Saturday, June 13, 2009

खेलने के वास्ते अब दिल किसी का चाहिए, उम्र ऍसी है कि तुमको इक खिलौना चाहिए

पिछले महिने एक शाम मेरे नाम पर अस्सी के दशक में ग़ज़लों की दुनिया के लोकप्रिय गायकों और गायिकाओं की चर्चा चल रही थी। इस सिलसिले में मैंने आपको पीनाज़ मसानी, राज कुमार रिज़वी और राजेंद्र मेहता - नीना मेहता की गाई अपनी कुछ पसंदीदा ग़ज़लों को सुनवाया था। इसी सिलसिले को आज आगे बढ़ाते हैं अस्सी के दशक की एक और सुरीली आवाज़ से, जिसे आप और हम चंदन दास के नाम से जानते हैं। पीनाज़ मसानी की तरह ही चंदन दास को सबसे पहले देखने और सुनने का मौका मुझे दूरदर्शन की वज़ह मिला। पीनाज़ की तरह ही उन दिनों चंदन अक्सर अपने चिरपरिचित सफेद या क्रीम कुर्ते में दूरदर्शन के सुगम संगीत के कार्यक्रम में बारहा नज़र आते थे।

भारतीय ग़ज़ल गायिकी में ग़ज़लों को गीतनुमा शैली में गाने की उनकी शैली बिल्कुल अलग थी। अपनी ग़ज़लों में संगीत तो उन्होंने परंपरागत ही इस्तेमाल किया पर ज्यादातर ऍसी ग़ज़लें चुनी जिसे उर्दू का विशेष ज्ञान ना रखने वाला भी समझ सकता था। और फिर चंदन की जानदार आवाज़ और लफ्ज़ों का पैना उच्चारण, आम के साथ विशिष्ट जनों को भी अपनी पकड़ में ले ही लेता था।
चंदन दास की एक खासियत और रही वो ये कि उन्होंने अपने समकालीनों की तरह, अपने आप को एक प्रारूपित ढांचे में नहीं ढाला। मेरा इशारा पंकज उधास और अनूप जलोटा की ओर है । पंकज जी का ध्यान आते ही सुर के साथ सुरा याद आने लगती है वहीं अनूप जलोटा नाम सुनते ही मन में घुँघरु खनकने लगते हैं। शायद यही वज़ह रही की पच्चीस सालों बाद भी चंदन दास की गाई कई ग़ज़लें मन कि तहों से निकल निकल कर ज़ुबान पर आती रहती हैं। हाल ही में विमल भाई ने आपको चंदन दास की लोकप्रिय ग़ज़ल

ना जी भर के देखा ना कुछ बात की
बड़ी आरजू थी मुलाकात की

सुनवाते हुए ये लिखा था कि इतनी अच्छी आवाज़ के मालिक होते हुए भी चंदन की ग़ज़लों की फेरहिस्त ज्यादा नहीं है। पर अगर चंदन दास के संगीत सफ़र पर ध्यान दें तो उनके एलबमों की तादाद बीस को पार कर जाती है जिसे कम भी नहीं कहा जा सकता।


इस श्रृंखला में


इस श्रृंखला के लिए मैंने जिन ग़जलों को आपके सामने प्रस्तुत करने की इच्छा है वो वे ग़जलें हैं जिन्हें नब्बे के दशक में मैंने बहुत सुना और गुनगुनाया है। इस कड़ी में आज पेश है मुराद लखनवी की एक ग़जल जिसका मतला मुझे इस ग़जल की जान लगता है।

खेलने के वास्ते अब दिल किसी का चाहिए
उम्र ऍसी है कि तुमको इक खिलौना चाहिए

तो क्यूँ ना इसे गुनगुनाना शुरु किया जाए..


वैसे आप ये बताइए क्या आजकल दिल लगाना और तोड़ना एक खेल की तरह नहीं हो गया है? और तो और अगर जेब भरी हो तो प्रेम की लता ज़रा ज्यादा तेजी से फलती फूलती है इसलिए तो मक़ते में मुराद कहते हैं

कल तलक था दिल जरूरी राह ए उलफत में मुराद
आज के इस दौर में चाँदी औ सोना चाहिए

तो लीजिए सुनिए चंदन दास की धारदार आवाज़ में इस ग़ज़ल को



खेलने के वास्ते अब दिल किसी का चाहिए
उम्र ऍसी है कि तुमको इक खिलौना चाहिए

मुझ को कहिए हाथ में मेंहदी लगाना है अगर
खूने दिल दूँ या कि फिर खूने तुमन्ना चाहिए

बज़्म मे आओ किसी दिन कर के तुम सोलह सिंगार
इक क़यामत वक़्त से पहले भी आना चाहिए

तुम कहो तो मर भी जाऊँ मैं मगर इक शर्त है
बस कफ़न के वास्ते आँचल तुम्हारा चाहिए

कल तलक था दिल जरूरी राह ए उलफत में मुराद
आज के इस दौर में चाँदी और सोना चाहिए

ये ग़ज़ल चंदन दास के एलबम सितम का हिस्सा है जिसे बाजार में टी सीरीज द्वारा लाया गया था।
इस श्रृंखला की अगली कड़ी में चंदन दास से जुड़ी कुछ और बातें होंगी और साथ में होगी उनकी एक प्यारी सी ग़ज़ल ...
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4 comments:

Surbhi on June 14, 2009 said...

"इक क़यामत वक़्त से पहले भी आना चाहिए"
बहुत खूब! खूबसूरत ग़ज़ल के लिए शुक्रिया

venus kesari on June 14, 2009 said...

बहुत शुक्रिया
कम कहाँ ज्यादा समझिये :)
वीनस केसरी

कंचन सिंह चौहान on June 15, 2009 said...

खेलने के वास्ते और न जी भर के देखा दोनो ही मे बेहद पसंदीदा गज़लों में से हैं। ये कैसेट हम भाई बहन का साझा कैसेट है। चंदन दास की सहज गायिकी यूँ भ मुझे बहुत पसंद आती है।

Anonymous said...

Bahut khub

 

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