Wednesday, August 07, 2013

हरिवंशराय बच्चन और सतरंगिनी : इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

हरिवंशराय बच्चन की लिखी अनेकानेक पुस्तकों में सतरंगिनी  (Satrangini) का मेरे दिल में विशेष स्थान है। स्कूल जीवन में बच्चन जी के व्यक्तित्व के प्रति पहला आकर्षण उनकी कविता जो बीत गई वो बात गई से पैदा हुआ। स्कूल की किताबों में प्रत्येक वर्ष किसी कवि की अमूमन एक ही रचना होती थी। इसलिए हर साल जब नई 'भाषा सरिता' हाथ में होती तो ये जरूर देख लेता था कि इसमें बच्चन और दिनकर की कोई कविता है या नहीं। कॉलेज के ज़माने में बच्चन जी की कविताओं से सामना होता रहा और उनकी लिखी पसंदीदा कविताओं की सूची में जो बीत गई के बाद, नीड़ का निर्माण फिर फिर, अँधेरे का दीपक और नई झनकार  शामिल हो गयीं। बाद में पता चला कि ये सारी कविताएँ उनके काव्य संकलन सतरंगिनी का हिस्सा थीं।

बाद में जब उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी से जुड़ी घटना को पढ़ा तो इन कविताओं को उनकी पहली पत्नी श्यामा के निधन और उनकी ज़िंदगी में तेजी के आगमन से जोड़ कर देख सका। हरिवंश राय बच्चन हमेशा अपने पाठकों से उनकी रचनाओं को उनके जीवन की परिस्थिति और मनःस्थिति के आलोक में समझने की अपेक्षा रखते रहे हैं। संतरंगिनी के चौथे संस्करण की शुरुआत में अपने पाठकों से ये विनम्र निवेदन करते हुए वे कहते हैं..

आप ‘सतरंगिनी’ पढ़ने के पूर्व ‘मधुशाला’, मधुबाला’, ‘मधु कलश’ और ‘निशा निमन्त्रण’, ‘एकान्त संगीत’, ‘आकुल अन्तर’ पढ़ लें; यदि आप अधिक सचेत पाठक हों तो मैं कहूँगा कि आप मेरी ‘प्रारम्भिक रचनाएँ’ और ‘खैयाम की मधुशाला’ भी पढ़ लें। रचना-क्रम में पढ़ने से रचयिता के विकास का आभास होता चलता है, साथ ही प्रत्येक रचना उसके बाद आने वाली रचना की पूर्वपीठिका बनती जाती है और उसे ठीक समझने में सहायक सिद्ध होती हैं; यों मैं जानता हूँ कि साधारण पाठक के मन में किसी लेखक की रचनाओं को किसी विशेष क्रम में पढ़ने का आग्रह नहीं होता। मान लीजिए, ‘सतरंगिनी’ मेरी पहली रचना है जो आपके हाथों में आती है, तो आपको यह कल्पना तो करनी ही होगी कि वह जीवन की किस स्थिति, किन मनःस्थिति में है जो ऐसी कविताएँ लिख रहा है। कविताओं की साधारण समझ-बूझ के लिए इससे अधिक आवश्यक नहीं, पर उनका मर्म वही हृदयंगम कर सकेगा जो पूर्व रचनाओं की अनुभूतियों को अपनी सहानुभूति देता हुआ आएगा।

सतरंगिनी में बच्चन साहब की कुल 49 कविताएँ और एक शीर्षक गीत है। इन 49 कविताओं को पुस्तक में सात अलग रंगों में बाँटा गया है और प्रत्येक रंग में उनकी सात रचनाओं का समावेश है। 


ख़ुद बच्चन साहब के शब्दों में सतरंगिनी तम भरे, ग़म भरे बादलों में इन्द्रधनुष रचने का प्रयास है। जिन कविताओं का मैंने ऊपर जिक्र किया है वे सभी उनके जीवन में तेजी जी के रूप में फूटी आशा की किरणों की अभिव्यक्ति मात्र हैं। पर बच्चन के अनुसार ये कोई सस्ता आशावाद नहीं , इसे अपने 'अश्रु स्वेद रक्त' का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया है। आज की इस प्रविष्टि में सतरंगिनी की एक और आशावादी रचना आपको पढ़ाने और सुनाने जा रहा हूँ। सुनाना इस लिए की बच्चन की कविता को बोलकर पढ़ने से दिल में जो भावनाएँ उमड़ती घुमड़ती हैं उनकी अनुभूति इतनी आनंदमयी है कि मैं उसका रस लिए बिना कविता को आप तक नहीं पहुँचाना चाहता।



इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

जमीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता,
        नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
        कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उमीद छोडकर जिया,
इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर - समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनिष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
        न कूल भुमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
        न कट सकी, न घट सकी विरह - घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

उजाड से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की बसंत के बयार की,
        मरुस्थली मरिचिका सुधामयी मुझे लगी,
        अंगार से लगा चुका उमीद मैं तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गडी,
इसीलिए खडा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार लो दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

(निदाघ : ग्रीष्म लहरॆ लू , तिमिर : अंधकार, विषाद : दुख, शूल ‍: काँटा,  कूल : किनारा, विभावरी : रात,  तुषार : बर्फ, हिम)

इसीलिए जीवन में कभी उम्मीद ना छोड़िए, ना जाने कब कोई सदा आपको अकेलेपन के अंधकार से मुक्त कर जाए....
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13 comments:

प्रवीण पाण्डेय on August 07, 2013 said...

हरिवंशरायजी को मधुशाला ने ख्याति दी और बाँध दिया एक आकार में। उस आकार के बाहर भी कितनी सुन्दर रचनायें की हैं, बस पढ़कर आनन्द आ जाता है।

वाणी गीत on August 07, 2013 said...

उत्कृष्ट रचना पढवाने का बहुत आभार !

ANULATA RAJ NAIR on August 07, 2013 said...

बहुत बढ़िया पोस्ट....
पढ़ती हूँ सतरंगिनी.......
शुक्रिया
अनु

dilbag virk on August 07, 2013 said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08-08-2013 के चर्चा मंच पर है
कृपया पधारें
धन्यवाद

Randhir Singh Suman on August 08, 2013 said...

nice

राजीव कुमार झा on August 08, 2013 said...

बच्चन जी की सभी रचनाएं उत्कृष्ट हैं .इसे आपने बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है .

Arvind Mishra on August 09, 2013 said...

बच्चन जी की कवितायें मनःस्थिति की अभिव्यक्तियाँ हैं और सकारात्मक हैं -यह कविता भी उनकी श्रेष्ठ कविताओं में से एक है -आभार आपका !

lori on August 10, 2013 said...

hats off to your knowledge
http://chandsitaarephoolaurjugnu.blogspot.in/

kebhari on August 14, 2013 said...

Bahut khub.

Hemal Shah on August 15, 2013 said...

Congratulations Manish! Your blog won an award at IBAwards 2013

रवि रतलामी on August 15, 2013 said...

इंडीब्लॉगर हिंदी पुरस्कार 2013 विजेता होने पर आपको व ब्लॉग को बधाई व शुभकामनाएं!

ब्लॉग - चिट्ठा on August 16, 2013 said...

आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" में शामिल कर लिया गया है। सादर …. आभार।।

कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

Unknown on April 07, 2014 said...

बच्चन साहब कि कविताओं का कोई ज़वाब नहीं।
इन पंक्तियों ने मेरे दिल को छू लिया,
"कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खड़ा रहा कि तुम मुझे पुकार लो। "

 

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