वार्षिक संगीतमाला 2024 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
वार्षिक संगीतमाला 2024 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, मार्च 19, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 सरताज गीत : मैनू विदा करो ...अब विदा करो मेरे यारा

वार्षिक संगीतमाला 2024 को विदा करने का वक़्त आ गया है उस साल के सबसे शानदार गीत के साथ जिसे सुन या देख कर शायद ही किसी शख़्स की आँखें न भीगीं हों। कभी किसी ज़माने में पंजाब के मशहूर कवि शिव कुमार बटालवी ने इसी शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसे गीतकार इरशाद कामिल ने फिल्म अमर सिंह चमकीला में विदाई गीत का मुखड़ा बना लिया और बाकी के अंतरों में जाते हुए व्यक्ति के भावों को ऐसा पकड़ा कि वो हम सबका गीत बन गया।


ऐसा कहा जाता है कि अमर सिंह चमकीला की हत्या इसलिए की गई  क्योंकि उनके गीतों के विषय सामाजिक मान्यताओं और नैतिकता के पैमानों पर खरे नहीं उतरते थे। अतिवादियों ने इसलिए उन्हें और उनकी सह गायिका अमरजोत को इस दुनिया से चलता कर दिया। आख़िर चमकीला का अपराध क्या इतना बड़ा था कि उन्हें ऐसी सजा मिली?

मुझे ऐसा लगता है कि आख़िरी वक़्त आने पर हम सब दिल से बड़े हो जाते हैं। हमारा हृदय उदार हो जाता है। जब जीवन रहा ही नहीं तो उसमें होने वाली ज्यादतियों की शिकायत भी नहीं रह जाती। शारीरिक पीड़ा के इन क्षणों में भी अपने प्रियजनों के सुखद भविष्य की कामना होठों पर चली ही आती है। इरशाद कामिल व्यक्ति की इसी मनोस्थिति का गीत में मार्मिक चित्रण करते हैं। अरिजीत सिंह ने क्या डूब के इस गीत को गाया है जोनिता गांधी के साथ। ये भी कैसा संयोग है कि इस गीत के आने के डेढ़ साल बाद अरिजीत ने बतौर पार्श्व गायक फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।

वैसे शुरुआत में रहमान का इरादा दिलजीत दोसांझ से इस गीत को गवाने का था जो फिल्म में अमर सिंह चमकीला की भूमिका निभा रहे थे। फिर ये ख़्याल उभरा कि कहानी में जब चमकीला मर चुका तो गाना किसी दूसरे की आवाज़ में गवाना चाहिए और फिर अरिजीत का नाम सामने आया। उनका हिस्सा रिकॉर्ड होने के बाद  लगा कि मृत्यु तो अमनजोत की भी हुई है तो उसके लिए एक महिला स्वर को भी गीत में होना चाहिए और इस तरह इस गीत का एक अंतरा जोनिता को मिला।

संसार को छोड़ने के पल के बारे में हर इंसान कभी न कभी विचार तो करता ही है। पर रहमान, इरशाद कामिल , इम्तियाज़ अली ने अरिजीत के साथ मिलकर इस विषय को गीत में ढाल कर अजर अमर बना दिया है। दशकों बाद भी इस गीत की भावनाएं अलग अलग परिपेक्ष्य में लोगों के दिल को जरूर झिझोड़ती रहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

चलते इस गीत के इस रूप में आने का वाक़या भी आपको बताता चलूँ। इस गीत के अपने अस्तित्व में आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।

"रात के ढाई बज रहे थे। संगीतकार ए आर रहमान अपने मुंबई वाले स्टूडियो में इम्तियाज़ अली और इरशाद कामिल के साथ बैठे थे। अचानक रहमान ने कहा कि स्टूडियो की सारी लाइट बंद कर देते हैं। बत्तियां तो बुझा दी गईं पर उनके स्थान पर मोमबत्तियों और दीयों को जलाया गया। रहमान अपने पियानो पर अपने उंगलियाँ चलने लगे।  मुखड़ा तो पहले ही बन चुका था पर  बाकी अंतरों पर काम अगले दो घंटों में हुआ।"

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,अब विदा करो मेरे यारा,

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार

तुम सभी साफ सही, हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार

झूठ भला क्यूँ बोलोगे तुम,
सब सच कहते हो,
मेरी नहीं है दुनिया जिसमें,
तुम सब रहते हो 


साथ तुम्हारे और रहूँ  मैं,
मेरा तो मन था,
सच है यहाँ पे जो भी बुरा था,
मेरे कारण था 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार 

मेरे सर पे सारी तोहमत तुम धर देना,
मैं तो मैं हूँ रूह भी मेरी पागल कर देना,
तुम खुश रहना, सब कुछ सहना, मुझको आता है,
टूटे तारे का धरती से कैसा नाता है 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यारा,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार 

तुम सभी साफ सही (साफ सही) हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर (पाक मगर) पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार...!!!


 


 

आशा है 2024 का सरताज गीत और पच्चीस गीतों की ये शृंखला आप सब को पसंद आई होगी। जिस तरह से मेरी कार्यालय की व्यस्तता बढ़ रही हैं उसका सीधा असर आपने इस संगीतमाला के लंबे खिंच जाने के तौर पर देखा होगा। मुझे पता नहीं की 2025 की संगीतमाला को आप तक इस रूप में पहुंचा पाऊंगा या नहीं पर पिछले 20-22 सालों से चल रही इस गीतमाला के जो श्रोता और पाठक रहे हैं उनका ढेर सारा आभार!

मंगलवार, मार्च 03, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 Runners Up : तू है तो दिल धड़कता है

हनी, बनी और सागर इन तीन नामों से आप शायद ही परिचित होंगे पर इन्होंने डेढ़ साल पहले जो गीत रचा वो आप सबने जरूर ही गुनगुनाया होगा। जी हां मैं बात कर रहा हूं तू है तो दिल धड़कता है कि जिसका संगीत निर्देशन किया है हनी-बनी की बेहद युवा जोड़ी ने। आवाज़ दी है बनी और सागर ने और लिखा है सागर ने।



फिल्म मिस्टर एंड मिसेज माही में शामिल इस गीत ने 2024 में संगीत जगत में खासा तहलका मचाया। फिल्म के इतर गायिका नीति मोहन  इस गीत का एक अंतरा गा के इसकी शोहरत में और इज़ाफ़ा किया। वैसे इतनी कम उम्र में इन कलाकारों का सितारा चमका तो वो इंटरनेट की बदौलत ही जहां गीत का मुखड़ा ऐसा वायरल हुआ कि इस युवा तिकड़ी को रातों रात एक पहचान मिल गई। पर आप सब के मन में ये सवाल तो आ ही रहा होगा कि आख़िर ये गीत बना कैसे और इन तीन अनजान से कलाकारों की झोली में गिरा कैसे?

दरअसल पंजाबी गीतों के एक गीतकार और कम्पोज़र हैं राजीव अरोड़ा जिन्हें दुनिया "जानी" के नाम से जानती है। इनकी एक टीम "जानी" है जिनका हिस्सा ये तीन कलाकार भी हैं। फिल्म में आने के करीब एक साल पहले सागर ने गीत का मुखड़ा लिखा था। उस दिन इनके दोस्त राग यमन की प्रैक्टिस कर रहे थे दा रा री र रा ..और उससे सागर ने बोलों में ढाला कोई नहीं है मेरा जरूरत मेरी....फिर मुखड़े को उन्होंने अपनी मां के बारे में सोचते हुए पंजाबी में लिखा जो बाद में हिंदी में कुछ इस शक्ल में आया

कोई नहीं मेरा जरूरत तेरी,  
लागे ना जिया देखूं ना जो सूरत तेरी
तू है तो दिल धड़कता है
तू है तो सांस आती है
तू ना तो घर घर नहीं लगता
तू है तो डर नहीं लगता

पर इसके आगे जब पूरा गीत लिखने की बारी आती तो उन्होंने इसे इस तरह लिखा कि लोग इसे अपने प्रिय, अपने हमसफ़र के लिए गा सकें। एक साल तक ये लोग गाना बनाने के बाद बैठे रहे। आश्वस्त नहीं थे कि गाना किसी को पसंद आयेगा। 

फिर ऐसा हुआ कि मिस्टर एंड मिसेज माही में जानी एक गीत का संगीत दे रहे थे और उन्हें एक और अदद गीत की तलाश थी। उन्होंने इस गीत का मुखड़ा बनी सागर से सुन रखा था और उन्होंने उसी रिकॉर्डिंग की फरमाइश कर दी। स्टूडियो में बैठे बैठे  सिर्फ गिटार के साथ रिकॉर्ड किया वो वॉयस नोट सबको इतना पसंद आया कि बिना धुन में छेड़ छाड़ किए गाने के बाकी अंतरे लिखने का आदेश आया और फिर सागर ने ये बोल लिखे

तू है तो ग़म ना आते हैं
तू है तो मुस्कुराते हैं
कि तेरे बिन सो नहीं सकते
किसी के हो नहीं सकते
तू है तो हां ...... तू है तो

तुझसे मेरा जीना मरना
जान तेरे हाथ में
सौ जनम भी कम क्यों लागे
लागे तेरे साथ में

मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर
इस मोहब्बत के सफ़र में
दो अकेले रोएं मिलके
मिलके दोनों रब के घर में
साथ तेरे ना सफ़र
वो सफ़र नहीं लगता

तू है तो दिल धड़कता ...

है अगर ये ख्वाब तो
फिर नींद ना टूटे कभी
सांस छूटे हाथ से
पर हाथ ना छूटे कभी

मैं नासमझ नादान हूं
आके मुझको थाम ले
लागे मुझको रब बुलाए
जब तू मेरा नाम ले
तू समंदर गहरा है
सागर नहीं लगता

तू है तो दिल धड़कता है...

इस गीत का सबसे सशक्त पहलू है गीत की धुन और उतने ही प्यारे इसके सहज और दिल को छूने वाले बोल। गिटार के साथ बीच बीच में बजता तबला अजीम जी के सुझाव पर डाला गया। गीत का दोनों अंतरों के बीच के फिलर के तौर पर प्रसिद्ध वादक पारसनाथ से कुछ ऐसा बजाने को कहा गया जिसमें शांति और सुकून हो कृष्ण की बंसी की तरह और पारस ने क्या ही धुन निकाली बांसुरी की।

फिल्म आई और चली गई पर ये गीत अभी भी लोगों की जुबान पर है। पिछली पायदान पर विराजमान जोड़ी के आमिर मीर ने भी इसे अपने गहरी आवाज़ में इसे पूरे दिल से गाया है। फिलहाल तो आप फिल्म में बनी और सागर के सम्मिलित स्वरों में और फिर नीति मोहन द्वार गाए हुए इसके दोनों वर्जन सुन लीजिए।





मंगलवार, फ़रवरी 10, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 5 : तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं

चलते चलते ये लंबा सफ़र वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी तक ले आया है जहां न कोई गीत है न कोई कव्वाली। यहां पर है एक प्यारी सी ग़ज़ल जिसे अपनी आवाज़ से संवारा है पिता पुत्र की जोड़ी ने। ये जोड़ी है गुजरात के कच्छ से ताल्लुक रखने वाली उस्मान मीर और आमिर मीर की।


ग़ज़लें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं पर सच बताऊं तो जगजीत जी के जाने के बाद नए ग़ज़ल गायक और उनकी धुन रचने वाले वो जादू नहीं जगा पा रहे। अव्वल तो जो ग़ज़लें चुनी जाती हैं वो भावों की गहराइयों को पकड़ नहीं पातीं और फिर जब शब्द बेअसर हों तो संगीत का लुत्फ़ भी कहां आ पाता है। ऐसे में जब मैने उस्मान और आमिर की जुगलबंदी को सुना तो मुझे बरबस मोहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन की गाई ग़ज़लें याद आ गईं। तब एक भाई एक सुर में ग़ज़ल के मिसरे को उठाते तो दूसरे भाई अंदाज़ को बदल कर उसी मिसरे को एक अलग रूप प्रदान कर देते थे। उस्मान और आमिर ने भी इस ग़ज़ल को उसी शैली में गाया है।

उस्मान एक मामूली घर से आते थे। उनके पिता हुसैनभाई गुजराती लोक संगीत जैसे भजन और संतवाणी में तबला वादक थे। उस्मान मीर को बचपन से ही संगीत में रुचि थी। नवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पिता के साथ तबला वादन करने लगे। परन्तु मन में उनकी इच्छा गायक बनने की थी।  संगीत की प्रारंभिक शिक्षा तो उन्होंने अपने पिता से ही ली पर आगे गायिकी उन्होंने इस्माइल दातार जी से सीखी।

कहते हैं कि एक बार गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन, वे तबला वादक के रूप में श्री मोरारी बापू के आश्रम गए, जहाँ पर लोगों ने उनकी गायन प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए उन्हें बापू से मिलवाया। यहीं से उन्हें गायिकी का एक मंच मिला जो फिल्मों से होता हुआ आज स्वतंत्र संगीत सृजन करने तक आ पहुंचा है।  

रही फ़हमी बदायूंनी साहब की लिखी इस ग़ज़ल की बात तो इस सहज पर असरदार सी ग़ज़ल की शुरुआत उस्मान मीर फ़हमी साहब की ही एक क़ता से करते हैं

कोई दुनिया में चेहरा देखता है, 
कोई चेहरे में दुनिया देखता है 
तेरी आँखों में बस ये देखता हूँ, 
कि मेरी आँखों में तू क्या देखता है

किसी के चेहरे में अपनी दुनिया सजा लेने वाली बात हो या फिर अपनी दृष्टि को अपने प्रिय के दृष्टिकोण तक सीमित कर लेने की,या फिर अपना दुख सुख भुलाकर सिर्फ अपने हमसफ़र की चिंताओं में घुले रहने की..प्रेम की जो पराकाष्ठा हो सकती है वो इस क़ता और इसके आगे के अशआर में झलकती है। ये अलग बात है कि इस तरह की भावनाएं धीरे धीरे आम सोच से विलुप्त हो रही हैं।

तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं
कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं

तू जहाँ तक दिखाई देता है 
उससे आगे मैं देखता ही नहीं

तेरे बारे में सोचने वाला 
अपने बारे में सोचता ही नहीं  

यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँढा 
जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं

दवे साहब का तार वाद्यों से सजा संगीत संयोजन भी बेहद मधुर लगता है। तबले के साथ साथ उस्मान मीर हारमोनियम भी क्या खूब बजाते हैं। इस ग़ज़ल के कुछ शेर जो नहीं इस्तेमाल हुए भी पढ़ने लायक हैं।

घर के मलबे से घर बना ही नहीं
ज़लज़ले का असर गया ही नहीं

मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया
मैं तिरी राह से हटा ही नहीं

कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ
शेर ताज़ा कोई हुआ ही नहीं

रात भी हम ने ही सदारत की
बज़्म में और कोई था ही नहीं

याद है जो उसी को याद करो
हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं

फ़हमी बदायूंनी का डेढ़ साल पहले ही निधन हुआ था। उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे फ़हमी को छोटे बहर की ग़ज़ल कहने में कमाल हासिल था। ये ग़ज़ल उसका जीता जागता उदाहरण है। फ़हमी साहब एक बेहद विनम्र स्वभाव के मालिक थे। उनकी  किताबों में दस्तकें निगाहों की’ और ‘पांचवी सम्त’ के बाद तीसरी किताब ‘हिज्र की दूसरी दवा’ देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुई है। 

 

उनका ही एक और कमाल का शेर है कि

मुंह में जब तक ज़बान बाक़ी है
आप की दास्तान बाक़ी है।

ले तो सकता हूँ नाम क़ातिल का
मसअला ये है जान बाक़ी है।

तो आइए सुनें उस्मान और आमिर की आवाज़ में ये ग़ज़ल

गुरुवार, जनवरी 08, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 5 : तू क्या जाने मेरे यार

2024 की मेरी संगीतमाला बेहद धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ी है। इसका एक कारण तो कार्यालय में बढ़ती जिम्मेदारियां हैं। जो लोग मुझे जानते हैं वो ये भी जानते होंगे कि मेरा खाली वक़्त संगीत के अलावा  सैर सपाटे, चिड़ियों और तितलियों की तस्वीरें लेने और उनके बारे में लिखने में लगता है। यही वज़ह है कि 2026 आ गया और मैं अभी तक 2024 की संगीतमाला की आख़िरी कुछ पायदानों में अटका हूं। पाठक गण से मैं अपनी इस मंथर गति के लिए क्षमा प्रार्थी हूं🙏।



खैर धीरे धीरे ही सही मेरी गीतमाला की ये पैसेंजर ट्रेन आ पहुंची है अपनी पांचवी पायदान पर जिस पर फिल्म अमर सिंह चमकीला का गाना वो जो पहली बार सुनते ही मेरा मनपसंद गीत बन गया था वो भी तब जबकि इसे गाया था एक अनजान गायिका ने जिन्हें इस गीत के पहले मैंने सुना ही नहीं था।

जी हां आपने सही पहचाना ये गायिका हैं यशिका सिक्का। यशिका का परिवार संगीत से जुड़ा परिवार नहीं है पर उनके पिता को संगीत सुनने का बड़ा शौक़ था। उन्हें अपनी बेटी की आवाज़ पर इतना भरोसा था कि न केवल उन्होंने यशिका को संगीत की तालीम दिलवाई पर साथ ही संगीत से जुड़े रियलिटी शो में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। वो अलग बात है कि यशिका की आवाज़ की बनावट परंपरागत न होने के कारण उन्हें ज्यादातर नाकामयाबी मिली। यशिका को भी ये बात मन में बैठने लगी कि शायद वो पार्श्व गायिकी के लायक नहीं हैं। पर पिता के विश्वास का कमाल था कि उन्हें जिंगल, कच्चे गीत और स्वतंत्र संगीत करने के प्रस्ताव मिलने लगे।

यशिका सिक्का

करीब एक दशक के संघर्ष के बाद अमर सिंह चमकीला में उन्हें नरम कलेजा गाने के लिए बुलाया गया। हुआ यूं कि रहमान को चमकीला के लिए पंजाबी गायकों की तलाश थी। फिल्म के संगीत को अंतिम रूप देने के पहले तमाम कलाकारों को बुलाकर उनसे ढेर सारे गाने गवाए गए। इन गायकों में यशिका भी एक थीं जिनकी आवाज़ रहमान को बिल्कुल अलग सी लगी। हालांकि नरम कलेजा में उनके हिस्से में बस गीत का छोटा टुकड़ा ही आया। 

इस बात के दस महीने बीतने के बाद अचानक ही उन्हें तू क्या जाने मेरे यार को गाने के लिए एक रात दस बजे बुलाया गया। दो बजे संगीत के जादूगर रहमान आए और उन्होंने 15 मिनट में धुन तैयार कर दी जिसे यशिका ने अगले दस मिनट में गा भी दिया और इस तरह गीत का मूल स्वरूप अस्तित्व में आया। गीत में परिवर्तन अगले कुछ महीने में होते रहे पर यशिका के मन में ये सवाल चलता रहा कि क्या उनकी आवाज़ अंततः फिल्म में रहेगी?

दरअसल इस गीत के लिए भी इम्तियाज़ अली और रहमान श्रेया घोषाल का नाम पहले सोच रहे थे पर जब इम्तियाज़ ने यशिका वाला वर्जन सुना तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि इसे ही रहने देते हैं।  वैसे भी यशिका की आवाज़ फिल्म के पंजाबी किरदार पर खूब जमी भी है।

यशिका बताती हैं कि इस गीत की सबसे कठिन जगह अंतिम वाले अंतरे में आती है जब सच्चियाँ मोहब्बतां के आगे की कुछ पंक्तियां उन्हें बिना बीच में सांस लिए ही गानी थीं और उन्होंने उसे क्या खूब  निभाया है। गीत के अंत में उनकी गुनगुनाहट को बार बार सुनने का दिल करता है। रिलीज़ होने के बाद बेहद लोकप्रिय हुआ पर दुख की बात ये थी कि यशिका के पिता जिन्होंने उनके संगीत की नींव रखी, ये देखने के लिए  जीवित नहीं रहे।

गीतकार इरशाद कामिल ने इस गीत में एक युवा स्त्री की आसक्तियों, उसकी आकांक्षाओं को भली भांति शब्दों में बांधा है। उनके शब्दों के चुनाव को देखिए तन का ताज भी मन का राज भी,अपना आज भी तुझपे है देना वार। प्रेम में डूबी हुई स्त्री के पूर्ण समर्पण का भाव कितनी स्पष्टता से उभरा है यहां। उसी भाव को आगे और गहरा कर के वे लिखते हैं

जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके,
सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने

अपने प्रिय को इन पंक्तियों में अपने दिल के पास रखने का क्या नायाब तरीका ढूंढा है यहां नायिका ने!

मुखड़े के पहले ताल वाद्यों के साथ तुम्बी (विजय यमला) और मेंडोलिन (एस एम सुभानी) का रिदम मन को लुभाता है जिसे पराग छाबड़ा ने अरेंज किया है। पंजाबी लोक संगीत का स्वाद इन्हीं वाद्यों की वज़ह से गीत में उभर कर आया है। वहीं मुखड़े के बाद प्रतीक श्रीवास्तव का बजाया सरोद ध्यान खींचता है। 

तू क्या जाने मेरे यार, हाय
तू क्या जाने मेरे यार
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ
नैना चोर से, इक दिन जोर से,
करना है तुझको प्यार,
हाय......  नैना चोर से इक दिन जोर से,
करना है तुझको प्यार 
तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरे यार 


तन का ताज भी मन का राज भी,
अपना आज भी तुझपे है देना वार,
तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरी जान

सच्चियाँ मोहब्बतां बुलंद करके,रखना पिटारी में तू बंद करके
रुसना भी हंसना भी नाल तेरे, सबसे छुपा रखना अंग संग मैंने
हाय आय आय आए 
जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके,
सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने
हाय आय आय आए। .. 

छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
तू क्या जाने मेरे यार, तू क्या जाने मेरे यार 

हो संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे,
बजने दे तन के तार,
हाय संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे,
बजने दे तन के तार 
तू क्या जाने मेरे यार, हाय
तू क्या जाने मेरी जान 

तो आइए सुनते हैं यशिका की आवाज़ में पांचवीं पायदान का ये गीत

सोमवार, दिसंबर 29, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 10 : रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे

जीवन की चुनौतियों से जूझते हुए बहुधा ऐसा होता है कि हम हिम्मत हार जाते हैं। अपने पर से भरोसा उठने लगता है। किसी काम को करने के पहले इतना अगर मगर सोच लेते हैं कि खुले मन से उस कार्य को अच्छे तरीके से कर भी नहीं पाते। नतीजन कई बार असफलता हाथ लगती है जो तनाव को जन्म देती है। ये दुष्चक्र कभी कभी हमें अवसाद की ओर ढकेल देता है।

स्वानंद, श्रेया और कनिष्क सेठ

गीतकार संगीतकार स्वानंद किरकिरे ने रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली इसी भावना को पकड़ा और एक लोरियों सा मुलायम गीत रच दिया जो सच पूछिए तो एक तरह का आत्मालाप है जिसे शायद ही किसी ने दिल से महसूस नहीं किया होगा। 2024 में जितने भी स्वतंत्र गीत बने उसमें किसी गीत की भी शब्द रचना इतनी उत्कृष्ट नहीं होगी जितनी इस गीत की है।

जब बुरे ख़्यालों से मन परेशान हो जाता है तो हम कल्पना के सागर में भटकते हुए ऋणात्मक सोच के दलदल में  धंसते चले जाते हैं। ऐसे में एक ढाढस संजीवनी का काम करता है।  ये गीत इस बात की ताकीद करता है कि ये ढाढस हमें अपने अंदर से ही लाना होगा। अपनी काबिलियत पर भरोसा करना होगा। उदासियों के जाल से मुक्त होने के लिए अपना दुलार खुद करना होगा।

स्वानंद को पता था कि उन्होंने एक व्यक्ति की मनोभावना को इस गीत में बड़ी बारीकी से पकड़ा है। अब उन्हें तलाश थी एक ऐसी आवाज़ की जो इस गीत को इसके उचित मुकाम तक ले जाए। इसके लिए उनके मन में एक ही आवाज़ थी और वो आवाज़ थी श्रेया घोषाल की। श्रेया ने जब इस गीत के लिए हां कि तो स्वानंद की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। श्रेया के आने से गीत निखरा भी उसी अंदाज़ में।

मन को शांत करती धुन, काव्यात्मक बोल और श्रेया का दिव्य स्वर एक ऐसा मिश्रण था जो किसी को भी मुग्ध कर दे।

ख़ुद श्रेया घोषाल का कहना था कि 
ये गाना ऐसा था कि रिकॉर्डिंग के समय हम इसे गाए जा रहे थे। ये ऐसे बैठ गया था मेरे जेहन में जैसे कि मेरा ही कोई हिस्सा हो। इस गीत का टेम्पो बच्चे को सुनाई जाने वाली लोरियों जैसा है। शूट में आने के पहले कल ही मैंने अपने बच्चे को सुलाते वक़्त ये गाना सुनाया था।
कोक स्टूडियो भारत ने इस गीत में संगीत arrange करने की जिम्मेदारी सौंपी कनिष्क सेठ को जो लोकप्रिय गायिका कविता सेठ के पुत्र हैं। स्वानंद और श्रेया की सलामी जोड़ी ने शुरुआत इतनी अच्छी दे दी थी कि नाममात्र का संगीत भी इस गीत के लिए काफी था। कनिष्क ने इसके लिए तार और ताल वाद्यों के साथ अंत में हल्के हल्के कोरस का सहारा लिया जो गीत में अंतर्निहित सुकून को एक विस्तार देता है।

भीड़ है ख़यालों की, इक अकेला मन
नोचती खरोंचती, ये सोच ज़ख्म दे
कोई मेरे मन को लगा दे मरहम
सो  जा रे
खींचता दिशा दिशा, तनाव बेरहम

रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे
रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे

ख़यालों से ना डर, कल की छोड़ दे फिक्र
ख़यालों से ना डर, कल की छोड़ दे फिक्र
आज नींद के अंधेरों में खो जा रे
रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे
रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे
सो जा रे

दिल में जो सहमा सहमा डर है या मलाल है
दिल में जो सहमा सहमा डर है या मलाल है
सच कहूँ जो भी है वो सिर्फ़ इक ख़याल है
तेरे ही तसव्वुरों का खोखला कमाल है
मुस्कुरा मुस्कुरा, क्यों दर्द की लड़ियाँ पिरोता रे
खोल दे तू इस घड़ी सुकून का झरोखा रे

ख़यालों से ना डर...... सो जा रे

कि पलकों की दो खिड़कियाँ तू हौले बंद कर ले
कि धड़कनों की थपकियों से तू ज़रा सँवर  ले
साँसों की सुन ले लोरी, पलने की जैसे डोरी
तू ही साथी तेरा, न खुद से ही तू थोड़ा प्यार और दुलार कर जा रे
सो जा रे..
.

तो आइए सुनें इस गीत को जो आपके अंदर एक विश्वास तो जगाएगा ही पर साथ ही साथ मन को सुकून भरी दुनिया में भी पहुंचा देगा।

रविवार, अक्टूबर 12, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 : शोर - गुल नहीं होगा ...स्वानंद किरकिरे

आजकल तो जबसे स्वतंत्र संगीत का चलन शुरू हुआ है रोज़ रोज़ नए गीत बन रहे हैं पर उनमें से ज्यादातर आपके दिलों में सेंध नहीं लगा पाते क्योंकि कहीं धुन तो कहीं शब्दों के लिहाज़ से मामला अधपका सा ही रह जाता है।

पर गीतों की इस भीड़ में भी कई बार ऐसे सुरीले नग्मे सुनने को मिल जाते हैं जो एक बार में ही दिल की कोठरी में ऐसे आसन जमा लेते हैं कि फिर वहां से निकलने के लिए जल्दी तैयार ही नहीं होते। स्वानंद किरकिरे के गाए और संगीतबद्ध किए इस गीत को प्रोग्राम किया है उज्ज्वल कश्यप ने। शोर-ग़ुल एक ऐसा गीत है जिसे एक बार सुनने के बाद बार बार सुनने का दिल करता है और इसीलिए ये गीत विराजमान है संगीतमाला की 12 वीं सीढ़ी पर।


ख़ुद इस गीत के पीछे की सोच और उसके इस रूप में आने के बारे में स्वानंद कहते हैं

"मेरा पहला गाना था बावरा मन..यही होता था कि हम बावरा मन गाते थे और लोग हाथ पकड़ के निकल जाते थे। शोर गुल भी वैसा ही गाना है। मैं चाहता हूं कि इसे सुनने के बाद कुछ लोग हाथ पकड़ कर निकलें। एक प्यार वाली फीलिंग है इसमें।

फिल्म उद्योग में गाने लिखने की दौड़ धूप में हम हिट होगा फ्लॉप होगा के चक्कर में ही पड़े रहते हैं। इसके बीच में आप खुद कोई गाना बना रहे होते हो जिसके लिए किसी ने आपको कुछ बताया नहीं। जिसका कोई brief नहीं है। इस तरह के गीत अपने आप ऑर्गेनिक रूप से बाहर आते हैं। जब गीत लिखा तो फिर मैंने इसे उज्ज्वल को सुनाया कि क्या ये गाना लोगों को प्रभावित कर पाएगा। "
ज़ाहिर है उज्ज्वल को गीत का मुखड़ा और अंतरे सुनने के बाद इतने पसंद आए कि उन्होंने तुरंत इस पर काम शुरू कर दिया। कितने प्यारे अंतरे लिखे हैं स्वानंद भाई ने इस गीत के लिए और उतना ही सुकून देने वाला उनका संगीत है जो गीत में इस कदर घुल मिल जाता है कि बोलों के साथ बजते तार वाद्यों रबाब और गिटार की टुनटुनाहट भी याद रह जाती है।


आखिर एकांत की तलाश हम क्यों करते हैं? ख़ुद से बातें करने के लिए या फिर किसी प्रिय के साथ को संपूर्णता से महसूस करने के लिए। स्वानंद भी अपने लिखे इस गीत में आपको शोर-ग़ुल से परे प्रकृति की गोद में पलते प्रेम से आपको जोड़ना चाहते हैं। उनका मानना है कि प्रकृति के साथ जब आपका मन एकाकार होने लगता है तो उसके स्वर आपको अपने से लगने लगते हैं। नदी की कलकल भी आपको ऐसी जान पड़ेगी जैसे कोई आपके कानों में आकर फुसफुसाया हो 😊। बहती हवा की सनसनाहट कोई ऐसा राग छेड़ेगी मानो कोई गुनगुना रहा हो और इसीलिए स्वानंद लिखते हैं

मन ही मन में बुदबुदाती एक नदी सी बहा करेगी
अनजानी धुन गुनगुनाती आती जाती हवा रहेगी

दूसरे अंतरे में भी उनका गेसुओं से ढककर रात करने और एक दूसरे के हाथों में उंगलियां फंसाने का भाव भी बड़ा प्यारा लगता है। 

इस गीत के बोल एक नायिका के लिए लिखे गए हैं और इसीलिए स्वानंद ने शुरुआत में ऐसा सोचा था कि इसे किसी गायिका से गवाएंगे पर फिर उन्हें ये महसूस हुआ कि उनकी आवाज़ इस गीत को उनके शब्दों में और इंटरेस्टिंग बना देगी। 

स्वानंद की आवाज़ तो मुझे बेहद पसंद है पर मुझे लगता है कि इस गीत के दूसरे अंतरे की जो प्यारी सी सोच है उसे एक नारी स्वर का साथ मिला होता तो इस गीत को एक दूसरे नज़रिए से देखने में मदद मिलती। मैंने नेट पर इस गीत को किसी गायिका की आवाज़ में ढूंढने की कोशिश की और मुझे विधि  त्यागी का गाया हुआ गीत का ये प्यारा टुकड़ा मिला। हालाँकि  उन्होंने अंतरों के बोलों को ऊपर नीचे बदल दिया है फिर भी उनकी आवाज़ में ये गीत सुनना अच्छा लगा । 



शोर - गुल नहीं होगा नहीं होगा नहीं होगा मेरी जान
मैं हूंगी तू होगा और होगा खामोश आसमान
मैं हूंगी तू होगा और होगा खामोश आसमान
शोर - गुल नहीं होगा नहीं होगा नहीं होगा मेरी जान
मन ही मन में बुदबुदाती एक नदी सी बहा करेगीअनजानी धुन गुनगुनाती आती जाती हवा रहेगीतेरी धड़कन क्या कहती है सुनूंगीतेरे सीने पे रख के कानमैं हूंगी तू होगा.....शोर - गुल नहीं होगा

तेरी उंगलियों में गूंथ लूंगी उंगलियां मेरी

तुझे गेसुओं में ढक कर के मैं कर लूंगी रात गहरी
फिर सर को झुका के हौले से, मैं चूम लूंगी चांद
मैं हूंगी तू होगा.....शोर - गुल नहीं होगा

गुरुवार, अगस्त 21, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 25 कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है?

वार्षिक संगीतमाला 2024 के 25 बेहतरीन गीतों की फेरहिस्त में आज बारी है उस गीत की जिसे संगीतबद्ध किया एक बार फिर से संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर ने, लिखा भी पिछले गीत की तरह अमिताभ भट्टाचार्य ने पर आवाज़ (वो जो इस गीतमाला में पहली बार सुनाई देगी) है विशाल मिश्रा की। यह गीत है फिल्म स्त्री 2 का और यहां बात हो रही है खूबसूरती की।



हिंदी फिल्म जगत में नायिका की खूबसूरती पर तमाम गीत लिखे गए हैं। हर गीत में स्त्री की सुंदरता के बारे में नए नए विचार..नई-नई काव्यमय कल्पनाएं। 

1968 में इन्दीवर ने फिल्म सरस्वतीचंद के गीतों के लिए बेहद प्यारे शब्द रचे थे। शुद्ध हिंदी में वर्णित उनका सौदर्य बोध सुनते ही बनता था। क्या मुखड़ा था ...चंदन सा बदन, चंचल चितवन धीरे से तेरा ये मुस्काना...मुझे दोष ना देना जगवालों, हो जाऊँ अगर मैं  दीवाना. 

इस गीत के अंतरे  भी सौंदर्य प्रतिमानों से भरे पड़े थे । मसलन पहला अंतरा कुछ यूं था। ये काम कमान भंवे तेरी, पलकों के किनारे कजरारे...माथे पर सिंदूरी सूरज, होंठों पे दहकते अंगारे....साया भी जो तेरा पड़ जाए....आबाद हो दिल का वीराना। लगभग सत्तर सालों बाद भी ये गीत कानों में वैसी ही मिसरी घोल देता है।

नब्बे के दशक की शुरुआत में 1942 A Love Story फिल्म में जावेद अख्तर साहब का वह गीत आपको जरूर याद होगा जिसमें उन्होंने एक लड़की की खूबसूरती को इतने सारे बिंबों में बांधा था कि कहना ही क्या। वह गीत था एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा। उस गीत मैं एक कन्या की तुलना एक खिलते गुलाब, शायर के ख़्वाब, उजली किरण, वन में हिरण, चांदनी रात, सुबह का रूप, सर्दी की धूप जैसे 21 रूपकों से की गई थी। गाना सुनते हुए उस वक्त दिल करता था कि रूपकों का ये सिलसिला चलता रहे।

वैसे खूबसूरत शब्द को लेकर नीलेश मिश्रा  ने फिर 2005 में फिल्म रोग के लिए लिखा कि खूबसूरत है वो इतना सहा नहीं जाता..कैसे हम ख़ुद को रोक लें रहा नहीं जाता....चांद में दाग हैं ये जानते हैं हम लेकिन....रात भर देखे बिना उसको रहा नहीं जाता

एम एम कीरावनी के संगीत और उदित नारायण की अदायगी ने तब इस गीत को खासी लोकप्रियता दिलवाई थी। पिछले साल अमिताभ भट्टाचार्य ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए  चौदहवीं पायदान के इस गीत के लिए क्या खूब लिखा कि

धूप भी तेरे रूप के सोने पे, कुर्बान हुई है
तेरी रंगत पे खुद, होली की रुत हैरान हुई है
तुझको चलते देखा, तब हिरणों ने सीखा चलना
तुझे ही सुनके कोयल को, सुर की पहचान हुई है
तुझसे दिल लगाए जो, उर्दू ना भी आए तो
शख़्स वो शायरी करने लगता है
कि कोई इतना खूबसूरत....कैसे हो सकता है?

अब कोयल और हिरण तो बेजुबान ठहरे वर्ना अमिताभ पर मानहानि का मुकदमा जरूर दायर करते। वैसे मजाक एक तरफ अमिताभ के लिखे बोलों में एक नयापन तो है ही जो सुनने में अच्छा लगता है।

सचिन जिगर यहां संगीत संयोजन में एक पाश्चात्य वातावरण रचते हैं जिसमें थिरकने की गुंजाइश रह सके हालांकि फिल्म की कहानी से इसका कोई लेना देना नहीं है। दरअसल ये गीत फिल्म के मूल कथानक के समाप्त होने के बाद आता है जहां वरुण धवन अतिथि कलाकार के रूप में पहली बार अपनी शक्ल दिखाते हैं। आजकल फिल्मी गीतों के बीच कोरस का प्रचलन बढ़ गया है। सचिन जिगर भी इसी शैली का यहां सफल अनुसरण करते दिखते हैं।

रही गायिकी की बात तो विशाल मिश्रा का गाने का अपना एक अलग ही अंदाज है। वह हर गाना बड़ा डूब कर गाते हैं। युवाओं का उनका ये तरीका भाता भी है। कबीर सिंह, एनिमल और हाल फिलहाल में सय्यारा में उनके गाए गीत काफी लोकप्रिय हुए हैं। ये अंदाज़ रूमानी गीतों  पर फबता भी है पर बार बार वही तरीका अपनाने से एक एकरूपता भी आती है जिससे विशाल को सावधान रहना होगा।

तो आइए सुनते है ये गीत जिसे फिल्माया गया है राज कुमार राव, वरुण धवन और श्रद्धा कपूर पर


खूबसूरती पर तेरी, खुद को मैंने कुर्बान किया 
मुस्कुरा के देखा तूने, दीवाने पर एहसान किया
खूबसूरती पर तेरी, खुद को मैंने कुर्बान किया
मुस्कुरा के देखा तूने, दीवाने पर एहसान किया
कि कोई इतना खूबसूरत, कोई इतना खूबसूरत
कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है?


जो देखे एक बार को, पलट के बार-बार वो
खुदा जाने, क्यों तुझे देखने लगता है
सच बोलूं ईमान से, ख़बर है आसमान से
हैरत में चांद भी तुझको तकता है
कि कोई इतना खूबसूरत....कैसे हो सकता है?


चलते चलते तो मैं बस आदिल फ़ारूक़ी साहब का ये शेर अर्ज करना चाहूंगा कि

न पूछो हुस्न की तारीफ़ हम से
मोहब्बत जिस से हो बस वो हसीं है
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie