Tuesday, March 13, 2007

अमृता प्रीतम की 'दो खिड़कियाँ ' औरतों के आपसी रिश्तों को कुरेदती एक अनुपम कृति !

अमृता प्रीतम के गद्य लेखन का आनंद शायद ही किसी साहित्य प्रेमी पाठक ने ना उठाया हो । अमृता प्रीतम की लेखन शेली में एक सतत प्रवाह है । वे अपने विचारों को बड़ी बेबाकी से रखती हैं और चरित्रों पर इनकी पकड़ हमेशा मजबूत रहती है । दो खिड़कियाँ उनका एक अनूठा कहानी संग्रह है जिसमें कुल सात कहानियाँ और एक लघु उपन्यास है ।

इस संग्रह की पहली कहानी दो खिड़कियाँ उन हालातों का जिक्र करती है जिनसे देश की हुकूमत सँभालने वाले परिवार को हिंसक तख्तापलट के बाद गुजरना पड़ता है । पति की मृत्यु के बाद विक्षिप्त पड़ी माँ के साथ घर में नजरबन्द जिंदगी बसर कर रही पुत्री डांगा के मनोभावो का सूक्ष्म विश्लेषण करती हुई अमृता जी कहती हैं


"डाँका के बड़े कमरे में दो खिड़कियाँ थीं। आगेवाली खिड़की की तरफ बड़ी सड़क थी..पीछेवाली खिड़की की तरफ जंगल था......आगे की खिड़की से बड़ा शोर आता था लोगों के पाँव, ट्रामों के पहिए जैसे शब्दों का खड़ाक होता है ..पर पीछे की खिड़की में से कोई खड़ाक नहीं होता था जैसे अर्थों का कोई खड़ाक नहीं होता, और वे सिर्फ पेड़ के पत्तों की तरह चुपचाप उग जाते हैं, और चुपचाप झड़ जाते हैं ।"

पक्की हवेली इस संग्रह का एकमात्र लघु उपन्यास है जो एक बच्ची द्वारा अपने इर्द गिर्द बुने जटिल इंसानी रिश्तों को समझने की कोशिश है । फिर आता है इस संग्रह का सबसे रोचक हिस्सा जिसमें छः कहानियाँ हैं और सभी का शीर्षक एक ही है- दो औरतें । स्त्री-पुरुष संबंधों पर तो कितनी रचनाएँ लिखी गईं हैं पर अलग अलग किरदारों के रूप में स्त्रियों के आपसी रिश्तों की बारीकियों को बड़ी ही सुंदरता से उभारा है अमृता जी ने इन कथाओं में । औरतों के आपसी रिश्तो और पुरुष से उसके रिश्तों में भेद करती हुई वो कहती हैं ।


"औरत और मर्द का रिश्ता जितना भी उलझा हुआ हो, फिर भी सीधा होता है। स्वाभाविक, एक प्राप्ति का अहसास उसकी रगों में है सिर्फ मिलन में नहीं, विरह में भी, ओर तसव्वुर में भी । उसकी बुनियाद में जिस्मानी जरूरतें होती हैं। इसलिए वो अपने अलगाव में भी कहीं ना कहीं जुड़ा रहता है, और उसका टूटकर भी अटूट रहना, उसे बड़ी से बड़ी कुर्बानी का बल देता है। .....


.....पर औरत और औरत का रिश्ता, माँ और बेटी के रिश्ते को छोड़कर, सीधा नहीं होता किसी मर्द के माध्यम से होता है। इसीलिए उसमें एक की प्राप्ति ,अक्सर दूसरे की अप्राप्ति बन जाती है और इसलिए वो उलझ जाता है तो उसका तार फिर हाथ में नहीं आता । टूट जाता है तो उसमें दर्द का गौरव नहीं आता ।..."


अमृता जी इंसानी रिश्तों को हमेशा उनके सामाजिक परिपेक्ष्य में रखते हुए ही कुरेदती हैं । सामाजिक विषमता और उससे जुड़ी इंसानी फितरत पर किए गए उनके तीखे कटाक्ष लाजवाब होते हैं । अपने किरदारों के चरित्र चित्रण के लिए वो ऐसे रूपकों का इस्तेमाल करती हैं जो हम सब की आस पास की जिंदगी से जुड़े होते हैं। अब यही बानगी देखिए
"रोटी का एक बड़ा सीधा हिसाब होता है अमीर को जिस वक्त भूख लगे, गरीब को जिस वक्त जुड़ जाए। सो धनराज ने जब उसकी तनख्वाह १८ रुपये महीना थी, गरीब की रोटी की तरह जब जुड़ी, खा ली थी। उसकी मरती हुई माँ ने इस डर से कि कहीं मेरा बेटा रह ना जाए, किसी गरीब घर की लड़की उसे ब्याह दी थी जो उम्र में धनराज से सात बरस बड़ी थी ।
.....पर अब वह १८ रुपये महिने नहीं बलकि १८०० रुपये कमाता था। और रोटी के सीधे-साधे उसूल की तरह उसकी भूख जाग उठी थी . वह अपनी औरत के साथ जब भी सोता, उसे लगता जैसे वह एक गरीब-गुरबे की तरह हथेली से प्याज तोड़कर रोटी खा रहा था। और उसे एक अमीर आदमी का रोष चढ़ जाता कि इस वक्त जो उसे भूख लगी हुई थी तो उसके सामने कबाब की प्लेट क्यूँ नहीं थी ...
सो एक दिन उसने प्याज जैसी औरत को एक कोने में रखकर, भुने हुए कबाब सरीखी औरत कर ली । कबाब की खुशबू सारे बँगले में फैल गई, और प्याज ने मन की तहों को लपेटकर अपने पर खामोशी का छिलका चढ़ा लिया था ।...."
अमृता प्रीतम के इस कथा संग्रह की अन्य कहानियों के बारे में अपने विचार ले के प्रस्तुत हूँगा इस समीक्षा की अगली समापन किश्त में ..
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2 comments:

Udan Tashtari on March 14, 2007 said...

हमेशा की तरह बड़ी सुन्दरता से इस कहानी की समीक्षा की है.बहुत बधाई.

Manish on March 15, 2007 said...

शुक्रिया समीर जी !

 

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