Saturday, August 18, 2007

यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया... भाग १ (आज का गीत- दुनिया ओ दुनिया)

किसने जाना था कि एक छोटे से शहर 'खंडवा' मे पैदाइश लेने वाला 'आभास कुमार गाँगुली' नाम का बालक भारतीय संगीत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ जाएगा। १९४८ में खेमचंद्र प्रकाश की संगीत निर्देशित फिल्म जिद्दी में अपना पहला गीत 'मरने की दुआएँ क्यूँ मागूँ' से लेकर अक्टूबर १९८७ में 'वक़्त की आवाज़' में आशा जी के साथ गाए गीत 'गुरु ओ गुरु..' तक अपने चालीस साल के संगीत सफ़र में किशोर दा ने संगीत प्रेमी करोड़ों भारतीयों का दिल जीता और आज भी जीत रहे हैं। किशोर कुमार को जब उनके बड़े भाई अशोक कुमार एक अभिनेता बनाने के लिए मुंबई लाए तो किशोर दा, मन ही मन कोई ख़ास उत्साहित नहीं थे। उनका तो सपना अपने उस वक़्त के प्रेरणास्रोत के एल सहगल से मिलने का था जो दुर्भाग्यवश पूरा नहीं हो पाया क्योंकि इनके मुंबई आगमन के कुछ ही दिन पश्चात सहगल चल बसे।

अपने शुरुआती दिनों में के एल सहगल के अंदाज का अनुकरण करने वाले किशोर दा की गायिकी में एक ख़ूबसूरत मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात एस डी बर्मन साहब से हुई। ये भी एक संयोग ही था कि बर्मन सीनियर, अशोक कुमार जी के घर पहुँचे और किशोर को बाथरूम में गुनगुनाते सुन कर ठिठक गए और उनसे मिल कर जाने का ही निश्चय किया। उन्होंने ही किशोर को गायन की अपनी शैली विकसित करने के लिए प्रेरित किया। किशोर दा की जिस आवाज़ के हम सब क़ायल हैं, वो पचास के उत्तरार्ध में एस डी बर्मन के सानिध्य का ही परिणाम रहा है।

अग़र बाकी गायकों की अपेक्षा किशोर दा के योगदान पर विचार करूँ तो यही पाता हूँ कि जहाँ रफी ने गायिकी में अपनी विविधता से सबका मन जीता, वहीं किशोर दा ने हिंदी फिल्म संगीत की गायिकी को आम जनता के होठों तक पहुँचाया। उनकी गायिकी का तरीका ऍसा था कि जिसे गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए अपेक्षाकृत अधिक सहज है। दरअसल किशोर, मुकेश और हेमंत दा सरीखे गायकों ने अपनी आवाज़ के बलबूते पर ही संगीतप्रेमी जनमानस को अपना दीवाना बना लिया। मोहम्मद रफी और मन्ना डे जैसे गायक दिलकश आवाज़ के मालिक तो थे ही, पर साथ-साथ वे शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल करने के बाद हिंदी फिल्मों में पार्श्व संगीत देने आए थे। किशोर दा के पास ऍसी काबिलियत नहीं थी फिर भी इसकी कमी उन्होंने महसूस नहीं होने दी और अपने मधुर गीतों को हमें गुनगुनाने पर मज़बूर करते रहे।


चार अगस्त को किशोर दा का जन्मदिन था। सो इस महान शख़्सियत को अपनी श्रृंद्धांजलि स्वरूप, आज से मैं 'किशोर दा' के उन दस गीतों को आपके सामने पेश करूँगा जिन्हें गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है। दरअसल आज हमारे सरीखे लोग अगर बाथरूम सिंगर बन पाए हैं तो उसका बहुत बड़ा श्रेय किशोर दा को जाता है :)। किशोर दा कि ख़ुशमिज़ाज गायिकी से तो हम सभी वाकिफ़ हैं। यूडलिंग के साथ गाए उन गीतों के साथ होता हूँ, तो मन हल्का-हल्का सा लगने लगता है। पर मैंने इन दस गीतों में ज्यादातर वैसे गीतों को चुना है जिनमें एक उदासी का पुट है।

वैसे तो जिंदग़ी खुशी और मायूसी का संगम है पर खुशी तो सब के साथ बँटती रहती है, रह गई उदासी तो वो दिल के किसी कोने में मुंह छुपाए बैठी रहती है। और कभी एकांत के पलों में आप दिल के क़रीब वक़्त गुजारने जाते हैं तो इसी उदासी से रूबरू हो बैठते हैं।


खैर, तो चलें गीतों कि इस उलटी गिनती को शुरु करें ।

गीत संख्या १०.: दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं ...

इस श्रंखला का पहला गीत फिल्म नया ज़माना से है। ये फिल्म १९७१ में रिलीज हुई। इस गीत के बोल लिखे थे आनंद बख्शी ने और धुन बनाई थी एस डी बर्मन ने।

बड़ी पेचदगी है इस दुनिया में....

जैसे लोग दिखते हैं वो होते नहीं...
सहजता से सब पर विश्वास करने वाला, कभी ना कभी ठोकर खाता ही है...
महान जन कहते हैं कि ऍसे ठोकरें खा के आदमी परिपक्व बनता है।

पर क्या ये सच नहीं कि हम सभी का जीवन ऍसी ही होशियारी जमा करते-करते, कुटिलता के उस मुकाम तक पहुंच जाता है कि कभी-कभी अपने बच्चों की मासूमियत देख, ख़ुद पर शर्म आती है। मन सोचने पर मज़बूर हो जाता हे यार ! हम भी कभी ऍसे थे... दुनिया के ऍसे ही रूप की झलक दिखाता हे ये गीत।

तो पहले सुनिए गुनगुनाहट इस बाथरूम सिंगर की...।



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वैधानिक चेतावनी : ऊपर की रिकार्डिग सुनने के लिए आप बाध्य नहीं हैं। उसे सुनकर आए किसी दुष्प्रभाव की जिम्मेदारी प्रस्तुतकर्त्ता की नहीं है :)


इस गीत को पूरा आप यहाँ से भी सुन सकते हैं


दुनिया ओ दुनिया, तेरा जवाब नहीं
तेरी जफ़ाओं का, बस कोई हिसाब नहीं

तू छांव है या है धूप खबर किसको
क्या है तेरा असली रूप खबर किसको
आये नज़र कैसे तू आँसू है, ख़्वाब नहीं
दुनिया ओ ...

तेरे ज़ुबां पे है, ज़िक्र सितारों का,
तेरे लबों पे है, नाम बहारों का
पर तेरे दामन में, काँटे हैं, गुलाब नहीं
दुनिया ओ ...

ये किन खयालों में, खो गये हैं आप,
क्यों कुछ परेशाँ से, हो गये हैं आप
आपसे तो मुझको कुछ शिक़वा जनाब नहीं
दुनिया ओ ...

इस गीत के बोल अक्षरमाला से लिए गए हैं।

धर्मेंद्र, प्राण और हेमा मालिनी पर अभिनीत इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।


इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ


  1. यादें किशोर दा कीः जिन्होंने मुझे गुनगुनाना सिखाया..दुनिया ओ दुनिया
  2. यादें किशोर दा कीः पचास और सत्तर के बीच का वो कठिन दौर... कुछ तो लोग कहेंगे
  3. यादें किशोर दा कीः सत्तर का मधुर संगीत. ...मेरा जीवन कोरा कागज़

  4. यादें किशोर दा की: कुछ दिलचस्प किस्से उनकी अजीबोगरीब शख्सियत के !.. एक चतुर नार बड़ी होशियार

  5. यादें किशोर दा कीः पंचम, गुलज़ार और किशोर क्या बात है ! लगता है 'फिर वही रात है'

  6. यादें किशोर दा की : किशोर के सहगायक और उनके युगल गीत...कभी कभी सपना लगता है

  7. यादें किशोर दा की : ये दर्द भरा अफ़साना, सुन ले अनजान ज़माना

  8. यादें किशोर दा की : क्या था उनका असली रूप साथियों एवम् पत्नी लीना चंद्रावरकर की नज़र में

  9. यादें किशोर दा की: वो कल भी पास-पास थे, वो आज भी करीब हैं ..समापन किश्त
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13 comments:

yunus on August 12, 2007 said...

बिल्‍कुल सही मनीष किशोर दा ने अपनी गायकी से आम आदमी को जोड़ा । इसीलिए आप पायेंगे कि किशोर के जितने क्‍लोन आये हैं उतने किसी के नहीं आए, रफ़ी के भी नहीं, स्‍थानीय ऑकेस्‍ट्रा में भी आपको किशोर की तरह गाने वाले आसानी से मिलेंगे, रफ़ी, मन्‍नाडे, हेमंत दा जैसे कम और तलत के तो बहुत बहुत ही कम । किशोर दा की ख़ासियत ये है कि वो युवाओं के गायक रहे हैं । नौजवान पीढ़ी के गायक । उनमें वो बेफिक्री, बिंदासपन और जोश लगातार मौजूद रहा जिसके नौजवान कायल होते हैं । देखें आपके पसंदीदा गाने कौन से हैं

नितिन बागला on August 12, 2007 said...

और सब तो ठीक मनीष भाई पर ये वैधानिक चेतावनी किस लिये? किस पर दुष्प्रभाव पड रहा है?

Manish on August 12, 2007 said...

आपकी बात से पूरी तरह इत्तिफ़ाक रखता हूँ यूनुस !
इतने लोकप्रिय गायक के दस गानों को छाँटना तो बेहद मुश्किल है। सो अपनी चुनाव का दायरा छोटा करने के लिए, मैंने उनके मस्ती भरे गानों जिनमें से कुछ तो मुझे बेहद प्रिय हैं को सम्मिलित नहीं किया है।

Manish on August 12, 2007 said...

वैधानिक चेतावनी इस लिए नितिन भाई कि किशोर दा की सुरीली आवाज़ के बीच में अगर मेरी आवाज़ सुनकर कहीं मुँह का ज़ायका बिगड़ जाए तो उसकी जिम्मेवारी मेरी नहीं...:) :) :)

sunita (shanoo) on August 12, 2007 said...

शुक्रिया मनीष जी मेरी कविता पर टिपियाने के लिये वैसे मुझे मालूम था कविता तो छोड़ना मेरे बस की बात न होगी मगर कोशिश की और लौट आई अपनी इस प्यारी दोस्तो की दुनियाँ में...

अच्छा लगा पढकर और किशोर दा को तो हम वर्षो से सुनते आ रहे है मुझे उनके बहुत से गाने बेहद पसंद है...

सुनीता(शानू)

Udan Tashtari on August 12, 2007 said...

आपकी गुनगुनाहट बहुत कोशिशों के बाद भी नहीं सुन पाये. चल नहीं रही.

बाकी की पूरी पोस्ट में तो खैर आनन्द आ गया.

जरा अपनी गुनगुनाहट अलग से भेज दें, अगर संभव हो तो.

Udan Tashtari on August 13, 2007 said...

वाह वाह!! अब सुन लिया. क्या गाते हो भाई. जब बाथरुम में यह हाल है तो स्टूडियो में मय म्यूजिक तो छा जाओगे. कुछ करते क्यूँ नहीं? मैं कहीं सेटिंग करवाऊँ क्या?? :)

mamta on August 13, 2007 said...

माशाल्लाह आप तो बहुत अच्छा गाते है.अरे आप कॉन्टेस्ट मे भाग क्यों नही ले रहे है।

कंचन सिंह चौहान on August 13, 2007 said...

मै अपने excitement को कैसे depict करूँ यहाँ पर.......? बस समझ लीजियेगा....! बहुत दिन से सोच रही थी कि आपसे कहूँ कि गाना तो आप निश्चित ही गाते होंगे, पर सुनूँ कैसे? वाह... वाह...वाह!

कंचन सिंह चौहान on August 13, 2007 said...
This comment has been removed by the author.
Manish on August 14, 2007 said...

गीत पसंद करने के लिए आप सबका शुक्रिया !

Anonymous said...

arre apko sunne ka mauka mila khushi huyi!!

smita

Merosoft on August 12, 2009 said...

आप्का ब्लग एकदम तारिफ कर्नेकी लाएक हैन हजुरको ब्लग एकदम राम्रो छ. म उत्तर उत्तर पर्गतिको कामना गर्दछु

 

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