रविवार, अगस्त 31, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 25: बंद आँखें करूँ और ख़्वाब तुम्हारे देखूँ

वार्षिक संगीतमाला की गाड़ी धीरे-धीरे चलती हुई अपने आधे सफर तक पहुंच चुकी है। यहां से आगे की पायदान पर जो गीत हैं उन्हें चुनने और सुनने का सफ़र मेरे लिए ज्यादा सुरीला और यादगार रहा। इस कड़ी में आज एक ग़ज़ल पेश है जिसे लिखा साहिबा शहरयार ने, धुन बनाई सार्थक कल्याणी और सिद्धार्थ ने और इसे गाया सार्थक ने। ग़ज़लें मेरी कमजोरी रही हैं और आज के गायक अगर इस विधा में कुछ नया करते हैं तो मन बेहद खुश होता है।



दो चीजें मुझे खास तौर पर पसंद आई इस ग़ज़ल में पहली तो सार्थक कल्याणी की गायिकी जिसमें उन्होंने ग़ज़ल के मिज़ाज को बखूबी पकड़ा है और दूसरी उनकी कम्पोजिशन। साहिबा तो ख़ैर एक स्थापित शायरा हैं ही और ये तो हम सब जानते हैं कि ग़ज़ल असरदार तभी हो सकती है जब उसमें इस्तेमाल हुए मिसरों में कुछ वज़न हो। 

सार्थक ने एक दशक से ज्यादा अवधि तक भारतीय शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने में अपना समय दिया है। एक रियलिटी शो के दौरान वे ए आर रहमान के संपर्क में आए और पिछले पांच सालों से वे उनके सहायक का काम कर रहे हैं। पिछले साल उन्होंने चमकीला और मैदान जैसी फिल्मों में रहमान के साथ काम किया। रहमान की देखरख में उन्होंने वेस्टर्न हार्मनी पर भी अपनी पकड़ बनाई। शास्त्रीय संगीत का उनका हुनर उनकी गायिकी में स्पष्ट झलकता है।

साहिबा शहरयार जिन्होंने ये ग़ज़ल लिखी है श्रीनगर से ताल्लुक रखती हैं। हालांकि उनके नाम से ये न समझ लीजिएगा कि वो प्रसिद्ध शायर शहरयार से संबंधित हैं।

यूं तो मैं उनकी लिखी ग़ज़लों से ज्यादा नहीं गुजरा पर उनके लिखे कुछ पसंदीदा शेर मेरी डायरी के हिस्से रहे हैं जैसे कि

पहले होता था बहुत अब कभी होता ही नहीं
दिल मेरा कांच था टूटा तो यह रोता ही नहीं


और बारिश के बारे में उनके लिखे ये अशआर तो आजकल चल रहे मौसम का मानो हाल बयां करते हैं


एक दिया जलता है कितनी भी चले तेज़ हवा

टूट जाते हैं कई एक शजर बारिश में


आंखें बोझल हैं तबीयत भी कुछ अफ़्सुर्दा
कैसी अलसाई सी लगती है सहर बारिश में


साहिबा ने इस ग़ज़ल के लिए कुछ उम्दा शेर कहे हैं जो किसी आशिक की मनोदशा को कुछ यूं व्यक्त करते हैं

बंद आँखें करूँ और ख़्वाब तुम्हारे देखूँ
तपती गर्मी में भी वादी के नज़ारे देखूँ

सच ही तो है अगर आप प्रेम में हों तो महबूब का ख़्याल तपती गर्मी में शीतलता का अहसास दिलाता है। कभी कभी ये यादें और उनके साथ दिल में उपजी विकलता हमारी आंखों को नम भी कर जाती हैं और इसीलिए साहिबा आगे लिखती हैं

ओस से भीगी हुई सुबह को छू लूँ जब मैं
अपनी पलकों पे मैं अश्कों के सितारे देखूँ

मुझ को छू जाती है आ कर जो कभी सुबह तिरी
हर तरफ़ फूलों के दिलचस्प नज़ारे देखूँ


साहिबा शहरयार
कश्मीर से ताल्लुक रखने वाली साहिबा की ग़ज़लों में वादी और फूलों का जिक्र ज़ाहिर तौर पर बार बार होता है। अब इस ग़ज़ल के इन्हीं मिसरों को जो बंद आंखों में शामिल नहीं किए गए ।

मैं कहीं भी रहूँ जन्नत तो मिरी वादी है
चाँद तारों के पड़े उस पे मैं साए देखूँ

अब तो हर गाम पे सहरा-ओ-बयाबाँ में भी
अपनी वादी के ही सदक़े में नज़ारे देखूँ

अब इससे पहले कि आप इस ग़ज़ल को सुने तो बात इसके उस पहलू की जो मुझे बिल्कुल नागवार गुजरा। ये ग़ज़ल निश्चय ही मेरी प्रथम दस की सूची में होती अगर इसका संगीत संयोजन ठीक से किया गया होता। मतले और उसके बाद के शेर के उपरांत बीच में कुछ पंक्तियां बोलने और उसके बाद जैसे पश्चिमी वाद्य यंत्रों का प्रयोग इन युवाओं ने किया उसकी कोई जरूरत नहीं थी। सच कहिए तो उसने बन रहे मूड को बिगाड़ दिया। गजलें एक अपनी कविता से एक ठहराव एक उदासी एक सघन शांति का भाव उकेरती हैं उसमें इस तरह का संगीत वैसा ही लगता है जैसे खाने में कंकड़। आशा है इसे बनाने वाले युवा चेहरे आगे इसका ध्यान रखेंगे।

हालांकि तब भी मुझे इस ग़ज़ल को गुनगुनाना बेहद पसंद है तो चलिए सुनिए और आप भी मेरी तरह शुरू हो जाइए 🙂

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