Thursday, February 23, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 3 : दिन परेशां है रात भारी है...ज़िदगी है कि फिर भी प्यारी है

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पॉयदान पर के गीत के लिए मैं सिर्फ एक कलाकार की ही प्रतिभा को नमन कर सकता हूँ। वैसे भी जब किसी गीत के गीतकार, संगीतकार और गायक की भूमिका एक ही शख़्स निभा रहा हो तो मेरे पास विकल्प ही क्या बचता है? इस शख़्स का नाम है सज्जाद अली और ये गीत है पाकिस्तान में बनी फिल्म 'बोल' का जो पिछले साल भारत में भी प्रदर्शित और सराही गई थी़। आप भले ही सज़्जाद से परिचित ना हो पर ये कलाकार पिछले तीन दशकों से संगीत की दुनिया में सक्रिय हैं।


46 वर्षीय सज्जाद के पिता शफ़क़त हुसैन एक क्रिकेट खिलाड़ी थे पर बच्चे में संगीत के प्रति रुझान देखते हुए उन्हें शास्त्रीय संगीत की तालीम दी जाने लगी। 1983 में पीटीवी पर अपने कार्यक्रम की बदौलत सज्जाद पाकिस्तान में चर्चा में आए। पिछले तीन दशकों में सज्जाद, शास्त्रीय, सूफ़ी व पॉप जैसे भिन्न भिन्न प्रकृति के संगीत में अपनी काबिलियत दिखलाते रहे हैं। यही नहीं सज्जाद ने दो फिल्में भी बनाई और अभिनय भी किया है। कोई ताज्जुब नहीं कि बहुमुखी प्रतिभा के इस कलाकार के हुनर के शैदाइयों में ए आर रहमानहंस राज हंस जैसे धुरंधर भी शामिल हैं।


'बोल' फिल्म का ये गीत जब मैंने पहली बार सुना था तो मन अनमना सा हो गया था। जाने क्या दर्द था इस नग्में में। मैंने फिल्म 'बोल' देखी तो नहीं थी पर इतना जानता था कि इसकी कहानी एक ऐसी लड़की की कहानी है जो क़त्ल के जुर्म में फाँसी के तख्ते पर लटकाई जा रही है। फिल्म फ्लैशबैक में चलती है नायिका की कथा को अतीत से निकालती हुई। छः लड़कियों के बाद एक रुढ़िवादी पिता को अगली संतान के रूप में ऐसा पुत्र मिलता है जो एक लड़की जैसा दिखना और बनना चाहता है। पिता की सारी आकांक्षाएँ जब मिट्टी में मिल जाती हैं तो वो अपने अंदर की हताशा अपने बच्चे व बेटियों पर निकालता है।

एक ओर प्यारा भाई तो दूसरी ओर उन्हें हेय दृष्टि से देखने वाला ज़ालिम पिता जिसे ना तो अपनी बेटियों की खुशियाँ सुहाती हैं ना अपने निर्दोष बच्चे की मासूमियत। ऐसी ही कठोर परिस्थितियों में चलती ज़िंदगी को सज्जाद अपने बोलों से उभारते हैं

इस कहानी को कौन रोकेगा
उम्र ये सारी कौन सोचेगा, कौन सोचेगा
साथ काटी है या गुजारी है
ज़िंदगी है कि फिर भी प्यारी है
दिल परेशां है रात भारी है

कितना सही कह गए सज्जाद ! ऐसा जीवन कटता नहीं बल्कि जैसे तैसे गुजर जाता है। 'बोल' फिल्म का ये गीत भले ही कहानी के अनुरूप लगे पर सच ये है कि सज्जाद ने ये गीत सबसे पहले अपने एलबम 'चहर बलिश' (Chahar Balish) के लिए लिखा था जो अप्रैल 2008 आया था। सज्जाद को बोल के लिए भी ये गीत उपयुक्त लगा तो उन्होंने उस गीत के एक अंतरे को बदलकर एकदम अलग संगीत संयोजन के साथ इस नग्मे को दोबारा फिल्म 'बोल' में शामिल किया। पर यहाँ ये बताना जरूरी होगा कि सज्जाद ने इस गीत का मुखड़ा अज़ीम शायर जनाब क़ाबिल अजमेरी की ग़ज़ल के मतले दिन परेशां है से लिया है। इस गीत से एकदम अलग इस रूमानी ग़ज़ल को  हरिहरण की आवाज़ में आप यहाँ सुन सकते हैं

इस गीत के बारे में तो बस इतना ही कहना चाहूँगा कि सीधे सच्चे शब्दों में व्यक्त पीड़ा जब पूरी तन्मयता से आप तक पहुँचे तो आँखे क्या दिल तक नम हो जाता है. बोल के इस नग्मे की यही ताकत है। गीत के बोल और संगीत खासकर बीच बीच में उभरती बाँसुरी की तान उदासी की चादर लपेटे हुए हैं जो दिल को कचोटते है। गीत सुनने के बाद भी इस टीस से उबरने में बहुत वक़्त लगता है। शायद आपको भी लगे...




दिन परेशां है रात भारी है
ज़िदगी है कि फिर भी प्यारी है
क्या तमाशा है कब से जारी है
ज़िंदगी है कि फिर भी प्यारी है

इस कहानी को कौन रोकेगा
उम्र ये सारी कौन सोचेगा, कौन सोचेगा
साथ काटी है या गुजारी है
ज़िंदगी है कि फिर भी प्यारी है
दिन परेशां है...

रंगों से कहूँ, लकीरों से कहूँ
मैली मैली सी तसवीरों से कहूँ, तसवीरों से कहूँ
बेक़रारी सी बेक़रारी है
ज़िदगी है कि फिर भी प्यारी है

बहुत लोगों को सज्जाद की आवाज़ सामान्य पुरुष स्वर से अलग लगती है। मुझे भी लगी थी पर इस गीत के बोल और संगीत का कुल मिलाकर असर ऐसा है कि उनकी आवाज़ की बनावट (texture) कम से कम मुझे तो इस गीत से विमुख नहीं करती।


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10 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय on February 23, 2012 said...

बहुत अच्छा लगा गीत सुनकर।

प्रवीण पाण्डेय on February 23, 2012 said...

बेहतरीन बोल, बेहतरीन संगीत..

Dilip Kawathekar on February 23, 2012 said...

You said it.

Prashant Suhano on February 23, 2012 said...

मुझे सज्जाद की आवाज ज्यादा पसंद तो नही.. पर ये गीत वाकई अच्छा है...

bhupendra on February 24, 2012 said...

I loved your blog page !!!!

Patali-The-Village on February 24, 2012 said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति| धन्यवाद।

vidya on February 26, 2012 said...

excellent blog...loved it!!!!

अंकित "सफ़र" on February 27, 2012 said...

This song haunts the soul. The agonized pain has been blended with the awesome lyrics and drizzling music.

Manish Kumar on March 04, 2012 said...

देवेंद्र, प्रवीण, विद्या, दिलीप जी, भूपेंद्र, पटाली गीत व प्रस्तुति पसंद करने के लिए धन्यवाद !

Manish Kumar on March 04, 2012 said...

प्रशांत सज्जाद की आवाज़ सामान्य पुरुष स्वर से अलग जरूर है पर जैसा मैंने अपनी प्रविष्टि में लिखा है गीत के बोल और संगीत का कुल मिलाकर असर ऐसा है कि उसका असर पीछे छूट जाता है

अंकित तुम्हारी राय से पूरी तरह इत्तिफाक़ रखता हूँ ।

 

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