Saturday, March 10, 2007

वार्षिक संगीतमाला 2006 सरताज गीत: बिटिया होने का सच !

दुख फसाना नहीं की तुझसे कहूँ
दिल भी माना नहीं की तुझसे कहूँ

आज तक अपनी बेकली का सबब
खुद भी जाना नहीं की तुझसे कहूँ

अहमद फराज

ये दुख भी अजीब सी चीज है । एक बार अंदर पलने लगे तो जी घुटता सा रहता है। इच्छा भी नहीं होती कि किसी को कहें। पर दिल की चारदीवारी के अंदर कोई भी बाँध कितना भी ऊँचा क्यूँ ना बनाएँ,...एक दिन तो वो बाँध भरेगा ही और उससे बह कर निकलने वाली पीड़ा दूसरों को भी दर्द में डुबायेगी ही । मेरी इस संगीत श्रृंखला के शिखर पर विराजमान इस गीत में कुछ ऐसी ही पीड़ा अन्तरनिहित है जो गीत के प्रवाह के साथ मन में रिसती हुई नक्श सी हो जाती है ।

आखिर उमराव जान 'अदा' की अमीरन ने उस बाँध के टूट जाने के बाद ही तो ऐसा कहा होगा ।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो....

तनिक अमीरन को क्षण भर के किए पीछे कर अपने चारों ओर के हालातों पर नजर दौड़ायें तो पाते हैं कि अभी भी हमारे समाज का एक वर्ग लड़की के रूप में जन्म लेने को एक अभिशप्त जिंदगी की शुरुआत मानता है ।

अगर ऐसा नहीं होता तो पंजाब जैसे समृद्ध और अपेक्षाकृत विकसित राज्य में मादा भ्रूण हत्याएँ इतनी ज्यादा क्यूँ कर होतीं ?


दहेज के लोभी अपनी नहीं तो किसी और की बिटिया को क्यूँ जलाते ?

शिक्षा के मंदिर / आश्रमों में भी पढ़ाई की आड़ में यौन शोषण की जुर्रत कोई कैसे करता ?

बलात्कर जैसे घिनौने अपराध के दोषी भी सीना तान के बिना किसी शर्मिन्दगी के न्यायालय में जाते और बेदाग छूट कर कैसे आते ?

रोज-रोज ऐसा देखते हुए भी हमारा समाज चेतनाशून्य सा क्यूँ बना रहता है ?.
सच तो ये है कि मस्तिष्क के किसी कोने में हमारी सोच नहीं बदली है ।

रिचा शर्मा की आवाज में जब भी ये गीत सुनता हूँ ,ये सारे प्रश्न दिलो दिमाग को सोचने पर मजबूर करते हैं ....

ये गीत इसलिए भी मेरी पहली पायदान का गीत है क्यूँकि इस गीत को सुनने के बाद ये जज्बा मजबूत होता है कि जो हो चुका उसे तो नहीं बदल सकते पर आने वाले कल में कुछ तो करें जिससे किसी कि बेटी इस गीत की व्यथा से न गुजरे ।


 


जावेद साहब ने इस गीत में एक बिटिया के दर्द को अपनी लेखनी के जादू से इस कदर उभारा है कि इसे सुनने के बाद आँखें नम हुये बिना नहीं रह पातीं । ऋचा जी की गहरी आवाज , अवधी जुबान पर उनकी मजबूत पकड़ और पार्श्व में अनु मलिक का शांत बहता संगीत आपको अवध की उन गलियों में खींचता ले जाता है ।गीत,संगीत और गायिकी के इस बेहतरीन संगम को शायद ही कोई संगीतप्रेमी सुनने से वंचित रहना चाहेगा।



अब जो किये हो दाता, ऐसा ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो ऽऽऽऽ

जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

हमरे सजनवा हमरा दिल ऐसा तोड़िन
उ घर बसाइन हमका रस्ता मा छोड़िन
जैसे कि लल्ला कोई खिलौना जो पावे
दुइ चार दिन तो खेले फिर भूल जावे
रो भी ना पावे ऐसी गुड़िया ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो
जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो...

ऐसी बिदाई बोलो देखी कहीं है
मैया ना बाबुल भैया कौनो नहीं है
होऽऽ आँसू के गहने हैं और दुख की है डोली
बन्द किवड़िया मोरे घर की ये बोली
इस ओर सपनों में भी आया ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो...
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10 comments:

Udan Tashtari on March 10, 2007 said...

वाह वाह!! सही है यह गाना बिल्कुल सही स्थान पर है.

पूरी संगीतमय यात्रा बहुत बढ़िया रही. मजा आया. आपको बधाई!!

जगदीश भाटिया said...

अच्छी रही संगीत यात्रा :)
बहुत ही खूबसूरत गीत है नंबर एक पर।
अफसोस आजकल के एम टीवी के जमाने में इस तरह के गीत अनजाने ही रह जते हैं :(

नितिन व्यास on March 10, 2007 said...

तो मनीष भाई मेरी गोटी सही फिट हो गई!!

गीत वाकई में सरताज है, आपकी पसंद के सारे गीत पसंद आये।

Jitendra Chaudhary on March 10, 2007 said...

बहुत सही मनीष भाई,
यह गीत सचमुच सरताज गीत के लायक था।
रिचा शर्मा की आवाज मे दर्द है, ऊपर से जावेद साहब के बोलों ने जादू का काम किया।

बहुत सुन्दर।

लेकिन यार! ये गीतों का सफ़र यहाँ समाप्त नही होना चाहिए, अब कुछ और शुरु करो, नया, कुछ अलग। गज़लों का सफ़र?

पूनम मिश्रा on March 12, 2007 said...

बहुत बढिया मनीष.आपके सरताज गीत का चुनाव बहुत सही है.इस गीत का दर्द उसके अल्फ़ाज़ ,उसकी धुन,ऋचा शर्मा की आवाज़ सबमें नज़र आता है.

Manish on March 12, 2007 said...

समीर जी हाँ , अब आपने चैन की साँस ली होगी कि चलो जान छूटी :) :)
इस गीत ने आपके दिल को भी छुआ जानकर प्रसन्नता हुई ।

जगदीश जी बिलकुल सही कहा आपने । टीवी बाले विसुअल अपील वाले गानों को तो घंटे में दस बार बजाते हैं पर इस तरह के गीत अनसुने रह जाते हैं ।

Manish on March 12, 2007 said...

नितिन वाह सच में आपका गेस कमाल का रहा ! आपको जरूर मेरी इस गीत पर की गई पिछली पोस्ट का ख्याल रहा होगा । :)

Manish on March 12, 2007 said...

जीतू भाई गीत संगीत से तो इस चिट्ठे का चोली दामन का सम्बन्ध है । कोई श्रृंखला तो नहीं शुरु करने जा रहा पर आपको रह रह कर कुछ सुनने को यहाँ मिलता रहेगा ये फिलहाल यकीन से कह सकता हूँ ।

manya on June 11, 2007 said...

Bahut der se dekha.. par ek baar fir yahi kahungi ki ye mere pasandida Geeton mein se ek hai.. jab se Umraao Jaan ke gaane release huye hain.. tab se ab tak praayh roz sunti hun... jab movie dekhi thi to last pararagraph mein ro di thi.. jo dard hai si gaane mein.. wo dil ek andar utar jata hai..geet ka ek ek bol.. ek ek pankti mein jodard hai wo sirf samjha ja sakta hai bayaan nahi kiya ja sakta.. fir iski bhasha ise aur madhur banaati hai..sachmuch aap Lyrics ke hisaab se jab gaano ka bhaut umdaa chunaaw karte hain... is gaane ke liye tahe dil se shukrgujaar hun.. aise gaane kam log hi sunte honge..bahuton ko pata bhi nahi hoga is gaane ke baare mein..jus superb!!!!!

Manish on June 11, 2007 said...

मान्या मैंने देखा है कि जिस वजह से मुझे कोई गीत ज्यादा पसंद आता है, हू बहू वही वजहें आपकी भी उस गीत को पसंद करने की होती हैं। सही कहा आपने, ऍसे गीतों को ज्यादा लोग सुन नहीं पाते। आजकल तो टीवी का जमाना है। देखे जाने वाले यानि जो आँखों को प्रिय लगें वो ही गीत ज्यादा लोकप्रिय होते हैं क्योंकि सिर्फ गीतों को सुन कर महसूस करने का फैशन नहीं है। मैनें उमराव जान देखी नही, पर पहली बार इसकी दो पंक्तियाँ सुनी...मन एकदम से दूसरी तरह का हो गया...बाकी जो आपने कहा इस गीत के बारे में उससे पूरी तरह इत्तिफाक रखता हूँ।

 

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