Sunday, March 21, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : एक नज़र उन गीतों पर जो गीतमाला में आते आते रह गए...

वार्षिक संगीतमाला के लिए गीतों का चयन करते समय बहुत सारे गीत ऐसे थे जो कुछ हद तक पसंद आते हुए भी अंतिम पच्चीस में अपना स्थान नहीं बना पाए। इसलिए इससे पहले कि इस साल के रनर्स अप और सरताज गीत से आपकी मुलाकात कराई जाए एक नज़र उन गीतों पर जो आखिरी वक़्त में मेरी अंतिम सूची से बाहर चले गए। और हाँ ये बता दूँ कि इस पोस्ट में मैंने इन गीतों के सिर्फ वही टुकड़े लगाए हैं जो मुझे खास पसंद आए।

सबसे पहले जिक्र करना चाहूँगा मैं फिल्म सुनो ना के इस गीत का। एक अविवाहित माँ की कहानी कहती इस फिल्म का एक गीत अंतरा चौधरी ने गाया है और मुखड़ा सुनते ही दिल गीत की मायूसी में डूब सा जाया करता है। वैसे ये जानना मेरे लिए सुखद रहा कि अंतरा मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी की पुत्री हैं।




जिंदगी उलझनों से भरी है
अजनबी हैं सफ़र की राहें
हमसफ़र थे जो कल तक हमारे
फेर ली हैं उन्हीं ने निगाहें...

मायूसी की बात करें तो फिल्म रेडिओ में हीमेश रेशमिया और श्रेया घोषाल का गाया ये गीत भी हीमेश के नए अंदाज़ और संगीत में चुटकियों के प्रयोग के लिए बार बार सुनने योग्य है



कोई ना कोई चाहे, कोई ना कोई चाहे
हमसफ़र जिंदगी ऐ
बहुत अकेले जी चुके हैं
थक के तनहा अब रुके हैं
कह रही आवारगी ये, कोई ना कोई चाहे

इसी फिल्म का एक और गीत का मुखड़ा पिया जैसे लाडू मोती चूर वाले मनवा में फूटे हूक..... जिसे हीमेश के साथ रेखा भारद्वाज ने गाया है भी खासा आकर्षित करता है।

वैसे तो फिल्म न्यूयार्क का गीत है जुनून.... पिछले साल काफी बजा पर इसी फिल्म का एक और गीत मेरी लिस्ट में लगभग आते आते रह गया था। इसे मोहित चौहान ने गाया था अपनी उसी खास शैली में



हूँ ऊ ऊँ.................हूँ ऊ ऊँ
तूने जो ना कहा मैं वो सुनता रहा
खामख्वाह, बेवज़ह ख़्वाब बुनता रहा
हूँ ऊ ऊँ.................हूँ ऊ ऊँ
जाने किस की हमें लग गई है नज़र
इस शहर में ना अपना ठिकाना रहा....

शिल्पा राव का फिल्म पा में गाया मुड़ी मुड़ी इत्तिफाक से ....में स्वानंद किरकिरे का छोटे छोटे शब्दों द्वारा किया गया गीत संयोजन कमाल लगता है।



इसी फिल्म में अमिताभ बच्चन का गाया मेरी माँ तेरी है मेरे पा .....भी आँखे नम करने की काबिलियत रखता है पर अगर साल के बेहतरीन बाल गीत को चुनना हो तो मैं फिल्म सुनो ना में अपूर्वा के गाए गीत को ही चुनूँगा...



मेरी अम्मा सुनो मेरा कहना, लगे अप्पा बिना सब सूना
मुझे बातों से ना बहलाओ,जाओ अप्पा कहीं से लाओ
मान भी जाओ ये ज़िद मेरी,और करो ना अब तुम देरी
तुमसे रूठूँगा मैं वर्ना..........

सूफी गीतों में दिल्ली 6 का अर्जियाँ सारी.... जहाँ सबसे प्रभावशाली रहा वहीं कुर्बान का अली मौला.... भी कर्णप्रिय रहा। रोमांटिक गीतों में कुर्बान फिल्म में सोनू निगम 'शुक्र अल्लाह...' और फिल्म तेरे बिन में शान और श्रेया का गाया 'तेरे बिन कहाँ हमसे जिया जाएगा....' भी उल्लेखनीय रहे। एक झलक सुनिए



और आखिर में वो गीत जिसकी शुरुआती धुन मुझे बेहद पसंद है और इसे बनाने वाले हैं विशाल भारद्वाज। फिल्म और गीत तो आप पहचान ही गए होंगे..



थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोए वोए भी तो कम हैं हम

है ना ये पंक्तियाँ आपके दिल से जुड़ी हुईं..क्यूँ ना हो आखिर आप भी तो एक ब्लॉगर ठहरे...:)
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6 comments:

Udan Tashtari on March 21, 2010 said...

भले ही न आ पाये संगीतमाला में, मगर हैं बहुत प्यारे प्यारे मनभावन गीत!!

अपूर्व on March 21, 2010 said...

कुछ और अच्छे गीत..वैसे कुर्बान का या अली भी सूफ़ी गीतों की परम्परा मे एक अच्छा गीत था..मगर फ़िल्म के पिट जाने का नुकसान उठाना पड़ा..

Manish Kumar on March 22, 2010 said...

हाँ अपूर्व पोस्ट में मैंने कुर्बान के उस गीत अली मौला का जिक्र किया है। सलीम मर्चेंट की आवाज़ बहुत प्यारी लगी है उस नग्मे में।

अभिषेक ओझा on March 22, 2010 said...

इन गानों में 'मुड़ी-मुड़ी' और 'थोड़े भीगे-भीगे' बहुत पसंद है मुझे.

हिमांशु । Himanshu on March 23, 2010 said...

हाँ, इस पोस्ट से बहुतों की जिज्ञासाएं और कुछ जरूरतें पूरी हो गयी होंगी !
कुछ और भी सुन्दर गीत उल्लिखित हो गये यहाँ !
आभार । आगत-द्वय प्रतीक्षित !

गौतम राजरिशी on March 30, 2010 said...

ये फ़ेहरिश्त देकर अच्छा किया मनीष जी...मेरी कुछ शिकायतें कम हुई।

 

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