संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत के लिए जाने जाते रहे हैं। जब दो साल पहले लाहौर में मुजरों और जिस्मफरोशी के लिए मशहूर हीरामंडी पर उन्होंने वेब सीरीज बनाई तो इसके आठ भागों के लिए ठुमरियों, कव्वाली और ग़ज़लों से सजा आठ गीतों का एक गुलदस्ता भी बना जो मूल कथानक से कहीं ज्यादा सराहा गया।
मुझे इस एल्बम के कई गीत अच्छे लगते हैं पर मेरी इस संगीतमाला में इनमें से दो ही शामिल हो पाए। पहला तो कल्पना गंधर्व का गाया इक बार देख लीजिए तो दूसरा आज का गीत चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है जिसे संजय लीला भंसाली ने श्रेया घोषाल से गवाया। इन दोनों ही गीतों को तुराज ने ही लिखा है। संजय लीला भंसाली की एक खूबी है कि कलाकारों को सुनने परखने के बाद अगर वे उनसे प्रभावित होते हैं तो फिर वे उनकी फिल्मों के अभिन्न अंग बन ही जाते है।
गीतकार ए एम तुराज को भंसाली साहब ने 2010 में गुजारिश के लिए गाने लिखने को कहा था। उसके बाद बाजीराव मस्तानी, गंगूबाई और फिर हीरामंडी में जब जब उन्हें काव्यात्मक गीतों की जरूरत हुई उन्होंने तुराज का हाथ पकड़ा और तुराज ने भी उन्हें निराश नहीं किया। इस गीत के संगीत को अरेंज करने वाले श्रेयस पुराणिक के साथ भंसाली जी का पुराना नाता रहा है।
श्रेया घोषाल को तो फिल्मी दुनिया मेला पहला बड़ा ब्रेक संजय लीला भंसाली की बदौलत देवदास में मिला था और उसके बाद उनकी हर फिल्म में श्रेया का गाया कोई गाना होता ही है। भंसाली श्रेया से अपनी पहली मुलाकात के बारे में कहते है।
बात 1999-2000 की होगी। मैं उस दिन इस्माइल दरबार के साथ दिन भर बैठा था। हम लोग एक अच्छी गायिका की तलाश में थे। सोलह साल की श्रेया तब अपने पिताजी के साथ मेरे घर आई थी। मैं दिन भर लक्ष्मीकांत जी की एक धुन गुनगुना रहा था। जब श्रेया आई तो मैंने उसे कुछ गुनगुनाने को कहा और कमाल देखिए कि श्रेया ने वही गीत सुनाया जो मैं दिन भर से गा रहा था। तभी मैंने जान लिया कि इससे मेरा कुछ अंदर का रिश्ता है जो शायद अब ज़िंदगी भर बरक़रार रहे।
प्रेम में डूबे हुए दिल को जब ठेस लगती है तो मन एकदम से उसे स्वीकार नहीं पाता है। तरह तरह के प्रश्न मन मस्तिष्क में उठने लगते हैं कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? भला पूर्णिमा के दिन भी किसी ने चांद को किसी ने ढलते देखा है? पर मेरा प्यार तो उरूज़ पर आते आते ही अचानक बिखर गया। लुटे पिटे दिल की हालत बयां करें तो किससे? हालत ये है कि सीने में दर्द छुपाए चेहरे पर मुस्कुराहट का लबादा ओढ़ना पड़ रहा है। तुराज़ इसी मनोदशा को कुछ यूं शब्द देते हैं।
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है
हाय, पानी में...., हाय, पानी में...कौन जलता है?
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है...
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है
हाय, पानी में...., हाय, पानी में...कौन जलता है?
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है...
दर्द ऐसा कि हँसी आती है
साँस सीने में, फँसी जाती है
जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक
जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक
ऐसे रस्ते पे, कौन चलता है?
हाय, पानी में, हाय, पानी में.....हा..य, पानी में कौन जलता है?
चौदहवीं शब ....ढलता है
जीता हुआ इश्क़, हार बैठे... हैं
इसी तरह दिल को, मार बैठे हैं
जैसे हमने मले हैं, हाथ अपने
जैसे हमने मले हैं हाथ अपने
ऐसे हाथों को कौन मलता है?
हाय, पानी में..हाँ..हाय, पानी में कौन जलता है?
चौदहवीं ....ढलता है
संजय लीला भंसाली की राग यमन कल्याण से प्रेरित प्यारी धुन तुरंत श्रोता का ध्यान अपनी ओर खींचती है। मुखड़ों और अंतरों के बीच श्रेयस का संगीत संयोजन इस उप शास्त्रीय गीत के लिए खरा उतरता है। कहीं सारंगी और सितार की झनझनाहट, तो कहीं जलतरंग की आहट। तबले पर तो संदेश कदम शुरू से अंत तक अपना जलवा बरकरार रखते हैं।
संजय जानते थे कि एल्बम के इस सबसे सुरीले गीत के साथ कोई न्याय कर सकता है तो वो हैं श्रेया घोषाल। तो आइए सुनें उन्हीं की आवाज़ में ये गीत





















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