Monday, July 03, 2006

शक्ति और क्षमा

परिचर्चा में दिनकर की कविताओं वाली पोस्ट में इन्द्रधनुष वाले नितिन बागला जी ने शक्ति और क्षमा की कुछ पंक्तियाँ पेश की थीं और लिखा था कि किसी को शेष पंक्तियाँ याद हो तो लिखे। ये कविता मुझे भी सदा से पसंद रही है पर पूरी याद नहीं थी। खोज बीन के पश्चात अंतरजाल पर ये जब इमेज फार्म में मिली तो आप सब के साथ बांटने की इच्छा हुई।

आज के इस एक ध्रुवीय विश्व में ये कविता कितनी प्रासंगिक है वो आज भी इस रचना को पढ़ कर आप सब महसूस कर सकते हैं। अब अमरीका की विश्व नीति की तुलना और असर, भारत की विदेश नीति से करें तो दिनकर की ये पंक्तियाँ मन को उद्वेलित किये बिना नहीं रह पातीं। बिना बल के क्षमा या सहनशीलता दिखाने वालों को ना किसी ने गंभीरता से लिया है ना लेगा।
आशा है ये कविता आप सब की भी प्रिय होगी ।

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

श्रेणी :
मेरी प्रिय कवितायें में प्रेषित
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19 comments:

आलोक on July 03, 2006 said...

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो


याद हैं मुझे ये पङ्क्तियाँ अभी भी। शायद आठवीं या सातवी कक्षा की हिन्दी की किताब में यह कविता थी। एक नायाब नज़रिया था, और बिल्कुल सही भी है।

ई-छाया on July 04, 2006 said...

बहुत सुंदर, और साधुवाद, इसे ढूँढने और हमें देने के लिये।

Nitin Bagla on July 04, 2006 said...

कविता यहां छापने के लिये आपको साधुवाद...

Pratik on July 04, 2006 said...

मनीष भाई, इस कविता को प्रस्तुत करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। यह कविता मुझे बचपन से ही बहुत पसन्द है। हालाँकि इसका कुछ अंश मैं भूल गया था।

Pratyaksha on July 05, 2006 said...

स्कूल में पढी थी ये कविता.पुराने दिन याद आ गये. वो शिक्षिका भी याद आईं जिन्होंने इस कविता का भाव समझाया था.
शुक्रिया

MAN KI BAAT on July 05, 2006 said...

प्रगतिवादी राष्ट्र-कवि दिनकर की कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
प्रेमलता

Sindhu on July 05, 2006 said...

बहुत सुन्दर हैं!

Manish on July 07, 2006 said...

मित्रों, बेहद खुशी हुई जानकर कि मेरी तरह ये कविता आपकी भी चहेती है ।:)

rachana on July 08, 2006 said...

ek achchi kavita ke liye dhanyawad.

Manish on July 10, 2006 said...

रचना कविता आपको पसंद आई जानकर खुशी हुई।

मुकेश बंसल on July 26, 2006 said...

मनीष भाई आपको धन्यवाद, इस कविता को इमेज से बदल कर यूनिकोडित करने के लिये।
मैंने यह कविता अपने ब्लाग पर भी डाल दी है। आपको धन्यवाद करना नहीं भूला हूं।

Anonymous said...

bahut achchi hai

Anonymous said...

Cool blog, interesting information... Keep it UP »

Seema Kumar on February 08, 2007 said...

मैंने भी स्कूल में पढी थी ये कविता और बचपन से ही बहुत पसन्द है।

मैंने इसका लिंक यहाँ डाला है : http://seemaspoems.blogspot.com/

Anonymous said...

Thanks a lot for uploading this poem........

dheeraj on June 05, 2008 said...

bahut achchha laga kavita pad ke bachpan me padi kavita main to bhul hi gaya to apko bahut bahut dhanyavad
dheeraj mishra

Mannu on September 06, 2008 said...

Dhanyavad manish jee. aapka blog padhkar mujhe kaafi khushi huee. nayee peedhee ke logon ka bhasha evam sanskriti ke pratee jhookav bahut kam dekhne ko milta hai. chaliye ham sab milkar hindi ke punarjagran ke liye kaam karen. aaj hum sab hindi bhashiyon ko jodkar rakhne waali ek sutra ki aavashykta hai. vishv ki sampurn bahshaon evam dharmon ka samman karte huye hum sab apni matribhasha ke vikas ke liye kaam karen.Vaise to bhasha ek bahti hui nadi ke saman hai jo ki apne vikas ka marg swayam doondh leti hai parantu nadi sarikhi is bahsha ke marg ko hum sab prashasht karne me sahayak banen. apni matribhasha ke prati yahi hamari sachhi shraddhanjali hogi.

beete kuch dinon se aisa lag raha tha ki main hindi likhna bhool gaya hoon. Kintu aaj hindi me likhte hue anayas hi vichar mere man me aate ja rahe hain aur aisa lagta hai ki main nirartha hi angreji ke prati apni peeche bhag raha tha.
Chaliye dekhte hain zindgi mujh jaise nacheez ko kis mukaam par le kaar jaati hai.
Vaise beete dinon ki yaad dilane ke liye dhanyavad.

Mannu on September 06, 2008 said...

Mitron, kshama karen. Mujhe " Chandan hai is desh ki maati , tapobhumi har gram hai" kavita yadi kahin se mil jaati to mujhe kaafi khushi hogi.
Aabhar- Mannu.

Manish Kumar on September 07, 2008 said...

Mannu ji is blog par aane aur apne vichar rakhne ke lliye shukriya. aaj hindi blogs par hazaron log Hindi mein likh rahe hain.
baharhaal aapne Harimohan Visht ki jis rachna ke liye aagrah kiya tha wo ye rahi:

चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है,
हर बाला देवी की प्रतिमा, बच्चा-बच्चा राम है ।

हर शरीर मंदिर-सा पावन, हर मानव उपकारी है,
जहाँ सिंह बन गये खिलौने, गाय जहाँ माँ प्यारी है।

जहाँ सबेरा शंख बजाता, लोरी गाती शाम है;
जहाँ कर्म से भाग्य बदलते, श्रम निष्ठा कल्याणी है,
त्याग और तप की गाथायें, गाती कवि की वाणी है।
ज्ञान जहाँ का गंगाजल-सा, निर्मल है, अविराम है
जिसके सैनिक समर भूमि में, गाया करते गीता है,
जहाँ खेत में हल के नीचे खेला करतीं सीता हैं ।
जीवन का आदर्श यहाँ पर, परमेश्वर का धाम है ।

चंदन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है

 

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