मंगलवार, अक्तूबर 05, 2010

चुपके से चुपके से रात की चादर तले..गुलज़ार, रहमान व साधना की सरगम में बहता संगीत...

ए आर रहमान ने बतौर गीतकार गुलज़ार के साथ कई फिल्में की हैं और जावेद साहब के साथ भी। पर जावेद अख़्तर के बोलों को उनके संगीत के साथ मैंने ज्यादा आत्मसात होते पाया है। यही वज़ह है कि स्वदेश, लगान और जोधा अकबर में इस जोड़ी द्वारा दिया गया गीत संगीत मन के बेहद करीब रहा है। पर गुलज़ार साहब के लफ़्जों के साथ रहमान साहब वो प्रभाव पैदा नहीं कर पाते हैं जो विशाल भारद्वाज करा लेते हैं। वैसे ये भी नहीं कि रावण, दिल से, साथिया, गुरु या फिर स्लमडॉग मिलनियर में इस जोड़ी ने हमें अच्छा संगीत नहीं दिया। गुरु का ऐ हैरते आशिक़ी और दिल से का सतरंगी रे... रहमान की बेहतरीन कम्पोसिशन्स में गिना जाता है। पर जब इन जैसी विभूतियाँ साथ होती हैं तो हमारी अपेक्षाएँ कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती हैं और यही वज़ह है कि ये एलबम पूरी तरह दिल में घर नहीं कर पाते।

साल 2002 में जब साथिया प्रदर्शित हुई थी तो उसका मुख्य गीत साथिया, साथिया मद्धम मद्धम तेरी गीली हँसी.. बेहद लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की हर एक पंक्ति पर गुलज़ार की अमिट छाप थी। वहीं ओ हमदम सुनियो रे में गुलजार के शब्दों से कही ज्यादा रहमान का वाद्य संयोजन इस क़दर हावी था कि गीत में चुपके से चाँद नंगे पाँव आ कर कब गुजर जाता था इसका पता ही नहीं लगता था।


इन आठ सालों में इस फिल्म को जो गीत मेरे साथ हमेशा ही साथ साथ ज़ेहन की वादियों में सैर करता रहा है वो है साधना सरगम का गाया चुपके से चुपके से रात की चादर तले... गीत के मुखड़े के पहले का कोरस मुझे हमेशा कॉलेज के दिनों की तरफ़ खींच ले जाता है। दोस्त यारों की वो एकतरफ़ा किस्सा गोई, किसी का रह रह कर ठंडी आहें भरना और किसी का बिलावज़ह तड़पना या उसका अभिनय करना। पर उन प्रेम में डूबे दिलों की व्यथा में शरीक होना भी हमें तब खुशी खुशी मंजूर होता था।

कोरस के बाद इस गीत में रह जाते हैं तो गुलज़ार के हृदय को सहलाते शब्द और साधना सरगम का गीत की भावनाओं में बहता स्वर। ताज़्जुब नहीं की संगीत प्रेमी इस गीत को हमेशा ही साधना सरगम के गाए दस बेहतरीन गीतों में शुमार करते हैं। इससे पहले कि इस गीत की ओर रुख करें कुछ बातें इसकी गायिका के बारे में..

महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाली साधना घाणेकर ने अपनी माँ नीलाताई घाणेकर से संगीत की आरंभिक शिक्षा ली। भारतीय शास्त्रीय संगीत इन्होंने पंडित जसराज से सीखा। हिंदी फिल्म संगीत में पाँव रखते ही वो साधना सरगम के नाम से मशहूर हुई। फिर तेरी कहानी याद आई, जुर्म, जो जीता वहीं सिकंदर, 1947 Earth में साधना के गाए गीत हमेशा से संगीतप्रेमियों की जुबान पर रहे हैं। पर हिंदी फिल्म जगत ने उन्हें वो मौके नहीं दिये जो उन्हें दक्षिण भारत में जाकर मिले। साधना सरगम आज तक 24 ज़ुबानों में गीत गा चुकी हैं। और तो और दक्षिण का ना हो के भी वर्ष 2007 में तमिल और तेलगु की सर्वश्रष्ठ पार्श्वगायिका का ख़िताब जीत चुकी हैं। ए आर रहमान उमकी गायिकी से इतने प्रभावित रहे हैं कि अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि

उसकी गिनती मैं ऐसी कुछ गायिकाओं में करता हूँ जिन्होंने अपनी अदाएगी से मुझे हर मोड़ पर अचंभित किया है। बहुत सारे गायक इस बात में निपुण होते हैं कि मैंने जैसा कहा उसे वो हू बहू अपनी गायिकी में उतार देते हैं। पर वो तो मेरे अनुदेशों से कहीं आगे गीत को इतनी सरलता से एक ऐसे धरातल पर ले जाती है जो मुझे चकित तो करता ही है और साथ ही उनके साथ काम करने के आनंद को भी बढ़ाता है।

तो आइए सुनते हैं इस गीत को जिसे सबसे पहले साधना ने तमिल में वर्ष 2000 में फिल्म स्नेहिधने के लिए गाया था। तो पहले सुनिए ये तमिल वर्जन





और उसके बाद साथिया के लिए हिंदी में गाया वही गीत..




दोस्तो से
दोस्तो से झूठी-मूठी दूसरों क नाम ले के
तेरी मेरी बातें करना
यारा रात से दिन करना
लंबी जुदाई तेरी
बड़ा मुश्किल है आहों से दिल भरना
यारा रात से दिन करना
कब ये पूरी होगी दूर ये दूरी होगी
कब ये पूरी होगी दूर ये दूरी होगी
रोज़ सफ़र करना
यारा रात से दिन करना

चुपके से चुपके से रात की चादर तले
चाँद की भी आहट ना हो बादल के पीछे चले
जले कतरा-कतरा गले कतरा-कतरा
रात भी ना हिले आधी आधी
रात भी ना हिले आधी आधी ये
चुपके से चुपके से रात की चादर तले


फ़रवरी की सर्दियों की धूप में
मूँदी-मूँदी अँखियों से देखना
हाथ की आड़ से
नीमी-नीमी ठण्ड और आग में
हौले-हौले मारवा के राग में
मीर की बात हो
दिन भी न डूबे रात ना आये शाम कभी ना ढले
शाम ढले तो सुबह न आये रात ही रात चले
चुपके से चुपके से रात की चादर तले.....

तुझ बिना पगली पुरवई
तुझ बिना पगली पुरवई
आके मेरी चुनरी में भर गई
तू कभी ऐसे ही गले लग जैसे ये पुरवई
आ गले लग जैसे ये पुरवई
साथिया सुन तू
कल जो मुझको नींद ना आये पास बुला लेना
गोद में अपनी सर रख लेना लोरी सुना देना
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12 टिप्पणियाँ:

Manish Singh " GumeDil" on अक्तूबर 05, 2010 ने कहा…

nice artical.......

राज भाटिय़ा on अक्तूबर 05, 2010 ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। धन्यवाद

Abhishek Ojha on अक्तूबर 05, 2010 ने कहा…

awesome song.

Prashant on अक्तूबर 06, 2010 ने कहा…

Really great song.. Its one of my favorite songs..

Vishwa Deepak on अक्तूबर 07, 2010 ने कहा…

I think its "aadi aadi"..... kyunki film mein Vivek oberoi ka naam "adi" tha...

Manisha Dubey on अक्तूबर 07, 2010 ने कहा…

‎''chand ki bhi aahat na ho baadal ke peeche chaleeeeee....!!!'' kya baat hai???

Manoj Kumar Sharma on अक्तूबर 07, 2010 ने कहा…

चुपके से चुपके से रात की चादर तले
चाँद की भी आहट ना हो बादल के पीछे चले
जले कतरा-कतरा गले कतरा-कतरा
रात भी ना हिले आधी आधी
रात भी ना हिले आधी आधी ये
चुपके से चुपके से रात की चादर तले

मेरे को यह शायरी समझ नहीं आयी. थोडा सा विस्तार से बताएं. कवि या शायर क्या कहना चाह रहा है.

निर्मला कपिला on अक्तूबर 07, 2010 ने कहा…

शानदार प्रस्तुति। धन्यवाद।

Manish Kumar on अक्तूबर 07, 2010 ने कहा…

मनोज जैसा कि मैंने आपको मेल पर कहा गुलज़ार की नज़्में कई बार अलग अलग लोगों को लिए अलग मायने रखती हैं। मेरा इन पंक्तियों के बारे में जो नज़रिया है वो ही सही हो इसकी भी गारंटी नहीं है।
मैं तो जब भी ये पंक्तियाँ सुनता हूँ मन में यही एहसास होता है कि मैं एक प्यारी से रात में अपने हमसफ़र के साथ खड़ा हूँ। ऊपर चाँद और बादल एक दूसरे से आँख मिचौनी खेल रहे हें हम एक दूसरे से। मन में एक दूसरे के प्रति जमी भावनाएँ उष्णता के अहसास से कतरा कतरा पिघल रही हैं। और मन ये सोच रहा है कि ये खुशनुमा रात कभी ना बीते।

कंचन सिंह चौहान on अक्तूबर 11, 2010 ने कहा…

ये गीत और इस फिल्म के सारे ही गीत मुझे बहुत प्रिय हैं। गुलज़ार के गीतों को समझ लिये जाये, तो ही अच्छा...! समझाना तो समझने से बी ज्यादा कठिन होता है...!!!

तथापि आपने जिस तरीके से समझाया वो बेहतरीन था...!

रंजना on अक्तूबर 20, 2010 ने कहा…

आप नायाब जौहरी हैं...

ruchi on जून 26, 2011 ने कहा…

very beautiful....... feeling...

 

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