शनिवार, अक्टूबर 22, 2016

सतपुड़ा के घने जंगल, नींद मे डूबे हुए से ऊँघते अनमने जंगल

कविताएँ तो स्कूल के ज़माने में खूब पढ़ीं। कुछ खूब पसंद आतीं तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़तीं। सतपुड़ा के घने जंगल भी पसंद ना आने वाली कविताओं में ही एक थी। एक तो थी भी इतनी लंबी। दूसरे तब ये समझ के बाहर होता था कि किसी जंगल पर भी इतनी लंबी कविता लिखी जा सकती है। किसी जंगल में घूमना विचरना ही उस छोटी उम्र में  हुआ ही कहाँ था? फिर भी परीक्षा के ख़्याल से ही कुछ रट रटा के ये पाठ निकालने की फिराक़ में थे कि घास पागल, कास पागल, शाल और पलाश पागल, लता पागल, वात पागल, डाल पागल, पात पागल पढ़कर हमने ये निष्कर्ष निकाल लिया था कि या तो ये कवि पागल था या इस कविता का मर्म समझते समझते हम ही पागल हो जाएँगे।


आज से ठीक दस साल पहले मुझे पचमढ़ी जाने का मौका मिला और वहाँ सतपुड़ा के घने जंगलों से पहली बार आमना सामना हुआ। अप्सरा, डचेस और बी जैसे जलप्रपातों तक पहुँचने के लिए हमें वहाँ के जंगलों के बीच अच्छी खासी पैदल यात्रा करनी पड़ी। सच कहूँ तब मुझे पग पग पर भवानी प्रसाद मिश्र की ये कविता याद आई और तब जाकर बुद्धि खुली कि कवि ने क्या महसूस कर ये सब रचा होगा। सतपुड़ा के जंगल के बीच बसे पचमढ़ी से जुड़े यात्रा वृत्तांत में मैंने जगह जगह इस कविता के विभिन्न छंदो को अपने आस पास सजीव होता पाया... 
"सतपुड़ा के हरे भरे जंगलों में एक अजीब सी गहन निस्तब्धता है। ना तो हवा में कोई सरसराहट, ना ही पंछियों की कोई कलरव ध्वनि। सब कुछ अलसाया सा, अनमना सा। पत्थरों का रास्ता काटती पतली लताएँ जगह जगह हमें अवलम्ब देने के लिये हमेशा तत्पर दिखती थीं। पेड़ कहीं आसमान को छूते दिखाई देते थे तो कहीं आड़े तिरछे बेतरतीबी से फैल कर पगडंडियों के बिलकुल करीब आ बैठते थे।.."

अगर इन जंगलों की प्रकृति के बारे में आपकी उत्सुकता हो तो आप उस आलेख को यहाँ पढ़ सकते हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र जी मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले से ताल्लुक रखते थे। गाँधीवादी थे सो कविताओं के साथ आजादी की लड़ाई में भी अपना योगदान निभाते रहे। कविताएँ तो हाईस्कूल से ही लिखनी शुरु कर चुके थे।  गीत फरोश, चकित है दुख, गान्धी पंचशती, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल सन्ध्या जैसे कई काव्य संग्रह उनकी लेखनी के नाम है। बुनी हुई रस्सी के लिए वो 1972 में साहित्य अकादमी पुरस्कार  से सम्मानित हुए उनकी कविताएं भाषा की सहजता और गेयता के लिए जानी जाती थीं। कविताओं में सहज भाषा के प्रयोग की हिमायत करती उनकी ये उक्ति बार बार याद की जाती है....

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।

है ना पते की बात। वही कविता जिसका सिर पैर मुझे समझ नहीं आता था, अब मेरी प्रिय हो गई है। इसीलिए आज मैंने इस कविता को अपनी आवाज़ में रिकार्ड किया है। आशा है आप इसे सुनकर मुझे बताएँगे कि मेरा ये प्रयास आपको कैसा लगा?



सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊँचे और नीचे,
चुप खड़े हैं आँख मींचे,
घास चुप है, कास चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है।
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
ऊँघते अनमने जंगल।
सतपुड़ा के घने जंगल पचमढ़ी शहर के करीब

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढक रहे-से
पंक-दल मे पले पत्ते।
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने-घने जंगल
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी-उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैर को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाएँ।
सांप सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ
लताओं के बने जंगल
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
सतपुड़ा के जंगल डचेस फॉल ले रास्ते में

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सर के बाल मुँह पर
मच्छरों के दंश वाले,
दाग काले-लाल मुँह पर,
वात- झन्झा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल|

अजगरों से भरे जंगल  
अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े-छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कम्प से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के खूब भीतर,
चार मुर्गे, चार तीतर
पाल कर निश्चिन्त बैठे,
विजनवन के बीच बैठे,
झोंपडी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले।
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके, बोल इनके
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।
हांडी खोह, पचमढ़ी

जागते अँगड़ाइयों में,
खोह-खड्डों खाइयों में,
घास पागल, कास पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल
मत्त मुर्गे और तीतर,
इन वनों के खूब भीतर।

क्षितिज तक फैला हुआ-सा,
मृत्यु तक मैला हुआ-सा,
क्षुब्ध, काली लहर वाला
मथित, उत्थित जहर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला
शम्भु और सुरेश वाला
एक सागर जानते हो,
उसे कैसा मानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल|

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले।
लाख पंछी सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बन-फूल, फलियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय
सतपुड़ा के घने जंगल,
लताओं के बने जंगल।

मंगलवार, अक्टूबर 18, 2016

जॉन डेनवर का एक प्यारा सा नग्मा Annie's Song : You fill up my senses...

कॉलेज के ज़माने के बाद अंग्रेजी  गीतों को सुनना थम सा ही गया है। पहले भी दोस्तों की सिफ़ारिश पर ही पॉप या रॉक सुनना हो पाता था। मज़ा ही आता था खासकर अगर बोल भी अच्छे हों। अब तो अंग्रेजी सुनने वाले दोस्त आस पास रहे नहीं तो पाश्चात्य संगीत सुन भी कम पाता हूँ। अब देखिए ना इन जॉन डेनवर को मैं कहाँ जान पाता गर मेरे एक मित्र ने इनका ये बेहद प्यारा सा नग्मा मुझे ना सुनाया  होता।

चालीस के दशक में अमेरिका के न्यू मेक्सिको में जन्मे जॉन डेनवर, बॉब डिलन के समकालीन थे। वही बॉब डिलन जिन्हें बतौर गीतकार इस साल के नोबल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। डिलन की तरह जॉन कभी समीक्षकों के चहेते नहीं रहे पर सत्तर के दशक में लिखे और गाए उनके गीत अमेरिका में खासे लोकप्रिय हुए।

सेना के बड़े ओहदे पर काम करने वाले अक्खड़ पिता से जॉन को वो प्यार नहीं मिल पाया जिनकी उन्हें उम्मीद थी। पिता के निरंतर होते तबादले से उन्हें कोई स्थायी मित्र मंडली भी नहीं मिली। दादी ने ग्यारह साल की उम्र में गिटार थमा कर उनकी जैसे तैसे चल रही पढ़ाई में एक जान सी फूँक दी। सत्तर की शुरुआत में उनके गीत Take Me Home, Country Roads से सफलता का पहला स्वाद उन्होंने चखा। फिर तो   Sunshine on My Shoulders", "Annie's Song", "Thank God I'm a Country Boy", और "I'm Sorry जैसे हिट गीतों की बदौलत वो सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ते चले गए।

जॉन डेनवर और एनी
मैं आपको उनके इन चर्चित गीतों में से आज वो नग्मा सुनाने जा रहा हूँ जिसे Annie's Song के नाम से जाना जाता  है।  ये एक बेहद रोमांटिक गीत है जिसे उन्होंने अपनी  पहली पत्नी एनी मार्टेल डेनवर के लिए लिखा था । ये गीत तुरत फुरत में तब लिखा गया था जब कोलेरेडो के एक पहाड़ पर स्काई लिफ्ट से जाते हुए उनका अपनी पत्नी से झगड़ा हुआ था। बाद में जब उनके मित्र ने इस गीत की एक दूसरी सिम्फनी से समानता की बात डेनवर को  बताई तो उन्होंने शुरू के पांच सुर वही रखते हुए पियानो पर घंटे भर में पूरी धुन ही बदल दी।  तो आइये रूबरू हो लें पहले गीत की  शब्द रचना से

You fill up my senses like a night in the forest,
like the mountains in springtime, like a walk in the rain,
like a storm in the desert, like a sleepy blue ocean.
You fill up my senses, come fill me again.

Come let me love you, let me give my life to you,
let me drown in your laughter, let me die in your arms,
let me lay down beside you, let me always be with you.
Come let me love you, come love me again.

You fill up my senses like a night in the forest,
like the mountains in springtime, like a walk in the rain,
like a storm in the desert, like a sleepy blue ocean.
You fill up my senses, come fill me again. 



तुम इस तरह मेरी चेतना में समा जाते हो जैसे कोई जंगल हो रात के आगोश में
जैसे वसंत में खिले हुए पहाड़, जैसे बारिश की गिरती बूँदो को चलते हुए महसूस करना
रेगिस्तान में कोई तूफ़ान हो जैसे या जैसे उनींदा सा नीला समन्दर
मेरी  चेतना में समाने वाले, एक बार फिर तुम मुझे उसी अहसास से भर दो

मेरे करीब आओ ज़रा तुम्हें प्यार तो कर लूँ, ख़ुद को न्योछावर कर दूँ तुम पर
तुम्हारी हँसी की खनक मेरे कानों में बजती रहे, ज़िंदगी का आख़िरी लमहा तुम्हारी बाहों में बीते
अपनी बगल में लेटने दो ना मुझे, मेरी तो बस यही तमन्ना है कि हमेशा तुम्हारे साथ रहूँ
पास आओ मुझे प्यार तो करने दो, या तुम्हीं मुझे प्यार करो.. फिर से...


ये गीत तो खूब चला पर गीतकार और उनकी प्रेरणा ज्यादा दिन इकठ्ठे नहीं रहे। बड़ी तिक्तता रही उनके रिश्तों में तलाक के पहले। कभी कभी लगता है कि प्रेम लमहों में ही हो के रह जाता है और लमहा जिंदगी से कब निकल जाता है पता ही नहीं लगता। बहुत कुछ गुलज़ार के उस गीत की तरह जहाँ वो कहते हैं इक बार वक़्त से लमहा गिरा कहीं, वहाँ दास्ताँ मिली लमहा कहीं  नहीं..

डेनवर का संगीत सहज था, लोगों के दिल में आसानी से जगह बनाने वाला। पर समीक्षकों ने उन्हें कभी वो सम्मान नहीं दिया इसीलिए वो साक्षात्कारों से बचते रहे। अपने एक दुर्लभ इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मैं कोई बॉब डिलन नहीं हूँ। मैं उस तरह के गीत नहीं लिखता। पर पच्चीस साल बाद भले लोग मेरे नाम याद ना रखें मेरे गीतों को जरूर याद रखेंगे।

डेनवर का कहना था कि मैं लोगों को बताना चाहता हूँ कि दुनिया के इस पागलपन, आतंक और समस्याओ् के बीच में भी ये ज़िदगी जीने लायक है। मुझे ज़िदगी से प्यार है। तमाम दुखों के बीच मैं प्रेम और इस जीवन के बारे में जो महसूस करता हूँ उसे लोगों से बाँटना चाहता हूँ। तिरपन साल की उम्र में डेनवर एक विमान दुर्घटना में चल बसे। चलते चलते उनके इसी गीत की बाँसुरी पर बजाई गई धुन जरूर सुनिएगा। फिर आप शायद ही इस गीत को भूल  पाएँ...
 

गुरुवार, अक्टूबर 06, 2016

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये... घुम भूलेछी Hum Bekhudi mein tumko .. Ghum bhulechhi nijhum

सन 1958 में इक फिल्म आई थी काला पानी। नवकेतन का बैनर था और फिल्म के संगीतकार थे, देव आनंद के दिलअजीज़ सचिन देव बर्मन। बतौर नायक देव आनंद ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था। फिल्म का संगीत भी काफी मशहूर हुआ था। ये वो दौर था जब सचिन दा और लता दी के बीच की अनबन ज़ारी थी। यही वज़ह थी  कि फिल्म में नायिका के सभी गीत आशा जी ने गाए थे। देव आनंद और मधुबाला की मीठी नोंक झोंक से भरा  गीत अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना को तो लोग आज भी याद करते हैं। वहीं नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर..होठों पर एक मुस्कुराहट जरूर ले आता है। पर इस फिल्म का सबसे शानदार नग्मा था मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। याद आया ना आपको हाँ वही हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये।


पर जानते हैं इस गीत की धुन सचिन दा ने कब रची थी? फिल्म के रिलीज़ होने के करीब एक साल पहले। दरअसल बंगाल में ये परंपरा रही है कि वहाँ के संगीतकार हर साल दुर्गा पूजा के समय अपनी नई धुनों के साथ एक एलबम जरूर निकालते थे। सन 1957 के दशहरे में रिलीज़  किये गए एलबम के  एक गीत के बोल थे ..घुम भूलेची निझुम इ निशिथे जेगे थाकी और इन्हें लिखा था गौरीप्रसाद मजुमदार ने।सचिन दा ने अपनी इस  संगीतबद्ध रचना को खुद ही आवाज़ दी थी । तो सचिन दा की आवाज़ में इस गीत  को सुनने के पहले क्यूँ ना इस गीत के भावों से आपका परिचय करा दिया जाए?

घुम भूलेछी  निझुम इ निशिथे.. जेगे थाकी
आर आमरी मोतोन, जागे नींदे, दूती पाखी, घुम्म....


पिछले कई दिनों से मैं नींद को भूल सा गया हूँ, रात भर जागता रहता हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह प्यार में डूबे ये दो पंक्षी सूने आकाश को ताकते हुए जग रहे हैं।

कोथा दिये चिले, आसिबे गो फीरे
चाँद जाबे दूरे, आकाशरो तीरे
ताय, तोमारे आमि, बारे बारे पीछू डाकी
घुम भूलेची..घुम्म...


तुम कहाँ चले गए लौटने का वादा करके! देखो अब तो चाँद भी खिसकता हुआ आकाश के कोने में जा चुका है और उसके साथ भटकता मेरा मन तुम्हें बार बार पुकार रहा है

ऐके ऐके ओइ डूबे गेलो तारा
तबू तूमी ओगो दिले ना तो शारा
हाय एलेया जेनो, आलो होए, दिलो फांकी
घुम भूलेची..घुम्म...


एक एक कर सारे तारे डूबने लगे हैं और सुबह के धुँधलके में मैं तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। रात के इस अंतिम प्रहर में मृगतृष्णा सी तुम्हारी झलक का छलावा रोशनी के आने के बाद टूट चुका है।

  

काला पानी के गीत में सचिन दा ने इसी धुन का इस्तेमाल किया। अपनी किताब सरगमेर निखद में वे कहते हैं "मैंने इस गीत का मुखड़ा ग़ज़ल की तरह और अंतरा गीत की तरह रचा। मैं जैसा चाहता था रफ़ी ने इस गीत को वैसा ही निभाया।"

सच, रफ़ी साहब ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों पर जिस तरह इस गीत की अदायगी की उसके लिए प्रशंसा के जितने भी शब्द लिखे जाएँ, कम होंगे। नशे में अपना ग़म गलत करते देव आनंद के दिल की करुण पुकार को पर्दे पर रफ़ी ने अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया था। सचिन दा ने बंगाली गीत में शुरुआत सरोद से की थी पर काला पानी में रफ़ी की आवाज़ के साथ नाममात्र का संगीत रखा। सचिन दा के "घुम्म.." के बाद की कलाकारी को रफ़ी आलाप के साथ "हम.." के बाद ले आए। "चले गए" को वो दुबारा जिस तरह गाते हैं तो कलेजा मुँह को आ जाता है। मजरूह का लिखा दूसरे अंतरा मुझे गीत की जान लगता है खासकर तब जब वो कहते हैं डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले...शीशे में आपको भी उतारे चले गये।

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये
साग़र में ज़िन्दगी को उतारे चले गये

देखा किये तुम्हें हम, बनके दीवाना
उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना
सारे वो ज़िन्दगी के सहारे चले गये
हम बेखुदी में...

तुम तो ना कहो हम, खुद ही से खेलें
डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गये
हम बेखुदी में...

 तो आइए एक बार फिर सुनते हैं रफ़ी साहब के इस गीत को..

गुरुवार, सितंबर 22, 2016

पिंक : तू ख़ुद की खोज में निकल, तू किस लिये हताश है Why everyone should see Pink ?

कुछ दिनों पहले पिंक देखी। एक जरूरी विषय पर ईमानदारी से बनाई गई बेहद कसी हुई फिल्म है पिंक। सबको देखनी चाहिए, कम से कम लड़कों को तो जरूर ही।  लड़कियों के प्रति लड़कों की सोच को ये समाज किस तरह परिभाषित करने में मदद करता है या यूँ कहें कि भ्रमित करता है, उससे आप सब वाकिफ़ ही  होंगे। पिंक ने इस कहानी के माध्यम से इसी सोच की बखिया उधेड़ने का काम किया है। 


दशकों बीत गए और लड़कियों  के प्रति हमारी सोच आज भी वहीं की वहीं है।  समाज के निचले तबकों में मुखर है तो मध्यम वर्ग में अंदर ही दबी हुई है जो वक़्त आने पर अपने सही रंग दिखाने लगती है। फिर तो  लगने लगता है कि इस सोच का पढ़ाई लिखाई से लेना देना है भी या नहीं?

आज वो दिन याद आ रहे हैं जब मैंने इंटर में एक कोचिंग में दाखिला लिया था। जैसा अमूमन होता है, अक्सर ब्रेक  में लड़के पढ़ाई के आलावा लड़कियों की भी बाते किया करते थे। किसी भी लड़की का चरित्र चुटकियों में तय कर दिया जाता था और वो भी किस बिना पर?  देखिये तो  ज़रा ..

जानते हैं इ जो नई वाली आई है ना, एकदमे करप्ट है जी
क्यूँ क्या हुआ?
देखते नहीं है कइसे सबसे हँस हँस के बात करती है
अरे आप भी तो सबसे हँस मुस्कुराकर बात करते हैं ?
अरे छोड़िए महाराज है तो उ लइकिए नू..


मतलब ख़ुद करें तो सही और लड़की करे तो लाहौल विला कूवत। मुझे बड़ी कोफ्त होती थी इस दोहरी सोच पर तब भी और आज इतने सालों के बाद भी मुझे नहीं लगता कि कमोबेश स्थिति बदली है। किसी का सबके साथ हँसना मुस्कुराना, हाथ पकड़ लेना, साथ घूमना, खाना  पीना  सो कॉल्ड हिंट मान लिया जाताा है।

ख़ैर इन्हें तो छोड़िए, अकेली सुनसान सड़कों पर चलना भी कोई हिंट है क्या? आफिस से रात में देर से लौटना कोई हिंट है क्या? मेरी एक सहकर्मी ने बहुत पहले अपने से जुड़ी एक घटना बताई थी जिसमें सुबह की एक प्यारी मार्निंग वॉक, एक कुत्सित दिमाग के व्यक्ति की वहशियाना नज़रों और भद्दी फब्तियों के बीच अपनी हिम्मत बनाए रखते हुए अपना आत्मसम्मान बचा पाने की जद्दोजहद हो गई थी। बिना किसी गलती के ऐसी यंत्रणा क्यूँ झेलनी पड़ती हैं लड़कियों को? डर  के साये में क्यूँ छीन लेना चाहते हैं हम उनका मुक्त व्यक्तित्व?

रही बात वैसे पुरुषों के अहम की जो ना सुनने का आदी ही नहीं है। दिल्ली में जिस तरह कुछ दिनों पहले शादी के लिए मना करने की वजह से सरे आम एक महिला की चाकू से गोद गोद कर नृशंस हत्या की गई उसे आप क्या कहेंगे? प्यार ! ऐसा ही प्यार करने वाले बड़ी खुशी से उन चेहरों पर तेजाब फेंक देखते हैं जिसे वो अपना बनाने चाहते थे। ये सब सुन और देख कर क्या आपको नहीं लगता है कि मनुष्य जानवरों से भी बदतर और कुटिल जीव है? क्या हमारे अंदर व्याप्त ये दरिंदगी कभी खत्म होगी?   पिंक के गाने के वो बोल याद आ रहे हैं

कारी कारी रैना सारी,  सौ अँधेरे क्यूँ लाई, क्यूँ लाई
रोशनी के पाँव में ये बेड़ियाँ सी क्यूँ लाई, क्यूँ लाई
उजियारे कैसे अंगारे जैसे, छाँव छैली धूप मैली, क्यूँ है री

 बस मन में सवाल ही हैं जवाब कोई नहीं......

आज जब की लड़कियाँ पढ़ लिख कर हर क्षेत्र में अपनी काबिलयित का लोहा मनवा रही हैं तो फिर उनसे अपनी हीनता का बोध हटाएँ कैसे? बस  जोर आजमाइश से आसान और क्या है। आबरू तो सिर्फ लड़कियों की ही जाती है ना इस दुनिया में। यही वो तरीका है जिसमें बिना मेहनत के किसी स्वाभिमानी स्त्री को अंदर तक तोड़ दिया जाए।  

मेरा मानना है कि आप प्रेम उसी से करते हैं, कर सकते हैं जिनकी मन से इज़्ज़त करते हैं।  अगर मान लें कि ये प्रेम एकतरफा है तो भी आप उस शख़्स की बेइज़्ज़ती होते कैसे देख सकते हैं। उससे झगड़ा कर सकते हैं, नाराज़ हो सकते हैं पर उसे शारीरिक क्षति कैसे पहुँचा सकते हैं?

आज फिल्मों में ही सही इन बातों को बेबाकी से उठाया तो जा रहा है। लोगों की मानसिकता को बदलने के लिए ये एक अच्छी पहल है और इसलिए मैंने शुरुआत में कहा कि ये फिल्म सबको देखनी चाहिए कम से कम लड़कों को तो जरूर ही। पर ये लड़ाई लंबी है और इसकी शुरुआत हर परिवार से की जानी चाहिए। अपने लड़कों को पालते वक़्त उनमें लड़कियों के प्रति एक स्वच्छ सोच को अंकुरित करना माता पिता का ही तो काम है। परिवार बदलेंगे तभी तो समाज बदलेगा, सोचने का नज़रिया बदलेगा। 

अभी तो समाज का पढ़ा लिखा तबका इस पर बहस कर रहा है। पर बदलाव तो उस वर्ग तक पहुँचना चाहिए जो समाज के हाशिये पर है और जिसकी आवाज़ इस देश के हृदय तक जल्दी नहीं पहुँच पाती। 

हताशा के इस माहौल में तनवीर गाजी की लिखी ये कविता एक नई उम्मीद जगाती है। मुझे यकीन है की अवसाद के क्षणों में अमिताभ की आवाज़ में आशा के ये स्वर लड़कियों के मन में आत्मविश्वास के साथ जोश की नई लहर जरूर पैदा करेंगे

तू ख़ुद की खोज में निकल, तू किस लिये हताश है
तू चल तेरे वजूद की, समय को भी तलाश है

जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ, समझ न इन को वस्त्र तू
यॆ बेड़ियाँ पिघला के, बना ले इन को शस्त्र तू

चरित्र जब पवित्र है, तो क्यूँ है यॆ दशा तेरी
यॆ पापियों को हक़ नहीं, कि ले परीक्षा तेरी

जला के भस्म कर उसे, जो क्रूरता का जाल है
तू आरती की लौ नहीं, तू क्रोध की मशाल है

चूनर उड़ा के ध्वज बना, गगन भी कँपकपाएगा
अगर तेरी चूनर गिरी, तो एक भूकम्प आएगा ।

तू ख़ुद की खोज में निकल ...

रविवार, सितंबर 11, 2016

तुझमें खोया रहूँ मैं , मुझमें खोयी रहे तू... खुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी : मधुर है M S Dhoni The Untold Story का संगीत

जिस दो किमी के रास्ते से आप सुबह शाम आफिस जाते हों। जहाँ के मैदानों में घूमते टहलते या खेल का आनंद लेने के लिए कई हँसती मुस्कुराती सुबहें आपने फुर्सत में गुजारी हों। जिस मोहल्ले में आपके साथी सहकर्मी रहते हों उन्हें सिनेमा के रूपहले पर्दे पर देखना कितना रोमांचक होगा। धोनी अपने जीवन पर बनी फिल्म M S Dhoni The Untold Story की बदौलत हमारे चौक चौबारों को आपके ड्राइंगरूम तक ले आए हैं। फिल्म के रिलीज़ होने में अभी भी लगभग तीन हफ्तों का समय शेष है पर पिछले महीने से इसके गाने पहले आडियो और फिर वीडियो के रूप में रिलीज़ हो रहे हैं। फिल्म ने आशाएँ तो जगा दी हैं पर फिलहाल तो इसका संगीत हमारे सामने है तो क्यूँ ना उसके बारे में थोड़ी बातें कर लें।

M S Dhoni The Untold Story नीरज पांडे द्वारा निर्देशित फिल्म हैं। ये वहीं नीरज पांडे हैं जिन्होंने A Wednesday, Special 26, Baby और हाल फिलहाल में रुस्तम जैसी सफल फिल्म का निर्देशन किया है। फिल्म का संगीत निर्देशन किया है उभरते हुए संगीतकार गीतकार अमाल मलिक ने व  किरदारों की भावनाओं को शब्द दिए हैं गीतकार  मनोज मुन्तशिर ने।



फिल्म में यूँ तो कुल छः गाने हैं। अगर आप पूरा एलबम सुनेंगे तो आप समझ लेंगे कि हर गीत धोनी की ज़िदगी के विभिन्न हिस्सों से जुड़ा हुआ है।  फुटबाल से क्रिकेट का खिलाड़ी बनना, बतौर क्रिकेटर स्कूल व फिर झारखंड की रणजी टीम में चयनित होना। पिता के दबाव में क्रिकेट के साथ टीटी की नौकरी करना और फिर झारखंड जैसी अपेक्षाकृत कमजोर टीम से भारत के लिए चयनित होना। बेसब्रियाँ, धोनी की इन छोटे छोटे सपनों को पूरा कर एक बड़े स्वप्न की ओर कदम बढ़ाने की इसी ज़द्दोज़हद को व्यक्त करता है। 

कौन तुझे गर उनके पहले प्रेम की आवाज़ है तो फिर कभी उसी प्रेम में रचता बसता उस रिश्ते को बड़े प्यारे तरीके से आगे बढ़ाता है। वक़्त के हाथ कैसे इस रिश्ते को अनायास ही तोड़ देते हैं वो तो आप फिल्म में ही देखियेगा। फिल्म का अगला गीत जब तक उनकी ज़िदगी में नए शख़्स के आने की बात करता है। परवाह नहीं में जीवन की राह में लड़ते हुए आगे बढ़ने का संदेश है तो पढ़ोगे लिखोगे बनोगे खराब खेलोगे कूदेगे बनोगे नवाब दशकों से घर घर में कही जा रही है हमारी कहावत को उल्टा कर माता पिता के परम्परागत दृष्टिकोण को बदलने की चुटीली कोशिश करता है।


अमाल मलिक का संगीत कुछ अलग सा भले नहीं हो पर उसमें मधुरता पूरी है। परवाह नहीं छोड़ दें जिसकी प्रकृति भिन्न है तो बाकी गीत  हवा के नरम फाहों की तरह कानों को सुकून देते हुए कब खत्म हो जाते हैं पता ही नहीं लगता। गिटार और पियानो का जैसा प्रयोग उन्होंने किया है वो मन को सोहता है। गीत के बोलों पर वे संगीत को हावी नहीं होने देते। बेसब्रियाँ में उनका संगीत संयोजन अमित त्रिवेदी की फिल्म उड़ान की याद दिलाता है तो फिर कभी के इंटरल्यूड्स प्रीतम के गीत जाने क्या चाहे मन बावरा से प्रभावित दिखते हैं।



मनोज मुन्तशिर की शब्द रचना नीरज पांडे की फिल्म बेबी में उनके गीत मैं तुझसे प्यार नहीं करती में मुझे बहुत प्यारी लगी थी। रही इस फिल्म की बात तो उन्होंने इस एलबम के हर गीत में कुछ पंक्तियाँ ऍसी दी हैं जो आपके ज़ेहन से जल्दी नहीं जाएँगी। "बेसब्रियाँ " के इन प्रेरणादायक बोलों पर गौर करें

क्या ये उजाले, क्या ये अँधेरे....दोनों से आगे हैं मंज़र तेरे
क्यूँ रोशनी तू बाहर तलाशे.. तेरी मशाले हैं अंदर तेरे

"जब तक" में उनका ये रूमानी अंदाज़ भी खूब भाने वाला है युवाओं को

जब तक मेरी उँगलियाँ तेरे बालों से कुछ कह ना लें
जब तक तेरी लहर में ख्वाहिशें मेरी बह ना लें
हाँ मेरे पास तुम रहो जाने की बात ना करो..

या फिर पलक की मिश्री सी आवाज़ में गाए हुए गीत "कौन तुझे" की इन पंक्तियों को लें।

तू जो मुझे आ मिला सपने हुए सरफिरे
हाथों में आते नहीं, उड़ते हैं लम्हे मेरे

पर मनोज की जो पंक्तियाँ फिलहाल मेरे होठों पर हैं वो है गीत फिर कभी से जिसे अरिजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी है..

तुझमें खोया रहूँ मैं , मुझमें खोयी रहे तू
खुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी
तुझसे मिलता रहूँ मैं, मुझसे मिलती रहे तू
ख़ुद से हम मिलेंगे फिर कभी, हाँ फिर कभी


बेहद सहजता व आसान लफ़्जों में प्रभावी ढंग से आम लोगों की मोहब्बत की कहानी कह दी है मनोज मुन्तशिर ने। तो सुनिए ये पूरा एलबम और बताइए कौन सा गाना आपको सबसे ज्यादा पसंद आया इस एलबम का...

रविवार, सितंबर 04, 2016

तुम मेरे पास रहो .. फ़ैज़ की दिलकश नज़्म नैयरा नूर की आवाज़ में Tum Mere Paas Raho : Nayyara Noor

आज से दस बारह साल पहले इंटरनेट में कविता ग़ज़लों को पसंद करने वाले कई समूह सक्रिय थे। प्रचलित भाषा में इन्हें बुलेटिन बोर्ड कहा जाता था। वैसे तो आज भी ये समूह हैं पर सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों ने उनकी प्रासंगिकता खत्म कर दी है। ऐसी ही उर्दू कविता के समूह में फ़ैज़ की गज़लों पर चली एक कड़ी में मैंने "हम तो ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद... पहले पढ़ी और फिर सुनी थी। इस ग़ज़ल की वज़ह से ही मेरी पहचान नैयरा नूर की खूबसूरत गायिकी से हुई थी। फिर तो उनकी आवाज़ मुझे इतनी प्यारी लगी कि उनकी गायी कई अन्य मशहूर ग़ज़लें व नज़्में मुझे अपने दिल पे नाज़ था..., ऐ जज़्बा दिल गर मैं चाहूँ... , रात यूँ दिल में.... , कभी मैं खूबसूरत हूँ ... खोज खोज कर सुनी।

वैसे क्या आप जानते हैं कि लाहौर में पली बढ़ी नैयरा की पैदाइश भारत के शहर गुवहाटी में हुई थी। उनका परिवार अमृतसर से रोज़ी रोटी की तलाश में गुवाहाटी में बस गया था। जब भी उनसे अपने बचपन के दिनों के बारे में पूछा जाता वे गुवाहाटी की हरी भरी खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसे अपने घर  की बात जरूर बतातीं और साथ ही ये भी कि रात में उनके उस घर के बाहर सैकड़ों की तादाद में पतंगे  कैसे उमड़ पड़ते थे। पर उनके जन्म के छः सात साल  बाद उनका परिवार 1957 के करीब लाहौर चला गया। 

लाहौर में उनकी शिक्षा नेशनल आर्ट्स कॉलेज में हुई। कॉलेज के ज़माने में वे संगीत की हर प्रतियोगिता में हिस्सा लेतीं। ऐसी ही प्रतियोगिताओं में उनकी मुलाकात शहरयार ज़ैदी से हुई जो ख़ुद एक उभरते गायक थे। नैयरा ने संगीत का कोई प्रथम पुरस्कार भले ही शहरयार को लेने ना दिया हो पर अपना दिल वे  उनसे जरूर हार बैठीं।

नैयरा नूर  और फ़ैज़ , सामने हैं फैज़ की बेटी सलीमा हाशमी
सत्तर के दशक की शुरुआत में कॉलेज के कार्यक्रम में जब वो लता का गाया भजन जो तुम तोड़ो पिया ... गा रही थीं तब उनकी आवाज़ पर प्रोफेसर असरार का ध्यान गया। असरार संगीतविद्य होने के साथ एक कम्पोजर भी थे। असरार ने ना केवल नैयरा नूर को गाने के लिए प्रोत्साहन दिया बल्कि अपने संगीतबद्ध नग्मे भी उनसे गवाए। नैयरा ने अगले कुछ सालों में पाकिस्तान टेलीविजन के ड्रामों में अपनी आवाज़ दी पर उनकी आवाज़ को लोगों ने पहचानना तब शुरु किया जब फ़ैज साहब की ग़ज़लों के एक एलबम में उनके दामाद शोएब हाशमी ने नैयरा को मौका दिया।

नैयरा ने शास्त्रीय संगीत की बक़ायदा शिक्षा नहीं ली पर ऐसा उन्हें  सुनने से महसूस नहीं होता। नैयरा की गाई जिस नज़्म को आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वो इसी एलबम की है। ग़ज़ब सी कशिश है इस नज़्म में जो हाशमी साहब के दावतखाने में एक टेपरिकार्डर सरीखे यंत्र पर रिकार्ड की गई थी।

रात के गहराते सायों में एकाकी मन जब काटने को दौड़ता है और धड़कता दिल गुजारिश करता है  उनके पास रहने की.. तो इस नज़्म की वादियों में मन ख़ुद ही भटक जाता है। आइए देखते हैं कि क्या कहते हैं फ़ैज़ इस नज़्म में..

तुम मेरे पास रहो
तुम मेरे पास रहो

तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी रात चले
आसमानों का लहू पी के स्याह रात चले
मरहम-ए-मुश्क लिए नश्तर-ए-अल्मास लिए
बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले
दर्द के कासनी, पाज़ेब बजाती निकले


मुझे पूरी तरह चेतना शून्य करने वाले मेरे प्रिय मेरे पास रहो। जब आस्मां का  नीला लहू पी के ये रात स्याह हो जाती है, तो हीरे के नश्तर सी ये दिल में  चुभती है। इसकी नीली पायल मेरे  दर्द की आवाज़ बन जाती है। कभी विलाप करती, कभी हँसती, कभी गाती तो कभी अपनी सुगंध से दिल को मरहम लगाती इस रात में मैं तुम्हारी कमी महसूस करता हूँ। ऐसी रातों में तुम मेरे पास रहो।

जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल
आस्तीनों में निहाँ हाथों की,
राह तकने लगे, आस लिये
और बच्चों के बिलखने की तरह, क़ुल-क़ुल-ए-मय
बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने

जब कोई बात बनाये न बने
जब न कोई... बात चले
जिस घड़ी रात चले
जिस घड़ी मातमी, सुन-सान, स्याह रात चले
पास रहो

तुम मेरे पास रहो
तुम मेरे पास रहो
मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो


जब तेरी यादों में दिल डूबता है, तब आस्तीनों में छुपे तुम्हारे बाहुपाश की आस दिल को बेचैन करती है। इस बेचैनी में गिलास में गिरती शराब का स्वर भी बच्चों के बिलखने जैसा लगता है।  किसी तरह भी मन इस नैराश्य से निकल नहीं पाता। ना कोई बात सूझती है ना दोस्तों से बात करने का मन करता है। और तुम हो कि ऐसी दुखभरी सुनसान अँधेरी रात में भी पास नहीं रहती । अब तो रहोगी ना?



नैयरा फ़ैज़ से जुड़ी अपनी यादों के बारे में कहती हैं कि जब मैं अपने सहगायकों के साथ रिकार्डिंग के लिए हाशमी साहब के घर पर होती तो फ़ैज़ साहब भी दूर बैठ कर हमें सुनते रहते। वैसे भी फ़ैज़ साहब को महफिलों में शिरक़त करना और दूसरों को सुनना पसंद था। उनकी चुप्पी तभी टूटती जब उनसे कोई राय माँगी जाती। जब भी हम कोई कठिन सुर लगाते तो कनखियों से फ़ैज़ साहब की ओर देखते और हमेशा हमें प्रोत्साहित करती मुस्कान उनके चेहरे पर होती। उन्हें देखकर हमें यही लगता कि वो भी हमारी गायिकी का पूरा आनंद उठा रहे  हैं ।

शहरयार से शादी के बाद अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से नय्यारा ने अपने आप को घर परिवार तक सीमित कर दिया। वो कहती हैं कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को वहन करते हुए संगीत से जुड़े अपने पेशे को ठहराव देने का उन्हें कोई मलाल नहीं है।   अपनी पोतियों से दादी का शब्द सुनना ही आज उनके लिए संगीत है।

गुरुवार, अगस्त 25, 2016

कृष्ण की चेतावनी : रामधारी सिंह दिनकर Krishna ki Chetavani by Dinkar

रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताएँ बचपन से मन को उद्वेलित करती रही हैं। पर स्कूल की पुस्तकों में उनके लिखे महाकाव्य कुरुक्षेत्र व रश्मिरथी के कुछ बेहद लोकप्रिय अंश ही रहा करते थे । स्कूल के दिनों में उनकी   दो लोकप्रिय कविताएँ शक्ति और क्षमा व हिमालय हमने नवीं  और दसवीं में पढ़ी थीं जो कुरुक्षेत्र का ही हिस्सा थीं। कुरुक्षेत्र तो महाभारत के शांति पर्व पर आधारित थी वहीं रश्मिरथी दानवीर कर्ण पर ! रश्मिरथी का शाब्दिक अर्थ वैसे व्यक्ति से है जिसका जीवन रथ किरणों का बना हो। किरणें तो ख़ुद ही सुनहरी व उज्ज्वल होती हैं। कर्ण के लिए ऐसे उपाधि का चयन दिनकर ने संभवतः उनके सूर्यपुत्र और पुण्यात्मा होने की वज़ह से किया हो।


रश्मिरथी के अंशों को मैंने शुरुआत में टुकड़ों में पढ़ा इस बात से अनजान कि ये पुस्तक बचपन से ही घर में मौज़ूद रही। रश्मिरथी यूँ तो 1952 में प्रकाशित हुई पर 1980 में जब करीब सवा सौ पन्नों की ये पुस्तक मेरे घर आई तो जानते हैं इसका मूल्य कितना था? मात्र ढाई रुपये!

जब किताब हाथ में आई तो समझ आया कि ये काव्य तो एक ऐसी रोचक कथा की तरह चलता है जिसे एक बार पढ़ना शुरु किया तो फिर बीच में इसे छोड़ना संभव नहीं। दिनकर, महाभारत के पात्र कर्ण की ये गाथा सात सर्गों यानि खंडों में कहते हैं। दिनकर की भाषा इतनी ओजमयी है कि शायद ही कोई उनके इस काव्य को बिना बोले हुए पढ़ सके।  आज जन्माष्टमी के अवसर पर मैं आपको इस महाकाव्य के तीसरे सर्ग का वो हिस्सा सुनाने जा रहा हूँ जिसमें बारह वर्ष के वनवास और एक साल के अज्ञातवास को काटने के बाद पांडवों ने कौरवों से सुलह के लिए भगवान कृष्ण को हस्तिनापुर भेजा जो कौरवों की राजधानी हुआ करती थी। इस अंश को कई जगह कृष्ण की चेतावनी के रूप में किताबों में प्रस्तुत किया गया।


वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

 हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।


 यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
परिधि-बन्ध :  क्षितिज , मैनाक-मेरु : दो पौराणिक पर्वत

दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य, सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
दृग : आँख,  शत कोटि : सौ करोड़

शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।
जिष्णु : विष्णु के अवतार

भूलोक अटल पाताल देख, गत और अनागत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन, यह देख महाभारत का रण 
मृतकों से पटी हुई भू है
पहचान,  कहाँ इसमें तू है

अंबर में  कुंतल जाल देख, पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनो काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते हैं
फिर लौट मुझी में आते हैं
कुंतल :केश 

जिह्वा से कढ़ती ज्वाला सघन, साँसों से पाता जन्म पवन
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जभी मूँदता  हूँ लोचन
छा जाता चारो ओर  मरण
लोचन : आँख

बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।
 वह्नि : अग्निपुंज

भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बँद से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।
 वायस : कौआ,  श्रृगाल : सियार

थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर न अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे 'जय-जय'!

विदुर तो पहले से ही कृष्ण भक्त थे इसलिए उन्हें प्रभु के विकराल रूप के दर्शन हुए। पर ऐसी कथा है कि विदुर ने जब धृतराष्ट्र से कहा कि आश्चर्य है कि भगवान अपने विराट रूप में विराज रहे हैं। इसपर धृतराष्ट्र ने अपने अंधे होने का पश्चाताप किया। पश्चाताप करते ही भगवन के इस विराट रूप देखने तक के लिए उनको दृष्टि मिल गयी।

मुझे तो इस कविता को पढ़ना और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करना आनंदित कर गया। रश्मिरथी का ये अंश और पूरी किताब आपको कैसी लगती है ये जरूर बताएँ। तीसरे सर्ग के इस अंश का कुछ हिस्सा अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म गुलाल में भी इस्तेमाल किया था। उन अंशों को अपनी आवाज़ से सँवारा था पीयूष मिश्रा ने।

गुरुवार, अगस्त 18, 2016

ज़िंदगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह.. महकी रहे Zindagi Phoolon ki Nahin...

1979 में एक फिल्म आई थी गृहप्रवेश। गंभीर फिल्म होने के बावज़ूद दर्शकों ने उसे हाथों हाथ लिया था। दाम्पत्य जीवन की पेचीदियों पर बासु भट्टाचार्य पहले भी फिल्में बना चुके थे। अनुभव, आविष्कार के बाद  फिल्म गृहप्रवेश इस तिकड़ी की आख़िरी कड़ी थी। बासु भट्टाचार्य के बारे में मशहूर था कि वो बेहद कम बजट पर फिल्मों का निर्माण करते थे। लिहाजा अक़्सर वे अपने मित्रों को ही अपनी फिल्म का हिस्सा बनाते थे ताकि वो कम पारिश्रमिक में भी उनके साथ काम कर सकें। यही वज़ह थी कि कनु रॉय उनकी अधिकांश फिल्मों के संगीतकार हुआ करते थे। गुलज़ार भी उनके अच्छे मित्रों में से थे। बासु, गुलज़ार और कनु की तिकड़ी ने अनुभव व आविष्कार में कितने कमाल का संगीत दिया था इसके बारे  में तो आपको इस श्रंखला में पहले ही विस्तार से बता चुका हूँ। 


गृहप्रवेश के गीत भी काफी बजे। बोले सुरीली बोलियाँ..., पहचान तो थी, पहचाना नहीं.... और मचल के जब भी आंखों से छलक जाते हैं दो आँसू... से तो आप परिचित होंगे ही। इसी फिल्म का एक और गीत था जिसका मुखड़ा मुझे बारहा अपनी ओर खींचता है। ज़िंदगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह महकी रहे... । कितना विरोधाभास सा है इस छोटी सी पंक्ति में? पर ये भी है कि ये विरोधाभास ज़िंदगी की सच्चाई के बेहद करीब है।

भला बताइए हममें से किसके जीवन की राह फूलों की तरह नर्म रही है। बिना संघर्ष के जीवन कैसा? पर आदमी संघर्ष तभी कर सकता है जब उसे लगे कि उसके मन में चल रही भावनाओं को कोई समझता है। उसके साथ की किसी को जरूरत है। इसीलिए दिल तो बस इतना चाहता है कि इस कँटीले रास्ते पे भी ऐसे लोग मिलते रहें जिनके इर्द गिर्द होने की खुशबू हमें अपने सफ़र पर निरंतर चलने को प्रेरित करती रहें। गुलज़ार इस गीत में 'खुशबू की ख़बर' और 'मुड़ती राहों' जैसे बिंबों से ऐसे ही किसी शख़्स की ओर इशारा कर रहे हैं।

ज़िंदगी फूलों की नहीं, 
फूलों की तरह 
महकी रहे, , ज़िंदगी ...

जब कोई कहीं गुल खिलता है, 
आवाज़ नहीं आती लेकिन   
खुशबू की खबर आ जाती है,
खुशबू महकी रहे, ज़िंदगी ...

जब राह कहीं कोई मुड़ती है,
मंजिल का पता तो होता नहीं
इक राह पे राह मिल जाती है, 
राहें मुड़ती रहें, ज़िंदगी ...


वैसे इस गीत के बनने का प्रसंग भी दिलचस्प है। बासु भट्टाचार्य को अपनी फिल्मों में मजाक बिल्कुल पसंद नहीं था। वो अक़्सर पटकथा से हल्के फुल्के लमहों को हटा देते थे। उनका मानना था कि फिल्म गंभीर चिंतन की जगह है और अपनी इसी सोच की वज़ह से गुलज़ार से उनकी बहस भी हो जाया करती थी। गृहप्रवेश की पटकथा और गीत भी गुलज़ार ने ही लिखे थे। 

ये गीत फिल्म की शुरुआत में पार्श्व में ओपनिंग क्रेडिट्स के साथ आता है। बासु दा चाहते थे कि गीत का स्वरूप फिल्म के विषय जैसा ही गंभीर हो। यही बताते हुए अचानक बंगाली में कही उनकी बात का अनुवाद गुलज़ार ने ज़िदगी फूलों की नहीं.. के रूप में किया। बासु दा को तुरंत ये पंक्ति पसंद आ गई। गुलज़ार आश्वस्त नहीं थे। उन्हें इसमें कविता जैसा कुछ लग नहीं रहा था पर बासु अड़े रहे और फिर मुखड़ा बना ज़िंदगी फूलों की नहीं, फूलों की तरह महकी रहे। कनु दा ने इस पर जो धुन तैयार की वो सबको अच्छी लगी और फिर एक सुबह मुंबई के तारादेव स्थित भंसाली स्टूडियो में भूपेंद्र की आवाज़ में इस गाने की रिकार्डिंग भी हो गई।

गीत जनता को भी पसंद आया पर गुलज़ार इस गीत को कविता के लिहाज़ से आज भी अच्छा नहीं मानते। वो यही कहते हैं कि मुखड़ा तो शब्दों का खेल भर था। पर मुझे तो वो इस गीत की जान लगता है। कनु दा सीमित संसाधनों में कमाल करने वाले संगीतकार थे। बाँसुरी, सितार व गिटार का कितना प्यारा उपयोग किया उन्होंने। खासकर जिस तरह उन्होंने भूपेंद्र से मुखड़े की पंक्तियाँ दो बार गवायीं। मुखड़े को छोटे छोटे हिस्सों में बाँटकर उनके बीच के ठहराव से उदासी का जो आलम उन्होंने बुना वो लाजवाब था। बाद में जब जब ये पंक्ति दोबारा आई उन ठहरावों को संगीत के टुकड़ों से भर कर उन्होंने उसका असर ही बढ़ा दिया।



वैसे पता है ना आपको आज गुलज़ार साहब का जन्मदिन भी है। तो जन्म के अवसर पर इस कलम के जादूगर और मेरे अत्यंत प्रिय गीतकार को ढेर सारी बधाई!   

कनु दा से जुड़ी कुछ और कड़ियाँ 

शुक्रवार, अगस्त 05, 2016

इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज़ कदम राहें.. Is Mod Se Jate Hain...

जिंदगी कई राहों को हमारे सामने खोल कर रखती है। कुछ पर हम चलते हैं, कभी दौड़ते है, कभी थोड़ी दूर चलकर वापस आ जाते है तो कभी बिल्कुल ही ठहर जाते हैं असमंजस में कि क्या ये राह हमें मंजिल तक पहुँचाएगी? पर मंजिल देखी किसने है, सामने तो रास्ता है और उस रास्ते पर साथ चलने वाले लोग। मंजिल जरूर हमें प्रेरित करती है चलते रहने के लिए पर जीवन की खुशी या ग़म तो उन लोगों से वाबस्ता है जो हमारे सफ़र के भागीदार रहे। कुछ पल, कुछ दिन या हमेशा हमेशा के लिए...  ऐसे ख्यालों के बीच दिल में गुलज़ार के ये शब्द ही गूँजते हैं ..

इक दूर से आती है, पास आ के पलटती है
इक राह अकेली सी, रुकती है ना चलती है
 ...... ..........................इस मोड़ से जाते हैं 
कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज़ कदम राहें।


आँधी एक ऐसी फिल्म थी जिसका संगीत सत्तर के दशक से लेकर आज तक मन में वही मीठी  तासीर छोड़ता है। पर इस मिठास के साथ, कुछ तो अलग सा है इस फिल्म के गीतों में कि आप उनमें जब डूबते हैं तो अपने इर्द गिर्द के रिश्तों को टटोलते परखते कुछ खो से जाते हैं अपने  ख़्यालों  में ।


आँधी के इस गीत को गुलज़ार ने लिखा था पंचम के साथ ! अपने साक्षात्कारों में इस गीत के बारे में दो बातें वो अक्सर कहा करते थे। पहली तो पंचम के बारे में जिन्हें उर्दू कविता और शब्दों की उतनी समझ कभी नही रही
"गाना बनाते हुए तुम जुबां से ज्यादा साउंड का ख्याल रखते थे। लफ़्जों की साउंड अच्छी हो तो फौरन उन्हें होठों पर ले लिया करते थे। मानी....? तुम कहा करते थे लोग पूछ लेंगे। जैसे तुमने इस गाने में पूछा था मुझसे.. ये नशेमन कौन सा शहर है यार ?"
और दूसरी ये कि फिल्म में इस गीत की शूटिंग के दौरान संजीव कुमार को भी 'नशेमन' का अर्थ गुलज़ार से पूछना पड़ा था।

आज जब मैं जब अस्सी और नब्बे के इस गीत को रिपीट मोड में बारहा सुनने की बात सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि पंचम की तरह मैंने भी इस गीत में उभरते स्वरों को ही मन में बसाया था उसके अर्थ को नहीं। तब कहाँ जानता था कि मुखड़े में गुलज़ार  आपसी रिश्तों के चरित्र को इन तीन अनूठे बिम्बों से दर्शा रहे हैं 

पत्थर की हवेली को, शीशे के घरोंदों में
तिनकों के नशेमन तक, इस मोड़ से जाते हैं

ये जीवन कैसे कैसे मोड़ पर ले जाता है? कैसे कैसे रिश्तों को जन्म देता है है ? एक राह पत्थर की हवेली की तरफ़ ले जाती है यानि एक ऐसे  रिश्ते की जानिब जो समाज के मापदंडों में बाहर से मजबूत दिखता तो है पर है अंदर से बिल्कुल बेजान। वहीं दूसरी शीशे के घरोंदों जैसे संबंध बनाती है जिनमें पारदर्शिता है पर जिनकी नींव इतनी कमजोर है कि एक बाहरी ठोकर भी ना बर्दाश्त कर सके।

गुलज़ार का तीसरा बहुचर्चित बिंब ऐसे रिश्तों की बात करता है जो तिनकों के बनाए उस घोंसले  की तरह हैं जहाँ परस्पर आत्मीयता है, प्यार है पर ये प्रेम समाजिक स्वीकृति के दायरों से बाहर है और हालात की आँधी के बीच तहस नहस होने को मजबूर है। फिर भी नायक नायिका आशावान है कि इन टेढी मेढी राहों के बीच से इक डगर वो ढूँढ ही लेंगे जो उन्हें एक दूसरे के और करीब ले आ सके।

इस गीत के इंटरल्यूड्स में बाँसुरी, सितार सरोद और वायलिन जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग हुआ है। राग यमन से प्रेरित इस बंदिश में किशोर और लता के मधुर स्वरों के बीच हरि प्रसाद चौरसिया की बाँसुरी, ज़रीन दारूवाला का सरोद और जयराम आचार्य का सितार, गीत में एक अलग रंग भरते हैं। 


इस मोड़ से जाते हैं
कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज़ कदम राहें
पत्थर की हवेली को, शीशे के घरोंदों में
तिनकों के नशेमन तक, इस मोड़ से जाते हैं
इस मोड़ से ...

आँधी की तरह उड़कर, इक राह गुज़रती है
शरमाती हुई कोई कदमों से उतरती है
इन रेशमी राहों में, इक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुँचती है, इस मोड़ से जाती है
इस मोड़ से...

इक दूर से आती है, पास आ के पलटती है
इक राह अकेली सी, रुकती है ना चलती है
ये सोच के बैठी हूँ, इक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुँचती है, इस मोड़ से जाती है
इस मोड़ से ...


निसंदेह आँधी का संगीत पंचम गुलज़ार की जोड़ी की सबसे शानदार कृतियों में अव्वल दर्जा पाने की काबिलियत रखता है और यही वजह है कि बनने के चार दशक बाद भी ये उतने ही मन से सुना जाता है और आने वाले कई दशकों तक सुना जाता रहेगा।

शनिवार, जुलाई 23, 2016

बारिश के नाम एक ख़त ...

प्यारी बरखा, कितने दिन से तुम छुपी हुई थी मुझसे कहीं। तुम्हारी एक झलक पाने के लिए मैंने तुम्हें कहाँ कहाँ नहीं ढूँढा। हवाओं का शोर, बादलों की गुड़गुड़ाहट या मिट्टी से उठती सोंधी महक....तुम्हारे आने की हर हल्की सी आहट पर मेरा  दिल पागल बन बैठा। पर तुमने उन बेताब होती भावनाओं को निकलने ही कब दिया? हर बार इन कँटीली आशाओं के बोझ से दब कर घायल तो मैं ही हुई। कितना छेड़ा, कितना ललचाया था ना तुमने मुझे। मूसलाधार लड़ी का स्वप्न दिखाती तुम आई भी तो हल्की सी फुहार ले के मानो मेरे मन की तड़प पर उपहास कर रही हो। कहो तो..अपने पक्के प्रेमी से कोई ऐसा बर्ताव करता है भला? तुम्हारे जैसे ही हैं मेरे कुछ जानने वाले, वो समझते होंगे शायद...


मैं नहीं जानती कि उनकी तरह मेरे प्रति तुम्हारे इस व्यवहार का कारण क्या है? तुमसे ढंग की आखिरी मुलाकात तो बोकारो में हुई थी। फिर वक़्त मुझे ले आया सूखी, बेरहम और गरम मिजाज़ वाली इस दिल्ली में। मुझे पाल पोस कर बड़ा करने वाला ये शहर तुम्हारे बिना कभी मेरे दिल में जगह नहीं बना सका। आख़िर एक रूखा शहर मेरी आत्मा  में अपने लिए नमी कैसे भरता ?

पर इस बार तो मेरी जान मैंने तुम्हें  पश्चिमी घाटों के पार वहाँ जाकर पकड़ा जहाँ तुम्हारा बसेरा है। और तब मुझे अनायास ही भान हुआ कि तुम भी मुझसे मिलने के लिए उतनी ही आतुर थी। बस तलाश थी तो सही लम्हे और सही जगह की । जिस तीव्रता  से तुमने मुझे अपनी बाहों में लिया, जिस बेफिक्री व उन्माद के साथ तुम मेरे पर बेइंतहा बरसी, मैं मन के अन्तःस्थल तक भीग गयी। जैसी मैं तुम्हें इस रूप में पाकर ठगी सी रह गयी, क्या तुम्हारे अंदर उफनता ज्वार उतना ही शांत हो पाया?

हम दोनों ही नियंत्रण में बहने के आदी नहीं हैं। सच तो ये है कि हम दोनों के अंदर एक सागर बसता है जो उन्हीं किनारों पर उमड़ता है जिनके प्रेम में हमारा दिल नाशाद है। 

एक बार फिर कितने युगों बाद तुमने मुझे इस तरह अपने आगोश में लिया था। किसी वादे के लिए नहीं..किसी समझौते के लिए नहीं..किसी बहाने के लिए नहीं।


कितनी अनोखी थी ना इस बार की ये मुलाकात...  उन दिनों तो ऐसा लगता कि तुम हर जगह हो और तुम्हारी ताकत को धरती का कोना कोना महसूस कर रहा है। छत पर टप टप की आवाज़ से तुम मुझे जगाती थी। तुम्हारे इस संगीत को सुनने के लिए कितना तरसी थी मैं। तुम हर सुबह एक दोस्त की तरह मिलती और तुम्हारा अभिवादन स्वीकार कर जब तक मैं समुद्र तट के किनारे सैर पर निकलती तुम अपना रूप बदल चुकी होती। इस गर्जन तर्जन को देख तुम्हें रिझाने के लिए समुद्र भी कई भंगिमाएँ बनाता हुआ यूँ उमड़ता घुमड़ता कि मैं एक पल सहमती तो दूसरे पल खुशी से नाच उठती। ताल भी तुम्हारी लड़ियों को अपने में समाता देख बच्चों की तरह खिलखिलाता। सड़कें तुम्हारे स्पर्श से एक पेंटिंग सरीखी दिखतीं। पेड़ तुमसे नहाकर चमकते हुए इठलाते। वहीं दूर क्षितिज स्याह व नीले रंग में धुँधलाता हुआ सा दिखाई देता। ऐसा लगता मानो कायनात एक नई ज़िंदगी से सराबोर हो गई हो।

तुम मोतियों की लड़ी बनकर आई, परतों में बिछी और प्रचंडता के साथ बरसी। तुम सर्वशक्तिमान थी और मैं नतमस्तक जैसा कि मैं अक्सर हो जाती हूँ तुम्हारे जैसों को अपने पास पा के। हर जर्रा तुम्हारी, हर कण जीवंत, हर कोर आभारी।

शुक्रिया तुम्हारा ये भरोसा दिलाने के लिए कि तुम साथ रहोगी मेरे.. . सशर्त ही सही ! शुक्रिया तुम्हारा कि आँसुओं का जो सैलाब मैने आँखों की कोरों में रोक रखा था वो तुमने खोल दिया और उनके साथ तुम मेरे दुखों को भी बहा ले गयी। उस बहती धारा ने कई जख़्मों को भर दिया सिवाए उनके जिनका हरा रहना मेरे अस्तित्व के लिए जरूरी है। शुक्रिया तुम्हारा कि तुम्हारे आने से मेरे मन की मिट्टी फिर आद्र हो उठी है। शायद प्रेम की नई किरण उसे भेद कर भावनाओं की नई फसल उपजा सके।

तो कैसा लगा आपको ये ख़त ? ये तो आपने समझ ही लिया ही होगा कि ये ख़त मैंने नहीं लिखा। लड़कियाँ जितनी गहराई से बारिश को महसूस कर उसे व्यक्त कर पाती हैं वो अपने आप में अनूठा होता है। इसलिए मैंने जब अपनी साथी ब्लॉगर सोनल सिंह का बारिश को लिखा ये प्यारा ख़त अंग्रेजी में पढ़ा तो उसका हिंदी में भावानुवाद करने का लोभ छोड़ नहीं पाया। उनकी भावनाओं को हिंदी में कितना उतार पाया हूँ ये तो लेखिका ही बता सकती हैं फिर भी मैंने एक कोशिश करी है कि जो आनंद मुझे वो लेख पढ़कर आया वो आपको भी आए।

बारिश में भींगने की बात से फिलहाल तो परवीन शाकिर की इक छोटी सी नज़्म याद आ रही है.अगर आपको बारिश में भींगती हुई कोई तनहा लड़की मिले तो उसे जरूर सुना दीजिएगा...

बारिश में क्या तनहा भींगना लड़की ?
उसे बुला जिसकी चाहत में
तेरा तन मन भींगा है
प्यार की बारिश से बढ़कर भी क्या बारिश होगी
और जब इस बारिश के बाद
हिज्र की पहली धूप खिलेगी
तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे :)

गुरुवार, जुलाई 14, 2016

निदा फ़ाज़ली कैसे आए इस जहान ए फानी में : अपनी अपनी सीमाओं का बंदी हर पैमाना है Apni Apni Seemaon Ka...

निदा फ़ाज़ली को सबसे पहले जगजीत व चित्रा की ग़ज़लों से ही जाना था। उनकी शायरी से मेरी पहली मुलाकात अस्सी के दशक में तब हुई थी जब रेडियो पर बिनाका गीत माला में चित्रा सिंह की गाई ग़ज़ल सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो अप्रत्याशित रूप से पाँचवी पायदान तक जा पहुँची थी। फिर तो उनकी नज़्मों , ग़ज़लों और दोहों से जगजीत की आवाज़ की बदौलत जान पहचान होती रही। बाद में उनके संस्मरण भी पढ़े और शायरी की उनकी कुछ किताबें भी और तब लगा कि उनका गद्य लेखन भी उतना ही सुघड़ है जितनी की उनकी लिखी नज़्में और दोहे। 


निदा की ग़ज़लें वो मुकाम नहीं छू पायीं जो उनके समकालीन शायर बशीर बद्र की ग़ज़लों को मिला पर उनकी नज़्मों की गहराई व दार्शनिकता वक़्त के साथ मन के अंदर उतरती चली गयी । उनकी शायरी का यही अक़्स मुझे उनकी कुछ ग़ज़लों में हाल फिलहाल सुनने को मिला तो सोचा क्यों ना उन्हें आपसे बाँट लूँ पर उससे पहले क्या ये जानना बेहतर ना होगा कि ज़िंदगी के प्रति निदा की सोच किन पारिवारिक परिस्थितियों में रहते हुए विकसित हुई।

निदा फ़ाज़ली की ज़िंदगी में झांकना हो तो उनकी आत्मकथ्यात्मक किताब "दीवारों के बीच" से गुजरिए। अपने आस पास का माहौल वे इतनी बेबाकी से बयां करते हैं कि आप हतप्रध होने के  साथ उनकी लेखनी के कायल भी  हो जाते हैं। निदा का जन्म एक  मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। पिताजी सिंधिया स्टेट में अफ़सर थे। ऊपर की आमदनी पूरी थी और मिजाज़ के रंगीन तबियत वाले थे और ऐसा मैं नहीं कह रहा बल्कि निदा अपनी किताब में कहते हैं। माँ धार्मिक प्रवृति की थीं और दिल्ली से ताल्लुक रखती थीं। शेर ओ सुखन में उनके माता पिता दोनों की ही दिलचस्पी थी। निदा इस दुनिया में कैसे आए उसका भी बड़ा रोचक रेखाचित्र उन्होंने अपनी किताब में खींचा है..

"...हर बच्चे की पैदाइश दिल्ली में होती है। वो अब तीसरे बच्चे की माँ बनने वाली हैं। दो के बाद तीसरा बच्चा ऐसी हालत में ठीक नहीं पर क्या किया जाए? तीन महीने पूरे हो चुके हैं...ऐसे काम छुप छुपा के ही किए जाते हैं। सुनी सुनाई जड़ी बूटियों से ही ख़ुदा के काम में दखल दिया जाता है। कई गर्म सर्द दवाएँ इस्तेमाल की जाती हैं। अभी ये सिलसिला ज़ारी है कि अचानक एक दिन इनके भारी पाँव तले पुरखों के घर की छत खिसक जाती है। होता यूँ है कि वो सुबह बाथरूम से बाहर आती हैं लेकिन जैसे ही पाँव बढ़ाती हैं धँसने लगती हैं। वो टूटती छत से सीधे नीचे ज़मीन पर गिरने को होती हैं कि उनके हाथ में लोहे का सरिया आ जाता है। इत्तिफाक से उनके भाई उस वक़्त नीचे ही  मकान की मरम्मत करा रहे हैं। पत्थरों के गिरने की आवाज़ से वो चौंककर ऊपर देखते हैं और अपनी बहन को ज़मीं और आसमान के बीच लटका हुआ पाते हैं। वो बाहें फैलाकर आगे बढ़ते हैं और बहन को सरिया छोड़ने को कहते हैं। कई लोग जमा हैं। ज़मीं पर रूई के गद्दे बिछा दिये जाते हैं। बच्चों के रोने चिल्लाने और औरतों की चीख पुकार में आख़िरकार वो भाई की बाहों में गिर जाती हैं। गिरते ही बेहोश हो जाती हैं। केस नाजुक है तुरंत अस्पताल ले जाया जाता है, जहाँ समय से पहले ही अपनी मर्जी के खिलाफ जमील फातिमा तीसरे बच्चे को जन्म देती हैं। उसका नाम बड़े लड़के के काफ़िये के अनुसार मुक्तदा हसन रखना तय किया जाता है। ये ही मुक्तदा हसन आगे चलकर काफिये की पाबंदी से ख़ुद को आजाद करके निदा फ़ाज़ली बन जाते हैं।..."

तो ये थी निदा फ़ाजली के इस जहान ए फानी में आने की दास्तान। तो आइए उनकी उन ग़ज़लों की बात करें जिने आप तक पहुँचाने की बात मैंने पहले की थी । निदा की ये पहली ग़ज़ल उदासी के आलम में लिपटी हुई है पर उम्दा शेर कहे हैं उन्होंने अपनी इस ग़ज़ल में। अब देखिए ना ज़िंदगी के कुछ लम्हों  को हम आपनी यादों की फोटो फ्रेम में सजा लेते हैं क्यूँकि वैसी तस्वीर ज़िंदगी बार बार नहीं बनाती और इसलिए निदा लिखते हैं  चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर आँखें...ज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही।

अँधेरे में ठोकर खाकर ही राह निकलने की सूरत, दूरियों की वज़ह से हर पत्थर को चाँद समझने की भूल .या हँसते हुए चेहरे के पीछे क्रंदन करता हृदय निदा ने शायद सब झेला हो और उसी कड़वाहट और हताशा को इन शब्दों में व्यक़्त कर गए


दिन सलीक़े से उगा रात ठिकाने से रही
दोस्ती अपनी भी कुछ रोज़ ज़माने से रही

चंद लम्हों को ही बनती हैं मुसव्विर*आँखें
ज़िन्दगी रोज़ तो तस्वीर बनाने से रही
 *चित्रकार 
इस अँधेरे में तो ठोकर ही उजाला देगी
रात जंगल में कोई शम्मा जलाने से रही

फ़ासला चाँद बना देता है हर पत्थर को
दूर की रौशनी नज़दीक तो आने से रही

शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की फ़ुरसत
अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने-हँसाने से रही

तो सुनिए इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ देने की मेरी कोशिश..



और चलते चलते निदा साहब की एक और ग़ज़ल जिसका मतला ही पूरी ग़ज़ल पर भारी है। अपनी अपनी सीमाओं का बंदी हर पैमाना है..उतना ही दुनिया को समझा जितना ख़ुद को जाना है। भाई वाह! कितनी गहरी बात कह गए चंद शब्दो में निदा फ़ाज़ली साहब। 

इस ग़ज़ल को गाया है जगजीत सिंह के शागिर्द और आज के बदलते समय में ग़ज़ल की विधा को सहेज कर रखने वाले फ़नकार घनशाम वासवानी जी ने। वॉयलिन, पियानो, सितार व ताल वाद्यों का खूबसूरत सम्मिश्रण इस ग़ज़ल की श्रवणीयता में इजाफ़ा कर देता है बाकी घनशाम की मखमली आवाज़ के तो क्या कहने..

अपनी अपनी सीमाओं का बंदी हर पैमाना है
उतना ही दुनिया को समझा जितना ख़ुद को जाना है


अपने आप से प्यार है जिसको प्यारी है हर शय उसको
इतनी बात ही सच है बाकी जो कुछ है अफ़साना है

रोज नया दिन रोज़ नयी शब बीत गया सो बीत गया
रोज़ नया कुछ खोने को है रोज़ नया कुछ पाना है

पैदा होना पैदा होकर मरने तक जीते रहना
एक कहानी है जो सबको अलग अलग दुहराना हो  

रविवार, जुलाई 03, 2016

हाल‍ ए दिल हमारा.... कौन थे दत्ताराम वाडकर ? Haal E Dil humara

एक सदाबहार गीत है मुकेश का जिसे मैं कॉलेज के ज़माने से आज तक अक़्सर गुनगुनाया करता हूँ। और मैं क्या.. आप सभी इसे गुनगुनाते होंगे। कौन ऐसा शख़्स है जिसे ज़िंदगी में कभी ये ना लगा हो कि दुनिया  उसके जज़्बातों को समझ  ही नहीं पा रही है। तरुणाई में तो खासकर जब सारी दुनिया ही बेगानी लगती है तब  गीत का ये मुखड़ा  हम सब के मन को सुकून देता रहा कि हाल‍ ए दिल हमारा जाने ना बेवफा ये ज़माना ज़माना।

इतने सहज बोल लिए, आशा भरा ये गीत जब मुकेश की आवाज़ में उन दिनों रेडियो पर बजता था तो होठ ख़ुद ब ख़ुद इसकी संगत के लिए चल पड़ते थे। एक भोला सा अपनापन था इस गीत में जिससे जुड़ने में दिल को ज़रा सी भी देरी नहीं लगती थी।

श्रीमान सत्यवादी के लिए ये गीत राज कपूर पर फिल्माया गया था। अब जहाँ राज कपूर और मुकेश साथ हों तो संगीतकार तो शंकर जयकिशन ही होंगे। इस मुगालते में मैं भी बहुत दिनों रहा। बाद में पता चला  कि इस फिल्म के संगीतकार शंकर जयकिशन नहीं बल्कि दत्ताराम वाडकर थे। आप भी सोच रहे होंगे कि सुरेश वाडकर के बारे में तो सुनते आए हैं पर ये दत्ताराम वाडकर के बारे में ज्यादा नहीं सुना। चलिए हमीं बताए देते हैं।

राजकपूर के साथ युवा दत्ताराम वाडकर

गोवा में जन्में और दक्षिणी महाराष्ट्र के एक कस्बे सामंतवाड़ी में पले बढ़े दत्ताराम सन 1942 में अपने परिवारवालों के साथ मुंबई पहुँचे। पढ़ने में खास रूचि न लेने वाले दत्ताराम की माँ की पहल पर गुरु पांडरी नागेश्वर से उनकी तबले की शिक्षा शुरु हुई । युवा दत्ताराम तबला बजाने के साथ कसरत करने का भी शौक़ रखते थे। गिरिगाँव के जिस अखाड़े में वो कसरत करते वहीं  संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन वाले शंकर भी वर्जिश के लिए आते थे। एक बार शंकर ने वहीं तबला बजाना शुरु कर दिया और कसरत के बाद अंदर स्नान कर रहे दत्ताराम के मुँह से वाह वाह निकल गई। शंकर ने तबला बजाना रोक दिया। जब दत्ताराम बाहर निकले तो उन्होंने पूछा कि क्या तुम भी तबला बजाते हो? दत्ताराम ने कहा हाँ थोड़ा बहुत बजा लेता हूँ। शंकर ने उन्हें तुरंत बजाने को कहा और उनके वादन से ऐसे प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें अपनी संगीत मंडली में शामिल कर लिया। 

दत्ताराम वाडकर

सालों साल शंकर के वादकों  के साथ अभ्यास करने  और नाटकों के बीच तबला बजाने के बाद फिल्म आवारा के गीत इक बेवफ़ा से प्यार किया में जब पहली बार उन्हें लता जी के साथ ढोलक बजाने का मौका मिला तो मानो  उनके मन की मुराद पूरी हो गई। फिर तो राज कपूर शंकर जयकिशन की फिल्मों  में बतौर वादक, वो एक स्थायी अंग बन गए। सलिल चौधरी  व कल्याणजी आनंद जी के कई मशहूर गीतों  का भी वो हिस्सा बनें। रिदम पर दत्ताराम की गहरी पकड़ थी। संगीत जगत में ढोलक पर उनकी शुरु की हुई रिदम दत्तू ठेका के नाम से मशहूर हुई।

शंकर जयकिशन की बदौलत उन्हें पहली बार फिल्म 'अब दिल्ली दूर नहीं' के लिए संगीत निर्देशन का काम मिला। संगीत के लिहाज़ से उनकी फिल्में परवरिश और श्रीमान सत्यवादी बहुत सराही गयी। आँसू भरी है जीवन की राहें , मस्ती भरा ये समा और चुनचुन करती आई चिड़िया जैसे गीतों को भला  कौन भूल सकता है। तो आइये लौटें श्रीमान सत्यवादी के इस गीत की ओर ।

श्रीमान सत्यवादी के इस गीत में वो अंतरा मुझे सबसे प्यारा लगता है जिसमें हसरत साहब लिखते हैं कि दाग हैं दिल पर हज़ारों हम तो फिर भी शाद (आनंदित) हैं.. आस के दीपक जलाये देख लो आबाद हैं। सच, जीवन में इस मंत्र को जिसने अपना लिया वो ना केवल ख़ुद को बल्कि अपने आस पास के लोगों को भी एक धनात्मक उर्जा से भर देगा। गीत के मुखड़े के पहले का संगीत और इंटरल्यूड्स में तरह तरह के वाद्यों का इस्तेमाल दत्ताराम के संगीत संयोजन की माहिरी की गवाही देता है। ये माहिरी उन्होंने शंकर जयकिशन के साथ लगातार काम करते हुए हासिल की थी।

हाल‍ ए दिल हमारा जाने ना बेवफा ये ज़माना ज़माना
सुनो दुनिया वालों आयेगा लौट कर दिन सुहाना सुहाना

एक दिन दुनिया बदलकर रास्ते पर आयेगी
आज ठुकराती है हमको कल मगर शरमायेगी
बात को तुम मान लो अरे जान लो भैया

दाग हैं दिल पर हज़ारों हम तो फिर भी शाद हैं 
आस के दीपक जलाये देख लो आबाद हैं
तीर दुनिया के सहे पर खुश रहे भैया
हाल-ए-दिल हमारा ...

झूठ की मंज़िल पे यारों हम ना हरगिज़ जायेंगे
हम ज़मीं की खाक़ सही आसमाँ पर छायेंगे
क्यूँ भला दब कर रहें डरते नहीं भैया



 मुकेश की शानदार आवाज़ में तो आपने ये गीत सुन लिया अगर मेरी झेल सकते हों तो ये भी सुन लीजिए :) 


आज दत्ताराम हमारे बीच नहीं है। उन्हें गुजरे लगभग एक दशक होने वाला है। गोवा के एक साधारण से परिवार में जन्मे दत्ताराम अपनी मेहनत के बल पर संगीत की जिन ऊँचाइयों को छू सके वो औरों के लिए एक मिसाल है। ताल वाद्यों पर उनकी गहरी पकड़ और उनके अमर गीतों की बदौलत वो संगीत प्रेमियों द्वारा हमेशा याद रखे जाएँगे।

शनिवार, जून 25, 2016

तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है... रमेश गौड़ Tere Bin by Ramesh Gaud

रमेश गौड़ को मैं नहीं जानता। कुछ दिन पहले व्हाट्सएप पर उनकी ये कविता एक मित्र ने भेजी और जी एकदम से उसे पढ़कर उदास हो गया। पता नहीं रमेश जी ने किसको सोचकर ये कविता लिखी होगी. पर इसमें उन सब लोगों का दर्द है जो अपनी छाया से दूर हैं। हम उसी व्यक्तित्व से तो जुड़ते हैं या जोड़ने की सोचते हैं जिसमें हमें अपना अक्स नज़र आता है या फिर ऐसी बात नज़र आती है जो हममें भले ना हो पर हम वैसा होना चाहते हैं। बरसों हम इसी काल्पनिक छाया के सपनों में डूबते उतराते रहते हैं। कभी तो ये कल्पना ज़िदगी की आपा धापी में दब सी जाती है तो कभी उस शख्स से सचमुच ही मिला देती है।
नेपथ्य में ताकती दो आँखें कुछ खोज रही हों जैसे, चित्र सोनमर्ग, जम्मू एवम् कश्मीर

अब ये छाया आभासी है या वास्तविक इससे क्या फर्क पड़ता है। उससे दूरी तो हमेशा ही खटकती है। अपनी छाया के बिना हम पूर्ण ही तो नहीं हो पाते। रमेश गौड़ इसी अपूर्णता को कुछ खूबसूरत और अनसुने से बिंबों में बाँटते हैं। कविता में मुझे विशेष रूप से संख्या के पीछे हटती इकाई, और बरसों बाद आई चिट्ठी के धुल जाने की बात दिल को छू गई। लगा कि जो उदासी इसे पढ़ने से मन में छाई है उसे तभी निकाल पाऊँगा जब इसे एक बार मन से पढ़ दूँ..


जैसे सूखा ताल बच रहे या कुछ कंकड़ या कुछ काई
जैसे धूल भरे मेले में चलने लगे साथ तन्हाई,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे सिफ़रों की क़तार बाक़ी रह जाए बिन इकाई ।

जैसे ध्रुवतारा बेबस हो, स्याही सागर में घुल जाए
जैसे बरसों बाद मिली चिट्ठी भी बिना पढ़े धुल जाए,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे लावारिस बच्चे की आधी रात नींद खुल जाए ।

जैसे निर्णय कर लेने पर मन में एक दुविधा  रह जाए
जैसे बचपन की क़िताब में कोई फूल मुँदा रह जाए,
मेरे मन पर तेरी यादें अब भी कुछ ऐसे अंकित  हैं
जैसे खंडहर  पर शासक का शासन-काल खुदा रह जाए...


रमेश गौड़ से अगर मेरे पाठकों में कोई परिचित हो तो जरूर मुझे आगाह करे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानकर मुझे खुशी होगी...

गुरुवार, जून 16, 2016

हिज्रे यारां ना सता बेवज़ह, बन गया तू क्यूँ वज़ह, बेवज़ह Bewajah

नबील शौक़त अली को क्या आप जानते हैं? मैं तो बिल्कुल नहीं जानता था। आपको याद है रियालटी शो के उस दौर में हर चैनल  चार पाँच  साल पहले गीत संगीत की प्रतियोगिता को अलग अलग रूप रंग से सजा रहा था। कलर्स ने सोचा कि जिस तरह क्रिकेट के मैदान पर भारत पाकिस्तान का आमना सामना लोगों को उत्साहित कर देता है वैसे ही संगीत की सरज़मीं पर दोनों मुल्क के कलाकार जब भिड़ेंगे तो शो का हिट होना पक्का है। कार्यक्रम का नाम रखा गया सुर क्षेत्र।  पर संगीत जब युद्ध की ताल ठोकने का सबब बन जाए तो फिर वो संगीत कैसा? लिहाज़ा कार्यक्रम के प्रोमो में हीमेश रेशमिया व आतिफ़ असलम का नाटकीय अंदाज़ में रणभेरी बजाना मुझे ख़ल गया और आशा, आबिदा व रूना लैला जैसे दिग्गज जूरी के रहते भी मैं इस कार्यक्रम को देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। 



यही वज़ह थी कि नबील शौक़त अली जिन्होंने कार्यक्रम में हो रही ड्रामेबाजी के बीच इस ख़िताब को अपने नाम कर लिया, की आवाज़ से मैं अनजाना ही रह गया। लाहौर में जन्मे 27 वर्षीय नबील को संगीत का शौक़ बचपन से था। घर में संगीत का माहौल था। पिता हारमोनियम में प्रवीण थे तो बड़े भाई गायिकी में । गायिकी का चस्का नबील को टीवी शो में किस्मत आज़माने के लिए प्रेरित कर गया। पाकिस्तानी टीवी के कुछ रियालिटो शो को जीतने के बाद उन्होंने सुर क्षेत्र में हिस्सा ले के अपनी विजय का सिलसिला ज़ारी रखा। पर उनकी आवाज़ को सुनने का मौक़ा मुझे तब मिला जब कुछ  ही दिन पहले एक मित्र ने कोक स्टूडियो के आठवें सत्र की इस प्रस्तुति को साझा किया। यकीन मानिये एक ही बार सुनकर मन इस गीत से बँध सा गया।

इस गीत को गाने के साथ साथ नबील ने इसे संगीतबद्ध भी किया है। गीतकार बाबर शौक़त हाशमी के बोल सहज पर दिल को छू लेने वाले हैं। पर जिस तरह अपनी गायिकी और संगीत रचना से उन्होंने इस ग़ज़ल में चार चाँद लगाए हैं उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है। गिटार और ड्रम्स तो कोक स्टूडियो की हर प्रस्तुति का अहम हिस्सा होते हैं पर इंटरल्यूड्स में कानों में शहद की मिठास भरती बाँसुरी और दिल को बहलाते तबले की थाप मन को सुकून से भर देती है !

किसी को याद करने की कोई वज़ह नहीं होती खासकर जब वो शख्स आपको प्यारा लगने लगे। फिर  तो वक़्त बेवक़्त ही वो आपके दिल के किवाड़ों में दस्तक देने लगता है। रिश्ता बना..वक़्त के हाथों बिगड़ गया। दिमाग ने सारी दीवारें खींच दीं और इस अहसास से अपने आप को संतुष्ट कर लिया कि लो मैंने तुम्हें भुला दिया। नादान था वो जो मोहब्बत को इन सींखचों में बाँधने की सोच बैठा। 

अब वो कहाँ जानता था कि कुछ भी करो , कितने भी व्यस्त रहो. अनायास ही ये दिल सींखचों के बीच उड़ता हुआ उन यादों के भँवर में डूब सा जाता है।  वो भी बिना किसी वज़ह के। 

तो आइए आज बेवज़ह ही सुने शौक़त आज़मी की इन भावनाओं को शौक़त अली की आवाज़ में.. :)


हिज्रे यारां ना सता बेवज़ह
बन गया तू क्यूँ वज़ह, बेवज़ह

दिल से कह वक़्त रुक जा पागल
चल पड़ा  करने ये वफ़ा बेवज़ह

मैं उसे भूल चुका भूल चुका
बात ऐ दिल ना बढ़ा बेवज़ह

नाम लेने का इरादा भी ना था
चल पड़ा जिक्र तेरा बेवज़ह

उनसे मिलने की वज़ह कोई नहीं
ढूँढता क्यूँ है वज़ह बेवज़ह



 

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