शुक्रवार, अक्टूबर 25, 2013

मन्ना डे (1919-2013) : हम ना भूलेंगे तुम्हें अल्लाह कसम..!

कल सुबह कार्यालय पहुँचने के साथ ही मन्ना दा के जाने की ख़बर मिल गयी थी।  अपनी तरह की आवाज़, शास्त्रीयता पर गहरी पकड़ और किसी भी मूड के गीत को निभा पाने की सलाहियत के बावज़ूद मन्ना डे को वो मौके नहीं मिल पाए जिसके वो हक़दार थे। शायद ये उस युग में पैदा होने का दुर्भाग्य था जब रफ़ी, किशोर, लता व मुकेश की तूती बोलती थी। फिर भी मन्ना दा ने जितने भी गीत गाए वो उन्हें बतौर पार्श्व गायक अमरता प्रदान करने के लिए काफ़ी रहे।

सत्तर के उत्तरार्ध और फिर अस्सी के दशक में जब हमारी पीढ़ी किशोरावस्था की सीढ़ियाँ लाँघ रही थी तब हिंदी फिल्मी गीतों में मन्ना डे की भागीदारी बहुत सीमित हो गई थी। ऐसे में रेडियो ही मन्ना दा की आवाज़ को हम तक पहुँचाता रहा था। बचपन में मन्ना डे के जिस गीत ने मुझे सबसे ज्यादा आनंदित किया था वो गीत था फिल्म 'तीसरी कसम' से। गीत के बोल थे  'चलत मुसाफ़िर मोह लिया रे पिंजरे वाली मुनिया..'। मन्ना डे जब गीत की इस पंक्ति तक पहुँचते  'उड़ उड़ बैठी हलवइया दुकनिया, बर्फी के सब रस ले लिया रे पिंजरे वाली मुनिया' तो बालमन गीत की लय में पूरी तरह तरंगित हो जाता। हाँ ये जरूर था कि गीत के बोल  से मन में इस चिड़िया के बारे मैं कौतूहल जरूर उत्पन्न होता था कि ये कैसे मिठाई व कपड़ों का रस निकाल लेती होगी। अब ये क्या जानते थे कि गीतकार शैलेंद्र की इस विचित्र चिड़िया का संबंध 'खूबसूरत स्त्री' से था।

स्कूल के दिन में शास्त्रीय संगीत की ज्यादा समझ तो नहीं थी पर बहन को रियाज़ करता सुनते रहने से संगीत में उसकी अहमियत का भास जरूर हो आया था। ऐसे में रेडियो पर जब पहली बार मन्ना डे का फिल्म वसंत बहार के लिए गाया गीत 'सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं .'.सुना तो बस इस गीत में डूबता चला गया और इतने दशकों बाद भी इसे गुनगुनाते हुए मन एक अलग ही दुनिया में विचरण करने लगता है। बाँसुरी की आरंभिक धुन के बाद मन्ना डे का आलाप मन को मोह लेता है और जब मन्नाडे की आवाज़ स्वर की साधना को परमेश्वर की आराधना का पर्याय बताती है तो उससे ज्यादा सच्ची बात कोई नहीं लगती।

सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं, सुर के बिना जीवन सूना.
संगीत मन को पंख लगाए,गीतों से रिमझिम रस बरसाए
स्वर की साधना ....,स्वर की साधना परमेश्वर की
सुर ना सजे क्या गाऊँ मैं
सुर के बिना जीवन सूना.


मैंने मन्ना डे के मुरीद बहुतेरे संगीत प्रेमियों के संग्रह में उनके बेमिसाल शास्त्रीय गीतों की फेरहिस्त देखी है। मजे की बात ये है कि इनमें से अधिकांश ऐसे लोग थे जिन्हें शास्त्रीय संगीत के बारे में कोई ज्ञान नहीं था। ये मन्ना डे की गायिकी और आवाज़ का ही जादू ही था जो शास्त्रीय संगीत को आम संगीतप्रेमी जनमानस के करीब खींच सका। लपक झपक तू आ रे बदरवा, ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं (राग पीलू), लागा चुनरी में दाग (राग भैरवी), तू छुपी है कहाँ (राग मालकोस) जैसे शास्त्रीय रागों पर आधारित कठिन गीतों को गाकर मन्ना डे ने आम जनमानस से जो वाहवाही लूटी वो किसी से छुपी नहीं है। शास्त्रीय रागों पर आधारित गीतों में मुझे राग अहीर भैरव पर आधारित मन्ना डे का फिल्म तेरी सूरत मेरी आँखें फिल्म का ये गीत बेहद प्रिय है.

पूछो ना कैसे मैने रैन बिताई 
इक पल जैसे, इक जुग बीता 
जुग बीते मोहे नींद ना आयी
उत जले दीपक, इत मन मेरा
फिर भी ना जाए मेरे घर का अँधेरा
तरपत तरसत उमर गँवाई,
पूछो ना कैसे...



ख़ुद संगीतकार सचिन देव बर्मन अपनी पुस्तक 'सरगमेर निखाद' में इस गीत का जिक्र करते हुए कहते हैं 
"जब भी मैंने अपनी फिल्म के लिए जब भी शास्त्रीय गीत को संगीतबद्ध किया मेरी पहली पसंद मन्ना डे रहे और देखिए ये गीत किस खूबसूरती से मन्ना की आवाज़ में निखरा। ये एक गंभीर और धीमा गीत था जिसे निभाना बेहद कठिन था। मन्ना ने इस अंदाज़ में गीत को निभाया कि वो आज भी उतना ही लोकप्रिय है और मुझे पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में भी ये संगीत के मर्मज्ञों और आम जनों द्वारा समान रूप से सराहा जाएगा। "
सचिन दा के आलावा संगीतकार सलिल चौधरी ने अंत तक मन्ना डे की आवाज़ का बेहतरीन इस्तेमाल किया। सलिल दा और मन्ना डे की इस जुगलबादी से निकले अपने तीन सर्वप्रिय गीतों 'ज़िंदगी कैसी है पहेली हाए..', 'फिर कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको....' और 'हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है...' के बारे में पहले भी मैं विस्तार से लिख चुका हूँ।

इतने गुणी गायक होने के बावज़ूद मन्ना डे को फिल्मों में मुख्य नायक को स्वर देने के मौके कम ही मिले। कोई और गायक होता तो इस स्थिति में अवसादग्रस्त हो जाता पर मन्ना जीवटता से डटे रहे। उन्होंने फिल्मों के आम चरित्रों के लिए कुछ ऐसे परिस्थितिजन्य गीत गाए जिनकी पहचान उन फिल्मों से ना होकर उनमें व्यक्त भावों से हुई। आप ही कहिए क्या आप आज भी अपने लाड़ले को देखकर इस गीत की पंक्तियाँ नहीं गुनगुनाते तूझे सूरज कहूँ या चंदा, तुझे दीप कहूँ या तारा ...मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राजदुलारा .....



आज भी जब स्कूलों में प्रार्थना होती है तो फिल्म सीमा का ये गीत तू प्यार का सागर है, तेरी इक बूँद के प्यासे हम..... गाते ही हाथ भगवन की तरफ़ श्रद्धा से जुड़ जाते हैं।



वहीं स्वतंत्रता व गणतंत्र दिवस के दिनों में बजते फिल्म 'काबुलीवाला' के देशभक्ति गीत ऐ मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन तुझपे दिल कुर्बान... सुनकर आँखें डबडबा जाती हैं। 

abc

इसी तरह फिल्म उपहार में चरित्र अभिनेता प्राण पर फिल्माए गीत 
कसमे वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं...बातों का क्या, 
कोई किसा का नहीं ये झूठे नाते हैं...नातों का क्या 
में बिना किसी संगीत के जब मन्ना दा की आवाज़ आज भी उभरती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।




ये सारे गीत इस बात को साबित करते हैं मन्ना दा को भले ही नायकों के पर्दे पर के तिलिस्म का साथ ज्यादा नहीं मिला,फिर भी अपनी बेमिसाल गायिकी से उन्होंने इसकी कमी महसूस नहीं होने दी। ऐसी आवाज़ के मालिक थे मन्ना दा जो हर मूड को अपनी गायिकी से जीवंत कर देते थे। 

मन्ना डे ने जहाँ आओ टविस्ट करें जैसे तेज गीत गाए वहीं किशोर, रफ़ी, आशा व लता जैसे दिग्गजों के साथ इक चतुर नार...., ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे...., फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम...., ना तो कारवाँ की तलाश है..., ये रात भीगी भीगी... में भी अपनी उपस्थिति को बखूबी दर्ज किया। गैर फिल्मी गीतों का भी एक बहुत बड़ा खजाना मन्ना डे के नाम है। हरिवंश राय 'बच्चन' की मधुशाला को जन जन तक पहुँचाने का श्रेय जितना अमिताभ को है उतना ही मन्ना डे का है। इतनी बड़ी विरासत अपने पीछे छोड़ जाने वाले इस गायक के बारे में मेरे जैसे संगीतप्रेमी तो यही कहना चाहेंगे हम ना भूलेंगे तुम्हें अल्लाह कसम..!

सोमवार, अक्टूबर 21, 2013

रंगीला रंगीला रंगीला रे...सुन मेरे बंधु रे : क्या था भाटियाली गीतों के प्रति सचिन दा का नज़रिया ?

पिछले हफ्ते थाइकैंड की यात्रा पर निकलने की वज़ह से एस डी बर्मन से जुड़ी श्रंखला का आख़िरी भाग आपके सम्मुख पहले नहीं ला सका। जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में जिक्र किया था कि इस कड़ी में मैं उन गीतों की बात करूँगा जिनके बारे में चर्चा करने का अनुरोध आपने अपनी टिप्पणियों में किया है। साथ ही एक सरसरी सी नज़र हिंदी फिल्मों में गाए उनके अन्य गीतों पर भी होगी...



तो आज की कड़ी की शुरुआत करते हैं निहार रंजन के पसंदीदा बाँग्ला गीत रंगीला रंगीला रंगीला रे..से। बर्मन दा ने अपनी आवाज़ में ये गीत सन 1945 में रिकार्ड किया था और ये बेहद लोकप्रिय भी हुआ था। खागेश देव बर्मन, सचिन दा से जुड़ी अपनी किताब में इस गीत के संदर्भ में लोक संगीत को निभाने में सचिन दा की माहिरी के बारे में संगीतकार व गायक कबीर सुमन को उद्धृत करते हुए कहते हैं

लोक संगीत की नब्ज़ जाने बगैर इस गीत की पंक्ति तुमी होइयो किनर बंधु, आमि गांगेर पानी के बाद ई ई.. स्वर को खींचना एक आम गायक के बस की बात नहीं है। खागेश का मानना है कि इस गीत में कुछ खास शब्दों पर जोर देने के लिए सचिन दा का रुकना और डुबियो गेलो बेला के पहले हे हे ..का प्रयोग डूबते सूरज की स्थिति को गायिकी द्वारा चित्रित करने में सहायक होता है।

इस गीत को पूर्वी बंगाल के कवि जसिमुद्दिन ने लिखा था। बाँग्लादेश में जसिमुद्दिन को लोक या ग्रामीण कवि के रूप में जाना जाता है। रंगीला रे एक नाविक द्वारा गाया भाटियाली प्रेम गीत है जिसमें वो अपनी प्रेमिका से पूछता है कि आख़िर तुम मुझे छोड़ कर कहाँ चली गयी?

बंधु रंगीला रंगीला रंगीला रे
आमरे छाड़ियर बंधु कोइ गैला रे

नाविक कहता है कि तुम अगर चंदा हो तो मैं नदी की बहती धारा हूँ। देखना ज्वार भाटा की बेला में हम एक हो जाएँगे। अगर तुम फूल हो तो तुम्हारी सुगंध के पीछे मैं बहती हवा के रूप में देश विदेश तब तक भटकूँगा जब तक पागल ना हो जाऊँ। वैसे बंगाली ना होने के बावज़ूद ये गीत सहज ही मन में बैठ जाता है। आप भी सुनकर देखिए..




वैसे हिंदी फिल्मों में भाटियाली गीतों की परंपरा सचिन दा ने सुजाता में गाए अपने बेहद लोकप्रिय गीत सुन मेरे बंधु रे सुनो मोरे मितवा ...से की। क्या सहज व प्यारे बोल लिखे थे मज़रूह ने इस गीत में...

होता तू पीपल मैं, होती अमरलता तेरी
तेरे गले माला बनके, पड़ी मुसकाती रे, सुन मेरे...
दीया कहे तू सागर मैं, होती तेरी नदिया
लहर लहर करती मैं पिया से मिल जाती.. रे सुन मेरे.



भाटियाली लोक संगीत के बारे में सचिन दा का अपना एक नज़रिया था। उन्होंने लोक संगीत से जुड़े अपने एक लेख में लिखा है..
"मेरे लिए भाटियाली मिट्टी की एक धुन है। इसकी जड़े ज़मीन से निकलती हैं और धरती ही इन धुनों को पोषित पल्लवित करती है। भाटियाली एक तरह से बहती नदी का गीत है। इसके सुर, इसके बोल, इसकी पीड़ा, इसकी खुशियाँ हमें बंगाल की नदियों की याद दिलाती हैं। भाटियाली गीत एक आम किसान का प्रेम गीत भी हो सकता है तो वहीं वो राधा कृष्ण के रास रंग को भी चित्रित कर सकता है। भाटियाली गीतों का मूड, उनकी कैफ़ियत दार्शनिकता में डूबे अकेलेपन को स्वर देती है पर ये दार्शनिकता बाउल गीतों से अलग होती है।"

1969 में आराधना के साथ एक और फिल्म आयी थी जिसका नाम था तलाश जिसका जिक्र हर्षवर्धन ने अपनी टिप्पणी में किया है। इस फिल्म में भी सचिन दा ने अपने अन्य फिल्मी गीतों की तरह पार्श्व से एक गीत गाया था। गीत के बोल थे मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में शीतल छाया तू, दुख के जंगल में। फिल्म के ठीक प्रारंभ में आने वाले इस गीत के बोल लिखे थे गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। माँ की ममता को सर्वोपरि मानने वाले इस गीत की भावनाओं से भला कौन अपने आपको अलग कर सकता है?



इन गीतों के आलावा सचिन दा ने Eight Days,ताजमहल, प्रेम पुजारी,तेरे मेरे सपने,ज़िंदगी ज़िंदगी व सगीना जैसी फिल्मों में भी पार्श्व गायक की भूमिका अदा की पर इन फिल्मों के लिए उनके गाए गीत उतने चर्चित नहीं रहे। इस प्रविष्टि के साथ सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला का यहीं समापन करता हूँ। आशा है सचिन दा के गाए इन गीतों और उनके पीछे छुपे व्यक्तित्व से जुड़ी बातों को आपने पसंद किया होगा।

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

शुक्रवार, अक्टूबर 04, 2013

सफल होगी तेरी आराधना, काहे को रोये... जब पहली बार मिला सचिन दा को गायिकी के लिए नेशनल अवार्ड !

हिंदी फिल्मों में सचिन दा के गाए गीतों की इस चर्चा में आज बात 1969 में आई फिल्म 'आराधना' की। आपको तो याद ही होगा कि इस फिल्म के सुपरहिट गीतों ने नवोदित नायक राजेश खन्ना और गायक किशोर कुमार के कैरियर का रुख ही मोड़ दिया था। इस फिल्म में सचिन दा ने एक गीत गाया था..सफल होगी तेरी आराधना..काहे को रोये। सचिन देव बर्मन के गाए अधिकांश गीतों से उलट इस गीत में भाटियाली लोक संगीत का अक़्स नहीं था। दरअसल इस गीत की जो प्रकृति है वो बहुत कुछ बंगाल के प्रचलित लोक नाट्य  जात्रा (यात्रा) में आने वाले प्रतीतात्मक क़िरदार बिबेक (विवेक) से मिलती जुलती है!

 'जात्रा' जो हिंदी शब्द 'यात्रा' का बंगाली रूप है, एक सांगीतिक लोक नाट्य के रूप में चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन से प्रचलित होना शुरु हुआ। जात्रा की शुरुआत धान की कटाई के साथ होती थी जब कलाकार जत्थों के रूप में गाँव देहात के अंदरुनी इलाकों तक पहुँच जाते। ये सिलसिला अगले मानसून के आने के पहले चलता रहता।
इस तरह के लंबे नाटकों में संगीत का प्रयोग, आरंभिक भीड़ जुटाने और नाटक के बीच के परिदृश्यों को जोड़ने के काम में होता था।  इन नाटकों में अक्सर एक प्रतीतात्मक क़िरदार बिबेक (विवेक) का मध्य में आगमन होता जो नैतिकता के आवरण में नाटक की परिस्थितियों को एक दार्शनिक की तरह तौलते हुए अपना दृष्टिकोण रखता। अगर आपने गौर किया हो तो  पाएँगे कि इससे पहले वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...में भी आप 'बिबेक' की इस दार्शनिकता का स्वाद चख चुके हैं। सचिन दा के सामने दिक्कत यही थी उनके गीतों में दार्शनिकता का पुट भरने वाले गीतकार शैलेन्द्र आराधना के बनने से पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। बर्मन दा ने शैलेंद्र की अनुपस्थिति में ये काम आनंद बख्शी को सौंपा।


बख्शी साहब को अपने शब्दों से  घोर निराशा में डूबी एक अनब्याही माँ (जिस के सर से अचानक ही प्रेमी और पिता का आसरा छिन जाता है) के मन में आशा का संचार करना था। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सहज शब्दों में जिस सोच को पैदा करने की काबिलियत शैलेंद्र ने अपने गीतों में दिखाई थी, आनंद बख्शी ने इस गीत में भली भाँति उस परंपरा का निर्वाह किया। सचिन दा ने इस खूबी से गीत की भावनाओं को अपने स्वर में उतारा कि उन्हें 1970 में इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का नेशनल एवार्ड मिला।

सचिन दा गाने के साथ प्रयुक्त होने वाले वाद्यों के बारे में निश्चित सोच रखते थे। गीतों में आर्केस्ट्रा के इस्तेमाल को वौ गैरजरूरी समझते थे। उन्हें लगता था कि विविध वाद्य यंत्रों का अतिशय प्रयोग गीत की आत्मा को मार देता है, उसे उभरने नहीं देता। बाँसुरी, सरोद सितार जैसे भारतीय वाद्य यंत्र तो उन्हें प्रिय थे ही वो लोक संगीत में बजने वाले वाद्य यंत्र जैसे इकतारा का भी अपने गीतों में अक्सर इस्तेमाल करते थे। इस गीत के संगीत पक्ष की बात करें तो उससे जुड़ा एक बड़ा मजेदार किस्सा है जिसका जिक्र निर्माता शक्ति सामंत ने अपने संस्मरणों में किया है।

"सचिन दा को मैंने एक बार ही बड़े गुस्से में देखा है। बात तबकी है जब सफल होगी तेरी.... की रिकार्डिंग चल रही थी। पंचम ने उस गीत के लिए कुल मिलाकर बारह वादकों को बुला रखा था जबकि सचिन दा ने पंचम को कह रखा था कि गीत में ग्यारह से ज्यादा वादकों की जरूरत नहीं है। पर पूरा दिमाग लड़ाने के बाद भी पंचम ये निर्णय नहीं ले पाए कि इनमें से किसे छाँटा जाए। जब सचिन दा आए तो वे ये देख के आगबबूला हो गए। आख़िरकार गीत ग्यारह वादकों से ही रिकार्ड किया गया। बारहवें वादक ने कुछ बजाया भले नहीं पर उसे सचिन दा ने पूरा मेहनताना दे कर ही विदा किया।"

तो ऐसे थे हमारे सचिन दा । तो आइए उनकी आवाज़ में इस गीत को सुना जाए..


बनेगी आशा इक दिन तेरी ये निराशा
काहे को रोये, चाहे जो होए
सफल होगी तेरी आराधना
काहे को रोये...

समा जाए इसमें तूफ़ान
जिया तेरा सागर सामान
नज़र तेरी काहे नादान
छलक गयी गागर सामान
ओ.. जाने क्यों तूने यूँ
असुवन से नैन भिगोये
काहे को रोये...

दीया टूटे तो है माटी
जले तो ये ज्योति बने
बहे आँसू तो है पानी
रुके तो ये मोती बने
ओ.. ये मोती आँखों की
पूँजी है ये ना खोये
काहे को रोये...

कहीं पे है दुःख की छाया
कहीं पे है खुशियों की धूप
बुरा भला जैसा भी है
यही तो है बगिया का रूप
ओ..फूलों से, काँटों से
माली ने हार पिरोये
काहे को रोये...


 

ये तो थे सचिन दा के गाए मेरे प्रियतम चार नग्मे। इस श्रंखला की आख़िरी कड़ी में मैं उन गीतों की बात करूँगा जिनके बारे में चर्चा करने का अनुरोध आपने अपनी टिप्पणियों में किया है। साथ ही एक सरसरी सी नज़र हिंदी फिल्मों में गाए उनके अन्य गीतों पर भी.. 

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...


शनिवार, सितंबर 28, 2013

डोली में बिठाई के कहार.. जब सचिन दा ने पंचम की फिल्म में गाया कोई गीत !

सचिन देव बर्मन से जुड़ी इस श्रंखला  में बात चल रही है उनकी गायिकी से जुड़े कुछ पहलुओं की। अब तक चर्चा हुई बंदिनी और गाइड में गाए उनके कालजयी गीतों की। सचिन देव बर्मन के गाए गीतों की एक खासियत ये भी रही है कि वे किसी नायक पर नही फिल्माए गए बल्कि पार्श्व से आती आवाज़ के रूप में चलचित्रों में शामिल किए गए। वैसे भी सचिन देव बर्मन जिस आवाज़ के मालिक थे वो शायद ही उनके फिल्मी नायकों पर फबती। पार्श्वगीतों को फिल्म में रखने का एक फ़ायदा ये भी होता है वो किसी क़िरदार की भावना को ना व्यक्त कर, फिल्म की पूरी परिस्थिति को अपने दायरे में समेट लेते हैं।

ऐसा ही एक गीत था 1971 में आई फिल्म 'अमर प्रेम' का ! फिल्म के संगीत निर्देशक थे पंचम। इसी फिल्म में सचिन देव बर्मन ने एक गीत को आवाज़ दी थी डोली में बिठाई के कहार...लाए मोहे सजना के द्वार । वैसे सचिन दा का पंचम की किसी फिल्म के लिए गाया ये पहला और अंतिम गीत था। यूँ तो अमर प्रेम के सारे गीतों के संगीत निर्देशन का श्रेय पंचम के नाम है पर पंचम के वरीय सहयोगी और वादक मनोहारी सिंह की बात मानी जाए तो उनके अनुसार फिल्म बनते वक्त इस गीत के संगीत संयोजन का काम सचिन दा ने ही किया था। इस गीत की धुन जिसमें गीत के बोलों के बीच बाँसुरी का अच्छा इस्तेमाल है, दादा बर्मन के संगीत की अमिट छाप का संकेत देती है।

बहरहाल ये गीत अमरप्रेम की कास्टिंग के साथ आता है। आजकल तो शादी विवाह में डोली का प्रचलन रहा नहीं। पर एक ज़माना वो भी था जब डोली में दुल्हन अपने पिया के घर पहुँचती थी और फिर उसी घर की हो कर ही रह जाती थी। बड़ा चिरपरिचित संवाद हुआ करता था फिल्मों में उन दिनों कि डोली में आने के बाद अब इस घर से मेरी अर्थी ही निकलेगी।

यानि सामाजिक तानाबाना ऐसा बुना जाता था कि उस पराए घर के आलावा नवविवाहिता किसी और ठोर की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। ऐसे माहौल में पली बढ़ी युवती को घर से अचानक ही निकाल दिया जाए तो कैसी मानसिक वेदना से गुजरेगी वो? गीतकार आनंद बक्षी को फिल्म की इन्हीं परिस्थिति के लिए गीत की रचना करनी थी। गीत तो उन्होंने बड़ा दर्द भरा लिखा पर उसमें निहित भावनाओं में प्राण फूँकने के लिए जरूरत थी, सचिन दा जैसी आवाज़ की।

सचिन दा जिस अंदाज़ में ओ रामा रे... कहकर गीत का आगाज़ करते हैं वो गीत में छुपी पीड़ा की ओर इशारा करने के लिए काफी होता है। सचिना दा की गूँजती आवाज़ के साथ बजती बाँसुरी के बाद आती है इस गीत की ट्रेडमार्क धुन (डोली में बिठाई के कहार के ठीक पहले) जो इस गीत की पहचान है। पूरे गीत में इसका कई बार प्रयोग हुआ है। तो आइए मन को थोड़ा बोझिल करते हैं अमर प्रेम के इस गीत के साथ..


हो रामा रे, हो ओ रामा
डोली में बिठाई के कहार
लाए मोहे सजना के द्वार
ओ डोली में बिठाई के कहार
बीते दिन खुशियों के चार, देके दुख मन को हजार
ओ डोली में...

मर के निकलना था, ओ, मर के निकलना था
घर से साँवरिया के जीते जी निकलना पड़ा
फूलों जैसे पाँवों में, पड़ गए ये छाले रे
काँटों पे जो चलना पड़ा
पतझड़, ओ बन गई पतझड़, ओ बन गई पतझड़  बैरन बहार              
डोली में बिठाई के कहार...

जितने हैं आँसू मेरी, ओ, जितने हैं आँसू मेरी
अँखियों में, उतना नदिया में नाहीं रे नीर
ओ लिखनेवाले तूने लिख दी ये कैसी मेरी
टूटी नय्या जैसी तक़दीर
उठा माझी, ओ माझी, उठा माझी,
ओ माझी रे, उठा माझी
उठे पटवार 
डोली में बिठाई के कहार...

टूटा पहले मेरे मन, ओ, टूटा पहले मन अब
चूड़ियाँ टूटीं, ये सारे सपने यूँ चूर
कैसा हुआ धोखा आया पवन का झोंका
मिट गया मेरा सिंदूर
लुट गए, ओ रामा, लुट गए, ओ रामा मेरे लुट गए
सोलह श्रंगार         
डोली में बिठाई के कहार...


सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

मंगलवार, सितंबर 24, 2013

कलम या कि तलवार : रामाधारी सिंह 'दिनकर' के जन्मदिन पर सुनिए उनकी ये प्रेरक कविता !

कल राष्ट्रकवि रामाधारी सिंह 'दिनकर' का जन्मदिन था। स्कूल और कॉलेज जीवन में मेरे प्रियतम कवि होने के बावज़ूद विगत कुछ सालों में "रश्मिरथी" के आलावा उनकी कोई और पुस्तक नहीं पढ़ पाया हूँ। ये जरूर है कि मेरे कार्यालय में दिनकर प्रेमी गाहे बगाहे उनको याद अवश्य कर लिया करते हैं। इसी बहाने उनके व्यक्तित्व से जुड़े कई वाकये और उनकी ओजमयी कविताएँ सुनने को मिल जाती हैं।

कल ऐसे ही एक कार्यक्रम में सहकर्मियों के साथ वक़्त गुजरा। पद्य के साथ गद्य पर उनके समान अधिकार, उनका आकर्षक रूप, विनम्र व्यवहार और ओजपूर्ण भाषा, 1971 के भारत पाक युद्ध के समय उनका लगातार तीन दिनों तक पटना में वीर रस कवि सम्मेलन का आयोजन कराना, नेहरु, राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण से उनके घनिष्ठ संबंध और अंतिम दिनों में धनाभाव के चलते पौत्रियों के विवाह की चिंता... बहुत सारी बातों पर चर्चा हुई और मन उनके व्यक्तित्व के प्रति आदरभाव से हृदय में सब समेटता चला गया।

शाम को वापस लौटा तो दिनकर की लिखी ये कविता जो स्कूल के दिनों में पढ़ी थी बरबस याद आ गयी। तब भी इसे पढ़ते वक्त मन प्रफुल्लित हो उठता था और आज भी इसके पाठ के दौरान मैं वैसी ही भावनाओं से एक बार फिर गुजरा। कलम और तलवार में से एक को चुनने की दुविधा को दिनकर चंद पंक्तियों में बड़ी ही सहजता से दूर करते हुए तलवार के ऊपर कलम की सर्वोच्चता को स्थापित करते हैं। तो आइए दिनकर को याद करें उनकी इस कविता के माध्यम से



दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति अजेय अपार

अंध कक्षा में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल ही नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे

एक भेद है और वहाँ निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी

जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादलों में बिजली होती, होते दिमाग में गोले

जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार

और चलते चलते उनकी इन पंक्तियों के साथ आपसे विदा लूँ

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,
आँसू के कण बरसाता चल।

 अगर दिनकर की कविताएँ आपको भी उद्वेलित करती हैं तो इन्हें भी आप पढ़ना पसंद करेंगे

बुधवार, सितंबर 18, 2013

वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ : कैसे सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया ?

सचिन देव बर्मन के गाए पसंदीदा गीतों की श्रंखला में पिछली पोस्ट में बात हुई फिल्म बंदिनी के गीत मेरे साजन हैं उस पार.... की। आज उसी सिलसिले को बढ़ाते हुए बात करते हैं सचिन दा के गाए फिल्म 'गाइड' के बेहद मशहूर गीत वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ..... की...।  पर गाइड के इस गीत के बारे में बात करने से पहले ये जानना रोचक रहेगा कि दादा बर्मन को गायिकी का रोग लगा कैसे?
सचिन दा के पिता खुद भी ध्रुपद गायक थे। वे सितार भी बजाते थे। बालक सचिन देव बर्मन पर संगीत की पहली छाया उन्हीं के माध्यम से पड़ी। पर सचिन जिस लोक संगीत के बाद में मर्मज्ञ बने, उसका आरंभिक ज्ञान उन्हें राजपरिवार के लिए काम करने वाले सेवकों की सोहबत से मिला। पहली बार पाँचवी कक्षा में पूजा के अवसर पर सचिन दा ने गीत गाया। स्कूल से जब भी उन्हें वक़्त मिलता वे दोस्तों की मंडली के साथ गाने में तल्लीन हो जाते। बचपन के इन्हीं दिनों की एक मजेदार घटना का जिक्र सचिन दा अपने संस्मरण में कुछ इस तरीके से करते हैं....

"कोमिला से दस मील दूर कमल सागर में एक काली का मंदिर था। पूजा के दिनों में वहाँ एक मेला लगता था। हमारी मित्र मंडली उस मेले में जा पहुँची। हम खूब घूमे, इतना कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। मेला खाली होने लगा तो होश आया और किसी तरह दौड़ कर आखिरी गाड़ी पकड़ी। टिकट लेने के लिए समय ना बचा था। कोमिला उतरे तो टिकट चेकर ने आ घेरा। बहुत हाथ पैर जोड़े पर वो सुनने को तैयार ना हुआ। उलटे स्टेशन मास्टर से कह कर हमें एक कमरे में बंद करा दिया। एक तो घर से अनुमति नहीं ली थी और दूसरे इतनी देर भी हो गई थी, ऊपर से ये नई मुसीबत। मैं रोने लगा। पर मेरे एक मित्र को एक तरकीब सूझी। कुछ दिनों पहले पूजा के अवसर पर स्टेशन मास्टर की माँ उसके घर आई थी और उसका कोई गीत सुनकर भावविभोर हो कर रो पड़ी थी। याद तो नहीं पड़ता पर मेरे मित्र ने मुझसे भाटियाली या बाउल गीत गाने को कहा। मैंने जैसे तैसे रोना रोका और गाने लगा। परिणाम सचमुच अच्छा निकला, थोड़ी ही देर में कमरे के दरवाजे पर आहट हुई और दरवाजा खोलकर स्टेशन मास्टर की माँ अंदर आ गई। उसने अपने बेटे से कह कर हमें छुड़वा ही नहीं दिया बल्कि खाने के लिए मिठाई भी दी।"

तो देखा आपने किस तरह सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया। सचिन दा पचास और साठ के दशक में मुंबई में बतौर संगीत निर्देशक फिल्मों में संगीत देते रहे पर हर साल कोलकाता जाकर उन्होंने अपने नए नए गीत रिकार्ड किए जिनमें कई बेहद लोकप्रिय हुए। साठ के दशक की शुरुआत में सचिन दा को हृदयाघात हुआ। तबियत खराब होने की वजह से उनका काम रुक गया।  देव आनंद तब गाइड पर फिल्म बनाने की तैयारियों में लगे थे। सारे निर्माता जब सचिन दा से कन्नी काट रहे थे तब देव आनंद ने सचिन दा के स्वस्थ होने का इंतज़ार किया और गाइड की कमान उन्हें ही सौंपी। दादा ने भी गाइड के लिए जो संगीत दिया वो सदा सदा के लिए अजेय अमर हो गया।

फिल्म की कहानी जेल से निकलते हुए गाइड राजू से शुरु होती है जो अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौटने की बजाए अपने नए सफ़र की शुरुआत  के लिए एक अनजान डगर पर चल उठता है। सचिन दा ने इस परिस्थिति के लिए एक बार फिर गीतकार शैलेंद्र को याद किया। अपनी आत्मकथा सरगमेर निखाद में वो लिखते हैं कि

जो भी शैलेंद्र ने मेरे लिए लिखा व सीधा और सरल होता था।  यही वज़ह थी कि मैं अपने सीमित हिंदी ज्ञान के बावज़ूद उसके बोलों को मन में पूरी तरह दृश्यांकित कर पाता था।

शैले्द ने जिस खूबसूरती से जीवन के शाश्वत सत्य को, हमारे रहने ना रहने से दुनिया पर पड़ते फर्क को अपने दर्शन के साथ इस गीत में उभारा है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। इस गीत को अगर आप ध्यान से सुनें तो हर अंतरे की पहली और तीसरी पंक्ति को दो हिस्से में बँटा पाएँगे जिनके बीच और बाद में संगीत के टुकड़े गीत की भावनाओं की गूँज से प्रतीत होते हैं। सचिन दा दूसरी और चौथी पंक्ति में अपनी आवाज़ का सारा दर्द उड़ेल देते हैं। हर अंतरे की पाँचवी पंक्ति के ठीक बीच में नगाड़े की ध्वनि का इस्तेमाल भी बड़ी खूबसूरती से हुआ है। इसी वज़ह से इतने अल्प वाद्य यंत्रों के प्रयोग बावज़ूद ये गीत इतना प्रभावी बन पड़ा है। आख़िर में मुसाफ़िर शब्द को सचिन दा का अलग अलग रूप  में गाना, श्रोता कभी भूल नहीं पाता।

वैसे क्या आप जानते हैं सचिन दा ने इस गीत की आंरंभिक धुन अपने गाए बंगाली गीत  दूर कोन प्रबासे तोमि चले जाइबा रे, तोमि चोले जाइबा रे बंधु रे कबे आइबा रे से ली थी। यकीन नहीं आता तो सचिन दा के गाए इस बाँग्ला गीत को सुनिए।



और अब सुनिए फिल्म गाइड का ये नग्मा


वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ
दम लेले घड़ी भर, ये छैयाँ, पाएगा कहाँ
वहाँ कौन है तेरा ...

बीत गये दिन, प्यार के पलछिन
सपना बनी वो रातें
भूल गये वो, तू भी भुला दे
प्यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अँधेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कोई भी तेरी, राह न देखे
नैन बिछाए ना कोई
दर्द से तेरे, कोई ना तड़पा
आँख किसी की ना रोयी
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के न आयी
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ..

देव आनंद पर फिल्माए गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

शुक्रवार, सितंबर 13, 2013

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार : कैसे सचिन दा ने आत्मसात किया अपनी आवाज़ में भाटियाली लोक संगीत ?

ज़रा सोचिए एक ऐसे संगीतकार के बारे में जिसने हिंदी फिल्मों में बीस से भी कम गाने गाए हों पर उसके हर दूसरे गाए गीत में से एक कालजयी साबित हुआ हो। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ पंचम के पिता और त्रिपुरा के राजसी ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन की। सचिन दा के संगीतबद्ध गीतों से कहीं पहले उनकी आवाज़ का मैं कायल हुआ था। जब जब रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनी उनके गाए शब्दों की दार्शनिकता और दर्द में अपने आपको डूबता पाया। बहुत दिनों से सोच रहा था कि सचिन दा के गाए गीतों के बारे में एक सिलसिला चलाया जाए जिसमें बातों का के्द्रबिंदु में उनके संगीत के साथ साथ उनकी बेमिसाल गायिकी भी हो।


इस श्रंखला में मैंने उनके उन पाँच गीतों का चयन किया है जो मेरे सर्वाधिक प्रिय रहे हैं।  तो आज इस श्रंखला की शुरुआत बंदिनी के गीत 'ओ रे माँझी, ओ रे माँझी, ओ मेरे माँझी...मेरे साजन हैं उस पार' से जो कहानी के निर्णायक मोड़ पर फिल्म समाप्त होने की ठीक पूर्व आता है। बंदिनी छुटपन में तब देखी थी जब दूरदर्शन श्वेत श्याम हुआ करता था। सच कहूँ तो आज फिल्म की कहानी भी ठीक से याद नहीं पर इस गीत और इसका हर एक शब्द दिमाग के कोने कोने में नक़्श है। कोरी भावुकता कह लीजिए या कुछ और, जब भी स्कूल और कॉलेज के ज़माने में इस गीत को सुनता था तो दिल इस क़दर बोझिल हो जाता कि मन अकेले कमरे में आँसू बहाने को करता। क्या बोल लिखे थे शैलेंद्र ने 

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना..
गुण तो न था कोई भी.. अवगुण मेरे भुला देना।

नदी के जल से धुले सीधे सच्चे शब्द जो सचिन दा की आवाज़ के जादू से दिल में भावनाओं का सैलाब ले आते।

इस गीत को सुनते हुए क्या आपके मन में ये प्रश्न नहीं उठता कि एक नाविक द्वारा गाए जाने वाले गीतों को त्रिपुरा का ये राजकुमार अपनी गायिकी में इतनी अच्छी तरह कैसे समाहित कर पाया?

दरअसल असम, पश्चिम बंगाल, बाँग्लादेश से बहती ब्रह्मपुत्र नदी अपने चौड़े पाटों के बीच लोकसंगीत की एक अद्भुत धारा को पोषित पल्लवित करती है जिसे लोग भाटियाली लोक संगीत के नाम से जानते हैं। अविभाजित भारत में त्रिपुरा और आज का बाँग्लादेश का इलाका एक ही रियासत का हिस्सा रहे थे। 1922 में  इंटर पास करने के बाद सचिन दा बीए करने के लिए कलकत्ता जाना चाहते थे पर उनके पिता ने उन्हें कोमिला बुला लिया।  सत्तर के दशक में लोकप्रिय हिंदी पत्रिका धर्मयुग में दिए साक्षात्कार में सचिन देव बर्मन ने अपने उन दिनों के संस्मरण को बाँटते हुए लिखा था...

"जब एक वर्ष तक मैं पिताजी के पास रहा तब मैंने आसपास का सारा क्षेत्र घूम डाला। मैं मल्लाहों और कोलियों के बीच घूमता और उनसे लोकगीतों के बारे में जानकारी एकत्र करता जाता। मैं वैष्णव और फकीरों के बीच बैठता, उनसे गाने सुनता, उनके साथ हुक्का पीता। उन्हें पता भी नहीं चल पाया कि मैं एक राजकुमार हूँ। सारे नदी नाले जंगल तालाब मेरी पहचान के हो गए। उन दिनों मैंने इतने सारे गीत इकठ्ठा कर डाले कि मैं आज तक उनका उपयोग करता आ रहा हूँ पर भंडार कम ही नहीं होता। चालीस पचास वर्ष पूर्व के गीत आज भी मेरे गले से उसी सहजता से निकलते हैं।"

सो किशोरावस्था में अपने आस पास के संगीत से जुड़ने की वज़ह से सचिन दा के गले में जो सरस्वती विराजमान हुईं उसका रसपान कर आज कई दशकों बाद भी संगीतप्रेमी उसी तरह आनंदित हो रहे हैं जैसा पचास साठ साल पहले उन फिल्मों के प्रदर्शित होने पर हुए थे। तो आइए सचिन दा की करिश्माई आवाज़ के जादू में एक बार और डूबते हैं बंदिनी के इस अमर गीत के साथ...





ओ रे माँझी, ओ रे माँझी, ओ मेरे माँझी,
मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार हूँ इस पार
ओ मेरे माँझी अब की बार, ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार..

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना
गुण तो न था कोई भी अवगुण मेरे भुला देना
मुझे आज की विदा का, मर के भी रहता इंतज़ार
मेरे साजन हैं उस पार..

मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की, मैं संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल, मनमीत तेरी, हर पुकार
मेरे साजन..ओ रे माँझी...

विमल राय ने इस गीत को जिस खूबसूरती से पर्दे पर उतारा था वो भी देखने के क़ाबिल है। अगर सचिन दा के गाए इस गीत के संगीत पक्ष की ओर ध्यान दें तो पाएँगे कि पूरे गीत में बाँसुरी की मधुर तान तबले की संगत के साथ चलती रहती है। गीत की परिस्थिति के अनुसार स्टीमर के हार्न और ट्रेन की सीटी को गीत में इतने सटीक ढंग से डाला गया है कि अपने साजन से बिछुड़ रही  नायिका के मन में उठ रहा झंझावात जीवंत हो उठता है।


सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की अगली कड़ी में चर्चा होगी उनके गाए एक और बेमिसाल गीत की...

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

गुरुवार, अगस्त 29, 2013

सोना महापात्रा @ MTV Coke Studio : 'दम दम अंदर' और 'मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे...'

कोक स्टूडिओ (Coke Studio) का भारतीय संस्करण अपने तीसरे साल मे है। विगत दो सालों में अपने अग्रज पाकिस्तानी कोक स्टूडिओ की तुलना में ये फीका ही रहा है। पर अपने शैशव काल से बाहर निकलता हुआ ये कार्यक्रम हर साल कुछ ऐसी प्रस्तुतियाँ जरूर दे जाता है जिससे इसके भविष्य के प्रति और उम्मीद जगती है। इस बार मुझे अपनी चहेती पार्श्व गायिका सोना महापात्रा को इस कार्यक्रम में सुनने का बेसब्री से इंतज़ार था। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि सोना की आवाज़ की गुणवत्ता बेमिसाल है और उनकी गायिकी की विस्तृत सीमाओं का हिंदी फिल्म जगत सही ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाया है। संगीतकार राम संपत जिनसे सोना परिणय सूत्र में बँध चुकी हैं इस मामले में अपवाद जरूर हैं पर सोना को अपने हुनर के मुताबिक अन्य संगीतकारों का साथ मिलता रहे तो मेरे जैसे संगीतप्रेमी को ज्यादा खुशी होगी।

 MTV के इस कार्यक्रम में राम संपत ने सोना की आवाज़ का दो बार इस्तेमाल किया और दोनों बार नतीजा शानदार रहा। तो आइए सुनते हैं आज इन दोनों गीतों को ।

पहले गीत में ईश भक्ति का रंग सर चढ़कर बोलता है। गीत की शुरुआत होती है सामंथा एडवर्ड्स की गाई इन पंक्तियों से, जिसमें दुख और सुख दोनों परिस्थितियों में ईश्वर की अनुकंपा से गदगद भक्त के प्रेम को व्यक्त किया गया है। 

When I am weak,
You give me strength,
You give me hope,
When I am down,
In the face of darkness,
You are my guide,
You are my love,
My love divine.
Help me forgive,
When I am hurt,
Help me believe,
When I am lost,
In times of trouble,
You ease my weary mind,
You are my love,
My love divine.

सामंथा, राम सम्पत के शब्दों को पूरे हृदय से आत्मसात करती दिखती हैं। मुंबई की ये बहुमुखी प्रतिभा पश्चिमी जॉज़ संगीत के साथ साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समान रूप से दक्ष हैं। पिछले दो दशकों में वो एक संगीत शिक्षक, संयोजक और गायिका की विविध भूमिकाओं को भली भांति निभाती आयी हैं। सामंथा की गायिकी और राम संपत के खूबसूरत इंटरल्यूड् से स्थिर हुए मन को बदलती रिदम के साथ सोना की आवाज़ नई उमंग का संचार करती है। गीतकार मुन्ना धीमन अपने  शब्दों की लौ से  भक्त को तरंगित अवस्था में ले आते हैं।




दम दम अंदर बोले यार
हरदम अंदर बोले यार
यार में मैं बोलूँ ना बोलूँ
मेरे अंदर बोले यार

घर के अंदर बोले यार
घर के बाहर बोले यार
छत के ऊपर नाचे यार
मंदिर मस्जिद बोले यार

हम ने यार दी नौकरी कर ली
कर ली प्यार दी नौकरी कर ली
उसके द्वार पर जा बैठे हैं
वो खोले ना खोले द्वार
लौ लागी ऐसी लौ लागी
फिरती हूँ मैं भागी भागी
मैं तुलने को राजी राजी
कोई तराजू तौले यार...

When I am weak...

हिंदी और अंग्रेजी शब्दों के मेल कर से बना ये गीत अपने बेहतरीन संगीत संयोजन दिल को सुकून पहुँचाता है।

इसी कार्यक्रम के अंत में सोना महापात्रा  ने अमीर ख़ुसरो साहब की लिखी एक और रचना को पेश किया जिसे खुसरो साहब ने अपने गुरु निजामुद्दिन औलिया के लिए लिखा था। सोना की आवाज़ में जो उर्जा है वो अमीर खुसरों की भावनाओं और गीत के चुलबुलेपन से पूरा न्याय करती दिखती है..

मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे
घर नारी कँवारी कहे सो कहे
मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे
सोहनी सुरतिया मोहनी मुरतिया..
मैं तो हृदय के पीछे समा आई रे..
मैं तो पिया से..
खुसरो निज़ाम के बली बली जैये
मैं तो अनमोल चेली कहा आई रे

सोना इस गीत के बारे में कहती हैं
इस गीत में गिनती गिन कर ऊपर के सुरों तक पहुँचने के बजाए मैंने पूरी तरह गीत के उन्माद में अपने आप को झोंक दिया। अगर मैं ऐसा नहीं करती तो शायद गीत की भावनाओं से मेरा तारतम्य टूट जाता। 
दोनों ही गीतों में कोरस का राम संपत ने बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया है।



तो बताइए सोना महापात्रा की गायिकी से सजी जनमाष्टमी की ये भक्तिमय सुबह आपको कैसी लगी?

एक शाम मेरे नाम पर सोना महापात्रा

रविवार, अगस्त 18, 2013

'एक शाम मेरे नाम' ने जीता इंडीब्लॉगर 'Indian Blogger Awards 2013' में सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉग का खिताब !

परसों शाम को  भारतीय ब्लॉगरों के सबसे बड़े समूह  इंडीब्लॉगर ने अपने द्वारा संचालित The Indian Blogger Award 2013 की घोषणा की। अपने ब्लॉग पाठकों को बताते हुए अत्यंत हर्ष का अनुभव कर रहा हूँ कि जो प्रेम आप पिछले सात वर्ष से इस ब्लॉग को देते रहे हैं उसी प्यार की बदौलत 'एक शाम मेरे नाम' को हिंदी के सर्वश्रष्ठ ब्लॉग के पुरस्कार से नवाज़ा गया है। 



वैसे आप जरूर जानना चाहेंगे कि इंडीब्लॉगर पुरस्कारों में चुनाव का मापदंड क्या था ? इंडीब्लॉगर ने इस पुरस्कार के लिए विभिन्न श्रेणियों की घोषणा की थी। किसी ब्लॉग के लिए उसकी विषयवस्तु पर 34%, मौलिकता पर 32 % अपने पाठकों से विचार विमर्श पर 18 % और ब्लॉग को इस्तेमाल करने की सहूलियत पर 16 % अंक रखे गए थे। विभिन्न श्रेणियों में बँटे ब्लॉगों के मूल्यांकन करने के लिए अपनी अपनी विधा में महारत हासिल कर चुके इन सोलह जूरी मेम्बरान को रखा गया था। इनमें से कुछ को तो आप चेहरे से पहचानते होंगे । वैसे बाकियों के बारे में जानना हो तो यहाँ देखें। 


हिंदी ब्लागिंग के नारद युग से आज तक इसके उतार चढ़ाव का साक्षी रहा हूँ। पिछले कुछ सालों में अंग्रेजी ब्लॉगरों के साथ भी एक मंच पर भाग लेने का मौका मिला है। वैसे तो हिंदी ब्लॉगिंग ने मुझे कई अभिन्न ब्लॉगर मित्र दिए हैं पर जब पूरे हिंदी ब्लॉगर समुदाय के सामूहिक क्रियाकलापों पर नज़र दौड़ाता हूँ तो निराशा ही हाथ लगती है। ब्लॉगिंग के शुरुआती दिनों में मैंने कई ब्लॉगर मीट्स में हिस्सा लिया जहाँ भी गया वहाँ के ब्लॉगरों से मिलने की कोशिश की और सच बहुत मजा भी आया। मुंबई और दिल्ली में ब्लागरों के सानिध्य में बिताई गई वो रातें आज भी दिलो दिमाग में नक़्श हैं। पर वक़्त के साथ हिंदी ब्लागिंग के तथाकथित महामहिमों ने ऐसा माहौल रच दिया कि ब्लागिंग सम्मेलन और पुरस्कार समारोह  एक दूसरे को नीचा दिखाने के अखाड़े बन गए और नतीजन मैं अपने आपको ऐसे क्रियाकलापों से दूर करता गया। इससे उलट जब भी मैंने अंग्रेजी ब्लॉगरों के साथ किसी कार्यक्रम में हिस्सा लिया माहौल को खुला और बेहद प्रोफेशनल पाया।

हिंदी ब्लॉगिंग के प्रति मेरी आस्था शुरु से रही है और इस पुरस्कार ने उस आस्था को और मजबूत किया है। हिंदी ब्लॉगर अक्सर इस समस्या का जिक्र करते हैं कि उनके ज्यादातर पाठक हिंदी ब्लॉगर हैं। पर जहाँ तक 'एक शाम मेरे नाम' का सवाल है, इस ब्लॉग के अधिकांश पाठक हिंदी संगीत और साहित्य में रुचि रखने वाले वे पाठक हैं जिनका ब्लॉगिंग से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है।  इसीलिए ये पुरस्कार मैं सबसे पहले उन पाठकों को समर्पित करना चाहता हूँ जो हिंदी ब्लागिंग का हिस्सा ना रह कर भी बतौर ई मेल सब्सक्राइबर, फेसबुक पेज और नेटवर्क ब्लॉग के ज़रिए मेरा उत्साहवर्धन करते रहे। यकीन मानिए आप ही मेरी सच्ची शक्ति हैं, क्यूँकि मैं जानता हूँ कि आप यहाँ किसी प्रत्याशा से नहीं आते। आप यहाँ तभी आएँगे जब मैं आपको आपकी दौड़ती भागती ज़िंदगी में सुकून के कुछ पल मुहैया करा सकूँ। सच मानिए मेरी कोशिश यही रहती है कि मुझे संगीत और साहित्य से जुड़ा कुछ भी अच्छा दिखे तो उसे मैं आपको अपने तरीके से उन्हें विश्लेषित कर पेश कर सकूँ ।

'एक शाम मेरे नाम' के पाठकों की पसंद अलग अलग है कुछ लोग इसे नए संगीत के बारे में ख़बर रखने के लिए पढ़ते हैं तो कुछ को शायर और शायरी से जुड़ी प्रविष्टियों को पढ़ने में ज्यादा आनंद आता है। कुछ मुझसे पुस्तकों की चर्चा बड़े अंतराल करने की शिकायत करते हैं तो कुछ संगीत के स्वर्णिम युग के अज़ीम फ़नकारों के बारे में लिखने की दरख़ास्त करते हैं। यूँ तो मेरी कोशिश रहती है कि इन सारे विषयो के सामंजस्य बैठा कर चलूँ पर कभी समयाभाव और कभी उस विषय पर नया कुछ ना कह पाने की स्थिति में मैं उस पर कुछ लिख नहीं पाता।

इंडीब्लॉगर के आलावा मैं एक बार उन सभी प्रशंसकों का धन्यवाद देना चाहता हूँ जिन्होंने  नामंकन प्रक्रिया के दौरान इस ब्लॉग की अनुशंसा की और साथ ही अपने विचार भी दिए कि ये उन्हें ये ब्लॉग क्यूँ पसंद है? फेसबुक पर आपने जो शुभकामना संदेश लिखे हैं उनसे मै अभिभूत हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आगे भी आपकी आशाओं पर ख़रा उतरने की कोशिश करता रहूँगा। बस यूँ ही आपका साथ मिलता रहे तो ये शामें यूँ ही गुलज़ार होती रहेंगी। वैसे 'गुलज़ार' होने की बात से याद आया कि आज इस हरदिलअजीज़ शायर का 79 वाँ जन्मदिन है। तो चलते चलते उनकी ये प्यारी सी ग़ज़ल आपके सुपुर्द करता चलूँ।

कहीं तो गर्द उड़े ,या कहीं गुबार दिखे
कहीं से आता हुआ कोई शहसवार दिखे

खफा थी शाख से शायद, के जब हवा गुजरी
ज़मीन पे गिरते हुए फूल बेशुमार दिखे

रवाँ हैं फिर भी रुके है वहीं पे सदियों से
बड़े उदास दिखे जब भी आबशार दिखे

कभी तो चौंक के देखें कोई हमारी तरफ
किसी की आँख में हम को भी इंतज़ार दिखे

कोई तिलिस्मी सिफत थी जो इस हुजूम में वों
हुए जो आँख से ओझल तो बार बार दिखे

बुधवार, अगस्त 07, 2013

हरिवंशराय बच्चन और सतरंगिनी : इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

हरिवंशराय बच्चन की लिखी अनेकानेक पुस्तकों में सतरंगिनी  (Satrangini) का मेरे दिल में विशेष स्थान है। स्कूल जीवन में बच्चन जी के व्यक्तित्व के प्रति पहला आकर्षण उनकी कविता जो बीत गई वो बात गई से पैदा हुआ। स्कूल की किताबों में प्रत्येक वर्ष किसी कवि की अमूमन एक ही रचना होती थी। इसलिए हर साल जब नई 'भाषा सरिता' हाथ में होती तो ये जरूर देख लेता था कि इसमें बच्चन और दिनकर की कोई कविता है या नहीं। कॉलेज के ज़माने में बच्चन जी की कविताओं से सामना होता रहा और उनकी लिखी पसंदीदा कविताओं की सूची में जो बीत गई के बाद, नीड़ का निर्माण फिर फिर, अँधेरे का दीपक और नई झनकार  शामिल हो गयीं। बाद में पता चला कि ये सारी कविताएँ उनके काव्य संकलन सतरंगिनी का हिस्सा थीं।

बाद में जब उनकी आत्मकथा पढ़ते हुए क्या करूँ संवेदना ले कर तुम्हारी से जुड़ी घटना को पढ़ा तो इन कविताओं को उनकी पहली पत्नी श्यामा के निधन और उनकी ज़िंदगी में तेजी के आगमन से जोड़ कर देख सका। हरिवंश राय बच्चन हमेशा अपने पाठकों से उनकी रचनाओं को उनके जीवन की परिस्थिति और मनःस्थिति के आलोक में समझने की अपेक्षा रखते रहे हैं। संतरंगिनी के चौथे संस्करण की शुरुआत में अपने पाठकों से ये विनम्र निवेदन करते हुए वे कहते हैं..

आप ‘सतरंगिनी’ पढ़ने के पूर्व ‘मधुशाला’, मधुबाला’, ‘मधु कलश’ और ‘निशा निमन्त्रण’, ‘एकान्त संगीत’, ‘आकुल अन्तर’ पढ़ लें; यदि आप अधिक सचेत पाठक हों तो मैं कहूँगा कि आप मेरी ‘प्रारम्भिक रचनाएँ’ और ‘खैयाम की मधुशाला’ भी पढ़ लें। रचना-क्रम में पढ़ने से रचयिता के विकास का आभास होता चलता है, साथ ही प्रत्येक रचना उसके बाद आने वाली रचना की पूर्वपीठिका बनती जाती है और उसे ठीक समझने में सहायक सिद्ध होती हैं; यों मैं जानता हूँ कि साधारण पाठक के मन में किसी लेखक की रचनाओं को किसी विशेष क्रम में पढ़ने का आग्रह नहीं होता। मान लीजिए, ‘सतरंगिनी’ मेरी पहली रचना है जो आपके हाथों में आती है, तो आपको यह कल्पना तो करनी ही होगी कि वह जीवन की किस स्थिति, किन मनःस्थिति में है जो ऐसी कविताएँ लिख रहा है। कविताओं की साधारण समझ-बूझ के लिए इससे अधिक आवश्यक नहीं, पर उनका मर्म वही हृदयंगम कर सकेगा जो पूर्व रचनाओं की अनुभूतियों को अपनी सहानुभूति देता हुआ आएगा।

सतरंगिनी में बच्चन साहब की कुल 49 कविताएँ और एक शीर्षक गीत है। इन 49 कविताओं को पुस्तक में सात अलग रंगों में बाँटा गया है और प्रत्येक रंग में उनकी सात रचनाओं का समावेश है। 


ख़ुद बच्चन साहब के शब्दों में सतरंगिनी तम भरे, ग़म भरे बादलों में इन्द्रधनुष रचने का प्रयास है। जिन कविताओं का मैंने ऊपर जिक्र किया है वे सभी उनके जीवन में तेजी जी के रूप में फूटी आशा की किरणों की अभिव्यक्ति मात्र हैं। पर बच्चन के अनुसार ये कोई सस्ता आशावाद नहीं , इसे अपने 'अश्रु स्वेद रक्त' का मूल्य चुकाकर प्राप्त किया गया है। आज की इस प्रविष्टि में सतरंगिनी की एक और आशावादी रचना आपको पढ़ाने और सुनाने जा रहा हूँ। सुनाना इस लिए की बच्चन की कविता को बोलकर पढ़ने से दिल में जो भावनाएँ उमड़ती घुमड़ती हैं उनकी अनुभूति इतनी आनंदमयी है कि मैं उसका रस लिए बिना कविता को आप तक नहीं पहुँचाना चाहता।



इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

जमीन है न बोलती न आसमान बोलता,
जहान देखकर मुझे नहीं जबान खोलता,
        नहीं जगह कहीं जहाँ न अजनबी गिना गया,
        कहाँ-कहाँ न फिर चुका दिमाग-दिल टटोलता,
कहाँ मनुष्य है कि जो उमीद छोडकर जिया,
इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

तिमिर - समुद्र कर सकी न पार नेत्र की तरी,
विनिष्ट स्वप्न से लदी, विषाद याद से भरी,
        न कूल भुमि का मिला, न कोर भोर की मिली,
        न कट सकी, न घट सकी विरह - घिरी विभावरी,
कहाँ मनुष्य है जिसे कमी खली न प्यार की,
इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!

उजाड से लगा चुका उमीद मैं बहार की,
निदाघ से उमीद की बसंत के बयार की,
        मरुस्थली मरिचिका सुधामयी मुझे लगी,
        अंगार से लगा चुका उमीद मैं तुषार की,
कहाँ मनुष्य है जिसे न भूल शूल-सी गडी,
इसीलिए खडा रहा कि भूल तुम सुधार लो!

इसीलिए खडा रहा कि तुम मुझे पुकार लो!
पुकार लो दुलार लो, दुलार कर सुधार लो!

(निदाघ : ग्रीष्म लहरॆ लू , तिमिर : अंधकार, विषाद : दुख, शूल ‍: काँटा,  कूल : किनारा, विभावरी : रात,  तुषार : बर्फ, हिम)

इसीलिए जीवन में कभी उम्मीद ना छोड़िए, ना जाने कब कोई सदा आपको अकेलेपन के अंधकार से मुक्त कर जाए....

गुरुवार, अगस्त 01, 2013

कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े : क्या आप 'शर्मा जी' जैसा बनना नहीं चाहेंगे?

पिछले हफ्ते टीवी पर तनु वेड्स मनु दोबारा देखी। फिल्म तो ख़ैर दोबारा देखने पर भी उतनी ही मजेदार लगी जितनी पहली बार लगी थी पर 'शर्मा जी (माधवन)' का चरित्र इस बार दिल में कुछ और गहरे बैठ गया। कितनी दुत्कार, कितनी झिड़कियाँ सहते रहे पर हिम्मत नहीं हारी उन्होंने।  कोशिश करते रहे, नाकामयाबी हाथ लगी तो उसे ही समय का तकाज़ा मान कर ना केवल स्वीकार कर लिया पर अपने रकीब की सहायता करने को भी तैयार हो गए। मन के अंदर हाहाकार मचता रहा पर प्रकट रूप में अपने आप को विचलित ना होने दिया। पर शर्मा जी एकदम से दूध के धुले भी नहीं हैं वक़्त आया तो कलम देने से कन्नी काट गए।  आखिर शर्मा जी इंसान ही थे, धर्मराज युधिष्ठिर तक अश्वथामा का इतिहास भूगोल बताए बगैर उसे दुनिया जहान से टपका गए थे। अब इतना तो बनता है ना 'इसक' में ।


दिक्कत यही है कि आज कल की ज़िदगी में 'शर्मा जी' जैसे चरित्र मिलते कहाँ हैं? आज की पीढ़ी प्यार में या परीक्षा में नकारे जाने को खुशी खुशी स्वीकार करने को तैयार दिखती ही नहीं है। अब आज के अख़बार की सुर्खियाँ देखिए। प्रेम में निराशा क्या हाथ लगी  चल दिए हाथ में कुल्हाड़ी लेकर वो भी जे एन यू जैसे भद्र कॉलेज में। इंतज़ाम भी तिहरा था। कुल्हाड़ी से काम ना बना तो पिस्तौल और छुरी तो है ही।

आजकल हो क्या रहा है इस समाज को? जब मर्जी आई एसिड फेका, वो भी नहीं तो अगवा कर लिया। क्या इसे प्रेम कहेंगे ? इस समाज को जरूरत है शर्मा जी जैसी सोच की। उनके जैसे संस्कार की। नहीं तो वक़्त दूर नहीं जब प्रेम कोमल भावनाओं का प्रतीक ना रह कर घिन्न और वहशत का पर्यायी बन जाएगा।

दरअसल 'शर्मा जी' का जिक्र छेड़ने के पीछे  मेरा एक और प्रयोजन था। आपको तनु वेड्स मनु के उस खूबसूरत गीत को सुनवाने का जिसे मेरे पसंदीदा गीतकार राजशेखर ने लिखा था। लिखा क्या था 'शर्मा जी' के दिल के मनोभावों को हू बहू काग़ज़ पर उतार दिया था।

संगीतकार कृष्णा जिन्हें 'क्रस्ना' के नाम से भी जाना जाता है और राजशेखर की जोड़ी के बारे में तो आपको यहाँ बता ही चुका हूँ। सनद रहे कि ये वही राजशेखर हैं जो आजकल फिल्म 'इसक' में ऐनिया ओनिया रहे हैं यानि सब एन्ने ओन्ने कर रहे हैं। 

गीत में क्रस्ना बाँसुरी का इंटरल्यूड्स में बेहतरीन इस्तेमाल करते हैं। मोहित चौहान रूमानी गीतों को निभाने में वैसे ही माहिर माने जाते हैं पर यहाँ तो एकतरफा प्रेम के दर्द को भी वो बड़े सलीके से अपनी आवाज़ में उतार लेते हैं। 


कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े
वैसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूँढ़ ली अपनी ख़ुशी
तू जो गर हाँ कहे तो बात होगी और ही
दिल ही रखने को कभी, ऊपर-ऊपर से सही, कह दे ना हाँ
कह दे ना हाँ, यूँ ही
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

कितने दफ़े हैराँ हुआ मैं ये सोचके
उठती हैं इबादत की ख़ुशबुएँ क्यूँ मेरे इश्क़ से
जैसे ही मेरे होंठ ये छू लेते हैं तेरे नाम को
लगे कि सजदा किया कहके तुझे शबद के बोल दो
ये ख़ुदाई छोड़ के फिर आजा तू ज़मीं पे
और जा ना कहीं, तू साथ रह जा मेरे
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

कितने दफ़े मुझको लगा, तेरे साथ उड़ते हुए
आसमानी दुकानों से ढूँढ़ के पिघला दूँ मैं चाँद ये
तुम्हारे इन कानों में पहना भी दूँ बूँदे बना
फिर ये मैं सोच लूँ समझेगी तू, जो मैं न कह सका
पर डरता हूँ अभी, न ये तू पूछे कहीं, क्यूँ लाए हो ये
क्यूँ लाए हो ये, यूँ ही
कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

वैसे भी ये गीत उन सबको अच्छा लगेगा जिनमें शर्मा जी के चरित्र का अक़्स है। मुझमें तो है और आपमें?

शनिवार, जुलाई 27, 2013

मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते : क्या आपको याद हैं घनशाम वासवानी ? (Ghansham Vaswani)

घनशाम वासवानी.. अस्सी के दशक में  इस नाम को मैंने पहली बार सुना था विविध भारती के रंग तरंग कार्यक्रम में। उस ज़माने में जगजीत सिंह, पंकज उधास, अनूप जलोटा, चंदन दास और पीनाज़ मसानी की ग़ज़ल गायिकी में तूती बोलती थी। इनके आलावा जो ग़ज़ल गायक इस दशक में उभरे उन्हें श्रोताओं के सामने लाने में जगजीत सिंह का बड़ा हाथ था। तलत अजीज़ , घनशाम वासवानी, अशोक खोसला, विनोद सहगल कुछ ऐसे ही नाम हैं जो जगजीत के प्रोत्साहन से ग़जल गायिकी के सीमित क्षितिज में चमके। 

पर मैं तो आपसे बात घनशाम वासवानी की कर रहा था जिन्हें जगजीत और चित्रा ने अंतर महाविद्यालय संगीत प्रतियोगिता में पहली बार सुना था और उनकी गायिकी से खासे प्रभावित भी हुए थे। घनशाम वासवानी एक सांगीतिक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता संतू वासवानी सिंधी के जाने माने सूफ़ी गायक थे। विज्ञान में स्नातक और कानून की पढ़ाई पढ़ने वाले घनश्याम वासवानी का झुकाव शुरु से संगीत की ओर रहा। उस्ताद आफताब अहमद खाँ, पंडित अजय पोहनकर और पंडित राजाराम शु्क्ल से उन्होंने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और उसके बाद जगजीत के मार्गदर्शन में वो एक ग़ज़ल गायक बन गए।

अस्सी के ही दशक में ही जगजीत सिंह के संगीत निर्देशन में घनशाम वासवानी का एक एलबम HMV पर आया । एलबम का नाम था Jagjit Singh presents Ghansham Vaswani..। जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया था कि इसी एलबम की एक ग़ज़ल विविधभारती पर उन दिनों खूब बजा करती थी। ग़ज़ल का मतला था मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते..हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते.............। जख़्म खाने की उम्र थी सो उस ग़ज़ल के पहले श्रवण के पश्चात ही मैं घायल हो गया था। लिहाजा स्कूल की एक कॉपी में वो ग़ज़ल सहेज कर रख ली गई थी। पर वक्त के साथ पिताजी के तबादले हुए और वो कॉपी कब रद्दी वाले की भेंट चढ़ गई पता ही नहीं चला। उस ज़माने में ना कंप्यूटर था और ना ही इंटरनेट, इसलिए अपनी इस प्रिय ग़ज़ल को अपने मस्तिष्क के कोने की 'मेमोरी' में डालने के आलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। दशक बीतते गए और साथ ही ग़ज़ल के शेर होठो पर गाहे बगाहे दस्तक देते रहे।

कुछ ही दिनों पहले फेसबुक पर घनशाम वासवानी का नाम दिखा तो वो ग़ज़ल फिर से याद आ गई।  ग़ज़ल को सुना गया और खूब खूब सुना गया। आप में से जो पुराने ग़ज़ल प्रेमी होंगे उन्होंने जरूर कभी ना कभी ये ग़ज़ल सुनी होगी। इस ग़ज़ल के शायर का नाम तो मुझे नहीं मालूम पर इसके सादगी से कहे अशआरों में अपने मीत को दी जाने वाली जो मीठी उलाहनाएँ हैं वो आपका मन जीत लेती हैं। तो आइए सुनें घनशाम वासवानी की आवाज़ में ये दिलकश ग़ज़ल..



मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते?
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?

ये रात, ये तनहाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते?

है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते?

गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते

क्या आपको पता है कि जिस तरह के जगजीत के संगीत निर्देशन में घनशाम वासवानी ने ग़ज़ले गायी हैं वैसे ही घनशाम जी ने भी जगजीत सिंह की एलबम फॉरगेट मी नॉट (Forget Me Not) में अपना संगीत दिया है।

घनशाम वासवानी और उनके समकालीन गायकों को अपना हुनर दिखाने के मौके कम ही मिल पाए। ग़ज़लों की लोकप्रियता अस्सी के दशक में शीर्ष पर पहुँचने के बाद नब्बे में फिल्म संगीत के स्तर में सुधार के कारण गिरने लगी। इस दौरान वे रेडिओ और दूरदर्शन के कार्यक्रमों और देश विदेश की ग़ज़ल की महफिलो में शरीक होते रहे और ये सिलसिला आज भी बदस्तूर ज़ारी है। वैसे क्या आप नहीं जानना चाहेंगे कि साठ वर्ष की आयु में घनश्याम आजकल क्या कर रहे हैं? हाल ही में अपने एक लाइव कान्सर्ट में उन्होंने जगजीत जी की याद में हो रहे एक कार्यक्रम ये ग़जल सुनाई तो श्रोतागण खुशी से झूम उठे।  इस ग़जल को सुनने के बाद तो मुझे यही लगा कि  आज भी उनकी आवाज़ में वही आकर्षण है जो दशकों पहले होता आया था।

बरसात के इस मौसम में वासवानी जी के रससिक्त स्वरों में गाई ये ग़ज़ल आपको यक़ीनन पसंद आएगी। ज़रा सुन के तो देखिए जनाब..

चोट वो खाई है इस दिल पे कि बस अबके बरस
ग़म को भी आया मेरे दिल पे तरस, अबके बरस

उनको नादों पे भी होने लगा नग्मों का गुमाँ
किस क़दर है मेरी फ़रियाद में रस, अबके बरस

हम मसर्रत* से बहुत दूर रहे तेरे बगैर
ग़म में डूबा रहा एक एक नफ़स**, अबके बरस
*खुशी, **साँस

 
मुझसे रूठी हुई तक़दीर ये कहती है 'सबा'
फूल तो फूल हैं काँटों को तरस, अबके बरस


आशा है वे इसी तरह ग़ज़ल साधना में लीन होकर हमारे जैसे ग़ज़ल प्रेमियों को आनंदित करते रहेंगे।

सोमवार, जुलाई 15, 2013

यादें पंचम की : क्या जादू था मेरे जीवन साथी के संगीत में ? ( The magic of Pancham in 'Mere Jeewan Sathi' !)

पंचम और किशोर दा कॉलेज के ज़माने में हमारे कानों लिए वो खुराक हुआ करते थे जिसके बिना नींद हमारी आँखों से कोसों दूर भागती थी। बात नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों की है। तब कैसेट्स बेचने वाली दुकानों में अपनी पसंद के गानों की सूची ले जाने और फिर उसे एक खाली कैसेट में रिकार्ड करने का चलन शुरु ही हुआ था। किशोर कुमार की ऐसी ही एक कैसेट मैंने भी तब बनवाई थी। उस सूची में किशोर के सदाबहार नग्मों के आलावा एक ही फिल्म के तीन गाने थे।  

पंचम द्वारा संगीत निर्देशित ये फिल्म थी मेरे जीवनसाथी जिसे मैंने उस वक़्त क्या, आज तक नहीं देखा है। पर इस फिल्म के तीन गीतों दीवाना ले के आया है...., ओ मेरे दिल के चैन......... और चला जाता हूँ किसी की धुन में........ को  कॉलेज से निकलने के बाद भी मैंने इतना सुना कि वो कैसेट बुरी तरह घिस गई। आज भी जब इन गीतों को सुनता हूँ तो सोचता हूँ कि आख़िर क्या था इन गीतों में जो अपने आने के इतने दशकों बाद भी ये उसी चाव से सुने जा रहे हैं?


सत्तर का दशक पंचम का उद्भव काल था। पंचम ने इस दौरान जितनी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया उसमें ज्यादातर का संगीत सफल रहा। यहाँ तक वैसी फिल्मों का संगीत भी जो अपेक्षा के अनुरूप नहीं चल पायीं। 'मेरे जीवन साथी' इसका जीता जागता उदाहरण है। फिल्म के गाने फिल्म प्रदर्शित होने के कुछ महिने पहले से ही धूम मचाने लगे थे पर गानों ने दर्शकों को जो उम्मीद बँधाई , वो फिल्म में नज़र नहीं आई। नतीजन मेरे जीवन साथी चली नहीं पर इसके गाने चलते रहे और आज तक चल रहे हैं।

फिल्म निर्माता हरीश शाह और राजेश खन्ना ने इस फिल्म के लिए पंचम की बनाई पहली धुन अस्वीकृत कर दी थी और फिर उसके बाद पंचम ने रची ओ मेरे दिल के चैन... । इसके मुखड़े के पहले की धुन पूरे फिल्म की ट्रेडमार्क धुन बन गई और उसका इस्तेमाल अन्य गीतों में भी हुआ। फिल्मफेयर में सितंबर 1973 में छपे आलेख में वी श्रीधर ने जब इस गीत के बारे में पंचम से बात की तो उन्होंने कहा था कि
"इसकी धुन जब अचानक से दिमाग में आई तो मन बेचैन हो उठा। उद्विग्नता इतनी बढ़ गई कि चार बजे सुबह उठकर मैंने उसे गुनगुनाते हुए कैसेट रिकार्डर में टेप किया और फिर अपने संगीत कक्ष में चला गया । इस तरह गीत की पूरी धुन तैयार हुई। उसी शाम ये धुन मैंने मजरूह को थमाई और मिनटों में पूरा गीत बन कर तैयार हो गया।"



मेरे जीवन साथी का दूसरा चर्चित नग्मा दीवाना ले के आया है दिल का तराना... था। संगीत संयोजन में आपको इस गीत में ओ मेरे दिल के चैन से कई समानताएँ सुनाई देंगी। खासकर गीत के पीछे बजने वाला तालवाद्य और इंटरल्यूडस। मजरूह के लिखे इस गीत में बीते हुए कल के लिए हताशा भी है और आने वाले कल के लिए धनात्मक सोच भी। पहले अंतरे के बाद पंचम फिर अपनी सिगनेचर धुन का इस्तेमाल करते है जिसका जिक्र मैंने ऊपर भी किया है। उत्तम सिंह के बजाए वायलिन के खूबसूरत टुकड़े से ये इंटरल्यूड समाप्त होता है।



अगर लोगों की जुबाँ पर ये गाने चढ़े तो उसमें पंचम की कर्णप्रिय धुन, मजरूह के सहज सपाट बोल और किशोर की बेमिसाल आवाज़ का बड़ा हाथ था। साथ ही ऊँचे सुरों का ना इस्तेमाल होने की वजह से पंचम के इन गीतों को गुनगुनाना एक आम संगीत प्रेमी के लिए बेहद आसान रहा।

पर आज की तारीख़ में मेरे जीवन साथी के जिस गीत को मैं बारहा सुनना पसंद करता हूँ वो है किशोर कुमार का गाया चला जाता हूँ ...किसी की धुन में ..धड़कते दिल के ..तराने लिए..। कोई भी सफ़र हो, कैसी भी डगर हो जब भी मन प्रफुल्लित होता है गीत की धुन चुपचाप कब होठों पर रेंगने लगती है पता ही नहीं चलता। किसी गीत के सफल होने में संगीतकार और गीतकार का जबरदस्त योगदान होता है क्यूँकि कोई भी गीत उनके मातृत्व में ही कोख से निकल कर पल बढ़कर तैयार होता है। पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनकी सफलता की कल्पना, उन्हें हम तक पहुँचाने वाले गायकों के बिना करना मुश्किल हो जाता है। चला जाता हूँ ....को मैं ऐसे ही गीतों की श्रेणी में रखता हूँ। किशोर कुमार इस गीत में अपनी बेमिसाल यूडलिंग से मस्ती और उमंग का जो माहौल रचते हैं उससे मन तो क्या पूरा शरीर ही तरंगित हो जाता है।



आज पंचम हमारे बीच नहीं हैं पर उनके रचे संगीत की लोकप्रियता दशकों बाद भी कम नहीं हुई है। पचास और साठ का दौर हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर कहा जाता है। इस दौर में हिंदी फिल्म संगीत के महानतम संगीतकारों का काम श्रोताओं तक पहुँचा। पंचम इस दौर के आखिरी चरण में आए पर जब उनके संगीत की उनके पूर्ववर्ती संगीतकारों से तुलना करता हूँ तो जावेद अख्तर की वो बात याद आ जाती है जो उन्होंने किताब R D Burman The Man, The Music के प्राक्कथन में कही हैं..

"..पंचम के बारे में मैं क्या कहूँ? कुछ लोग एक विशेष कालखंड में सफल होते हैं। जैसे जैसे वक़्त बीतता है, तौर तरीके और शैलियाँ बदलती हैं। पुराने लोग गुजर जाते हैं या स्मृतियों के धुंधलके में खो जाते हैं। उनकी जगह नए लोग ले लेते हैं। हम सिर्फ उन लोगों को याद रख पाते हैं जो ना सिर्फ सफल हुए बल्कि जिन्होंने ऐसा कुछ अभूतपूर्व किया जिससे उनकी कला एक नए स्तर तक पहुँची और जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपने हुनर को और तराशने के लिए नई सोच मिली। पंचम ने एक नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। आज हम संगीत में जिन तकनीकी सुविधाओं को  सामान्य मानते हैं वो साठ या सत्तर के दशक में थी ही नहीं। ये पंचम की विलक्षणता ही है कि तब भी उनका संगीत ताजा और आज के युग का लगता है।.."

मंगलवार, जुलाई 09, 2013

कैसे देखते हैं गुलज़ार 'बारिश' को अपनी नज़्मों में... (Barish aur Gulzar)

बारिश का मौसम हो तो औरों को कुछ हो ना हो शायरों को बहुत कुछ हो जाता है और अगर बात गुलज़ार की हो रही हो तब तो क्या कहने ! कुछ साल पहले बारिशों के मौसम में परवीन शाकिर पर बात करते हुए उनकी उससे जुड़ी नज़्मों की चर्चा हुई थी। कुछ दिनों पहले ही एक गुलज़ार प्रेमी मित्र ने  इस ब्लॉग पर कई दिनों से उनकी नज़्मों का ज़िक्र ना होने की बात कही थी। तो मैंने सोचा क्यूँ ना बारिश के इस मौसम को इस बार गुलज़ार साहब की आँखो से देखने का प्रयास किया जाए उनकी चार अलग अलग नज़्मों के माध्यम से..


 (1)

सच पूछिए तो कुछ घंटों की बारिश से हमारे शहरों और कस्बों का हाल बेहाल हो जाता है। नालियों का काम सड़के खुद सँभाल लेती हैं। कीचड़ पानी में रोज़ आते जाते कोफ्त होने लगती है। पर जब गुलज़ार जैसा शायर इन बातों को देखता है तो इसमें से भी मन को छू जाने वाली पंक्तियाँ का सृजन कर देता है। बारिश के मौसम में साइकिल को गड्ढ़े भर पानी में उतारते वक़्त अपना संतुलन ना खोने और कपड़े मैले हो जाने के ख़ौफ के आलावा तो मुआ कोई और ख़्याल मेरे मन में नहीं आया। पर गुलज़ार की साइकिल का पहिया पानी की कुल्लियाँ भी करता है और उनकी छतरी आकाश को टेक बनाकर बारिश की टपटपाहट का आनंद भी उठाती है।

बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला
सब बजने लगते हैं

तंग गली में जाते-जाते,
साइकल का पहिया पानी की कुल्लियाँ करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं क़द भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूब के चलता है

ख़ुश्क था तो रस्ते में टिक टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप टप चलते हैं !


 (2)
गुलज़ार की इस दूसरी नज़्म में बारिश काव्य का विषय नहीं बल्कि सिर्फ एक बिंब है । एक ऐसा बिंब जिसकी मदद से वो दिल के जख्मों को कुरेदते चलते हैं। गुलज़ार की इस भीगी नज़्म को पढ़ते हुए सच में इक अफ़सोस का अहसास मन में तारी होने लगता है...



मुझे अफ़सोस है सोनां....

कि मेरी नज़्म से हो कर गुज़रते वक्त बारिश में,
परेशानी हुई तुम को ...
बड़े बेवक्त आते हैं यहाँ सावन,
मेरी नज़्मों की गलियाँ यूँ ही अक्सर भीगी रहती हैं।
कई गड्ढों में पानी जमा रहता है,
अगर पाँव पड़े तो मोच आ जाने का ख़तरा है
मुझे अफ़सोस है लेकिन...

परेशानी हुई तुम को....
कि मेरी नज़्म में कुछ रौशनी कम है
गुज़रते वक्त दहलीज़ों के पत्थर भी नहीं दिखते
कि मेरे पैरों के नाखून कितनी बार टूटे हैं...
हुई मुद्दत कि चौराहे पे अब बिजली का खम्बा भी नहीं जलता
परेशानी हुई तुम को...
मुझे अफ़सोस है सचमुच!!

 (3)
यूँ तो गर्मी से जलते दिनों के बाद बारिश की फुहार मन और तन दोनों को शीतल करती है। पर जैसा कि आपने पिछली नज़्म में देखा गुलज़ार की नज़्में बारिश को याद कर हमेशा उदासी की चादर ओढ़ लिया करती हैं। याद है ना आपको फिल्म इजाजत के लिए गुलज़ार का लिखा वो नग्मा जिसमें वो कहते हैं "छोटी सी कहानी से ,बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई, ना जाने क्यूँ दिल भर गया ....ना जाने क्यूँ आँख भर गई...."

ऐसी ही एक नज़्म  है बस एक ही सुर में ..जिसमें गुलज़ार मूसलाधार बारिश की गिरती लड़ियों को अपने हृदय में रिसते जख़्म से एकाकार पाते हैं।  देखिए तो नज़्म की पहली पंक्ति लगातार हो रही वर्षा को कितनी खूबसूरती से परिभाषित करती है..

बस एक ही सुर में, एक ही लय पे
सुबह से देख
देख कैसे बरस रहा
है उदास पानी
फुहार के मलमली दुपट्टे से
उड़ रहे हैं
तमाम मौसम टपक रहा है

पलक-पलक रिस रही है ये
कायनात सारी
हर एक शय भीग-भीग कर
देख कैसी बोझल सी हो गयी है

दिमाग की गीली-गीली सोचों से
भीगी-भीगी उदास यादें
टपक रही हैं

थके-थके से बदन में
बस धीरे-धीरे साँसों का
गरम लोबान जल रहा है...


(4)

बारिश से जुड़ी गुलज़ार की नज्मों में ये मेरी पसंदीदा है और शायद आपकी हो। इंसान बरसों के बने बनाए रिश्ते से जब निकलता है तो उससे उपजी पीड़ा असहनीय होती है। टूटे हुए दिल का खालीपन काटने को दौड़ता है। गुलज़ार की ये नज़्म वैसे ही कठिन क्षणों को अपने शब्दों में आत्मसात कर लेती है। जब भी इसे सुनता हूँ मन इस नज़्म में व्यक्त भावनाओं से निकलना अस्वीकार कर देता है। गुलज़ार की आवाज़ में खुद महसूस कीजिए इस नज़्म की विकलता को..

किसी मौसम का झोंका था....
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है
गए सावन में ये दीवारें यूँ सिली नहीं थी
न जाने इस दफा क्यूँ इनमे सीलन आ गयी है ,
दरारे पड़ गयी हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे खुश्क रुखसारों पे गीले आँसू चलते हैं

ये बारिश गुनगुनाती थी इसी छत की मुंडेरों पर
ये घर की खिडकियों के काँच पर ऊँगली से लिख जाती थी संदेशे...
बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानो के पीछे
दुपहरें ऐसी लगती हैं बिना मुहरों के खाली खाने रखे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी और न कोई चाल चलता है
ना दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झोंका था जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है


वैसे बारिश से जुड़ी गुलज़ार की लिखी और किन नज़्मों को आप पसंद करते हैं?

एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

 

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