गुरुवार, अगस्त 19, 2010

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स.... रूना लैला / उबैद्दुलाह अलीम


आज की ये पोस्ट है पाकिस्तान के मशहूर शायर उबैद्दुलाह अलीम की एक बेहतरीन ग़ज़ल के बारे में, जिसे रूना जी ने अपनी दिलकश आवाज़ से एक अलग ही ऊँचाई तक उठाया है। तो पहले जिक्र इस ग़ज़ल का और बाद में अलीम शाह की कुछ और चुनिंदा ग़ज़लों के माध्यम से रूबरू होइएगा इस शायर से...


भगवान ने हमें जो जिंदगी बख्शी है उसकी एक डोर तो ऊपरवाला अपने पास रखता ही है पर उसी डोर का एक सिरा वो हमें भी थमा कर जाता है। पर हम इस डोर को पकड़ने के लिए कब इच्छुक रहे हैं ? बचपन में ये डोर माता पिता के पास रहती है पर जवानी मे जब हम इस डोर को पकड़ने के काबिल हो भी जाते हैं तो इसे किसी और के हाथ में दे के ज़िंदगी उसके इख़्तियार में दे देते हैं। आलम ये होता है कि मैं मैं नहीं रह कर वो हो जाते हैं। बकौल मीर

दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया
मुझे आप से ही जुदा कर चले

लीजिए अपना वज़ूद यूँ भुला दिया कि अपने आप से ही ख़ुद को जुदा पाया। पर ये बेइख़्तियारी का आलम तो तभी तक सुकून देता है जब आपकी ये डोर एक सच्चे प्रेमी के हाथ रहती है। पर आप कहेंगे सच्चा प्रेमी वो भी आज के दौर में क्यूँ मजाक कर रहे हैं जनाब ? सही है आपको मजाक लग रहा है क्यूँकि वक़्त के थपेड़ों ने आप को समझदार बना दिया है। पर इस दौर में क्या.. हर दौर में खामख्याली पालने वाले लोग रहे हैं और रहेंगे। यहाँ तक कि कल तक समझदार लगने वाले लोगों को भी मैंने अपने जीवन के इस डोर को ऐसे शख्सों के हाथ में सोंपते देखा है जो कि कभी भी उस ऐतबार के लायक नहीं थे। नतीज़ा वही जो इस ग़ज़ल में उबैद्दुलाह अलीम फरमा रहे हैं कि

बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स
हुआ चराग तो घर ही जला गया इक शख़्स

अलीम साहब की ग़ज़लों में ये ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। इसका हर इक शेर दिल में उतरता सा महसूस होता है, खासकर तब जब आप इसे रूना लैला की आवाज़ में सुन रहे होते हैं। अपनी ग़ज़ल गायिकी से जो असर रूना जी पैदा करती हैं वो उनकी समकालीन भारतीय ग़ज़ल गायिकाओं में मुझे तो नज़र नहीं आता। कुछ दिनों से ये ग़ज़ल जुबाँ से उतरने का नाम ही नहीं ले रही है। तो आप भी सुनिए ना..



बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स
हुआ चराग तो घर ही जला गया इक शख़्स


तमाम रंग मेरे और सारे ख़्वाब मेरे

फ़साना थे कि फ़साना बना गया इक शख़्स


मै किस हवा में उडूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ

दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स


मोहब्बतें भी अजब उसकी नफरतें भी कमाल

मेरी ही तरह का मुझ में समा गया इक शख़्स


रूना जी ने उबैद्दुलाह अलीम की इस ग़ज़ल के कुछ अशआर नहीं गाए हैं।

वो माहताब था मरहम बदस्त आया था

मगर कुछ और सिवा दिल दुखा गया इक शख़्स 


मोहब्बतों ने किसी की भुला रखा था उसे
मिले वो जख्म कि फिर याद आ गया इक शख़्स

खुला ये राज़ कि आईनाखाना है दुनिया
और उसमें मुझ को तमाशा बना गया इक शख़्स


मुझे यकीं है कि आप में से अधिकांश ने उबैद्दुलाह अलीम साहब का नाम नहीं सुना होगा पर विभिन्न ग़ज़ल गायकों द्वारा उनके द्वारा लिखी गई ग़ज़लें जरूर सुनी होंगी। मसलन गुलाम अली की वो छोटे बहर की प्यारी सी ग़ज़ल याद है आपको

कुछ दिन तो बसो मेरी आँखों में
फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या


कोई रंग तो दो मेरे चेहरे को

फिर ज़ख्म अगर महकाओ तो क्या


जब हम ही न महके फिर साहब

तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या


एक आईना था,सो टूट गया

अब खुद से अगर शरमाओ तो क्या


ऐसी ही उनकी एक हल्की फुल्की ग़ज़ल और है जिसे गुनगुनाने में बड़ा आनंद आता है
तेरे प्यार में रुसवा होकर जाएँ कहाँ दीवाने लोग
जाने क्या क्या पूछ रहे हैं यह जाने पहचाने लोग


जैसे तुम्हें हमने चाहा है कौन भला यूँ चाहेगा

माना और बहुत आएँगे तुमसे प्यार जताने लोग


और उनकी इस ग़ज़ल के प्रशंसकों की भी कमी नहीं है। चंद शेर मुलाहजा फरमाएँ ..

अजीज़ इतना ही रखो कि जी संभल जाये
अब इस क़दर भी ना चाहो कि दम निकल जाये

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये


उनकी ग़ज़ल कुछ इश्क था कुछ मज़बूरी थी.... को जहाँ फरीदा ख़ानम जी ने अपनी आवाज़ दी थी वहीं चाँद चेहरा सितारा
आँखें को हबीब वली मोहम्मद ने गाया था।

1939 में भोपाल में जन्में अलीम का शुमार आज़ाद पाकिस्तान के बुद्धिजीवी शायरों में होता है। कराची से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे साठ के दशक में कराची के दूरदर्शन केंद्र से जुड़े रहे। उनकी शायरी के दो संग्रह 'चाँद चेहरा सितारा आँखें' और 'वीरान सराय का दीया' नाम से प्रकाशित हुए हैं।

उबैद्दुलाह अलीम अहमदिया संप्रदाय से ताल्लुक रखते थे। पाकिस्तान में ये एक अल्पसंख्यक समुदाय है जिसकी आबादी करीब 40 लाख बताई जाती है। वहाँ इस संप्रदाय को गैर मुस्लिम करार दिया गया है और यहाँ तक कि उनके पवित्र स्थलों को मस्ज़िद कहने पर भी पाबंदी है। अगर आपको याद हो तो इसी साल मई में लाहौर के जिन धार्मिक स्थलों पर बम विस्फोट हुए थे (जिसमे करीब 80 लोग मारे गए थे) वो अहमदी संप्रदाय के पूजा स्थल ही थे। ख़ैर आप सोच रहे होंगे कि ग़ज़लों के जिक्र करते करते मैं इन बातों का उल्लेख आप से क्यूँ करने लगा? दरअसल उबैद्दुलाह की शायरी में अहमदियों के साथ हो रहे कत्ले आम का जिक्र बार बार मिलता रहा है। अलीम जी की इस ग़ज़ल के इन अशआरों पर गौर करें..

मैं किसके नाम लिखूँ जो आलम गुज़र रहे हैं
मेरे शहर जल रहे हैं, मेरे लोग मर रहे हैं

कोई और तो नहीं है पस-ए-खंजर-आजमाई
हमीं क़त्ल हो रहे हैं, हमीं क़त्ल कर रहे हैं



अलीम १९९८ में हृदय गति रुक जाने से इस दुनिया को छोड़ चले गए। पर उन्हें अपने लोगों पर हो रहे जुल्मों सितम का दर्द हमेशा सालता रहा। उनके दिल का दर्द उनकी इस मशहूर ग़ज़ल में साफ दिखाई देता है।

कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी सो मैंने जीवन वार दिया
मैं कैसा ज़िंदा आदमी था इक शख़्स ने मुझको मार दिया



मैं खुली हुई इक सच्चाई, मुझे जानने वाले जानते हैं
मैंने किन लोगों से नफरत की और किन लोगों को प्यार दिया

मैं रोता हूँ और आसमान से तारे टूटता देखता हूँ
उन लोगों पर जिन लोगों ने मेरे लोगों को आज़ार* दिया

*दुख

मेरे बच्चों को अल्लाह रखे इन ताज़ा हवा के झोकों ने
मैं खुश्क पेड़ खिज़ां का था, मुझे कैसा बर्ग-ओ-बार दिया


आशा है अपने लोगों के लिए जिस चैनो सुकूँ की कामना करते हुए वो इस ज़हाँ से रुखसत हुए वो उनके समुदाय को निकट भविष्य में जरूर नसीब होगा।
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19 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari on अगस्त 19, 2010 ने कहा…

मेरे बहुत पसंदीदा शायरों में है उबैद्दुलाह अलीम साहेब..बहुत पहले इनका जिक्र मैने अपने एक आलेख में भी लिखा था...और देखिये इसी गज़ल के जिक्र के साथ...

तेरे प्यार में रुसवा होकर...


खुद शायद की जुबां सुनने का इस गज़ल का आनन्द ही कुछ और है.

बहुत बढ़िया लगा आलेख पढ़कर. रुना लैला की आवाज मे सुनना अच्छा लगा.

पारुल "पुखराज" on अगस्त 19, 2010 ने कहा…

मोहब्बतें भी अजब उसकी नफरतें भी कमाल
मेरी ही तरह का मुझ में समा गया एक शख्स

kamaal

रंजना on अगस्त 19, 2010 ने कहा…

इस पोस्ट की हर बात मेरे लिए नयी है...
कितना सुखद लगा सब जानना ,पढना, सुनना यह शब्दों में नहीं बता सकती..
दिल से आभार आपका इस नायब पोस्ट के लिए...

Manish Singh "गमेदिल" on अगस्त 19, 2010 ने कहा…

awsome!

Priyank Jain on अगस्त 19, 2010 ने कहा…

"कुछ इश्क था कुछ मजबूरी थी सो मैंने जीवन वार दिया
मैं कैसा जिंदा आदमी था एक शख्स ने मुझको मार दिया "
तुमची पोस्ट चांगली आहे| में तुमचा खूब-खूब आभार मनतो|
शेष शुभ

राजभाषा हिंदी on अगस्त 20, 2010 ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति!
राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

anjule shyam on अगस्त 20, 2010 ने कहा…

बेहतरीन जानकारी सर ........शुक्रिया इस प्यारी सी ग़ज़ल के लिए..

Unknown on अगस्त 21, 2010 ने कहा…

Aleem sb. ki yaad ke saath unke aziz dost aur samkaleen bade shyar John Elia sahib ki yaad bhi aaj apne khoob dilae. Shukriya Kabhi John sb. per bhi likheye. Kuch kalam unka bhi You Tube per hai

Manish Kumar on अगस्त 21, 2010 ने कहा…

शफक़त जॉन एलिया जी को मैंने भी थोड़ा बहुत पढ़ा है। आपने जो गुजारिश की है वो मेरे भी मन में है। उनके बारे में फिलहाल तो नहीं पर निकट भविष्य में जरूर लिखने की कोशिश करूँगा।

Unknown on अगस्त 22, 2010 ने कहा…

शुक्रिया मनीष साब
जॉन एलिया का नाम प्रसंगवश आ गया था.दोनों परम मित्र रहे थे और जॉन साब एकदम अलग किस्म के फक्कड़ पोएट थे पुरे बर्बाद.खेर आप से थोड़ा असहमत होते हुये लिख रहा हूँ की कलाकार अहमदी या किसी और शिया सुन्नी के तमगो से उपर उठ कर सारी मानवता के लिए होता है .पाकिस्तान के आतंकीतंत्र को देखें तो खूनखराबे सभी मानवतावादी को रुलाते हैं .साथ ही आपसे पूर्ण सहमत हूँ अहमदिया लोगों को दोयम दर्जा प्राप्त है जिसपर अलीम साब जेसे संवदनशील का अहसास तडपा होगा.साब पाकिस्तान खुद के चाकू से मरने वाला आत्मघाती है.आपने अलीम साब का सुन्दर शेर लिखा भी तो है -मैं किसके नाम लिखू जो आलम....बहरहाल उर्दू जेसी मरती भाषा को जिंदगी के दवा दे रहे हैं उसके लिए आपका शुक्रिया

कंचन सिंह चौहान on अगस्त 23, 2010 ने कहा…

जिस दिन इस पोस्ट को पढ़ा था, उस दिन पूरा समय पढ़ने और गीत सुनने में चला गया। अब आज कमेंट देने आई हूँ तो समझ नही पा रही कि तथ्यों को इकट्ठा कर के लाने की आपकी मेहनत को किस तरह दाद दिया जाये..!!

मोहब्बतों में अजब है दिलों का धड़का सा,
ना जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाये....!!

पढ़ा नही है, अलीम जी को पढ़ूँगी अब...

Deepika ने कहा…

Manishji, Aapki pasand ki dad deti hun. Bahut achhe vishay le kar bahut hee achhi jankari dete he.

Himanshu Pandey on अगस्त 24, 2010 ने कहा…

सिर झुका है इस प्रविष्टि के आगे...पूर्णतया नतमस्तक !
सब कुछ नया है इस प्रविष्टि में । लिखी गज़ले सुनी थी..पर शख्सियत से परिचित नहीं थे ! आपका आभार !

कैसा-कैसा, खूबसूरत-खूबसूरत, मूल्यवान-मूल्यवान, मौजूँ-मौजूँ ढूँढ़ लाते हैं आप ! श्रम को सलाम !

SATYA on अगस्त 26, 2010 ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति.

Manish Kumar on सितंबर 04, 2010 ने कहा…

आप सब को मेरा ये आलेख और उबैद्दुलाह अलीम की रचनाएँ पसंद आईं जानकर खुशी हुई।

Parul Singh on सितंबर 27, 2010 ने कहा…

ji namaskar
yun to pahle bhi kyi bar ye blog pad chuki aur apni pasand se milti kafi rachnaye bhi mili par aaj "khuch din to baso meri aankho main... " ne likhne par majboor kar diya. ye choti baher ki gajal sunti aur pasand to karti hun par shayar ka nam nahi sun saki kabhi.aaj apke blog se malum hua shukriya.aur bahut si shubhkamnaye
aapke blog ke liye
regards

Manish Kumar on सितंबर 27, 2010 ने कहा…

शु्क्रिया पारुल सिंह जी जानकर खुशी हुई कि ये पोस्ट आपको पसंद आई। आशा है आपके विचारों से आगे भी अवगत होते रहने का मौका मिलता रहेगा।

Swati Gupta on मार्च 14, 2020 ने कहा…

बेहतरीन गज़ल। कभी कभी मायूस ग़ज़लें भी दिल को सुकून देती है।
मेरे लिए ये सारी ग़ज़लें नई है, सिर्फ "कुछ दिन तो बसो मेरी आंखो में" को छोड़कर। ऐसी ही कुछ और ग़ज़लें भी शेयर कीजिएगा।

Manish Kumar on मार्च 14, 2020 ने कहा…

Swati आपकी फरमाइश आज ही ब्लॉग पर नई पोस्ट के ज़रिए पूरी की है। सुनिएगा।

 

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