Sunday, March 08, 2015

वार्षिक संगीतमाला 2014 सरताज गीत : क्या वहाँ दिन है अभी भी पापा तुम रहते जहाँ हो Papa

तो दोस्तों वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला 2014 के सरताजी बिगुल को बजाने का। यूँ तो संगीतमाला के आरंभ के छः गीत मेरे बेहद प्रिय रहे हैं पर पिछली पॉयदानों से उलट वार्षिक संगीतमाला की सर्वोच्च पॉयदान पर आसीन ये गीत एकदम भिन्न प्रकृति का है। पिछले गीतों की तरह ये कोई रूमानी गीत नहीं है। इस गीत में एक रिश्ते को शिद्दत से याद करने का आग्रह है। उससे जुड़ी पुरानी यादों को बटोरने की ललक है। उसके दरकने और राह से भटकने का क्षोभ है। ये रिश्ता है पिता व पुत्री का जिसे अपनी आवाज़ से सँवारा है गायिका शिल्पा राव ने। नवोदित गीतकार गौरव सोलंकी के रचे शब्द इतने गहरे हैं कि संगीतकार जी वी प्रकाश कुमार पियानो आधारित नाममात्र के संगीत से भी वो असर पैदा करते हैं जो बहुतेरे संगीतकार आर्केस्ट्रा में भी नहीं ला पाते। ये गीत है पिछले साल दिसंबर के आखिर में प्रदर्शित हुई फिल्म Ugly का। 



संगीतकार जी वी प्रकाश कुमार मुख्यतः तमिल फिल्मों के संगीतकार व गायक हैं। प्रकाश रिश्ते में ए आर रहमान के भांजे हैं। उनकी माँ ए आर रेहाना एक पार्श्व गायिका रह चुकी हैं। पिछले दस सालों से तमिल फिल्म उद्योग में सक्रिय  प्रकाश तीस से ज्यादा फिल्मों में अपना संगीत दे चुके हैं। पर  Ugly के माध्यम से उन्होंने पहली दफा हिंदी फिल्मों में कदम रह है। इससे पहले उन्होंने अनुराग की फिल्म Gangs of Wasseypur.में पार्श्व संगीत भी दिया था। पर इस गीत के असली हीरो हैं इसके गीतकार गौरव सोलंकी। गीत की हर पंक्ति दाद जी हक़दार है।
G V Prakash Kumar, Shilpa Rao and Gaurav Solanki

गौरव सोलंकी के लेखन से मैं बतौर हिंदी ब्लॉगिंग के ज़रिए परिचित हुआ था। आई आई टी रुड़की से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में स्नातक गौरव को हाईस्कूल के बाद से ही  कविता और कहानी लिखने का चस्का लग गया था। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेखन के साथ साथ वे कॉलेज की पत्रिका से भी जुड़े रहे। फिल्मों से जुड़ने का उनका ख़्वाब इससे भी पहले का था। इसीलिए वो आई आई टी मुंबई जाना चाहते थे ताकि जब चाहें वहाँ से फिल्म उद्योग में छलाँग लगा दें। उन्हें ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिए भी चुना गया जिसे बाद में उन्होंने प्रकाशकों द्वारा लेखको का आर्थिक दोहन करने के विरोध में लौटा दिया। बहरहाल अब उन्होंने अपने आपको मुंबई वाला बना लिया है और जयदीप साहनी की तर्ज पर बतौर पटकथा लेखक व गीतकार अपने आपको फिल्म जगत में स्थापित करने में जुट गए हैं।

Ugly एक ऐसी बच्ची की कहानी है जो अपने पिता से बिछुड़ जाती है। गौरव इस गीत के माध्यम से इतनी संवेदनशीलता से बच्चे के मन में अपने पिता के लिए उभरने वाली यादों को टटोलते हैं कि उन्हें एकबारगी सुन कर ही आँखें भर आती हैं। टीन के कनस्तर से बूँदी चुराने की बात हो या पापा की ऊँगली थामे चलते हुए खिसकते फर्श को देखने का आभास, दोपहरी में नीम के पेड़ के नीचे जलती ज़मीन की याद हो, या खरगोशों और चीटियों के पीछे गुज़ारे वो दिन ,गौरव बचपन की इन सजीव कल्पनाओं का इस्तेमाल कर यादों के आँगन से कोमल से रिश्ते के पीछे के प्रेम को बड़ी खूबसूरती से उभार लाते हैं।  भौतिक संपदा के लोभ में इंसानी रिश्तों को तिलांजलि देने वाले इस समाज पर गौरव बखूबी तंज़ कसते हुए कहते हैं गिनतियाँ सब लाख में हैं .. हाथ लेकिन राख में हैं।

गौरव की भावनाओं को शिल्पा राव जब स्वर देती हैं तो मन बचपन की उन पुरानी यादों में खो जाता है। ये दूसरी बार है जब शिल्पा ने वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत का हिस्सा बनने में सफलता पाई है। इससे पहले वर्ष 2008 में  फिल्म आमिर के लिए अमित त्रिवेदी के संगीतबद्ध गीत इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरे मौला में उन्होंने ये सफलता अर्जित की थी। तो आइए सुनें इस बेहद भावनात्मक नग्मे को


क्या वहाँ दिन है अभी भी
पापा तुम रहते जहाँ हो
ओस बन के मैं गिरूँगी
देखना, तुम आसमाँ हो

टीन के टूटे कनस्तर
से ज़रा बूंदी चुराकर
भागती है कोई लड़की
क्या तुम्हें अब भी चिढ़ाकर

फ़र्श अब भी थाम उँगली
साथ चलता है क्या पापा
भाग के देखो रे आँगन
नीम जलता है क्या पापा


आग की भी छाँव है क्या
चींटियों के गाँव हैं क्या
जिस कुएँ में हम गिरे हैं
उस कुएँ में नाव है क्या

क्या तुम्हें कहता है कोई कि चलो, अब खा भी लो
डिब्बियों में धूप भरकर कोई घर लाता है क्या
चिमनियों के इस धुएँ में मेरे दो खरगोश थे
वे कभी आवाज़ दें तो कोई सुन पाता है क्या

गिनतियाँ सब लाख में हैं
हाथ लेकिन राख में हैं


चाँद अब भी गोल है क्या
जश्न अब भी ढोल है क्या
पी रहे हैं शरबतें क्या
क्या वहाँ सब होश में हैं?
या कि माथे सी रहे हैं
दो मिनट अफ़सोस में हैं?


वार्षिक संगीतमाला 2013 का ये सफ़र आज यहीं पूरा हुआ। आशा है मेरी तरह आप सब के लिए ये आनंददायक अनुभव रहा होगा ।  इस सफ़र में साथ बने रहने के लिए शुक्रिया..

वार्षिक संगीतमाला 2014

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12 comments:

Mamta Swaroop on March 08, 2015 said...

मन को छूती पंक्तियाँ . . . बहुत सुन्दर संगीत

Himanshu Kumar Pandey on March 09, 2015 said...

खूबसूरत गीत। सुन्दर लिखाई और स्वर और भी सुन्दर। आभार।

Manish Kumar on March 09, 2015 said...

ममता जी व हिमांशु आप दोनों को भी ये गीत उतना ही पसंद आया जान कर प्रसन्नता हुई।

ब्लॉग - चिट्ठा on March 11, 2015 said...

आपको बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता हो रही है कि हिन्दी चिट्ठाजगत में चिट्ठा फीड्स एग्रीगेटर की शुरुआत आज से हुई है। जिसमें आपके ब्लॉग और चिट्ठे को भी फीड किया गया है। सादर … धन्यवाद।।

Kanchan Singh Chauhan on March 12, 2015 said...

अभी सुना। समय रुका हुआ है, थोड़ा पीछे भी

Manish Kumar on March 12, 2015 said...

मुझे लगा था कि ये गीत आपकी बीती स्मृतियों को जगा देगा।

Anonymous said...

Namaskar manish jee! Main Ashutosh Tiwari aapke blog ka niyamit pathak hu. Sabse pahle devnagri me na likh paane ke liye maafi chahta hu. Mujhe aapka andaaz e bayan bahut pasand hai par maine kabhi aapki prashansa me koi comment bhi nhi kiya. Bas man hi man khush hota tha.
Pichhle saal ki shuruat me hi Dedh Ishqia aur Highway ka sangeet sunkar maine socha tha ki in dono filmo ke gaane aapki sangeetmala ke top 5 me jaroor ayenge. Par main hairan ho raha hu ye dekhkar ki Kya Hoga (Dedh Ishqia) Bismil (Haider) Zabaan Jale Hain (Dedh Ishqia) jaise geet sangeetmala me kahi hain hi nahi. Boodhe Shayar ki lekhni shayad is baar prabhavit na kar saki. Aapko padhte padhte lagne laga tha ki aapki pasand ka main andaza laga sakta hu par aisa nahi ho saka. Khair, ye blog aap apni pasand ko sajha karne ke liye likh rahe hain. Bhawishya ke liye shubhkamnayen .

Manish Kumar on March 16, 2015 said...

आशुतोष तिवारी जी आप यहाँ आए और ईमानदारीपूर्वक अपनी राय रखी मेरे लिए ये ज्यादा खुशी की बात है। प्रशंसा से ज्यादा वो टिप्पणी मुझे हमेशा पसंद आती है जहाँ पाठक विषय के बारे में अपनी सोच को भी साझा करता है।

आपने बिल्कुल सही कहा ये शायद वार्षिक संगीतमाला के लिए पहली बार है कि इस बूढ़े शायर गुलज़ार को इस संगीतमाला में जगह नहीं मिली। इश्क़िया, कमीने और एक थी डॉयन में ये जोड़ी इस संगीतमाला पर राज कर चुकी है। आपने जिन गीतों का जिक्र किया उसे कई लोगों ने पसंद किया है। बतौर गायक रेखा और सुखविंदर मुझे बेहद प्रिय रहे हैं। रेखा जी का एक गाना भी है प्रथम पाँच में शीशे का समन्दर.. पर जहाँ तक मेरा सवाल है गुलज़ार जिस कोटि के गीतकार हैं उस हिसाब से मुझे उनके बोलों ने इस साल निराश किया और यही वज़ह रही कि आपकी पसंद के ये गीत मेरी सूची में नहीं आ पाए।

Ankit Joshi on March 25, 2015 said...

गौरव का लिखा ये सरताज गीत वाक़ई खूबसूरत है लेकिन ये इस गीतमाला का सरताज बनेगा, इसमें संकोच था।
हर बार की तरह ये गीतमाला मुझे इस बार भी चौंका गई। मेरे नज़रिये से भी 'बिस्मिल' पहले पाँच में स्थान रखता था।
पीछे कई गीत देखने, सुनने और पढ़ने से छूट गए हैं, यूँ तो सरसरी नज़र फेर ली है मगर फुर्सत मिलने पर ज़रूर कुछ अपनी बात कहूँगा।

eddie guerrero on March 28, 2015 said...

अति सुन्दर , मर्मस्पर्शी गीत और उतना ही सुन्दर आपका चित्रण । बधाई।

Manish Kumar on March 29, 2015 said...

अंकित..हैदर मैंने देखी थी। फिल्म के संगीत को भी बारहा सुना था। फिल्म की कहानी के साथ झेलम और बिस्मिल दोनों खूब फबे थे। विशाल भारद्वाज़ का फिल्मांकन और सुखविंदर व विशाल की गायिकी भी अच्छी थी। पर फिल्म खत्म हो जाने के बाद ये गीत कभी मेरे ज़हन का हिस्सा नहीं बन सके। याद रहा तो डा. साहब का गुलों में रंग भरे को गुनगुनाना और सुरेश वाडकर का गाया वो दो जहाँ साथ ले गया..।

Manish Kumar on March 29, 2015 said...

Eddie ये आपका वास्तविक नाम तो नहीं पर मजबूरन इससे ही संबोधित करना पड़ रहा है। इस गीत ने जितना आपके मन को छुआ उतना ही मेरे दिल को भी कुरेद गया इसी लिए इसके बारे में यूँ लिख पाया।

 

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