Saturday, November 14, 2009

'बुढ़िया कबड्डी' और बचपन के वे अनमोल दिन .....

तो आज है बच्चों का दिन यानि बाल दिवस ! तो क्यूँ ना इस दिन बचपन की कुछ बातों को साझा किया जाए एक बेहद दिलअज़ीज़ गीत के साथ। समय के साथ कितना बदल गया है तब और आज का बचपन। तब भी मस्तियाँ और शैतानियाँ होती थीं और आज भी। फर्क आया है इनके तौर तरीकों में, तब के और आज के माहौल में। बचपन की स्मृतियों पर नज़र दौड़ाऊँ तो बहुत सारी बातें अनायास ही मन में आती हैं। पेड़ों पर रस्सी लगा कर झूला झूलना, इमली के पेड़ की डरते डरते चढ़ाई करना, टोकरी को तिरछा कर रस्सी के सहारे चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करना, हारने या खेल में ना शामिल किए जाने पर टेसुए बहाना, मन का ना होने पर बार बार घर छोड़ने की धमकी दे डालना और ऐसी ही ना जाने कितनी और बातें। पर आज बात उन खेलों की जिन्हें खेलते हुए बचपन का एक बड़ा हिस्सा बीता।

बचपन में पहला खेल जो हमनें सीखा था वो था बुढ़िया कबड्डी। अगर आप इस खेल से वाकिफ़ ना हों तो ये बताना जरूरी होगा कि इस खेल में अपनी साँस बिना तोड़े बारी बारी से विपक्षी दल के खिलाड़ियों को दौड़ाना और इन्हें छू कर वापस आना होता था। ऍसा इसलिए किया जाता था ताकि एक गोल रेखा के अंदर खड़ी अपने दल की बुढ़िया को भागने का रास्ता मिल जाए। कबड्डी के इस परिवर्तित रूप में गोल रेखा के अंदर खड़े खिलाड़ी को बुढ़िया क्यूँ कहा जाता था ये अभी भी मेरी समझ के बाहर है।

ज़ाहिर है जितनी लंबी साँस होगी उतने ही अधिक खिलाड़ियों को दौड़ाकर आप बुढ़िया का काम आसान कर सकते थे। अब एक साँस को लेने के लिए कई तरीके थे। सबसे प्रचलित होता था

शैल तीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई............. या फिर
कबड्डी के बाड बड्डी बाड बड्डी बाड बड्डी......

पर इन दोनों तरीकों में साँस में हेर फेर यानि चीटिंग करने की गुंजाइश काफी कम होती थी तो हम लोग इनका इस्तेमाल कम ही करते थे। सबसे मज़ेदार रहता

शैल दल्ले छू दल्ले छू...

बोलना क्यूँकि ये इतनी धीमी गति से बोला जाता कि साँस ले लेने का पता ही न चलता। अगर विपक्षी खिलाड़ी शिकायत करते तो हम अपने दूसरे सहारे प्रकाश लाल की शरण में चले जाते। अब ये न पूछिएगा कि ये प्रकाश लाल कौन था क्यूंकि हम तो उसे जाने बगैर ही उसका मर्सिया पढ़ देते थे यानि

शैल कबड्डी आस लाल मर गया प्रकाश लाल मेरा....लाल लाल लाल लाल...

बुढ़िया कबड्डी का शुमार तो अब लुप्तप्राय खेलों में कर लेना चाहिए। पर गिल्ली डंडा, रस्सी और लट्टू, कंचों पिट्टो, कोनों की अदला बदली और रुमाल ले कर भागने वाले खेल तो कस्बों और गाँवों में जरूर खेले जाते होंगे। आज तो बाजार में हर आयु वर्ग के लिए तरह तरह के आकर्षक खेल हैं खासकर तब जब आपकी जेब में इनके लिए पर्याप्त पैसे हों। वैसे भी आज के बच्चों के हाथ, मोबाइल और कम्प्यूटर के कीबोर्ड में गेम खेलने को इतने सिद्धस्त हो जाते हैं कि उन्हें गिल्ली और डंडे को पकड़ने की जरूरत ही क्या है। पर जो बच्चे इन सुविधाओं से अभी भी दूर हैं उनके लिए तो ये खेल आज भी मौज मस्ती की तरंग जरूर लाते होंगे।

तो आइए आज आपको वो गीत सुनाऊँ जो मुझे अपने बचपन की इन्हीं यादों के बहुत करीब ले जाता है। सुजाता फिल्म के इस गीत के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था सचिन देव बर्मन साहब ने। गीता दत्त और आशा जी ने जो चुनिंदा युगल गीत गाए हैं उनमें से ये एक था। गायिकी, संगीत और बोल तीनों के लिहाज़ से ये गीत मुझे पसंद हैं ..



बचपन के दिन बचपन के दिन
बचपन के दिन भी क्या दिन थे हाय हाय
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन....

वहाँ फिरते थे हम फूलों में पड़े
यहाँ ढूँढते सब हमें छोटे बड़े
थक जाते थे हम कलियाँ चुनते
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन.....

कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय रे हाय हाय हाय हाय रे हाय
कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन ...


और चलते चलते आज के बचपन को अपने क़ैमरे में क़ैद करने की मेरी कोशिश


तो क्या आपको ये प्रविष्टि आपके बचपन तक खींच कर ले जा सकी ?
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19 comments:

रंजना on November 14, 2009 said...

Bilkul le gayi.....chehre par bilkul wahi befikra muskaan abhi tair rahi hai,jo baalpan ka hissa hua karta tha...

Main to ladki thi par apne do chhote bhaiyon ke gilli danda kee pramukh sangini main hi hua karti thi... wo bhi kya din the.....

Udan Tashtari on November 14, 2009 said...

बचपन की सैर कर आये मन में...बेहतरीन!!


बाल दिवस की शुभकामनाएँ.

राज भाटिय़ा on November 14, 2009 said...

बहुत सुंदर जी गीत भी बहुत प्यारा लगा. धन्यवाद

Priya on November 14, 2009 said...

zindgi de gai aapki post to

Navin Tiwari on November 14, 2009 said...

मजा आ गया मनीष भाई का ये लेख पढ़ के

अगर आपकी अनुमति हो तो क्या मैं इसे कही पे शेयर कर लू आपके ब्लॉग (चिठा) के लिंक के साथ |

इन्तेजार हैं आपके हाँ की |

Priyank Jain on November 14, 2009 said...

maine kahin padha tha:"bachpan ke na jane kitne sach bade hone par jhuth maloom hote hain, KYA SACHMUCH HUM BADE HONE PAR SACH KO JHUTH KARTE JATE HAIN".Mai to khair abhi bachcha hi hoon isliye khoob khelta hoon aur khasi hone par bhi imli kha leta hoon,mai is baat ke liye apne ko bhagyashali samajhta hoon ki maine aadhunik aur alahad bachpan dono ko jiya hai.Aapki aaj ki pravishti ki ek khas baat rahi ki ye uparyukt bachpan ki shreniyoon ki nirarthak behas me nahi uljhi.
Pata nahi kyun par mai ye gana sirf padh hi paya shayad isliye kuch maza jarur kam raha par yakeen maniye bhaut shandaar prayaas tha aapka ye sabko "chane ke jhaad se girane ka".

Manish Kumar on November 14, 2009 said...

जी बिल्कुल नवीन भाई ये यादें तो आप सब से बाँटने के लिए ही तो हैं।

अभिषेक ओझा on November 15, 2009 said...

:) dalle chhoo !

हिमांशु । Himanshu on November 15, 2009 said...

पहुँच ही गये बचपन में । गीत तो खैर बेहद खूबसूरत है । आभार ।

Harkirat Haqeer on November 15, 2009 said...

वाह मनीष जी आपने तो पचपन की याद दिला दी कबड्डी तो हम भी बहुत खेला करते थे ......छल कबड्डी अकडा बुलबुल का बक्डा ....आगे याद नहीं , एक और कहा करते थे ....कबड्डी कबडुआ बाप तेरा नटुआ मैं तारी तारी जाईं कतक दुरु जाईं....पता नहीं अब तक कैसे याद है ....!!

श्रद्धा जैन on November 15, 2009 said...

Waah waqayi baal diwas par khud ke bachpan ko yaad karne se behatar kuch nahi ho sakta

Renu Mishra said...

manish ji maine bhi apke is lekh ko jo ki bal divas ke mauke pe apne likha hai ko padha aur bachpan ki yadein phir se taza ho gayin.aap bahot accha likhta hain

shangrila on November 17, 2009 said...

thanku manishji aapka lekh padkar sach me bachpan ke din yaad aa gaye hum log bhi jam kar masti karte the holy ke samay mein logo ke gharo se lakdi churana,holika jalane ke liye,dusre ke pedo se aam aur amarud churana football aur gend tadi khelna aur aisitamaam bate ek satth ankho ke samne aa gayi.aaj ke bache aadhunikta mein sach mein kahi kho gaye hai

Renu Mishra said...

manish ji jis khel ke baare me aap ne likha hai us khel ko maine bhi khela tha aur wo mera manpasand khel tha us waqt main class 9th menin thi,par humlog us khel ko "buddhichor", ke naam se jante the par aaj kal kisi bhi vidyalay ya park men aisa khel dekhne ko nahin milta kyon ki aaj kal ke zamane mein bachche ghar men rah kar TV dekhna zyada pasand karte hain, kyon ki aapne apne lekh mein is khel ka zikra kiya is liye mujhe bahot accha laga,iske sath hi aur bhot se lekh maine padhe joki mujhe bahot acche lage

Manish Kumar on November 17, 2009 said...

Shukriya Shangrila aur Renu ji aap donon ka. Behad achcha laga ki is post ki wazah se mujhe aapke bachpan ke kuch anubhavon ko jaanne ka mauqa mila.

Manish Kumar on November 17, 2009 said...

मज़ेदार संस्मरण सुनाया आपने हरकीरत जी पर ये मैं तारी तारी जाईं कतक दुरु जाईं.... का मतलब क्या हुआ ये ठीक से समझ नहीं आया। मदद करें :)

रविकांत पाण्डेय on November 18, 2009 said...

सच में बचपन में पहुंचा दिया आपने। कबड्डी के साथ-साथ और भी कई खेल याद आ गये।

Chandra on December 12, 2009 said...

Can't tell you how well i related to this post. Very few of us know Buddhiya Kabaddi.
Thanks for such a nice post...

mrityunjay kumar rai on November 15, 2011 said...

यार पोस्ट पढकर बहुत अच्छा लगा , साधुवाद

 

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