Sunday, March 04, 2007

रचना जी - सवाल आपके जवाब हमारे !

१६ फरवरी की अपनी पोस्ट में रचना जी ने जब मुझे अपनी टैग में शामिल किया था तब मुझे नहीं पता था कि मैं कितनी जल्दी या कितनी देर में उनके प्रश्नों का जवाब दे पाऊँगा । पहले बैंगलोर फिर कानपुर और फिर राउरकेला की यात्रा ने कुछ ऐसा फँसाया कि पिछले १५ दिनों में से ११ घर के बाहर बीते ।

खैर, रचना जी पहले तो आपका धन्यवाद कि आपने अपनी पोस्ट में सवालों को बदल कर एक ऐसे सिलसिले का आगाज किया जिससे कि सभी साथी चिट्ठाकारों को अपने लेखन एवम् अपनी पसंद के बारे में राय जाहिर करने का मौका मिला। नहीं तो पहले तो लोग-बाग बाट जोहते थे कि कब साक्षात्कार के प्रश्नों के साथ अनूप जी का भव्य रथ उनके द्वार पर आ के रुकेगा।:)

अंग्रेजी के चिट्ठों में टैगिंग का प्रचलन बहुत दिन से है पर यहाँ एक बात अलग सी लगी! जिस ईमानदारी के साथ हिन्दी चिट्ठा जगत के सदस्यों ने अपने जवाब लिखे हैं वो मन को अभिभूत कर गया । तो लौटता हूँ उन सवालों पर

१. आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं?
दस साल का था जब पहली बार सब से छुप छुपाकर अपनी पुरानी कॉपी में बहनों द्वारा खाना खिलाने में मेरे साथ हो रहे तथाकथित अत्याचार का ब्योरा लिखा था। वो कॉपी जब दीदी के हाथ लगी तो परिवार में परिहास का विषय बन गई। और मारे झेंप के लिखने का क्रम जो छूटा तो उसके बाद डॉयरी की शक्ल में +2 के समय ही दोबारा शुरु हो पाया । उसी वक्त से अपने कॉलेज जीवन, संगीत, कविता, शायरी, किताबों और यात्रा में बीते लमहों को डॉयरी के पन्नों में कैद करने की आदत सी हो गई । नौकरी में आने के बाद जिंदगी की प्राथमिकताएँ ऐसी बदलीं कि इस सिलसिले पर विराम सा लग गया। अपनी बात अपने जैसों में बाँट सकने की अकुलाहट दब तो गई पर मरी नहीं ।

यही वजह रही की आज से करीब दो वर्ष पूर्व मेरी मित्र
डॉन ने जब मुझे चिट्ठाकारी के विषय में बताया तो मुझे लगा कि अरे यही तो मैं हमेशा से करना चाहता था । चिट्ठाकारी मेरे लिए जिंदगी की इस भागदौड़ में अपनी रुचियों से जुड़ी रहने की कोशिश है। और जब अपनी इस कोशिश में दूर-दूर बैठे पर अपने जैसा सोचने और महसूस करने वाले दोस्त मिलते हैँ तो दिल को बेइंतहा खुशी मिलती है ।

२. यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?
ऐसे तो सारे चिट्ठाकारों से मिलने का मन करता है। हाँ, ये जरूर है कि चिट्ठाकारों के समूह में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने विचारों और रुचियों की बदौलत अंतरजालीय जिंदगी का अभिन्न अंग बन जाते हैं । अंग्रेजी चिट्ठा जगत में मेरे ऐसे ही कई मित्र हैं जिनसे मिलने की मन में इच्छा जरूर है। हिंदी चिट्ठा जगत में रचना जी और प्रतीक पांडे के आलावा ज्यादा लोगों से व्यक्तिगत रूप से जुड़ नहीं पाया हूँ। ये उम्मीद जरूर है कि अंग्रेजी की तरह भविष्य में हिंदी चिट्ठाजगत में भी वार्षिक रुप से चिट्ठाकारों की एक जगह एकत्रित होने की परम्परा शुरु होगी और सबसे मिलने की इच्छा फलीभूत हो पाएगी ।

३.क्या आप यह मानते हैं कि चिट्ठाकारी करने से व्यक्तित्व में किसी तरह का कोई बदलाव आता है?
मेरे लिए तो चिट्ठाकारी खुद ही मेरे व्यक्तित्व का आईना है और उसमें कुछ खास बदलाव नहीं आया है। पर चिट्ठाजगत में आने के बाद हिंदी भाषा के प्रति अपने दायित्व का बोध जरूर हुआ है । नारद, परिचर्चा और चिट्ठा चर्चा जैसे प्रयासों की बदौलत सारा हिंदी चिट्ठाजगत एक सूत्र में बँधा सा लगता है । इसलिए अगर परिचर्चा/नारद के माध्यम से मैं किसी को हिंदी में लिखने के लिए प्रेरित कर पाता हूँ तो अच्छा लगता है । रचना जी का ही उदाहरण लूँ तो वो खुद पहली बार मेरे रोमन ब्लॉग पर आईं थीं और फिर उनकी लेखन प्रतिभा को देखकर मैंने उन्हें परिचर्चा पर जाने को कहा था और देखिये पहले परिचर्चा और फिर हिंदी चिट्ठा जगत में अपने अच्छे लेखन से सबका स्नेह पा रही हैं।

४.आपकी अपने चिट्ठे की सबसे पसंदीदा पोस्ट और किसी साथी की लिखी हुई पसंदीदा पोस्ट कौन सी है?
ये प्रश्न हम सभी जानते हैं कि कितना कठिन है खासकर तब जब रोज कुछ ना कुछ उल्लेखनीय लिखा जा रहा है ।पसंदीदा पोस्ट का जिक्र करने से पहले कहना चाहूँगा कि मैं अक्सर अपनी रुचियों से जुड़े विषय ही नियमित रूप से पढ़ पाता हूँ । पर कई बार अच्छी पोस्ट देख कर आराम से पढ़ेंगे ऐसा सोचता हूँ और वो सोच बस सोच ही रह जाती है ।

अनूप शुक्ल की फिराक गोरखपुरी को समर्पित शानदार पोस्ट पर की गई उनकी मेहनत आज भी याद है । समीर जी के प्यारे तोते की कहानी सुन कर मेरी भी आखें नम हो गईं थीं। रत्ना शुक्ला की नारीमन की संवेदनाओं को जागृत करने वाली कविताएँ मुझे हमेशा से मन को छूती रही हैं। नीरज दीवान और मोहल्ले पर मीडिया के दायित्व पर लिखे लेखों ने आज भी मन में आशा की ज्योत जलाए रखी है कि वहाँ भी आज के हालात को लेकर वैसी ही बेचैनी है । ई-छाया के प्रवासियों पर लिखे लेख उनके चिट्ठाजगत छोड़ने के बाद उसी तरह दिल में नक्श हैं। इसके आलावा नये लोगों में रचना जी और अनुराग श्रीवास्तव का लिखा भी मुझे बेहद पसंद आता है।

अब अपनी प्रविष्टियों की बात करूँ तो धर्मवीर भारती की किताब गुनाहों का देवता पर लिखी अपनी प्रविष्टि मेरे दिल के बेहद करीब है।
सिक्किम पर लिखा यात्रा विवरण जो बाद में अभिव्यक्ति में छपा, लंबे लेखों में मेरी पहली पसंद है । मजाज लखनवी के व्यक्तित्व को उनकी नज्म आवारा के जरिए देखना भी मेरे लिए एक अलग तरह का अनुभव था ।

५.आपकी पसंद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं।
पुस्तकों को बार-बार पढ़ना मेरी आदत नहीं । हाँ, उनके कुछ अंश जो मुझे बेहद पसंद हों उन्हें उतार जरूर लेता हूँ । वैसे तो बहुत सी पुस्तकें रह रह कर अपनी ओर ध्यान खीँचती हैं पर यहाँ इन तीन का नाम लेना चाहूँगा ।

स्वतंत्र भारत में मध्यमवर्गीय नारी की अभ्युदय गाथा कहती आशापूर्णा देवी की सुवर्णलता, भारत की आजादी से जुड़े पहलुओं और खासकर उसमें महात्मा की भूमिका को ईमानदारी से उजागर करती डोमेनिक लैपियर और फिल कांलिंस की फ्रीडम ऐट मिडनाइट तथा उत्तर भारतीय ग्रामीण परिदृश्य के हर पहलू को अपने निराले अंदाज में छूती श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी मेरी पसंदीदा कृतियों में से हैं।


मुझे नहीं लगता कि अब कोई सवालों का उत्तर देने के लिए बचा रह गया है । और सवालों को बदलते बदलते काफी सारे सवाल भी पूछे जा चुके हैं । कुछ सवाल मेरे मन में भी हैं जिन्हें मैं सभी से पूछना चाहता हूँ । शायद उसके लिए परिचर्चा का फोरम ज्यादा उपयुक्त जगह होगी ।

चलते-चलते होली के इस पावन दिन पर आप सब को मेरी तरफ से रंगारंग शुभकामनाएँ ।:)
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11 comments:

Udan Tashtari on March 04, 2007 said...

आपको पढ़ना और जानना आनन्ददायक अनुभूति रही.

आपको भी होली की बहुत बहुत शुभकामनायें. :) :)

उन्मुक्त on March 04, 2007 said...

ऐसे आशापूर्ण देवी की प्रथम प्रतिशुति और बाकुल कथा भी बहुत अच्छी हैं।

नितिन व्यास on March 05, 2007 said...

आपके जवाब अच्छे लगे।

Dawn....सेहर on March 05, 2007 said...

WAh! Accha laga hindi jagat mein iss shrinkhala ko dekhkar aur parhkar :)
sadharanta iise angrezi blog mein hee dekha gaya hai!! Sawal acche the hee jawab lajawab rahe :D

Shubhkamnaon ke saath
DON ;)

अनूप शुक्ला on March 05, 2007 said...

जवाब अच्छे लगे। लेकिन ये बताओ भैये कि कानपुर आये और बिना मिले चले गये। कुछ सोचा भी नहींकि लोग क्या कहेंगे? क्या इतनी भी फुरसत नहीं थी कि फुरसतिये से मिल लेते? :)

पूनम मिश्रा on March 07, 2007 said...

बहुत अच्छा लगा आपके बारे में पढना.आपके चिट्ठा की चर्चा कुछ यहाँ भी है.टैग-ए-माला की कडी हूँ मैं

rachana said...

मनीष जी, बहुत शुक्रिया इस टेग को अपने अनोखे अन्दाज मे लिखने के लिये.आपके चिट्ठे पर कहीं पढा था कि आपको टेग करना पसंद नही, फिर भी अपने किया, खास धन्यवाद. शीर्षक देखकर यही लगा कि होली के पावन मौके पर रेडियो से कोई अन्तरंग प्रश्न-उत्तर का कार्यक्रम प्रसारित हो रहा है! आपकी उम्दा हिन्दी मुझे हमेशा से पसन्द है..शुक्र है कुछ दिनों के लिये आपने वो याहू का "चैट बाॉक्स" लगा रखा था, जिस पर मैने हिम्मत जुटा कर परिचर्चा और हिन्दी लिखने के बारे मे सवाल किये थे! और मै हिन्दी चिट्ठा-जगत के इतने बेहतर लोगों से जुड पाई.

@ डाॉन, आप हिन्दी मे भी सक्रिय होती तो आपको भी जरूर इन प्रश्नों के उत्तर देने पडते! आपने "सेहर" पर कई दिनों से कुछ लिखा नही है..क्या आप इन प्रश्नों के जवाब वहाँ लिखना चाहेंगी?

Manish on March 08, 2007 said...

समीर जी और नितिन भाई शुक्रिया !

उनमुक्त जी बिलकुल ..प्रथम प्रतिश्रुति के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था

Manish on March 08, 2007 said...

डॉन आपने ही मुझे ये मार्ग दिखलाया । इसके लिए में हमेशा आपका शुक्रगुजार रहूँगा ।

Manish on March 08, 2007 said...

अनूप जी समय की कमी थी ! मात्र २७ घंटे और कजन की शादी ! अगली बार आपको शिकायत का मौका नहीं दूँगा ।


पूनम जी बहुत बहुत धन्यवाद !

Manish on March 08, 2007 said...

रचना जी हा हा ! करना तो था ही, मित्रों को खींचना मुझे पसंद है तो चैट पर इसीलिए थोड़ी मौज ले रहा था । वहाँ जो कहा यहाँ जो किया उसमें फर्क है ना :)

 

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