Sunday, May 13, 2018

पाजी नज़्में, गुलज़ार : ऐ तू मला खूप आवडतो Paaji Nazmein

पिछले कुछ वर्षों में गुलज़ार एक फिल्म के गीतकार के तौर पर कम और बतौर शायर ज्यादा क्रियाशील नज़र आए हैं। करीब साल भर पहले अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा भी था कि उनकी प्राथमिकताएँ बदल गयी हैं। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि बतौर शायर उनके पास देने को बहुत कुछ है और उस हिसाब से उनके पास वक़्त कम है। यही वज़ह है कि बच्चों के लिए उनका लेखन, अनुवाद और नज़्मों की नई प्रस्तुतियाँ पाठकों को बारहा पढ़ने को मिल रही हैं।

अपनी नज़्मों की श्रंखला की नई पेशकश के तौर पर दिसंबर 2017 में राधाकृष्ण से उनकी एक किताब आई जिनका उन्होंने नाम रखा था पाजी नज़्में। वैसे जानना नहीं चाहेंगे आप कि ख़ुद गुलज़ार क्या कहते हैं इन नज़्मों के बारे में

कहते हैं, कीचड़ में पत्थर मारो 
तो अपने ही मुँह पर आता है।
मैने तो यही सोचकर मारा था, 
मगर कुछ छींटे दूसरॊं के मुँह पर भी जा पड़े!
कान पकड़ के माफी मांग ली।
ये सब 'करो और कान पकड़ लो' वाली नज़्में हैं।
पाजी इसलिए कि अकसर गुद्दी पर धप पड़ती है और 
'धत पाजी' की आवाज़ आती है।
हालाँकि मज़ा लो, तो इतनी पाज़ी भी नही है!



इस बार देश के राजनैतिक माहौल पर भी गुलज़ार की नज़र है। लंबे चौड़े लुभावने वादों की आड़ में मूलभूत सुविधाएँ ना दे पाने का तंज़ 'हाइटेक इलेक्शन 'और 'बहुत से मसले लेकर गया था ' में झलकता है। वहीं मंत्रालयों की अदला बदली पर उनका व्यंग्य 'कहा गया है कैबिनट के सब वजीर' में गुदगुदाता है। मोबाइल पर हमारी बढ़ती निर्भरता पर चुटकी लेते हुए वे कहते है कि बिना मोबाइल खाली हाथ नज़र आ जाए कोई तो ख़्वामख़्वाह ही जाकर हाथ मिलाने को जी करता है। पुरानी तहज़ीब के धीरे धीरे गायब होने और समाज में बढ़ते दिखावे पर उनकी चिंता हल्के फुल्के तरीके से कई जगह उभरती है। इस दृष्टि से मुझे उनकी नज़्म 'कितना प्रोग्राम्ड है दिल ' मन को एक guilt feeling से भर देती है। गुलज़ार अपनी इस नज़्म में लिखते हैं

कितना प्रोग्राम्ड है दिल
चोट लगती है तो कुल चार मिनट रोता है
दो मिनट हँसता है, जब बॉस सुनाता है लतीफ़ा कोई 
होंट खुलते हैं फ़कत तीन ही इंच,, खैर से मुस्काए अगर 
कोई मर जाए तो भर लेता है गहरी आहें 
और मौके की तलब हो तो गिरा देता है गिन के आँसू
दस मिनट बाद इसे भूख भी लग जाती है
कितना होशियार है कितना प्रोग्राम्ड है ये दिल

आप कहेंगे कि इतनी संजीदगी है नज़्मों में फिर पाजीपना कहाँ है? पाजीपना तो साहब इस संग्रह के हर दूसरे चौथे पन्ने पर बिखरा पड़ा है। अब वो गंजे की खोपड़ी पर बैठी मक्खी का सवाल हो या एयरपोर्ट पर समय बिताने के लिए उनका आजमाया जाने वाला नुस्खा। ऐसे कई  दृष्टांत हैं इस संकलन में। कागज पर उकेरी  इन बदमाशियों का असली लुत्फ़ आता है उनकी उस पुरानी नज़्म को पढ़कर जिसमें वो भगवान को भी लपेटे में लेने से परहेज़ नहीं करते। गुलज़ार बड़े भोलेपन से पूछते हैं चिपचिपाते दूध में नहाते भगवन से कि

जब धुआँ देता, लगाता पुजारी, घी जलाता है कई तरह के छोंके देकर 
इक ज़रा छींक ही दो तुम, तो यक़ीं आए सब देख रहे हो

अब गुलज़ार की नज़्में हैं तो चाँद तो रहेगा ही। ये अलग बात है कि आधा दर्जन नज़्मों में शामिल होते हुए भी इस संकलन में चाँद एक दूसरे ही रूप में नज़र आया है। यहाँ उसका अक्स रूमानी बिल्कुल नहीं है। चाँद तो पुस्तक के नाम के अनुरूप खुराफातों में उलझा हुआ है। कभी टीवी टॉवर पर चढ़ जाता है, कभी चुपके से नज़्मों की चोरी कर लेता है तो कभी  बुझने की भी हिमाकत कर लेता है। ये जरूर है कि साठ से ऊपर नज़्मों के इस संग्रह में उनकी नटखट लेखनी हर बार आपको मुस्कुराने पर मजबूर नहीं कर पाती और कुछ पन्नों पर दोबारा लौटने का मन भी नहीं होता। 

पर जब भी इस किताब में गुलज़ार इश्क़ की बात करते हैं वो अपनी उसी पुरानी लय में लौटते दिखते हैं जिसकी वज़ह से लाखों करोड़ों लोग उनके मुरीद हैं। गुलज़ार के पास मोहब्बत के महीन अहसासों को बिनने का हुनर है। अब मुझको इतने से काम पर रख लो में अपनी इसी काबिलियत को उन्होंने इतने प्यारे तरीके से नज़्म का जामा पहनाया है कि पढ़कर मन का रोम रोम पुलकित हो जाता है। प्रेम की चाशनी में डूबी इतनी शुद्ध भावनाएँ कहाँ दिखती हैं आजकल.. तो सुनिए रूमानियत में डूबी गुलज़ार की भावनाओं को अपनी आवाज़ में पकड़ने की मेरी एक कोशिश।

मुझको इतने से काम पे रख लो...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट 
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में

मुस्कुराके बस इतना सा कह दो 
आह चुभता है ये अलग कर दो

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए

या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है
'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है
लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है
मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा


मुझको इतने से काम पे रख लो...


इसी तरह उनकी एक नज़्म डिक्लेरेशन में ये बता देने की जिद है कि भले मैं तुम्हें पा नही् सका, भले ही तुम्हारी हसरत को यूँ दिल में बनाए रखना मुनासिब नहीं... फिर भी इस गुनाह को करने में मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं। एक सुबह जब इश्क़ हुआ था जैसी मोहब्बत में डूबी नज़्मों को पढ़ने के बाद  गुलज़ार से कहने को दिल करता है ऐ तू मला खूप आवडतो यानि आप मेरे को खूब पसंद हैं।


डिक्लेरेशन
मैं जब लौटा वतन अपने…
यहाँ कस्टम के काउंटर पर खड़े सरकारी अफ़सर ने
मेरा सामान जब खोला…
मेरे कपड़े टटोले, मुझसे पूछा भी,
“कोई शै ग़ैरमुल्की है?
जिसका लाना ग़ैरवाजिब हो?
‘बयाननामे’ पे लिख के दस्तख़त कर दो!

मैं सब कुछ ला नहीं सकता था तेरे मुल्क से लेकिन
मैं तेरी आरज़ू को रोक न पाया, चली आई
मुनासिब तो नहीं फिर भी…
‘बयाननामे’ पे तेरा नाम लिख के, कर दिये हैं दस्तख़त मैंने!


पुस्तक के बारे में

  • पुस्तक का नाम : पाजी नज़्में
  • प्रकाशक  : राधाकृष्ण प्रकाशन
  • पृष्ठ संख्या  : 85 
  • मूल्य : Rs 125
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2 comments:

Sumit on May 14, 2018 said...

Bahut khoob Manish Ji! Gulzar Saab ke kya kehne! Aapne khoob pakda hai unke bhav ko apni aawaz mein.

Manish Kumar on May 17, 2018 said...

सराहने के लिए शुक्रिया सुमित !

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