सोमवार, जुलाई 16, 2012

कावा वा नागारेते डोको डोको इकू नो- हाना.. दिल को छूता जापानी लोकगीत

जापान के इस दक्षिण पश्चिमी भाग आए हुए लगभग तीन हफ्ते हो चुके हैं। भोजन को छोड़ दें अब तक इस देश में रहना एक बेहद सुखद अनुभव रहा है। इतनी बातें हैं बताने को यहाँ के बारे में पर उन सबको सिलसिलेवार ढंग से रखने के लिए वक़्त नहीं है। अपनी इस व्यस्तता के बीच अगर आज आपसे मुख़ातिब हो पाया हूँ तो अपनी जापानी मैम के कारण। हम यहाँ आए तो उर्जा संरक्षण तकनीक के बारे में जानने के लिए हैं पर उसके साथ हमारी सहूलियत के लिए काम भर की जापानी भाषा भी सिखाई जा रही है। वैसे आप सहज कल्पना कर सकते हैं कि इस उम्र में वर्णमाला व १,२,३,४ पढ़ना कैसा लग सकता है। पर ये जो जापानी मैम है ना वो हमें सारी गिनती गिनवा के ही दम लेती हैं। इनकी क्लास देर रात को लगती है पर मजाल है जो हमें पहले छोड़ दें। सो वो हँस हँस कर बोलती हैं और हम तोते की तरह रटते हैं। पिछली क्लास में दाएँ बाएँ वाले दिशा ज्ञान को समझाने के लिए पूरी क्लॉस को ही ट्रेन बनाकर छुक छुक गाड़ी वाला खेल खिला दिया। पर उनकी बताई टूटी फूटी जापानी से ही हम यहाँ की सड़कों पर अपरिचितों के चेहरों पर मुस्कुराहट या कई बार तो हँसी के फव्वारे ले आते हैं।

हमारी मैम हमें हर कक्षा के बाद हमें एक जापानी गीत सुनाती है। ऐसा ही एक गीत था हाना जो पहली बार सुनकर ही हम सबको खूब पसंद आया। जापानी में हाना का मतलब होता है 'फूल'। हाना एक लोकगीत है जिसकी उत्पत्ति जापान के सुदूर दक्षिण के द्वीप समूह ओकीनावा (Okinava) में हुई । इसलिए इस गीत की धुन पश्चिमी रंग में रँगे आज के जापानी पॉप से सर्वथा अलग है और एक भारतीय मन को सहज ही अपनी ओर खींच लेती है। अपने मन को फूलों की तरह खिलाने की बात करता ये गीत रिमी नात्सुकावा (Rimi Natsukawa) की आवाज़ में बेहतरीन लगता है। रिमी के बारे में तो आप यहाँ जान सकते है्। इस गीत के बोलों का मैंने हिंदी में भावानुवाद करने की कोशिश की है। पर बिना अर्थ समझे भी रिमी की गायिकी दिल को छू जाती है। वो कहते हैं ना संगीत की कोई सरहदें नहीं होती।

तो आइए सुनते हैं ये गीत

Kawa wa nagarete doko doko iku no
Hito mo nagarete doko doko iku no
Sonna nagare ga tsuku koro niwa
Hana toshite hana toshite sakassete aguetai
Nakinasai Warainasai
Itsuno hi ka itsu no hi ka hana wo sakasoyo

सोचो तो ये नदी कहाँ जाती है ? या यूँ कहूँ कि हमारा नदी की तरह बहता जीवन ही आखिर हमें कहाँ ले जाता है ? जब तक वो नदी अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच जाती उसे फूलों की तरह खिलने दो। इस जीवन में हँसना भी है और रोना भी पर अपने हृदय को हमेशा फूलों की तरह खिलाकर रखो।
Namida nagarete doko doko iku no
Ai mo nagarete doko doko iku no
Sonna nagare wo kono uti ni
Hana toshite hana toshite Mukaette aguetai
Nakinasai Warainasai
Itsuno hi ka itsu no hi ka hana wo sakasoyo

ये आँसू बह कर कहाँ जाते हैं? प्यार का बहाव हमें कहाँ ले जाता है? मैं इस बहाव को अपने दिल में समा लेना चाहती हूँ। फूलों की तरह खिलकर उनका स्वागत करना चाहती हूँ। इस जीवन में हँसना भी है और रोना भी पर अपने हृदय को हमेशा फूलों की तरह खिलाकर रखो।

Hana wa hana toshite warai mono dekiru
Hito wa hito toshite namida mo nagassu
sorega shizen no utananossa
kokoro no naka ni kokoro no naka ni hana wo sakasoyo
Nakinasai Warainasai
itsu itsu mademo itsu itsu mademo
hana wo tsukamoyo
Nakinasai Warainasai
itsu itsu mademo itsu itsu mademo
hana wo tsukamoyo
Nakinasai Warainasai
Itsuno hi ka itsuno hi ka hana wo tsukamoyo


एक फूल, फूल की तरह हँस सकता है। एक आदमी, आदमी की तरह रो सकता है। सुख और दुख तो प्रकृति के दिए हुए जीवन के सत्य हैं। बस अगर हमारा मन पुष्पित रहे और जीवन की हर परिस्थिति में अपने अंदर के इस फूल को हम अपने से अलग ना होने दें इससे अच्छा और क्या हो सकता है।

तो अगली पोस्ट तक सारे मित्रों को देवामाता यानि see you later..

रविवार, जून 24, 2012

ज़िदगी के मेले में, ख़्वाहिशों के रेले में.. तुम से क्या कहें जानाँ ,इस क़दर झमेले में


पिछली पोस्ट में अमज़द इस्लाम अमज़द के बारे में बाते करते वक़्त आपसे वादा किया था कि उनसे जुड़ी कुछ और बातें होंगी उनकी एक नज़्म के साथ। पर कुछ हफ्तों में व्यस्तताएँ कुछ ऐसी बढ़ीं कि ये अंतराल कुछ ज्यादा ही लंबा हो गया। 


अमज़द इस्लाम अमज़द अपनी रूमानियत भरी शायरी के लिए ज़रा ज्यादा जाने जाते हैं। पर क्या आप ये जानना नहीं चाहेंगे कि अपनी इश्क़िया शायरी से लोगों का दिल जीतने वाले अमज़द साहब क्या ख़ुद कभी किसी की मोहब्बत में गिरफ़्तार हुए थे। उनसे जब ये प्रश्न किया गया तो उनका जवाब कुछ यूँ रहा..

मैं किसी एक लड़की से कभी गंभीरता से जुड़ नहीं पाया। मुझे लगता है कि प्यार जैसी भावना को हमने बेहद सिमटे जुमलों और दीवारों में क़ैद कर रखा है। ये अहसास उन सब से कहीं ज्यादा फैलाव लिए है। हमने प्यार को कविता को आहें, शिकवे, शिकायतें के इर्द गिर्द ही समेट रखा है। इसमें वास्तविकता का अंश कम है। मुझे लगता है कि किसी के लिए प्यार उस शख़्स के प्रति भावनात्मक लगाव से पैदा होता है। जैसे जैसे वक़्त बीतता जाता है दो व्यक्तित्व एक दूसरे के अहसासों को अपने से जोड़ कर देखने लगते हैं। प्यार समय के साथ और प्रगाढ़ होता जाता है। पर मेरे मन में उस वक़्त तक किसी के प्रति ऐसा लगाव नहीं पैदा हुआ जो मेरे जीवन की धारा को बदल पाता।

ताज़्जुब की बात है कि अमज़द साहब ने अपनी शायरी के इस दौर में ऐसी ग़ज़लें लिखी जिनमें प्रेम की सरिता बहती रही। मिसाल के तौर पर उनके कुछ अशआरों को देखें जो बेहद मशहूर हुए..

भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा
सब से छुप कर वो किसी का देखना अच्छा लगा

सुरमई आँखों के नीचे फूल से खिलने लगे
कहते कहते कुछ किसी का सोचना अच्छा लगा

और उनके चाँद से जुड़े इस शेर को तो आपने कभी ना कभी पढ़ा ही होगा

चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले

और जब आप उनकी ये ग़ज़ल पढ़ेंगे तो यक़ीनन आपका दिल मेरी तरह बाग बाग हो जाएगा। पूरी ग़ज़ल तो नहीं पर इस ग़ज़ल के चंद अशआर आप तक जरूर हुँचाना चाहूँगा जिन्हें सिर्फ पढ़कर दिल खुश खुश सा महसूस करने लगता है

ये अजीब खेल है इश्क़ का मैंने आप देखा ये मोज़जा
वो जो लफ्ज़ मेरे गुमाँ में थे वो तेरी जुबाँ पे आ गए

वो जो गीत तुमने सुना नहीं मेरी उम्र भर का रियाज़ था
मेरे दर्द की थी दास्तां जो तुम हँसी में उड़ा गए

वो था चाँद शाम ए विसाल का था रूप तेरे ज़माल का
मेरी रुह से मेरी आँख तक किसी रोशनी में नहा गए

तेरी बेरुखी के दयार में मैं हवा हे साथ 'हवा' हुआ
तेरे आइने की तलाश में मेरे ख़्वाब चेहरा गँवा गए

मेरी उम्र से ना सिमट सके मेरे दिल में इतने सवाल थे
तेरे पास जितने जवाब थे तेरी इक निगाह में आ गए

सच तो ये है कि अमज़द भी कीट्स की तरह इस बात में विश्वास रखते हैं कि

“Heard Melodies Are Sweet, but Those Unheard Are Sweeter”
यानि प्यार के बारे में हमारा मन जो अपने में ताना बाना बुनता है वो वास्तविक प्यार से कहीं ज़्यादा सुंदर और
मासूम होता है। अगर अमज़द साहब के व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो उन्होंने भी देर सबेर अपने बचपन के मित्र को अपना हमसफ़र बना दिया जो रिश्ते में उनकी चचेरी बहन थीं। 

अमज़द आज भी कविता को अपनी आत्मा से मिलने का ज़रिया मानते हैं। उनके हिसाब से कविता उनके अंदर एक ऐसे हिमखंड की तरह बसी हुई है जिसकी वो कुछ ऊपरी परतें खुरच पाएँ हैं। अमज़द साहब अपनी इस साधना में अंदर तक पहुँचने के तरीके के लिए माइकल ऐंजलो से जुड़ा एक संस्मरण सुनाते हैं। माइकल से पूछा गया कि पत्थर की बेडौल आकृतियों से वो शिल्प कैसे गढ़ लेते हैं? माइकल का जवाब था पत्थरों में आकृति तो छिपी हुई ही रहती है। मैंने तो सिर्फ उसके गैर जरूरी अंशों को हटा देता हूँ
अमज़द कविता की तहों तक ऐसे ही पहुँचते रहें यही हमारे जैसे पाठकों की शुभकामनाएँ हैं। चलते चलते उनसे जुड़े इस सिलसिले का समापन करते हैं उनकी एक नज़्म से..



ज़िदगी के मेले में, ख़्वाहिशों के रेले में
तुम से क्या कहें जानाँ ,इस क़दर झमेले में

वक़्त की रवानी1 है, बखत की गिरानी2  है
सख़्त बेज़मीनी है, सख़्त लामकानी3 है
हिज्र4 के समंदर में, तख्त और तख्ते की
एक ही कहानी है...तुम को जो सुनानी है

1. तेजी, प्रवाह,  2. भाग्य का अस्ताचल, 3. बिना मकान के, 4. विरह

बात गो ज़रा सी है, बात उम्र भर की है
उम्र भर की बातें कब, दो घड़ी में होती हैं
दर्द के समंदर में
अनगिनत ज़जीरें5  हैं, बेशुमार मोती हैं
आँख के दरीचे6  में तुमने जो सजाया था
बात उस दीये की है, बात उस गिले की है
जो लहू की ख़िलवत में, चोर बन के आता है
लफ़्ज के फसीलों पर टूट टूट जाता है 7

5. टापू  6. खिड़कियाँ 7. वो गिले शिकवे चुपचाप हमारे खून में समा तो गए हैं  पर जो होठों की चारदीवारी से निकल नहीं पाते और अंदर ही अंदर टूट के रह जाता हैं।

ज़िंदगी से लंबी है, बात रतजगे की है
रास्ते में कैसे हो, बात तख़लिये की है
तख़लिये की बातों में, गुफ़्तगू इज़ाफी है 8
प्यार करने वालों को, इक निगाह काफी है
हो सके तो सुन जाओ, एक दिन अकेले में
तुम से क्या कहें जानाँ, इस क़दर झमेले में

8.  एकांत में कही जाने वाली बात के लिए ज्यादा संवाद गैरजरूरी है


अगर सब कुछ ठीक रहा तो इस ब्लॉग की अगली पोस्ट आपके सामने होगी एक विदेशी ज़मीन से.. तब तक के लिए आप सब को सायोनारा...

रविवार, जून 10, 2012

ख़ुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन : अमज़द इस्लाम अमज़द

कुछ ग़ज़लें ऐसी होती हैं जिनकी सहजता आपको मुग्ध कर देती है। इन्हें समझने के लिए किसी बौद्धिक पराक्रम की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे ही एक ग़ज़ल अंतरज़ाल पर पढ़ी थी आज से छः सात साल पहले। पहली बार पढ़कर ही इसके कई अशआर एकदम से याद हो गए थे। मक़ते में बतौर शायर किसी अमज़द साहब का जिक्र था। पर ये अमज़द पाकिस्तान के मशहूर शायर और धारावाहिकों के पटकथालेखक अमज़द इस्लाम अमज़द हैं इस बात का खुलासा कई दिनों बाद हुआ। आज अचानक ही इस ग़ज़ल के चंद पसंदीदा शेर ज़ेहन में फिर उभरे तो सोचा कि क्यूँ ना इस पूरी ग़ज़ल औ‌र इसके शायर से आपका परिचय करवा दूँ।

अमज़द इस्लाम अमज़द का जन्म सन 1944 में लाहौर में हुआ था। पिता का छोटा सा कारोबार था। पर नन्हे अमज़द को किताबें पढ़ने का शौक़ अपने पड़ोसी बैदर बख़्त के ज़रिए हुआ। इस शौक़ का असर ये हुआ कि वो स्कूल की पत्रिका के संपादक बन गए। पर स्कूल से कॉलेज में जाते वक़्त अमज़द साहब के सर पर एक और जुनून सवार हो गया था। ये बुखार था क्रिकेट का। पर उनका ख़्वाब तब चकनाचूर हो गया जब विश्विद्यालय की क्रिकेट टीम में उनका नाम चयनित खिलाड़ियों की सूची में नहीं आया। इस बीच उनका बीए का रिजल्ट आया और उन्हें आगे उर्दू पढ़ने के लिए वज़ीफा भी मिलने लगा। ये अमज़द साहब के जीवन को  उर्दू साहित्य की तरफ़ मोड़ने के लिए महत्त्वपूर्ण वाक़या साबित हुआ। 1968 में MA करने के बाद उन्हें लाहौर के MAO कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी भी मिल गई।

अमज़द साहब ने इसी बीच रेडिओ के लिए भी काम करना शुरु किया। वे नाटक की पटकथाएँ लिखने लगे। उनकी पटकथाएँ उस समय टीवी रेडिओ पर काम करने वाले ज्यादातर निर्देशकों को पसंद नहीं आयीं। शुरु के पाँच सात सालों तक यही हाल रहा। फिर 1975 में उनका लिखा एक नाटक लाहौर में मंचित हुआ और उसे पुरस्कार भी मिला। नाटकों के पटकथा लेखक के रूप में उनकी पहचान यहीं से बननी शुरु हुई। 1979 में उनके लिखे धारावाहिक वारिस को जबरदस्त लोकप्रियता मिली और उनका नाम नाटक और धारावाहिकों के पटकथा लेखक के रूप में मशहूर हो गया। पिछले 23 सालों में अमज़द ने बारह धारावाहिक लिखे हैं जिन्हें साल दर साल पुरस्कारों से नवाज़ा जाता रहा है।

सातवां दर, ज़रा फिर से कहना और इतने ख़्वाब कहाँ रखूँगा उनके कुछ मुख्य प्रकाशित कविता संग्रहों में से है। वैसे देवनागरी में मैं उनके किसी संकलन से अब तक नहीं गुजरा हूँ। अमज़द इस्लाम अमज़द पटकथा लेखक से ज्यादा अपने आप को बतौर शायर ही याद किये जाने की तमन्ना रखते हैं। उनका कहना है कि कविता किसी की व्यक्तिगत रचनाशीलता का परिणाम है जबकि एक नाटक सामूहिक रचनाशीलता का। उनका मानना है कि कविता ही उनके व्यक्तित्व की भीतरी तहों तक पहुँचने का ज़रिया रही है। इसलिए शायरी उन्हें ज्यादा संतोष देती है।

कविता लेखन के बारे में उनकी सोच बेहद दिलचस्प है..
"मैं नहीं समझता कि कोई क्यूँ कविता लिखता है ये समझ पाना किसी के लिए मुमकिन है। मुझे ये भी नहीं पता कि ये आधे अधूरे वाक्यांश दिमाग में कैसे आते हैं ? क्यूँ हम शब्दों का इस तरह हेरफेर करते हैं कि वो ख़ुद बख़ुद मीटर में आ जाते हैं? पर इतना जानता हूँ कि जब लिखने का मूड मुझे पूरी तरह नियंत्रित कर लेता है और जब वो बातें मन से निकल कर क़ाग़ज के पन्नों पर तैरने लगती हैं तो मन एक अजीब से संतोष से भर उठता है। मन में जितनी ज्यादा उद्विग्नता होती है विचार उतनी ही तेजी से प्रस्फुटित होते हैं।
मैं मानता हूँ कि शायद हर समय कोई कारक इस प्रक्रिया में उत्प्रेरक का काम करता है। पर जो बाहर निकल कर आता है वो व्यक्ति के उस समय के व्यक्तित्व का रूप होता है। ये उद्गार उस समय मन में गृहित सारी बातों, उस विषय से जुड़े छोटे छोटे अनुभवों (जो तब तक हमारे ज़ेहन का हिस्सा बन चुके होते हैं) का सार होते हैं। मन मस्तिष्क में चलती ये सारी प्रक्रिया  जो इस काव्य कला को मूर्त रूप देती है हमारे भीतर छुपे कविता रूपी हिमखंड का सिर्फ एक छोटा सा टुकड़ा है। मुझे नहीं लगता कि रचना की इस आंतरिक प्रक्रिया को पूरी तरह समझा जा सकता है और इसीलिए मेरी कविताओं के सृजन का रहस्य पूर्णतः ढूँढने में मैं कामयाब नहीं रहा हूँ।"
अमज़द साहब के लेखन के कुछ और पहलुओं की बातें तो अगली पोस्ट में होंगी। आइए आज आनंद उठाएँ रूमानियत में भींगी हुई उनकी इस प्यारी सी ग़ज़ल का। कोशिश तो बहुत की इसे उनकी आवाज़ में ढूँढने की पर जब विफलता हाथ लगी तो अपनी आवाज़ में इसे रिकार्ड कर आप तक पहुँचा रहा हूँ।

 

ख़ुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन
यूँ है के तुझे भूल के देखेंगे किसी दिन

भटके हुए फिरते हैं कई लफ्ज़ जो दिल मैं
दुनिया ने दिया वक्त तो लिखेंगे किसी दिन

हिल जाएँगे इक बार तो अर्शों के दर ओ बाम1
ये ख़ाकनशीं2 लोग जो बोलेंगे किसी दिन

आपस की किसी बात का मिलता ही नहीं वक़्त
हर बार ये कहते हैं कि बैठेंगे किसी दिन


ऐ जान तेरी याद के बेनाम परिंदे
शाखों पे मेरे दर्द की उतरेंगे किसी दिन


जाती है किसी झील की गहराई कहाँ तक
आँखों में तेरी डूब कर देखेंगे किसी दिन


खुशबू से भरी शाम में जुगनू के कलम से
इक नज़्म तेरे वास्ते लिखेंगे किसी दिन

सोयेगे तेरी आँख की ख़लवत 3 मैं किसी रात
साये में तेरी ज़ुल्फ के जागेंगे किसी दिन

सहरा4 ए खराबी कि इसी गर्द ए सफ़ा से
फूलों से भरे रास्ते निकलेंगे किसी दिन

खुशबू की तरह मिस्ल5सबा6 ख़्वाबनुमा से
गलियों से तेरे शहर की गुजरेंगे किसी दिन

अमज़द है यही अब कि कफ़न बाँध के सर पर
उस सहर ए सितमगर में जाएँगे किसी दिन

1. घर के दरवाजे और छत, 2 . गरीब, 3. एकांत, 4.जंगल, 5.समान, 6.हवा


अगली कड़ी में जानेंगे शायर की ख़ुद की ज़िदगी में प्यार की अहमियत उनकी एक नज़्म के साथ..

सोमवार, मई 28, 2012

मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ : क्या था गीता दत्त की उदासी का सबब ?

कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की आख़िरी कड़ी में पेश है वो गीत जिसने उनके संगीत से मेरी पहली पहचान करवाई। अनुभव में यूँ तो गीता दत्त जी के तीनों नग्मे लाजवाब थे पर मुझे जाँ ना कहो मेरी जान.... की बात ही कुछ और है। रेडिओ से भी पहले मैंने ये गीत अपनी बड़ी दी से सुना था। गीता दत्त के दो नग्मे वो हमें हमेशा सुनाया करती थीं एक तो बाबूजी धीरे चलना... और दूसरा अनुभव फिल्म का ये गीत। तब गुलज़ार के बोलों को समझ सकने की उम्र नहीं थी पर कुछ तो था गीता जी की आवाज़ में जो मन को उदास कर जाता था।

आज जब इस गीत को सुनता हूँ तो विश्वास नहीं होता की गीता जी इस गीत को गाने के एक साल बाद ही चल बसी थीं। सच तो ये है कि जिस दर्द को वो अपनी आवाज़ में उड़ेल पायी थीं उसे सारा जीवन उन्होंने ख़ुद जिया था। इससे पहले कि मैं इस गीत की बात करूँ, उन परिस्थितियों का जिक्र करना जरूरी है जिनसे गुजरते हुए गीता दत्त ने इन गीतों को अपनी आवाज़ दी थी। महान कलाकार अक़्सर अपनी निजी ज़िंदगी में उतने संवेदनशील और सुलझे हुए नहीं होते जितने कि वो पर्दे की दुनिया में दिखते हैं।  गीता रॉय और गुरुदत्त भी ऐसे ही पेचीदे व्यक्तित्व के मालिक थे। एक जानी मानी गायिका से इस नए नवेले निर्देशक के प्रेम और फिर 1953 में विवाह की कथा तो आप सबको मालूम होगी। गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में जिस खूबसूरती से गीता दत्त की आवाज़ का इस्तेमाल किया उससे भी हम सभी वाकिफ़ हैं।


पर वो भी यही गुरुदत्त थे जिन्होंने शादी के बाद गीता पर अपनी बैनर की फिल्मों को छोड़ कर अन्य किसी फिल्म में गाने पर पाबंदी लगा दी। वो भी सिर्फ इस आरोप से बचने के लिए कि वो अपनी कमाई पर जीते हैं। हालात ये थे कि चोरी छुपे गीता अपने गीतों की रिकार्डिंग के लिए जाती और भागते दौड़ते शाम से पहले घर पर मौज़ूद होतीं ताकि गुरुदत्त को पता ना चल सके। गुरुदत्त को एकांतप्रियता पसंद थी। वो अपनी फिल्मों के निर्माण  में इतने डूब जाते कि उन्हें अपने परिवार को समय देने में भी दिक्कत होती। वहीं गीता को सबके साथ मिलने जुलने में ज्यादा आनंद आता। एक दूसरे से विपरीत स्वाभाव वाले कलाकारों का साथ रहना तब और मुश्किल हो गया जब गुरुदत्त की ज़िंदगी में वहीदा जी का आगमन हुआ। नतीजन पाँच सालों में ही उनका विवाह अंदर से बिखर गया। आगे के साल दोनों के लिए तकलीफ़देह रहे। काग़ज के फूल की असफलता ने जहाँ गुरुदत्त को अंदर से हिला दिया वहीं घरेलू तनाव से उत्पन्न मानसिक परेशानी का असर गीता दत्त की गायिकी पर पड़ने लगा। 1964 में गुरुदत्त ने आत्महत्या की तो गीता दत्त कुछ समय के लिए अपना मानसिक संतुलन खो बैठीं। जब सेहत सुधरी तो तीन बच्चों की परवरिश और कर्ज का पहाड़ उनके लिए गंभीर चुनौती बन गया। शराब में अपनी परेशानियों का हल ढूँढती गीता की गायिकी का सफ़र लड़खड़ाता सा साठ के दशक को पार कर गया।

इन्ही हालातों में कनु राय, गीता जी के पास फिल्म अनुभव के गीतों को गाने का प्रस्ताव ले के आए। बहुत से संगीतप्रेमियों को ये गलतफ़हमी है कि कनु दा गीता दत्त के भाई थे। (गीता जी के भाई का नाम मुकुल रॉय था)  दरअसल कनु दा और गीता जी में कोई रिश्तेदारी नहीं थी पर कनु उनकी शोख आवाज़ के मुरीद जरूर थे क्यूँकि अपने छोटे से फिल्मी कैरियर में उन्होंने लता जी की जगह गीता जी के साथ काम करना ज्यादा पसंद किया। गीता जी के जाने के बाद भी लता जी की जगह उन्होंने आशा जी से गाने गवाए। कनु दा के इस गीत में भी उनके अन्य गीतों की तरह न्यूनतम संगीत संयोजन है। जाइलोफोन (Xylophone) की तरंगों के साथ गुलज़ार के अर्थपूर्ण शब्दों को आत्मसात करती गीता जी की आवाज़ श्रोताओं को गीत के मूड से बाँध सा देती हैं।

 

गुलज़ार शब्दों के खिलाड़ी है। कोई भी पहली बार इस गीत के मुखड़े को सुन कर बोलेगा ये जाँ जाँ क्या लगा रखी है। पर ये तो गुलज़ार साहब हैं ना ! वो बिना आपके दिमाग पर बोझ डाले सीधे सीधे थोड़ी ही कुछ कह देंगे। कितनी खूबसूरती से जाँ (प्रियतम)और जाँ यानि (जान,जीवन) को एक साथ मुखड़े में पिरोया हैं उन्होंने। यानि गुलज़ार साहब यहाँ कहना ये चाह रहे हैं कि ऐसे संबोधन से क्या फ़ायदा जो शाश्वत नहीं है। जो लोग ऐसा कहते हैं वो तो अनजान हैं ..इस सत्य से। वैसे भी कौन स्वेच्छा से  इस शरीर को छोड़ कर जाना चाहता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को


मेरी जाँ, मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ
मेरी जाँ, मेरी जाँ

जाँ न कहो अनजान मुझे
जान कहाँ रहती है सदा
अनजाने, क्या जाने
जान के जाए कौन भला
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ ...

अगले अंतरों में गुलज़ार एकाकी दिल की व्यथा और उसके प्रेम की पाराकाष्ठा को व्यक्त करते नज़र आते हैं। साथ ही अंत में सुनाई देती है गीता जी की खनकती हँसी जो उनके वास्तविक जीवन से कितनी विलग थी।

सूखे सावन बरस गए
कितनी बार इन आँखों से
दो बूँदें ना बरसे
इन भीगी पलकों से
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ   ...

होंठ झुके जब होंठों पर
साँस उलझी हो साँसों में
दो जुड़वाँ होंठों की
बात कहो आँखों से
मेरी जाँ
मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ   ...


गीता दत्त और कनु रॉय ने जो प्रशंसा अनुभव के गीतों से बटोरी उसका ज्यादा फ़ायदा वे दोनों ही नहीं उठा सके। अनुभव के बाद भी गीता जी ने फिल्म रात की उलझन ,ज्वाला व मिडनाइट जैसी फिल्मों में कुछ एकल व युगल गीत गाए पर 1972 में गीता जी के लीवर ने जवाब दे दिया और उनकी आवाज़ हमेशा हमेशा के लिए फिल्मी पर्दे से खो गई।

वहीं कनु रॉय भी बासु दा की छत्रछाया से आगे ना बढ़ सके। दुबली पतली काठी और साँवली छवि वाला ये संगीतकार जीवन भर अंतरमुखी रहा। उनके साथ काम करने वाले भी उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में कम ही जानते थे। इतना जरूर है कि वे अविवाहित ही रहे। आभाव की ज़िंदगी ने उनका कभी साथ ना छोड़ा। उसकी कहानी (1966) से अनुभव, आविष्कार, गृहप्रवेश, श्यामला से चलता उनका फिल्मी सफ़र  स्पर्श (1984) के संगीत से खत्म हुआ। पर जो मेलोडी उन्होंने मन्ना डे और गीता दत्त की आवाज़ों के सहारे रची उसे शायद ही संगीतप्रेमी कभी भूल पाएँ। 

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

गुरुवार, मई 17, 2012

मेरा दिल जो मेरा होता...क्या था कनु दा का गीत के मीटर को बताने का अंदाज़ ?

कनु रॉय से जुड़ी इस श्रृंखला में पिछली पोस्ट में हम बातें कर रहे थे उनके व्यक्तित्व के कुछ अछूते पहलुओं के बारे में गुलज़ार की यादों के माध्यम से। पिछले दो गीतों में आपने सुना कनु दा, कपिल और मन्ना डे की तिकड़ी को। पर आज  इस तिकड़ी से मन्ना डे और कपिल कुमार रुखसत हो रहे हैं और उनकी जगह आ रहे हैं गुलज़ार और गीता दत्त।

कनु दा ने गीता दत्त से चार गीत गवाए। ये गीत खासे लोकप्रिय भी हुए।  इनमें से दो को लिखा था गुलज़ार ने। उनमें से एक गीत था मेरा दिल जो मेरा होता। सच ही तो है ये दिल धड़कता तो इस शरीर के अंदर है पर इसकी चाल को काबू में रखना कब किसी के लिए संभव हो पाया है। गुलज़ार ने इसी बात को अपने गीत में ढालने की कोशिश की है।



पहले अंतरे में गुलज़ार अपनी काव्यात्मकता से मन को प्रसन्न कर देते हैं। जरा गौर कीजिए इन पंक्तियों को सूरज को मसल कर मैं, चन्दन की तरह मलती...सोने का बदन ले कर कुन्दन की तरह जलती। इन्हें सुनकर तो स्वर्णिम आभा लिया हुआ सूरज भी शर्म से लाल हो जाए। गुलज़ार तो जब तब हमें अपनी कोरी कल्पनाओं से अचंभित करते रहते हैं। पर कनु दा के संगीत निर्देशन में काम करते हुए एक बार गुलज़ार भी अचरज में पड़ गए। इसी सिलसिले में कनु दा के बारे में अपने एक संस्मरण में वो कहते हैं..
"गीत का मीटर बताने के लिए अक्सर संगीतकार कच्चे गीतों या डम्मी लिरिक्स का प्रयोग करते रहे हैं। और वो बड़ी मज़ेदार पंक्तियाँ हुआ करती थीं जिनमें से कई को तो मैंने अब तक सहेज कर रखा हुआ है। जैसे कुछ संगीतकार मेरी जान मेरी जान या कुछ जानेमन जानेमन की तरन्नुम में गीत का मीटर बतलाते थे। कुछ डा डा डा डा ...तो कुछ ला ला ला ला... या रा रा रा रा....। पर कनु का मीटर को बताने का तरीका सबसे अलग था। वो अपनी हर संगीत रचना का मीटर ती टा ती ती, ती टा ती ती.. कह के समझाते थे। उनका ये तरीका थोड़ा अज़ीब पर मज़ेदार लगता था।  अपने इस ती टा ती ती को उन्होंने अंत तक नहीं छोड़ा।"
कनु दा ने अपने अन्य गीतों की तरह फिल्म अनुभव के इस गीत में भी कम से कम वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया है। संगीत सुनने का आनंद तब दूना हो जाता है गीता जी की आवाज़ के साथ प्रथम अंतरे की हर पंक्ति के बाद सितार की धुन लहराती सी  गीत के साथ साथ चलती है। तो आइए सुनें इस गीत को..

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मेरा दिल जो मेरा होता
पलकों पे पकड़ लेती
होंठों पे उठा लेती
हाथों मे. खुदा होता
मेरा दिल   ...

सूरज को मसल कर मैं
चन्दन की तरह मलती
सोने का बदन ले कर
कुन्दन की तरह जलती
इस गोरे से चेहरे पर
आइना फ़िदा होता
मेरा दिल   ...

बरसा है कहीं पर तो
आकाश समन्दर में
इक बूँद है चंदा की
उतरी न समन्दर में
दो हाथों की ओट मिली
गिर पड़ता तो क्या होता
हाथों में खुदा होता
मेरा दिल   ...

बासु भट्टाचार्य के गीतों को फिल्माने का एक अलग अंदाज था। गीतों के दौरान वो फ्लैशबैक को ऐसे दिखाते थे मानो स्क्रीन पर लहरें उठ रही हों और उन्हीं में से पुरानी यादें अनायास ही प्रकट हो जाती हों।  ये गीत  अभिनेत्री तनुजा पर फिल्माया गया था।



अगली प्रविष्टि में बात करेंगे कनु दा, गुलज़ार और गीता दत्त के सबसे ज्यादा सराहे जाने वाले नग्मे के बारे में..
 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

गुरुवार, मई 10, 2012

हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है :कौन थे कनु रॉय ?

पिछली पोस्ट में आपसे बात हो रही थी मन्ना डे, कपिल कुमार और कनु रॉय की तिकड़ी की। इस त्रिमूर्ति का एक और गीत मुझे बेहद पसंद है।पर इससे पहले 1974 में आई फिल्म आविष्कार के इस संवेदनशील नग्मे की बात करूँ कुछ बातें इसके संगीतकार कनु रॉय के बारे में। 


कनु राय ने अपने संगीत का सफ़र बंगाली फिल्मों से शुरु किया था। पचास के दशक में वे गायक बनने का सपना लेकर हावड़ा से मुंबई पहुँचे। गायिकी का काम नहीं मिला पर सलिल दा से परिचित होने की वज़ह से उन्हें उनके सहायक का काम जरूर मिल गया। सलिल दा ही के यहाँ उनकी मुलाकात बासु भट्टाचार्य से हुई। हिंदी फिल्मों में बतौर संगीतकार उन्हें बासु भट्टाचार्य ने मौका दिया और फिर वे बासु दा की सारी फिल्मों के
ही संगीत निर्देशक बन गए। उसकी कहानी, अनुभव, आविष्कार, श्यामला और स्पर्श में उनका काम सराहा गया। 

कनु राय एक अंतरमुखी इंसान थे। काम माँगने के लिए निर्देशकों के पास जाने में उन्हें झिझक महसूस होती थी। शायद इसके लिए उनकी पिछली पृष्ठभूमि जिम्मेदार रही हो। क्या आपको पता है कि कनु रॉय फिल्मों में काम करने से पहले एक वेल्डर का काम किया करते थे? कहते हैं कि युवावस्था में कनु ने हावड़ा ब्रिज की मरम्मत का काम भी लिया था।

फिल्मफेयर को दिये अपने एक साक्षात्कार में गुलज़ार अविष्कार का जिक्र करते हुए कहते हैं कि बासु दा वैसे तो बेहद भले आदमी थे पर फिल्मों को बनाते समय खर्च कम से कम करते थे। वो अक्सर ऐसे कलाकारों के साथ काम करते जिनसे कम पैसों या मुफ्त में भी काम लिया जा सके। गुलज़ार को उन्होंने आविष्कार की पटकथा लिखने के लिए दो सौ रुपये देते हुए कहा था कि मैं इतना तुम्हें इसलिए दे रहा हूँ कि तुम बाद में ये ना कह सको कि बासु ने तुमसे इस फिल्म के लिए मुफ्त में काम करवाया। आप सोच सकते हैं कि जब गुलज़ार का ये हाल था तो कनु दा की क्या हालत होती होगी। 

गुलज़ार ऐसे ही एक प्रसंग के बारे में कहते हैं
"कनु के पास कभी भी छः से आठ वादकों से ज्यादा रिकार्डिंग के लिए उपलब्ध नहीं रहते थे। और बेचारा कनु उसके लिए कुछ कर भी नहीं पाता था। मुझे याद है कि कितनी दफ़े कनु , बासु दा से एक या दो अतिरिक्त वॉयलिन के लिए प्रार्थना करता रहता। बासु दा और कनु मित्र थे। सो जब भी कनु का ऐसा कोई अनुरोध आता बासु दा उसे वो वाद्य अपने पैसों से खरीदने की सलाह दिया करते थे। अब उसके पास कहाँ पैसे होते थे। बासु की बहुत हुज्जत करने के बाद वे उसे वॉयलिन और सरोद देने को राजी होते थे।"
ताज्जुब होता है कि इतनी कठिनाइयों के बीच भी कनु दा ने इन चुनिंदा फिल्मों में इतनी सुरीली धुनें बनायीं और वो भी लगभग न्यूनतम संगीत संयोजन से।। आज तकनीक कहाँ से कहाँ पहुँच गई। संगीत पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है फिर भी मधुर धुनों को सुनने के लिए कितना इंतज़ार करना पड़ता है।

फिल्म आविष्कार में एक बार फिर कपिल कुमार का लिखा ये गीत देखिए। मुखड़े के पहले बाँसुरी की जो धुन बजती है वो वाकई लाजवाब है। इंटरल्यूड्स में बाँसुरी के साथ कनु दा का प्रिय वाद्य यंत्र सितार भी आ जाता है। खुली छत पर एकाकी रातों में दुख से बोझल साँसों के बीच आसमान में टिमटिमाते तारों के लिए कपिल जी का ये कहना कि किसी की आह पर तारों को प्यार आया है.....मन को निःशब्द कर देता है। मन्ना डे की दर्द में डूबती सी आवाज़ और उसका कंपन इतना असरदार है कि गीत को सुनकर आप भी अनमने से हो जाते हैं। तो आइए सुनते हैं ये नग्मा....

  

हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है
कोई हमदर्द नहीं, दर्द मेरा साया है
हँसने की चाह ने इतना मुझे रु..ला..या है

दिल तो उलझा ही रहा ज़िन्दगी की बा..तों में
साँसें  चलती हैं कभी कभी रातों में 

किसी की आह पर तारों को प्यार आया है
कोई हमदर्द नहीं ...

सपने छलते ही रहे रोज़ नई रा..हों से
कोई फिसला है अभी अभी बाहों से
 
किसकी ये आहटें ये कौन मुस्कुराया है
कोई हमदर्द नहीं ...

राजेश खन्ना वा शर्मिला टैगौर द्वारा अभिनीत फिल्म आविष्कार में ये गीत शुरुआत में ही आता है.. 


 कनु दा से जुड़ी अगली कड़ी में बातें होगी गीता दत्त के गाए और उनके द्वारा संगीतबद्ध कुछ बेहतरीन गीतों की...

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

सोमवार, मई 07, 2012

फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको : क्या आप निराशावादी हैं?

आप आशावादी (optimist) हैं या निराशावादी (pessimist) ये तो मुझे नहीं पता पर बचपन में ये प्रश्न मुझे बड़ा परेशान करता था। अक्सर बड़े लोगों के साक्षात्कार पढ़ता तो ये जुमला बारहा दिख ही जाता था कि I am an eternal optimist। अपने दिल को टटोलता तो कभी भी इन पंक्तियो को वो पूरी तरह स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होता।  होता भी कैसे? बचपन से ही उसे अपनी आशाओं को वास्तविकता के तराजू में तौलने की आदत जो हो गई थी। परीक्षा के बाद दोस्त लोग नंबर पूछते तो मैं मन में अंक देने में कंजूस आध्यापक की छवि बनाता और उस हिसाब से गणना कर अपने दोस्तों को अपना अनुमान बता देता। ज़ाहिर है उनके अनुमान मेरे से हमेशा ज्यादा होते पर जब परिणाम आते तो नतीजा उल्टा होता। इंटर में रहा हूँगा जब पहली बार मुझे देखकर एक कन्या ने बड़े प्यार से हाथ हिलाया। प्रचलित जुबान में कहूँ तो wave.. किया। पर जनाब उस का प्रत्युत्तर देने के बजाए मैंने ये देखा कि मेरी नीचे और ऊपर की मंजिल की बॉलकोनी पर कोई लड़का खड़ा तो नहीं है। ऐसे में आप ही बताइए मैं अपने आप को आशावादी कैसे कह सकता हूँ? पर मन ये मानने को तैयार नहीं था कि मैंने नैराश्य की चादर अपने ऊपर ओढ़ रखी है। दिन बीतते गए पर मुझे अपने व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए उपयुक्त जवाब नहीं मिला और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान कब ये प्रश्न मुझसे दूर हो गया मुझे पता ही नहीं चला।

और फिर एक दिन अखबार में छपी किसी के ये उक्ति नज़रों से गुजरी 

"Success or failure..I will  always be pleasantly surprised rather than bitterly disappointed."

और  मुझे लगा कि अपने बारे में ये ख्याल मुझे पहले क्यूँ नहीं आया। संयोग देखिए उस दिन के मात्र एक हफ्ते बाद ही बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक कैंपस इंटरव्यू में ये सवाल मुझपे दागा गया Are you an optimist or pessimist ? मैंने भी छूटते ही ऊपर वाली पंक्ति दोहरा दी। अब मुझे क्या पता था कि मैनेजमेंट फिलॉसफी के तहत मेरा जवाब ठीक नहीं बैठेगा। मेरे जवाब के बाद कुछ देर शांति छाई रही फिर उन्होंने मुझे रफा दफ़ा कर दिया। पर इतने दशकों बाद भी मैं अपने फलसफ़े पर कायम हूँ। ख़्वाबों की दुनिया में उड़ने से मुझे कभी परहेज़ नहीं रहा पर पैर धरातल से उखड़े नहीं ये बात भी दिमाग में रही बहुत कुछ मेरी इस कविता की तरह।

वैसे इन सब बातों को आपसे साझा मैं क्यूँ कर रहा हूँ? उसकी वज़ह है आज का वो गीत जो मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ। इस गीत का मर्म भी वही है। जीवन में घट रही तमाम धनात्मक घटनाओं को उतना ही आँकें जिनके लायक वो हैं। नहीं तो अपने सपनों के टूटने की ठेस को शायद आप बर्दाश्त ना कर पाएँ।

ये गीत है फिल्म अनुभव का  जिसे लिखा था कपिल कुमार ने और धुन बनाई थी कनु रॉय ने। कपिल कुमार फिल्म उद्योग में एक अनजाना सा नाम हैं। कनु रॉय के साथ उन्होंने दो फिल्मों में काम किया है अनुभव और आविष्कार। पर इन कुछ गीतों में ही वो अपनी छाप छोड़ गए। यही हाल संगीतकार कनु रॉय का भी रहा। गिनी चुनी दस से भी कम फिल्मों में काम किया और जो किया भी वो सारे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बैनर तले। बाहर उनको काम ही नहीं मिल पाया। पर इन थोड़ी बहुत फिल्मों से भी अपनी जो पहचान उन्होंने बनाई वो आज भी संगीतप्रेमियों के दिल में क़ायम है।

अब इसी गीत को लें गीत के मुखड़े में मन्ना डे का स्वर उभरता है फिर कहीं और पीछे से कनु  की संयोजित वाइलिन और सितार की धुन आपके कानों में पड़ती है। इंटरल्यूड्स में भी यही सितार आपके मन को झंकृत करता है। कनु के संगीत की खासियत ही यही थी कि वे बेहद कम वाद्य यंत्रों में भी सुरीले गीतों को जन्म देते थे। पर  सबसे अद्भुत है मन्ना डे की गायिकी । बेहद  अनूठे अंदाज़ में उन्होंने गीतकार की भावनाओं को अपनी गायिकी से उभारा है।  मन्ना डे साहब हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में बदलती लय में लहरों का लगा जो मेला..... या दिल उनसे बहल जाए तो.... गाते हैं तो बस मन एकाकार सा हो जाता है उन शब्दों के साथ। 

पिछले हफ्ते अपना 93 वाँ जन्मदिन मनाने वाला ये अनमोल गायक आज भी हमारे बीच है, यह हमारी खुशनसीबी है। मन्ना डे ने शास्त्रीय से लेकर हल्के फुल्के गीतों को जितने बेहतरीन तरीके से निभाया है वो ये साबित करता है उनके जैसा संपूर्ण पार्श्वगायक बिड़ले ही मिलता है।

फिर कहीं...
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको
फिर कहीं ...

मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ
लहरों का लगा जो मेला.., तू..फ़ां ना कहो उसको
फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...

देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने...
दिल उनसे बहल जाए तो, राहत ना कहो उसको
फिर कहीं ...


फिल्म अनुभव में इस गीत को फिल्माया गया है मेरे चहेते अभिनेता संजीव कुमार और तनुजा पर..


पर  कनु रॉय और उनके संगीत का ये सफ़र अभी थमा नहीं है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे इस तिकड़ी के एक और बेमिसाल गीत की..

 कनु दा से जुड़ी इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ 

सोमवार, अप्रैल 30, 2012

मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा : हवा. मैं और सुरेश चोपड़ा

गर्मियों के ये दिन बड़े सुहाने चल रहे हैं। वैसे आप जरूर पूछेंगे ये तपती झुलसाती गर्मी मेरे लिए सुहानी कैसे हो गई?  आपका पूछना लाज़िमी है। दरअसल पिछले कुछ दिनों से जब जब हमारे शहर का तापमान बढ़ रहा है तब तब तेज़ ठंडी हवाएँ बारिश की फुहार के साथ तन और मन दोनों को शीतल किए दे रही हैं। बारिश से मेरा वैसा लगाव कभी नहीं रहा जैसा अमूमन हर कवि हृदय का होता है। पर जब भी बादलों की हलचल के साथ ठंडी हवा की मस्त बयार शरीर से टकराती है दिल हिलोरें लेने लगता है। ऐसे में मैं हमेशा छत की ओर दौड़ता हूँ इन हवाओं की प्रचंडता को और करीब से महसूस करने के लिए। पता नहीं हवा के इस सुखद स्पर्श में क्या शक्ति है कि मन चाहे कितना भी अवसादग्रस्त क्यूँ ना हो, ऐसी मुलाकातों के बाद तरोताज़ा हो जाया करता है। इन खुशनुमा लमहों में लता जी का गाया फिल्म शागिर्द का ये गीत होठों पर रहता है

उड़ के पवन के रंग चलूँगी
मैं भी तिहारे संग चलूँगी
बस मन को दिक्कत ये आती है कि आगे रुक जा ऐ हवा, थम जा ऐ बहार कहने का दिल नहीं करता..



बचपन की ये आदत कई दशकों के बाद आज भी छूटी नहीं है। वैसे इस आदत के पड़ने का कुछ जिम्मा हमारे देश की विद्युत आपूर्ति करने वाली संस्थाओं को भी जाना चाहिए। जैसा कि भारत में आम है कि जब भी आँधी आती है बिजली या तो चली जाती है या एहतियातन काट दी जाती है। फिर या तो छत या घर की बॉलकोनी, यही जगहें तो बचती है बच्चों को बोरियत से बचने के लिए। उम्र बढ़ती गई और उसकी इक दहलीज़ में आकर आँधी आते ही बिजली का जाना बड़ा भला लगने लगा।  हवा के पड़ते थपेड़ों से उड़ते बालों व धूल फाँकती मिचमिचाती आँखों  के बीच एकांत में घंटों बीत जाते और मुझे उसका पता भी ना चलता। बिजली आती तो बड़े अनमने मन से अपनी वास्तविक दुनिया में वापस लौटते।

पर तेज़ हवाओं से मेरा ये प्रेम अकेले का थोड़े ही है। आपमें से भी कई लोगों को बहती पवन वैसे ही आनंदित करती होगी जैसा मुझे। इस मनचली हवा के प्रेमियों की बात आती है तो मन लगभग दो दशक पूर्व की स्मृतियों में खो जाता है।  बात 1994 की है तब हमारे यहाँ दिल्ली से प्रकाशित टाइम्स आफ इंडिया आया करता था। उसके संपादकीय पृष्ठ पर लेख छपा था सुरेश चोपड़ा (Suresh Chopda) का। शीर्षक था  The Wind and I। उस लेख में लिखी चोपड़ा साहब की आरंभिक पंक्तियाँ मुझे इतनी प्यारी और दिल को छूती लगी थीं कि मैंने उसे अपनी डॉयरी के पन्नों में हू बहू उतार लिया था। चोपड़ा साहब ने लिखा था

"There is something so alive and moving in a strong wind, that one of my concept of perfect bliss is to find myself standing alone on a high cliff by the sea with a strong wind hurtling past me with full ferocity. Nothing depresses me more than a windless day, with everything still and the leaves of the trees hanging still and lifeless. Yes give me the wind any day the stronger, wilder and more ferocious the better."

पर जब आज आपसे जब सुरेश चोपड़ा के लेख का जिक्र किया है तो उसके साथ हवा से जुड़े उनके दो मज़ेदार संस्मरणों को भी बताता चलूँ जिन्हें मैं आज तक भुला नहीं पाया हूँ।

सुरेश चोपड़ा तब आकाशवाणी के संवाददाता थे। एक बार उन्हें पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश के मुख्यालय पेशावर में  काम के सिलसिले में कुछ महिनों के लिए भेजा गया। पेशावर के सदर इलाके में चोपड़ा साहब अपनी मारुति चला रहे थे कि उनकी नज़र सामने तांगे पर जाती एक युवती पर पड़ी। जैसा कि वहाँ का रिवाज़ है उस युवती ने अपनी आँखों को छोड़ अपना पूरा चेहरा काली मोटी चद्दर से ढका हुआ था। वो लगातार उनकी ओर अपलक देख रही थी। ये समझने का प्रयास करती हुई कि आख़िर पाकिस्तान के इस सुदूर इलाके में एक भारतीय कार् क्या कर रही है? चोपड़ा साहब मन ही मन सोच रहे थे कि काश मैं इस कन्या का चेहरा देख पाता कि इतने में पवन का एक तेज़ झोंका आया। झोंके की तीव्रता इतनी थी कि युवती के चेहरे से चादर अचानक ही हट गई। उसने तुरंत चादर वापस अपनी जगह पर कर ली पर हवा की दया से चोपड़ा साहब के मन की तमन्ना पूरी हो गई और उस चेहरे को वो कभी भूल नहीं पाए।

हवा से जुड़ा एक और दिलचस्प वाक्या सत्तर के दशक में हुआ जब चोपड़ा साहब को भारत चीन सीमा पर स्थित नाथू ला पर भेजा गया। नाथू ला पर भारत और चीन की सेनाओं की टुकड़ी आमने सामने गश्त लगाती है। दोनों सीमाओं के बीच बीस गज का फ़ासला हुआ करता था जो कि No man's land कहलाता था। एक दिन वे फौज से उधार माँगे बाइनोक्यूलर से चीनी टुकड़ीकी गतिविधियों का जायज़ा ले रहे थे। तभी उनकी नज़र एक चीनी सैनिक पर पड़ी जो एक दीवार के सहारे खड़ा होकर हाथ में लिये काग़ज़ को पढ़ रहा था। अचानक ही वहाँ हल्की सी आँधी आ गयी। वो काग़ज़ चीनी सैनिक के हाथ से निकलकर हवा में उड़ने लगा। बहुत देर तक हवा के विपरीत बहाव के बीच काग़ज़ का वो टुकड़ा नो मैन्स लेंड के ऊपर मँडराता रहा। कुछ देर के बाद वो टुकड़ा अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता हुआ भारतीय हिस्से में आकर गिर गया। वो बड़ा नाटकीय क्षण था। किसी भी हालत में उस पत्र को वापस लौटाया नहीं जा सकता था क्यूँकि जवानों के बीच बातचीत की उस वक़्त सख्त मनाही थी। सेना ने उस टुकड़े को ज़ब्त कर लिया और संदेश का अनुवाद करने के लिए उसे दिल्ली भेज दिया गया।

उस घटना के कई साल बाद  जब चोपड़ा जी को सेना क मुख्यालय में जाने का मौका मिला तो उन्हें उस कागज के टुकड़े की याद आई। उन्हें पता लगा कि वो कोई गुप्त संदेश ना होकर एक प्रेम पत्र था जिसका पता चलने के बाद औपचारिक क्षमा के साथ चीनी टुकड़ी को वापस लौटा दिया गया था।
अब हवा क्या जानें सरहद की दीवारों को। वो तो बेखौफ़ उस दिशा में चलती है जिधर उसकी मर्जी हो।चीन से जुड़ी इस घटना को याद करते हुए मुझे अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन की गाई वो ग़ज़ल याद आ रही है जिसमें वो फर्माते हैं

मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा
दश्त मेरा ना ये चमन मेरा

आप भी सुनिए..


तो ये थे हवा के कुछ शरारती कारनामे। क्या आपकी ज़िंदगी में भी इस नटखट हवा से जुड़ी कुछ यादें हैं ..तो बताइए ना हम सुनने को तैयार बैठे हैं..

बुधवार, अप्रैल 18, 2012

पीली छतरी वाली लड़की : हिंदी, ब्राह्मणवाद और उदयप्रकाश ...

पीली छतरी वाली लड़की शीर्षक देखने से तो यही लगता है कि ये एक प्रेम कथा होगी। पर अगर मैं इस दृष्टि से इस लंबी कहानी (लेखक उदयप्रकाश इसे लघु उपन्यास के बजाए इसी नाम से पुकारे जाने के पक्षधर हैं।) का मूल्यांकन करूँ तो इस पुस्तक के नायक राहुल व नायिका अंजली जोशी के प्यार की दास्तां किसी कॉलेज की प्रेम कहानियों सरीखी लगेगी। मैं तो इसे पढ़ने के बाद पुस्तक को इस श्रेणी में डालना भी नहीं चाहता। इसे पढ़ने के बाद जो बातें मन पर गहरे असर करती हैं वो राहुल अंजली का प्रेम हरगिज़ नहीं है। दरअसल लेखक ने इस कहानी में प्रेम का ताना बाना इसीलिए बुना है कि इसके ज़रिए वो उन मुद्दों को उठा सकें जिन्होंने उनके अब तक के लेखकीय जीवन को अंदर तक झिंझोड़ा है। पुस्तक में नायक के माध्यम से कहे गए ये विचार, पीछे चलती प्रेम कथा से ज्यादा दिलचस्प और असरदार लगते हैं।


इससे पहले कि मैं लेखक उदयप्रकाश द्वारा उठाए गए इन विचारणीय मुद्दों की बात करूँ, कथा नायक व नायिका से आपका संक्षिप्त परिचय कराना आवश्यक है। मध्यमवर्गीय परिवार से अपने घर से दूर कॉलेज में आया राहुल एनथ्रोपोलॉजी  में एम ए के लिए दाखिला लेता है पर पीली छतरी वाली लड़की अंजली जोशी को देखकर इस तरह मुग्ध हो जाता है कि दोस्तों की सलाह ना मानते हुए  हिंदी विभाग में दाखिला ले लेता है। हलके के दबंग ब्राह्मण राजनीतिज्ञ की बेटी अंजली जोशी के किरदार से तो आप कई हिंदी फिल्मों में मिल चुके होंगे। यानि भ्रष्ट पिता व गुंडे मवाली भाइयों के घर में रहने वाली आम, सुसंस्कृत, सज्जन हृदय लिए एक अतिसुंदर कन्या।

ये बताना यहाँ जरूरी होगा कि कथा का ये प्रसंग लेखक के निजी जीवन से मेल खाता है। उदयप्रकाश जी ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि "सागर विश्वविद्यालय में मैं एनथ्रापोलाजी में जाना चाहता था। 'पीली छतरी वाली लड़की' में मैंने हल्का सा संकेत किया है कि वहाँ कुछ ऐसी स्थितियाँ बनीं और ऐसे मित्र बने कि मैं हिन्दी में आ गया और हिन्दी में भी मैंने टॉप किया।"

उदयप्रकाश जी ने अपनी इस किताब में भाषायी शिक्षा से जुड़े कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण मसले उठाए है। किस तरह के छात्र इन विषयों में दाखिला लेते हैं? कैसे आध्यापकों से इनका पाला पड़ता है? अपनी पुस्तक में लेखक इस बारे में टिप्पणी करते हुए कहते हैं...
हिंदी, उर्दू और संस्कृत ये तीन विभाग विश्वविद्यालय में ऐसे थे, जिनके होने के कारणों के बारे में किसी को ठीक ठीक पता नहीं था। यहाँ पढ़ने वाले छात्र.......उज्जड़, पिछड़े, मिसफिट, समय की सूचनाओं से कटे, दयनीय लड़के थे और वैसे ही कैरिकेचर लगते उनके आध्यापक। कोई पान खाता हुआ लगातार थूकता रहता, कोई बेशर्मी से अपनी जांघ के जोड़े खुजलाता हुआ, कोई चुटिया धारी धोती छाप रघुपतिया किसी लड़की को चिंपैजी की तरह घूरता। कैंपस के लड़के मजाक में उस विभाग को कटपीस सेंटर कहते थे।

कहने का अर्थ ये कि जिनका कहीं एडमिशन नहीं होता वे ऐसे विभागों की शोभा बढ़ाते थे। अगर अंजली जोशी अंग्रेजी में स्नातक करते समय बीमार ना पड़ी होती तो ये कहानी अस्तित्व में ही ना आई होती।

मैंने उदयप्रकाश जी को पहले ज्यादा पढ़ा नहीं। पर इस पुस्तक को पढ़कर ये जरूर लगा कि हिंदी साहित्य की राजनीति में ब्राह्मणों के वर्चस्व से वे आहत रहे हैं। लेखक हिंदी विभागों में बहुतायत में पाए जाने वाले ब्राह्मण अध्यापक और विभागाअध्यक्षों को इसी जातिवादी भाई भतीजावाद की उपज मानते हैं। उनकी इस पुस्तक में नायक एक किताब का हवाला देते हुए (जो संभवतः वरिष्ठ पत्रकार व लेखक प्रभाष जोशी का वक़्तव्य है) कहता है .

इस देश के इतिहास में कोई भी जाति कभी स्थिर नहीं रही है ... लेकिन एक जाति ऐसी है, जिसने अपनी जगह स्टेटिक बनाये रखी है। विल्कुल स्थिर, सबसे ऊपर .हजारों सालों से। वह जाति है ब्राह्मण . शारीरिक श्रम से मुक्त, दूसरों के परिश्रम, बलिदान, और संघर्ष को भोगने वाली संस्कृति के दुर्लभ प्रतिनिधि। इस जाति ने अपने लिए श्रम से अवकाश का एक ऐसा स्वर्गलोक बनाया, जिसमे शताब्दियों से रहते हुए इसने भाषा, अंधविश्वासों, षड्यंत्रों, संहिताओं और मिथ्या चेतना के ऐसे मायालोक को जन्म दिया, जिसके जरिये वह अन्य जातियों की चेतना,उनके जीवन और इस तरह समूचे समाज पर शासन कर सके।...एक निकम्मे , अकर्मण्य धड़ पर रखा हुआ एक बेहद सक्रिय, शातिर, षड्यंत्रकारी दिमाग, एक ऐसी खोपडी, जिसमे तुम सीधी-सादी कील भी ठोंक दो तो वह स्क्रू या स्प्रिंग बन जायेगी ।

अपनी किताब के विभिन्न किरादारों की मदद से उन्होंने ये बात रखनी चाही है कि हिंदी शिक्षण व साहित्य में फैला ब्राह्मणवाद पूरी व्यवस्था को अंदर ही अंदर दीमक की तरह चाट रहा है। उदयप्रकाश जी ने हिंदीजगत में पाए जाने वाले स्वनामधन्य साहित्यकारों की भी अच्छी खिंचाई की है। लेखक  ऐसे ही एक विद्वान के बारे में लिखते हैं..

डा. राजेंद्र तिवारी ने अपने बहनोई के कांटैक्ट से, जो कि राज्यसभा के मेंबर थे, पद्मश्री का जुगाड़ कर लिया था। अलग अलग शहरों और कस्बों में अभिनंदन समारोह आयोजित कराने का उन्हें शौक था। उनके बारे में मशहूर था कि वो जहाँ भी जाते हैं अपने झोले में एक शाल, एक नारियल, पाँच सौ रुपये का एक लिफाफा और अपनी प्रशस्ति का एक मुद्रित फ्रेम किया प्रपत्र साथ ले कर चलते हैं। सुप्रसिद्ध हिंदी सेवी एवम् विद्वान डा. राजेंद्र तिवारी का नगर में अभिनंदन शीर्षक समाचार अखबारों में अक्सर छपता रहता था। हर महिने  पखवाड़े उन्हें कोई ना कोई सम्मान या पुरस्कार मिलता रहता था, जिसका प्रबंध वे स्वयम् करते थे।
सच तो ये है कि हिंदी से जुड़े हर क्षेत्र जिसमें अपना ये ब्लॉग जगत शामिल है इस प्रवृति ने अपनी जड़े जमाई हुई हैं।

पर लेखक सिर्फ ब्राह्मणवाद से ही दुखी हैं ऐसा नहीं है। वे देश में फैले नक्सलवाद और आतंकवाद से भी उतने ही चिंतित है। दरअसल आज की सामाजिक व्यवस्था ने जिन वर्गों को हाशिये पर ला खड़ा किया है उसके लिए उनकी लेखनी बड़ी गंभीरता से चली है। कश्मीर की तो इस देश में इतनी चर्चा होती है पर क्या हम मणिपुरियों के कष्ट को , उनके इस देश से बढ़ते अलगाव को , इरोम चानु शर्मिला के एक दशक से चल रही भूख हड़ताल पर उतनी संवेदनशीलता और कुछ करने की ललक दिखलाते हैं? देश से पनपती इस विरक्तता को लेखक मणिपुरी छात्र सापाम के रूप में पाठकों के सम्मुख लाते हैं।

मायांग (परदेसियों) ने हमें बोहोत लूटा। हमारी लड़की ले गए। हमें बेवकूफ बनाया। हमारा बाजार ट्रेड नौकरी सब पर मायांग का कब्जा है। कुछ बोलो तो सेसेनिस्ट कहता है। तुम आज उदर से आर्मी हटा लो. कल हम आजाद हो जाएगा। अंग्रेजों के टाइम पर हमने सुभाष चंद्र बोस को अपना ब्लड दिया था। बर्मा तक जाकर इंडिया की आजादी के लिए हम लोग लड़ा। अब हम अपनी आज़ादी के लिए लड़ेगा। लिख के ले लो , कश्मीर से पहले हम इंडिया से आज़ाद होगा।
उदयप्रकाश जी कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित रहे हैं। देश की राजनीति में फैली दलाली संस्कृति और उससे पनपता भोगवाद उन्हें नागवार गुजरता है। इस लिए इस संस्कृति को को भी उन्होंने आड़े हाथों लिया है और ये इशारा किया है कि सरकारें चाहे किसी की भी हों असली सत्ता ये दलाल ही चला रहे हैं। हिंदी अंग्रेजी मिश्रित भाष्य में बिना किसी लाग लपेट के लिखे उनके कटाक्ष वस्तुस्थिति से ज्यादा दूर नहीं लगते । पुस्तक में ऐसे ही एक दलाल और देश के प्रधानमंत्री के बीच चलते वार्तालाप को वे कुछ यूँ पेश करते हैं...

ठीक से सहलाओ ! पकड़कर ! ओ. के. !’ उस आदमी ने मिस वर्ल्ड को प्यार से डाँटा फिर सेल फोन पर कहा ‘इत्ती देर क्यों कर दी....साईं ! जल्दी करो ! पॉवर, आई टी, फूड, हेल्थ एजुकेशन....सब ! सबको प्रायवेटाइज करो साईं !...ज़रा क्विक ! और पब्लिक सेक्टर का शेयर बेचो... डिसएन्वेस्ट करो...! हमको सब खरीदना है साईं...! ‘बस-बस !
ज़रा सा सब्र करें भाई...बंदा लगा है डयूटी पर, मेरा प्रॉबलम तो आपको पता है। खिचड़ी सरकार है सारी दालें एक साथ नहीं गलतीं निखलाणी जी। ’
रिच एंड फेमस तुंदियल ने विश्वसुन्दरी के सिर को सहलाया फिर ‘पुच्च...पुच्च की आवाज़ निकाली, ‘आयम, डिसअपांयंटेड पंडिज्जी ! पार्टी फंड में कितना पंप किया था मैंने, हवाला भी, डायरेक्ट भी...केंचुए की तरह चलते हो तुम लोग, एकॉनमी कैसे सुधरेगी ? अभी तक सब्सिडी भी खत्म नहीं की !’
‘हो जायेगी निखलाणी जी ! वो आयल इंपोर्ट करने वाला काम पहले कर दिया था, इसलिए सोयाबीन, सूरजमुखी और तिलहन की खेती करने वाले किसान पहले ही बरबाद थे. उनके फौरन बाद सब्सिडी भी हटा देते तो बवाल हो जाता...आपके हुकुम पर अमल हो रहा है भाई....सोच-समझ कर कदम उठा रहे हैं,’
‘जल्दी करो पंडित ! मेरे को बी. पी है. ज़्यादा एंक्ज़ायटी मेरे हेल्थ के लिए ठीक नहीं, मरने दो साले किसानों बैंचो....को...ओ...के...’

विकास के इस ढाँचे ने समाज में दो वर्ग पैदा कर दिए हैं। एक जिसके पास सब कुछ है और दूसरे जिस के पास कुछ भी नहीं। लेखक विकास के अंदरुनी खोखलेपन पर हम सब का ध्यान खींचते हुए कहते हैं

भारत की नयी पीढ़ी आख़िर कौन सी है, जो आने वाले दिनों को आकार देगी? क्या इंडिया का नया एक्स-वाइ जेनेरेशन वह है, जो टीवी में सिनेमा में फैशन परेडों और दिल्ली मुंबई कलकत्ता बंगलूर से निकलने वाले अंग्रेजी के रंगीन अखबारों में पेप्सी पीता, क्रिकेट खेलता, पॉप म्यूजिक एलबम में नंगी अधनंगी लड़कियों के साथ हिप्पियों जैसा नाचता व ज्यादा से ज्यादा दौलत कमाने के लिए एम. एन. सी. की नौकरियों के लिए माँ बाप को लतियाता और तमाम परंपराओं पर थूकता हुआ अमेरिका, कनाडा जर्मनी भाग रहा है? 
या नया जेनरेशन वह है जो असम, मिज़ोरम, मणिपुर, आंध्र, कश्मीर, बिहार, तमिलनाडु से लेकर तमाम नरक जैसे पिछड़े इलाकों में एके 47, बारूदी सुरंग, तोड़ फोड़ और हताश हिंसक वारदात में शामिल है? या फिर रोजी रोटी ना होने की निराशा में हर रोज़ आत्महत्याएँ कर रहा है? ..जिसके माँ बापों को पिछले पचास सालों में शासकों द्वारा लगातार ठगा गया है और जिसके हाथ में फिलहाल हथियार है और जिसे हर रोज मुठभेड़ों में मारा जा रहा है।
राहुल के दिमाग में लेखक द्वारा उठाए गए ये मुद्दे चलते रहते हैं। हिंदी विभाग का घोर ब्राह्नणवाद और एक ब्राह्मण कन्या से उसकी निकटता उसके मन को अजीब उधेड़बुन में डाल देती है। अंजली का निश्चल प्रेम उसे इस उहापोह से निकालकर आगे की दिशा तो दिखलाता है पर क्या राहुल उस मार्ग पर चलकर अपने भविष्य की सीढ़ियाँ तय कर पाता है? इस प्रश्न का जवाब तो आप पुस्तक पढ़ कर ही जान सकते हैं। वैसे उदयप्रकाश जी की कथा का समापन एक फिल्मी क्लाइमेक्स से कम नहीं है जिसमें दुखांत और सुखांत के दोनों सीन शूट किए गए हैं। उदयप्रकाश ने अंत में उनमें से एक को चुन भर लिया है। 

ये लंबी कहानी हिंदी साहित्यिक पत्रिका हंस में छपी थी । अब ये किताब जर्मन और उर्दू  और कई अन्य भारतीय भाषाओं में अनुदित हो चुकी है। पुस्तक में लेखक द्वारा व्यक्त विचारों और कहीं कहीं प्रयुक्त उनके स्वछंद भाष्य ने काफी विवाद पैदा किया। स्वर्गीय कमलेश्वर ने तो इसे ग़लाज़त (गंदगी) भरी कहानी करारा और हंस के संपादक राजेंद्र यादव को इसे छापने के लिए आड़े हाथों लिया। ख़ैर एक दूसरे पर निशाना साधने वाली हिंदी साहित्य जगत की इस प्रवृति पर हम जैसे आम पाठकों को क्या लेना देना। 2005, 2009 और फिर 2011 के संस्करणों से तो यही लगता है कि तमाम पाठकों ने इस पुस्तक को सहर्ष स्वीकारा। इस पुस्तक के बारे में अपना मत तो इस चर्चा के पहले अनुच्छेद में रख ही चुका हूँ। 

पुस्तक के बारे में अन्य जानकारी ये रही :

गुरुवार, अप्रैल 12, 2012

जब भी ये दिल उदास होता है : जब गीत का मुखड़ा बना एक ग़ज़ल का मतला !

कुछ गीतों का कैनवास फिल्मों की परिधियों से कहीं दूर फैला होता है। वे कहीं भी सुने जाएँ, कभी भी गुने जाएँ वे अपने इर्द गिर्द ख़ुद वही माहौल बना देते हैं। इसीलिए परिस्थितिजन्य गीतों की तुलना में ये गीत कभी बूढ़े नहीं होते। गुलज़ार का फिल्म सीमा के लिए लिखा ये नग्मा एक ऐसा ही गीत है। ना जाने कितने करोड़ एकाकी हृदयों को इस गीत की भावनाएँ उन उदास लमहों में सुकून पहुँचा चुकी होंगी। कम से कम अगर अपनी बात करूँ तो सिर्फ और सिर्फ इस गीत का मुखड़ा लगातार गुनगुनाते हुए कितने दिन कितनी शामें यूँ ही बीती हैं उसका हिसाब नहीं।

कहते हैं प्रेम के रासायन को पूरी तरह शब्दों में बाँध पाना असंभव है। पर शब्दों के जादूगर गुलज़ार गीत के पहले अंतरे में लगभग यही करते दिखते हैं। होठ का चुपचाप बोलना, आँखों की आवाज़ और दिल से निकलती आहों में साँसों की तपन को महसूस करते हुए भी शायद हम कभी उन्हें शब्दों का जामा पहनाने की सोच भी नहीं पाते, अगर गुलज़ार ने इसे ना लिखा होता।

गुलज़ार के लिखे गीतों में से बहुत कम को मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली है।  पर मौसम, स्वयंवर, बीवी और मकान, देवता , कशिश और कोशिश जैसी फिल्मों में गुलज़ार के लिखे गिने चुने जो गीत रफ़ी साहब को गाने को मिले उन सारे गीतों पर अकेला ये गीत भारी पड़ता है। सीमा 1971  में प्रदर्शित हुई पर कुछ खास चली नहीं पर ये गीत खूब चला। मुझे हमेशा ये लगता रहा है कि रफ़ी की आवाज़ और गुलज़ार के लाजवाब बोलों की तुलना में शंकर जयकिशन का संगीत फीका रहा। संगीतकार शंकर की बदौलत गायिका शारदा भी इस गीत का हिस्सा बन सकीं। आप अंतरों के बीच उनके आलाप और कहीं कहीं मुखड़े में उनकी आवाज़ सुन सकते हैं।


जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है


होठ चुपचाप बोलते हों जब
साँस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आँखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में साँस जलती हो, 

ठंडी आहों में साँस जलती हो
जब भी ये दिल ...

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए

एक मासूम सा सवाल लिए
जब भी ये दिल ...

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है
दिल बड़ा बेकरार रहता है
जब भी ये दिल ...

इस गीत को फिल्माया गया था कबीर बेदी और सिमी ग्रेवाल की जोड़ी पर। देखिए तो कितने बदले बदले से लग रहे हैं इस गीत में ये कलाकार।


पर अगर आप ये सोच रहे हों कि मुझे गुलज़ार के इस गीत की अचानक क्यूँ याद आ गई तो आपका प्रश्न ज़ायज है। वैसे तो किसी गीत के ज़हन में अनायास उभरने का कई बार कोई कारण नहीं होता। पर कल जब मैं गुलजार की एक किताब के पन्ने उलट रहा था तो उनकी एक ग़ज़ल पर नज़रे अटक गयीं। ग़ज़ल का मतला वही था जो इस गीत का मुखड़ा है.। तो आप समझ सकते हैं ना कि जितना प्यार हम सबको इस मुखड़े से है उतना ही दिलअज़ीज ये गुलज़ार साहब को भी है तभी तो उन्होंने इसी पर एक ग़ज़ल भी कह डाली।

जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

गो बरसती नहीं सदा आँखें
अब्र तो बारह मास होता  है


छाल पेड़ों की सख़्त है लेकिन
नीचे नाख़ून के माँस होता है

जख्म कहते हैं दिल का गहना है
दर्द दिल का लिबास होता है

डस ही लेता है सब को इश्क़ कभी
साँप मौका-शनास होता है


सिर्फ उतना करम किया कीजै
आपको जितना रास होता है

जिन अशआरों को bold किया है वो दिल के ज्यादा करीब हैं। वैसे इश्क़ की तुलना सर्प दंश से करने के ख़याल के बारे में आपका क्या ख़याल है ?

बुधवार, अप्रैल 04, 2012

मेहदी हसन के दो नायाब फिल्मी गीत : मुझे तुम नज़र से.. और इक सितम और मेरी जाँ ..

बतौर ग़ज़ल गायक तो मेहदी हसन की गायिकी से शायद ही कोई संगीत प्रेमी परिचित ना होगा। पर ये बात भारत में कम ही लोगों को पता है कि ग़ज़ल गायिकी के इस बादशाह ने 1960-80 के दशक में साठ से ज्यादा पाकिस्तानी फिल्मों में पार्श्वगायक की भूमिका अदा की। आज भी पाकिस्तान में उनके गाए पुराने नग्मे चाव से सुने जाते हैं। तो आज आपसे बातें होगी ऐसे ही दो गीतों के बारे में जिनमें एक तो भारत में भी बेहद मशहूर है। 


इन दोनों गीतों के बारे में एक और साम्यता ये है कि इन्हें लिखनेवाले थे मसरूर अनवर जिन्हें पाकिस्तानी फिल्म उद्योग के लोकप्रिय गीतकार का दर्जा प्राप्त था। मसरूर के लिखे हिट गीतों की फेरहिस्त का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो दस से ज्यादा बार निगार अवार्ड से सम्मानित हुए जो कि पाकिस्तान में हमारे फिल्मफेयर एवार्ड के बराबर की हैसियत रखता है।

1967 में परवेज़ मलिक ने एक फिल्म बनाई थी दो राहा। इस फिल्म का सिर्फ एक गीत मेहदी हसन साहब ने गाया था। फिल्म के संगीतकार थे सुहैल राना। गीत में तीन बातें गौर करने की है। एक तो ग़ज़ल सम्राट की आवाज़ जिसका पैनापन उस समय चरम पर था। दूसरी संगीतकार सुहैल राना द्वारा गीत के मुखड़े और इंटरल्यूड्स में रची हुई पियानो की धुन। तीसरे इस गीत को सुनने के बाद कोई भी संगीतप्रेमी इसे गुनगुनाए बिना नहीं रह सकता। इतनी आसानी से ये गीत होठों पर उतर आता है कि क्या कहें!

मेहदी साहब ने बाद अपने लाइव कन्सर्ट में इस गीत ग़ज़ल के अंदाज़ में  पेश करना शुरु कर दिया था।  पर मुझे आज भी ज्यादा आनंद इसके फिल्मी संस्करण को सुनने में ही आता है।


मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो
मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे
ना जाने मुझे क्यूँ यक़ीं हो चला है
मेरे प्यार को तुम मिटा ना सकोगे
मुझे तुम नज़र से....

मेरी याद होगी, जिधर जाओगे तुम,
कभी नग़मा बन के, कभी बन के आँसू
तड़पता मुझे हर तरफ़ पाओगे तुम
शमा जो जलायी मेरी वफ़ा ने
बुझाना भी चाहो, बुझा ना सकोगे
मुझे तुम नज़र से....

कभी नाम बातों में आया जो मेरा
तो बेचैन हो हो के दिल थाम लोगे
निगाहों पे छाएगा ग़म का अँधेरा
किसी ने जो पूछा, सबब आँसुओं का
बताना भी चाहो, बता ना सकोगे
मुझे तुम नज़र से....

1968 में आई फिल्म सैक़ा के लिए मसरूर अनवर ने एक बेहद संज़ीदा नज़्म लिखी। क्या कमाल का मुखड़ा था इक सितम और मेरी जाँ अभी जाँ बाक़ी है..। मेहदी साहब ने भी अपनी आवाज़ में गीत की भावनाओं को क्या खूब उतारा। आप खुद ही सुन लीजिए ना



इक सितम और मेरी जाँ अभी जाँ बाक़ी है
दिल में अबतक तेरी उल्फ़त का निशाँ बाक़ी है

जुर्म-ए-तौहीन-ए-मोहब्बत की सज़ा दे मुझको
कुछ तो महरूम-ए-उल्फ़त का सिला1 दे मुझको
जिस्म से रूह2 का रिश्ता नहीं टूटा है अभी
हाथ से सब्र का दामन नहीं छूटा है अभी
अभी जलते हुये इन ख़्वाबों का धुआँ बाक़ी है

अपनी नफ़रत से मेरे प्यार का दामन भर दे
दिल-ए-गुस्ताख़ को महरूम-ए-मोहब्बत कर दे
देख टूटा नहीं चाहत का हसीन ताजमहल
आ के बिखरे नहीं महकी हुई यादों के कँवल3
अभी तक़दीर के गुलशन में ख़िज़ा4 बाकी है
इक सितम और मेरी जाँ अभी जाँ बाक़ी है...

1. प्रेम से दूर रखने की सज़ा,  2. आत्मा बिना, 3. फूल   4. पतझड़.

मसरूर साहब सिर्फ गीत ही नहीं लिखते थे। कई फिल्मों की उन्होंने पटकथा भी लिखी। इसके आलावा वो कमाल के शायर भी थे। चलते चलते उनकी एक हल्की फुल्की ग़ज़ल भी पढ़वाना चाहूँगा जिसे गुलाम अली ने बड़ी मस्ती के साथ गाया है

हमको किसके ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही
किसने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी फिर सही

दिल के लुटने का सबब पूछो न सबके सामने
नाम आयेगा तुम्हारा ये कहानी फिर सही

नफ़रतों के तीर खा कर दोस्तों के शहर में
हमने किस किस को पुकारा ये कहानी फिर सही


क्या बताएँ प्यार की बाज़ी वफ़ा की राह में
कौन जीता कौन हारा ये कहानी फिर सही

सोमवार, मार्च 26, 2012

'एक शाम मेरे नाम' ने पूरे किए 6 साल : आज की शाम आपके नाम !

आज मेरे ब्लॉग एक शाम मेरे नाम का छठा जन्मदिन है। गुजरे छः सालों में अपने चिट्ठे के माध्यम से मैंने वैसे लोगों का सानिध्य व प्रेम पाया है जो बगैर ब्लागिंग किए बिना मुश्किल था। सच कहूँ तो आज भी ये सिलसिला ज़ारी है। 

ये आपका प्रेम ही है कि विगत छः सालों में इस ब्लॉग के पृष्ठ पलटने की संख्या (Page loads) साढ़े चार लाख और इसे ई मेल से पढ़ने वालों की संख्या 900 के करीब पहुँच गई है वो भी तब जबकि मेरे लेखन की आवृति पिछले सालों से कम हुई है।


मैं इसके लिए अपने मित्रों और इस चिट्ठे को अलग अलग ज़रिए ( e-mail, Networked Blogs, Facebook Page, Google Friend Connect) से अनुसरण करने वाले तमाम जाने अनजाने चेहरों को हार्दिक धन्यवाद देना चाहता हूँ और आशा करता हूँ कि उनका साथ भविष्य में भी बना रहेगा।

अब वर्षगाँठ मनानी है तो कुछ अलग होना चाहिए ना हमेशा के ढर्रे से तो आइए देखें कि गुजरे साल इस चिट्ठे पर संगीत और साहित्य का ये सफ़र कैसा रहा आपकी नज़रों में..

नए पुराने गीतों की बात करते हुए जब मैं आपसे उस गीत से जुड़ी यादें पढ़ता हूँ तो बेहद आनंद आता है। चर्चा हो रही थी हिंदी गीतों में आपसी नोंक झोंक की। गीत था ठहरिए होश में आ लूँ तो चले जाइएगा। साथी चिट्ठाकार कंचन सिंह चौहान का कहना था
"ये गीत कॉलेज में खूब गाया गया है। गीत एक लड़की और ऊँहु बीच में कोई भी या सब के सब....!! वैसे प्रेमिका की उलाहना और प्रेमी के कूल रिएक्शन पर इसी फिल्म का एक गीत "तुमको होती मोहब्बत जो हमसे, तुम ये दीवानापन छोड़ देते" की वार्ता व्यक्तिगत रूप से मुझे और अधिक पसंद है।"
वहीं गुलज़ार के लिखे नग्मे पूछे जो कोई मेरी निशानी रंग हया लिखना पर फेसबुक मित्र शैली शर्मा का कहना था
"वादी के मौसम भी एक दिन तो बदलेंगे" ये गीत कई बार सुना था पर इस पक्ति पर आज पहली बार आपका लेख पढ़कर गौर किया....... और याद आ गया कि आज भी हर हिन्दुस्तानी के दिल में कही न कही ये सपना है कि कश्मीर फिर से धरती का स्वर्ग बन जाए...."
पिछले साल जगजीत सिंह की गायी ग़ज़लों के आरंभिक दौर पर विस्तार से चर्चा की थी। हिंदी ब्लॉग जगत के मेरे पसंदीदा शायरों में से एक दानिश भाई का कहना था.. 
"पुरानी यादों का फिर से ताज़ा हो जाना....मानो लफ्ज़ लफ्ज़ में धडकनों का महसूस होने लगना, बड़ा एहसान फरमाया आपने जनाब !! "
वहीं हिमांशु ने कहा."बाद मुद्दत यहाँ आना, और अपने प्रिय गायक जगजीत को सुनना, उनके बारे में पढ़ना अद्भुत अनुभव है ! आपकी लिखावट की कारीगरी देखते बनती है, जब आप गम्भीर गायकों/गायकी को अपनी रोचक लेखनी के सुन्दर संतुलन से सहज बना कर प्रस्तुत कर रहे होते हैं .."
जगजीत जी की पुरानी ग़ज़लों पर अपनी लेखमाला मैंने पूरी भी नहीं की थी कि वे हमारा साथ छोड़ कर चले गए। मेरी कोशिश रहेगी अपनी यादों से जुड़े उनके बाकी एलबमों को भी आपके सामने इस साल प्रस्तुत करूँ।
शम्मी कपूर ने भी पिछले साल हमारा साथ छोड़ा दिया। श्रद्धंजलि स्वरूप मैंने मोहम्मद रफ़ी के साथ उनके फिल्मी सफ़र के चंद रोचक लमहे आपके साथ बाँटे। साथी चिट्ठाकार रंजना जी ने लिखा
"काफी समय तक शम्मी जी के लटके झटके से मुझे भी खासी अरुचि रही...पर बाद में जब उनके व्यक्तित्व के विषय में जाना कि वे कितने नेकदिल इंसान हैं, तो उन्हें गंभीरता से लेने लगी..बड़ी तफ़सील में जानकारी दी आपने युगल जोड़ी की...बड़ा ही अच्छा लगा...सच है, जैसे मुकेश जी ने राज कपूर जी की शोहरत चमकाई ,वैसे ही मुहम्मद रफ़ी जी ने शम्मी जी की. गंभीर और शर्मीले स्वभाव के रफ़ी साहब ने शम्मी जी का चुहलपन कैसे ओढा होगा,सचमुच काबिले तारीफ़ है..."
हिंदी ग़ज़ल के लोकप्रिय स्तंभ अदम गोंडवी लंबी बीमारी के बाद चल बसे। उनकी कविता मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको की प्रस्तुति पर साथी चिट्ठाकार डा. सोनरूपा विशाल का कहना था..
"सामाजिक सरोकारों के कवि ,आम जन की आवाज ,विडंवनाओं के धुर विरोधी अदम जी जैसे कवि विरले ही होते हैं जो सम्मान के लिए नहीं समाज के लिए लिखते हैं ! दुखद अवसान !"
फिल्म और साहित्यिक विभूतियों के आलावा कुछ साथी चिट्ठाकार भी हमारा साथ छोड़ गए। डा. अमर कुमार को उनकी ईमानदार टिप्पणियों के लिए पूरे ब्लॉग जगत में जाना जाता था। इब्नें इंशा से जुड़ी एक नज़्म पर दिए उनके विचार इस चिट्ठे पर उनके अंतिम हस्ताक्षर थे..
आज दिल में वीरानी, अब्र बन के घिर आयी
आज दिल को क्या कहिये, बावफ़ा न हरज़ाई

"अपने ललित लेख और व्यंग्य संकलन "उर्दू की आख़िरी किताब" में इंशा ने इसे स्वीकार भी किया है.. पर वज़ह को लेकर नामालूम की अदा ओढ़ ली ।यह लाइनें बहुत उदास कर जाती हैं। इस दुर्लभ रचना से आज की प्रस्तुति विशिष्ट बन गयी है ।"
पिछले साल भी पुस्तकों पर चर्चा चली। सागर ने मुन्नवर राणा की किताब घर अकेला हो गया के बारे में कहा
"मुनव्वर राणा की एक सी डी मेरे पास है पठानकोट में मुशायरे की, इतवार को सुनता हूँ.. घर को वो अनोखे अंदाज़ से याद करते हैं और माँ तो फेमस है ही. यहाँ लिखे सारे शेर उसमें उनके मुंह से सुनना राहत देता है, कई बार वो शेर पढ़ते पढ़ते रोने लगते हैं और उनका हाथ क्षितिज की ओर उठता है."
वहीं विभा को वरुण के बेटे को आंचलिक ऊपन्यास करार देने पर ऐतराज था..
"सुंदर समीक्षा. बाबा ने अपने मिथिला इलाके का जीवन चित्र खींचा है तो जाहिर है कि वहां की भाषा की गंध आएगी ही. मगर इसका यह मतलब नहीं कि उनके लेखन को आंचलिक लेखन के खाते में डाल दिया जाए. एक समय था, जब तथाकथित मुख्य धारा के हिंदी लेखकों ने अपनी राजनीति और अपने वर्चस्व के लिए फणीश्वर नाथ रेणु जैसे साहित्यकर को आंचलिकता के खाते में डाल दिया था. जो जिस प्रदेश की पृष्ठभूमि पर लिखेगा, उसकी लेखनी में वह भाषा बोली, संस्कृति आयेगी ही, यही सच्चे लेखक की ईमानदारी भी है. बाबा या रेणु आंचलिक नहीं पूरे देश के कथाकार हैं."
हमेशा की तरह इस चिट्ठे पर नए साल की शुरुआत हुई वार्षिक संगीतमाला के साथ और इस बार मैंने सीधे गीतकारों से बातें कर उन गीतों की तह तक पहुँचने का प्रयास किया। राजशेखर, सीमा सैनी और पंक्षी जालौनवी से बात कर लगा ही नहीं कि मैं किसी से पहली बार बात कर रहा हूँ। पंक्षी जालोनवी से जुड़ी पोस्ट पर बेहद पुख्ता टिप्पणी रही अपूर्व श्रीवास्तव की जब उन्होंने कहा..
"शुक्रिया...जालौनवी साहब के बारे मे जानना अच्छा लगा..अपनी म्यूजिक इंडस्ट्री की बिडम्बना मुझे लगती है कि गीतकार को कोई पहचान कोई हाइलाइट जल्द नही मिलती..जब तक कि वो खुद गुलजार या प्रसून जैसा सेलिब्रिटी ना हो जाये..सो कुछ अच्छे बोल भी सिंगर को कम्पोजर, ऐक्टर को ज्यादा फ़ायदा पहुचाते हैं बनिस्बत कि उन्हे लिखने वाले के.गीतकारों के लिये इंडियन-आइडल जैसे स्टेजेज भी नही होते ग्लैमर का इस्तकबाल करने के लिये...नये और अच्छे गीतकारों के बारे मे लोगों को और भी ज्यादा पता चलना चाहिये.."
विशाल के संगीतबद्ध गीत बेकराँ से जुड़ी पोस्ट पर डा. अनुराग आर्य का कहना था
"विशाल इन लफ्जों की रूह को समझते है , इनकी उदासियो को भी , ओर गुलज़ार को भी ....दरअसल शायर से मुतासिर हुए बगैर अच्छा कम्पोज़ करना मुश्किल काम है .सच कहूँ तो आर डी के बाद अगर किसी ने गुलज़ार को "पूरा "समझा है तो वो विशाल ही है ....बेकराँ मुझे बेहद अज़ीज़ है....विशाल की आवाज को बहुत सूट करता है , विशाल जानते है रहमान की तरह उन्हें कहाँ ओर कब गाना है।"
गीतकार स्वानंद किरकिरे जो मेरे फेसबुक मित्र भी हैं  ने ये साली ज़िंदगी के अपने लिखे गीत को संगीतमाला में पाकर टिप्पणी की उफ्फ ये गाना जिंदा है ?

इस चिट्ठे की पुरानी पाठिका मृदुला तांबे ने कुन फ़ाया कुन की इन पंक्तियों जब कहीं पे कुछ भी नहीं था वही था को इस श्लोक से जोड़कर देखा
"नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत|
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम ||

सृष्टि से पहले सत नहीं था। असत भी नहीं, अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था।  छिपा था क्या, कहाँ किसने ढका था उस पल तो अगम अतल जल भी कहां था |"
संगीतमाला के सरताज गीत रंगरेज़ पर अंकित सफ़र का कहना था 
राज शेखर जी को बन्दे का सलाम! क्या खूब लिखा है, हर शब्द अपना एक अलग आकाश ढूंढ रहा है, सब मिलके अनंत हो जा रहे हैं.
वहीं इस चिट्ठे के शुरुवाती दौर से साथ रही सुपर्णा का रंगरेज़ और वार्षिक संगीतमाला के बारे में कहना था
"I was waiting for the 'Sartaj Geet' :) am thrilled its this one! When this album/song released i listened to it and talked about it so much that i almost can't say anything about it anymore except how much i love it. sheer brilliance! the lyrics and singing are super ..loved the countdown , lots of stuff i hadn't heard before. congratulations on the steady run and trust it will last a long time to come despite how busy you are :). I get breathless even thinking of how you must manage it ."
पूरे साल में विभिन्न प्रविष्टियों में व्यक्त आपके उद्गारों में से कुछ को ही यहाँ समेट पाया हूँ। एक शाम मेरे नाम के संगीतमय सफ़र में आप यूँ ही मेरे साथ बने रहेंगे ऐसी आशा करता हूँ।
 

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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