Wednesday, February 21, 2007

वार्षिक गीतमाला पायदान # 4: रात, नींद, ख्वाब और गुलजार !

देवियों और सज्जनों, एक बार फिर आपका ये सीरियल मेकर :) हाजिर है अपनी इस गीतमाला के चौथे नंबर के गीत को लेकर । अगर आपकी शिकायत ये है कि इस गीतमाला की रफ्तार इन दिनों पैसेंजर की माफिक क्यूँ हो गई है तो उसका जवाब यही है कि पिछले १२ दिनों में मैं सिर्फ तीन दिन ही घर पर बिता पाया हूँ और आगे भी हालात कुछ ऐसे ही नजर आ रहे हैं। खैर, इस बार हम लौटे हैं कानपुर की निम्मी -निम्मी ठंड का मजा लेते हुए । नींद, ख्वाब और रात के बारे में मैं सोचूँ तो अभी तो मुझे सफर में अपने डिब्बे की थोड़ी सी खुली खिड़की से आती सर्द हवा की याद आती है जिसने हमारी कच्ची नींद में जब तब सेंध लगाई ,पर गुलजार की रात में जागती आँखें तो कोई और फसाना बयां करती हैं ।

आखिर कौन है इन जागती आँखों का कुसूरवार?

अरे वही मुए ख्वाब जो उनकी नींद के साथ एक अर्से से कबड्डी खेलते आए हैं। याद है आपको घर फिल्म का किशोर दा का गाया वो गीत जिसने हॉस्टल के बन्द कमरे में हमारी कितनी ही रातों की नींद चुराई थीं ।

फिर वही रात है...
फिर वही रात है, ख्वाबों की
रात भर ख्वाब में, देखा करेंगे तुम्हें...
मासूम सी नींद में, जब कोई सपना चले
हमको बुला लेना तुम पलकों के पर्दे तले
ये रात है ख्वाब की, ख्वाब की रात है...


और फिर इंतजार की उन घड़ियों को गिनती ( फिल्म -खामोशी) की पुकार तो कभी मंद नहीं पड़ी..

ख्वाब चुन रही है रात बेकरार है, तुम्हारा इंतजार है....पुकार लो..!

या फिर जीवा में आशा जी का गाया ये गीत हो

रोज-रोज आँखों तले, एक ही सपना चले
रात भर काजल जले, आँख मे जिस तरह
ख्वाब का दीया जले...


नींद..रात ..ख्वाब..चाँद गुलजार के प्रिय विषय रहे हैं। शायद ये उनकी निजी जिंदगी में भी कुछ खास मायने रखते हों । यही वजह है कि इन शब्दों को पिरोकर निकला उनका हर गीत एक नए आयाम देता प्रतीत हुआ है । चौथी पायदान की ये छोटी सी नज्म इन शब्दों को जोड़ती हुई दिल को करीब से छूते हुए गुजर जाती हैं । गुरु फिल्म में इस नज्म की आरंभिक चार पंक्तियों का प्रयोग हुआ है क्योंकि वो कथानक पर दुरुस्त बैठती हैं।

जागे हैं देर तक हमें कुछ देर सोने दो
थोड़ी सी रात और है सुबह तो होने दो
आधे अधूरे ख्वाब जो पूरे ना हो सके
इक बार फिर से नींद में वो ख्वाब बोने दो

और अगर कोई ख्बाब देखते-देखते आपकी नींद टूट जाए तो भी हिम्मत ना हारें क्योंकि

इक ख्वाब टूट जाने का अहसास ही तो है
थोड़ी सी रात और सहर पास ही तो है !


गुरु की इस नज्म को अपना स्वर दिया है के. एस. चित्रा और ए.आर. रहमान ने । वैसे रहमान ने किसी दूसरे गायक को मौका दिया होता तो नतीजा और बेहतर होता ।

Related Posts with Thumbnails

4 comments:

Udan Tashtari on February 22, 2007 said...

वाह भई, सिरियल मेकर जी, फिर से एक दम सही पायदान पर एकदम सही गीत. अब तो एक रेडियो स्टेशन चालू कर ही दो. इसी तरह कहानी के साथ गाने सुनवा करो, शुभकामनायें. :)

Sunil Deepak on February 22, 2007 said...

अधिकतर जब सुबह सुबह काम पर जाने से पहले चिट्ठे पढ़ता हूँ तो क्मप्यूटर की ध्वनि बिल्कुल कम होती है, पर आज जाने कैसे कुछ ऊँची थी, तभी मालूम चला कि चिट्ठे के साथ साथ गीत भी था, बहुत अच्छा लगा. धन्यवाद

Manish on February 25, 2007 said...

समीर जी रेडियो स्टेशन अरे आपनी इतनी औकात कहाँ ! आप जैसा विशाल हृदय वाला एक स्पान्सर चाहिए बस !:)

Manish on February 25, 2007 said...

सुनील जी गीत आपको पसंद आया जानकर खुशी हुई !

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie