Friday, March 12, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- बड़े नटखट हैं मोरे कँगना..श्रेया घोषाल

भाइयों और बहनों वक्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला के शीर्ष में बैठे पिछले साल के मेरे पाँच सबसे पसंदीदा गीतों के बारे मे बातें करने का। ये पाँचों गीत अलग अलग मिज़ाज के हैं और इनकी सापेक्षिक वरीयता कोई खास मायने नहीं रखती। हाँ पाँच में चार गीतों में मुख्य स्वर किसी गायिका का है और इन चारों गीतों की गायिकाएँ भी भिन्न भिन्न हैं। तो आज किसकी बारी है? वार्षिक संगीतमाला की पाँचवी पॉयदान की शोभा बढ़ा रहा है 'दि ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई ' फिल्म का शास्त्रीयता के रंग में डूबा एक बेहद सुरीला सा नग्मा।

(चित्र में बाँये से मनोज,श्रेया, दीपक)
अगर फिल्म के नाम को देखकर कुछ अचंभित महसूस कर रहे हों तो ये बताना वाज़िब होगा कि फिल्म का शीर्षक उस काल्पनिक भारतीय तितली से जुड़ी कहानी कहता है जिसे पाने से खुशियाँ आपकी गुलाम हो जाती हैं। ये फिल्म भारत के बाहर वर्ष 2007 में ही प्रदर्शित हो चुकी है और उसके बाद विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का हिस्सा भी बन चुकी है पर इसका संगीत भारत में पिछले साल सितंबर में ही आया। पर पाँचवी पॉयदान के इस गीत का आनंद उठाने के लिए फिल्म की कहानी जानने की ज्यादा आवश्यकता नहीं। 

अमेठी से ताल्लुक रखने वाले गीतकार मनोज 'मुन्तशिर' इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। टीवी के कई महत्त्वपूर्ण शो जैसे केबीसी, सच का सामना वैगेरह के लिए लेखन का काम करने के बाद उन्होंने गीतकार बनने का निश्चय किया। मनोज, संगीतकार दीपक पंडित के साथ यू बोमसी & मी का भी एक गीत लिख चुके हैं। 

प्रस्तुत गीत में यूँ तो नायिका अपने प्रीतम को याद कर रही है पर किसके बहाने करे याद उनको। मुआ कँगना किस दिन काम आएगा। इसीलिए गीत के मुखड़े में मनोज लिखते हें...

बड़े नटखट हैं मोरे कँगना
रात में खनके तो सखियाँ समझें
आए पिया मोरे अँगना...
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...

वैसे कंगन का नाम लेकर सिर्फ नायिकाएँ अपने दिल की बात करती हों ऐसा भी नहीं। पाकिस्तान के युवा शायर वासी शाह की वो सदाबहार नज़्म दिमाग में आ जाती है।

काश मैं तेरे हाथ का कंगन होता !
तू बड़े प्यार से बड़े चाव से बड़े अरमान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझको
और बेताबी से फुरक़त के खिज़ां के लमहों में
तू किसी सोच में जो घुमाती मुझको
मैं तेरे हाथ की खुशबू से महक सा जाता
जब कभी 'mood' में आकर मुझे चूमा करती
तेरे होठों की शिद्दत से मैं दहक सा जाता..

तो देखा आपने कितना नटखट है ये 'कंगन' कवि की कल्पनाएँ इसके बहाने कहाँ तक छलाँग मार लेती हैं। पर मनोज तो सिर्फ कँगना के सहारे प्रेम में डूबी नायिका का मन टटोल रहे हैं। वैसे मनोज के सहज बोलों को संगीतकार दीपक पंडित ने विशु्द्ध भारतीय संगीत के चोले में इस तरह सजाया है कि एक बार सुन कर ही मन वाह वाह कर उठता है। गीत के साथ चलती तबले की थाप, इंटरल्यूड्स में विविध भारतीय वाद्यों का प्रयोग मन को सोहता है। और फिर श्रेया घोषाल का कोकिल स्वर रही सही कसर पूरी कर देता है। किस खूबसूरती से गीत को निभाया है उन्होंने! शास्त्रीय गीत हो या बॉलीवुड की विशुद्ध मेलोडी, दोनों में ही श्रेया अपनी प्रतिभा हमेशा से दर्शाते आई हैं। शायद इसीलिए पाठकों में अधिकांश ने उनको इस साल का सर्वश्रेष्ठ गवैया चुना है। तो आइए 

सुनें इस गीत को ..


बड़े नटखट हैं मोरे कँगना
रात में खनके तो सखियाँ समझें
आए पिया मोरे अँगना...
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...
हर पल याद पिया को करना
भूल गई मैं सँजना सँवरना
प्रीत के रंग में, रंग गई जबसे
भाए मोहे कोई रंग ना
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...
मोहे खबर क्या इस दुनिया की
जोगन हूँ अपने पिया की
मगन रहूँ मैं प्रेम लगन में
कोई करे मुझे तंग ना
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना....

वैसे चलते चलते ये भी बताता चलूँ कि इस गीत को गुलाम अली साहब ने भी अपनी आवाज़ दी है पर मुझे श्रेया का वर्सन ज्यादा प्रिय है। और हाँ, ये एलबम बाजार में Eros Music (Catalog -ECD0171) पर उपलब्ध है।
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11 comments:

अभिषेक ओझा on March 12, 2010 said...

पहली बात ही सुना इस गाने के बारे में, आज रात को सुनता हूँ. अभी तो चल नहीं पायेगा.

राज भाटिय़ा on March 12, 2010 said...

मनीष जी धन्यवाद

गौतम राजरिशी on March 12, 2010 said...

लीजिये हम अनुपस्थित क्या रहे कुछ दिनों तक, गिनती पाँचवें पायदान पर पहुँच गयी...

अभी देखा सारा छूटा हुआ। बाकि तो ठीक थे, किंतु इस गाने ने एकदम से चौंका दिया। अभी तक सुना जो नहीं था कभी।

अद्‍भुत...लाजवाब और आपकी पारखी नजर को सलाम!

एक विनती है सर जी, जब आप इतनी मेहनत कर ही रहे हैं तो तनिक इस डिव-शेयर वाला डाउन-लोड विकल्प वाला कोड भी डाल दिया कीजिये ना। चंद हम जैसे वीरानों में बैठे गीत-प्रेमियों का उद्‍धार हो जायेगा।

"अर्श" on March 12, 2010 said...

मनीष जी आदाब ,
बेहद खुबसूरत गीत , बेहद ,... अब मेरी पसंदीदा में शामिल है ये यही कहूँगा ... श्रेया मुझे अछि लगती है .. उनकी मखमली आवाज़ तो नहीं कहूँगा बल्कि ये की भोली आवाज़ है सुनाने के बाद दिमाग के देर तक चहलकदमी करती है ... और ऊपर से यह गीत मूलतः श्रेया की नहीं रह गयी है ... मनोज जी ने जिस नजाकत से लिखी है उतनी ही खूबसूरती से ... दीपक जी ने संगीत बढ़ किया है ... कुछ यादें आन मिलो सजना से ता'आलुक है लेखन में ...मगर दोनों के मिजाज़ अलग हैं... तबले की थिरकन से जो खूबसूरती दिया है दीपक जी ने वो कमाल है ... और जब श्रेया सम पर उतरती हैं तो हदें पार हो जाती हैं... बेहद खुबसूरत गीत ... बधाई


अर्श

निर्मला कपिला on March 13, 2010 said...

मनीश जी धन्यवाद । गीत मैने भी पहली बार सुना है मगर श्रेया को सुनना हमेशा ही अच्छा लगता है। बहुत सुन्दर प्रस्तुती।

Anjule Maurya said...

kangan ki khan khan se judi yaaden ..........bahut khub......

अपूर्व on March 13, 2010 said...

वार्षिक गीतमाला के यह फ़ायदे तो हैं..जो अनसुने गीतों का भी पता लग जाता है..औ सुनने को मिल जाते हैं..शुक्रिया शेयर करने के लिये..खासकर म्यूजिक बड़ा सुकून्देह लगा..

अल्पना वर्मा on March 13, 2010 said...

बेहद खूबसूरत गीत .
शुक्रिया .
पहली बार सुना यह गीत और गीतों से कुछ अलग सुनायी दे रही हैं श्रेया इस में.
बहुत ही निराली प्रस्तुति.

Priyank Jain on March 14, 2010 said...

Shreya Ghosal's melodious voice....really makes you wave with. Though listened the song first time but very soothing,

कंचन सिंह चौहान on March 16, 2010 said...

ye geet yun pahale kabhi nahi suna tha magar... pichhale dino is blog par khub suna.

Shreya ki awaaz yu bhi aise geeto me bahut suit karti hai.

thanks for introducing this song

Manish Kumar on March 16, 2010 said...

शुक्रिया आप सब का इस गीत को पसंद करने के लिए ! कभी कभी कुछ अच्छे गीत भी नज़रों से रह जाते हैं । ना रेडिओ पे बजते हैं ना कहीं चर्चा में आते हैं। वैसी ही श्रेणी का गीत हे ये।

 

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