Wednesday, April 06, 2016

आजा पिया, तोहे प्यार दूँ.. गोरी बैयाँ , तोपे वार दूँ Aaja Piya Tohe Pyar Doon..

साठ के दशक में नासिर हुसैन साहब ने एक फिल्म बनाई थी बहारों के सपने। फिल्म का संगीत तो बहुत लोकप्रिय हुआ था पर अपनी लचर पटकथा के कारण फिल्म बॉक्स आफिस पर ढेर हो गयी थी। कल बहुत दिनों बाद इस फिल्म के अपने प्रिय गीत को सुनने का अवसर मिला तो सोचा आज इसी गीत पर आपसे दो बातें कर ली जाएँ। लता की मीठी आवाज़ और मज़रूह के लिखे बोलों पर पंचम की संगीतबद्ध इस मधुर रचना को सुनते ही मेरा इसे गुनगुनाने का दिल करने लगता है। मजरूह साहब ने इतने सहज पर इतने प्यारे बोल लिखे इस गीत के कि क्या कहा जाए। पर पहले बात संगीतकार  पंचम की।

1967 में जब ये फिल्म प्रदर्शित हुई थी तो पंचम  तीसरी मंजिल की सफलता के बाद धीरे धीरे हिंदी फिल्म संगीत में अपनी पकड़ जमा रहे थे। पर शुरु से ही उनकी छवि पश्चिमी साजों के साथ तरह तरह की आवाज़ों को मिश्रित कर एक नई शैली विकसित करने वाले संगीतकार की बन गयी थी। पर उन्होंने अपनी इस छवि से हटकर जब भी शास्त्रीय या विशुद्ध मेलोडी प्रधान गीतों की रचना की, परिणाम शानदार ही रहे। आजा पिया, तोहे प्यार दूँ... का शुमार पंचम के ऐसे ही गीतों में किया जाता रहा है।


वैसे  क्या आपको मालूम है कि इस गीत की धुन इस फिल्म को सोचकर नहीं बनाई गयी थी। सबसे पहले इस धुन का इस्तेमाल फिल्म तीन देवियाँ के पार्श्व संगीत में हुआ था। सचिन देव बर्मन उस फिल्म के संगीतकार थे पर संगीत के जानकारों का मानना है  कि उसका पार्श्व संगीत यानि बैकग्राउंड स्कोर पंचम की ही देन थी। हाँ, ये बात जरूर थी कि मजरूह सुल्तानपुरी दोनों फिल्मों के गीतकार थे। हो सकता हूँ मजरूह ने ये गीत तभी लिखा हो  और उस फिल्म में ना प्रयुक्त हो पाने की वज़ह से उसका इस्तेमाल यहाँ हुआ हो या फिर उस शुरुआती धुन को पंचम ने इस फिल्म के लिए विकसित किया हो। ख़ैर जो भी हो पंचम को इस बात की शाबासी देनी चाहिए कि उन्होंने मधुर लय में बहते गीत के संगीत संयोजन में लता की आवाज़ को सर्वोपरि रखा। इंटरल्यूड्स में एक जगह संतूर के टुकड़े के साथ  बाँसुरी आई तो दूसरी जगह सेक्सो।

गीतकार मज़रूह के कम्युनिस्ट अतीत, गीत लिखने के प्रति उनकी शुरुआती अनिच्छा और प्रगतिशील ग़ज़ल लिखने वालों में फ़ैज़ के समकक्ष ना पहुँच पाने के मलाल जैसी कुछ बातों के बारे में मैं यहाँ पहले भी लिख चुका हूँ आज आपके सामने उनका परिचय उनके समकालीन शायर निदा फ़ाजली के माध्यम से कराना चाहता हूँ।



निदा फ़ाज़ली ने अपने एक संस्मरण में मजरूह की छवि को बढ़ी खूबसूरती से कुछ यूँ गढ़ा है

"..... शक़्लो सूरत से क़ाबीले दीदार, तरन्नुम से श्रोताओं के दिलदार, बुढ़ापे तक चेहरे की जगमगाहट, पान से लाल होठों की मुस्कुराहट और अपने आँखों की गुनगुनाहट से मज़रूह दूर से ही पहचाने जाते थे। बंबई आने से पहले यूपी के छोटे से इलाके में एक छोटा सा यूनानी दवाखाना चलाते थे। एक स्थानीय मुशायरे  में जिगर साहब ने उन्हें सुना और अपने साथ मुंबई के एक बड़े मुशायरे में ले आए। सुंदर आवाज़, ग़ज़ल में उम्र के लिहाज से जवान अल्फाज़, बदन पर सजी लखनवी शेरवानी के अंदाज़ ने स्टेज पर जो जादू जगाया कि पर्दा नशीनों ने नकाबों को उठा दिया।....."

मज़रूह ने जहाँ अपनी शायरी में अरबी फारसी के शब्दों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया वहीं गीतों में यूपी की बोली का। नतीजा ये  रहा कि  उनकी ग़ज़लों की अपेक्षा  गीतों को आम जनता ने हाथों हाथ लिया। अब इस गीत को ही लें, एक प्रेम से भरी नारी की भावनाओं को कितनी सहजता से व्यक्त किया था मजरूह ने। दुख के बदले सुख लेने की बात तो ख़ैर अपनी जगह थी पर उसके साथ मैं भी जीयूँ, तू भी जिए लिखकर मजरूह ने उस भाव को कितना गहरा बना दिया। तीनों अंतरों में सरलता से कही मजरूह की बातें लता जी की आवाज़ में कानों में वो रस बरसाती हैं कि बस मन  किसी पर न्योछावर कर देने को जी चाहने लगता है..
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आजा पिया, तोहे प्यार दूँ
गोरी बैयाँ , तोपे वार दूँ
किसलिए तू, इतना उदास?
सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास
किसलिए, किसलिए?

जल चुके हैं बदन कई, पिया इसी रात में
थके हुए इन हाथों को, दे दे मेरे हाथ में
हो सुख मेरा ले ले, मैं दुःख तेरे ले लूँ
मैं भी जीयूँ, तू भी जिए

होने दे रे, जो ये जुल्मी हैं, पथ तेरे गाँव के
पलकों से चुन डालूँगी मैं, कांटे तेरे पाँव के
हो लट बिखराए, चुनरिया बिछाए
बैठी हूँ मैं, तेरे लिए

अपनी तो, जब अखियों से, बह चली धार सी
खिल पड़ीं, वहीं इक हँसी , पिया तेरे प्यार की
हो मैं जो नहीं हारी, सजन ज़रा सोचो
किसलिए, किसलिए?


वैसे आपका क्या ख्याल है इस गीत के बारे  में ?
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7 comments:

Shikha saxena on April 07, 2016 said...

बहुत खूबसूरत गीत ..और इतनी जानकारी देने के लिए धन्यवाद आपको

Sanjeev Srivastava on April 08, 2016 said...

A must read article!!!! Panchamda.... I miss you !!!

Manish Kaushal on April 09, 2016 said...

सर आपको आश्चर्य होगा की इस गीत का वीडियो मैंने कभी नहीं देखा.. और इस गीत की मेरी कल्पना में जाया बच्चन जी और संजीव कुमार जी आया करते थे.. वैसे मैं भी जियूँ, तू भी जिए सच में बहुत खूबसूरत लाइन है. वीडियो के लिए धन्यवाद.

मन on April 12, 2016 said...

यादगार गीत..

RAJESH GOYAL on April 16, 2016 said...

एक बेहद मधुर गीत....

Manish Kumar on April 19, 2016 said...

शिखा, राजेश, मन आप सबको ये गीत पसंद है जानकर खुशी हुई।

संजीव पंचम हम सब के दिलों में हैं और रहेंगे

Manish Kumar on April 19, 2016 said...

मनीष कौशल मेरा ध्यान भी ज्यादा गीत के बोल, गायिकी व संगीत पर ही रहता है वीडियो का तो ख्याल तब आता है जब आपने वो फिल्म देखी हुई हो।

 

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