Monday, October 13, 2008

इतनी मुद्दत बाद मिले हो, किन सोचों में गुम रहते हो : दिलराज कौर और गुलाम अली की आवाज़ों में

पिछले हफ़्ते भर मैं अपने चिट्ठे से दूर उड़ीसा के कस्बों और जंगलों में यायावरी करता रहा । सफ़र के दौरान नौका पर लेटे लेटे आसमान की ओर नज़रें डालीं तो ये आधा अधूरा चाँद मुझको ताकता दिखा और बरबस जनाब मोहसीन नक़वी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं

बिछुड़ के मुझ से कभी तूने ये भी सोचा है
अधूरा चाँद भी कितना उदास लगता है

चिट्ठे से अपना विरह आज समाप्त हुआ तो दिल हुआ कि क्यूँ ना मोहसीन नक़वी साहब की ये प्यारी ग़ज़ल आप सबको सुनवाई जाए। ये ग़ज़ल गुलाम अली साहब की उस एलबम का हिस्सा थी जिसने उन्हें भारत में ग़ज़ल गायिकी के क्षेत्र में मकबूलियत दिलवाई। अब हंगामा है क्यूँ बरपा, आवारगी और इतनी मुद्दत बाद मिले हो जैसी मशहूर ग़ज़लों को कौन भूल सकता है। 'आवारगी' लिखने वाले भी मोहसीन ही थे।

पर कभी-कभी सीधे सहज शब्द ज्यादा तेजी से असर करते हैं। शायद यही वज़ह रही कि बीस बाईस साल पहले गुलाम अली की ये ग़ज़ल ऐसी दिल में बसी कि फिर कभी नहीं निकल सकी।
इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो

तेज़ हवा ने मुझसे पूछा,
रेत पे क्या लिखते रहते हो

हमसे न पूछो हिज्र के किस्से
अपनी कहो, अब तुम कैसे हो

कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यों लगते हो


पर आज इसे मैं आपको गुलाम अली साहब की आवाज़ के साथ साथ दिलराज कौर की आवाज में भी सुना रहा हूँ। जहाँ गुलाम अली ने इस ग़ज़ल में शब्दों के उतार चढ़ाव को अपनी गायिकी के हुनर के ज़रिए कई नमूनों में पेश किया है वहीं दिलराज कौर ने सीधे तरीके से इस ग़ज़ल को अपनी खूबसूरत आवाज़ से सँवारा है। तो पहले सुनिए दिलराज कौर की दिलकश अदाएगी..

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गुलाम अली इस ग़ज़ल को गाते समय कहते हैं जैसे लफ्ज़ इज़ाजत दें वैसे ही सुर लगाने की कोशिश कर रहा हूँ तो सुनिए उनका अपना अलग सा अंदाज़...


वैसे आप बताएँ कि इनमें से ग़ज़ल गायिकी का कौन सा तरीका आपको ज्यादा पसंद आया ?
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11 comments:

Ranjan on October 13, 2008 said...

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो..

बहुत दिनों बाद सुनने को मिला.. धन्यवाद

शोभा on October 13, 2008 said...

मनीष जी
बहुत सुंदर गीत सुनवाया. ये मेरा मन पसंद गीत है. आभार.

शायदा on October 13, 2008 said...

एक कैसेट थी-एक ग़ज़ल दो आवाज़...उसमें सुना था इसे बरसों पहले। कई बार सुबह से लेकर शाम तक भी सुना गया। बाद में कैसेट गुम हो गई उन्‍हीं दिनों की तरह जो पलटकर नहीं आए। आज सुना तो लगा कि दिन भी पलट सकते हैं इन आवाज़ों की तरह।
बहुत बहुत शुक्रिया सुनवाने का।

रंजना [रंजू भाटिया] on October 13, 2008 said...

बहुत पसंद आया यह ..शुक्रिया मनीष जी

डॉ .अनुराग on October 13, 2008 said...

दिलराज कौर की आवाज में सुना नही था पहले....शुक्रिया

रौशन on October 13, 2008 said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल

अभिषेक ओझा on October 13, 2008 said...

हमने अभी तक तो सुना नहीं था... आज फुर्सत से सुनता हूँ. आपकी पसंद है तो अच्छी तो होगी ही !

सुकेश श्रीवास्तव on October 13, 2008 said...

इतनी मुद्दत बाद मिले हो
किन सोचों में गुम रहते हो.......?

जनाब ये सवाल तो आपके लिए है, इतने दिनों बाद अपने ब्लॉग पैर लौटे है आप.....:-)

PREETI BARTHWAL on October 13, 2008 said...

बहुत बढ़िया मनीष जी ।

kar lo duniya muththee me on October 13, 2008 said...

मनमोहक प्रस्तितुती .... मेरे ब्लॉग पर पधारने हेतु सादर आमंत्रण है

कंचन सिंह चौहान on October 16, 2008 said...

कौन सी बात है तुम में ऐसी
इतने अच्छे क्यों लगते हो

ye ek line jo bahut chhuti hai, bahut bhavuk hai aur bahut practical bhi.ja bhi koi man kisi ko maanta hai to kitni hi baar us ke man me aata hoga ki ye itna sadharan sa vyakti.. aisi kaun si baat hai is me ki mera vazud is ke girda ghoomata hai...!

beyond explanations..I love these lines... thanks

 

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