चलते चलते ये लंबा सफ़र वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी तक ले आया है जहां न कोई गीत है न कोई कव्वाली। यहां पर है एक प्यारी सी ग़ज़ल जिसे अपनी आवाज़ से संवारा है पिता पुत्र की जोड़ी ने। ये जोड़ी है गुजरात के कच्छ से ताल्लुक रखने वाली उस्मान मीर और आमिर मीर की।
ग़ज़लें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं पर सच बताऊं तो जगजीत जी के जाने के बाद नए ग़ज़ल गायक और उनकी धुन रचने वाले वो जादू नहीं जगा पा रहे। अव्वल तो जो ग़ज़लें चुनी जाती हैं वो भावों की गहराइयों को पकड़ नहीं पातीं और फिर जब शब्द बेअसर हों तो संगीत का लुत्फ़ भी कहां आ पाता है। ऐसे में जब मैने उस्मान और आमिर की जुगलबंदी को सुना तो मुझे बरबस मोहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन की गाई ग़ज़लें याद आ गईं। तब एक भाई एक सुर में ग़ज़ल के मिसरे को उठाता तो दूसरा उस अंदाज़ को बदल कर उसी मिसरे को गा देता था। उस्मान और आमिर ने भी इस ग़ज़ल को उसी शैली में गाया है।
उस्मान एक मामूली घर से आते थे। उनके पिता हुसैनभाई गुजराती लोक संगीत जैसे भजन और संतवाणी में तबला वादक थे। उस्मान मीर को बचपन से ही संगीत में रुचि थी। नवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पिता के साथ तबला वादन करने लगे। परन्तु मन में उनकी इच्छा गायक बनने की थी। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा तो उन्होंने अपने पिता से ही ली पर आगे गायिकी उन्होंने इस्माइल दातार जी से सीखी।
कहते हैं कि एक बार गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन, वे तबला वादक के रूप में श्री मोरारी बापू के आश्रम गए, जहाँ पर लोगों ने उनकी गायन प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए उन्हें बापू से मिलवाया। यहीं से उन्हें गायिकी का एक मंच मिला जो फिल्मों से होता हुआ आज स्वतंत्र संगीत सृजन करने तक आ पहुंचा है।
रही इस ग़ज़ल की बात तो इस सहज पर असरदार सी ग़ज़ल की शुरुआत उस्मान मीर फ़हमी साहब की ही एक क़ता से करते हैं
कोई दुनिया में चेहरा देखता है,
कोई चेहरे में दुनिया देखता है
तेरी आँखों में बस ये देखता हूँ,
तेरी आँखों में बस ये देखता हूँ,
कि मेरी आँखों में तू क्या देखता है
निस्वार्थ प्रेम की जो पराकाष्ठा हो सकती है वो इस क़ता और आगे के अशआर में झलकती है। दवे साहब का तार वाद्यों से सजा संगीत संयोजन भी बेहद मधुर लगता है। तबले के साथ साथ उस्मान हारमोनियम भी क्या खूब बजाते हैं।
तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं
कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं
तू जहाँ तक देखता है
उससे आगे मैं देखता ही नहीं
तेरे बारे में सोचने वाला
अपने बारे में सोचता ही नहीं
यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँढा
जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं
इस ग़ज़ल के कुछ शेर जो नहीं इस्तेमाल हुए भी पढ़ने लायक हैं।
घर के मलबे से घर बना ही नहीं
ज़लज़ले का असर गया ही नहीं
ज़लज़ले का असर गया ही नहीं
मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया
मैं तिरी राह से हटा ही नहीं
मैं तिरी राह से हटा ही नहीं
कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ
शेर ताज़ा कोई हुआ ही नहीं
रात भी हम ने ही सदारत की
बज़्म में और कोई था ही नहीं
याद है जो उसी को याद करो
हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं
फ़हमी बदायूंनी का डेढ़ साल पहले ही निधन हुआ था। उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे फ़हमी को छोटे बहर की ग़ज़ल कहने में कमाल हासिल था। ये ग़ज़ल उसका जीता जागता उदाहरण है। फ़हमी साहब एक बेहद विनम्र स्वभाव के मालिक थे। उनकी किताबों में दस्तकें निगाहों की’ और ‘पांचवी सम्त’ के बाद तीसरी किताब ‘हिज्र की दूसरी दवा’ देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुई है।
उनका ही एक और कमाल का शेर है कि
मुंह में जब तक ज़बान बाक़ी है
आप की दास्तान बाक़ी है।
ले तो सकता हूँ नाम क़ातिल का
मसअला ये है जान बाक़ी है।
तो आइए सुनें उस्मान और आमिर की आवाज़ में ये ग़ज़ल





















0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें