मंगलवार, अगस्त 29, 2006

कहाँ गए संगीत के सुर ! मर गई क्या मेलोडी ?

जी नहीं ये प्रश्न मैं नहीं बल्कि हमारे अग्रज श्री जी.के.अवधिया जी पूछ रहे हैं हम सबसे परिचर्चा पर !

अवधिया जी मेरे मन में ये कहते हुये जरा भी संदेह नहीं कि भारत जैसे देश में संगीत की लय ना कभी मरी थी ना कभी मरेगी। समय के साथ साथ हमारे फिल्म संगीत में बदलाव जरूर आया है। ५० के दशक के बाद से इसमें कई अच्छे-बुरे उतार-चढ़ाव आये हैं । पर आपका ये कहना कि आज का संगीतकार 'मेलॉडियस' संरचना शायद करना ही नहीं चाहता सत्य से कोसों दूर है। इससे पहले कि मैं आज के संगीतकारों के बारे में आपकी राय पर कुछ प्रतिक्रिया दूँ फिल्म संगीत के अतीत पर नजर डालना लाजिमी होगा ।

इसमें कोई शक नहीं पुरानी फिल्मों के गीत इतने सालों के बाद भी दिल पर वही तासीर छोड़ते हैं ।
नौशाद, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन जैसे कमाल के संगीतकारों,
सहगल, सुरैया, गीता दत्त, लता, रफी, मुकेश, हेमंत, आशा, किशोर जैसे सुरीले गायकों
और राज कपूर, विमल राय, महबूब खान और गुरूदत जैसे संगीत पारखी निर्माता निर्देशकों ने ५० से ७० के दशक में जो फिल्म संगीत दिया वो अपने आप में अतुलनीय है। इसीलिये इस काल को हिन्दी फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल कहा जाता है । ये वो जमाना था जब गीत पहले लिखे जाते थे और उन पर धुनें बाद में बनाई जाती थीं ।

वक्त बदला और ७० के दशक में पंचम दा ने भारतीय संगीत के साथ रॉक संगीत का सफल समावेश पहली बार 'हरे राम हरे कृष्ण' में किया । वहीं ८० के दशक में बप्पी लाहिड़ी ने डिस्को के संगीत को अपनी धुनों का केन्द्रबिन्दु रखा । मेरी समझ से ८० का उत्तरार्ध फिल्म संगीत का पराभव काल था । बिनाका गीत माला में मवाली, हिम्मतवाला सरीखी फिल्मों के गीत भी शुरु की पायदानों पर अपनी जगह बना रहे थे । और शायद यही वजह या एक कारण रहा कि उस समय के हालातों से संगीत प्रेमी विक्षुब्ध जनता पहली बार गजल और भजन गायकी की ओर उन्मुख हुई। जगजीत सिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, तलत अजीज, पीनाज मसानी जैसे कलाकार इसी काल में उभरे।

९० का उत्तरार्ध हिन्दी फिल्म संगीत के पुनर्जागरण का समय था । पंचम दा तो नहीं रहे पर जाते जाते १९४२ ए लव स्टोरी (१९९३) का अमूल्य तोहफा अवश्य दे गए । कविता कृष्णामूर्ति के इस काव्यात्मक गीत का रस अवधिया जी आपने ना लिया हो तो जरूर लीजि॓एगा

क्यूँ नये लग रहे हें ये धरती गगन
मेंने पूछा तो बोली ये पगली पवन
प्यार हुआ चुपके से.. ये क्या हुआ चुपके से

मेंने बादल से कभी, ये कहानी थी सुनी
पर्वतों से इक नदी, मिलने से सागर चली
झूमती, घूमती, नाचती, दौड़ती
खो गयी अपने सागर में जा के नदी
देखने प्यार की ऍसी जादूगरी
चाँद खिला चुपके से..प्यार हुआ चुपके से..


पुरानी फिल्मों से आज के संगीत में फर्क ये है कि रिदम यानि तर्ज पर जोर ज्यादा है। तरह तरह के वाद्य यंत्रों का प्रयोग होने लगा है। धुनें पहले बनती हैँ, गीत बाद में लिखे जाते हैं। नतीजन बोल पीछे हो जाते हैं और सिर्फ बीट्स पर ही गीत चल निकलते हैं।
ऐसे गीत ज्यादा दिन जेहन में नहीं रह पाते। पर ये ढर्रा सब पर लागू नहीं होता ।

१९९५-२००६ तक के हिन्दी फिल्म संगीत के सफर पर चलें तो ऐसे कितने ही संगीतकार हैं जिन पर आपका कथन आज का संगीतकार 'मेलॉडियस' संरचना .................बिलकुल सही नहीं बैठता । कुछ बानगी पेश कर रहा हूँ ताकि ये स्पष्ट हो सके कि मैं ऐसा क्यूँ कह रहा हूँ।

साल था १९९६ और संगीतकार थे यही ओंकारा वाले विशाल भारद्वाज और फिल्म थी माचिस ! आतंकवाद की पृष्ठभूमि में बनी इस फिल्म का संगीत कमाल का था ! भला

छोड़ आये हम वो गलियाँ.....
चप्पा चप्पा चरखा चले.. और
तुम गये सब गया, मैं अपनी ही मिट्टी तले दब गया


जैसे गीतों और उनकी धुनों को कौन भूल सकता है ?

इसी साल यानि १९९६ में प्रदर्शित फिल्म इस रात की सुबह नहीं में उभरे एक और उत्कृष्ट संगीतकार एम. एम. करीम साहब ! एस. पी. बालासुब्रमण्यम के गाये इस गीत और वस्तुतः पूरी फिल्म में दिया गया उनका संगीत काबिले तारीफ है

मेरे तेरे नाम नहीं है
ये दर्द पुराना है,
जीवन क्या है
तेज हवा में दीप जलाना है

दुख की नगरी, कौन सी नगरी
आँसू की क्या जात
सारे तारे दूर के तारे, सबके छोटे हाथ
अपने-अपने गम का सबको साथ निभाना है..
मेरे तेरे नाम नहीं है.....


१९९९ में आई हम दिल दे चुके सनम और साथ ही हिन्दी फिल्म जगत के क्षितिज पर उभरे इस्माइल दरबार साहब ! शायद ही कोई संगीत प्रेमी हो जो उनकी धुन पर बने इस गीत का प्रशंसक ना हो

तड़प- तड़प के इस दिल से आह निकलती रही....
ऍसा क्या गुनाह किया कि लुट गये,
हां लुट गये हम तेरी मोहब्बत में...



पर हिन्दी फिल्म संगीत को विश्व संगीत से जोड़ने में अगर किसी एक संगीतकार का नाम लिया जाए तो वो ए. आर रहमान का होगा । रहमान एक ऐसे गुणी संगीतकार हैं जिन्हें पश्चिमी संगीत की सारी विधाओं की उतनी ही पकड़ है जितनी हिन्दुस्तानी संगीत की । जहाँ अपनी शुरुआत की फिल्मों में वो फ्यूजन म्यूजिक (रोजा, रंगीला,दौड़ ) पेश करते दिखे तो , जुबैदा और लगान में विशुद्ध भारतीय संगीत से सारे देश को अपने साथ झुमाया। खैर शांत कलेवर लिये हुये मीनाक्षी - ए टेल आफ थ्री सिटीज (२००४) का ये गीत सुनें

कोई सच्चे ख्वाब दिखाकर, आँखों में समा जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है
जब सूरज थकने लगता है
और धूप सिमटने लगती है
कोई अनजानी सी चीज मेरी सांसों से लिपटने लगती है
में दिल के करीब आ जाती हूँ , दिल मेरे करीब आ जाता है
ये रिश्ता क्या कहलाता है


२००४ में एक एड्स पर एक फिल्म बनी थी "फिर मिलेंगे" प्रसून जोशी के लिखे गीत और शंकर-एहसान-लॉय का संगीत किसी भी मायने में फिल्म संगीत के स्वर्णिम काल में रचित गीतों से कम नहीं हैं। इन पंक्तियों पर गौर करें

खुल के मुस्कुरा ले तू, दर्द को शर्माने दे
बूंदों को धरती पर साज एक बजाने दे
हवायें कह रहीं हैं, आ जा झूमें जरा
गगन के गाल को चल जा के छू लें जरा

झील एक आदत है, तुझमें ही तो रहती है
और नदी शरारत है तेरे संग बहती है
उतार गम के मोजे जमीं को गुनगुनाने दे
कंकरों को तलवों में गुदगुदी मचाने दे


और फिर २००५ की सुपरिचित फिल्म परिणिता में आयी एक और जुगल जोड़ी संगीतकार शान्तनु मोइत्रा और गीतकार स्वान्द किरकिरे की !
अंधेरी रात में परिणिता का दर्द क्या इन लफ्जो में उभर कर आता है

रतिया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो, चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद, आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरहा है, झींगुर का बाजे साथ


गीतों की ये फेरहिस्त तो चलती जाएगी। मेंने तो अपनी पसंद के कुछ गीतों को चुना ये दिखाने के लिये कि ना मेलोडी मरी है ना कुछ हट कर संगीत देने वाले संगीतकार।

हमारे इतने प्रतिभावान संगीतकारों और गीतकारों के रहते हुये आज के संगीत से आपकी नाउम्मीदी उनके साथ न्याय नहीं है । मैं मानता हूँ कि हीमेश रेशमिया जैसे जीव अपनी गायकी से आपका सिर दर्द करा देंते होंगे पर वहीं सोनू निगम और श्रेया घोषाल की सुरीली आवाज भी आपके पास हैं। अगर एक ओर अलताफ रजा हें तो दूसरी ओर जगजीत सिंह भी हैं । अगर आपको MTV का पॉप कल्चर ही आज के युवाओं का कल्चर लगता है तो एक नजर Zee के शो सा-रे-गा-मा पर नजर दौड़ाइये जहाँ युवा प्रतिभाएँ हिन्दी फिल्म संगीत को ऊपर ले जाने को कटिबद्ध दिखती हैं ।

सच कहूँ तो आज जैसी विविधता संगीत के क्षेत्र में उपलब्ध है वैसी पहले कभी नहीँ थी । संगीत की सीमा देश तक सीमित नहीं, और जो नये प्रयोग हमारे संगीतकार कर रहे हैँ उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के हमें खुले दिल से सुनना चाहिए। जब तक संगीत को चाहने वाले रहेंगे, सुर और ताल कभी नहीं मरेंगे । जरूरत है तो संगीत के सही चुनाव की।

श्रेणी : अपनी बात आपके साथ में प्रेषित

बुधवार, अगस्त 23, 2006

धर्मवीर भारती की मर्मस्पर्शी रचना : 'गुनाहों का देवता '

कौन सा गुनाह ? कैसा गुनाह ?
किसी से जिंदगी भर स्नेह रखने का...
और वो स्नेह अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचने लगे तो उसका त्याग करने का...
है ना अजीब बात !
पर यही तो किया चंदर ने अपनी सुधा के साथ ।
इस भुलावे में कि दुनिया प्यार की ऐसी पवित्रता के गीत गाएगी...
प्यार भी कैसा...

"सुधा घर भर में अल्हड़ पुरवाई की तरह तोड़-फोड़ मचाने वाली सुधा, चंदर की आँख के एक इशारे से सुबह की नसीम की तरह शांत हो जाती थी। कब और क्यूँ उसने चंदर के इशारों का यह मौन अनुशासन स्वीकार कर लिया था, ये उसे खुद भी मालूम नहीं था और ये सब इतने स्वाभाविक ढंग से इतना अपने आप होता गया कि कोई इस प्रक्रिया से वाकिफ नहीं था.......... दोनों का एक दूसरे के प्रति अधिकार इतना स्वाभाविक था जैसे शरद की पवित्रता या सुबह की रोशनी.... "
और अपनी इस सुधा को ना चाहते हुये भी उसने उस राह में झोंक दिया जिस पर वो कभी नहीं चलना चाहती थी । सुधा तो चुपचाप दुखी मन से ही सही उस राह पर चल पड़ी और चंदर...

क्या चंदर का बलिदान उसे देवता बना पाया?

जो समाज के सामने अपने प्यार को एक आदर्श, एक मिसाल साबित करना चाहता था वो अपने खुद के अन्तर्मन से ना जीत सका । और जब अपने आपको खुद से हारता पाया तो अपना सारा गुस्सा, सारी कुंठा उन पे निकाली जिनके स्नेह और प्रेम के बल पर वो अपने व्यक्तित्व की ऊँचाईयों तक पहुँच पाया था।

तो क्या चंदर को अपनी भूल का अहसास हुआ ?
क्या वो समझ पाया कि कहाँ उसका जीवन दर्शन उसे धोखा दे गया?

पर ये भी तो सच है ना कि जिंदगी में बहुत सी बातें वक्त रहते समझ नहीं आतीं । और जब समझ आती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
चंदर हम सब से अलग तो नहीं !


चंदर ने यही गलती की कि अपने प्यार को यथार्थ के धरातल या जमीनी हकीकत से ऊपर कर के देखा, एक आदर्श प्रेम की अवधारणा को लेकर जो भीतर से खोखली साबित हुई। अपने दुख को पी कर वो जीवन में कुछ कर पाता तो भी कुछ बात थी। पर वो तो बुरी तरह कुंठित हो गया अपने आप से अपने दोस्तों से....सुधा उसे इस कुंठा से निकाल तो सकी पर किस कीमत पर ?


बहुत आश्चर्य होता है कि क्यूँ हम नहीं समझ पाते कि कभी कभी मामूली शख्स बन के जीने में ही सबसे बड़ी उपलब्धि है ! क्या हम वही बन के नहीं रह सकते जो हम सच्ची में हैं। अपने को दूसरों की नजर में ऊँचा साबित करने के लिये अपने आप को छलाबा देना कहाँ तक सही है?

किताब के बारे में
धर्मवीर भारती जी की गुनाहों का देवता सबसे पहले १९५९ में प्रकाशित हुई । हिन्दी साहित्य के दिग्गज इस उपन्यास को पात्रों के चरित्र -चित्रण के लिहाज से हिन्दी में लिखे हुये सर्वश्रेष्ठ उपन्यासों में से एक मानते हैं । अब तक इस उपन्यास के तीस से भी ज्यादा संस्करण छापे जा चुके हें और ये सिलसिला बदस्तूर जारी है ।

पिछले साल जून में इस उपन्यास को पढ़ा था और तभी ये पोस्ट अपने रोमन हिंदी चिट्ठे पर प्रकाशित की थी । जैसी की उम्मीद थी इसके कथानक ने मुझे हिला कर रख दिया था । सुधा की मौत को पचा पाना कितना दुष्कर था ये इस कथानक को पढ़ने वाला भली - भांति जानता है । और ऐसा अनुभव अकेला मेरा हो ऐसी बात नहीं , इस
पोस्ट पर मिली प्रतिक्रियाएँ इस बात की गवाह हैं कि पढ़ने वाला सुधा, चंदर, पम्मी, विनती के चरित्र से इस कदर जुड़ जाता है कि उनके कष्ट को अपने अंदर ही होता महसूस करता है।

खुद धर्मवीर भारती जी कहते है कि इस उपन्यास को लिखते समय उन्होंने वैसी भावनाएँ महसूस कीं जैसी कोई घोर विपदा में पूरी श्रृद्धा के साथ प्रार्थना करने में महसूस करता है .. उन्हें ऍसा लगा की वो प्रार्थना उनके हृदय में समाहित है और खुद बा खुद उसे वो दोहरा रहे हों ।

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किताबें बोलती हैं में प्रेषित

शनिवार, अगस्त 19, 2006

मन्नू भंडारी की अनुपम कृति 'महाभोज'

मन्नू भंडारी के इस उपन्यास को पहली बार 1986 में पढ़ा था । पिछले हफ्ते राँची के ठंडे माहौल को छोड़ कर पटना जाना पड़ा । वहाँ की चिपचिपाती गर्मी से निजात पाने के लिये इधर उधर निरुद्देश्य भटक रहा था तो सहसा अलमारी से ये पुस्तक झांकती मिली ।


कहानी तो अब बिलकुल याद नहीं थी पर ये जरूर याद था कि पहली बार पढ़ते वक्त ये किताब मन को बहुत भायी थी। डॉयरी के पन्नों में इस किताब के नाम के आगे मैंने तीन स्टार जड़े थे । और बाद में जब भंडारी जी का लिखा हुआ उपन्यास 'आप का बंटी' पढ़ा था तब से मन्नू जी मेरी चहेती लेखिका बन गईं थीं।

200 पृष्ठों से भी कम की इस पुस्तक को दुबारा पढ़ने में ज्यादा समय नहीं लगा और इस बात की खुशी भी हुई कि इस किताब को फिर से पढ़ने का मौका मिल पाया । तो आइए ले चलें आपको इस उपन्यास के कथानक की ओर ! ये कहानी है विकास के हाशिये से बाहर खड़े एक गाँव सरोहा की ! एक ऐसा गाँव जहाँ बाहुल्य तो है हरिजनों का, पर तूती बोलती है जाटों की । यहीं मौत होती है एक पढ़े लिखे हरिजन नवयुवक बिसू की । वैसे तो बिसू एक सामान्य नागरिक की तरह गुमनामी की मौत मरा होता, पर परम गौरवशाली भारतीय लोकतंत्र की एक परम्परा ने ऐसा होने नहीं दिया। बिसू की मौत के कुछ दिनों पहले ही सरोहा में उपचुनाव की घोषणा हो चुकी थी । और जैसा की होता है विरोधी दल हाथ में आए इस सुनहरे मौके को कैसे जाने देते ।
कहानी आगे बढ़ती है...शुरु होती है बिसू की मौत की तहकीकात...

या यूँ कहें कि एक आम से शख्स के करीबियों से किया गया क्रूर मजाक !
राजनीतिक रस्साकशी के इस माहौल में इस दुखद मौत पर सारे पक्ष अपनी अपनी गोटियाँ सेंकते नजर आते हैं। 
चाहे वो मुख्यमंत्री हों जो जनता का ध्यान बिसू की हत्या से हटाने के लिए, लोक लुभावन योजना का चारा डालता हो...
या विरोधी जो कत्ल के राजनीतिक लाभ के लिये जातिगत वैमनस्य को बढ़ाने से नहीं चूकते...
या आला अफसर जो केस की तह तक जाने वालों को प्रताड़ित कर अपनी पदोन्नति के रास्ते साफ करते चले जाते हैं...
या फिर मीडिया जो कागज के परमिट बढ़बाने की चाह में रातों रात सरकार की नीतियों के मुखर प्रशंसक बन जाते हैं...

लोकतंत्र के तले एक ऍसा घृणित राजनीतिक चक्र जिसमें एक हत्या , आत्महत्या बताई जाती है और फिर कुछ और .......
खैर वो बताना नहीं बताना ज्यादा मायने नहीं रखता उसे उपन्यास में ही पढ़ लीजिएगा ।

पर गौर करने वाली बात ये है कि 1979  में लिखे इस उपन्यास को पढ़कर नहीं लगता कि हम 30 वर्ष पहले की स्थितियों से गुजर रहे हैं। उपन्यास के हर एक चरित्र को आज भी हम सब अपने इर्द-गिर्द घूमता महसूस कर सकते हैं। एक बेहद सशक्त उपन्यास जो हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की खामियों और निरंतर घटते राजनीतिक मूल्यों की झलक दिखलाकर मन को कचोटता हुआ सा जाता है ।

बुधवार, अगस्त 09, 2006

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी (भागः2)

पिछली बार बात कर रहे थे कि किस तरह जब कोई हमारी आँखें पढ़ लेता है तो मन पुलकित हो उठता है। पर बात यहीं खत्म हो जाती तो फिर लुत्फ किस बात का था। अरे, आँखों या नजरों का इक इशारा प्यार की खुशबू बिखेरने के लिए काफी है। इसीलिये तो निदा फॉजली साहब कहते हैं

उनसे नजरें क्या मिलीं रौशन फिजाएँ हो गयीं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज है

खुलती जुल्फों ने सिखाई मौसमों को शायरी
झुकती आँखों ने बताया महकशीं क्या चीज है

पर क्या आँखों का मोल सिर्फ इशारों तक है? नहीं जी, किसी की खूबसूरत आँखों को एक आशिक की नजरों से देखें तो आप भी शायद ये गीत गाने पर मजबूर हो जाएँ

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
ये उठें सुबह चले, ये झुकें शाम ढ़लें
मेरा जीना, मेरा मरना इन्हीं पलकों के तले...


और अमजद इस्लाम अमजद तो महबूब की आँखों के सामने ही रात दिन एक करने पर तुले हैं

सोएँगे तेरी आँख की खिलवत में किसी रात
साये में तेरी जुल्फ के जागेंगे किसी दिन


पर शुरु शुरु में अपने महबूब की ओर आँख उठा कर देखना आसान है क्या ?
अब इन्हें ही देखिये दिल में प्यार की शमा जल चुकी है पर ये हैं कि अभी भी निगाहें मिलाने से कतरा रहे हैं
हसरत है कि उनको कभी नजदीक से देखें
नजदीक हो तो आँख उठायी नहीं जाती
चाहत पे कभी बस नहीं चलता है किसी का
लग जाती है ये आग लगाई नहीं जाती


पर हुजूर एक बार अगर किसी से आँखों ही आँखों में बात हो भी जाये तो भी क्या कम मुसीबतें हैं। कभी तो उनकी बड़ी बड़ी आँखों का काजल दिल की धड़कनों को बढ़ाता है तो कभी आँखों आँखों में हुई वो मुलाकातें दिल में घबराहट पैदा करती हैं। बरसों पहले डॉयरी के पन्नों पे लिखी अपनी एक तुकबन्दी याद आती है

उसकी आँखों का वो काजल
जैसे गगन में काले बादल
उमड़ें घुमड़ें हाय ! मन मेरा घबराए

आँखों आँखों की वो बातें
वो नन्ही छोटी मुलाकातें
बरबस याद आ जाएँ, मन मेरा घबराए


पर ये आतुरता भरी घबराहट भी ऐसा जादू बिखेरती है कि अपनी आँखें भी किसी और की हो जाती हैं! यकीन नहीं आता तो इस नज्म की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएँ ।

कहो वो दश्त कैसा था?
जिधर सब कुछ लुटा आये
जिधर आँखें गँवा आये
कहा सैलाब जैसा था, बहुत चाहा कि बच निकलें, मगर सब कुछ बहा आए !

कहो वो चाँद कैसा था?
फलक से जो उतर आया तुम्हारी आँख में बसने
कहा वो ख्वाब जैसा था, नहीं ताबीर थी उसकी, उसे इक शब सुला आए.. !

पर क्या आँखों से सिर्फ प्रेम की धारा बहती है?
नहीं हरगिज नहीं ! आँखें जितना दिखाती हैं उतना ही छुपा भी सकती हैं। और फिर आँसुओं की जननी भी तो ये आँखें ही हैं ना !
अगली कड़ी में देखेंगे की कैसे करती हैं आखें भावों की लुकाछिपी और क्या होता है जब उन पर चढ़ता है उदासी का रंग.....

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मंगलवार, अगस्त 08, 2006

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी (भागः१)

आँखें ऊपरवाले की दी हुई सबसे हसीन नियामत हैं। शायद ही जिंदगी का कोई रंग हो जो इनके दायरे से बाहर रहा हो। यही वजह है कि शायरों ने इन आँखों में बसने वाले हर रंग को, हर जज्बे को किताबों के पन्नों में उतारा है। तो आज से शुरू होने वाले इस सिलसिले में पेश है शायरों की जुबानी, इन बहुत कुछ कह जाने वाली आँखों की कहानी..

आखें देखीं तो में देखता रह गया
जाम दो और दोनों ही दो आतशां
आँखें या महकदे के ये दो बाब हैं
आँखें इनको कहूँ या कहूँ ख्वाब हैं
बाब-दरवाजा

आँखें नीचे हुईं तो हया बन गयीं
आँखें ऊँची हुईं तो दुआ बन गयीं
आँखें उठ कर झुकीं तो अदा बन गयीं
आँखें झुक कर उठीं तो कजा बन गयीं
कजा किस्मत
आँखें जिन में हैं मह्व आसमां ओ जमीं
नरगिसी, नरगिसी, सुरमयी, सुरमयी...

मह्व - तन्मय
यूं तो कहते हैं कि आँखें दिल का आइना होतीं हैं पर उसे पढ़ने के लिये एक संवेदनशील हृदय चाहिये। अगर कोई बिना बोले आपकी मन की बात जान ले तो कितना अच्छा लगता है ना ! अब खुमार बाराबंकवी साहब की आँखें - देखिये किसने पढ़ लीं ?

वो जान ही गये कि हमें उन से प्यार है
आँखों की मुखबिरी का मजा हम से पूछिये

किसी का प्यारा चेहरा हो, और सामने हो उस चेहरे को पढ़ती दो निगाहें तो जवां दिलों के बीच का संवाद क्या शक्ल इख्तियार करता है वो मशहूर शायरा परवीन शाकिर की जुबां सुनिये

चेहरा मेरा था, निगाहें उस की
खामोशी में भी वो बातें उस की
मेरे चेहरे पर गजल लिखती गईं
शेर कहती हुईं आँखें उस की


खुशी की चमक हो या उदासी के साये सब तुरंत आँखों में समा जाता है।

कभी तो ये किसी की याद से खिल उठती हैं......

तेरी आँखों में किसी याद की लौ चमकी है
चाँद निकले तो समंदर पे जमाल आता है


तो कभी किसी के पास ना होने का गम उन्हें नम कर देता है

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है


पर आँखों की ये भाषा हर किसी के पल्ले नहीं पड़ती। अगर ऍसा नहीं होता तो नजीर बनारसी के मन में भला ये संदेह क्यूँ उपजता ?

मेरी बेजुबां आँखों से गिरे हैं चंद कतरे
वो समझ सके तो आँसू, ना समझ सके तो पानी


अब इन्हें भी तो अपने महबूब से यही शिकायत है

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैँ मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा
वो मेरे मसायल को समझ ही नहीं सकता
जिस ने मेरी आँखों में समंदर नहीं देखा


पर ऐसा भी नहीँ है कि इस समंदर को महसूस करने वाले शायरों की कमी है।
एक तरफ तो जनाब अमजद इस्लाम अमजद इसकी गहराई में उतरना चाहते हैं....

जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक
आँखों में तेरी डूब के देखेंगे किसी दिन

.......तो फराज अपनी आखिरी हिचकी इन आँखों के समंदर में लेने की ख्वाहिश रखते हैं

डूब जा उन हसीं आँखों में फराज
बड़ा हसीन समंदर है खूदकुशी के लिये
और इन हजरात का ख्याल भी कोई अलग नहीं
अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ , मुझे डूब कर मर जाने दे


तो हुजूर आज के किये तो इतना ही... आँखों की ये दास्तान तो अभी चलती रहेगी क्योंकि

इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं
इन आँखों के वाबस्ता अफसाने हजारों हैं
इक सिर्फ हमीं मय को आँखों से पिलाते हैँ

कहने को तो दुनिया में महखाने हजारों हैं


इस श्रृंखला की अगली कड़ियाँ

आँखों की कहानी : शायरों की जुबानी - भाग 2, भाग 3

बुधवार, अगस्त 02, 2006

'अभिव्यक्ति' पर मेरी पहली अभिव्यक्ति !

कल का दिन मेरे लिये अपार हर्ष का था । सुबह जब मेल बॉक्स खो ला तो देखा कि पूर्णिमा जी ने सूचना भेजी है कि मेरा सिक्किम का यात्रा विवरण अभिव्यक्ति के १ अगस्त के अंक में छप रहा है। मन खुशी से फूला ना समाया और तुरंत नाते रिश्तेदारों को खबर भिजवायी कि हमें भी लेखक बनने का सौभाग्य प्राप्त हो गया है। मन ही मन उन दोस्तों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने सिक्किम चलने का सुझाव दिया था। वैसे तो सिक्किम का यात्रा विवरण सुना-सुना कर मैंने आप सबको महिनों बोर किया था पर जो मेरे इस अनर्गल प्रलाप से पतली गली से साफ बच निकले हों उनके लिये अभिव्यक्ति की ये कड़ी पुनः परोस रहा हूँ ।

सिक्किम के सफर पर....

श्रेणी :
अपनी बात आपके साथ में प्रेषित

बुधवार, जुलाई 26, 2006

फिर क्या होगा उसके बाद ? : बालकृष्ण राव

हमारे भविष्य में क्या है, ये जानने की उत्सुकता तो हम सभी में होती है। पर इस उत्सुकता का ना तो कोई अंत है, ना कोई सीमा।
भविष्य की गहराइयों में उतरने लगें तो पहले तो सब स्पष्ट दिखता है, पर फिर धुंधलापन बढ़ता जाता है ।
आखिर किसी से कहाँ तक जान पाते हैं हम ?
जन्म, शिक्षा, प्रेम, नौकरी, विवाह, वैभव.... के बारे में जान लेने के बाद बचता ही क्या है हमारे पास!
बस मृत्यु की एक दस्तक जिसे जानने की इच्छा नहीं होती !
और फिर उसके बाद क्या ?
उसका जवाब शायद किसी के पास नहीं! भविष्य के पास भी नहीं क्योंकि यहाँ आकर तो वो भी अपने मायने खो देता है।
बालकृष्ण राव की ये कविता शिशु के मुख से चंद पंक्तियों में इस सहजता और भोलेपन से प्रकृति की इस अनसुलझी पहेली की ओर इशारा कर जाती है कि मन सोच में पड़ जाता है।

विद्यालय की छठी कक्षा में पढ़ी ये कविता मुझे बेहद प्रिय है पर नेट पर ये मिल नहीं रही थी। इसकी तालाश मुझे NCERT की एक पुस्तक अपूर्वा तक ले गयी और इसे पुनः पढ़कर मन ही मन बालकृष्ण राव को नमन किया, जिन्होंने अनादि..अनन्त काल से चले आ रहे इस प्रश्न को इतनी सुंदरता से पेश किया है .

' फिर क्या होगा उसके बाद?'
उत्सुक होकर शिशु ने पूछा,
' माँ, क्या होगा उसके बाद?'


 रवि से उज्जवल, शशि से सुंदर,
नव-किसलय दल से कोमलतर ।
वधू तुम्हारे घर आएगी 
उस विवाह उत्सव के बाद 

पलभर मुख पर स्मिति - रेखा
खेल गई, फिर माँ ने देखा
उत्सुक हो कह उठा किन्तु वो
फिर क्या होगा उसके बाद


फिर नभ से नक्षत्र मनोहर
स्वर्ग -लोक से उतर- उतर कर
तेरे शिशु बनने को मेरे
घर आएँगे उसके बाद


मेरे नए खिलौने लेकर,
चले ना जाएँ वे अपने घर
चिंतित होकर उठा, किन्तु फिर
पूछा शिशु ने उसके बाद ?

अब माँ का जी ऊब चुका था
हर्ष-श्रांति में डूब चुका था
बोली, "फिर मैं बूढ़ी होकर
मर जाऊँगी उसके बाद"


ये सुन कर भर आए लोचन
किंतु पोंछकर उन्हें उसी क्षण
सहज कुतूहल से फिर शिशु ने
पूछा, "माँ, क्या होगा उसके बाद"

 कवि को बालक ने सिखलाया
सुख-दुख है पलभर की माया
है अनंत तत्त्व का प्रश्न यह,
"फिर क्या होगा उसके बाद?"


बालकृष्ण राव (Balkrishna Rao)

मंगलवार, जुलाई 18, 2006

जहाँ हो स्वतंत्रता का अपमान, कैसे होगा वो भारत महान ?



जहाँ हो स्वतंत्रता का अपमान
कैसे होगा वो भारत महान ?


जिस बात पर बचपन से गर्व करते आए हैं कि हमारे देश में चाहे जो भी कमियाँ हो हमारे यहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है । पर कुछ ब्लॉग्स को प्रतिबंधित करने के लिये लाखों लोगों के विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता का हनन करने का जो तरीका सरकार ने अपनाया है, ना केवल वो बेहद निंदनीय है पर एक उदार लोकतांत्रिक छवि और परम्परा रखने वाले देश भारत के दामन में काला धब्बा है। मैं पूरी ब्लॉगर मंडली की ओर से सरकार से अनुरोध करता हूं कि इस अविवेकपूर्ण फैसले को तुरंत वापस ले।

रविवार, जुलाई 16, 2006

मर्डरर की माँ

धमाकों से उपजे आतंक के इस वातावरण में पुलिस की खोजबीन जारी है ! पर किसकी खोज कर रही है पुलिस?....... चंद कठपुतलियों की ? शायद वो पता कर सकें की इन कठपुतलियों के तार किन शातिर दिमागों से जुड़े हैं ! ऍसा भी नहीं कि वे जानते नहीं कि इनकी चाभी किसके पास है ? पर घृणा और नफरत फैलाने वाले सौदागरों का बाल भी बांका नहीं होने वाला ! गाज गिरनी है तो इन कठपुतलियों पर ! पर उससे क्या समस्या का निदान हो पाएगा। नहीं कदापि नहीं! जब तक मौत के ये ठेकेदार धरती पर रहेंगे नई-नई कठपुतलियाँ रंगमंच पर आती रहेंगी और ये धरा रक्त-रंजित होती रहेगी। अगर थोड़ा परिदृश्य बदलें तो पाएँगे कि देश के अंदर भी ऐसे महानुभावों की कमी नहीं जो ऊपर से तो भले और सम्मानित लोगों की गिनती में आते हैं पर जिनकी मुट्ठी में अनगिनत टूटती‍-बनती कठपुतलियाँ हैं जो उनके फायदे कि लिये किसी भी पल किसी तरह के अपराध को अंजाम देने के लिये तैयार हैं। बंगाल की प्रसिद्ध साहित्यकार महाश्वेता देवी का उपन्यास मर्डरर की माँ ऐसी ही शक्तियों की ओर इशारा करता है जो अपराधियों को पैदा करती हैं, उनसे घृणित कृत्य करवाती हैँ और अपना मतलब पूरा होने पर उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंकती हैं। पार्टियाँ बदलती हैं, कहने को नई विचारधारा वाले लोग आते हैं पर कुछ दिनों बाद जनता ठगी-ठगी सी देखती हे कि अरे सभ्य समाज के दुश्मन रहे लोग फिर से नयी व्यवस्था पर काबिज हो गये हैं। लेखिका के इन शब्दों पर गौर करें " मेरे बेटे के हाथ में छुरा थमाया भवानी बाबू ने! ये लोग मर गए ! तपन भी मर जाएगा। लेकिन भवानी बाबू जैसे लोग और मर्डरर ले आयेंगे। जो खून करता है वह जरूर मुजरिम है।....लेकिन दारोगा बाबू, जो लोग मर्डर कराते हैं, वे लोग तो खुले ही छूट गये। आजाद ही छूट गए। यह कैसा फैसला है? तपन क्या अकेला ही मर्डरर हैं ? भवानी बाबू क्या हैं ? तपन की मां की सूखी-सूखी आंखों में सूखा-सूखा हाहाकार ! भवानी बाबू जेसे लोग भी तो मर्डरर हैं , लेकिन उन लोगों को कोई नहीं पकड़ेगा, कोई गिरफ्तार नहीं करेगा । आज अगर भय और आतंक रहित समाज की स्थापना करनी है तो पहली चोट करनी होगी आतंक और अपराध का निर्माण करने वाली इन शक्तियों की । ऐसी ताकतों की पैठ समाज के हर तबके, हर धर्म, हर दल में है। पर अगर देश की सारी जनता इन दुश्मनों को चिन्हित कर इनका सफाया करने के लिये सरकार पर दबाव डाले तभी इस देश में शांति सदभाव की एक नयी सुबह का आगमन हो सकता है । 

मंगलवार, जुलाई 11, 2006

मेरे मन ये बता दे तू , किस ओर चला है तू ?

हाय री जिन्दगी...
और उसकी ख्वाहिशें...
कूछ पूरी होती हें तो कुछ फिर से पैदा हो जाती हैं। पर मामला इतना सरल भी नहीं।
कभी तो ऐसा होता है जनाब कि हम जिसे चाहते हैं मन उसे पाने की राह भी खोज देता है पर ये खोपड़ी पर राज करने वाला दिमाग है ना तुरंत एक हिदायत दे डालता है

ख्वाब, उम्मीद, नशा, सांस, तबस्सुम, आँसू
टूटने वाली किसी शय पर भरोसा ना करो

कमरान नज्मी

किसी की प्रीत से उपजी दिलोदिमाग की इस जद्दोजहद का शिकार इंसान आखिर यही कहने पर मजबूर हो जाता है

क्या ये भी जिंदगी है कि राहत कभी ना हो
ऐसी भी किसी से मोहब्बत कभी ना हो


लब तो ये कह रहे हैं कि उठ बढ़ कर चूम ले
आँखों का इशारा कि जुर्रत कभी ना हो


कृष्ण मोहन

पर परसों जब ये गीत सुना तो पाया कि जावेद अख्तर साहब तो कुछ उलटा ही सिखा पढ़ा रहे हैं। अब वो तो धड़कनों की आवाज सुनने को कहेंगे शायर जो ठहरे। पर ये जो शायर हैं ना कुछ पल के लिये ही सही वास्तविकता के धरातल के ऊपर ऐसी उड़ान पर ले जाते हैं जहाँ प्रीत की ऊँची ऊँची लहरों के थपेड़ों से टकराकर दिमागी उलझनें दूर छिटक जाती हैं।

सूफियाना अंदाज में शफकत अमानत अली द्वारा गायी पहली कुछ पंक्तियाँ सुन कर ही मन झूम जाता है। और शंकर-अहसान-लॉय की तिकड़ी के मधुर संगीत संयोजन का तो कहना ही क्या! चाहे वो मुखड़े के पहले गिटार की धुन हो या अंतरे के बीच गिटार और भारतीय वाद्य यंत्रों के साथ की शास्त्रीय जुगलबंदी। मन वाह वाह कर उठता है।
मेरे मन ये बता दे तू
किस ओर चला है तू ?
क्या पाया नहीं तूने ?
क्या ढ़ूंढ़ रहा है तू ?

जो है अनकही , जो है अनसुनी, वो बात क्या है बता ?
मितवा ऽऽऽऽऽऽ, कहें धड़कनें तुझसे क्या, मितवा ऽऽऽऽऽऽऽऽऽ, ये खुद से तो ना तू छुपा

जीवन डगर में, प्रेम नगर में
आया नजर में जब से कोई है
तू सोचता है! तू पूछता है !
जिसकी कमी थी, क्या ये वही है ?
हाँ ये वही है, हाँ ये वही है ऽऽऽऽऽऽऽऽ
तू इक प्यासा और ये नदी हैऽऽऽ
काहे नहीं, इसको तू, खुल के बताये
जो है अनकही .................ना तू छुपा

तेरी निगाहें पा गयी राहें
पर तू ये सोचे जाऊँ ना जाऊँ
ये जिंदगी जो, है नाचती तो
क्यूँ बेड़ियों में हैं तेरे पाँव?
प्रीत की धुन पर नाच ले पागलऽऽऽऽ
उड़ता अगर है, उड़ने दे आंचलऽ
काहे कोई, अपने को, ऐसे तरसाए
जो है अनकही .................ना तू छुपा


कभी अलविदा ना कहना के ये गीत जरूर सुनें ।
गीत सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें ।और हाँ गलती से Remix Version मत सुन लीजियेगा।
श्रेणी : मेरे सपने मेरे गीत में प्रेषित

शुक्रवार, जुलाई 07, 2006

लो जी मन्ने कर दिया गोल !

फुटबॉल का महासंग्राम समापन की ओर अग्रसर है । अखबार के पहले पन्ने चीख-चीख कर इस बात की घोषणा कर रहे हैं। रात की नींद हराम हो रही हो तो हुआ करे पर सुबह कार्यालय में लोगों की पहली बहस फुटबॉल की ही होनी है। एक आम भारतीय की तरह इस खेल पर मेरा प्यार हर चार साल के बाद इस महापर्व के दौरान ही उमड़ता है। यूरो के टी.वी. प्रसारण के बाद ये अंतराल घट कर दो साल का हो गया है। ऍसा सिर्फ मेरे साथ है ऐसी बात नहीं । मुझ जैसे बरसाती मेढ़क भारत के हर गली-मोहल्लों में भरे पड़े हैं जो चार साल में आने वाली इस मौसमी बयार के समय ही टरटराते हैं।

छाया ने प्रश्न किया था कि फुटबॉल में इतने पीछे हम क्यूँ है। अब इतनी दिलचस्पी दिखाने वाले भारतीय जनमानस से ये पूछा जाए कि भइया आप में से कितने हैं जिन्होंने स्कूल या कॉलेज के जमाने में हफ्ते भर २ घंटे भी फुटबॉल खेली हो। यकीन के साथ कह सकता हूँ कि ये संख्या २० फीसदी से भी कम आएगी। दरअसल इतनी दौड़ भाग करना हमारी प्रकृति में ही नहीं ।

अपनी बात करूँ तो फुटबॉल हम पर पहली बार तब थोपा गया जब हमने छठी कक्षा में प्रवेश किया था। स्कूल का नियम था कि पी.टी. क्लॉस के बाद सबको फुटबॉल ही खेलनी है। अब अपनी दुबली पतली काया ले कर हम कहाँ अपने अपेक्षाकृत बलिष्ठ साथियों से धींगामुश्ती करते फिरते। हाँ गोल करने की वो उत्कट अभिलाषा मन में जरूर विद्यमान रहती थी। चूंकि कक्षा के सारे विद्यार्थियों को खेलना अनिवार्य था इसलिये एक टीम में १५ से २० खिलाड़ी हो जाया करते थे। इसी सुविधा का फायदा उठा कर हम अक्सर विरोधी पक्ष की 'D' के पास खड़े दिखाई देते थे। जब गेंद गोलपोस्ट के पास आती तभी पता लगता कि मनीष किस टीम में है :)। पर क्या कहें गेंद कब्जे में होने के बावजूद मैं गोलकीपर को चकमा नहीं दे पाता था। साल बीतते गए , कक्षाएँ पार होती गईं पर एक अदद गोल करने का सपना अधूरा ही रहा । पर भगवान के घर देर है अँधेर नहीं । तीन सालों का स्वप्न, भगवन ने नवीं कक्षा में जाकर पूर्ण किया।

उस दिन दो पीरियड खाली मिल गये थे। मुख्य मैदान में जगह नहीं थी। बगल का छोटा मैदान खाली था। हमेशा की तरह इस बार मैं 'D' तो नहीं पर मध्य रेखा के आगे खड़ा था। तीन साल के अनुभवों से लोग ये तो जान ही चुके थे कि ये बंदा कहीं भी खड़ा हो ले, गोल तो करने से रहा। इसी वजह से हमारे आगे पीछे कोई टोह लेने वाला नहीं था। किसी ने हमारे गोल की तरफ से किक ली और अनजाने में गेंद हमारे पास आ गिरी। अब सामने विपक्षी रक्षक के रूप में सिर्फ एक ही खिलाड़ी था जिसकी डील डौल मेरी तरह की थी। ऊपरवाले की दया से उसे छकाने में कामयाब रहा और गोलकीपर के पास जा पहुँचा। किक तो धीमी लगी पर उसका कोण सही बना । और लो जी अंततः गोल कर ही दिया मैंने। उस गोल की खुशी मुझे आज तक है क्योंकि वो इस महान खिलाड़ी का इकलौता गोल था :p।

खैर, बात भारत के फुटबॉल प्रेम की हो रही थी। वक्त बदल रहा है। आजकल के युवा शरीर बनाने और भाग दौड़ करने पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। फिर भी जो वास्तव में इस खेल से जुड़े हैं वो दम-खम में यूरोपीय, लैटिन अमरीकी और अफ्रीकी खिलाड़ियों से काफी पीछे हैं। १० वर्षों में अगर भारतीय टीम एशिया में भी अपनी साख बना ले तो ये एक महान उपलब्धि होगी।

श्रेणी :
अपनी बात आपके साथ में प्रेषित

सोमवार, जुलाई 03, 2006

शक्ति और क्षमा

परिचर्चा में दिनकर की कविताओं वाली पोस्ट में इन्द्रधनुष वाले नितिन बागला जी ने शक्ति और क्षमा की कुछ पंक्तियाँ पेश की थीं और लिखा था कि किसी को शेष पंक्तियाँ याद हो तो लिखे। ये कविता मुझे भी सदा से पसंद रही है पर पूरी याद नहीं थी। खोज बीन के पश्चात अंतरजाल पर ये जब इमेज फार्म में मिली तो आप सब के साथ बांटने की इच्छा हुई।

आज के इस एक ध्रुवीय विश्व में ये कविता कितनी प्रासंगिक है वो आज भी इस रचना को पढ़ कर आप सब महसूस कर सकते हैं। अब अमरीका की विश्व नीति की तुलना और असर, भारत की विदेश नीति से करें तो दिनकर की ये पंक्तियाँ मन को उद्वेलित किये बिना नहीं रह पातीं। बिना बल के क्षमा या सहनशीलता दिखाने वालों को ना किसी ने गंभीरता से लिया है ना लेगा।
आशा है ये कविता आप सब की भी प्रिय होगी ।

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

श्रेणी :
मेरी प्रिय कवितायें में प्रेषित

शनिवार, जुलाई 01, 2006

गुनचा कोई मेरे नाम कर दिया ...

आज सुनिये एक अलग आवाज और निराले अंदाज में मोहित चौहान को । सिवाए गिटार के इस गीत में अन्य किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं हुआ है। सीधी सहज भाषा में लिखी, फिल्म 'मैं मेरी पत्नी और वह' की इस गजल में जान डालने में मोहित पूरी तरह सफल रहे हैं । आशा है आप सब भी इसे सुनने के बाद उनके इस अंदाज पर मोहित हुये बिना नहीं रह सकेंगे।

गुनचा कोई मेरे नाम कर दिया
साकी ने फिर से मेरा जाम भर दिया

तुम जैसा कोई नहीं इस जहान में
सुबह को तेरी जुल्फ ने शाम कर दिया

महफिल में बार बार इधर देखा किये
आँखों के जजीरों को मेरे नाम कर दिया

होश बेखबर से हुये उनके बगैर
वो जो हमसे कह ना सके, दिल ने कह दिया


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गुरुवार, जून 29, 2006

लमहा-लमहा दूरी यूँ पिघलती है...

अरे बाबा! दो महिने हो गये और इस चिट्ठे पर किसी गीत का जिक्र नहीं हुआ। ना जी आपका ये नाचीज बन्दा संगीत से दूर भला कैसे रह सकता है। पर क्या करें इस साल संगीत के नाम पर मायानगरी मुंबई ने अब तक जो कुछ परोसा है वो अपने उदर को कुछ खास पसंद नहीं आया था। पर गैंगस्टर का ये गीत सुना तो जुबान पर ये नग्मा चिपक सा गया।
इस हल्के फुल्के रूमानियत भरे नग्मे को अपनी मखमली आवाज से तराशा है गायक अभिजीत ने। और गाने में गिटार के जो प्रारंभिक नोट्स प्रयोग किये गये हैँ वो एक ऐसा माहौल पैदा करते हैं की सुनने वाला गीत के साथ बहता चले।

वो एक चेहरा..
भावनाओं में बहती वो आखें...
बिना हिले अपनी ही कहानी कहते वो होठ...
ना जाने कितने कवियों को कल्पना की उड़ान में बहाकर ले जा चुके हैं
गीतकार नीलेश मिश्र भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। इसलिये जनाब अगर सावन की सिमसिमी सी बयार आपके दिल को पहले से ही बेचेन किये हो तो ये गीत जुरूर सुनें। मेरा यकीं है कि ये आपके मूड को और रूमानी बना देगा! तो क्यूँ ना थोड़ा सा रूमानी हुआ जाए :) :p

लमहा-लमहा दूरी यूँ पिघलती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है
ख्वाहिशों की शाम ढ़लती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है

तेरी आँखें दिखाती हैं
हमें सपने सितारों के
तेरे होठों पे लिखा है
जो तुम बोले, इशारों में
ख्वाबो के कारवां में रात चलती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है

बहकती शाम, आयी है
तुझे लेकर के, बाहों में
तुझे छू लूँ कि रखूँ मैं
छुपाकर के, निगाहों में
शर्माती इठलाती है मचलती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है

लमहा-लमहा दूरी यूँ पिघलती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है
ख्वाहिशों की शाम ढ़लती है
जाने किस आग में ये शबनम जलती है

गीत सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें ।

रविवार, अप्रैल 30, 2006

क्षमा करना जीजी !

उत्तर भारत में शादी के बाद बडी बहन को जीजी कहते हैं । नरेन्द्र कोहली के इस उपन्यास की मुख्य पात्र जीजी ही हैं । पाँच भाईयों के साथ निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में पली बढ़ी जीजी को वो सभी कष्ट झेलने पड़े जो इस परिवेश में आगे बढ़ने का सपना देखने वाली नारी के लिए आम हैं । शादी के पहले तक जीजी ने निस्वार्थ भाव से अपने सारे भाईयों को जो स्नेह और मार्गदर्शन दिया क्या वे वक्त पड़ने पर उसका ‌अंशमात्र भी चुका पाये ?

उपन्यास का कथानक फ्लैशबैक से शुरू होता है जब जीजी अपना आखिरी वक्त बिताने अपने छोटे भाई विनीत के यहाँ आती हैं! और वहीं से शुरू होती है विनीत की आत्म विवेचना कि जीजी की इस हालत के लिये क्या सारे भाई दोषी नहीं थे ?

" वह अपने बौनेपन से परिचित था । दिखने को जो भी दिखे, किन्तु जानता था कि भीतर से वह कितना तुच्छ, कितना छोटा है । जीजी के बड़प्पन को भी वो जानता था...पर जीजी के स्वाभिमान का ये रूप उसके लिए अपरिचित ही था कि वे उसके द्वार पे आकर, अपना स्नेह उसे देंगी ।....

.....उसे लगा , कपड़े के नीचे मुँह ढ़ांके जीजी मुस्कुरा रही हैं,.....अब पाखण्ड मत करो ज्यादा । तुम्हारे द्वार पर जितना लेने आई हूँ उतना ही दे सको तो बहुत है ।...सारी उम्र तुम लोग एक दूसरे का मुँह ही ताकते रहे । अब ना किसी का मुँह ताको ना किसी की राह ! अपने भरोसे, अपनी इच्छा से,जो कर सकते हो वही करो। अब बहुत लम्बी चौड़ी आवश्यकताएँ नहीं है. मेरी।.....बस एक चिता.....।"

एक लघु उपन्यास जिसमें लेखक अपनी बात न केवल सहज भाषा एवम् रोचक ढ़ंग से रखने में पूर्ण रूप से सफल हुआ है बल्कि कुछ अनुत्तरित प्रश्न हमारे मानस पटल पर रखता भी गया है ।

  • किस तरह से शादी हो जाने के बाद हमारी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैँ?
  • नयी नवेली परिणिता का प्रेम पाने के लिये क्यूँ हम पुराने रिश्तों एवम् जिम्मेदारियों के साथ न्याय नहीं कर पाते?
ये ऐसे प्रश्न हैं जो आज भी भारतीय पारिवारिक परिवेश के लिये उतने ही प्रासंगिक हैं जितने आज से कई दशक पूर्व थे ।

गुरुवार, अप्रैल 06, 2006

आँख का आँसू : अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

आँसुओं की लीला भी बड़ी विचित्र है । ये कब, क्यों और कैसे निकल जाएँ इस बारे में पहले से कोई भविष्यवाणी करना अत्यन्त दुष्कर है । जब भी दिल की भावनायैं, चाहे वो अपार हर्ष की हों या गहरे विषाद की, जब्त करने में हम अपने आपको असहाय पाते हैं, अश्रु की बूँदें निकल ही पड़ती हैं । इस कविता में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ने आँसुओं की कहानी को उनको जन्म देने वाली भावनाओं के साथ प्रस्तुत किया है ।

आँसू उस शख्स के लिये निकलते हें जिससे हमें स्नेह हो । अपने करीबी के कष्ट से हमारी आखों का द्रवित होना उसके प्रति हमारा प्यार जतलाने का एक तरीका होता है । बकौल कतील शिफाई 
कोई आसूँ तेरे दामन पे गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ
 
और यहाँ कवि मन को छू लेने वाली पंक्तियों में कहते हैं

आँख के आँसू निकल करके कहो
चाहते हो प्यार जतलाना किसे ?

पर हर वक्त इन मोतियों को यूं ही बहाते रहना भी तो ठीक नहीं...कभी कभी आँसुओं को हमें दिल में सहेज के रखना पड़ता है...कभी अपने मान सम्मान के लिए तो...कभी उन गमों को दिल ही में दफन करने के लिये जिसकी काली छाया हम अपने करीबियों पर नहीं पड़ने देना चाहते ।

इसीलिये तो कविता के अंत में कवि आँसुओ को उलाहना देते हुए कहते हैं
हो गया कैसा निराला यह सितम
भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया
यों किसी का है नहीं खोते भरम आँसुओं, तुमने कहो यह क्या किया ?तो पेश है एक बेहद मर्मस्पर्शी रचना जिसके शब्द शायद आपको भी अश्रु विगलित कर दें
 
आँख का आँसू ढ़लकता देखकर
जी तड़प कर के हमारा रह गया
क्या गया मोती किसी का है बिखर
या हुआ पैदा रतन कोई नया ?

ओस की बूँदे कमल से है कहीं
या उगलती बूँद है दो मछलियाँ
या अनूठी गोलियाँ चांदी मढ़ी
खेलती हैं खंजनों की लडकियाँ ।

या जिगर पर जो फफोला था पड़ा
फूट कर के वह अचानक बह गया
हाय था अरमान, जो इतना बड़ा
आज वह कुछ बूँद बन कर रह गया ।

पूछते हो तो कहो मैं क्या कहूँ
यों किसी का है निराला पन भया
दर्द से मेरे कलेजे का लहू
देखता हूँ आज पानी बन गया ।

प्यास थी इस आँख को जिसकी बनी
वह नहीं इस को सका कोई पिला
प्यास जिससे हो गयी है सौगुनी
वाह क्या अच्छा इसे पानी मिला ।

ठीक कर लो जांच लो धोखा न हो
वह समझते हैं सफर करना इसे
आँख के आँसू निकल करके कहो
चाहते हो प्यार जतलाना किसे ?

आँख के आँसू समझ लो बात यह
आन पर अपनी रहो तुम मत अड़े
क्यों कोई देगा तुम्हें दिल में जगह
जब कि दिल में से निकल तुम यों पड़े ।

हो गया कैसा निराला यह सितम
भेद सारा खोल क्यों तुमने दिया
यों किसी का है नहीं खोते भरम
आँसुओं, तुमने कहो यह क्या किया ?

- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

रविवार, अप्रैल 02, 2006

नर हो ना निराश करो मन को ..


नाकामी, हताशा, मायूसी, क्रोध कुछ ‌‌ऐसी भावनायें हैं जो गाहे बगाहे अक्सर हमें दुखी करती रहती हैं । पर इनसे निकलने के लिये इधर उधर भटकने के बजॉय अगर अपने अन्तर्मन में झांकें तो वहीं से एक उम्मीद की किरण दिख सकती है । मैं तो हर बार ऐसे क्षणों मे अपने पास ही लौटा हूँ और मुझे यही महसूस हुआ है कि आत्म बल ही सबसे बड़ा बल है । यानि यूँ कहैं कि अपने आप को सबसे बड़ा सहारा आप अपनी अन्दरुनी शक्ति को जगा के ही दे सकते हैं । वैसे भी ऊपरवाला उन्हीं का साथ देता है जिन्हें खुद अपनी काबिलियत पर विश्वास हो ।
आखिर इकबाल ने यूँ ही तो नहीं कहा...
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे कि बता तेरी रजा क्या है

और इस कविता में गुप्त जी खुद कहते हैं
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो ना निराश करो मन को

बचपन में पिताजी उत्साह बढ़ाने के लिये इसी कविता की पंक्तियाँ सुनाया करते थे । और आज भी जब लगता है कि मैं बेकार ही अपना समय नष्ट कर रहा हूँ तो इस कविता की पंक्तियाँ गुनगुना कर खुद में एक नयी आशा का संचार करने कि कोशिश करता हूँ... आशा है ये कविता आप सब की भी प्रिय होगी...

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो ।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो ।
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

संभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना ।
अखिलेश्वर है अवलम्बन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो ।
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को ।।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।
सब जाय अभी पर मान रहे
मरणोत्तर गुंजित गान रहे ।
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो न निराश करो मन को ।।


प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को
।।

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को

करके विधि वाद न खेद करो
निज़ लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
।।
मैथिलीशरण गुप्त

गुरुवार, मार्च 30, 2006

छिप छिप अश्रु बहाने वालों ........

जिन्दगी में छोटी बड़ी मायूसी तो आती जाती रहती हैं । उन्हें कितने दिनों कोई अपने ऊपर हावी होने देता रहे । नीरज की ये कविता उन लोगों पर एक तीखा कटाक्ष है जो सपनों के टूटने और किसी के जुदा होने का मातम इस तरह मनाते हैं जैसे उसके आलावा उनकी जिन्दगी के कोई मायने ही ना हों ।
ये कविता हमें प्रेरित करती है गम के अंधेरों से बाहर निकलने की ...
और इस कठोर यथार्थ को समझने की, कि संगी साथी, सपने सब छूट जायें भी तो ये जीवन चलता रहता है,.बिना रुके बिना थमें...
तो क्यूँ ना हम बिखरे हुये तिनकों को जोड़ें और चल पड़ें जीवन रुपी पर्व का हर्षोल्लास से स्वागत करने!:)

रविवार, मार्च 26, 2006

आधुनिक हिन्दी कविता क्यूँ है भूली बिसरी ?

अगर हास्य कवियों की बात छोड दी जाए तो आधुनिक हिन्दी कविता के इस युग में इक आध ही ऐसे कवि हैं जिन्हें सुनने में असीम आनंद की अनुभूति होती हो । क्यूँ है ऐसी हालत इस युग की कविता की ? इस दुर्दशा का एक कारण तो ये भी रहा है कि आज के कवियों ने कविता के नये स्वरूप में सिर्फ विचारों को अहमियत दी और लय को तुकबंदी का नाम दे के उसकी सर्वथा उपेछा की ।

मेरा ये मानना है कि अगर भावना में कविता के प्राण बसते हैं तो उसकी लय में उसका शरीर। शब्दों को लय की वेणी से गुथा जाए तो उसके भाव संगीत की लहर पैदा कर आत्मा तक पहुँचते हैं । आत्मा कितनी पवित्र क्यूँ ना हो, शरीर के बिना उसका शिल्प अधूरा है।

इसलिये अगर आप से कोई ये कहे कि हिन्दी कविता सुनाओ तो यकीनन आप आज की पत्र पत्रिकाओं में छपने वाली नहीं बल्कि स्कूल में पढ़ी गयी कोई कविता ही सुनाएँगे । क्यूँकि उस वक्त की कविता दिल में बसती थी और आज की कागज के पन्नों पर ।

इसलिये आज भी अगर कबीर और रहीम के दोहों में आप सही दिशा खोज पाते हों .....आज भी अगर दिनकर और सुभद्रा कुमारी चौहान की कृतियाँ याद कर ही आपके खून में गर्मी आ जाती हो........ महादेवी वर्मा और जयशंकर प्रसाद की भाव प्रवणता देख के आज भी आपकी आखें नम हो जाती हों ....मैथलीशरण गुप्त कि यशोधरा और बच्चन की मधुशाला का प्रतिबिम्ब आज भी आपकी यादों में विद्यमान हो.... तो आगे की कड़ियों में आपकी भागीदारी चाहूँगा१

इस ब्लॉग की पहली वर्षगांठ जो अगले महिने आ रही है उसी पुरानी हिन्दी कविता को समर्पित रहेगी। शुरूआत करूँगा मैं गोपाल दास नीरज से जो आज के युग से ताल्लुक रखने के बावजूद उसी पुरानी काव्य शैली का निर्वहन करते आये हैं। कविता लिखने के साथ साथ उसे लयबद्ध तरीके से गाने में उनका कोई सानी नहीं है । इस मायने में उन्होंने बच्चन की विरासत को आगे बढ़ाया है.....
 

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