रविवार, मार्च 28, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 पुनरावलोकन (Recap) : कौन बने हिंदी फिल्म संगीत के धुरंधर ?

वार्षिक संगीतमाला 2009 में बचा है सिर्फ शिखर पर बैठा सरताज गीत। पर इससे पहले कि उस गीत की चर्चा की जाए एक नज़र संगीतमाला के इस संस्करण की बाकी पॉयदानों और उन पर आसीन हिंदी फिल्म संगीत के धुरंधरों पर।

बतौर संगीतकार शंकर-अहसान-लॉय और प्रीतम ने इस साल की संगीतमाला में अपनी जोरदार उपस्थिति रखी। जहाँ शंकर-अहसान-लॉय के छः गीत इस संगीतमाला में बजे वहीं प्रीतम ने अजब प्रेम की गजब कहानी, लव आज कल एवम् बिल्लू में बेहद कर्णप्रिय संगीत देकर चार पॉयदानों पर अपना कब्जा जमाया। पर साल २००९ किसी एक संगीतकार का नहीं बल्कि मिश्रित सफलता का साल रहा। रहमान, विशाल भारद्वाज, शांतनु मोइत्रा जैसे संगीतकार जो साल में चुनिंदा फिल्में करते हैं, का काम भी बेहतरीन रहा। इसलिए लोकप्रियता में दिल्ली ६ , कमीने और थ्री इडियट्स भी पीछे नहीं रहे। अमित त्रिवेदी को देव डी और वेक अप सिड के लिए जहाँ शाबासी मिली वहीं सलीम सुलेमान द्वारा संगीत निर्देशित कुर्बान और रॉकेट सिंह जैसी फिल्में भी चर्चा में रहीं।

अब तक अभिनेता व गीतकार के रूप में पहचान बनाने वाले पीयूष मिश्रा, गुलाल के ज़रिए इस साल के सबसे बेहतरीन आलरांउडर के रूप में उभरे। उनके आलावा बतौर संगीतकार दीपक पंडित, अफ़सार‍ - साज़िद और पीयूष - रजत जैसी जोड़ियों ने वार्षिक संगीतमाला में अपनी पहली उपस्थिति दर्ज करायी।

वैसे जहाँ तक गीतकारों की बात आती है तो मेरी समझ से साल के गीतकार का खिताब निश्चय ही पीयूष मिश्रा की झोली में जाना चहिए। ना केवल उन्होंने फिल्म गुलाल के गीतों को अपने बेहतरीन बोलों से सँवारा पर साथ ही गीतों में कुछ अभिनव प्रयोग करते हुए फिल्म संगीत के बोलों को एक नई दिशा दी।

पुराने गीतकारों में गुलज़ार और जावेद अख्तर का दबदबा पहले की तरह ही कायम रहा। प्रसून जोशी तो अब ना नए रहे ना पुराने। इस साल उनके गीतों में हिंदी भाषा के वो शब्द समाहित हुए, जो सहज होते हुए भी सामान्य गीतकारों के शब्दकोश से गायब होते हैं। नए गीतकार इरशाद क़ामिल ने भी प्रीतम की फिल्मों के गीतों को अपने शब्द दिए जो खासा लोकप्रिय हुए। दो नए गीतकारों मनोज मुन्तसिर और शाहाब इलाहाबादी के लिखे गीतों को पहली बार इस साल सुनने का मौका मिला और ये खुशी की बात है कि इन युवा गीतकारों को पहली दस पॉयदानों में जगह बनाने का मौका मिला।

गायिकी के लिहाज़ से जहाँ पुराने धुरंधरों रेखा भारद्वाज, शंकर महादेवन, मोहित चौहान, श्रेया घोषाल, राहत फतेह अली खाँ ने हमें कुछ बेमिसाल नग्मे दिए वहीं कुछ नई आवाज़ें भी दिल को छू गईं। कविता सेठ का इकतारा हो या श्रुति पाठक का रसिया... कार्तिक का गाया बड़े से शहर में हो या मोहन का खानाबदोश ..इन गीतों को सुनने का मन बार-बार करता रहा।

हो सकता है आपने इस संगीतमाला की कुछ कड़ियाँ को पढ़ने का मौका ना मिला हो। इसलिए आपकी सहूलियत के लिए एक बार फिर से चलते हैं वार्षिक संगीतमाला 2009 के पुनरावलोकन पर..



वार्षिक संगीतमाला 2009 पुनरावलोकन:


इस श्रृंखला का समापन होगा अगली पोस्ट में सरताज गीत के साथ। पर अगली पोस्ट मैं आप तक पहुँचा पाऊँगा अपनी दिल्ली यात्रा (29-31 मार्च) के बाद। तो तब तक दीजिए मुझे इज़ाजत पर ये जरूर बताइए कि कौन रहा आपका पिछले साल का सर्वाधिक प्रिय गीत ?

बुधवार, मार्च 24, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 रनर्स अप : बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार... रेखा भारद्वाज

लगभग तीन महिनों का सफ़र तय कर वार्षिक संगीतमाला 2009 जा पहुँची है दूसरी पायदान पर। और वार्षिक संगीतमाला 2009 के रनर्स अप गीत का सेहरा बँधा है उस गीत के सर जो बड़ी ठेठ जुबान में हम सबमें पाई जाने वाली मनोवृति को अपने खूबसूरत बोलों के माध्यम से उभारता है। कौन सी मनोवृति ! अरे वही

बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार
मन बोले चकमक हाए चकमक ...

अब पड़ोसी की कार हो या अर्धांगिनी, कितनी बार उनको देखकर आपने अपने मन को चकमकाते पाया है? खैर छोड़िए आप भी कहेंगे सब जान बूझ कर क्यूँ खुले आम ये सवाल किया जा रहा है ? मुख्य बात ये है कि आजकल के गीत सिर्फ प्रेम, विरह त्याग, दोस्ती, सौंदर्य जैसे विषयों पर नहीं लिखे जा रहे हैं पर हमारे समाज की उस पक्ष पर चुटकी ले रहे हैं जो स्याह है, धुँधला है जिसे जानते बूझते हुए भी हम उन पर बात करने में असहज हैं।

पर इस गीत की खासियत बस इतनी नहीं हैं। पीयूष मिश्रा के इस गीत के संगीत संयोजन और बोलों में लोकगीत वाली मिठास है वहीं रेखा भारद्वाज ने इस अंदाज़ में इस गीत को गाया है कि लगता है सचमुच किसी मुज़रेवाली के सामने बैठ कर ये गीत सुन रहे हों। आंचलिकता के हिसाब से भिन्न भिन्न शब्दों को उनके द्वारा दिया लोच, मूड को गीत के रंग में रँग डालता है। यूँ तो साइडबार की वोटिंग में आप लोगों में से ज्यादातर ने शंकर महादेवन और श्रेया घोषाल को साल का श्रेष्ठ गवैया चुना है पर मेरी नज़र में एक गवैये के तौर पर ये साल रेखा भारद्वाज का रहेगा। गुलाल, फिराक़ और दिल्ली 6 में उनके गाए गीत काफी दिनों तक याद किए जाएँगे।

मेरी एक संगीत मित्र हैं सुपर्णा। अक्सर वो मुझे अपने पसंदीदा गीतों के बारे में बताती रहती हैं। साल के शुरु में जब ये फिल्म रिलीज़ भी नहीं हुई थी, मुझे उनके द्वारा इस गीत की दो पंक्तियों से रूबरू होने का मौका मिला था और मै उन्हें पढ़कर ठगा सा रह गया था। वो पंक्तियाँ थीं

संकट ऐसा सिलवट से कोई हाल भाँप ले जी
करवट ऐसी दूरी से कोई हाथ ताप ले जी

पीयूष मिश्रा के इन शब्दों का जादू कुछ ऐसा था जो मुझे फिल्म के आते ही थियेटर तक ले गया। कितने सहज बिंबों का प्रयोग किया है पीयूष ने। ऐसे बिंब जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से लिए गए हैं। पर इनसे जो बात उन्होंने कहनी चाही है वो लोग तरह तरह के शब्दजाल जोड़ कर भी नहीं कह पाते। तो सुनें और ठुमके लगाएँ गुलाल के इस चकमकाते गीत के साथ..


बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार

मन बोले चकमक हाए चकमक ...
हाए चकमक चकमक चकमक
बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक

खाए..खाए तो मचल गई रे हो कजरारी नार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक
बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक

हमको दुनिया की लाज सरम का डर लगे है हो जी
हमको दुनिया के लोक धरम का डर लगे है हो जी
पर इस जलते करेजवा पे कोई फूँक मार दो जी
पर इस मनवा की अगिया पे कोई छींट मार दो जी
हो हो हो ओ ...हो हो हो ओ
मीठी.. मीठी सी कसक छोड़ कर चला गया भर्तार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक
बीड़ा दूजी थाली का लगे बड़ा मसालेदार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक

जुगनी जान गयो रे मान गयो रे बीड़ो की तासीर
अरे कुर्बान गयो हलकान के मसला सब्र पट गंभीर
कैसे देवे रे इलजाम कि तू भी संकट में आखिर
मैं तो पूरा राजस्थान गयो ना तेरे जैसी बीड़

संकट ऐसा सिलवट से कोई हाल भाँप ले जी
करवट ऐसी दूरी से कोई हाथ ताप ले जी
निकले सिसकी जैसे बोतल का काग जो उड़ा हो
धड़कन ऍसी जैसे चंबल में घोड़ा भाग जो पड़ा हो


हो हो हो ओ ...हो हो हो ओ
अंगिया.... अंगिया भी लगे है जैसे सौ सौ मन का भार
मन बोले चकमक हाए चकमक हाए चकमक चकमक चकमक

रविवार, मार्च 21, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : एक नज़र उन गीतों पर जो गीतमाला में आते आते रह गए...

वार्षिक संगीतमाला के लिए गीतों का चयन करते समय बहुत सारे गीत ऐसे थे जो कुछ हद तक पसंद आते हुए भी अंतिम पच्चीस में अपना स्थान नहीं बना पाए। इसलिए इससे पहले कि इस साल के रनर्स अप और सरताज गीत से आपकी मुलाकात कराई जाए एक नज़र उन गीतों पर जो आखिरी वक़्त में मेरी अंतिम सूची से बाहर चले गए। और हाँ ये बता दूँ कि इस पोस्ट में मैंने इन गीतों के सिर्फ वही टुकड़े लगाए हैं जो मुझे खास पसंद आए।

सबसे पहले जिक्र करना चाहूँगा मैं फिल्म सुनो ना के इस गीत का। एक अविवाहित माँ की कहानी कहती इस फिल्म का एक गीत अंतरा चौधरी ने गाया है और मुखड़ा सुनते ही दिल गीत की मायूसी में डूब सा जाया करता है। वैसे ये जानना मेरे लिए सुखद रहा कि अंतरा मशहूर संगीतकार सलिल चौधरी की पुत्री हैं।




जिंदगी उलझनों से भरी है
अजनबी हैं सफ़र की राहें
हमसफ़र थे जो कल तक हमारे
फेर ली हैं उन्हीं ने निगाहें...

मायूसी की बात करें तो फिल्म रेडिओ में हीमेश रेशमिया और श्रेया घोषाल का गाया ये गीत भी हीमेश के नए अंदाज़ और संगीत में चुटकियों के प्रयोग के लिए बार बार सुनने योग्य है



कोई ना कोई चाहे, कोई ना कोई चाहे
हमसफ़र जिंदगी ऐ
बहुत अकेले जी चुके हैं
थक के तनहा अब रुके हैं
कह रही आवारगी ये, कोई ना कोई चाहे

इसी फिल्म का एक और गीत का मुखड़ा पिया जैसे लाडू मोती चूर वाले मनवा में फूटे हूक..... जिसे हीमेश के साथ रेखा भारद्वाज ने गाया है भी खासा आकर्षित करता है।

वैसे तो फिल्म न्यूयार्क का गीत है जुनून.... पिछले साल काफी बजा पर इसी फिल्म का एक और गीत मेरी लिस्ट में लगभग आते आते रह गया था। इसे मोहित चौहान ने गाया था अपनी उसी खास शैली में



हूँ ऊ ऊँ.................हूँ ऊ ऊँ
तूने जो ना कहा मैं वो सुनता रहा
खामख्वाह, बेवज़ह ख़्वाब बुनता रहा
हूँ ऊ ऊँ.................हूँ ऊ ऊँ
जाने किस की हमें लग गई है नज़र
इस शहर में ना अपना ठिकाना रहा....

शिल्पा राव का फिल्म पा में गाया मुड़ी मुड़ी इत्तिफाक से ....में स्वानंद किरकिरे का छोटे छोटे शब्दों द्वारा किया गया गीत संयोजन कमाल लगता है।



इसी फिल्म में अमिताभ बच्चन का गाया मेरी माँ तेरी है मेरे पा .....भी आँखे नम करने की काबिलियत रखता है पर अगर साल के बेहतरीन बाल गीत को चुनना हो तो मैं फिल्म सुनो ना में अपूर्वा के गाए गीत को ही चुनूँगा...



मेरी अम्मा सुनो मेरा कहना, लगे अप्पा बिना सब सूना
मुझे बातों से ना बहलाओ,जाओ अप्पा कहीं से लाओ
मान भी जाओ ये ज़िद मेरी,और करो ना अब तुम देरी
तुमसे रूठूँगा मैं वर्ना..........

सूफी गीतों में दिल्ली 6 का अर्जियाँ सारी.... जहाँ सबसे प्रभावशाली रहा वहीं कुर्बान का अली मौला.... भी कर्णप्रिय रहा। रोमांटिक गीतों में कुर्बान फिल्म में सोनू निगम 'शुक्र अल्लाह...' और फिल्म तेरे बिन में शान और श्रेया का गाया 'तेरे बिन कहाँ हमसे जिया जाएगा....' भी उल्लेखनीय रहे। एक झलक सुनिए



और आखिर में वो गीत जिसकी शुरुआती धुन मुझे बेहद पसंद है और इसे बनाने वाले हैं विशाल भारद्वाज। फिल्म और गीत तो आप पहचान ही गए होंगे..



थोड़े भीगे भीगे से थोड़े नम हैं हम,
कल से सोए वोए भी तो कम हैं हम

है ना ये पंक्तियाँ आपके दिल से जुड़ी हुईं..क्यूँ ना हो आखिर आप भी तो एक ब्लॉगर ठहरे...:)

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ..

तो चलिए वार्षिक संगीतमाला 2009 की तीसरी पॉयदान पर आज विशुद्ध बॉलीवुड रोमांटिक मेलोडी का स्वाद चखने। ये गाना पिछले साल के अंत में आया और हर जगह छा गया और आज भी इसे सुनने पर एक मीठा मीठा सा अहसास मन में तारी रहता है और आप इसे गुनगुनाने का लोभ संवरण नहीं कर सकते। तारीफ करनी होगी संगीतकार प्रीतम की जिन्होंने एक बेहतरीन धुन के साथ आलिशा चिनॉय और आतिफ असलम को इस गीत को गाने को चुना।

गीत शुरु होता है अंग्रेजी जुबान में। प्रीतम अपने गीतों में अंग्रेजी की पंक्तियाँ, हिंदी अंतरों के बीच में पहले भी डालते आए हैं। वर्ष 2006 में उन्होंने फिल्म 'प्यार के साइड एफेक्टस' के लिए एक गीत रचा था जाने क्या चाहे मन बावरा.. जिसे मैं उनकी बेहतरीन कम्पोशीसन में से एक मानता हूँ। वहाँ भी अंग्रेजी का एक अंतरा ठीक इसी तरह लगाया था उन्होंने!

मन सोचता है कि क्या इसकी जरूरत थी? शायद आज के अंग्रेजीदाँ युवा वर्ग को गीत से जोड़ना उनका मकसद रहा हो। कई जगह संगीतप्रेमियों द्वारा इसकी आलोचना भी पढ़ी। पर मेरा मत तो यही है कि ये अगर ना भी करते तो भी चलता और अगर किया भी है तो वो अंतरा इस गीत के साथ भावनात्मक तौर पर जुड़ा ही दिखता है।

खैर, आशीष पंडित के लिखे इस गीत में अपनी शहद सी आवाज़ का जादू बिखेरा है अलीशा चिनॉय ने। अलीशा की बात करने पर उन पुराने दिनों की याद करना लाज़िमी हो जाता है जब हम स्कूल की दहलीज़ पार कर कॉलेज में जाने को तैयार हो रहे थे। वो वक़्त 'मेड इन इंडिया' की लोकप्रियता के पहले का था। हिंदी पॉप जगत में उन दिनों बेबी डॉल के नाम से मशहूर अलीशा इंडियन मेडोना की छवि को बनाने में व्यस्त थीं। अपनी जेबखर्च से मैंने पहला कैसेट उन्हीं का खरीदा था पर उसके बाद उनका पॉप संगीत मुझे विशेष रास नहीं आया। पर फिल्मी गीतों में अलीशा बीच बीच में सुनाई देती रहीं। 'मेरा दिल गाए जा जूबी जूबी जूबी...' से लेकर 'कजरारे कजरारे...' तक संगीत जगत तीन दशकों का सफ़र पूरा करने वाली अलीशा की इस बात पर दाद देनी होगी कि इतने लंबे समय में भी उनकी आवाज़ में वही खनक बरकरार है जो तीस साल पहले थी।

वैसे उनके बारे में एक रोचक तथ्य ये है जिसे आप अलीशा के नाम से जानते हैं, उनका वास्तविक नाम 'सुजाता' था जिसे बाद में उन्होंने अपनी भतीजी के नाम पर बदल कर अलीशा कर लिया। इस गीत के रोमांटिक मूड को पुख्ता करने में भी अलीशा की आवाज़ का महती योगदान है। रहे आतिफ साहब तो उनकी आवाज़ और लोकप्रियता के बारे में मैं पहले ही यहाँ चर्चा कर चुका हूँ।

तो आइए एक बार फिर सराबोर हो लें इस गीत की रूमानियत में..


shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and heal me, girl heal me
thinking abt the love we making n the life we sharing
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, comon heal me

हुआ जो तुम्हें मेरा मेरा
तेरा जो इकरार हुआ
तो क्यूँ ना मैं भी कह दूँ कह दूँ
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ
जब से मिला हूँ
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and heal me, girl heal me


वैसे तो मन मेरा,
पहले भी रातों में
अक्सर ही चाहत के हाँ
सपने सँजोता था
पहले भी धड़कन ये
धुन कोई गाती थी
पर अब जो होता है वो
पहले ना होता था

हुआ है तुझे जो भी जो भी
मुझे भी इस बार हुआ
तो क्यूँ ना मैं भी कह दूँ कह दूँ
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ...
आँखों से छू लूँ
कि बाहें तरसती हैं
दिल ने पुकारा है हाँ
अब तो चले आओ

आओ कि शबनम की बूँदे बरसती हैं
मौसम इशारा है हाँ
अब तो चले आओ

बाँहों में डाले बाँहें बाँहें
बाँहों का जैसे हार हुआ
हाँ माना मैंने माना माना
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ...
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean...

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मंगलवार, मार्च 16, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- गूँजा सा है कोई इकतारा इकतारा..कविता सेठ

वार्षिक संगीतमाला की चौथी पॉयदान पर विराजमान हैं अमित त्रिवेदी। अमित त्रिवेदी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के लिए कोई नए संगीतकार नहीं हैं। पिछले साल की संगीतमाला में आमिर में उनके संगीतबद्ध इक लौ इस तरह क्यूँ बुझी मेरी मौला को साल के सरताज गीत के खिताब से नवाज़ चुका हूँ।

इस साल भी अमित Dev D और वेक अप सिड के इस गीत के लिए चर्चा में बने रहे। पर Dev D की अपेक्षा इस गीत का सम्मिलित प्रभाव मुझ पर ज्यादा हुआ। दरअसल वेक अप सिड का ये गीत, उन गीतों में शुमार होता है जिसे एक बार सुन कर ही आप उसके सम्मोहन में आ जाते हैं।


इस गीत की इस सम्मोहनी शक्ति का श्रेय अमित त्रिवेदी के साथ गायिका कविता सेठ ,अमिताभ भट्टाचार्य और गीतकार जावेद अख्तर को भी जाता है। अब इन खूबसूरत लफ़्जों में बहती कविता को महसूस करें , जावेद अख्तर सपनों की बारिश को अपने नज़रिए से देखते हुए लिखते हैं ...

जो बरसें सपने बूँद बूँद
नैनों को मूँद मूँद
कैसे मैं चलूँ
देख न सकूँ
अनजाने रास्ते


और फिर कविता सेठ की गहरी आवाज़ गीत के दर्द को यूँ उड़ेलती हुई चलती है कि श्रोताओं को लगता है कि उनका ख़ुद का दर्द बयाँ किया जा रहा है। अमित त्रिवेदी के बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ। आज जानते हैं इस गीत की गायिका कविता सेठ के बारे में।

शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने के बाद कविता ने सूफ़ी गायिकी को अपने गायन का माध्यम चुना। कविता जगह जगह अपने समूह कारवाँ के लिए कार्यक्रम करने के आलावा चुनिंदा हिंदी फिल्मों में गाती भी रहीं। फिल्म गैंगस्टर का गीत मुझे मत रोको, फिल्म वादा का मौला और पिछले साल आई ये मेरा इंडिया के तीन गीत उन्होंने गाए। पर उनका ये गीत सबके मन को बावरा कर गया और शायद इसीलिए इस गीत के लिए उन्हें साल की श्रेष्ठ गायिका का फिल्मफेयर एवार्ड भी मिला।

वैसे कविता खुद क्याँ सोचती हैं इस गीत के बारे में? अपने ब्लॉग पर कविता इस गीत के बारे में लिखती हैं

ये एक सुरीला नग्मा है जो कि व्यक्ति के मन की उस प्रवृति की पड़ताल करता है जो उसे मीलों लंबे सफ़र पर भटकाती रहती है। गीत का मुखड़ा 'ओ रे मनवा तू तो बावरा है,तू ही जाने तू क्या सोचता है' बड़ी खूबसूरती से लिखा गया है (और मुझे लगता है कि मेंने शायद उसे ठीक से निभाया भी है)... दरअसल ये पंक्तियाँ हम सभी की मनःस्थिति को दर्शाती है। ये गीत मन में उतरता इसीलिए है कि हम सब इसे अपनी जिंदगी के किसी ना किसी हिस्से से आसानी से जोड़ पाते हैं।

तो आइए सुनें वेक अप सिड का ये नग्मा


ओ रे मनवा तू तो बावरा है
तू ही जाने तू क्या सोचता है
तू ही जाने तू क्या सोचता है बावरे
क्यूँ दिखाए सपने तू सोते जागते
जो बरसें सपने बूँद बूँद
नैनों को मूँद मूँद
कैसे मैं चलूँ
देख न सकूँ
अनजाने रास्ते

गूँजा सा है कोई इकतारा इकतारा
गूँजा सा है कोई इकतारा
गूँजा सा है कोई इकतारा इकतारा
गूँजा सा है कोई इकतारा इकतारा
दिल में बोले कोई इकतारा
दिल में बोले कोई इकतारा
गूँजा सा है कोई इकतारा

सुन रही हूँ सुध-बुध खो के कोई मैं कहानी
पूरी कहानी है क्या किसे है पता
मैं तो किसी की हो के ये भी न जानी
रुत है ये दो पल की या रहेगी सदा
किसे है पता
किसे है पता

जो बरसें सपने बूँद बूँद
नैनों को मूँद मूँद......
गूँजा-सा है कोई इकतारा इकतारा...


शुक्रवार, मार्च 12, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- बड़े नटखट हैं मोरे कँगना..श्रेया घोषाल

भाइयों और बहनों वक्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला के शीर्ष में बैठे पिछले साल के मेरे पाँच सबसे पसंदीदा गीतों के बारे मे बातें करने का। ये पाँचों गीत अलग अलग मिज़ाज के हैं और इनकी सापेक्षिक वरीयता कोई खास मायने नहीं रखती। हाँ पाँच में चार गीतों में मुख्य स्वर किसी गायिका का है और इन चारों गीतों की गायिकाएँ भी भिन्न भिन्न हैं। तो आज किसकी बारी है? वार्षिक संगीतमाला की पाँचवी पॉयदान की शोभा बढ़ा रहा है 'दि ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई ' फिल्म का शास्त्रीयता के रंग में डूबा एक बेहद सुरीला सा नग्मा।

(चित्र में बाँये से मनोज,श्रेया, दीपक)
अगर फिल्म के नाम को देखकर कुछ अचंभित महसूस कर रहे हों तो ये बताना वाज़िब होगा कि फिल्म का शीर्षक उस काल्पनिक भारतीय तितली से जुड़ी कहानी कहता है जिसे पाने से खुशियाँ आपकी गुलाम हो जाती हैं। ये फिल्म भारत के बाहर वर्ष 2007 में ही प्रदर्शित हो चुकी है और उसके बाद विभिन्न अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का हिस्सा भी बन चुकी है पर इसका संगीत भारत में पिछले साल सितंबर में ही आया। पर पाँचवी पॉयदान के इस गीत का आनंद उठाने के लिए फिल्म की कहानी जानने की ज्यादा आवश्यकता नहीं। 

अमेठी से ताल्लुक रखने वाले गीतकार मनोज 'मुन्तशिर' इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। टीवी के कई महत्त्वपूर्ण शो जैसे केबीसी, सच का सामना वैगेरह के लिए लेखन का काम करने के बाद उन्होंने गीतकार बनने का निश्चय किया। मनोज, संगीतकार दीपक पंडित के साथ यू बोमसी & मी का भी एक गीत लिख चुके हैं। 

प्रस्तुत गीत में यूँ तो नायिका अपने प्रीतम को याद कर रही है पर किसके बहाने करे याद उनको। मुआ कँगना किस दिन काम आएगा। इसीलिए गीत के मुखड़े में मनोज लिखते हें...

बड़े नटखट हैं मोरे कँगना
रात में खनके तो सखियाँ समझें
आए पिया मोरे अँगना...
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...

वैसे कंगन का नाम लेकर सिर्फ नायिकाएँ अपने दिल की बात करती हों ऐसा भी नहीं। पाकिस्तान के युवा शायर वासी शाह की वो सदाबहार नज़्म दिमाग में आ जाती है।

काश मैं तेरे हाथ का कंगन होता !
तू बड़े प्यार से बड़े चाव से बड़े अरमान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझको
और बेताबी से फुरक़त के खिज़ां के लमहों में
तू किसी सोच में जो घुमाती मुझको
मैं तेरे हाथ की खुशबू से महक सा जाता
जब कभी 'mood' में आकर मुझे चूमा करती
तेरे होठों की शिद्दत से मैं दहक सा जाता..

तो देखा आपने कितना नटखट है ये 'कंगन' कवि की कल्पनाएँ इसके बहाने कहाँ तक छलाँग मार लेती हैं। पर मनोज तो सिर्फ कँगना के सहारे प्रेम में डूबी नायिका का मन टटोल रहे हैं। वैसे मनोज के सहज बोलों को संगीतकार दीपक पंडित ने विशु्द्ध भारतीय संगीत के चोले में इस तरह सजाया है कि एक बार सुन कर ही मन वाह वाह कर उठता है। गीत के साथ चलती तबले की थाप, इंटरल्यूड्स में विविध भारतीय वाद्यों का प्रयोग मन को सोहता है। और फिर श्रेया घोषाल का कोकिल स्वर रही सही कसर पूरी कर देता है। किस खूबसूरती से गीत को निभाया है उन्होंने! शास्त्रीय गीत हो या बॉलीवुड की विशुद्ध मेलोडी, दोनों में ही श्रेया अपनी प्रतिभा हमेशा से दर्शाते आई हैं। शायद इसीलिए पाठकों में अधिकांश ने उनको इस साल का सर्वश्रेष्ठ गवैया चुना है। तो आइए 

सुनें इस गीत को ..


बड़े नटखट हैं मोरे कँगना
रात में खनके तो सखियाँ समझें
आए पिया मोरे अँगना...
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...
हर पल याद पिया को करना
भूल गई मैं सँजना सँवरना
प्रीत के रंग में, रंग गई जबसे
भाए मोहे कोई रंग ना
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना...
मोहे खबर क्या इस दुनिया की
जोगन हूँ अपने पिया की
मगन रहूँ मैं प्रेम लगन में
कोई करे मुझे तंग ना
बड़े नटखट हैं मोरे कँगना....

वैसे चलते चलते ये भी बताता चलूँ कि इस गीत को गुलाम अली साहब ने भी अपनी आवाज़ दी है पर मुझे श्रेया का वर्सन ज्यादा प्रिय है। और हाँ, ये एलबम बाजार में Eros Music (Catalog -ECD0171) पर उपलब्ध है।

मंगलवार, मार्च 09, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 6 - ऐ सुरमयी आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया...

वार्षिक संगीतमाला की छठी पॉयदान पर एक बार फिर है फिल्म गुलाल का एक और गीत। इस गीत के तीनो पक्षों यानि बोल, संगीत और गायिकी में जान डालने वाला एक ही शख़्स हैं और वो हैं पीयूष मिश्रा!


ग्वालियर में जन्मे और पले बढ़े पीयूष मिश्रा, बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक कमाल के कलाकार हैं। नाटककार, चरित्र अभिनेता, संवाद लेखक, गीतकार, संगीतकार, गायक के रूप में तो सारे संगीतप्रेमी उन्हें जान ही गए हैं। पर क्या आप जानते हैं कि पीयूष को अपने अंदर के कलाकार को ढूँढने के लिए कितनी मशक्कत करनी पड़ी? पाँच साल तक सितार वादन में लगे रहे तो भी सुकून नहीं मिला। फिर ग्वालियर के शिल्प महाविद्यालय में दाखिला लिया पर वहाँ भी बात नहीं बनी। मन था कि रचनात्मकता के कुछ और आयाम तलाशने में लगा था। आखिरकार उनकी प्रतिभा को उचित मंच राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रवेश लेने के साथ मिल गया।

पीयूष फिल्मों में पहली बार 1998 में मणि रत्नम की फिल्म 'दिल से' में दिखे। मुंबई में अपने विद्यालय के पुराने साथियों विशाल भारद्वाज, आशीष विद्यार्थी, अनुराग कश्यप, मनोज वाजपेयी की वज़ह से नाटकों में काम मिलता रहा पर उन्हें मुंबई से प्यारी दिल्ली ही लगती रही। जब पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उन्हें सताने लगीं तो वो मुंबई आ गए। ये नहीं कि रंगमंच से उन्होंने नाता तोड़ लिया है पर समय रहते उन्होंने ये महसूस कर लिया कि आर्थिक स्थायित्व उन्हें फिल्म उद्योग ही दे सकता है।

पिछले साल वार्षिक संगीतमाला में पीयूष, सुखविंदर सिंह के गाए मस्तमौला नग्मे दिल हारा रे... की वज़ह से चर्चा में आए थे। वैसे ब्लैक फ्राइडे के चर्चित गीत ओ रुक जा रे बंदे के रचयिता भी वही थे। पर इस बार उन्होंने गुलाल के गीत लिखकर ये दिखला दिया कि एक गीतकार को अगर निर्देशक द्वारा खुली छूट दी जाए तो वो लीक से अलग हटकर भी बहुत कुछ दे सकता है। पीयूष कहते हैं कि अनुराग कश्यप के निर्देशन में बनी इस फिल्म के गीतों को रचने में उन्हें मात्र एक हफ्ते का समय लगा।

पॉयदान संख्या 18 पर हम उनके लिखे पॉलटिकल मुज़रे की चर्चा कर चुका हूँ। छठी पॉयदान पर विराजमान आज का ये गीत पीयूष ने मशहूर गीतकार और शायर साहिर लुधियानवी के अज़र अमर गीत ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है से प्रेरित हो कर लिखा है और उन्हीं को ये गीत समर्पित भी किया है। मोहम्मद रफ़ी जैसे महान गायक ने साह़िर के शब्दों की संवेदनाओं को पकड़ते हुए इतने बेहतरीन तरीक़े से उस गीत को अपनी आवाज़ बख्शी थी कि शायद ही कोई उस गीत को भूल पाएगा।

पीयूष ने अपने इस गीत में साहिर की भावनाओं को आज के परिपेक्ष्य में देखने की कोशिश की है। वैसे तब और अब की दुनिया की समस्याओं में फर्क़ कुछ ज्यादा नहीं आया है। साहिर ने अपनी कालजयी रचना में गरीबी, सामाजिक और आर्थिक असमानता, व्यक्ति के भावनात्मक और नैतिक अवमूल्यन की बात की थी। पीयूष भी आज के समाज की भौतिकवादी मानसिकता का जिक्र अपने गीत में करते हैं जो इंसान को सत्ता, धन के मोह जाल में क़ैद किए हुए है। फिल्म गुलाल के अंत में पार्श्व में बजने वाला ये गीत दिल को झकझोरता सा निकल जाता है और हमें कुछ सोचने पर मज़बूर कर देता है।

तो आइए पढ़ें और सुनें पीयूष मिश्रा जी को


ओ री दुनिया, ओ री दुनिया…
ऐ ओ री दुनिया….
ऐ सुरमयी आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया,
सुरमयी आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया,
सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया,
सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया,
अलसाई सेजों के फूलों की दुनिया ओ दुनिया रे,
अंगड़ाई तोड़े कबूतर की दुनिया ओ दुनिया रे,
ऐ करवट ले सोई हकीक़त की दुनिया ओ दुनिया,
दीवानी होती तबियत की दुनिया ओ दुनिया,
ख्वाहिश में लिपटी ज़रुरत की दुनिया ओ दुनिया रे,
ऐ इंसान के सपनों की नीयत की दुनिया ओ दुनिया,
ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,
ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

ममता की बिखरी कहानी की दुनिया ओ दुनिया,
बहनों की सिसकी जवानी की दुनिया ओ दुनिया,
आदम के हव्वा से रिश्ते की दुनिया ओ दुनिया रे,
ऐ शायर के फीके लफ्ज़ों की दुनिया ओ दुनिया ,
ओ...............ओ...............

गा़लिब के मोमिन के ख़्वाबों की दुनिया,
मज़ाज़ों के उन इन्कलाबों की दुनिया,
फैज़, फिराको, साहिर व मखदूम,
मीर की, ज़ौक की, दाग़ों की दुनिया,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

पल छिन में बातें चली जाती हैं हैं,
पल छिन में रातें चली जाती हैं हैं,
रह जाता है जो सवेरा वो ढूँढे,
जलते मकान में बसेरा वो ढूँढे,
जैसी बची है वैसी की वैसी बचा लो ये दुनिया,
अपना समझ के अपनों के जैसी उठा लो ये दुनिया,
छिटपुट सी बातों में जलने लगेगी सँभालो ये दुनिया,
कटकुट के रातों में पलने लगेगी सँभालो ये दुनिया,

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,
वो कहे हैं की दुनिया ये इतनी नहीं है,
सितारों से आगे ज़हाँ और भी हैं,
ये हम ही नहीं हैं वहाँ और भी हैं,
हमारी हर एक बात होती वहीं हैं,
हमें ऐतराज़ नहीं हैं कहीं भी,
वो आलिम हैं फ़ाज़िल हैं होंगे सही ही,
मगर फलसफा ये बिगड़ जाता है जो वो कहते हैं,
आलिम ये कहता वहाँ ईश्वर है,
फ़ाज़िल ये कहता वहाँ अल्लाह है,
काबिल यह कहता वहाँ ईसा है,
मंजिल ये कहती तब इंसान से कि तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया,
ये बुझते हुए चंद बासी चरागों, तुम्हारे ये काले इरादों की दुनिया,
हे ओ.... री दुनिया…


शुक्रवार, मार्च 05, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 7 - मन बावरा तुझे ढूँढता ..शाहाब के बोलों पर राहत का स्वर

वार्षिक संगीतमाला की सातवीं पॉयदान पर बड़ा ही खूबसूरत नग्मा है जो पिछले साल जनवरी में प्रदर्शित हुई फिल्म आसमाँ sky is the limit... का हिस्सा था। युवा कलाकारों को लेकर बनाई गई ये फिल्म ज्यादा तो नहीं चली पर इसने हिन्दी फिल्म संगीत में संगीतकार और गीतकार के रूप में दो नए नाम जरूर जोड़ दिए जिनसे आगे भी ऐसे ही प्यारे गीतों को सुनने की उम्मीद रहेगी।

वैसे राहत फतेह अली खाँ अक्सर बड़े बैनरों की फिल्मों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरते रहे हैं। पर इस छोटे बजट की फिल्म का ये गीत उन्होंने इसके हृदय को छूने वाले बोलों और बेहतरीन धुन को देखकर ही चुना होगा। वैसे तो राहत ने इस साल कुछ ज्यादा चर्चित फिल्मों के भी नग्मे गाए हैं पर उन सबको सुनने के बाद मुझे ये उनके द्वारा संगीतप्रेमियों की दी हुई इस साल की सबसे बेहतरीन सौगात लगी। ये गीत है मन बावरा... जिसे लिखा शाहाब इलाहाबादी ने और इस गीत की धुन बनाई अफ़सार साज़िद की युगल जोड़ी ने।

गीत के मूड के अनुरूप गीत के पार्श्व में बाँसुरी और तबले का प्रयोग मन को सोहता है। राहत की आवाज़ का दर्द, शास्त्रीय गायिकी पर उनकी पकड़, शाहाब के अर्थपूर्ण बोलों को सीधे मन के भीतर ले जा कर छोड़ते हैं।

यक़ीन नहीं होता तो शाहाब के बोलों को पढ़ें और फिर आनंद लें राहत की बेमिसाल गायिकी का...



मन बावरा तुझे ढूँढता
पाने की खोने की पैमाइशें1
जीने की सारी मेरी ख़्वाहिशें
आसमाँ ये ज़हाँ, सब लगे ठहरा
मन बावरा तुझे ढूँढता

1.नाप जोख़,

बदगुमाँ था नादाँ ये दिल
धड़केगा ना कभी
होश खो बैठा है पागल
रूठी है ज़िंदगी
खुद से बातें कर करके हँसना
भीड़ में भी तनहा सा लगना
बज रही हैं जलतरंगें
साँसों के दरमियाँ
मन बावरा तुझे ढूँढता...


उन्सियत2 के ख़्वाब चुनकर
कटती रातें मेरी
इलतज़ा ए दीद3 लेकर
भटके आँखें मेरी
मीलों लंबे ये फ़ासले हैं
बस तस्सुवर4 के सिलसिले हैं
रतजगे गुमसुम पड़े हैं
पलकों पे रायगाँ5
2. प्रेम, 3.झलक, 4. ख्याल, 5.बेकार

मन बावरा तुझे ढूँढता ....

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तो हुजूर कैसा लगा आपको ये गीत ?

बुधवार, मार्च 03, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 8 - जरा बताइए ना ये ससुराल 'गेंदा फूल' सा क्यूँ है ?

होली की वज़ह से वार्षिक संगीतमाला 2009 ने लिया था एक विश्राम! तो एक बार फिर बाकी की सीढ़ियों का सफ़र शुरु करते हैं पॉयदान संख्या 8 से, जहाँ पर है एक छत्तिसगढ़ी लोकगीत जिसके बोलों को प्रसून जोशी द्वारा थोड़ा बहुत परिवर्तित करके फिल्म दिल्ली ६ में इस्तेमाल किया गया। संगीतकार ए आर रहमान और सहायक संगीत निर्देशक रजत ढोलकिया ने इस लोकगीत का पाश्चत्य संगीत के साथ इतना बेहतरीन सम्मिश्रण किया कि पिछले साल फिल्म रिलीज़ होने के साथ ही ये गीत सबकी जुबाँ पर चढ़ गया। इस गीत में लोकगीत की मिठास को कायम रखने के लिए रेखा भारद्वाज की गायिकी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। वैसे रेखा के साथ पीछे आने वाले कोरस में आवाज़ें थीं श्रृद्धा पंडित, सुजाता मजूमदार और वी न महथी की।

गीत चल गया तो साथ में ये मसला भी उठ गया कि प्रसून जोशी की जगह इस लोकगीत के लेखक को क्रेडिट देना चाहिए। क्रेडिट देने के मामले में फिल्म उद्योग का रिकार्ड जगज़ाहिर है। प्रसून का कहना है कि ये गीत उन्हें अभिनेता रघुवीर यादव ने दिया। वैसे इस संबंध में प्रसून का पक्ष जानने के लिए राजेश अग्रवाल जी की लिखी ये पोस्ट पढ़ें। पर आप ये जरूर जानना चाहेंगे कि इतन सहज और अपने से लगने वाले लोकगीत को लिखा किसने?

खोजबीन के बाद मुझे ये जानकारी मिली कि इसे स्व. गंगाराम शिवारे ने लिखा था और स्व. भुलवाराम यादव ने उसे स्वर दिया। भुलवाराम जी ने ही तीनों जोशी बहनों डा. रेखा, रमादत्त और प्रभादत्त को ये गीत सिखाया। जोशी बहनों का कहना है कि सत्तर के दशक में उन्होंने ये गीत पहली बार रायपुर में गाया।

ससुराल में सास की गालियाँ, ननद के ताने और देवर से सहानुभूति मिलना शायद ही संयुक्त परिवार में रही किसी दुल्हन के लिए नई बात होगी। हालाँकि धीरे धीरे शिक्षा के प्रसार और एकल परिवार की ओर अग्रसर होता भारतीय समाज इस मिथक को तोड़ने में प्रयासरत है। पर गीत में ससुराल को गेंदा फूल कहा जाना कुछ नया और उत्सुकता जगाने वाला है। अब गंगाराम शिवारे जी तो रहे नहीं कि ये प्रश्न उनसे पूछा जाए पर इस बारे में जब भी चर्चा चली लोगों ने कई तर्क दिये। वैसे यहाँ ससुराल को गुलाब फूल कहा जाता तो फूल के साथ काँटे की बात कह कर आसानी से ये रूपक सब की समझ में आ जाता। पर सवाल तो यहाँ ये है कि इस गेंदे में बनावट के लिहाज़ से ऐसी क्या खासियत है?

गेंदे के फूल की खासियत है इसमें बहुत सारे फूल एक ही तने से उगते और पलते बढ़ते हैं ठीक वैसे ही जैसे ससुराल रूपी तने से सास,ससुर,देवर, ननद जैसे रिश्ते पनपते हैं और साथ साथ फलते फूलते हैं। हो सकता है आप इस व्याख्या से सहमत ना हों पर इस बारे में आपका मत जानने की उत्सुकता रहेगी।

तो जब तक आप सोचे विचारें सुनते जाएँ ये प्यारा सा नग्मा..



सैंया छेड़ देवें, ननद चुटकी लेवे ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे, देवरजी समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का अँगना, भावे डेरा पिया का हो
सास गारी देवे, देवरजी समझा लेवे ससुराल गेंदा फूल...


सैंया है व्यापारी, चले है परदेश
सूरतिया निहारूँ जियरा भारी होवे, ससुराल गेंदा फूल....
सास गारी देवे देवरजी समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल
सैंया छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल...

छोड़ा बाबुल का अंगना भावे डेरा पिया का हो !
बुशर्ट पहिने खाईके बीड़ा पान, पूरे रायपुर से अलग है
सैंया...जी की शान ससुराल गेंदा फूल ....


सैंया छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे ससुराल गेंदा फूल ...
सास गारी देवे, देवरजी समझा लेवे ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का अंगना ,भावे डेरा पिया का हो ....
ओय होय ओय होय-
होय होय होय होय होय होय .....

रविवार, फ़रवरी 28, 2010

जनाब प्रदीप चौबे की आवाज़ में उनकी ये मज़ेदार हास्य कविता... भारतीय रेल की जनरल बोगी

होली का मौसम आते ही उन हास्य कविताओं की याद आ जाती है जिनका हम कवि सम्मेलनों या पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से सुनने या देखने का बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे। उस वक्त यानि अस्सी के दशक में आज की तरह टीवी चैनलों की भरमार नहीं थी। ले देकर एक दूरदर्शन था जो इस अवसर पर हास्य कवि सम्मेलनों का आयोज़न किया करता था। पर उससे भी ज्यादा हम इंतज़ार करते थे धर्मयुग के होली विशेषांक का। धर्मयुग चूँकि उस वक़्त की लोकप्रिय पत्रिका थी इसलिए प्रतिष्ठित हास्य कवियों काका हाथरसी, हुल्लड़ मुरादाबादी, शैल चतुर्वेदी, ओम प्रकाश आदित्य व प्रदीप चौबे की ताज़ा कविताओं को पढ़ने का मौका हमें मिल जाया करता था।

अस्सी के पूर्वार्ध की बात है। मैं उस सातवीं क्लास में पढ़ता था। स्कूल में कहा गया था कि वार्षिकोत्सव के दौरान छात्रों को कुछ सुनाना है। वो गीत भी हो सकता है कविता भी और मुझे धर्मयुग में छपी इस कविता का ध्यान हो आया था, जो मैंने होली के समय पढ़ी थी। वो हास्य कविता प्रदीप चौबे की थी और उसे पढ़कर और उसके बारे में सोचकर हफ़्तों मेरा मूड खुशनुमा रहा था। पर कविता इतनी लंबी थी कि मैं कक्षा में उसे समय रहने तक याद ना रख सका। फिर धर्मयुग की वो प्रति भी खो गई और समय के साथ उस कविता की आरंभिक पंक्तियों
......भारतीय रेल की जनरल बोगी पता नहीं
आपने भोगी कि नहीं भोगी
एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे...........के आलावा मुझे कुछ याद भी नहीं रहा।

पिछले हफ़्ते दिल हुआ कि क्यूँ ना होली के माहौल में इस कविता को ढूँढकर आप सबके साथ बाँटा जाए। खुशी की बात ये हुई कि ना केवल मुझे ये कविता मिली साथ ही कवि प्रदीप चौबे की एक रिकार्डिंग भी मिली जिसमें उन्होंने इस कविता का पाठ किया है।

रेल की जनरल बोगी पर अस्सी के दशक में लिखी ये कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। वैसे रेलवे ने अस्सी के दशक से आज तक में ट्रेनों की संख्या और यात्री सुविधाओं में निरंतर इज़ाफा किया है पर रेल यात्रियों की संख्या भी उससे कहीं तेजी से बढ़ी है। खासकर आज भी जब आप किसी आम पैसेंजर ट्रेन की बोगी या मेल एक्सप्रेस की जनरल बोगी को देखते हैं तो नीचे जैसे दृश्य आपको सहज ही दिखाई दे जाएँगे।




तो आइए मेरे साथ पढ़िए जबलपुर के इस प्रसिद्ध हास्य कवि प्रदीप चौबे की ये कविता जिसमें उन्होंने हँसी ही हँसी में जनरल बोगी में सफ़र करने वाले आम यात्रियों की व्यथा का बखूबी चित्रण किया है।

भारतीय रेल की जनरल बोगी
पता नहीं आपने भोगी कि नहीं भोगी
एक बार हम भी कर रहे थे यात्रा
प्लेटफार्म पर देखकर सवारियों की मात्रा
हमारे पसीने छूटने लगे

हम झोला उठाकर घर की ओर फूटने लगे
तभी एक कुली आया
मुस्कुरा कर बोला - 'अन्दर जाओगे ?'
हमने कहा - 'तुम पहुँचाओगे !'
वो बोला - बड़े-बड़े पार्सल पहुँचाए हैं आपको भी पहुँचा दूंगा
मगर रुपये पूरे पचास लूँगा.
हमने कहा - पचास रुपैया ?
वो बोला - हाँ भैया
दो रुपये आपके बाकी सामान के
हमने कहा - सामान नहीं है, अकेले हम हैं
वो बोला - बाबूजी, आप किस सामान से कम हैं !
भीड़ देख रहे हैं, कंधे पर उठाना पड़ेगा,
धक्का देकर अन्दर पहुँचाना पड़ेगा
वैसे तो हमारे लिए बाएँ हाथ का खेल है
मगर आपके लिए दाँया हाथ भी लगाना पड़ेगा
मंजूर हो तो बताओ
हमने कहा - देखा जायेगा, तुम उठाओ
कुली ने बजरंगबली का नारा लगाया
और पूरी ताकत लगाकर हमें जैसे ही उठाया
कि खुद बैठ गया
दूसरी बार कोशिश की तो लेट गया
बोला - बाबूजी पचास रुपये तो कम हैं
हमें क्या मालूम था कि आप आदमी नहीं, बम हैं
भगवान ही आपको उठा सकता है
हम क्या खाकर उठाएंगे
आपको उठाते-उठाते खुद दुनिया से उठ जायेंगे !
हमने कहा - बहाने मत बनाओ
जब ठेका लिया है तो उठाओ.
कुली ने अपने चार साथियों को बुलाया
और पता नहीं आँखों ही आँखों मैं क्या समझाया
कि चारों ने लपक कर हमें उठाया
और हवा मैं झुला कर ऐसे निशाने से
अन्दर फेंका कि हम जैसे ही
खिड़की से अन्दर पहुँचे
दो यात्री हम से टकराकर
दूसरी खिड़की से बाहर !
जाते-जाते पहला बोला - बधाई !
दूसरा बोला - सर्कस मैं काम करते हो क्या भाई ?

अब जरा डिब्बे के अन्दर झाँकिए श्रीमान
भगवान जाने डिब्बा था या हल्दी घाटी का मैदान
लोग लेटे थे, बैठे थे, खड़े थे
कुछ ऐसे थे जो न बैठे थे न खड़े थे, सिर्फ थे
कुछ हनुमान जी के वंशज
एक दूसरे के कंधे पर चढ़े थे
एक कन्धा खाली पड़ा था
शायद हमारे लिए रखा था
हम उस पर चढ़ने लगे
तो कंधे के स्वामी बिगाड़ने लगे बोले - किधर?
हमने कहा - आपके कंधे पर !
वे बोले - दया आती है तुम जैसे अंधे पर
देखते नहीं मैं खुद दूसरे के कंधे पर बैठा हूँ
उन्होंने अपने कन्धा हिला दिया
हम पुनः धरती पर लौट आए
सामने बैठे एक गंजे यात्री से गिड़गिडाये - भाई साहब
थोडी सी जगह हमारे लिए भी बनाइये
वो बोला - आइये हमारी खोपड़ी पर बैठ जाइये
आप ही के लिए साफ़ की है
केवल दो रुपए देना
मगर फिसल जाओ तो हमसे मत कहना !

तभी एक बोरा खिड़की के रास्ते चढा
आगे बढा और गंजे के सिर पर गिर पड़ा
गंजा चिल्लाया - किसका बोरा है ?
बोरा फौरन खडा हो गया
और उसमें से एक लड़का निकल कर बोला
बोरा नहीं है बोरे के भीतर बारह साल का छोरा है
अन्दर आने का यही एक तरीका है
हमने आपने माँ-बाप से सीखा है
आप तो एक बोरे मैं ही घबरा रहे हैं
जरा ठहर तो जाओ अभी गददे मैं लिपट कर
हमारे बाप जी अन्दर आ रहे हैं
उनको आप कैसे समझायेंगे
हम तो खड़े भी हैं वो तो आपकी गोद मैं ही लेट जाएँगे

एक अखंड सोऊ चादर ओढ़ कर सो रहा था
एकदम कुम्भकरण का बाप हो रहा था
हमने जैसे ही उसे हिलाया
उसकी बगल वाला चिल्लाया -
ख़बरदार हाथ मत लगाना वरना पछताओगे
हत्या के जुर्म मैं अन्दर हो जाओगे
हमने पुछा- भाई साहब क्या लफड़ा है ?
वो बोला - बेचारा आठ घंटे से एक टाँग पर खड़ा
और खड़े खड़े इस हालत मैं पहुँच गया कि अब पड़ा है
आपके हाथ लगते ही ऊपर पहुँच जायेगा
इस भीड़ में ज़मानत करने क्या तुम्हारा बाप आयेगा ?
एक नौजवान खिड़की से अन्दर आने लगा
तो पूरे डिब्बा मिल कर उसे बाहर धकियाने लगा
नौजवान बोला - भाइयों, भाइयों
सिर्फ खड़े रहने की जगह चाहिए
एक अन्दर वाला बोला - क्या ?
खड़े रहने की जगह चाहिए तो प्लेटफोर्म पर खड़े हो जाइये
जिंदगी भर खड़े रहिये कोई हटाये तो कहिये
जिसे देखो घुसा चला आ रहा है
रेल का डिब्बा साला जेल हुआ जा रहा है !
इतना सुनते ही एक अपराधी चिल्लाया -
रेल को जेल मत कहो मेरी आत्मा रोती है
यार जेल के अन्दर कम से कम
चलने-फिरने की जगह तो होती है !

एक सज्जन फर्श पर बैठे हुए थे आँखें मूँदे
उनके सर पर अचानक गिरीं पानी की गरम-गरम बूँदें
तो वे सर उठा कर चिल्लाये - कौन है, कौन है
साला पानी गिरा कर मौन है
दीखता नहीं नीचे तुम्हारा बाप बैठा है !
क्षमा करना बड़े भाई पानी नहीं है
हमारा छः महीने का बच्चा लेटा है कृपया माफ़ कर दीजिये
और अपना मुँह भी नीचे कर लीजिये
वरना बच्चे का क्या भरोसा !
क्या मालूम अगली बार उसने आपको क्या परोसा !!

एक साहब बहादुर बैठे थे सपरिवार
हमने पुछा कहाँ जा रहे हैं सरकार ?
वे झल्लाकर बोले जहन्नुम में !
हमने पूछ लिया - विथ फॅमिली ?
वे बोले आपको भी मजाक करने के लिए यही जगह मिली ?
अचानक डिब्बे में बड़ी जोर का हल्ला हुआ
एक सज्जन दहाड़ मार कर चिल्लाये -
पकड़ो-पकड़ो जाने न पाए
हमने पुछा क्या हुआ, क्या हुआ ?
वे बोले - हाय-हाय, मेरा बटुआ किसी ने भीड़ में मार दिया
पूरे तीन सौ रुपये से उतार दिया टिकट भी उसी में था !
कोई बोला - रहने दो यार भूमिका मत बनाओ
टिकेट न लिया हो तो हाथ मिलाओ
हमने भी नहीं लिया है गर आप इस तरह चिल्लायेंगे
तो आपके साथ क्या हम नहीं पकड़ लिए जायेंगे ....
वे सज्जन रोकर बोले - नहीं भाई साहब
मैं झूठ नहीं बोलता मैं एक टीचर हूँ ....
कोई बोला - तभी तो झूठ है टीचर के पास और बटुआ ?
इससे अच्छा मजाक इतिहास मैं आज तक नहीं हुआ !
टीचर बोला - कैसा इतिहास मेरा विषय तो भूगोल है
तभी एक विद्यार्थी चिल्लाया - बेटा इसलिए तुम्हारा बटुआ गोल है !

बाहर से आवाज आई - 'गरम समोसे वाला'
अन्दर से फ़ौरन बोले एक लाला - दो हमको भी देना भाई
सुनते ही ललाइन ने डाँट लगायी - बड़े चटोरे हो !
क्या पाँच साल के छोरे हो ?
इतनी गर्मी मैं खाओगे ?
फिर पानी को तो नहीं चिल्लाओगे ?
अभी मुँह मैं आ रहा है समोसे खाते ही आँखों में आ जायेगा
इस भीड़ में पानी क्या रेल मंत्री दे जायेगा ?
तभी डिब्बे में हुआ हल्का उजाला
किसी ने जुमला उछाला ये किसने बीड़ी जलाई है ?
कोई बोला - बीड़ी नहीं है स्वागत करो
डिब्बे में पहली बार बिजली आई है
दूसरा बोला - पंखे कहाँ हैं ?
उत्तर मिला - जहाँ नहीं होने चाहिए वहाँ हैं
पंखों पर आपको क्या आपत्ति है ?
जानते नहीं रेल हमारी राष्ट्रीय संपत्ति है
कोई राष्ट्रीय चोर हमें घिस्सा दे गया है
संपत्ति में से अपना हिस्सा ले गया है
आपको लेना हो आप भी ले जाओ
मगर जेब में जो बल्ब रख लिए हैं
उनमें से एकाध तो हमको दे जाओ !

अचानक डिब्बे में एक विस्फोट हुआ
हलाकि यह बम नहीं था
मगर किसी बम से कम भी नहीं था
यह हमारा पेट था उसका हमारे लिए संकेत था
कि जाओ बहुत भारी हो रहे हो हलके हो जाओ
हमने सोचा डिब्बे की भीड़ को देखते हुए
बाथरूम कम से कम दो किलोमीटर दूर है
ऐसे में कुछ हो जाये तो किसी का क्या कसूर है
इसिलए रिस्क नहीं लेना चाहिए
अपना पडोसी उठे उससे पहले अपने को चल देना चाहिए
सो हमने भीड़ में रेंगना शुरू किया
पूरे दो घंटे में पहुँच पाए
बाथरूम का दरवाजा खटखटाया तो भीतर से एक सिर बाहर आया
बोला - क्या चाहिए ?
हमने कहा - बाहर तो आजा भैये हमें जाना है
वो बोला - किस किस को निकालोगे ? अन्दर बारह खड़े हैं
हमने कहा - भाई साहब हम बहुत मुश्किल में पड़े हैं
मामला बिगड़ गया तो बंदा कहाँ जायेगा ?
वो बला - क्यूँ आपके कंधे
पे जो झोला टँगा है
वो किस दिन काम में आयेगा ...
इतने में लाइट चली गयी
बाथरूम वाला वापस अन्दर जा चुका था
हमारा झोला कंधे से गायब हो चुका था
कोई अँधेरे का लाभ उठाकर अपने काम में ला चुका था

अचानक गाड़ी बड़ी जोर से हिली
एक यात्री ख़ुशी के मरे चिल्लाया - 'अरे चली, चली'
कोई बोला - जय बजरंग बली, कोई बोला - या अली
हमने कहा - काहे के अली और काहे के बली !
गाड़ी तो बगल वाली जा रही है
और तुमको अपनी चलती नजर आ रही है ?
प्यारे ! सब नज़र का धोखा है
दरअसल ये रेलगाडी नहीं हमारी ज़िन्दगी है
और हमारी ज़िन्दगी में धोखे के अलावा और क्या होता है ?



वैसे प्रदीप जी कवि सम्मेलनों में अपनी ये कविता संपादित करकर सुनाते रहे हैं। तो लीजिए सुनिए उन्हीं की आवाज़ में ये कविता..



तो होली के हुड़दंग में आप सभी रंग अबीर से सराबोर रहें इन्हीं शुभकामनाओं के साथ ! आप सब को होली मुबारक!

मंगलवार, फ़रवरी 23, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 9 - बड़े से शहर में छोटे छोटे घर में...

गीतमाला की नवीं सीढी पर स्वागत करें इस प्यारे से गीत का जिसमें मेलोडी है, सुकून देने वाला संगीत है, दिल छूने वाला मुखड़ा है और साथ ही है एक नए गायक का स्वर। मुझे यकीं है कि इस गीत को आप में से ज्यादातर ने नहीं सुना होगा। जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में इशारा किया था कि डरावनी फिल्मों के संगीत पर हमारा ध्यान सामान्यतः कम ही जाता है।

इस साल एक ऍसी ही फिल्म आई थी 13B। फिल्म का संगीत दिया था शंकर एहसान लॉय ने और उनके इस गीत ने पहली बार सुनने में ही मेरा दिल जीत लिया था।

गीतकार नीलेश मिश्रा जो हिंदुस्तान टाइम्स में पत्रकार, एक घुमक्कड़ और एक अनियमित ब्लॉगर भी हैं ने इस गीत के लिए जो मुखड़ा रचा है उसकी काव्यत्मकता और धनात्मक उर्जा मूड बना देती है या यूँ कहें कि इसे सुनकर आप खुद ब खुद अच्छा महसूस करने लगते हैं।

आँखों से बचाकर, लो रखो छुपाकर,
प्यार को कभी किसी की नज़र ना लगे
चाँद को चुराकर, माथे पे सजाकर
हौले चलना रात को खबर ना लगे
सितारे ढूँढ लाए हैं अँधेरों पे सजाए हैं
जैसे दीवाली की हो रात जिंदगी....


पर इस गीत के नवीं पॉयदान पर होने की एक वज़ह मेरे लिए निजी है। दरअसल नीचे के अंतरा मुझे उन लमहों से जोड़ता है जो मैंने बिहार के छोटे छोटे शहरों गया, सासाराम और आरा में रहने के बाद पटना आकर आफिसर्स हॉस्टल में बिताए। दो कमरों के उस छोटे से घर में बिताए जिंदगी के वो 16 साल जिसमें मुझे जिंदगी की खुशियाँ भी मिलीं और कुछ ग़म भी जो शायद जीवन पर्यन्त मेरे साथ रहें।

उस छोटे से घर में रहते हुए मेरे पहले याद रहने वाले दोस्त बनें, पहली बार दिल फिसला, जहाँ की बॉलकोनी से मैंने कितनी रातों को घंटों चाँद सितारों से मौन वार्तालाप किया। वो प्यारी दीपावली, स्कूल से रुसवा होना, भूकंप की भगदड़ और यहाँ तक की इंजीनियरिंग की परीक्षा में सफल होने की घोषणा करता वो अखबार उसी घर में तो आया था। इस लिए जब भी घर में ये गीत बजता है मैं इन पंक्तियों को बड़े मन से गाता हूँ

बड़े से शहर में छोटे छोटे घर में
इतनी ही खुशियाँ वो उनको रखने का हक़
प्यार मुस्कुराहट सपनों की आहट
जो भी माँगा मिल गया


आगे का अंतरा फिल्म की परिस्थितियों से जुड़ा है
आज कल इक नन्हे
मेहमाँ से बाते करो ख्वाबों में
दोनों कहानियाँ बनाते झूठी सच्ची है बताते
मैंने कल, उससे कहा
यार अब आ भी जाओ घर कभी
भीगने से ना तुम डरना
खुशियों की है बरसातें


सितारे ढूँढ लाए हैं अँधेरों पे सजाए हैं
जैसे दीवाली की हो रात जिंदगी....
बड़े से शहर में छोटे छोटे घर में
इतनी ही खुशियाँ वो उनको रखने का हक़
प्यार मुस्कुराहट सपनों की आहट
जो भी माँगा मिल गया



गीत तो आपने सुन लिया और मेरे उद्गार भी पढ़ लिए अब ये बताइए कि ये गीत गाया किसने हैं। चलिए मैं ही बता देता हूँ इस गीत के गायक हैं कार्तिक। चित्र में बाँयी तरफ़ है गीतकार नीलेश और दाँयी ओर कार्तिक।



श्रीनिवास, विजय प्रकाश, राशिद अली, चिन्मया, नरेश अय्यर की तरह कार्तिक भी रहमान भक्त हैं और इन गायकों की तरह ही हिंदी फिल्म संगीत में प्रवेश करने का मौका कार्तिक को रहमान ने ही दिया। स्कूल में ही कर्नाटक संगीत सीखने वाले कार्तिक ने कॉलेज में अपने बैंड के लिए गाते रहे। रहमान के संपर्क में गायक श्रीनिवास की मदद से आए। साथिया, युवा, गज़नी और युवराज के कुछ गीत वे गा चुके हैं। पिछले साल उनका फिल्म गज़नी के लिए गाया गीत बहका मैं बहका.... काफी लोकप्रिय हुआ था।



वार्षिक संगीतमाला 2009 अब लेगी एक हफ्ते का विश्राम। होली के माहौल में अगली सीढ़ी पर बजने वाले ग़मगीन गीत से मैं आपको अभी मिलवाना नहीं चाहता। होली की मस्ती में आपको सराबोर करने के लिए अगली पोस्ट में सुनिएगा मेरी आवाज़ में एक मशहूर पाकिस्तानी शायर का रस भरा गीत। तो गुरुवार तक के लिए दीजिए इज़ाजत..

रविवार, फ़रवरी 21, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 10 - कैसे बताएँ, क्यूँ तुझको चाहें, यारा बता न पाएँ...

वक्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला की अंतिम दस सीढियों को चढ़ने का। ये दसों नग्मे सुनने में बहुत प्यारे हैं। ये जरूर है कि इनमें से कुछ एक खास मूड में ज्यादा भले लग सकते हैं। इन दस में से छः गीत ऐसे हैं जो आप सब ने पिछले साल खूब सुने होंगे और बाकी ऐसे जिन्हें आपने कम या बहुत कम सुना होगा।

तो बात दसवीं पॉयदान के गीत की जिसने पिछले साल के अंत में आकर कुछ ही समय में सबके दिल में घर कर लिया। मज़े की बात है कि संगीतकार प्रीतम ने इस गीत को तीन अलग अलग गायकों से गवाया। एक में कैलाश खेर थे तो दूसरे में सोहम चक्रवर्ती पर सबसे ज्यादा सुनने में आया आतिफ असलम वाला वर्सन। गीत तो आप पहचान ही गए होंगे इसलिए ये कहने की जरूरत अब नही पड़ेगी कि तू जाने ना...

सवाल ये है कि आतिफ असलम (जो हर साल बस एक या दो फिल्में करते हैं) के गीत भारत में इतने लोकप्रिय क्यूँ हो जाते हैं जबकि गायिकी के लिहाज़ से हमारे सारे वरिष्ठ गायक उनसे बीस ही हैं?

इसका उत्तर जानने के लिए किसी संगीतप्रेमी को ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दरअसल आतिफ़ असलम और कई अन्य पाकिस्तानी गायकों की लोकप्रियता की मुख्य वज़ह उनकी आवाज़ का यहाँ के गायकों की अपेक्षा 'अलग' तरह का होना है। इसी टोनल क्वालिटी के चलते उनकी आवाज़ का असर सुनने वाले पर शीघ्र होता है। वैसे क्या आपको पता है कि आतिफ़ असलम बचपन में एक गायक की जगह इमरान खाँ जैसा तेज गेंदबाज बनना चाहते थे। वो किस्सा मैंने आपके साथ बाँटा था वार्षिक संगीतमाला 2006 के दौरान जब आतिफ़ पहली बार मेरी किसी संगीतमाला का हिस्सा बने थे।

बहरहाल अजब प्रेम की गजब कहानी की चौपट कहानी को अगर किसी ने सँभाला तो वो था इसका कर्णप्रिय संगीत। इस गीत में आतिफ़ असलम का असर तो अपनी जगह है ही पर गीत की शुरुआत का कोरस भी मन को मोहता है। वैसे इरशाद क़ामिल ने भी इस गीत के माध्यम से कुछ ऐसे प्रश्न उठाए है जो हर किशोर और युवा इंसान की ज़िंदगी में कभी ना कभी उमड़ते घुमड़ते हैं ही।

यानि वही चिर शाश्वत प्रश्न कि कोई अचानक ही इतना अच्छा हमें क्यूँ लगने लगता है? और जब वो लगने ही लगता है तो चाहकर भी हम अपनी बात को उस तक पहुँचाने में इतना असहाय सा क्यूँ महसूस करते हैं? और फिर मन ही मन उससे सवाल करते हें और फिर अपने ही मन से उधर का जवाब भी पा जाते हैं। कभी ये काल्पनिक जवाब होठों पर अनायास ही मुस्कुराहट ले आते हैं तो कभी ढेर सारा ग़म! और फिर अपनी मानसिक स्थिति को अपने तक सीमित रखकर हम ये भी कहने से नहीं चूकते कि तू जाने ना...।

तो आइए एक बार फिर सब मिल जुल कर गुनगुनाएँ इस बेहद रोमांटिक गीत को





कैसे बताएँ
क्यूँ तुझको चाहें
यारा बता न पाएँ
बातें दिलों की
देखो जो बाकी
आके तुझे समझाएँ
तू जाने ना ...तू जाने ना

मिल के भी, हम न मिले
तुमसे न जाने क्यूँ, मीलों के
हैं फासले तुमसे न जाने क्यूँ
अनजाने हैं सिलसिले
तुमसे न जाने क्यूँ, सपने हैं
पलकों तले तुमसे न जाने क्यूँ

कैसे बतायें
क्यूँ तुझको चाहें
यारा बता न पायें
बातें दिलों की
देखो जो बाकी
आके तुझे समझाएँ
तू जाने ना तू जाने ना

आ .......
निगाहों में देखो
मेरी जो है बस गया
वो है मिलता तुमसे हू-ब-हू
ओ हो ओ
जाने तेरी आँखें थी
या बातें थी वजह
हुए तुम जो दिल की आरज़ू
तुम पास हो के भी
तुम आस हो के भी
एहसास हो के भी
अपने नहीं, ऐसे हैं
हमको गिले
तुमसे न जाने क्यूँ, मीलों के
हैं फासले तुमसे न जाने क्यूँ ऊँ ऊँ ऊँ ...
तू जाने ना तू जाने ना....

ऊ ... जाने ना जाने ना जाने ना
हा आ आ... तू जाने ना
ख्यालों में लाखों बातें,
यूँ तो कह गया
बोला कुछ न तेरे सामने
ओ ओ ... हुए न बेगाने भी
तुम हो के और के
देखो तुम न मेरे ही बने
अफ़सोस होता है, दिल भी ये रोता है
सपने सँजोता है, पगला हुआ, सोचे ये
हम थे मिले तुमसे न जाने क्यूँ
मीलों के, हैं फासले तुमसे न जाने क्यूँ
अनजाने, हैं सिलसिले
तुमसे न जाने क्यूँ, सपने हैं
पलकों तले तुमसे न जाने क्यूँ
हो ओ ओ ओ ...

कैसे बतायें
क्यूँ तुझको चाहें
यारा बता न पाएँ
बातें दिलों की
देखो जो बाकी
आके तुझे समझायें
तू जाने ना तू जाने ना....




तो चलिए मंगलवार को आपसे फिर मिलेंगे इस गीतमाला के अगले गीत से जिसे शायद आपने पहले ना सुना हो। भला भुतहा फिल्मों के गीतों पर कोई ध्यान देता है क्या? :)

गुरुवार, फ़रवरी 18, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 11 -बावली सी प्रीत मोरी अब चैन कैसे पावे,आजा रसिया मोहे अंग लगा ले ...

वार्षिक संगीतमाला की ग्यारहवीं पॉयदान का गीत एक ऐसा गीत हे जिससे शायद आप अभी तक अनजान हों। वैसे तो ये गीत जिस फिल्म से है उसका विभिन्न चैनलों पर काफी प्रमोशन किया गया था। पर प्रमोशन के दौरान इस गीत के बजाए अन्य गीतों को ज्यादा तरज़ीह दी गई। इस गीत की गायिका का फिल्मों के लिए गाया ये सिर्फ तीसरा गीत है। पर इनकी गायिकी का कमाल देखिए कि पिछले साल अपने पहले गीत के लिए इन्हें फिल्मफेयर एवार्ड के लिए नामित कर दिया गया।


आप भी सोच रहे होंगे कि ये बंदा पहेलियाँ ही बुझाता रहेगा या गायिका का नाम भी बताएगा। तो चलिए आपकी उत्सुकता भी शांत किए देते हैं। ये गायिका हैं श्रुति पाठक जिनका फैशन फिल्म के लिए गाया गीत मर जावाँ... बेहद लोकप्रिय हुआ था और पिछले साल मेरी संगीतमाला की 16 वीं पॉयदान पर बजा भी था। पर उस पोस्ट में श्रृति के बारे में आपसे ज्यादा बातें नहीं हो पाई थीं।

27 वर्षीय श्रुति पाठक गुजरात से ताल्लुक रखती हैं। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा श्रुति ने अपने गुरु दिवाकर ठाकुर जी से अहमदाबाद में ली। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो मुंबई आ गईं। फिलहाल वो सुनील गुरगावकर से संगीत की शिक्षा ले रही हैं। यूँ तो श्रुति का नाम फैशन फिल्म के संगीत रिलीज होने के बाद चमका पर उन्हें गाने का पहला मौका ले के पहला पहला प्यार... के रीमिक्स वर्सन (एलबम - बेबी डॉल) को गाने में मिला था। अगला मौका मिलने में श्रुति को 3 साल लग गए और इसके लिए नवोदित संगीतकार अमित त्रिवेदी से उनकी जान पहचान काम आई जिन्होंने फिल्म Dev D में उन्हें गाने का मौका दिया।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि श्रुति गाने के साथ साथ गीत लिखने का शौक भी रखती हैं। देव डी के गीत पायलिया .... को गाने के साथ उसे अपनी कलम से सँवारने का काम भी उन्होंने किया। श्रुति सोनू निगम की जबरदस्त प्रशंसक हैं और रोज़ कम से कम दो घंटे का समय रियाज़ में देती हैं।

आखिर क्या खास है श्रुति की आवाज़ में.. कुछ ऐसा कि आप उस आवाज़ की गहराइयों में डूबते चले जाएँ। ऐसी आवाज़ रूमानियत भरे नग्मों को आपकी संवेदनाओं के काफी करीब ले जाने की क्षमता रखती है। इसीलिए फैशन के बास फिल्म कुर्बान में जब संगीतकार सलीम सुलेमान के सामने एक शादी शुदा जोड़े के बीच प्रणय दृश्य की परिस्थिति आई तो एक बार फिर उन्होंने श्रुति पाठक को ही चुना। और श्रृति ने गीतकार प्रसून जोशी के शब्दों में निहित भावनाओं को बखूबी अपनी आवाज़ के साँचे में ढाल कर श्रोताओं तक पहुँचा दिया।

तो आइए सुनें कुर्बान फिल्म का ये गीत।



ओ रसिया...रसिया..

बावली सी प्रीत मोरी
अब चैने कैसे पावे
आ जा रसिया मोहे
अंग लगा ले

अंग लगा ले..अंग लगा ले

गेसुओं सी काली रतियाँ
अधरों पे काँपे बतियाँ
सांवली सी साँसे मोरी
अरज सुनावें
आके मोरी श्वेत प्रीत पे
रंग सजा दे

बावली सी प्रीत मोरी ....





और हाँ अगर पहले अंतरे के बाद की आवाज़ आपको अलग तरह की लगे तो बता दूँ कि गीत के बीच की ये पंक्तियाँ करीना कपूर ने पढ़ी हैं।
तन एक, जाँ एक
अपना खूँ ज़हाँ एक
ऐसे लिपटे रुह से रुह
कि हो जाए ईमाँ एक...


आशा है श्रुति की इस खास आवाज़ का फ़ायदा संगीतकार आगे भी उठाते रहेंगे जिससे हम जैसे संगीतप्रमियों को उनकी आवाज़ के अन्य आयामों का भी पता चल सके।

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पॉयदान संख्या 12 -जैसे के दिन से रैन अलग है,सुख है अलग और चैन अलग है

पहले लखनऊ और फिर पटना में शादियों में शिरकत करने और कुछ ब्लॉगर दोस्तों से दिलचस्प मुलाकातों के सिलसिले को निबटाते हुए वापस आ गया हूँ अपनी इस वार्षिक संगीतमाला की ऊपर की 12 सीढ़ियों को चढ़ने। इस क्रम में पहला यानि 12वीं पॉयदान का गीत एक ऐसा गीत है जो कि राग भैरवी पर आधारित है। इस गीत को लिखा जावेद अख्तर साहब ने, इसकी धुन बनाई संगीतकार तिकड़ी शंकर एहसान लॉय ने और इसे अपनी आवाज़ से सँवारा शंकर महादेवन ने। फिल्म का नाम तो आप पहचान ही गए होंगे। जी हाँ ये फिल्म थी जोया अख्तर द्वारा निर्देशित 'लक बाई चांस'। इसी फिल्म का शेखर की आवाज़ में गाया गीत संगीतमाला की 22 वीं पॉयदान पर पहले ही बज चुका है।



वैसे निर्देशिका जोया अख्तर का कहना था कि गर उनका बस चलता तो इस फिल्म के सारे गीत शंकर महादेवन से ही गवा लेती। वहीं गायक शंकर महादेवन कहते हैं कि कुछ गीत ऐसे होते हैं जिन्हें मन में बैठने में वक़्त लगता है। पश्चिमी वाद्य यंत्रों ड्रम्स, बेस के बैकग्राउंड और राग भैरवी में ठुमरी स्टाइल गायिकी के स्ममिश्रण से बना गीत इसी श्रेणी में आता है। इस गीत के जिन हिस्सों में शास्त्रीयता का पुट अधिक है वो मन को गहरा सुकून देते हैं। जावेद साहब ने ऐसे रूपको का इस्तेमाल किया जो गीत की शास्त्रीयता से मेल खाए।

फिल्म उद्योग में जब भी कोई कलाकार कदम रखता है तो सबसे पहले उसे काम पाने के लिए विभिन्न स्टूडिओ में आडिशन देना पड़ता है। पहली बार कैमरे के सामने की घबराहट, ठुकराए जाने के डर से लेकर सफल होने की आशा इन सभी मिश्रित भावनाओं से हर अभिनेता को गुजरना पड़ता है।

पर जावेद अख्तर सफल होने की इस सर्वव्यापी चाह और उसे पाने के लिए अपने सभी मूल्यों को दाँव पर लगाने की प्रवृति पर चोट करते हुए बेहद वाज़िब परंतु कठिन प्रश्न करते हैं। जावेद साहब हम सब के समाने ये सवाल करते हैं कि
सिर्फ अपना लक्ष्य पूरा करने से सुख की अनुभूति तो आती है पर क्या दिल में चैन आ जाता है?
सुख हमारे से बाहर हैं या इसकी तलाश दिल के अंदर करनी चाहिए ?
हमने अपने जीवन में सुख के मापदंड बना रखे हैं वो क्या मन को सुकून देने वाले होते हैं?


तो आइए सुनें इस गीत में शंकर महादेवन की लाजवाब गायिकी को..




बगिया-बगिया बालक भागे,तितली फिर भी हाथ ना लागे!
इस पगले को कौन बताये,
ढूँढ रहा है जो तू जग मैं,कोई जो पाये तो मन में ही पाए!
सपनों से भरे नैना, तो नींद है न चैना!


ऐसी डगर कोई अगर जो अपनाए,
हर राह के वो अंत पे रस्ता ही पाए!
धूप का रस्ता जो पैर जलाए,
मोड़ तो आए छाँव ना आए,
राही जो चलता है चलता ही जाए,
कोई नही है जो कहीं उसे समझाए!

सपनों से भरे नैना,
तो नींद है ना चैना!
नैना रे नैना रे......

दूर ही से सागर जिसे हर कोई माने,
पानी है वो या रेत है ये कौन जाने,
जैसे के दिन से रैन अलग है,
सुख है अलग और चैन अलग है,
पर जो ये देखे वो नैन अलग है,
चैन तो है अपना सुख हैं पराए!


सपनों से भरे नैना,
तो नींद है न चैना.....



पर ना तो आदमी सफल होने की इच्छा छोड़ सकता है ना इसे पाने के लिए होने वाली जद्दोज़हद से दूर रह सकता है। सफल होने की चाह ही तो शायद जिंदगी का टॉनिक है जो हमें विषम परिस्थियों में भी जूझने के लिए प्रेरित करता रहता है। इस गीत की शूटिंग के दौरान अपनी किस्मत आज़माने आए एक कलाकार द्वारा कहा गया ये शेर सब कुछ कह जाता है...

कि दिल मे चुभ जाएँगे जब अपनी जुबाँ खोलेंगे
हम भी शहर में काँटों की दुकाँ खोलेंगे
और शोर करते रहे गलियों में हजारों सूरज
धूप निकलेगी तो हम भी अपना मकाँ खोलेंगे

 

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इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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