियत बिखेरती सुनी जा सकती हैं..



क्यूँ इतने में तुमको ही चुनता हूँ हर पल
क्यूँ तेरे ही ख़्वाब बुनता हूँ हर पल
तूने मुझको जीने का हुनर दिया
खामोशी से सहने का सबर दिया


संदीप नाथ ने एक बेहतरीन मुखड़ा दिया फिल्म दो लफ़्जों की कहानी के इस गीत में। यक़ीन मानिए अल्तमश फरीदी की गायिकी आपको अपनी ओर आकर्षित जरूर करेगी। बबली हक़ की अच्छी कम्पोजीशन जो गीतमाला से ज़रा ही दूर रह गई।


इस साल इश्क़ के नाम पर अच्छा कारोबर चलाया है मुंबई फिल्म जगत ने ने। अब ज़रा फिल्मों के नाम पर ही सरसरी निगाह डाल लीजिए लव गेम्स, वन नाइट स्टैंड, इश्क़ क्लिक, लव के फंडे, लव शगुन, इश्क़ फारएवर।  इनके गीतों को सुनकर माँ कसम लव का ओवरडोज़ हो गया इस बार तो। अब विषय मोहब्बत हो तो गीत भी कम नहीं पर गीत की मुलायमित के साथ ये गीत बालाओं की मुलायमियत भी बेचते नज़र आए। इन गीतों के दलदल से लव गेम्स का ये नग्मा कानों में थोड़ा सुकून जरूर पैदा कर गया।

क़ौसर मुनीर के शब्दों और हल्दीपुर बंधुओं संगीत और सिद्धार्थ की संगीत रचना से लव गेम्स का ये गीत निश्चय ही श्रवणीय बन पड़ा है। गीत में गायक संगीत हल्दीपुर का साथ दिया है उभरती हुई बाँसुरी वादिका रसिका शेखर ने। गीत की धुन प्यारी है और शब्द रचना भी। जरूर सुनिएगा इसे इक दफ़ा


इस साल हमारे खिलाड़ी भी अपने प्रेम प्रसंगों के साथ फिल्मों में नज़र आए। गनीमत ये रही कि धोनी और अज़हर जैसी फिल्मों के एलबम्स मेलोडी से भरपूर रहे। इन फिल्मों का एक एक गीत वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा है। चलते चलते एम एस धोनी फिल्म का गीत आपको सुनवाता चलूँ जो गीतमाला से आख़िरी वक़्त बाहर हो गया। आवाज़ अरमान मलिक की और बोल एक बार फिर मनोज मुन्तसिर के...


साल के अंत में फिर बात करेंगे ऐसी ही और छः गीतों की जो अंतिम मुकाम से कुछ फासले पर रह गए.. क्रिसमस और शीतकालीन छुट्टियों की असीम शुभकामनाओं के साथ..

Sunday, December 18, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2016 की तैयारियाँ और एक नज़र पिछली संगीतमालाओं पर...

नए साल के आने में दो हफ्तों का समय शेष है और एक शाम मेरे नाम पर वार्षिक संगीतमालाओं के लिए साल भर के पच्चीस बेहतरीन गीत चुनने की क़वायद ज़ारी है। दिसंबर से ही एक बोझ सा आ जाता है मन में कि क्या पच्चीस गीतों की फेरहिस्त आसानी से पूरी हो पाएगी। पर हर साल प्रदर्शित हुई लगभग सौ से ज़्यादा फिल्मों के गीतों से गुजरता हूँ तो कभी कभी गीतों के अटपटेपन से मन में कोफ्त सी हो जाती है पर जैसे जैसे गीतों को चुनने की प्रक्रिया अपने आख़िरी चरण में पहुँचती है अच्छे गीतों को सुनकर सारा कष्ट काफूर हो जाता  है और चुनने लायक गीतों की संख्या पच्चीस से भी अधिक होने लगती है। फिर समस्या आती है कि किसे छोड़ूँ और किसे रखूँ? पर अंत में संगीत, गायिकी, बोल और संपूर्ण प्रभाव के आधार पर कोई निर्णय लेना ही पड़ता है।  

जैसा कि मैं पहले भी इस चिट्ठे पर कह चुका हूँ कि वार्षिक संगीतमालाएँ मेरे लिए नए संगीत में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उसको आप तक संजों लाने की कोशिश मात्र है। बचपन से रेडिओ सीलोन की अमीन सयानी की बिनाका और फिर विविधभारती पर नाम बदल कर आने वाली सिबाका गीतमाला सुनता रहा। उसका असर इतना था कि जब 2005 के आरंभ में अपने रोमन हिंदी ब्लॉग की शुरुआत की तो मन में एक ख्वाहिश थी कि अपने ब्लॉग पर अपनी पसंद के गीतों को पेश करूँ।

तो आइए एक नज़र डालें पिछली  संगीतमालाओं की तरफ। मैंने अपनी पहली संगीतमाला की शुरुआत 2004  के दस बेहतरीन गानों से की जिसे 2005 में 25 गानों तक कर दिया। 2006 में जब खालिस हिंदी ब्लागिंग में उतरा तो ये सिलसिला इस ब्लॉग पर भी चालू किया। इस साल मैंने पिछली सारी संगीतमालाओं में बजने वाले गीतों को एक जगह इकठ्ठा कर दिया है ताकि नए पाठकों को भी इस सिलसिले (जो अपने ग्यारहवें साल से गुजर रहा है) की जानकारी हो सके। गर आपको किसी साल विशेष से जुड़े गीत संबंधित आलेख तक पहुँचना है तो उस साल की सूची देखिए और गीत मिलने से उससे जुड़ी लिंक पर क्लिक कीजिए। आप संबंधित आलेख तक पहुँच जाएँगे।  

वार्षिक संगीतमाला 2015

साल भर जो दो सौ फिल्में प्रदर्शित हुई उनमें रॉय, बदलापुर, तनु वेड्स मनु रिटर्न, हमारी अधूरी कहानी, जॉनिसार, बजरंगी भाईजान, मसान, पीकू, दम लगा के हैस्सा, तलवार, तमाशा और बाजीराव मस्तानी जैसे एलबम अपने गीत संगीत की वज़ह से चर्चा में आए। पर अपनी पिछली फिल्मों के संगीत की छाया रखते हुए भी संगीतकार संजय लीला भंसाली साल के सर्वश्रेष्ठ एलबम  का खिताब अपने नाम कर गए। इस संगीतमाला में उनके एलबम के तीन गीत शामिल हुए और आज इबादत, पिंगा व दीवानी मस्तानी कगार पे रह गए।




साल के संगीत पर किसी एक संगीतकार का दबदबा नहीं रहा। रहमान, प्रीतम, अनु मलिक, सचिन जिगर, अजय अतुल, विशाल भारद्वाज, क्रस्ना, अंकित तिवारी, हीमेश रेशमिया, जीत गांगुली सबके इक्का दुक्का गाने इस संगीतमाला में बजे। अमित त्रिवेदी के कुछ एलबम जरूर सुनाई पड़े पर विशाल शेखर, शंकर अहसान लॉए, साज़िद वाज़िद जैसे नाम इस साल परिदृश्य से गायब से हो गए। हाँ अनु मलिक ने शानदार वापसी जरूर की।

गायकों में नये पुराने चेहरे जरूर दिखे। साल के सर्वश्रेष्ठ गायक का खिताब मेरे ख्याल से अरिजीत सिंह के नाम रहा। यूँ तो उनके गाए पाँच गाने इस गीतमाला का हिस्सा बने और कुछ बनते बनते रह गए पर बाजीराव मस्तानी के लिए उनका गाया गीत ''आयत'' गायिकी के लिहाज़ से मुझे अपने दिल के सबसे करीब लगा।


श्रेया घोषाल ने जॉनिसार की ग़जल, हमारी अधूरी कहानी के विशुद्ध रोमांटिक गीत और बाजीराव मस्तानी की शास्त्रीयता को बड़े कौशल से अपनी आवाज़ में ढाला। इसलिए मेरी राय में वो साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका रहीं। पर साथ ही साथ मैं नवोदित गायिका राम्या बेहरा का भी नाम लेना चाहूँगा जिन्होंने हिंदी फिल्म के अपने पहले गीत से ही दिल में जगह बना ली। राम्या बेहरा, पायल देव व अंतरा मित्रा के डमी गीतों को जिस तरह बिना किसी दूसरे ज्यादा नामी गायक से गवाए हुए अंतिम स्वीकृति दी गई वो इस प्रवृति को दर्शाता है कि बॉलीवुड में नई प्रतिभाओं को आगे लाने के लिए कुछ निर्माता निर्देशक जोख़िम उठाने को तैयार हैं।

साल के सर्वश्रेष्ठ गीतकार तो निसंदेह वरुण ग्रोवर हैं जिन्होंने मोह मोह के धागे और तू किसी रेल सी गुजरती है जैसे गीतों को लिखकर सबका दिल जीत लिया। पर इस साल गीतकारों में कुछ नए नाम भी चमके जैसे अभयेन्द्र कुमार उपाध्याय और ए एम तुराज जिन्होंने रॉय व बाजीराव मस्तानी के लिए प्रशंसनीय कार्य किया। इरशाद कामिल व अमिताभ भट्टाचार्य के लिए भी ये साल अच्छा ही रहा। महिला गीतकार में इस बार सिर्फ क़ौसर मुनीर ही संगीतमाला में दाखिल हो सकीं।

वार्षिक संगीतमाला 2015

वार्षिक संगीतमाला 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013

वार्षिक संगीतमाला 2013  में गीतों की फेरहिस्त से साल के गीतकार का चयन करूँ तो वो तमगा इरशाद क़ामिल को ही जाएगा। इरशाद ने इस साल कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे जैसे मधुर गीत लिखे तो दूसरी ओर जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है पीछे छुपके जैसे सूफ़ियत के रंग में रँगे गीत की भी रचना की। इतना ही नहीं इरशाद क़ामिल ने आमिर खुसरो की कह मुकरनी की याद ऐ सखी साजन से ताज़ा तो की ही, दो प्रेम करने वालों को पिछले साल शर्बतों के रंग और मीठे घाट के पानी जैसे नए नवेले रूपकों से नवाज़ा। 


 वार्षिक संगीतमाला 2013 संगीत के सितारे

इरशाद क़ामिल के आलावा अमिताभ भट्टाचार्य ने भी  सँवार लूँ, ज़िदा, कबीरा व तितली जैसे कर्णप्रिय गीत रचे। प्रसून जोशी ने भी भाग मिल्खा भाग के लिए कमाल के गीत लिखे। पर धुरंधरों में जावेद अख़्तर की अनुपस्थिति चकित करने वाली थी। मेरे पसंदीदा गीतकार गुलज़ार ने विशाल भारद्वाज की फिल्मों मटरू की बिजली.. और एक थी डायन के गीत लिखे। उनका लिखा गीत ख़ामख़ा मुझे बेहद पसंद है पर विशाल अपनी आवाज़ और धुन से उन बोलों के प्रति न्याय नहीं कर सके वैसे भी गुलज़ार की कविता कभी कभी गीत से ज्यादा यूँ ही पढ़ने में  सुकून देती है..विश्वास नहीं होता तो गीत के इस अंतरे को पढ़ कर देखिए

सारी सारी रात का जगना
खिड़की पे सर रखके उंघते रहना
उम्मीदों का जलना-बुझना
पागलपन है ऐसे तुमपे मरना
खाली खाली दो आँखों में
ये नमक, ये चमक, तो ख़ामख़ा नहीं...


संगीतकारों में इस साल की सफलताओं का सेहरा बँट सा गया। लुटेरा में अमित त्रिवेदी, रांझणा में ए आर रहमान और भाग मिल्खा भाग में शंकर एहसान लॉय ने कमाल का संगीत दिया। नये संगीतकारों में अंकित तिवारी ने सुन रहा है के माध्यम से काफी धूम मचाई। सचिन जिगर ने शुद्ध देशी रोमांस में अब तक का अपना सबसे बेहतर काम दिखाया। प्रीतम बर्फी जैसा एलबम तो इस साल नहीं दे पाए पर  ये जवानी है दीवानी, फटा पोस्टर निकला हीरो, Once upon a time in Mumbai दोबारा के उनके कुछ गीत बेहद सराहे गए।

गायकों में ये साल बिना किसी शक़ अरिजित सिंह के नाम रहा। तुम ही हो और लाल इश्क़ जैसे गीतों को जिस तरह डूब कर उन्होंने गाया है वो आम लोगों और समीक्षकों दोनों द्वारा सराहा गया है। वैसे कुछ नए पुराने कलाकारों ने पिछले साल अपनी खूबसूरत आवाज़ की बदौलत कुछ गीतों को यादगार बना दिया। चैत्रा अम्बादिपुदी द्वारा बेहद मधुरता से गाया कौन मेरा, मिल्खा के पैरों में जोश भरते आरिफ़ लोहार,मस्तों का झुंड में थिरकने पर मजबूर करते दिव्य कुमार, ये तूने क्या किया वाली कव्वाली में अपनी गहरी आवाज़ का जादू बिखेरते जावेद बशीर, अपनी आवाज़ की मस्ती से स्लो मोशन अंग्रेजा में झुमाने वाले सुखविंदर सिंह,भागन के रेखन की बँहगिया में एक प्यारी बन्नो का अपने परिवार से जुदाई का दर्द उभारती मालिनी अवस्थी  और झीनी झीनी में अपनी शास्त्रीय गायिकी से मन मोहते उस्ताद राशिद खाँ पिछले साल की कुछ ऐसी ही मिसालें हैं।

साल के सरताज गीत के बारे में तो आप अगली प्रविष्टि में जानेंगे (वैसे ये बता दूँ कि ऊपर के कोलॉज  में सरताज गीत से जुड़े सभी कलाकारों की तसवीर मौज़ूद है।) तब तक एक नज़र इस संगीतमाला के पिछले चौबीस गीतों पर एक नज़र...

वार्षिक संगीतमाला 2012 

संगीतकारों की बात करूँ तो ये साल प्रीतम के नाम रहा। बर्फी के संगीत ने ये साबित कर दिया कि प्रीतम हमेशा 'inspired' नहीं होते और कभी कभी उनके संगीत से भी 'inspired' हुआ जा सकता है। ऐजेंट विनोद फिल्म चाहे जैसी रही हो वहाँ भी प्रीतम का दिया संगीत श्रोताओं को खूब रुचा। Cocktail के गीतों ने भी झूमने पर मजबूर किया। अमित त्रिवेदी ने भी इस साल इश्क़ज़ादे, इंग्लिश विंग्लिश और अइया के लिए कुछ खूबसूरत और कुछ झूमने वाले नग्मे दिए। अजय अतुल का अग्निपथ के लिए किया गया काम शानदार था। नवोदित संगीतकार स्नेहा खानवलकर ने GOW-I और GOW-II में जिस तरह एक बँधे बँधाए दर्रे से हटकर एक नए किस्म के संगीत और बोलों पर काम किया वो निश्चय ही प्रशंसनीय है। शंकर अहसान लॉय, सलीम सुलेमान, विशाल शेखर के लिए ये साल फीका फीका सा ही रहा।

 


 वार्षिक संगीतमाला 2011  

वर्ष 2011 में क्रस्ना और राजशेखर की नवोदित जोड़ी ने तनु वेड्स मनू के लिए कमाल का गी संगीत दिया और रंगरेज़ जैसे बेमिसाल गीत की बदौलत सरताज गीत का सेहरा अपने सर बाँध लिया। 

  

वार्षिक संगीतमाला 2010 

2009 की बादशाहत गुलज़ार ने 2010 में भी कायम रखी दिल तो बच्चा है जी में राहत के गाए शीर्षक गीत के द्वारा।
2010 की गीतमाला में  गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...
  1.  दिल तो बच्चा है जी संगीत:विशाल भारद्वाज, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र :दिल तो बच्चा है जी
  2. नैन परिंदे पगले दो नैन.., संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायिका: शिल्पा राव चलचित्र :लफंगे परिंदे
  3. सजदा तेरा सजदा दिन रैन करूँ , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : My Name is Khan
  4. फूल खिला दे शाखों पर पेड़ों को फल दे मौला, संगीत: रूप कुमार राठौड़, गीत : शकील आज़मी, गायक : जगजीत सिंह, चलचित्र : Life Express 
  5.  बिन तेरे बिन तेरे कोई ख़लिश है, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : शफ़कत अमानत अली खाँ, सुनिधि चौहान, चलचित्र : I hate Luv Storys
  6. तेरे मस्त मस्त दो नैन, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : फ़ैज़ अनवर, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : दबंग
  7.  सुरीली अँखियों वाले, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : वीर
  8. तू ना जाने आस पास है ख़ुदा, संगीत: विशाल शेखर, गीत : विशाल ददलानी, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : अनजाना अनजानी
  9. मन के मत पे मत चलिओ, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : आक्रोश
  10. मँहगाई डायन खात जात है, संगीत:राम संपत, गायक :रघुवीर यादव, चलचित्र : पीपली लाइव
  11. देश मेरा रंगरेज़ ऐ बाबू, संगीत:Indian Ocean, गीत :स्वानंद किरकिरे, संदीप शर्मा , गायक :राहुल राम, चलचित्र : पीपली लाइव
  12. कान्हा बैरन हुई रे बाँसुरी, संगीत:साज़िद वाज़िद, गीत : गुलज़ार, गायक : रेखा भारद्वाज, चलचित्र : वीर
  13. चमचम झिलमिलाते ये सितारों वाले हाथ, संगीत:शैलेंद्र बार्वे, गीत : जीतेंद्र जोशी, गायक : सोनू निगम, चलचित्र : स्ट्राइकर
  14. बहारा बहारा हुआ दिल पहली बार वे, संगीत: विशाल शेखर, गीत : कुमार, गायक : श्रेया घोषाल, चलचित्र : I hate Luv Storys
  15. आज़ादियाँ, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  16. तुम जो आए, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : राहत फतेह अली खाँ, चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  17. सीधे सादे सारा सौदा सीधा सीधा होना जी , संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक : अनुपम अमोद, चलचित्र : आक्रोश
  18. पी लूँ तेरे गोरे गोरे हाथों से शबनम, संगीत: प्रीतम, गीत : इरशाद क़ामिल, गायक :मोहित चौहान चलचित्र : Once Upon A Time in Mumbai
  19. Cry Cry इतना Cry करते हैं कॉय को, संगीत: ए आर रहमान, गीत : अब्बास टॉयरवाला, गायक : राशिद अली, श्रेया घोषाल, चलचित्र : झूठा ही सही
  20. नूर ए ख़ुदा , संगीत: शंकर अहसान लॉए, गीत : निरंजन अयंगार, गायक : शंकर महादेवन, अदनान सामी, श्रेया घोषाल , चलचित्र : My Name is Khan
  21. मन लफंगा बड़ा अपने मन की करे, संगीत: आर आनंद, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :लफंगे परिंदे
  22. गीत में ढलते लफ़्जों पर, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : अमिताभ भट्टाचार्य, गायक : अमित व अमिताभ, चलचित्र : उड़ान
  23. यादों के नाज़ुक परों पर, संगीत: सलीम सुलेमान, गीत :स्वानंद किरकिरे, गायक :मोहित चौहान चलचित्र :आशाएँ
  24. खोई खोई सी क्यूँ हूँ मैं, संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अनुषा मणि, चलचित्र : आयशा
  25. तुम हो कमाल, तुम लाजवाब हो आयशा , संगीत: अमित त्रिवेदी, गीत : जावेद अख़्तर, गायक : अमित त्रिवेदी, चलचित्र : आयशा 

वार्षिक संगीतमाला 2009  

साल 2009  में पहली बार मेरे चहेते गीतकार गुलज़ार पहली पायदान पर कमीने फिल्म के लिए विशाल भारद्वाज के संगीतबद्ध गीत इक दिल से दोस्ती के सहारे कब्जा जमाया।

2009 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी...

 वार्षिक संगीतमाला 2008   

में सरताज गीत का  का सेहरा बँधा युवा संगीतकार अमित त्रिवेदी के सर पर। सरताज गीत था शिल्पा राव के गाए और अमिताभ द्वारा लिखे इस बेहद संवेदनशील नग्मे के बोल थे इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला !.

2008 की गीतमाला में बाकी गीतों का सिलसिलेवार क्रम ये था..

वार्षिक संगीतमाला 2007 में एक बार फिर प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध, 'तारे जमीं पर' के गीतों के बीच ही प्रथम और द्वितीय स्थानों की जद्दोजहद होती रही। पर माँ...जैसे नग्मे की बराबरी भला कौन गीत कर सकता था


2007 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी..

वार्षिक संगीतमाला 2006 में ओंकारा और गुरु के गीत छाए रहे पर बाजी मारी 'उमराव जान' के संवेदनशील गीत 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' ने। इस गीत और दूसरे नंबर के गीत 'मितवा ' को लिखा था जावेद अख्तर साहब ने


2006 की गीतमाला में बाकी गीतों की फेरहिस्त कुछ यूँ थी.
  1. अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो (उमराव जान)
  2. मितवा... ( कभी अलविदा ना कहना )
  3. ओ साथी रे दिन डूबे ना... (ओंकारा)
  4. जागे हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो (गुरू)
  5. तेरे बिन मैं यूँ कैसे जिया... (बस एक पल )
  6. बीड़ी जलइ ले, जिगर से पिया.... (ओंकारा)
  7. अजनबी शहर है, अजनबी शाम है.... ( जानेमन )
  8. तेरे बिना बेसुवादी रतिया...(गुरू)
  9. मैं रहूँ ना रहूँ ....( लमहे-अभिजीत )
  10. लमहा लमहा दूरी यूँ पिघलती है...(गैंगस्टर)
  11. नैना ठग लेंगे...... (ओंकारा)
  12. तेरी दीवानी.... ( कलसा- कैलाश खेर)
  13. रूबरू रौशनी है...... (रंग दे बसंती)
  14. क्या बताएँ कि जां गई कैसे...(कोई बात चले)
  15. ये हौसला कैसे झुके.. ( डोर )
  16. ये साजिश है बूंदों की.....( फना )
  17. सुबह सुबह ये क्या हुआ....( I See You.)
  18. मोहे मोहे तू रंग दे बसन्ती....( रंग दे बसंती )
  19. चाँद सिफारिश जो करता.... ( फना )
  20. बस यही सोच कर खामोश मैं......( उन्स )

वार्षिक संगीतमाला 2005 में बाजी मारी स्वानंद किरकिरे और शान्तनु मोइत्रा की जोड़ी ने जब परिणिता फिल्म का गीत 'रात हमारी तो चाँद की सहेली' है और हजारों ख्वाहिशें ऍसी के गीत 'बावरा मन देखने चला एक सपना' क्रमशः प्रथम और द्वितीय स्थान पर रहे थे।




वार्षिक संगीतमाला 2004 में मेरी गीतमाला के सरताज गीत का सेहरा मिला था फिर मिलेंगे में प्रसून जोशी के लिखे और शंकर अहसान लॉए के संगीतबद्ध गीत "खुल के मुस्कुरा ले तू" को जबकि दूसरे स्थान पर भी इसी फिल्म का गीत रहा था कुछ खशबुएँ यादों के जंगल से बह चलीं। ये वही साल था जब कल हो ना हो, रोग, हम तुम, मीनाक्षी और पाप जैसी फिल्मों से कुछ अच्छे गीत सुनने को मिले थे।




अब ये स्पष्ट कर दूँ कि इस गीतमाला का पॉपुलरटी से कोई लेना देना नहीं है। गायिकी, संगीत , बोल और इनका सम्मिलित प्रभाव इन सभी आधारों को बराबर वज़न दे कर मैं अपनी पसंद के गीतों का क्रम तैयार करता हूँ। कई बार ये स्कोर्स लगभग बराबर होते हैं इसलिए गीतों को ऊपर नीचे करना बड़ा दुरुह होता है।
 

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Freedom at Midnight
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कसप Kasap
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Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
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