Wednesday, August 08, 2007

अज़ब पागल सी लड़की थी...

मोहब्बत एक ऐसा अहसास है, जो कभी बासी नहीं होता। काव्य, साहित्य, संगीत, सिनेमा सब तो इसकी कहानी, न जाने कितनी बार कह चुके हैं, पर फिर भी इसके बारे में कहते रहना इंसान की फ़ितरत है। ये इंसान की काबिलियत का सबूत है कि हर बार वो इस भावना को शब्दों के नए नवेले जाल बुनकर एक से बढ़कर एक सुंदर अभिव्यक्ति की रचना करता है।

अज़ब पागल सी लड़की थी.. इस मुखड़े से दो लोकप्रिय नज्में हैं और इन्हें इन दोनों नज़्मों को आतिफ़ सईद साहब ने लिखा है..। खैर, आज पढ़ें इसका वो स्वरूप जहाँ गुज्ररे दिनों की बातों को शिद्दत से याद किया जा रहा है...

अज़ब पागल सी लड़की थी....

मुझे हर रोज़ कहती थी
बताओ कुछ नया लिख़ा
कभी उससे जो कहता था
कि मैंने नज़्म लिखी है
मग़र उन्वान देना है..
बहुत बेताब होती थी


वो कहती थी...
सुनो...
मैं इसे अच्छा सा इक उन्वान देती हूँ
वो मेरी नज़्म सुनती थी
और उसकी बोलती आँखें
किसी मिसरे, किसी तस्बीह पर यूँ मुस्कुराती थीं
मुझे लफ़्जों से किरणें फूटती महसूस होती थीं
वो फिर इस नज़्म को अच्छा सा उन्वान देती थी
और उसके आख़िरी मिसरे के नीचे
इक अदा-ए-बेनियाज़ी से
वो अपना नाम लिखती थी

मैं कहता था
सुनो....
ये नज़्म मेरी है
तो फिर तुमने अपने नाम से मनसूब कर ली है ?
मेरी ये बात सुनकर उसकी आँखें मुस्कुराती थीं

वो कहती थी
सुनो.....
सादा सा रिश्ता है
कि जैसे तुम मेरे हो
इस तरह ये नज़्म मेरी है

अज़ब पागल सी लड़की थी....

(उन्वान-शीर्षक, बेनियाज़ी-लापरवाही से, मिसरा - छंद का चरण)

पुनःश्व बहुत दिनों बाद आज इस नज़्म का आडिओ हाथ लगा तो सोचा जनाब आतिफ़ सईद की ख़ुद की आवाज़ को आप तक पहुँचाना निहायत जरूरी है...



यहाँ तो जिस मोहतरमा को याद किया गया वो तो शायर के स्मृति पटल को रह रह कर गुदगुदाती है पर ये जो दूसरी पागल कन्या है वो तो आए दिन शायर को परेशान किए रहती है। उसकी कहानी अगली पोस्ट में.....
Related Posts with Thumbnails

10 comments:

Udan Tashtari on August 08, 2007 said...

मगर यह लिखी किसने है? आपके अंदाजे बयाँ तो हमेशा की तरह काबिले तारीफ है.

Manish on August 08, 2007 said...

समीर जी जैसा मैंने कहा कि इसके वास्तविक शायर का ज़िक्र मुझे कहीं नहीं मिला।

Divine India on August 08, 2007 said...

बेहतरीन प्रस्तुति की है मनीष भाई…
बस बहुतSSSSSS ही सुंदर लगा…।

अमित on August 09, 2007 said...

मनीष भाई, बहुत अच्छी चीज़ बांटी है आपने. बहुत-बहुत शुक्रिया...

"वो कहती थी
सुनो.....
सादा सा रिश्ता है..."

क्या मासूमियत है... वाह, वाह!

अब अगली नज़्म का इंतज़ार है.

Pratyaksha on August 09, 2007 said...

बढिया !

manya on August 09, 2007 said...

Bahut hee khoobsurat!!!!!!.... alhad, masoom.... ajab see kashish hai.. jinhone bhi likha hai.. taarif ko lafz nahi hai.... Thnx to u.. for such a wonderful presentation...

kanchan on August 09, 2007 said...

अंदाज़‍-ए-बयाँ तो कुछ-कुछ जावेद अख्तर जैसा लग रहा है, खैर किसी का भी हो, बड़ी ही सादगी से कही गई दिल के अंदर तक उतर जाने वाली बात।

हरिमोहन सिंह on August 09, 2007 said...

दूसरी वाली का जिक्र कर दिया
हम बैचेन है तब से
अब ये तुम पर है कि
कब हमें करार आये

रवीन्द्र रंजन on August 09, 2007 said...

बहुत अच्छा। खासकर भाषा तो बहुत ही पसंद आई। अब बस इंतजार है तो अगली...

Manish on August 09, 2007 said...

इस नज़्म को पसंद करने का आप सब को शुक्रिया !

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie