Sunday, February 24, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 5 : इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ..

वार्षिक संगीतमाला का सफ़र आ पहुँचा है अपनी आखिरी पाँच पॉयदानों के मुकाम तक। संगीतमाला के इन अंतिम पाँच गीतों की शुरुआत गैंग्स आफ वासेपुर में पीयूष मिश्रा के गाए इस गीत के साथ। इस साल जो दो एकल गीत पीयूष ने गाए हैं वे दोनों ही इस संगीतमाला का हिस्सा बने हैं। पीयूष मिश्रा के बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि वो एक ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने शायद ही फिल्म और रंगमंच जगत से जुड़ी किसी विधा पर हाथ ना आज़माया हो। पर रंगमंच, फिल्म संगीत, पटकथा लेखन, गीतकार, गायक, अभिनेता के विविध किरदारों को निभाने के बाद उनकी ज़िदगी में कुछ और नया करने की चाहत मरी नहीं है और शायद इसीलिए उनकी नई पुरानी कृतिया जब भी श्रोताओं के सामने आती हैं उनकी प्रतिभा का लोहा मानने के आलावा उनके पास दूसरा कोई चारा नहीं बचता। 


पीयूष का मानना है कि एक इंसान के पास इतने गुण छिपे होते हैं जिनका उसे खुद भी भान नहीं होता। पीयूष के अनुसार एक कलाकार की यात्रा अपने अंदर के इन छिपे गुणों के प्रति संशय से लड़ने और उससे सफलतापूर्वक बाहर निकलने की ज़द्दोज़हद है। अपनी इस लड़ाई के पीछे उनका ये दृष्टिकोण माएने रखता है। वे कहते हैं

"मैं कोई भी काम लगातार करते करते बहुत जल्दी ऊब भी जाता हूँ। मैं मानता हूँ कि हर काम बेहतर तरीके से करने की जरूरत होती है पर व्यक्ति को काम कर चुकने के बाद उसे सलाहियत से भूलने की भी आदत होनी चाहिए। अभी गैंग्स आफ वासेपुर की है मैंने पर मैं उसे भूल चुका हूँ इसके आगे भी बहुत सारा काम करना है..."

पर हमारे यहाँ दिक्कत यही है कि फिल्म जगत की इस मायावी दुनिया में गीतकारों को अपनी हुनर लायक काम मिल नहीं पाता है। पीयूष ने हाल ही में NDTV को दिए साक्षात्कार में कहा था गुलाल की सफलता के बाद उन्हें लगा था कि उसके बाद उनका कैरियर बन जाएगा। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ क्यूँकि जो मौके आए उनमें पीयूष के मन लायक कुछ करने का था नहीं। वैसे ये समस्या सभी प्रतिभाशाली गीतकारों के साथ है राजशेखर ने पिछले साल तनु वेड्स मनु के लिए ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है जैसा शानदार गीत लिखा पर अपनी नई रिलीज़ के लिए उनके प्रशंसकों को एक साल से ज्यादा इंतज़ार करना पड़ रहा है। अमिताभ भट्टाचार्य को 'आमिर' के बाद अपने ऊपर लगे गंभीर गीतकार के टैग को निकालने के लिए आइटम सांग से  लेकर हर तरह के गीत लिखने पड़े। पीयूष इस बारे में कहते हैं
"किसी को जरूरत नहीं है ऐसे गानों की। अनुराग जैसा लफंगा मुझे मिलता रहे ना ज़िंदगी भर तो मैं बड़ा अनुगृहित रहूँगा उसका कि ऐसे लोग मिलते रहेंगे तो करवाते रहेंगे ऐसा कुछ। इक बगल में चाँद होगा ..जाने कहाँ से खोज लिया इसने मेरी किताब से। 1996 दिसंबर में मैंने एक नाटक किया था लेडी श्री राम कॉलेज के सामने, जिसका नाम था एक थी सीपी..एक थी सीपी। उसी नाटक के लिए ये गीत लिखा गया था। अनुराग ने कहा ये गीत करना है। मैंने कहा क्यूँ करना है? फिल्म पूरी हो चुकी थी और मेरा काम सिर्फ अभिनय था और मैं सोच रहा था कि सिर्फ एक्टिंग कर के निकल जाऊँगा  आराम से। पर अनुराग के कहने पर मैंने इसे किया और फिल्म के लिए मुझे इसकी धुन भी बदलनी पड़ी।"

पीयूष का मानना है कि अनुराग, दिवाकर , इम्तियाज़ और विशाल भारद्बाज जैसे निर्देशकों की वज़ह से उनके जैसे गीतकारों के लिए कुछ करने लायक हो पा रहा है।

ख़ैर ये तो थी इस गीत के पीछे की कहानी। तो लौटते हैं पाँचवी पॉयदान के इस संवेदनशील नग्मे की तरफ। गीत के परिदृश्य में पीयूष के अनुसार उस वक़्त का बिहार है जब वहाँ बहुत मुफ़लिसी थी और उस वक़्त धीरे धीरे पलायन हो रहा था लोग बाग शहर जाना शुरु कर रहे थे। गरीबी और बेरोजगारी से उत्पन्न पलायन की इन विषम परिस्थितियों के बावज़ूद भी इन लोगों में जो जीने की ललक है, जो हिम्मत ना हारने का जज़्बा है उसको ही पीयूष मिश्रा ने इस गीत की पंक्तियों में बड़ी खूबसूरती से उभारा है। पीयूष ने गीत के मुखड़े में सितार और इंटरल्यूड्स में बाँसुरी का प्रयोग किया है। पर इस गीत की जान हैं इसके शब्द।

गीत में पीयूष ने कहना चाहा है कि कहीं तो कोई चाँद से खेल रहा है तो कहीं रोटियों के लिए मारामारी है। एक ओर मुद्राओं की खनक है तो दूसरी ओर रुदन के स्वर हैं । पर सामाजिक असमानता के इस माहौल में क्या गरीबों की कोई  सुध लेने वाला है?  पर इन्हें अब इस बात का आसरा भी नहीं कि कोई इनका उद्धार करने बाहर से आएगा। अपने भाग्य से इन्हें ख़ुद ही लड़ना है। इतनी हिम्मत पैदा करनी है अपने आप में कि आती मौत भी इनके जज़्बे को देख दूर भाग जाए।

तो उन्हीं की आवाज़ में सुनते हैं ये नग्मा


इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ
इक बगल में नींद होगी, इक बगल में लोरियाँ
हम चाँद पे रोटी की चादर डालकर सो जाएँगे
और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे

इक बगल में खनखनाती सीपियाँ हो जाएँगी
इक बगल में कुछ रुलाती सिसकियाँ हो जाएँगी
हम सीपियों में भरके सारे तारे छूके आएँगे
और सिसकियों को गुदगुदी कर कर के यूँ बहलाएँगे

अब न तेरी सिसकियों पे कोई रोने आएगा
गम न कर जो आएगा वो फिर कभी ना जाएगा
याद रख पर कोई अनहोनी नहीं तू लाएगी
लाएगी तो फिर कहानी और कुछ हो जाएगी

होनी और अनहोनी की परवाह किसे है मेरी जाँ
हद से ज्यादा ये ही होगा कि यहीं मर जाएँगे
हम मौत को सपना बता कर उठ खड़े होंगे यहीं
और होनी को ठेंगा दिखाकर खिलखिलाते जाएँगे

 

एक शाम मेरे नाम पर पीयूष मिश्रा

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10 comments:

प्रवीण पाण्डेय on February 24, 2013 said...

बहुत अर्थ निकलता है सदा ही इस गीत से...फिल्म में तो यह बहुत ही उभर कर आता है..

expression on February 24, 2013 said...

excellent....बार बार सुनने लायक..

अनु

Anurag Arya on February 24, 2013 said...

वैसे सरपराईजीनगली अनुराग कश्यप की म्यूजिक सेन्स मुझे उनके डाइरेक्टर सेन्स से ज्यादा काबिल लगती है .शैतान ,गुलाल ओर फिर G O W.इस वज़ह से भी वे मासेस में पेनीट्रेट कर गए है .दिबाकर यहाँ शंघाई में एक शानदार प्लाट ओर मूवी के बावजूद पीछे रह गए .उम्मीद करता हूँ आगे फिल्म के इस माध्यम की ताकत को वो भी समझेगे .एक बात ओर इन साहब को भी गायक के "रेंज के विस्तार" को समझना होगा ....एक जैसे गानों के रिपिटिशन से बचने के लिए .

Sushil Choker on February 24, 2013 said...

मेरा पसंदीदा गीत...

abhishek singhal on February 24, 2013 said...

बढ़िया लेख,,

Manish Kumar on February 25, 2013 said...

"अनुराग कश्यप की म्यूजिक सेन्स मुझे उनके डाइरेक्टर सेन्स से ज्यादा काबिल लगती है" 100 % सहमत हूँ इस कथन से। यही वज़ह है कि मुझे गुलाल या GOW टुकड़ों में अच्छी लगी पर इन फिल्मों गीत संगीत कभी ज़ेहन से दूर नहीं गया।

वैसे यही बात मेरी समझ से विशाल भारद्वाज पर भी लागू होती है। वैसे विशाल तो खुद भी कुबूल करते रहे हैं कि निर्देशन इसीलिए करना शुरु किया कि संगीत संयोजन का मौका मिलता रहे।

रही बात शंघाई की तो शंघाई में बस एक गीत "जो भेजी थी दुआ " मुझे बहुत अच्छा लगा था।

पीयूष मूलतः रंगमंच के कलाकार हैं और उनके अधिकांश गीतों (जिनमें उन्होंने ख़ुद अपनी आवाज़ दी है)में वे एक दास्ताँ सुनाते नज़र आते हैं। उनकी आवाज़ की ठनक मुझे बेहद पसंद है इसलिए ये एकरूपता मुझे अभी भी भाती है। वैसे भी साल में दो गीत गाने वाले से बोर कैसे हुआ जा सकता है :)

Ramakant Roy on February 26, 2013 said...

फिल्म गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर में इसे उन्ही की आवाज में सुनना और ज्यादा मोहक है.

Jiten Dobriyal on February 26, 2013 said...

nice song

Saroj Goswami on February 28, 2013 said...

Wah bahut khoob

Manish Kumar on March 05, 2013 said...

जीतेन, सरोज, प्रवीण, अभिषेक, अनु जी, रमाकांत, सुशील ये गीत आप सबको भी पसंद है जानकर खुशी हुई।

 

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