Tuesday, September 18, 2007

रब्बी शेरगिल : तेरे बिन, सन सोणिया कोई होर नहीं ओ लभना...सुनिए इस पंजाबी गीत को हिंदी अनुवाद के साथ...

पश्चिमी रॉक , लोक संगीत और सूफ़ियाना बोल का मिश्रण सुनने में आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता। ज़ाहिर है जरुर लगता होगा। मुझे भी लगा था जब मैंने इस नौजवान को नहीं सुना था। पर 2005 में जब मैंने 'बुल्ला कि जाणा मैं कौन' सुना तो रब्बी शेरगिल की गायिकी का मैं कायल हो गया। आज, बुल्ले शाह के सूफी लफ़्जों को गिटार के साथ इतने बेहतरीन ढ़ंग से संयोजित कर प्रसिद्धि पाने वाले रब्बी शेरगिल किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। आज की तारीख़ में उनके पास प्रशंसकों की अच्छी खासी जमात है। पर रब्बी को ये शोहरत आसानी से नहीं मिली।

सितंबर १९८८ में ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कान्सर्ट में संगीत को अपना पेशा चुनने की ख़्वाहिश रखने वाले रब्बी सत्रह साल बाद अपना खुद का एलबम निकालने का सपना पूरा कर पाए। ख़ैर बुल्ला ..के बाजार में पहुँचने की दास्तान तो अपने आप एक पोस्ट की हकदार है, वो बात कल करेंगे। आज चर्चा करेंगे रब्बी के गाए इस गीत की जिसे एक बार सुन कर ही मन प्रेमी के शब्दों की मासूमियत में बहता चला जाता है। अब देखिए ना, पंजाबी मेरी जुबान नहीं फिर भी इस गीत के बोल, पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू मेरे इर्द गिर्द फैला ही जाते हैं।

अब भला एक अच्छे च्यक्तित्व के स्वामी, गिटार के इस महारथी को पंजाबी में गाने की कौन सी जरुरत आन पड़ी? रब्बी इस प्रश्न का जवाब कुछ यूं देते हैं....

"...हम जाट सिख लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है। वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल सकती। दूसरी भाषा में सोचने का मतलब उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेना होगा। वैसे भी अंग्रेजी में गाकर मुझे दूसरे दर्जे का रॉक सिंगर नहीं बनना। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मैं कौन हूँ. ....."

काश हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार भी अपनी भाषा के बारे में ये सोच रखते!

खैर रब्बी की आवाज, उनके खुद के लिखे बोल, अंतरे के बीचों-बीच में गिटार की मधुर बंदिश इस गीत में खोने के लिए काफ़ी हैं। तो लीजिए इस गीत का आनंद उठाइए।क्या कहा पंजाबी नहीं आती !

गीत का दर्द तो आप इसकी भाषा जाने बिना भी महसूस कर सकेंगे पर आपकी सुविधा के लिए इस गीत का हिंदी अनुवाद भी इसके बोल के साथ साथ देने की कोशिश की है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मूझे कोई और पसंद नहीं। तुम्हारे आलावा कौन है जो मेरे नखरे सहे और जिस का साथ दिल को सुकून दे सके?

मैं सारे घूम के वेखिया, अमरीका, रूस, मलेशिया
ना किते वी कोई फर्क सी, हर किसे दी कोई शर्त सी
कोई मंगदा मेरा सी समा, कोई हूंदा सूरत ते फ़िदा
कोई मंगदा मेरी सी वफा, ना कोई मंगदा मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, मंगनी मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, करनी धूप विच छां
तेरे बिन, सन सोणिया...


मैंने कहाँ कहाँ घूम कर नहीं देखा, अमरीका हो या रूस, या फिर मलेशिया। कहीं कोई फर्क नहीं है, सारे मतलबी हैं। सबकी कोई ना कोई शर्त है। कोई मेरा समय चाहता है तो कोई मेरे रूप पर मोहित है। किसी को वफादारी का वादा चाहिए। पर मेरी कमियाँ... वो तो कोई नहीं लेना चाहता....सिवाय तेरे। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि तुम मेरे लिए जिंदगी की इस कड़ी धूप में एक ठंडी छाँह की तरह हो।

जीवैं रुक्या  सी तू ज़रा, नहींo भूलणा मैं सारी उमर
जीवें अखियाँ सी अक्खयाँ चुरा, रोवेंगा सानू याद कर
हँस्या सी मैं हँसा अज़ीब, पर तू नहीं सी हँस्या
दिल विच तेरा जो राज सी, मैंनू तू क्यूँ नहीं दसया
तेरे बिन, सानू एह राज, किसे होर नहींऽओ दसना
तेरे बिन, पीड़ दा इलाज, किस बैद कोलों लभना
तेरे बिन, सन सोणिया...

मैं जीवन भर भूल नहीं सकता वो दिन..जिस तरह तुम हौले से रुकी थी और मुझसे आँखे चुराते हुए कहा था कि मेरी याद तुम्हें रुलाएगी। इक अज़ीब सी हँसी हंसा था मैं पर तुम तो नहीं हँसी थी। तुमने क्यूँ नहीं कहा कि तुम्हारे दिल मे वो प्यारा सा राज नज़रबंद है। भला बताओ तो तुम्हारे आलावा ये राज मुझे कौन बता सकता है? तुम्हारे बिना वो कौन सा वैद्य है जो मेरे दिल का इलाज कर सकता है?

मिलिआँ सी अज्ज मैनू.. तेरा इक पत्रां
लिखिआ सी जिस तै, तुन शेर वारे शाह दा
पढ़ के सी ओस्नूँ, हांन्जू इक दुलिया
आँखांच बंद सी, सेह राज अज्ज खुलिया
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू, किसे होर नहींऽओ चुमना
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू मिट्टी विच रुंदणा

मुझे आज ही तेरा लिखा वो ख़त मिला जिसमें तूने वारिस शाह का वो शेर लिखा था। उसे पढ़कर अनायास ही आँसू का एक कतरा नीचे ढलक पड़ा वो राज खोलता हुआ जो मेरी आँखों मे अर्से से बंद था.। अब मेरे इन आँसुओं को तुम्हारे सिवा कोई और नहीं चूमेगा। सच तो ये है कि तुम्हारे बिना मेरे लिए इन आँसुओं को मिट्टी की गर्द फाँकना ही बेहतर है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

इस गीत को दिल्ली हाइट्स में जिमी शेरगिल और नेहा धूपिया पर फिल्माया गया है। साथ-साथ रब्बी तो हैं ही..





अगली पोस्ट में बात करेंगे रब्बी के सबसे लोकप्रिय गीत की जिसे रिलीज होने से पहले सुना अमिताभ बच्चन और वी. एस. नएपाल जैसी नामी हस्तियों ने और एक बार सुन कर ही वे इस गीत में खो गए..
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9 comments:

अजय यादव on September 18, 2007 said...

मनीष भाई!
रब्बी शेरगिल के इस खूबसूरत गीत को सुनवाने और इसके अर्थ के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद! मैं आमतौर पर रॉक नहीं सुनता. रब्बी शेरगिल की गायकी की तरफ मेरा रुझान भी उनके गाये ’बुल्ला की जाँणा मैं कौन’ गीत की वज़ह से हुआ था जो बहुत अरसे से मेरा पसंदीदा कलाम रहा है. पहली बार जब बुल्लेशाह के कलाम को इस रूप में सुना तो आकर्षण से अधिक ये जानने की इच्छा मन में उभरी कि आखिर बुल्लेशाह की काफ़ियों को इस दौर में और इस ढंग से इस्तेमाल करने वाला शख्स है कौन? उसके बाद से रब्बी को कई बार सुना है. पंजाबी लोकसाहित्य से आज की पीढ़ी को जोड़ने के इस बेहतरीन प्रयास के लिये रब्बी निश्चय ही सम्मान के काबिल हैं.
पुनश्च: धन्यवाद!

yunus on September 18, 2007 said...

मनीष अभी भी इस गीत को सुन रहा हूं ।
आजकल ये बहुत सुनाई देता है । रब्‍बी मेरे प्रिय कलाकार हैं ।
सूफी की तो वैसे भी हमें लौ लग गयी है । आजकल आबिदा को सुन रहे हैं ।
बेहतरनी प्रस्‍तुति ।

काकेश on September 18, 2007 said...

ये तो मेरा भी फैवरिट है जी.

vimal verma on September 18, 2007 said...

अच्छा लगा और खासकर अनुवाद करके तो आपने बहुत ही अच्छा काम किया है.. रब्बी की आवाज़ तो बढिया है ही पर उन्होंने धुन बहुत सुन्दर रची है. "बुल्ला" का अनुवाद भी हो सकता है क्या?उसे ज़रूर सुनना चाहुंगा.. पूरे गीत का मजमून तो समझ मे आता है पर पूरा गीत समझना चाहता हूं. मनीषजी बहुत बहुत शुक्रिया..

सजीव सारथी on September 18, 2007 said...

वाह मनीष जी अब तक मैं इस गीत के दूसरे और तीसरे अंतरे का अर्थ नही समझा पाया था आपने बता कर बहुत अच्छा किया, अब सुनने मे और भी मज़ा आएगा

Udan Tashtari on September 19, 2007 said...

वाह!! रब्बी शेरगिल के तो हम भी दीवाने हैं. बुल्ला की जाना तो उतरता ही नहीं दिमाग से. आज कल यह ही खूब चल निकला है. यूट्यूब के क्लिप का आभार.

Udan Tashtari on September 19, 2007 said...

वाह!! रब्बी शेरगिल के तो हम भी दीवाने हैं. बुल्ला की जाना तो उतरता ही नहीं दिमाग से. आज कल यह ही खूब चल निकला है. यूट्यूब के क्लिप का आभार.

Manish on September 21, 2007 said...

अजय रब्बी के संगीत और गायिकी के बारे में मेरी राय आपसे बिलकुल मिलती है।
यूनुस सूफी संगीत मोहक तो है ही।
काकेश अच्छा लगा जानकर।
विमल जी बुल्ला के बारे में अपने रोमन हिंदी चिट्ठे पर लिखा था। शीघ्र ही उसे हिंदी में प्रस्तुत करूँगा.
सजीव चलिए अनुवाद आपके काम तो आया। खुशी हुई जानकर।
समीर जी आपकी पसंद यानि हमारी पसंद

वाणी गीत on December 16, 2013 said...


कब से इस गीत के पूरे शब्दों का अर्थ ढूंढती थी , बहुत कुछ समझ में आते हुए भी।
शायद ठीक से ढूँढा नहीं !
शुक्रिया !

 

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