रविवार, नवंबर 13, 2022

हमसे तो वो बेहतर हैं जो किसी के ना हुए Ghazals of new web series Mukhbir

हाल ही में ZEE5 पर आई एक वेब सीरीज का एक संगीत एलबम सुनने को मिला। खास बात ये कि इस एल्बम में दो ग़ज़लें भी थीं। वैसे तो आज के दौर में भी कम ही सही पर युवा कलाकार पुरानी ग़ज़लों को तो बखूबी निभा रहे हैं पर उनकी  गायी नई ग़ज़लों के मिसरों में वो गहराई नहीं दिखती जो ग़ज़ल को सही मायने  ग़ज़ल का रूतबा दिलाने के लिए बेहद जरूरी है।


दरअसल कविता तो ग़ज़ल की आत्मा है जिसके मूड को समझते हुए संगीतकार उसमें अपनी धुन का रंग भरता है और गायक उसके शब्दों के वज़न को समझते हुए अपनी अदाएगी के ज़रिए हर मिसरे के भावों को श्रोताओं के दिल में बैठा देता है। मुझे मुखबिर में शामिल ग़ज़लों को सुनते हुए ये लगा कि शायरी, धुन और गायिकी तीनों को इस तरह से पिरोया गया है कि उनका सम्मिलित प्रभाव एक समां बाँध देता है।

जब आप हमसे तो वो बेहतर हैं  सुनेंगे तो आपको लगेगा कि आप एकदम से साठ सत्तर के दशक में पहुँच गए हैं जब बेगम अख्तर, मेहदी हसन और गुलाम अली जैसे गायकों की तूती बोलती थी और ग़ज़लें  एक परम्परागत तरीके से  गायी जाती थीं। ये ग़ज़ल भी उसी माहौल में रची बसी है क्यूँकि कहानी का काल खंड भी वही है। क्या निभाया है ग़ज़ल गायिकी के उस तौर तरीके को रोंकिनी ने और वैभव ने उन्हें मौका दिया है हर मिसरे में तंज़ की शक्ल में छुपी पीड़ा को अपनी शास्त्रीय अदाकारी से उभारने का। 

ज़िंदगी में हमारा हुनर, हमारा व्यवहार कौशल अपने से दूर खड़े लोगों में भले ही खूबसूरत छवि गढ़ दे पर उसका क्या फायदा जब हम अपनी मिट्टी, अपने शहर और अपने करीबियों के मन को ही ना जीत पाएँ। ऐसे ही व्यक्तित्व के विरोधाभास को उभारा है वैभव मोदी ने अपने शब्दों में।

अभिषेक नेलवाल के संगीत निर्देशन में ग़ज़ल के मिसरों के बीच अभिनय रवांडे का बजाया हारमोनियम मन को लुभाता है। तो आइए सुनिए इस ग़जल को

हमसे तो वो बेहतर हैं जो किसी के ना हुए
इक आप हैं जिसके हैं उसी के ना हुए

परवाज़ को जिनके मिली आसमां की ये रज़ा
कुछ लोग 
हैं ऐसे जो ज़मीं के ना हुए

इक उम्र लग गयी कि कहें वो भी वाह वाह
वो हो गए कायल मगर खुशी से ना हुए

लेते हमारा नाम ये गलियाँ ये रास्ते
पर हम थे जिस शहर के वहीं के ना हुए


एल्बम की दूसरी ग़ज़ल का मिज़ाज थोड़ा नर्म और रूमानियत से भरा है। ज़ाहिर है यहाँ वाद्य यंत्रों का चुनाव भारतीय और पश्चिमी का मिश्रण है। मुखड़े के पहले गिटार की कानों में मिश्री भरती टुनटुनाहट है तो मिसरों के बीच ताली की थपथपाहट के साथ कभी बाँसुरी तो कभी तार वाद्यों की झंकार रोंकिनी का गाना है तो फिर सरगम का सुरीला तड़का तो बीच बीच में रहेगा ही।

अभिषेक की मधुर धुन जहाँ मन को सहलाती  है वहीं वैभव के मिसरे वास्तव में दिल को तसल्ली देते हुए एक उम्मीद सी जगाते हैं।  तेरे सीने पे हर इक रात की सहर हो बस वाला शेर तो कमाल सा करता हुआ निकल जाता है रोंकिनी की आवाज़ इस ग़ज़ल की जान है। क्या निभाया है उन्होंने दोनों ग़ज़लों के अलग अलग मूड को। इस बात को आप तब और महसूस करेंगे जब इसी ग़ज़ल को अभिषेक की आवाज़ में सुनेंगे।


क्या पता फिर से ये सँभल जाए
तेरे आने से दिल बहल जाए

सर्द आहों से बुझ गयी थी कभी
कुछ ऐसा कर ये शमा जल जाए

ये आरजू ये शिकस्त ये तेरे इश्क़ की बाजी
ख़ुदा करे कि तेरा कोई दाँव चल जाए

तेरे सीने पे हर इक रात की सहर हो बस
तेरी बाहों में मेरा दम यूँ ही निकल जाए

गंभीर भावनात्मक गीतों में रोंकिनी अपनी काबिलियत पहले ही साबित कर चुकी हैं पर इन ग़ज़लों में जो रंग उनकी आवाज़ ने भरा उससे उनकी बहुमुखी प्रतिभा की नयी झलक देखने को मिली।


तो बताइए कैसी लगीं आप सबको ये दोनों ग़ज़लें।

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21 टिप्पणियाँ:

Vimal Verma on नवंबर 13, 2022 ने कहा…

वाह, बहुत खूब

Manish Kumar on नवंबर 13, 2022 ने कहा…

पहली ग़ज़ल सुन कर पुराने दिन याद आ गए।

Sanjeev Kumar on नवंबर 13, 2022 ने कहा…

ये सीरीज़ आज ही देख रहा था ! हमसे तो वो बेहतर है - सुनकर मैं भी मुरीद हुआ इस ग़ज़ल का ! वैसा ही महसूस हुआ , जैसा कि आपने वर्णन किया है ! 🙏

Manish Kumar on नवंबर 13, 2022 ने कहा…

Sanjeev Kumar अरे वाह! कैसी बनी है ये सीरीज ?

Sanjeev Kumar on नवंबर 13, 2022 ने कहा…

मैं इज़राइल जासूस एली कोहेन आधारित वेब सीरिज़ -The spy जैसा सोच के देखना शुरू किया था पर यह उतना दमदार नहीं है ! मसाला मूवी जैसा है !

बेनामी ने कहा…

Bahut khubshurt lika aur gaya bhi

बेनामी ने कहा…

Bahut hi sundar मुद्दत बाद आज के वक्त में अच्छी गजलें सुनी।

Manish Kumar on नवंबर 14, 2022 ने कहा…

Bahut khubshurt lika aur gaya bhi

सही कहा। टिप्पणी करते समय अपना नाम भी दे देते तो बेहतर होता :)

Manish Kumar on नवंबर 14, 2022 ने कहा…

Bahut hi sundar मुद्दत बाद आज के वक्त में अच्छी गजलें सुनी।

मुझे भी ऐसा ही लगा। टिप्पणी करते समय अपना नाम भी दे देते तो बेहतर होता।

Ranju Bhatia on नवंबर 14, 2022 ने कहा…

बेहद खूबसूरत है यह ,कई बार सुनी

Manish Kumar on नवंबर 14, 2022 ने कहा…

जी बिल्कुल मैं भी अभी इसके इश्क में गिरफ्तार हूं 😊

Amita Mishra on नवंबर 15, 2022 ने कहा…

वाह ! बहुत ख़ूबसूरत है । दिल बहल जाए के संगीत में हल्का सा नयेपन का टच है जो इसे और अधिक कर्णप्रिय बना रहा है ।

Manish Kumar on नवंबर 15, 2022 ने कहा…

Amita Mishra हां, सही कह रही हैं । इस एल्बम की जो दूसरी गजल है वो पारंपरिक तरीके से गायी गई है और उसमें संगीत भी वैसा ही है।

Shangrila Mishra on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

Such light voice suiting this ghazal and the ghazal itself is so imaginable and rhythmic. One would like to keep listening. There is one more web series on amazon "love in Mumbai" which also has a beautiful ghazal in second episode. I will share.

Manish Kumar on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

Shangrila जरूर साझा करें। सुनना चाहूंगा।

Nupur Saxena on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

Sachmuch bahot umda hain ye gazalein

Manish Kumar on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

हां नुपुर जानकर खुशी हुई कि तुम्हें भी पसंद आई।

Vaibhav Modi on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

Really humbled with your review Manish Ji. It strengthens our belief that good poetry never goes out of fashion. Grateful for having such discerning audience

Manish Kumar on नवंबर 16, 2022 ने कहा…

Vaibhav Modi Rightly said. Good poetry in a song/ghazal is always cherished and remembered even years after release of the film.
The combined effort of entire team behind this album is definitely laudable. आप सबने मिलकर ग़ज़ल सुनने का वो पुराना लुत्फ़ वापस ला दिया।👏👏

Ravi Ashani ने कहा…

in dono gazal(ronkini gupta) ko sun kar aisa lagta hai....inki tarif ke liye koi sabda nahi hai...bahut badhiya......Speechless

Manish Kumar on दिसंबर 02, 2022 ने कहा…

रवि सहमत हूँ आपसे रोंकिनी ने दोनों ही ग़ज़लों को बखूबी निभाया है।

 

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