Friday, July 13, 2007

परवीन शाकिरः अपनी छोटी सी जिंदगी में उर्दू अदब में पहचान बनाने वाली शायरा !

अपने चिट्ठे पर आपके साथ मैं फै़ज अहमद फै़ज का कलाम बाँट चुका हूँ। आज की ये महफिल है परवीन शाकिर के नाम। परवीन शाकिर का नाम पहली बार एक अंतरजाल पर उर्दू कविता के एक मंच पर सुना था। वक्त के साथ उसी मंच पर इस मशहूर पाकिस्तानी शायरा की कई गजलें और नज्में पढ़ने का मौका मिला और उनके काव्य की संवेदनशीलता और साफगोई ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया। कोशिश करूंगा कि उनकी चंद बेहतरीन कृतियाँ आपके सामने रख सकूँ जो उनकी शख्सियत को आपके सामने ज़ाहिर कर सके।

परवीन शाकिर को ऐसी शायरा में शुमार किया जाता है जिन्होंने अपनी कविता में वो सब बेबाकी से बयां किया जो उन्होंने अपनी जिंदगी में महसूस किया और सहा। उनका सबसे पहला ग़जलों और नज्मों का संग्रह ख़ुशबू (१९७६) तब प्रकाशित हुआ जब वो २४ वर्ष की थीं। यमन टाइम्स ने परवीन शाकिर के इस संग्रह के बारे में लिखा है कि यूँ तो कविताओं में खुशबू एक ऐसा प्रतीक है जो उस प्यार की कहानी कहता है जो कभी मिला नहीं। पर परवीन जिस ख़ुशबू की बात करती हैं वो एक ऍसे फूल की है जिसने पूरी शिद्दत से फ़िजा में अपनी महक बिखेरी, पर वो अपनों द्वारा उपेक्षित ही रहा । वो भी उस सूरत तक कि आखिरकार वो मुरझाकर मिट्टी की ग़र्द फांकने पर मजबूर हुआ। उनका एक बेहद मशहूर शेर याद पड़ता है

वो तो ख़ुशबू है हवाओं में बिखर जायेगा
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा

दरअसल, ये संग्रह किशोरावस्था से निकल कर युवावस्था में प्रवेश करती लड़की के ख़्वाबों, खुशियों और रुसवाइयों का आईना है। अब उनकी इसी नज्म को देखें...किस तरह यहाँ अपने साथी की कल्पनाओं में खोई ये लड़की मधुर सपनों के जाल बुनते-बुनते एक चुभती सच्चाई के रूबरू आ जाती है।

अपने बिस्तर पर बहुत देर से मैं नीम दराज
सोचती थी कि वो इस वक्त कहाँ पर होगा
मैं यहाँ हूँ मगर इस कूचा-ए-रंग बू में
रोज़ की तरह वो आज भी आया होगा
और जब उसने वहाँ मुझ को ना पाया होगा


आपको इल्म है वो आज नहीं आईं हैं?
मेरी हर दोस्त से उसने यही पूछा होगा
क्यूँ नहीं आईं क्या बात हुई है आखिर
खुद से इस बात पर सौ बार वो उलझा होगा
कल वो आएगी तो मैं उससे नहीं बोलूँगा
आप ही आप कई बार वो रूठा होगा
वो नहीं है तो बुलंदी का सफर कितना कठिन
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसने ये सोचा होगा
राहदारी में, हरे लॉन में, फूलों के करीब
उस ने हर सिमत मुझे आ के ढूंढा होगा

.............................................
.............................................
याद कर के मुझे नम हो गई होगी पलकें
"आँख में कुछ पड़ गया कुछ" कह के टाला होगा
और घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाह
हर सतर में मेरा चेहरा उभर आया होगा
जब मिली होगी मुझे मेरी हालत की खबर
उस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगा
सोच कर ये थम जाए परेशानी-ए-दिल
यूंही बेवजह किसी शख्स को रोका होगा

इत्तिफ़ाकन मुझे उस शाम मेरी दोस्त मिली
मैंने पूछा कि सुनो , आए थे वो? कैसे थे?
मुझको पूछा था? मुझे ढू्ढा था चारों जानिब
उसने इक लमहे को देखा मुझे और फिर हँस दी
उस हँसी में वो तल्खी थी कि उससे आगे
क्या कहा उसने मुझे याद नहीं है लेकिन
इतना मालूम है, ख्वाबों का भरम टूट गया...


परवीन शाकिर ने अंग्रेजी में स्नात्कोत्तर किया । नौ साल तक वो काँलेज में शिक्षिका रहीं। इसी दौरान इनका दूसरा काव्य संग्रह सद-बर्ग (सौ पत्ते) छप चुका था। पढ़ने-लिखने में इनकी काबिलियत का आलम ये था कि १९८६ में जब पहली बार पाकिस्तान सिविल सर्विसेज की परीक्षा में बैठीं तो चुन ली गईं। मजे की बात ये रही कि उस इम्तिहान में एक सवाल इनकी कविता से भी पूछा गया।

ग़जल में तो हमेशा से प्रेम, वियोग, एकाकीपन, उदासी, बेवफ़ाई, आशा और हताशा से जुड़ी भावनाओं को प्रधानता मिली है। काव्य समीक्षकों का ऐसा मानना है कि परवीन शाकिर ने ना केवल अपनी ग़जलों और नज्मों में इन भावनाओं को प्रमुखता दी , बल्कि साथ साथ इन विषयों को उन्होंने एक नारी के दृध्टिकोण से देखा जो तब तक उर्दू कविता में ठीक से उभर के आ नहीं पाया था। परवीन, नाज़ुक से नाज़ुक भावनाओं को सहजता से व्यक्त करना बखूबी जानती थीं। मिलन के कोमल मुलायम
ज़ज्बातों को जिस खूबसूरती से उन्होंने अपनी इस नज्म में उकेरा है, उसकी मिसाल समकालीन उर्दू शायरी में निकाल पाना मुश्किल है।

सब्ज़ मद्धम रोशनी में सुर्ख़ आँचल की धनक
सर्द कमरे में मचलती गर्म साँसों की महक

बाज़ूओं के सख्त हल्क़े में कोई नाज़ुक बदन
सिल्वटें मलबूस पर आँचल भी कुछ ढलका हुआ

गर्मी-ए-रुख़्सार से दहकी हुई ठंडी हवा
नर्म ज़ुल्फ़ों से मुलायम उँगलियों की छेड़ छाड़

सुर्ख़ होंठों पर शरारत के किसी लम्हें का अक्स
रेशमी बाहों में चूड़ी की कभी मद्धम धनक

शर्मगीं लहजों में धीरे से कभी चाहत की बात
दो दिलों की धड़कनों में गूँजती थी एक सदा


काँपते होंठों पे थी अल्लाह से सिर्फ़ एक दुआ
काश ये लम्हे ठहर जायें ठहर जायें ज़रा


और यहाँ देखें प्यार के खुशनुमा अहसास को यादों कि गिरफ्त में क़ैद करती ये ग़जल अपने प्रवाह में पाठक को किस तरह बहा ले जाती है।

सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानाँ
धूप आँखों तक आ पहुँची है रात गुज़र गई जानाँ

भोर समय तक जिसने हमें *बाहम उलझाये रखा
वो अलबेली रेशम जैसी बात गुज़र गई जानाँ
*एक दूसरे में


सदा की देखी रात हमें इस बार मिली तो चुप के से
ख़ाली हाथ पे रख के क्या सौग़ात गुज़र गई जानाँ

किस कोंपल की आस में अब तक वैसे ही सर-सब्ज़ हो तुम
अब तो धूप का मौसम है बरसात गुज़र गई जानाँ


लोग न जाने किन रातों की मुरादें माँगा करते हैं
अपनी रात तो वो जो तेरे साथ गुज़र गई जानाँ

जो शख़्स तीस की उम्र के पहले ही सेलीब्रेटी का दर्जा पा चुका हो उसकी जिंदगी में खुशियों की क्या कमी । पर क्या ऍसा हो पाया था परवीन के साथ ? काव्य और नौकरी दोनों में कम उम्र में इतनी तरक्की पा कर भी अपनी निजी जिंदगी में उन्हें काफी निराशा हाथ लगी थी। ग़म और खुशी का ये मिश्रण उनकी लेखनी में जगह-जगह साफ दिखाई पड़ता है।

कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तेरा ख़याल भी
दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की
चाँद भी ऐन *चेत का उस पे तेरा **जमाल भी
* एक महिने का नाम ** सुंदरता

सब से नज़र बचा के वो मुझ को ऐसे देखते
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लो
*शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
* शीशे पर काम करने वाला

उस को न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था
अब जो पलट के देखिये बात थी कुछ *मुहाल भी
* मुश्किल

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी


शाम की नासमझ हवा पूछ रही है इक पता
मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मेरा ख़याल भी

उस के ही बाज़ूओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी


अगली पोस्ट में बाते होंगी उनकी कुछ और मशहूर रचनाओं की। तो चलते-चलते एक झलक देखिए उन्हें खुद एक मुशायरे में
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14 comments:

subhash_bhadauriasb@yahoo.com said...

मनीशजी
आपने मरहूम परवीन शाकिरजी के दीदार और उनके शीरी लबों से ग़ज़ल सुनवाकर उर्दू शायर मीर तकी मीर याद दिलादी.

उसके होंटों की नाज़ुकी या कहिए
पंखुड़ी एक गुलाब की सी है.

मीर उन नीमबाज आँखों में,
सारी मस्ती शराब की सी है.
मुझे उनकी ये ग़ज़ल के शेर बहुत पसंद हैं-

तिरी चाहत के भीगे जंगलों में,
मेरा मन मोर बनके नाचता है,

मैं उसकी दस्तरस में हूँ मगर वो
मुझे मेरी रिज़ा से मांगता है.
बहरे हज़ज़ मुसद्दस महज़ूफ में कही गयी इस ग़ज़ल के एक मिसरे में अरकान इस प्रकार होंगे-
मफाईलुन मफाईलुन फऊलुन
1222 1222 122
लगागागा लगागागा लगागा
दुष्यन्त की ग़ज़ल इसी बहर में हैं.

परिन्दे अब भी पर तौले हुऐ हैं
हवा में सनसनी घोले हुऐ हैं.
जो ग़ज़ल के शिल्पी हैं वे गौर फर्मायें.
आप ने परवीनजी की नज़्म ग़ज़ल की बात कर हमें
भर दिया आपके लिए तो ये ही दुआ करेंगे
अल्लाह करे ज़ोरो कलम और ज़्यादा.
डॉ.सुभाष भदौरिया अहमदाबाद.

कंचन सिंह चौहान on July 13, 2007 said...

पहली बार ही जाना मैने इन शायरा के बारे में और सोंच रही हूँ कि अब तक क्यों नही पढ़ा इनको ?

वो तो ख़ुशबू है हवाओं में बिखर जायेगा
मसला फूल का है फूल किधर जायेगा
तो सुनी हुई पंक्तियाँ थी, परंतु ये नही पता था कि किसकी हैं ?

अब
अपने बिस्तर पर बहुत देर से मैं नीम दराज........
इस पूरी नज़्म के विषय में क्या कहें ? भावुक दिलों की आखें नम करने वाली इस नज़्म की एक एक पंक्ति दिल को भीतर तक छू जाती है।

जो शख़्स तीस की उम्र के पहले ही सेलीब्रेटी का दर्जा पा चुका हो उसकी जिंदगी में खुशियों की क्या कमी । पर क्या ऍसा हो पाया था परवीन के साथ ?

ऊपरी चमक दमक के भीतर कुछ भीगा सा ना हो तो शायद कोई शायर न बन पाए मनीष जी! ये ईंधन उस आग के लिये जरूरी है!

काँपते होंठों पे थी अल्लाह से सिर्फ़ एक दुआ
काश ये लम्हे ठहर जायें ठहर जायें ज़रा

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर
हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

मुझे विशेषकर पसंद आईं ! इतनी खूबसूरत जानकारी देने का शुक्रिया

manya on July 13, 2007 said...

मुझे शायरों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं.. बस चंद गिने चुने नामों से वाकिफ़ हूं.. पर परवीन जी को पढ कर लगा.. हर एक लफ़्ज़ दिल से गुअज्र गया.. आप सही कहते हैं दिल के हर एह्सास को उन्होंने बहुत सहजता से कहा है... यूं कहा जाये की दिल निकाल के रख दिया है तो ज्यादा सही होगा.. सारे कलाम बेहद उम्दा.. आपका बेहद शुक्रिया जो इनको यहां प्रेषित किया.. इनकी जिम्दगी के बारे में जानना भी बहुत अच्छा लगा..बेहद मार्मिक विवरण था.. आपने जो शेर बोल्ड किये हैं वो तो अच्छे हैं ही...

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लो
*शीशागरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी
मुझे ये लाइनें बेहद पसं द आई.. शुक्रिया ..

पूनम मिश्रा on July 13, 2007 said...

आपकी खासियत है कि आप ऐसी जानकारी देते हैं कि बार बार पडने को मजबूर हो जाती हूँ.परवीन शाकिर से रूबरू करा कर आपने कमसेकम मुझे नइ जानकारी दी .एक खूबसूरत शायरा की खूबसूरत शायरी से मुलाकात हो गई.

सब से नज़र बचा के वो मुझ को ऐसे देखते
एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

eSwami on July 13, 2007 said...

मैं भी उनका फ़ैन हूं!

sajeev sarathie on July 13, 2007 said...

parveen shakir ki jo nazmen aapni chuni hai wo wakai sanghaniya hai bahut achhe manish maza aaya padh ke

Manish on July 13, 2007 said...

सुभाष जी आपसे पहली बार मुख़ातिब हूँ। आपको परवीन शाकिर की आवाज और रचनाएँ पसंद आईं जानकर खुशी हुई। ग़ज़लों में प्रयुक्त होने वाली बहरों के बारे में कभी फुर्सत निकाल कर एक विस्तृत लेख लिखें तो ग़ज़ल प्रेमियों और नए लिखनेवालों के लिए वो काफी ज्ञानवर्धक होगा। आशा है महफ़िल के मंच पर
http://www.akshargram.com/paricharcha/viewforum.php?id=19

भी आपसे मुलाकात होती रहेगी।

Manish on July 13, 2007 said...

कंचन परवीन शाकिर की रचनाओं को दिल से महसूस करने और उस पर अपनी राय को तफ़सील से बताने का बेहद शुक्रिया ! शीघ्र ही उनकी कुछ और पसंदीदा रचनाएँ आपके सामने पेश करूँगा.

मान्या विवरण खत्म नहीं हुआ...उनके जीवन के दुख की गहराई में जाने की कोशिश करेंगे अगली पोस्ट में।

पूनम जी आप हमारे चिट्ठा संसार में होती ही कहाँ हैं जो बार-बार पढ़ें :) परवीन जी की कृतियों को पसंद करने का शुक्रिया

ई-स्वामी अरे फिर तो उनकी लिखी अपनी पसंदीदा ग़ज़ल, नज्म भी आपको बतानी थी।

सजीव शुक्रिया ! अगले हिस्से में बाकी की नज्में भी आपको पढ़वाएँगे

Udan Tashtari on July 13, 2007 said...

बहुत खूब अंदाज है आपकी पेशकश का. यह यूट्यूब पर पहले देखा था. मगर आपको पढ़ने के बाद सुनने में और आनन्द आ गया.

yunus on July 14, 2007 said...

मनीष परवीन शाकिर की इस पोस्‍ट ने कुछ पुरानी बातें याद दिला दीं । पोस्‍ट तो कल ही देख ली थी पर पढ़ आज पाया । मुझे लगता है कि उन्‍नीस सौ छियासी के बाद की ही बात रही होगी । स्‍कूल का ज़माना था तब शायरी पढ़ने और सुनने का नया नया शौक़ लगा था । टी.वी. पर मुशायरे और कवि सम्‍मेलन बहुत आते थे । मैं फिलिप्‍स के अपने ‘पुरंटे’ टेप रिकॉर्डर पर उन्‍हें रिकॉर्ड कर लेता था और फिर आराम से डायरी में उतारता रहता । तभी ख़बर उड़ी कि परवीन शाकिर भारत आई हैं और कई कवि सम्‍मेलनों में हिस्‍सा लेंगी । बस इंतज़ार शुरू हो गया । आखिरकार वो मुशायरा दूरदर्शन पर आया जिसमें परवीन शाकिर पढ़ रही थीं । बहुत बहुत अच्‍छा लगा । फिर मुझे वो दौर याद आता है जब ख़बर आई कि परवीन शाकिर एक सड़क दुर्घटना (शायद सड़क दुर्घटना में ही) मारी गयीं । दिल बैठ गया ।

बहुत बाद में वाणी प्रकाशन ने परवीन शाकिर के अशआर की एक किताब ‘रहमतों की बारिश’ देवनागरी में छापी । जो मेरे संग्रह में है । फिर एक बात और याद आई—चार छह साल पहले हम रूप कुमार राठौर के घर में थे । ममता कुछ सुना रही थीं, और कुछ रूप जी । बे तकल्‍लुफ़ माहौल था । तभी उन्‍होंने कहा कि मैंने परवीन शाकिर के कुछ अशआर गाये हैं । सुनाए । वो ग़ज़ल थी ‘पूरा दुख और आधा चांद, हिज्र की शब और ऐसा चांद । अच्‍छा लगा । ये ग़ज़ल रूप कुमार राठौर के अलबम ‘खुश्‍बू’ में है । कभी नेट पर मिली तो लिंक भेजूंगा ।

मैंने एक ख़ास बात नोट की है । परवीन शाकिर ने बारिश पर बहुत लिखा है । उनका एक बरसाती शेर है, जो दिन भर से याद करने की कोशिश कर रहा हूं, कमबख्‍त याद नहीं आ रहा है, फिर कभी बताऊंगा । क्‍या आप बारिश पर केंद्रित उनकी रचनाओं को इकट्ठा पेश कर सकते हैं ।

फिलहाल ये वही ग़ज़ल जिसका ऊपर मैंने जिक्र किया है--

पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
किस मक्‍तल से गुजरा होगा
इतना सहमा सहमा चांद
यादों की आबाद गली में
घूम रहा है तन्‍हा चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तन्‍हा होगा चांद
इतने रोशन चेहरे पर भी
सूरज का है साया चांद

Manish on July 15, 2007 said...

यूनुस भाई
परवीन जी के बारें में अपनी यादें बाँटने का शुक्रिया !
बारिश से जुड़ी छोटी छोटी कई नमकीन सी :)नज्में परवीन जी की हैं। गौर करें..

बारिश अब से पहले भी कई बार होती थी
क्या इस बार रंगरेज ने चुनरी कच्ची रँगी थी
या तन का ही कहना सच था
रंग तो उसके होठों में था


या ये देखें
बारिश में क्या तनहा भींगना लड़की ?
उसे बुला जिसकी चाहत में
तेरा तन मन भींगा है
प्यार की बारिश से बढ़कर भी क्या बारिश होगी
और जब इस बारिश के बाद
हिज्र की पहली धूप खिलेगी
तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे


या फिर ये
मैं क्यूं उसको फोन करूँ
उसको भी तो इल्म में होगा
कल शब
मौसम की पहली बारिश थी


बाकी एक बेहद प्यारी ग़जल अगली पोस्ट में पेश करूँगा। मतला देखिए
बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गये
मौसम के हाथ भीग के सफ़्फ़ाक हो गये


समीर जी शुक्रिया पसंदगी का

poemsnpuja on October 16, 2009 said...

परवीन शाकिर को पढना मुझे भी बहुत पसंद है, चाँद की जिस कविता का ऊपर जिक्र युनुस जी ने किया है, उसी से इस अद्भुत शायरा की पहचान हुयी थी मेरी. और आज भी मेरी पसंदीदा है. उनके बारे में इतना कुछ जान कर बहुत अच्छा लगा. आज काफी देर से आपका ब्लॉग पढ़ रही हूँ और एक से एक रंग में भीग रही हूँ. शुक्रिया मनीष जी इतनी बेहतरीन पोस्ट्स लिखने के लिए.

Manish Kumar on October 21, 2009 said...

शुक्रिया पूजा पसंदगी का । परवीन जैसी शायरा इतनी जल्दी इस दुनिया से कूच कर गईं इस बात का अफ़सोस हमारी सारी पीढ़ी करती रहेगी।

honey on November 25, 2010 said...

aankho se aashu nikal aaye hai aaj pravin ji nazme dil jo chu gayi or meri jindhghi ki haqkikat baya jar gayi sukaria ,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

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