Wednesday, September 18, 2013

वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ : कैसे सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया ?

सचिन देव बर्मन के गाए पसंदीदा गीतों की श्रंखला में पिछली पोस्ट में बात हुई फिल्म बंदिनी के गीत मेरे साजन हैं उस पार.... की। आज उसी सिलसिले को बढ़ाते हुए बात करते हैं सचिन दा के गाए फिल्म 'गाइड' के बेहद मशहूर गीत वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ..... की...।  पर गाइड के इस गीत के बारे में बात करने से पहले ये जानना रोचक रहेगा कि दादा बर्मन को गायिकी का रोग लगा कैसे?
सचिन दा के पिता खुद भी ध्रुपद गायक थे। वे सितार भी बजाते थे। बालक सचिन देव बर्मन पर संगीत की पहली छाया उन्हीं के माध्यम से पड़ी। पर सचिन जिस लोक संगीत के बाद में मर्मज्ञ बने, उसका आरंभिक ज्ञान उन्हें राजपरिवार के लिए काम करने वाले सेवकों की सोहबत से मिला। पहली बार पाँचवी कक्षा में पूजा के अवसर पर सचिन दा ने गीत गाया। स्कूल से जब भी उन्हें वक़्त मिलता वे दोस्तों की मंडली के साथ गाने में तल्लीन हो जाते। बचपन के इन्हीं दिनों की एक मजेदार घटना का जिक्र सचिन दा अपने संस्मरण में कुछ इस तरीके से करते हैं....

"कोमिला से दस मील दूर कमल सागर में एक काली का मंदिर था। पूजा के दिनों में वहाँ एक मेला लगता था। हमारी मित्र मंडली उस मेले में जा पहुँची। हम खूब घूमे, इतना कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। मेला खाली होने लगा तो होश आया और किसी तरह दौड़ कर आखिरी गाड़ी पकड़ी। टिकट लेने के लिए समय ना बचा था। कोमिला उतरे तो टिकट चेकर ने आ घेरा। बहुत हाथ पैर जोड़े पर वो सुनने को तैयार ना हुआ। उलटे स्टेशन मास्टर से कह कर हमें एक कमरे में बंद करा दिया। एक तो घर से अनुमति नहीं ली थी और दूसरे इतनी देर भी हो गई थी, ऊपर से ये नई मुसीबत। मैं रोने लगा। पर मेरे एक मित्र को एक तरकीब सूझी। कुछ दिनों पहले पूजा के अवसर पर स्टेशन मास्टर की माँ उसके घर आई थी और उसका कोई गीत सुनकर भावविभोर हो कर रो पड़ी थी। याद तो नहीं पड़ता पर मेरे मित्र ने मुझसे भाटियाली या बाउल गीत गाने को कहा। मैंने जैसे तैसे रोना रोका और गाने लगा। परिणाम सचमुच अच्छा निकला, थोड़ी ही देर में कमरे के दरवाजे पर आहट हुई और दरवाजा खोलकर स्टेशन मास्टर की माँ अंदर आ गई। उसने अपने बेटे से कह कर हमें छुड़वा ही नहीं दिया बल्कि खाने के लिए मिठाई भी दी।"

तो देखा आपने किस तरह सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया। सचिन दा पचास और साठ के दशक में मुंबई में बतौर संगीत निर्देशक फिल्मों में संगीत देते रहे पर हर साल कोलकाता जाकर उन्होंने अपने नए नए गीत रिकार्ड किए जिनमें कई बेहद लोकप्रिय हुए। साठ के दशक की शुरुआत में सचिन दा को हृदयाघात हुआ। तबियत खराब होने की वजह से उनका काम रुक गया।  देव आनंद तब गाइड पर फिल्म बनाने की तैयारियों में लगे थे। सारे निर्माता जब सचिन दा से कन्नी काट रहे थे तब देव आनंद ने सचिन दा के स्वस्थ होने का इंतज़ार किया और गाइड की कमान उन्हें ही सौंपी। दादा ने भी गाइड के लिए जो संगीत दिया वो सदा सदा के लिए अजेय अमर हो गया।

फिल्म की कहानी जेल से निकलते हुए गाइड राजू से शुरु होती है जो अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौटने की बजाए अपने नए सफ़र की शुरुआत  के लिए एक अनजान डगर पर चल उठता है। सचिन दा ने इस परिस्थिति के लिए एक बार फिर गीतकार शैलेंद्र को याद किया। अपनी आत्मकथा सरगमेर निखाद में वो लिखते हैं कि

जो भी शैलेंद्र ने मेरे लिए लिखा व सीधा और सरल होता था।  यही वज़ह थी कि मैं अपने सीमित हिंदी ज्ञान के बावज़ूद उसके बोलों को मन में पूरी तरह दृश्यांकित कर पाता था।

शैले्द ने जिस खूबसूरती से जीवन के शाश्वत सत्य को, हमारे रहने ना रहने से दुनिया पर पड़ते फर्क को अपने दर्शन के साथ इस गीत में उभारा है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। इस गीत को अगर आप ध्यान से सुनें तो हर अंतरे की पहली और तीसरी पंक्ति को दो हिस्से में बँटा पाएँगे जिनके बीच और बाद में संगीत के टुकड़े गीत की भावनाओं की गूँज से प्रतीत होते हैं। सचिन दा दूसरी और चौथी पंक्ति में अपनी आवाज़ का सारा दर्द उड़ेल देते हैं। हर अंतरे की पाँचवी पंक्ति के ठीक बीच में नगाड़े की ध्वनि का इस्तेमाल भी बड़ी खूबसूरती से हुआ है। इसी वज़ह से इतने अल्प वाद्य यंत्रों के प्रयोग बावज़ूद ये गीत इतना प्रभावी बन पड़ा है। आख़िर में मुसाफ़िर शब्द को सचिन दा का अलग अलग रूप  में गाना, श्रोता कभी भूल नहीं पाता।

वैसे क्या आप जानते हैं सचिन दा ने इस गीत की आंरंभिक धुन अपने गाए बंगाली गीत  दूर कोन प्रबासे तोमि चले जाइबा रे, तोमि चोले जाइबा रे बंधु रे कबे आइबा रे से ली थी। यकीन नहीं आता तो सचिन दा के गाए इस बाँग्ला गीत को सुनिए।



और अब सुनिए फिल्म गाइड का ये नग्मा


वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ
दम लेले घड़ी भर, ये छैयाँ, पाएगा कहाँ
वहाँ कौन है तेरा ...

बीत गये दिन, प्यार के पलछिन
सपना बनी वो रातें
भूल गये वो, तू भी भुला दे
प्यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अँधेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कोई भी तेरी, राह न देखे
नैन बिछाए ना कोई
दर्द से तेरे, कोई ना तड़पा
आँख किसी की ना रोयी
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के न आयी
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ..

देव आनंद पर फिल्माए गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

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21 comments:

राजीव कुमार झा on September 18, 2013 said...

आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

dr.mahendrag on September 18, 2013 said...

सचिन दा की एक ऐतिहासिक कृति.नाज होता है उन गीतकारों व संगीतकारों पर.आज जितने घंटे गीत को लिखने व संगीतकारों को धुन बना फिल्माने में लगते हैं,उतने घंटे फिल्म सिनेमाघरों में चलती ही नहीं.

प्रवीण पाण्डेय on September 18, 2013 said...

अद्भुत गीतों का पूरा संग्रह दे गये हैं, बर्मन दा।

दिलबाग विर्क on September 18, 2013 said...

आपकी यह प्रस्तुति 19-09-2013 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत है
कृपया पधारें
धन्यवाद

HARSHVARDHAN on September 18, 2013 said...

आज की विशेष बुलेटिन "रहीम" का आँगन, राम की "तुलसी" और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

Nutan Sharma on September 18, 2013 said...

Beautiful song ,another gem of sd burman da.

आशा जोगळेकर on September 19, 2013 said...

Anand Aaya sun kar dekh kar. Dhanywad.

parag on September 19, 2013 said...

जब भी कोई शरीफ इंसान समाज के ढोंग के कारण समाज से दूर जाने की सोचने लगता है।इस तरह के गानों के द्वारा अपने दिल को तसल्ली दे पायेगा।

Darshan jangra on September 19, 2013 said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 20/09/2013 को
अमर शहीद मदनलाल ढींगरा जी की १३० वीं जयंती - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः20 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





Jiten Dobriyal on September 19, 2013 said...

Aapki lekhni Sachin Da ke geeton ki tarah lajawaab hai..

अनिल सहारण 'सोनङी' on September 19, 2013 said...

Aapka bahut bahut dhanywad manish ji. My most fav song.

HARSHVARDHAN on September 20, 2013 said...

आपको तो बता ही चुका हूँ, कि ये मेरा मनपसंद गाना है। सचिन दा के बारे में और जानकारी देने के लिए आपका सहर्ष आभार। सादर।।

Manish Kumar on September 20, 2013 said...

हाँ अनिल पिछली पोस्ट पर आपका प्रश्न याद था मुझे इसे लिखते वक़्त !

अनिल सहारण 'सोनङी' on September 20, 2013 said...

Maine guide film 2 saal pahle dekhi thi,kyo ki guide upnyas mere collage syllabus me tha. Jab maine R. K. Narayan ke ish masterpiece novel ko pada to khud ko ish par bani film dekhane se bhi nahi rok paya. Ish movie me pahlee bar ye geet suna tha parthamdrishti me hi mai barman da ki aawaj ka aur ish geet ke darshnik lyric ka dee wana ho gaya tha. Ukt vishay par lekh ke liye aapka dhanywad Manish ji.

kebhari on September 21, 2013 said...

Beautiful songs.

Yashwant Yash on September 21, 2013 said...

कल 22/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

Rama Shankar Verma on September 22, 2013 said...

Nice song with great philosophy of life !! SD Burman was a most appropriate singer for such song.. Thanks for sharing !!

Onkar on September 22, 2013 said...

धन्यवाद. बहुत पसंद हैं मुझे सचिनदेव बर्मन

Alok Srivastava said...

Beautiful article....such nice lyrics and songs..
truly a golden era...

Manish Kumar on September 25, 2013 said...

राजीव , दिलबाग, दर्शन, यशवंत व हर्षवर्धन भिन्न भिन्न चर्चा समूहों में इस प्रविष्टि को स्थान देने के लिए शुक्रिया !

Manish Kumar on September 25, 2013 said...

ओंकार, प्रवीण, रमाशंकर जी, Kebhari,हर्षवर्धन, आशा जी, नूतन जी, आप सबको ये गीत उतना ही पसंद है जितना मुझे जान कर खुशी हुई।

डा. महेंद्र नाग व पराग जी सहमत हूँ आपके विचारों से

आलोक श्रीवास्तव व जितेन मेरे लेख को पसंद करने के लिए आभार

अनिल इस गीत से जुड़े अपने संस्मरण यहाँ बाँटने के लिए शुक्रिया !

 

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