शुक्रवार, मई 31, 2013

'उर्दू की आख़िरी किताब' : इब्ने इंशा का अनूठा व्यंग्य संग्रह (Urdu Ki Aakhri Kitaab)

पिछली बार विमल मित्र की किताब 'एक और युधिष्ठिर' के बारे में चर्चा करते हुए मैंने उसे आपको ना पढ़ने की सलाह दी थी, पर आज जिस पुस्तक की बात मैं आपसे करूँगा ना सिर्फ वो पढ़ने योग्य है बल्कि सहेज के रखने लायक भी। दरअसल इब्ने इंशा की लिखी 'उर्दू की आख़िरी किताब' की तलाश मुझे वर्षों से थी। हर साल राँची के पुस्तक मेले में जाता और खाली हाथ लौटता। ये किताब आनलाइन भी सहजता से मिल सकती है इसका गुमान ना था। पर जब अचानक ही एक दिन राजकमल प्रकाशन के जाल पृष्ठ पर ये किताब दिखी तो वहीं आर्डर किया और एक सप्ताह के अंदर किताब मेरे हाथों में थी। इससे पहले इब्ने इंशा की ग़ज़लों व गीतों से साबका पड़ चुका था पर उनके व्यंग्यों की धार का रसास्वादन करने से वंचित रह गया था।


वैसे अगर आप अभी तक इब्ने इंशा के लेखन से अपरिचित हैं तो इतना बताना लाज़िमी होगा कि भारत के जालंधर जिले में सन् 1927  में जन्मे इंशा , उर्दू के नामी शायर, व्यंग्यकार और यात्रा लेखक के रूप में जाने जाते हैं।। वैसे उनके माता पिता ने उनका नाम शेर मोहम्मद खाँ रखा था पर किशोरावस्था में ही उन्होंने अपने आप को इब्ने इंशा कहना और लिखना शुरु कर दिया। इंशा जी के लेखन की ख़ासियत उर्दू के अलावा हिंदी पर उनकी पकड़ थी। यही वज़ह है कि उनकी शायरी में हिंदी शब्दों का भी इस्तेमाल प्रचुरता से हुआ है। लुधियाना में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद इंशा जी विभाजन के बाद कराची चले गए। इस दौरान पहले आल इंडिया रेडिओ और पाकिस्तानी रेडिओ में काम किया। पाकिस्तान में पहले क़ौमी किताब घर के निदेशक और फिर यूनेस्को के प्रतिनिधि के तौर पर भी उन्होंने अपना योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने इस व्यंग्य संग्रह के अतिरिक्त भी कई किताबें लिखीं जिनमें चाँदनगर, इस बस्ती इस कूचे में और आवारागर्द की डॉयरी प्रमुख  हैं। 

'उर्दू की आख़िरी किताब' व्यंग्य लेखन का एक अद्भुत नमूना है जिसका अंदाज़े बयाँ बिल्कुल नए तरीके का है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि ये पूरी किताब एक पाठ्यपुस्तक की शैली में लिखी गई है जिसमें   इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान और नीति शिक्षा के अलग अलग पाठ हैं। इन पाठों में इंशा जी ने जो ज्ञान बाँटा है उसे पढ़कर हो सकता है आपको अपनी अब तक की शिक्षा व्यर्थ लगे। इंशा जी को भी इस बात का इल्म था इसीलिए किताब की शुरुआत में वो कहते हैं

ये किताब हमने लिख तो ली लेकिन जब छपाने का इरादा हुआ तो लोगों ने कहा, ऐसा ना हो कि कोर्स में लग जाए। बोर्ड वाले इसे मंजूर कर लें और अज़ीज़ तालिब इल्मों का ख़ूनेनाहक हमारे हिसाब में लिखा जाए, जिनसे अब मलका ए नूरजहाँ के हालात पूछे जाएँ तो मलका ए तरन्नुम नूरजहाँ के हालात बताते हैं। 

इंशा ख़ुद ही अपनी इस कृति को मज़ाहिया लहजे में बाकी की 566 कोर्स की किताबों को व्यर्थ साबित करने की ख़तरनाक कोशिश मानते हैं। इंशा जी को अंदेशा है कि इसे पढ़कर तमाम तालिब इल्म (विद्यार्थी) उस्ताद और उस्ताद तालिब इल्म बन जाएँ।

इस किताब के  अनुवादक अब्दुल बिस्मिल्लाह बखूबी इन शब्दों में इस किताब को सारगर्भित करते हैं

इंशा के व्यंग्य में जिन बातों को लेकर चिढ़ दिखाई देती है वो छोटी मोटी चीजें नहीं हैं। मसलन विभाजन, हिंदुस्तान पाकिस्तान की अवधारणा, मुस्लिम बादशाहों का शासन, आजादी का छद्म, शिक्षा व्यवस्था, थोथी नैतिकता, भ्रष्ट राजनीति आदि। अपनी सारी चिढ़ को वे बहुत गहन गंभीर ढंग से व्यंग्य में ढालते हैं ताकि पाठकों को लज़्ज़त भी मिले और लेखक की चिढ़ में वो ख़ुद को शामिल महसूस करे।

हम अंग्रेजो् से तो स्वाधीन हो गए पर बदले में हमने जिस हिंदुस्तान या पाकिस्तान की कल्पना की थी क्या हम वो पा सके ? इंशा जी इसी नाकामयाबी को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं
अंग्रेजों के ज़माने में अमीर और जागीरदार ऐश करते थे। गरीबों को कोई पूछता भी नहीं था। आज अमीर लोग ऐश नहीं करते और गरीबों को हर कोई इतना पूछता है कि वे तंग आ जाते हैं।

आज़ादी के पहले हिंदू बनिए और सरमायादार हमें लूटा करते थे। हमारी ये ख़्वाहिश थी कि ये सिलसिला ख़त्म हो और हमें मुसलमान बनिए और सेठ लूटें।

इतिहास के पूराने दौरों को इंशा की नज़र आज के परिपेक्ष्य में देखती है। अब देखिए पाषाण युग यानि पत्थर के दौर को इंशा की लेखनी किस तरीके से शब्दों में बाँधती है..
राहों में पत्थर
जलसों में पत्थर
सीनों में पत्थर
अकलों में पत्थर
.......................
पत्थर ही पत्थर
ये ज़माना पत्थर का ज़माना कहलाता है...
वहीं आज के समय के बारे में इंशा का कटाक्ष दिल पर सीधे चोट करता है। इंशा इस आख़िरी दौर को वो कुछ यूँ परिभाषित करते हैं..
पेट रोटी से खाली
जेब पैसे से खाली
बातें बसीरत (समझदारी) से खाली
वादे हक़ीकत से खाली
...............................
ये खलाई दौर (अंतरिक्ष युग, Space Age) है

इंशा जी इस उपमहाद्वीप के इतिहास को इस तरीके से उद्घाटित करते हैं कि उनके बारे में सोचने का एक नया नज़रिया उत्पन्न होता है। गणित व विज्ञान के सूत्रों को वो हमें नए तरीके से समझाते हैं। नीति शिक्षा से जुड़ी उनकी कहानियों को पढ़कर शायद ही कोई हँसते हँसते ना लोटपोट हो जाए। बहरहाल इस पोस्ट को ज्यादा लंबा ना करते हुए इस किताब के बेहद दिलचस्प पहलुओं पर ये चर्चा ज़ारी रखेंगे इस प्रविष्टि के अगले भाग में...

किताब के बारे में
प्रकाशक राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्या १५४
मूल्य   पेपरबैक मात्र साठ रुपये..


एक शाम मेरे नाम पर इब्ने इंशा

मंगलवार, मई 21, 2013

पानियों की छत पर, बूँदों के भीतर बह चलो...

पिछले साल एक फिल्म आई थी टुटिया दिल। फिल्म कब आई और कब गई ये तो पता नहीं चला पर पिछले साल RMIM पुरस्कार के लिए बतौर जूरी ये गाना जब हिंदी फिल्म संगीत प्रेमियों द्वारा नामांकित हो कर आया तो मैंने इसे पहली बार सुना। तब तक वार्षिक संगीतमाला 2012 के सारे गीत चयनित हो चुके थे इसलिए ये गीत संगीतमाला में स्थान नहीं बना पाया। पर नवोदित कलाकारों द्वारा रचा ये गीत मुझे बेहद पसंद आया था। अक्सर कम बजट की फिल्मो के ऐसे बेहतरीन गीत श्रोताओं तक पहुँच नहीं पाते। पर ये गीत इतनी काबिलियत रखता है कि इस पर चर्चा जरूरी है।

फिल्म टुटिया दिल के इस गीत को लिखा है मनोज यादव ने और इसकी धुन बनाई है गुलराज सिंह ने। जब पहली बार इस गीत को सुना तो माहौल गुलज़ारिश सा लगा।  फिर मनोज यादव के बारे में जो जानकारी अंतरजाल से हासिल हुई उससे ये तो समझ आ गया कि आख़िर इस गीत पर गुलज़ार की सी छाप क्यूँ है?

एक आम माँ बाप की तरह मनोज के माता पिता ने भी उनके डॉक्टर या इंजीनियर बनने का सपना देखा था। मनोज पढ़ाई में मन भी लगा रहे थे कि अचानक कविता लिखने का शौक़ जागृत हो गया उनके मन में। इसकी वज़ह थे गुलज़ार । मनोज तब स्कूल में थे जब उन्होंने गुलज़ार का गीत जंगल जंगल बात चली है पता चला है, चड्ढी पहन कर फूल खिला है फूल खिला है.. सुना। गुलज़ार की इस अद्भुत कल्पनाशीलता से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भी लिखना शुरु कर दिया।  

छठी सातवीं कक्षा की बात है। मनोज के स्कूल में इतिहास का पीरियड चल रहा था। इतिहास मनोज को जरा भी नहीं रुचता था तो उन्होंने  शिक्षिका को ब्लैकबोर्ड पर तन्मयता से पढ़ाते देख अपनी गीतो की कॉपी में कलम चलानी शुरु कर दी। अभी  ब्लैकबोर्ड को देखते हुए कविता की पहली पंक्ति काली रात की स्याही में..लिखी ही थी कि टीचर उनके पास आयीं और इनके गीतों  की उस कॉपी को वहीं फाड़कर रखते हुए बोलीं -अब ऐसा नहीं चलेगा। मनोज को क्रोध बहुत आया। उन्होंने टीचर से बहस की और तमतमाते हुए कक्षा के बाहर निकल गए। तभी से स्कूल में मशहूर हो गया कि एक नवोदित लेखक पैदा हो गया। वे अपने इस शौक़ की वज़ह से उपहास के भी पात्र बने पर उन्हें यह अहसास हो चुका था कि ऊपरवाले ने उन्हें यही करने के लिए भेजा है। संयोग से मनोज शंकर महादेवन के संपर्क में आए और  फिर उनके साथ पहले एयरसेल के जिंगल के लिए लिखा। फिर लक्स और ऐसे ही कई और विज्ञापनों से बढ़ता मनोज का सफ़र विश्व कप क्रिकेट के गीत दे घुमा के......तक पहुँचा और आज वो फिल्मों के गीत भी लिख रहे हैं।

मनोज की तरह उनके  मित्र गुलराज सिंह को स्कूल में ही वाद्य वादन का चस्का लग गया था। उनके माँ बाप ने उनकी इस प्रतिभा को पहचाना और उन्हें काफी प्रोत्साहित किया। जिस तरह मनोज के प्रेरणास्रोत गुलज़ार हैं वहीं गुलराज अपनी ज़िदगी में ध्वनियों के प्रति आकर्षण पैदा करने का श्रेय ए आर रहमान के फिल्म रोजा में दिए गए संगीत को देते हैं। संगीतकार लॉए को उन्हें अपना हुनर दिखाने का मौका मिला और फिर तो वो  बतौर की बोर्ड प्लेयर शंकर अहसान लॉय की टीम का हिस्सा बन गए। 

मीनल जैन, मनोज यादव, गुलराज सिंह

टुटिया दिल के इस  रूमानी नग्मे में गुलराज ने मीनल जैन और जसविंदर सिंह की जोड़ी को गायिकी के लिए चुना। ये वही मीनल हैं जो इंडियन आइडल के वर्ष 2006 के प्रथम दस प्रतिभागियों का हिस्सा बनी थीं। मीनल की आवाज़ मे उनकी उम्र से ज्यादा  परिपक्वता है। उनकी आवाज़ जब पहली बार कानों से टकराई तो ऐसा लगा मानो कविता सेठ या रेखा भारद्वाज गा रही हों। इस गीत में उनका बखूबी साथ दिया है जसविंदर सिंह ने जिन्हे लोग कैफ़ी और मैं नाटक में बतौर ग़ज़ल गायक ज्यादा जानते हैं।

गीत के लिए मनोज ने जिस शब्द विन्यास का प्रयोग किया है वो अलग हट के है। एक विशाल जलधारा की बूँद के भीतर बह कर चलने के अहसास के बारे में कभी सोचा है आपने? ऐसे कई नए नवेले से अहसासों के साथ आइए घुलते हैं इस प्यारे से गीत के साथ..


पानियों की छत पर
बूँदों के भीतर बह चलो
पलकों के तट पर
प्यार के पते पर ले चलो रे
ओ चलो चलें परछाइयाँ बाँधकर
इश्क़ के आबशारों पर
बातें सारी सी लें
प्यार सारा जी लें
बाँधे यूँ ही आँखों से आँखों को चलना
(

ख्वाहिशें पहन कर
धड़कनों में घुल कर बह चलो
चाहतों के भीतर
प्यार के सिरे पर ले चलो रे
ओ आओ चलें दुश्वारियाँ बाँधकर
इश्क़ के आबशारों* पर  
बातें सारी सी लें
प्यार सारा पी लें
बाँधे यू ही हाथों में हाथों को चलना
*झरना)

उजले उजले दिल के परों पे आ
सदियाँ सदियाँ रख ले पिरो के आ
गहरे गहरे  उतरें दिलों में  आ
छलके छलके पगले पलों में आ
सारी दोस्ती तुझे आज दे दूँ मैं आ
तेरे वास्ते ले के रास्ता चलूँ
आ चलें
राहें सारी सी लें
साथी साथ जी लें
बाँधे यू ही राहों से राहों को चलना

बुधवार, मई 15, 2013

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा : कौन हैं इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी ( Iftikhar Imam Siddiqui ) ?

फिल्म 'अर्थ' और उसका संवेदनशील संगीत तो याद  है ना आपको। बड़े मन से ये फिल्म बनाई थी महेश भट्ट ने। शबाना, स्मिता का अभिनय, जगजीत सिंह चित्रा सिंह की गाई यादगार ग़ज़लें और कैफ़ी आज़मी साहब की शायरी को भला कोई कैसे भूल सकता है। पर फिल्म अर्थ में शामिल एक ग़ज़ल के शायर का नाम शायद ही कभी फिल्म की चर्चा के साथ उठता है। ये शायर हैं इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी  ( Iftikhar Imam Siddiqui ) साहब जिनकी मन को विकल कर देने वाली ग़ज़ल तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा ..को चित्रा सिंह ने बड़ी खूबसूरती से निभाया था।


आगरा से ताल्लुक रखने वाले जाने माने शायर सीमाब अकबराबादी के पोते इफ़्तिख़ार इमाम को कविता करने का इल्म विरासत में ही मिल गया था। सीमाब अकबराबादी  ने उर्दू शायरी की पत्रिका 'शायर' (Shair) का प्रकाशन आगरा में 1930 से शुरु किया था।  सीमाब तो विभाजन के बाद पाकिस्तान यात्रा पर गए और वहीं लकवा मारे जानी की वज़ह से स्वदेश नहीं लौट पाए। सीमाब के पाकिस्तान जाने के बाद ये जिम्मेदारी इफ़्तिख़ार इमाम के पिता इज़ाज सिद्दिकी ने सँभाली और 1951 में अपने आगरा के पुश्तैनी मकान से बेदखल होने के बाद मुंबई आ गए। आज भी मध्य मुंबई के ग्रांट रोड के एक कमरे के मकान से इस पत्रिका को इफ्तिख़ार इमाम अपने भाइयों के सहयोग से बखूबी चलाते हैं। इस पत्रिका की खास बात ये है कि इसके पाठकों द्वारा भेजे गए सारे ख़तों को आज भी सुरक्षित रखा गया है

'शायर' ने कई नौजवान शायरों की आवाज़ को आम जन तक पहुँचाने का काम किया। इसमें निदा फ़ाजली जैसे मशहूर नाम भी थे। इमाम के पास आज भी वो चिट्ठियाँ मौज़ूद हैं जब निदा उनसे 'शायर' पत्रिका में अपनी कविताएँ छापने का आग्रह किया करते थे।

तो इससे पहले कि इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी के बारे में कुछ और बाते हों उनके चंद खूबसूरत रूमानी अशआरों से रूबरू हो लिया जाए। देखिए तो किस तरह एक आशिक के असमंजस को यहाँ उभारा है उन्होंने..

मैं जानता हूँ वो रखता है चाहतें कितनी
मगर ये बात उसे किस तरह बताऊँ मैं

जो चुप रहा तो समझेगा बदगुमाँ मुझे
बुरा भला ही सही कुछ तो बोल आऊँ मैं

ज़िदगी में जब तब कोई ख़्वाहिश अपने पर फड़फड़ाने लगती है। मन की ये सारी इच्छाएँ जायज नहीं होती या यूँ कहूँ तो ज्यादा बेहतर होगा कि व्यक्ति की वर्तमान परिस्थितियों के अनुकूल नहीं होतीं । पर दिल तो वो सीमाएँ लाँघने के लिए कब से तैयार बैठा है बिना उनके अंजाम की परवाह किए। इसी बात को इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी कितनी खूबसूरती से अपने शब्द देते हैं..

दिल कि मौसम के निखरने के लिए बेचैन है
जम गई है उनके होठों की घटा अपनी जगह

कर कभी तू मेरी ख़्वाहिशों का एहतराम
ख़्वाहिशों की भीड़ और उनकी सजा अपनी जगह


हम अपने लक्ष्य के पीछे  भागते हैं और वो हमारी बेसब्री पर मन ही मुस्कुराते हुए और ऊँचा हो जाता है। नतीजा वही होता है जो इफ्तिख़ार इमाम सिद्दिकी इस शेर में कह रहे हैं...

इक मुसलसल दौड़ में हैं मंजिलें और फासले
पाँव तो अपनी जगह हैं रास्ता अपनी जगह

इफ़्तिख़ार साहब जितना अच्छा लिखते हैं उतना ही वो उसे तरन्नुम में गाते भी हैं। ग़ज़ल गायिकी का उनका अंदाज़ इतना प्यारा है कि आप उनकी आवाज़ को बार बार सुनना पसंद करें। इस ग़ज़ल में उनके शब्द तो सहज है पर अपनी गायिकी से वो उसमें एक मीठा रस घोल देते हैं।

ग़म ही चाँदी है गम ही सोना है
गम नहीं तो क्या खुशी होगी

उस को सोचूँ उसी को चाहूँ मैं
मुझसे ऐसी ना बंदिगी होगी



इमाम साहब की ज़िंदगी ने तब दुखद मोड़ लिया जब वर्ष 2002 में चलती ट्रेन पर चढ़ने की कोशिश में वो गिर पड़े और उस दुर्घटना के बाद उमका कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। आज उनकी ज़िंदगी व्हीलचेयर के सहारे ही घिसटती है, फिर भी वो इसी हालत में 'शायर' के संपादन में जुटे रहते हैं।

उनकी ये ग़ज़ल जिस कातरता से अपने प्रियतम के विछोह से पैदा हुई दिल की भावनाओं को बयाँ करती है वो आँखों को नम करने के लिए काफी है। फिल्म में इस ग़ज़ल का दूसरा शेर प्रयुक्त नहीं हुआ है।

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा,
दूर तक तन्हाइयों का सिलसिला रह जाएगा

कीजिए क्या गुफ़्तगू, क्या उन से मिल कर सोचिए
दिल शिकस्ता ख़्वाहिशों का जायक़ा रह जाएगा

दर्द की सारी तहें और सारे गुज़रे हादसे
सब धुआँ हो जाएँगे इक वाक़या रह जाएगा

ये भी होगा वो मुझे दिल से भुला देगा मगर
यूँ भी होगा ख़ुद उसी में इक ख़ला रह जाएगा

दायरे इंकार के इकरार की सरग़ोशियाँ
ये अगर टूटे कभी तो फ़ासला रह जाएगा


(ख़ला : खालीपन,शून्य,  सरग़ोशियाँ : फुसफुसाहट)
तो आइए सुनते हैं इस ग़ज़ल को चित्रा जी की आवाज़ में...



इसी जज़्बे के साथ अपनी पत्रिका को वो अपना वक़्त देते रहें यही मेरी मनोकामना है। चलते चलते उनके ये अशआर आपकी नज़र करना चाहता हूँ

वो ख़्वाब था बिखर गया ख़याल था मिला नहीं
मगर ये दिल को क्या हुआ क्यूँ बुझ गया पता नहीं

हम अपने इस मिज़ाज में कहीं भी घर ना हो सके
किसी से हम मिले नहीं किसी से दिल मिला नहीं

बुधवार, मई 08, 2013

इक ये आशिक़ी है...इक वो आशिक़ी थी !

आशिक़ी 2 फिल्म और उसके गीतों के आज काफी चर्चे हैं। सोचा आज इसके गीतों को सुन लिया जाए। सुन रहा है..और कुछ हद तक तुम ही हो के आलावा फिल्म के बाकी गीत सामान्य ही लगे। हाँ ये जरूर हुआ कि जिस फिल्म की वज़ह से ये दूसरा भाग अस्तित्व में आया  है उसके गीत संगीत की इस फिल्म ने यादें ताज़ा कर दीं।

1990 में जब आशिक़ी आई थी तब मैं इंजीनियरिंग कर रहा था। फिल्म के रिलीज़ होने के पहले ही इसके संगीत ने ऐसी धूम मचा दी थी कि हॉस्टल के हर कमरे से इसका कोई ना कोई गीत बजता ही रहता था। राँची के संध्या सिनेमा हाल में फिल्म देखने के बाद फिल्म की कहानी से ज्यादा उसके गीत ही गुनगुनाए गए थे और आज भी इस फिल्म के बारे में सोचने से इसकी पटकथा नहीं पर इसके गाने जरूर याद आ जाते हैं।


आशिक़ी के गीतों की लोकप्रियता ने नदीम श्रवण की संगीतकार जोड़ी को फर्श से अर्श तक पहुँचा दिया था। अस्सी का दशक इस जोड़ी के लिए संघर्ष का समय था। छोटी मोटी फिल्में करते हुए उन्होंने उस ज़माने में ही अपनी बनाई धुनों का बड़ा जख़ीरा बना लिया था जो नब्बे के दशक में गुलशन कुमार द्वारा आशिक़ी में बड़ा ब्रेक दिए जाने के बाद खूब काम आया। आशिक़ी हिंदी फिल्म उद्योग की उन चुनिंदा फिल्मों का हिस्सा रही है जिसका हर गीत हिट रहा था। नदीम श्रवण के संगीत में कर्णप्रिय धुनों के साथ मेलोडी का अद्भुत मिश्रण था।


आज भी आशिक़ी के गीतों के मुखड़ों को याद करने के लिए दिमाग पर ज़रा भी जोर देना नहीं पड़ता। शीर्षक गीत साँसों की जरूरत हो जैसे ज़िंदगी के लिए बस इक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए या फिर नज़र के सामने जिगर के पास कोई रहता है वो हो तुम या फिर धीरे धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना धीरे धीरे से दिल को चुराना या अब तेरे बिन जी लेंगे हम जहर ज़िदगी का पी लेंगे हम  ये सारे गीत एक बार ज़ेहन में जो चढ़े वे कभी वहाँ से उतरे ही नहीं।

आशिक़ी ने बतौर संगीतकार नदीम श्रवण की जोड़ी के साथ गायक कुमार शानू और अनुराधा पोडवाल को सीधे शिखर पर पहुँचा दिया और पूरे नब्बे के दशक में इन्हीं कलाकारों की हिंदी फिल्म संगीत पर तूती बोलती रही। यहाँ तक कि गीतकार समीर का परचम भी इसी दौर में फहरा। गुलशन कमार की कंपनी टी सीरीज़ का कारोबार यूँ बढ़ा कि HMV के कदम भी डगमगाने लगे।

आशिक़ी फिल्म का मेरा सबसे प्रिय गीत वो हे जो ऊपर के गीतों की तुलना में उतना तो नहीं बजा पर मेरे दिल के बेहद करीब रहा है। मेरी समझ से इस फिल्म में कुमार शानू द्वारा गाया ये सबसे मधुर गीत था। तो आइए सुनते हैं कुमार शानू को आशिक़ी फिल्म के इस गीत में..


तू मेरी ज़िन्दगी है,तू मेरी हर खुशी है
तू ही प्यार तू ही चाहत
तू ही आशिक़ी है
तू मेरी ज़िन्दगी है....

पहली मुहब्बत का अहसास है तू
बुझ के भी बुझ न पाई, वो प्यास है तू
तू ही मेरी पहली ख्वाहिश,तू ही आखिरी है
तू मेरी ज़िन्दगी है...........

हर ज़ख्म दिल का मेरे, दिल से दुआ दे
खुशियां तुझे ग़म सारे, मुझको खुदा दे
तुझको भुला ना पाया, मेरी बेबसी है
तू मेरी ज़िन्दगी है...........

वैसे पुरानी वाली आशिक़ी का आप को कौन सा गीत सबसे पसंद है?

बुधवार, मई 01, 2013

जड़ की मुस्कान : हरिवंश राय बच्चन

ज़िंदगी की दौड़ में आगे भागने की ज़द्दोज़हद मे हमें कई सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। हर सीढ़ी पर चढ़ने में नामालूम कितने जाने अनजाने चेहरों की मदद लेनी पड़ती है। पर जब हम शिखर पर पहुँचते हैं तो कई बार उन मजबूत हाथों और अवलंबों को भूल जाते हैं जिनके सहारे हमने सफलता की पॉयदानें चढ़ी थीं।

जाने माने कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपने काव्य संग्रह 'कटती प्रतिमाओं की आवाज़' में एक बेहद सहज पर दिल को छू लेने वाली कविता लिखी थी। देखिए इंसानों की इस प्रवृति को एक पेड़ के बिंब द्वारा कितनी खूबसूरती से उभारा है बच्चन साहब ने..
 

एक दिन तूने भी कहा था,
जड़?
जड़ तो जड़ ही है,
जीवन से सदा डरी रही है,
और यही है उसका सारा इतिहास
कि ज़मीन में मुँह गड़ाए पड़ी रही है,

लेकिल मैं ज़मीन से ऊपर उठा,
बाहर निकला, बढ़ा हूँ,
मज़बूत बना हूँ,
इसी से तो तना हूँ।


एक दिन डालों ने भी कहा था,
तना?
किस बात पर है तना?
जहाँ बिठाल दिया गया था वहीं पर है बना;
प्रगतिशील जगती में तील भर नहीं डोला है,
खाया है, मोटाया है, सहलाया चोला है;
लेकिन हम तने में फूटीं,
दिशा-दिशा में गयीं
ऊपर उठीं,
नीचे आयीं
हर हवा के लिए दोल बनी, लहरायीं,
इसी से तो डाल कहलायीं।


एक दिन पत्तियों ने भी कहा था,
डाल?
डाल में क्‍या है कमाल?
माना वह झूमी, झुकी, डोली है
ध्‍वनि-प्रधान दुनिया में
एक शब्‍द भी वह कभी बोली है?
लेकिन हम हर-हर स्‍वर करतीं हैं,
मर्मर स्‍वर मर्म भरा भरती हैं
नूतन हर वर्ष हुईं,
पतझर में झर
बाहर-फूट फिर छहरती हैं,
विथकित चित पंथी का
शाप-ताप हरती हैं।


एक दिन फूलों ने भी कहा था,
पत्तियाँ?
पत्तियों ने क्‍या किया?
संख्‍या के बल पर बस डालों को छाप लिया,
डालों के बल पर ही चल चपल रही हैं;
हवाओं के बल पर ही मचल रही हैं;
लेकिन हम अपने से खुले, खिले, फूले हैं-
रंग लिए, रस लिए, पराग लिए-
हमारी यश-गंध दूर-दूर  दूर फैली है,
भ्रमरों ने आकर हमारे गुन गाए हैं,
हम पर बौराए हैं।

सबकी सुन पाई है,
जड़ मुस्करायी है!


जड़ की इस मुस्कुराहट से जनाब राहत इंदौरी का ये शेर याद आता है।

ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग बड़े हैं वो बड़े रहते है

इस चिट्ठे पर हरिवंश राय 'बच्चन' से जुड़ी कुछ अन्य प्रविष्टियाँ


  •  जड़ की मुस्कान
  • मधुशाला के लेखक क्या खुद भी मदिराप्रेमी थे ?
  • रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था प्यार तुमने...
  • मैं हूँ उनके साथ खड़ी, जो सीधी रखते अपनी रीढ़ 
  • मधुशाला की चंद रुबाईयाँ हरिवंश राय बच्चन , अमिताभ और मन्ना डे के स्वर में...
  • एक कविता जिसने हरिवंश राय 'बच्चन' और तेजी बच्चन की जिंदगी का रास्ता ही बदल दिया !
  • शुक्रवार, अप्रैल 26, 2013

    शमशाद बेगम (Shamshad Begum) 1919-2013 : कैसा रहा हिंदी फिल्म संगीत में उनका सफ़र ?

    शमशाद बेगम ये नाम आज का संगीत सुनने वालों के लिए अनजाना ही है। जाना हुआ हो भी तो कैसे ? आजकल पुराने गानों का मतलब साठ और सत्तर के दशक के गीतों से रह गया है। हद से हद पचास के दशक के गीत आप विविध भारती सरीखे सरकारी चैनलों पर सुन पाते हैं। पर जो गायिका चालिस और पचास के दशक में अपने कैरियर के सर्वोच्च शिखर पर हो उसके गीतों की झंकार आज कहाँ सुनाई देगी? अगर पिछले दशक में शमशाद बेगम का जिक़्र आया भी तो वो उनके गाए गीतों के रिमिक्स वर्जन की वज़ह से या फिर उनकी मौत की गलत अफ़वाह की वजह से। आज जब वो हमारे बीच नहीं है आइए एक नज़र डालें शमशाद आपा के सांगीतिक सफ़र पर उनके उन पाँच गीतों के साथ जिनको सुन सुन कर हम बड़े हुए और जिनकी तरावट हम आज भी गाहे बगाहे अपने होठों पर महसूस करते रहते हैं।


    1919 में पश्चिमी पंजाब के लाहौर में जन्मी शमशाद बेगम लाहौर रेडियो पर भक्ति गीत गाया करती थीं। जब वो अठारह वर्ष की थीं तब उनकी आवाज़ से प्रभावित होकर सबसे पहले पंजाबी फिल्मों के निर्देशक गुलाम हैदर ने उन्हें मौका दिया। 1941 में आई फिल्म 'ख़जाना' बतौर गायिका उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। चालिस के उत्तरार्ध में उन्होंने अपनी समकक्ष गायिकाओं ज़ोहराबाई व अमीरबाई को पीछे छोड़ दिया। हालात ये हो गए कि उन्हें तब एक गीत गाने के लिए हजार रुपये दिए जाने लगे। आज से साठ साल पहले हजार रुपये की कीमत क्या रही होगी इसका आप सहज अंदाज़ा लगा सकते हैं। शमशाद बेगम को लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ाने में संगीतकार नौशाद साहब का काफी हाथ रहा।

    नौशाद के लिए गाए उनके गीत चाँदनी आई बनके प्यार, बादल आया झूम के, धरती को आकाश पुकारे काफी लोकप्रिय हुए। पर 1950 में फिल्म 'बाबुल' के बाद नौशाद ने बतौर मुख्य गायिका शमशाद के ऊपर लता मंगेशकर को तरज़ीह देनी शुरु कर दी। शमशाद की आवाज़ में ना तो लता की मधुरता थी और ना ही उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा था। इन सीमाओं के बावज़ूद उनकी आवाज़ में खनक के साथ एक सादगी थी। यही सादगी उन्हें आम आदमी की आवाज़ बना देती थी।

    पचास के दशक में नौशाद से साथ छूटा पर एस डी बर्मन, सी रामचन्द्र और ओ पी नैयर जैसे संगीतकारों से शमशाद को काम मिलता रहा। पचास के दशक के इन्हीं गीतों को सुनना और गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद रहा है। तो आइए सुनिए मेरी पसंद का पहला नग्मा जिसके बोल लिखे थे राजेंद्र कृष्ण ने और धुन बनाई थी एस डी बर्मन साहब ने। 1951 में आई फिल्म 'बहार' के इस गीत की इन पंक्तियों को कौन भूल सकता है  सैंया दिल में आना रे, आ के फिर ना जाना रे छम छमाछम छम..

       

    राजेंद्र कृष्ण का ही लिखा हुआ एक और मजेदार युगल गीत था फिल्म 'पतंगा' (1949) का। मेरी समझ से रंगून को बहादुरशाह जफ़र के बाद किसी गीत ने मशहूर बनाया था तो वो इसी गीत ने :)। मेरे पिया गए रंगून को संगीतबद्ध करने वाले थे सी रामचन्द्र। वही रामचन्द्र जिन्हें शमशाद बेगम से हिन्दी फिल्मों का पहला पश्चिमी शैली में संगीतबद्ध किया गीत आना मेरी जान संडे के संडे   गवाने का श्रेय दिया जाता है। 



    ओ पी नैयर से लता की अनबन के बारे में तो सब जानते ही हैं। पचास के दशक में इसका फायदा शमशाद बेगम को मिला। ओ पी नैयर के लिए 1954 में आई फिल्म आर पार के लिया शमशाद जी का गीत कभी आर कभी पार लागा तीर ए नज़र........ और 

      
    1956 में CID के लिए गाया गीत कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना... खूब लोकप्रिय हुए। शमशाद बेगम की आवाज़ की शोखी इन गीतों में सिर चढ़कर बोली।  पर पचास के दशक में जहाँ लता मदनमोहन, नौशाद व सी रामचन्द्र की आवाज़ बन बैठी थीं। वहीं ओ पी नैयर भी अपने गीतों के लिए आशा जी और गीता दत्त को प्रश्रय देने लगे थे।


    इस दौरान नौशाद ने युगल गीतों में शमशाद बेगम को मौका जरूर दिया पर उन गीतों में लता ही मुख्य गायिका रहीं। मुगले आज़म की इस कव्वाली (तेरी महफिल में..) में मधुबाला वाला हिस्सा लता के हाथ आया और निगार सुल्ताना वाला शमशाद के। साठ के दशक में शमशाद बेगम ये समझ चुकी थीं कि लता की गायिकी के सामने उनकी आवाज़ को मौके देने वाले कम ही बचे हैं। 1968 में उनका आशा जी के साथ फिल्म 'किस्मत' के लिए गाया युगल गीत कज़रा मोहब्बत वाला ....उनका आखिरी लोकप्रिय गीत था।


    शमशाद बेगम ने परिवार वालों की इच्छा के विरुद्ध पन्द्रह साल की उम्र में वकील गणपत लाल से शादी की थी। पिता ने इस शर्त पर उनका गाना गाना कुबूल किया कि वो कभी बेपर्दा हो कर नहीं रहेंगी। यही वजह कि शादी के बाद अपनी गायिकी के तीन दशकों के सफ़र में उन्होंने कभी फोटो नहीं खिंचवाई। पर इसमें कोई शक़ नहीं कि उनके गाए इन अमर गीतों की बदौलत उनकी आवाज़ का चित्र हमेशा हमारे हृदयपटल पर अंकित रहेगा ।

    शुक्रवार, अप्रैल 19, 2013

    क्रिकेट,रेडियो और मेहदी हसन : देख तो दिल कि जाँ से उठता है...ये धुआँ सा कहाँ से उठता है ?

    बड़ा अज़ीब सा शीर्षक है ना। पर इस ग़ज़ल के बारे में बात करते वक़्त उससे परिचय की छोटी सी कहानी आपके सम्मुख ना रखूँ तो बात अधूरी रहेगी। बात अस्सी के दशक की  है। क्रिकेट या यूँ कहूँ उससे ज्यादा उस वक़्त मैच का आँखों देखा हाल सुनाने वाली क्रिकेट कमेंट्री का मैं दीवाना था। संसार के किसी कोने मैं मैच चल रहा हो कहीं ना कहीं से मैं कमेंट्री को ट्यून कर ही ले लेता था। बीबीसी और रेडियो आस्ट्रेलिया के शार्ट वेव (Short Wave, SW) मीटर बैंड्स जिनसे मैच का प्रसारण होता वो मुझे जुबानी कंठस्थ थे। यही वो वक़्त था जब शारजाह एक दिवसीय क्रिकेट का नया अड्डा बन गया था। दूरदर्शन और आकाशवाणी शारजाह में होने वाले इन मैचों का प्रसारण भी नहीं करते थे। ऐसे ही एक टूर्नामेंट के फाइनल में भारत व पाकिस्तान का मुकाबला था। मेरी बचपन की मित्र मंडली मुझे पूरी आशा से देख रही थी। मैंने भी मैच शुरु होने के साथ ही शार्ट वेव के सारे स्टेशन को एक बार मंथर गति से बारी बारी ट्यून करना शुरु कर दिया।

    जिन्हें रेडियो सीलोन या बीबीसी हिंदी सर्विस को सुनने की आदत रही होगी वो भली भाँति जानते होंगे कि उस ज़माने (या शायद आज भी) में शार्ट वेव के किसी स्टेशन को ट्यून करना कोई विज्ञान नहीं बल्कि एक कला हुआ करती थी। मीटर बैंड पर लाल सुई के आ जाने के बाद हाथ के हल्के तेज दबाव से फाइन ट्यूनिंग नॉब को घुमाना और साथ ही ट्राजिस्टर को उचित कोण में घुमाने की प्रक्रिया तब तक चलती रहती थी जब तक आवाज़ में स्थिरता ना आ जाए। ऐसे में किसी ने ट्रांजिस्टर हिला दिया तो सारा गुस्सा उस पर निकाला जाता था।
    मेहदी हसन व नसीम बानो चोपड़ा

    नॉब घुमाते घुमाते 25 मीटर बैंड पर अचानक ही उर्दू कमेंट्री की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी ही देर में पता लग गया कि ये कमेंट्री रेडियो पाकिस्तान से आ रही है। उसके बाद तो शारजाह में भारत के 125 रनों के जवाब में पाकिस्तान को 87 रन पर आउट करने का वाक़या हो या चेतन शर्मा की आख़िरी गेंद पर छक्का जड़ने का.... सब इसी रेडियो स्टेशन की बदौलत मुझ तक पहुँच सका था। ऐसे ही एक दिन लंच के अवकाश के वक़्त रेडियो पाकिस्तान पर आ रहे एक कार्यक्रम में ये ग़ज़ल पहली बार कानों में पड़ी थी। मेहदी हसन साहब की आवाज़ का ही असर था कि एक बार सुन कर ही ग़ज़ल की उदासी दिल में घर कर गयी थी। तब उर्दू जुबाँ से जगजीत की ग़ज़लों के माध्यम से हल्का फुल्का राब्ता हुआ था तो  मीर तकी 'मीर' की लिखी ये ग़ज़ल पूरी तरह कहाँ समझ आती पर जाने क्या असर था इस ग़ज़ल का कि उसके बाद जब भी हसन साहब की आवाज़ कानों में गूँजती...दिल धुआँ धुआँ हो उठता।



    अब जब इस ग़ज़ल का जिक्र छिड़ा है तो आइए देखें जनाब मीर तकी 'मीर' ने क्या कहना चाहा है अपनी इस ग़ज़ल में

    देख तो दिल कि जाँ से उठता है
    ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

    गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक
    शोला इक सुबह याँ से उठता है


    मतले के बारे में क्या कहना! असली शेर तो उसके बाद आता है जब मीर पूछते हैं..हमारे चारों ओर फैले आसमाँ में आख़िर ये किस की कब्र है ? जरूर कोई दिलजला रहा होगा वर्ना इस कब्र से रोज़ सुबह एक शोला ( सूरज का गोला) यूँ नहीं उठता।

    खाना-ऐ-दिल से जिनहार न जा
    कोई ऐसे मकान से उठता है

    नाला सर खेंचता है जब मेरा
    शोर एक आसमान से उठता है

    मेरे दिल से तुम हरगिज़ अलग ना होना। भला कोई अपने घर से यूँ जुदा होता है। रो रो कर की जा रही ये फ़रियाद मेरे दिल को विकल कर रही है। मुझे आसामाँ से एक आतर्नाद सा उठता महसूस हो रहा है।

    लड़ती है उस की चश्म-ऐ-शोख जहाँ
    इक आशोब वाँ से उठता है

    जब भी उस शोख़ नज़र से मेरी निगाह मिलती है दिल में इक घबराहट ...इक बेचैनी सी फैल जाती है।

    बैठने कौन दे है फिर उस को
    जो तेरे आस्तान से उठता है

    ऐ ख़ुदा जिस शख़्स से तेरा करम ही उठ गया उसे फिर कहाँ ठौर मिलती है?

    यूँ उठे आह उस गली से हम
    जैसे कोई जहाँ से उठता है

    इश्क इक 'मीर' भारी पत्थर है
    बोझ कब नातवाँ से उठता है


    मैंने तुम्हारी गली से आना जाना क्या छोड़ा, लगता है जैसे ये संसार ही मुझसे छूट गया है। सच तो ये है मीर कि इश्क़ एक ऐसा भारी पत्थर है जिसका बोझ शायद ही कभी इस कमजोर दिल से हट पाए।

    वैसे क्या आप जानते हैं कि मीर की इस ग़ज़ल का इस्तेमाल एक हिंदी फिल्म में भी किया गया है। वो फिल्म थी पाकीज़ा। पाकीज़ा में कमाल अमरोही साहब ने फिल्म के संवादों के पीछे ना कई ठुमरियाँ बल्कि ये ग़ज़ल भी डाली है। इधर मीना कुमारी फिल्म के रुपहले पर्दे पर अपने दिल का दर्द बयाँ करती हैं वहीं पीछे से ये नसीम बानो चोपड़ा की आवाज़ में ये ग़ज़ल डूबती उतराती सी बहती चलती है।



    वैसे नसीम बानो की गायिकी भी अपने आप में एक पोस्ट की हक़दार है पर वो चर्चा फिर कभी! वैसे आपका इस ग़ज़ल के बारे में क्या ख्याल है?

    रविवार, अप्रैल 07, 2013

    रद्दी का अख़बार और गुलज़ार...

    ज़रा बताइए तो अख़बार शब्द से आपके मन में कैसी भावनाएँ उठती हैं ? चाय की चुस्कियो् के साथ हर सुबह की आपकी ज़रूरत जिसके सानिध्य का आकर्षण कुछ मिनटों के साथ ही फीका पड़ जाता है। देश दुनिया से जोड़ने वाले काग़ज के इन टुकड़ों का भला कोई काव्यात्मक पहलू हो सकता है ....ये सोचते हुए भी अज़ीब सा अनुभव होता है।  पर गुलज़ार तो मामूली से मामूली वस्तुओं में भी अपनी कविता के लिए वो बिंब ढूँढ लेते है जो हमारे सामने रहकर भी हमारी सोच में नहीं आ पाती। नहीं समझे कोई बात नहीं ज़रा गुलज़ार की इस त्रिवेणी पर गौर कीजिए 

    सामने आए मेरे, देखा मुझे, बात भी की
    मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिये 

    कल का अखबार था बस देख लिया रख भी दिया..


    पर रिश्तों के बासीपन से अलग पुराने पड़ते अख़बार का भी हमारी ज़िंदगी में एक अद्भुत मोल रहा है। ज़रा सोचिए तो बचपन से आज तक इस अख़बार को हम कैसे इस्तेमाल करते आ रहे हैं? नागपुर में रहने वाले विवेक राणाडे (Vivek Ranade) , जो प्रोफेशनल ग्राफिक डिजाइनर होने के साथ साथ एक कुशल फोटोग्राफर भी हैं ने इसी थीम को ध्यान में रखते हुए कई चित्र खींचे। वैसे तो ये चित्र अपने आप में एक कहानी कहते हैं पर जब गुलज़ार उस पर अपनी बारीक सोच का कलेवर चढ़ाते हैं तो विचारों की कई कड़ियाँ मन में उभरने लगती हैं। तो आइए देखते हैं कि विवेक और गुलज़ार ने साल के बारह महिनों के लिए अख़बार के किन रूपों को इस अनोखी काव्य चित्र श्रृंखला में सजाया है ?

    ख़ुद तो पान खाने की आदत नहीं रहीं पर पान के बीड़े को अख़बार में लपेट  अतिथियों तक पहुँचाने का काम कई बार पल्ले पड़ा है ! इसीलिए तो गुलज़ार की इन पंक्तियों का मर्म समझ सकता हूँ जब वो कहते हैं...
     ख़बर तो आई थी कि होठ लाल थे उनके
    'बनारसी' था कोई दाँतों में चबाया गया



    वैसे क्या ये सही नहीं कि चूड़ियाँ भी सालों साल उन कलाइयों में सजने के पहले काग़ज के इन टुकड़ों की सोहबत में रह कर अपनी चमक बरक़रार रख पाती हैं !


    ख़बर तो सबको थी कि चूड़ियाँ थी बाहों में
    ना जाने क्या हुआ कुछ रात ही को टूट गयीं



    मुबई की लोकल ट्रेनों में सफ़र करते हुए काग़ज़ के इन टुकड़ों में परोसे गए बड़ा पाव का ज़ायका बरबस याद आता है विवेक राणाडे की इस छवि को देखकर।

    ये वादा था कोई भूखा नहीं रहेगा कहीं
    वो वादा देखा है अख़बार में लपेटा हुआ


     

    शायद ही कोई बचपन ऐसा होगा को जो बरसात में काग़ज़ की नावों और कक्षा के एक  कोने से दूसरे कोने में निशाना साध कर फेंके गए इन रॉकेटों से अछूता  रहा हो..पर इन राकेटों से बारूद नहीं शरारत भरा प्यार बरसता था। इसीलिए तो गुलज़ार कहते हैं

    असली रॉकेट थे बारूद भरा था उनमें
    ये तो बस ख़बरें हैं और अख़बारें हैं


    सोचिए तो अगर ये काग़ज़ के पुलिंदे ही ना रहें तो गर्व से फूले इन बैगों, बटुओं और जूतों के सीने क्या अपना मुँह दिखाने लायक रह पाएँगे..
    फली फूली रहें जेबें तेरी और तेरे बटवे
    इन्हीं उम्मीद की ख़बरों से हम भरते रहेंगे



    बड़ी काग़ज़ी दोस्ती है नोट के साथ वोट की..:)

    ख़बर थी नोट के साथ कुछ वोट भी चले आए
    सफेद कपड़ों में सुनते हैं 'ब्लैक मनी' भी थी


    काँच की टूटी खिड़कियाँ कबसे अपने बदले जाने की इल्तिजा कर रही हैं। पर घर के मालिक का वो रसूख तो रहा नहीं..दरकती छतें, मटमैली होती दीवारों की ही बारी नहीं आती तो इस फूटे काँच की कौन कहे। उसे तो बस अब अख़बार के इस पैबंद का ही सहारा है। गुलज़ार इस चित्र को अलग पर बेहद मज़ेदार अंदाज़ में आँकते हैं..


    ख़ुफिया मीटिंग की हवा भी ना निकलती बाहर
    इक अख़बार ने झाँका तो ख़बर आई है


    याद कीजिए बचपन में बनाए गए उन पंखों को जो हवा देते नहीं पर माँगते जरूर थे :)

    हवा से चलती है लेकिन हवा नहीं देती
    ख़बर के उड़ने से पहले भी ये ख़बर थी हमें




    किताबों की जिल्द के लिए अक़्सर मोटे काग़जों की दरकार होती। सबसे पहले पिछले सालों के कैलेंडर की सेंधमारी होती। उनके चुकने पर पत्रिकाओं के रंगीन पृष्ठ निकाले जाते। पर तब श्वेत श्याम का ज़माना था। कॉपियों का नंबर आते आते अख़बार के पन्ने ही काम में आते...

    इसी महिने में आज़ादी आई थी पढ़कर
    कई किताबों ने अख़बार ही लपेट लिए


    कई बार अख़बार के पुराने ठोंगो के अंदर की सामग्री चट कर जाने के बाद मेरी नज़रें अनायास ही उन पुरानी ख़बरों पर जा टिकती थीं। कभी कभी तो वो इतनी रोचक होतीं कि उन्हें पूरा पढ़कर ही खाली ठोंगे को ठिकाना लगाया जाता। वैसे क्या आपके साथ ऐसा नहीं हुआ ?

    धूप में रखी थी मर्तबान के अंदर
    अचार से ज़्यादा चटपटी ख़बर मिली



    बचपन में माँ की नज़र बचा काग़ज़ में आग लगाना मेरा प्रिय शगल हुआ करता था। दीपावली में अख़बार को मचोड़ कर एक सिरे पर बम की सुतली और दूसरे सिरे पर आग लगाने का उपक्रम सालों साल रोमांच पैदा करता रहा। जितना छोटा अख़बार उतनी तेज दौड़ ! कई बार तो अख़बार की गिरहों में फँसा बम अचानक से फट पड़ता जब हम उसके जलने की उम्मीद छोड़ उसका मुआयना करने उसके पास पहुँचते। 

    यूँ तो अख़बार जलने से ख़बरें जलती हैं पर कुछ ख़बरें तो दिल ही जला डालती हैं। उनका क्या !

    कुछ दिन भी सर्दियों के थे और बर्फ पड़ी थी
    ऐसे में इक ख़बर मिली तो आग लग गई

    साल के समापन का गुलज़ार का अंदाज़ निराला है
    जैसी भी गुजरी मगर साल गया यार गया
    Beach पर उड़ता हुआ वो अख़बार गया



    इस कैलेंडर पर अपनी लिखावट से अक्षरों को नया रूप दिया है अच्युत रामचन्द्र पल्लव (Achyut Palav) ने। इस पूरे कैंलेंडर को पीडीएफ फार्मेट में आप यहाँ से डाउनलोड कर सकते हैं। 

    पुनःश्च इस लेख का जिक्र  दैनिक हिंदुस्तान में भी


    सोमवार, अप्रैल 01, 2013

    और एक युधिष्ठिर : जब बिमल मित्र ने किया मुझे निराश !

    बंगाली साहित्यकारों की हिंदी में अनुदित पुस्तकें स्कूल जीवन में पढ़े गए हिंदी उपन्यास का सबसे बड़ा हिस्सा रही हैं। आशापूर्णा देवी तो मेरी सबसे पसंदीदा उपन्यासकार थीं ही,  उन दिनों मुझे बिमल मित्र, महाश्वेता देवी, समरेश बसु व वरेन गंगोपाध्याय को भी पढ़ना बुरा नहीं लगता था। बिमल मित्र की सुरसतिया, चतुरंग और मुज़रिम हाज़िर मैंने हाईस्कूल में पढ़ी थी और तब उनकी रोचक और सहज कथ्य शैली ने मुझे ख़ासा प्रभावित किया था। इसीलिए दशकों बाद जब कार्यालय की लाइब्रेरी में मुझे बिमल दा की किताब  'और एक युधिष्ठिर' दिखी तो तुरंत मैं उसे घर ले आया।


    जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि ये कथा एक ऐसे सत्यवादी प्रतुल की कहानी है जो जीवन में सत्य के मार्ग से विमुख नहीं होता और ना ही इसके लिए कोई समझौता करता है। ज़ाहिर है ऐसे में उसे अपनी पढ़ाई, नौकरी, विवाह में सब जगह कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। लेखक ने उपन्यास में इस बात को उभारना चाहा है कि एक आम मध्यमवर्गीय मानुष किस तरह समाज  में व्याप्त भ्रष्टाचार को अपने जीवन का हिस्सा मान कर समझौतावादी प्रवृति का हो गया है।

    बिमल दा ने यूँ तो अपने लंबे साहित्य सफ़र में सत्तर के करीब उपन्यास लिखे पर मेरे पहले के अनुभवों के विपरीत इस उपन्यास ने मुझे बेहद निराश किया। उपन्यास में कथा तीव्र गति से भागती है। नतीजा ये कि चरित्रों को गहराई से काग़ज़ के पन्नों पर उतारने में लेखक असफल रहते हैं। उपन्यास के अंत में प्रतुल को अपने अनाथ होने का पता चलना और फिर तेजी से बदलते घटनाक्रम में अनायास ही अपने असली पिता और माता से मिलना पुरानी फिल्मी कहानियों के क्लाइमेक्स को भी मात करता है।ऐसा लगता है मानो लेखक उपन्यास को खत्म करने की भारी हड़बड़ी में हों।

    वर्ष 2008 में विद्या विहार द्वारा  प्रकाशित इस  दो सौ रुपये मूल्य व 192 पृष्ठों की किताब को ना ही पढ़े तो बेहतर होगा। एक शाम मेरे नाम पर की गई पुस्तक चर्चाओं से जुड़ी कड़ियाँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

    मंगलवार, मार्च 26, 2013

    एक शाम मेरे नाम ने पूरे किए अपने सात साल !

    वक़्त का पहिया बिना रुके घूमता ही रहता है। आपके इस चिट्ठे ने भी आज समय के साथ चलते हुए अपनी ज़िंदगी के सात साल पूरे कर लिए हैं। सात सालों के इस सफ़र में करीब पौने छः लाख पेजलोड्स, हजार से ज्यादा ई मेल सब्सक्राइबर और उतने ही फेसबुक पृष्ठ प्रशंसक,  मुझे इस बात के प्रति आश्वस्त करते हैं कि इस ब्लॉग के माध्यम से मैं आपकी गुज़री शामों में सुकून के कुछ पल मुहैया करा सका हूँ। पिछले साल मैंने इस अवसर पर पाठकों की उन चुनिंदा टिप्पणियों को शामिल किया था जिसे मेरी लिखी प्रविष्टियों को नए आयाम मिल गए थे।

    इस साल सालगिरह के अवसर पर पेश है उन  दस प्रविष्टियों का झरोखा जिन्हें पिछले साल एक शाम मेरे नाम के पाठकों ने  ब्लॉगर द्वारा दी गई गणना के हिसाब से सबसे ज्यादा पढ़ा...

    #10.  फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको : क्या आप निराशावादी हैं?



    फिर कहीं...
    फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
    फिर कहीं  कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको
    फिर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको
    फिर कहीं ..

    यानि जीवन में घट रही तमाम धनात्मक घटनाओं को उतना ही आँकें जिनके लायक वो हैं। नहीं तो अपने सपनों के टूटने की ठेस को शायद आप बर्दाश्त ना कर पाएँ।

    ये गीत है फिल्म अनुभव का  जिसे लिखा था कपिल कुमार ने और धुन बनाई थी कनु रॉय ने। कपिल कुमार फिल्म उद्योग में एक अनजाना सा नाम हैं। कनु रॉय के साथ उन्होंने दो फिल्मों में काम किया है अनुभव और आविष्कार। पर इन कुछ गीतों में ही वो अपनी छाप छोड़ गए। यही हाल संगीतकार कनु रॉय का भी रहा। गिनी चुनी दस से भी कम फिल्मों में काम किया और जो किया भी वो सारे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बैनर तले। बाहर उनको काम ही नहीं मिल पाया। पर इन थोड़ी बहुत फिल्मों से भी अपनी जो पहचान उन्होंने बनाई वो आज भी संगीतप्रेमियों के दिल में क़ायम है।
    पर तेज़ हवाओं से मेरा ये प्रेम अकेले का थोड़े ही है। आपमें से भी कई लोगों को बहती पवन वैसे ही आनंदित करती होगी जैसा मुझे। इस मनचली हवा के प्रेमियों की बात आती है तो मन लगभग दो दशक पूर्व की स्मृतियों में खो जाता है।  बात 1994 की है तब हमारे यहाँ दिल्ली से प्रकाशित टाइम्स आफ इंडिया आया करता था। उसके संपादकीय पृष्ठ पर लेख छपा था सुरेश चोपड़ा (Suresh Chopda) का। शीर्षक था  The Wind and I। उस लेख में लिखी चोपड़ा साहब की आरंभिक पंक्तियाँ मुझे इतनी प्यारी और दिल को छूती लगी थीं कि मैंने उसे अपनी डॉयरी के पन्नों में हू बहू उतार लिया था। चोपड़ा साहब ने लिखा था

    "There is something so alive and moving in a strong wind, that one of my concept of perfect bliss is to find myself standing alone on a high cliff by the sea with a strong wind hurtling past me with full ferocity. Nothing depresses me more than a windless day, with everything still and the leaves of the trees hanging still and lifeless. Yes give me the wind any day the stronger, wilder and more ferocious the better."
    चित्र साभार

    #8.  विभाजन की विरह गाथा कहता जावेद का ख़त हुस्ना के नाम  : पीयूष मिश्रा

    पीयूष जी ने कभी हुस्ना को नहीं देखा। ना वो लाहौर के गली कूचों से वाकिफ़ हैं। पर उनका पाकिस्तान उनके दिमाग में बसता है और उसी को उन्होंने शब्दों का ये जामा पहनाया है। गीत की शुरुआत में  पीयूष द्वारा 'पहुँचे' शब्द का इस्तेमाल तुरंत उस ज़माने की याद दिला देता है जब चिट्ठियाँ इसी तरह आरंभ की जाती थीं। पुरानी यादों को पीयूष, दर्द में डूबी अपनी गहरी आवाज़ में जिस तरह हमारे साझे रिवाज़ों, त्योहारों, नग्मों के माध्यम से व्यक्त करते हैं मन अंदर से भींगता चला जाता है। जावेद की पीड़ा सिर्फ उसकी नहीं रह जाती हम सबकी हो जाती है।

    #7.  जब भी ये दिल उदास होता है : जब गीत का मुखड़ा बना एक ग़ज़ल का मतला !

    जब भी ये दिल उदास होता है
    जाने कौन आस-पास होता है

    होठ चुपचाप बोलते हों जब
    साँस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
    आँखें जब दे रही हों आवाज़ें
    ठंडी आहों में साँस जलती हो, 
    ठंडी आहों में साँस जलती हो
    जब भी ये दिल ...
    कुछ गीतों का कैनवास फिल्मों की परिधियों से कहीं दूर फैला होता है। वे कहीं भी सुने जाएँ, कभी भी गुने जाएँ वे अपने इर्द गिर्द ख़ुद वही माहौल बना देते हैं। इसीलिए परिस्थितिजन्य गीतों की तुलना में ये गीत कभी बूढ़े नहीं होते। गुलज़ार का फिल्म सीमा के लिए लिखा ये नग्मा एक ऐसा ही गीत है। ना जाने कितने करोड़ एकाकी हृदयों को इस गीत की भावनाएँ उन उदास लमहों में सुकून पहुँचा चुकी होंगी। कम से कम अगर अपनी बात करूँ तो सिर्फ और सिर्फ इस गीत का मुखड़ा लगातार गुनगुनाते हुए कितने दिन कितनी शामें यूँ ही बीती हैं उसका हिसाब नहीं।

    #6.  ख़ुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन : अमज़द इस्लाम अमज़द

     
    ख़ुद अपने लिए बैठ के सोचेंगे किसी दिन
    यूँ है के तुझे भूल के देखेंगे किसी दिन

    भटके हुए फिरते हैं कई लफ्ज़ जो दिल मैं
    दुनिया ने दिया वक्त तो लिखेंगे किसी दिन

    आपस की किसी बात का मिलता ही नहीं वक़्त
    हर बार ये कहते हैं कि बैठेंगे किसी दिन

    ऐ जान तेरी याद के बेनाम परिंदे
    शाखों पे मेरे दर्द की उतरेंगे किसी दिन

    मैं नहीं समझता कि कोई क्यूँ कविता लिखता है ये समझ पाना किसी के लिए मुमकिन है। मुझे ये भी नहीं पता कि ये आधे अधूरे वाक्यांश दिमाग में कैसे आते हैं ? क्यूँ हम शब्दों का इस तरह हेरफेर करते हैं कि वो ख़ुद बख़ुद मीटर में आ जाते हैं? पर इतना जानता हूँ कि जब लिखने का मूड मुझे पूरी तरह नियंत्रित कर लेता है और जब वो बातें मन से निकल कर क़ाग़ज के पन्नों पर तैरने लगती हैं तो मन एक अजीब से संतोष से भर उठता है। मन में जितनी ज्यादा उद्विग्नता होती है विचार उतनी ही तेजी से प्रस्फुटित होते हैं।

    #5. ज़िदगी के मेले में, ख़्वाहिशों के रेले में.. तुम से क्या कहें जानाँ, इस क़दर झमेले में

     ज़िदगी के मेले में, ख़्वाहिशों के रेले में
    तुम से क्या कहें जानाँ ,इस क़दर झमेले में

    वक़्त की रवानी1 है, बखत की गिरानी2  है
    सख़्त बेज़मीनी है, सख़्त लामकानी3 है
    हिज्र4 के समंदर में, तख्त और तख्ते की
    एक ही कहानी है...तुम को जो सुनानी है

    1. तेजी, प्रवाह,  2. भाग्य का अस्ताचल, 3. बिना मकान के, 4. विरह
     अमज़द आज भी कविता को अपनी आत्मा से मिलने का ज़रिया मानते हैं। उनके हिसाब से कविता उनके अंदर एक ऐसे हिमखंड की तरह बसी हुई है जिसकी वो कुछ ऊपरी परतें खुरच पाएँ हैं। अमज़द साहब अपनी इस साधना में अंदर तक पहुँचने के तरीके के लिए माइकल ऐंजलो से जुड़ा एक संस्मरण सुनाते हैं। माइकल से पूछा गया कि पत्थर की बेडौल आकृतियों से वो शिल्प कैसे गढ़ लेते हैं? माइकल का जवाब था पत्थरों में आकृति तो छिपी हुई ही रहती है। मैंने तो सिर्फ उसके गैर जरूरी अंशों को हटा देता हूँ

     #4. मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ : क्या था गीता दत्त की उदासी का सबब ?

    इससे पहले कि मैं इस गीत की बात करूँ, उन परिस्थितियों का जिक्र करना जरूरी है जिनसे गुजरते हुए गीता दत्त ने इन गीतों को अपनी आवाज़ दी थी। महान कलाकार अक़्सर अपनी निजी ज़िंदगी में उतने संवेदनशील और सुलझे हुए नहीं होते जितने कि वो पर्दे की दुनिया में दिखते हैं।  गीता रॉय और गुरुदत्त भी ऐसे ही पेचीदे व्यक्तित्व के मालिक थे। एक जानी मानी गायिका से इस नए नवेले निर्देशक के प्रेम और फिर 1953 में विवाह की कथा तो आप सबको मालूम होगी। गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में जिस खूबसूरती से गीता दत्त की आवाज़ का इस्तेमाल किया उससे भी हम सभी वाकिफ़ हैं।


    पर वो भी यही गुरुदत्त थे जिन्होंने शादी के बाद गीता पर अपनी बैनर की फिल्मों को छोड़ कर अन्य किसी फिल्म में गाने पर पाबंदी लगा दी। वो भी सिर्फ इस आरोप से बचने के लिए कि वो अपनी कमाई पर जीते हैं। 

    #3. पीली छतरी वाली लड़की : हिंदी, ब्राह्मणवाद और उदयप्रकाश ...

     उदयप्रकाश जी ने अपनी इस किताब में भाषायी शिक्षा से जुड़े कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण मसले उठाए है। किस तरह के छात्र इन विषयों में दाखिला लेते हैं? कैसे आध्यापकों से इनका पाला पड़ता है? अपनी पुस्तक में लेखक इस बारे में टिप्पणी करते हुए कहते हैं...
    हिंदी, उर्दू और संस्कृत ये तीन विभाग विश्वविद्यालय में ऐसे थे, जिनके होने के कारणों के बारे में किसी को ठीक ठीक पता नहीं था। यहाँ पढ़ने वाले छात्र.......उज्जड़, पिछड़े, मिसफिट, समय की सूचनाओं से कटे, दयनीय लड़के थे और वैसे ही कैरिकेचर लगते उनके आध्यापक। कोई पान खाता हुआ लगातार थूकता रहता, कोई बेशर्मी से अपनी जांघ के जोड़े खुजलाता हुआ, कोई चुटिया धारी धोती छाप रघुपतिया किसी लड़की को चिंपैजी की तरह घूरता। कैंपस के लड़के मजाक में उस विभाग को कटपीस सेंटर कहते थे।

     #2. कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो :हुसैन बंधु

    पर  कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो मैंने सबसे पहले जगजीत जी की आवाज़ में ही सुनी थी। पर जब हुसैन बंधुओं की जुगलबंदी में इसे सुना तो उसका एक अलग ही लुत्फ़ आया। डा. बशीर बद्र की ये ग़ज़ल वाकई कमाल की ग़जल है। क्या मतला लिखा है उन्होंने

    कभी यूँ भी आ मेरी आँख में, कि मेरी नज़र को ख़बर न हो
    मुझे एक रात नवाज़ दे, मगर उसके बाद सहर न हो

    सहर : सुबह

    कितना प्यारा ख़्याल है ना  किसी को चुपके से  हमेशा हमेशा के लिए अपनी आँखों में बसाने का। पर बद्र साहब का अगला शेर भी उतना ही असरदार है

    वो बड़ा रहीमो-करीम है, मुझे ये सिफ़त भी अता करे
    तुझे भूलने की दुआ करूँ तो मेरी दुआ में असर न हो

    सिफ़त :  विशेषता, गुण,    अता करे :  प्रदान करे

    अब भगवन ने ना भूलने का ही वर दे दिया तब तो उनसे ज़ुदा होने का तो मौका ही नहीं आएगा।

    #1.  मेहदी हसन के दो नायाब फिल्मी गीत : मुझे तुम नज़र से.. और इक सितम

     इस साल मेहदी हसन से जुड़े इस लेख को सबसे ज्यादा हिट्स मिले।
    मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो
    मुझे तुम कभी भी भुला ना सकोगे
    ना जाने मुझे क्यूँ यक़ीं हो चला है
    मेरे प्यार को तुम मिटा ना सकोगे
    मुझे तुम नज़र से....

    मेरी याद होगी, जिधर जाओगे तुम,
    कभी नग़मा बन के, कभी बन के आँसू
    तड़पता मुझे हर तरफ़ पाओगे तुम
    शमा जो जलायी मेरी वफ़ा ने
    बुझाना भी चाहो, बुझा ना सकोगे
    मुझे तुम नज़र से....
    आशा है उनके इस गीत की तरह ही आप इस चिट्ठे के प्रति आप सब का प्रेम यूँ ही बरक़रार रहेगा।

    बुधवार, मार्च 20, 2013

    वार्षिक संगीतमाला 2012 सरताज गीत : क्यूँ.., न हम-तुम चले टेढ़े-मेढ़े से रस्तों पे नंगे पाँव रे...

    लगभग ढाई महिनों के इस सफ़र को तय कर आज बारी है वार्षिक संगीतमाला 2012 के शिखर पर बैठे गीत से आपको रूबरू कराने। वार्षिक संगीतमाला 2012 के सरताज गीत के गायक पहली बार किसी संगीतमाला का हिस्सा बने हैं और वो भी सीधे पहली पॉयदान पर। इस गीत के गीतकार वार्षिक सगीतमालाओं में दो बार प्रथम दस में अपनी जगह बना चुके हैं पर इस साल की संगीतमाला में वो पहली बार प्रवेश कर रहे हैं और इनके साथ हैं संगीतकार  प्रीतम जो पहली बार एक शाम मेरे नाम की शीर्ष पॉयदान पर अपना कब्जा जमा रहे हैं। जी हाँ आपने ठीक पहचाना ये गीत है फिल्म बर्फी का। इसे गाया है असम के जाने माने फ़नकार अंगराग  महंता वल्द पापोन ने सुनिधि चौहान के साथ और इस गीत के बोल लिखे हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी नीलेश मिश्रा ने।

    यूँ तो इस संगीतमाला की प्रथम तीन पॉयदान पर विराजमान गीतों का मेरे दिल में विशेष स्थान रहा  है पर जब भी ये गीत बजता है मेरे को अपने साथ बहा ले जाता है एक ऐसी दुनिया में जो शायद वास्तविकता से परे है, जहाँ बस अनिश्चितता है,एक तरह का भटकाव है। पर ये तो आप भी मानेंगे कि अगर हमसफ़र का साथ मिल जाए और फुर्सत के लमहे आपकी गिरफ़्त में हों तो निरुद्देश्य अनजानी राहों पर भटकना भी भला लगता है।  नीलेश मिश्रा सरसराती हवाओं, गुनगुनाती फ़िज़ाओं, टिमटिमाती निगाहों व चमचमाती अदाओं के बीच प्रेम के निश्चल रंगों को भरते नज़र आते हैं।

      प्रीतम और नीलेश मिश्रा

    नीलेश  के इन  शब्दों पर गौर करें ना हर्फ़ खर्च करना तुम,ना हर्फ़ खर्च हम करेंगे..नज़र की सियाही से लिखेंगे तुझे हज़ार चिट्ठियाँ ..ख़ामोशी झिडकियाँ तेरे पते पे भेज देंगे। कितने खूबसूरती से इन बावरे प्रेमियों के बीच का अनुराग शब्दों में उभारा है उन्होंने।

    पर ये गीत अगर वार्षिक संगीतमाला की चोटी पर पहुँचा है तो उसकी वज़ह है पापोन की दिल को छूने वाली आवाज़ और प्रीतम की अद्भुत रिदम जो गीत सुनते ही मुझे उसे गुनगुनाने पर मजबूर कर देती है। मुखड़े के पहले की आरंभिक धुन हो या इंटरल्यूड्स प्रीतम का संगीत संयोजन मन में एक खुशनुमा अहसास पैदा करता है। प्रीतम असम के गायकों को पहले भी मौका देते रहे हैं। कुछ साल पहले ज़ुबीन गर्ग का गाया नग्मा जाने क्या चाहे मन बावरा सबका मन जीत गया था। अंगराग महंता यानि पापोन को भी मुंबई फिल्म जगत में पहला मौका प्रीतम ने  फिल्म दम मारो दम के गीत जीये क्यूँ में दिया था।

    पापोन को संगीत की विरासत अपने माता पिता से मिली है। उनके पिता असम के प्रसिद्ध लोक गायक हैं। यूँ तो पापोन दिल्ली में एक आर्किटेक्ट बनने के लिए गए थे। पर वहीं उन्हें महसूस हुआ कि वो अच्छा संगीत रच और गा भी सकते हैं। युवा वर्ग में असम का लोक संगीत लोकप्रिय बनाने के लिए उन्होंने रॉक को लोक संगीत से जोड़ने की कोशिश की।

    पापोन की आवाज़ का जादू सिर्फ मुझ पर सवार है ऐसा नहीं है। संगीतकार शान्तनु मोएत्रा का कहना है कि पापोन की आवाज़ का नयापन दिल में तरंगे पैदा करता है वही संगीतकार समीर टंडन नीचे के सुरों पर उनकी पकड़ का लोहा मानते हैं। क्यूँ ना हम तुम को जिस अंदाज़ में पापोन ने निभाया है वो माहौल में एक ऐसी अल्हड़ता और मस्ती भर देता है जिसे गीत को गुनगुनाकर ही समझा जा सकता है।

    क्यूँ.., न हम-तुम
    चले टेढ़े-मेढ़े से रस्तों पे नंगे पाँव रे
    चल., भटक ले ना बावरे
    क्यूँ., न हम तुम
    फिरे जा के अलमस्त पहचानी राहों के परे
    चल, भटक ले ना बावरे
    इन टिमटिमाती निगाहों में
    इन चमचमाती अदाओं में
    लुके हुए, छुपे हुए
    है क्या ख़याल बावरे

    क्यूँ, न हम तुम
    चले ज़िन्दगी के नशे में ही धुत सरफिरे
    चल, भटक ले ना बावरे

    क्यूँ, न हम तुम
    तलाशें बगीचों में फुरसत भरी छाँव रे
    चल भटक ले ना बावरे
    इन गुनगुनाती फिजाओं में
    इन सरसराती हवाओं में
    टुकुर-टुकुर यूँ देखे क्या
    क्या तेरा हाल बावरे

    ना लफ्ज़ खर्च करना तुम
    ना लफ्ज़ खर्च हम करेंगे
    नज़र के कंकड़ों से
    खामोशियों की खिड़कियाँ
    यूँ तोड़ेंगे मिल के मस्त बात फिर करेंगे
    ना हर्फ़ खर्च करना तुम
    ना हर्फ़ खर्च हम करेंगे
    नज़र की सियाही से लिखेंगे
    तुझे हज़ार चिट्ठियाँ
    ख़ामोशी झिडकियाँ तेरे पते पे भेज देंगे

    सुन, खनखनाती है ज़िन्दगी
    ले, हमें बुलाती है ज़िन्दगी
    जो करना है वो आज कर
    ना इसको टाल बावरे
    क्यूँ, न हम तुम...




    इसी के साथ वार्षिक संगीतमाला 2012 का ये सफ़र यहीं समाप्त होता है। इस सफ़र में साथ निभाने के लिए आप सब पाठकों का बहुत बहुत शुक्रिया !

    बुधवार, मार्च 13, 2013

    वार्षिक संगीतमाला 2012 : पुनरावलोकन (Recap)

    इससे पहले कि वार्षिक संगीतमाला 2012 के सरताज़ गीत के नाम का आपसे खुलासा करूँ एक नज़र पिछले साल के फिल्म संगीत की तरफ़। गत वर्ष करीब सौ फिल्में रिलीज़ हुई यानि हर तीसरे या चौथे दिन एक नई फिल्म! पर अगर आप मेरी वार्षिक संगीतमाला 2012 पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि इनमें से सिर्फ सोलह फिल्मों के ही गाने गीतमाला में दाखिल हो पाए। इसका मतलब ये है कि आज हालात ये हैं कि पाँच छः फिल्मो के गीत सुनने के बाद ही कोई ढंग का नग्मा सुधी श्रोता के कानों से गुजर पाता है। इतने हुनरमंद कलाकारों के रहते हुए फिल्म संगीत जगत से आम संगीतप्रेमी जनता को और बेहतर परिणाम  की उम्मीद है। 



    करीब पाँच सौ गीतों को सुनने के बाद सर्वोच्च पच्चीस की सूची तैयार करते समय अक्सर ऐसा होता है कुछ गीतों को ना चाहते हुए भी छोड़ना पड़ता है। इस साल भी तीन ऐसे गीत थे जो संगीतमाला में शामिल गीतों में आ सकते थे पर संख्या सीमा की वज़ह से दाखिल नहीं हो सके। ये गीत थे फिल्म टुटिया दिल का ले चलो, GOW-II में शारदा सिन्हा का गाया तार बिजली से पतले हमारे पिया और अग्निपथ में रूप कुमार राठौड़ का गाया औ सैयाँ। इनके आलावा GOW-II का काला रे, जन्नत२ का तेरा दीदार हुआ, चटगाँव का बोलो ना, इश्क़ज़ादे का इक डोर बँधने लगे हैं और इंग्लिश विंग्लिश का पिया बिन धाक धूक भी थोड़े अंतर से गीतमाला में प्रवेश करने से चूके।

    संगीतकारों की बात करूँ तो ये साल प्रीतम के नाम रहा। बर्फी के संगीत ने ये साबित कर दिया कि प्रीतम हमेशा 'inspired' नहीं होते और कभी कभी उनके संगीत से भी 'inspired' हुआ जा सकता है। ऐजेंट विनोद फिल्म चाहे जैसी रही हो वहाँ भी प्रीतम का दिया संगीत श्रोताओं को खूब रुचा। Cocktail के गीतों ने भी झूमने पर मजबूर किया। अमित त्रिवेदी ने भी इस साल इश्क़ज़ादे, इंग्लिश विंग्लिश और अइया के लिए कुछ खूबसूरत और कुछ झूमने वाले नग्मे दिए। अजय अतुल का अग्निपथ के लिए किया गया काम शानदार था। नवोदित संगीतकार स्नेहा खानवलकर ने GOW-I और GOW-II में जिस तरह एक बँधे बँधाए दर्रे से हटकर एक नए किस्म के संगीत और बोलों पर काम किया वो निश्चय ही प्रशंसनीय है। शंकर अहसान लॉय, सलीम सुलेमान, विशाल शेखर के लिए ये साल फीका फीका सा ही रहा।

    गायक और गायिकाओं में कुछ नई आवाज़ें कानों में सुकूनदेह तरंगे पैदा करने में कामयाब रहीं। जहाँ नंदिनी सिरकार ने जो भेजी थी दुआ और दिल मेरा मुफ्त का की अदाएगी से लोगों का दिल जीत लिया वहीं अरिजित सिंह और पापोन ने बर्फी के गीतों द्वारा अपने प्रतिभाशाली होने का सुबूत पेश कर दिया। शाल्मली  की आवाज़ परेशाँ में सराही गई तो आयुष्मान खुराना ने विकी डोनर में अपने रंग दिखा दिए। नीति मोहन भी जिया रे की वज़ह से सुर्खियों बटोरीं। पुराने धुरंधरों में सोनू निगम ने अभी मुझ में कहीं, श्रेया घोषाल ने महक भी कहानी सुनाती है और आशियाँ जैसे गीतों में अपनी मधुर गायिकी से सम्मोहित सा कर दिया। युगल गीतों में सोना महापात्रा और रवींद्र उपाध्याय की जोड़ी द्वारा फिल्म तलाश के लिए गाया नग्मा मन तेरा जो रोग है दिल को छू गया।

    इस साल के सबसे सफल गीतकारों की सूची में अमिताभ भट्टाचार्य अव्वल रहे। अग्निपथ,हीरोइन,एजेंट विनोद और अय्या के लिए उन्होंने कुछ बेहद संवेदनशील गीत लिखे वहीं दूसरी ओर साल के सबसे ज्यादा मशहूर डान्स नंबर में भी अपनी लेखनी का कमाल दिखलाकर उन्होंने अपने हरफनमौला होने का प्रमाण दिया। स्वानंद किरकिरे ने भी बर्फी और इंग्लिश विंग्लिश के लिए कुछ कमाल के गीत लिखे। बर्फी के लिए उनका लिखा हुआ साँवली सी रात हो मुझे इस साल का सबसे रूमानी गीत लगता है। गीतकार कुमार ने शंघाई और Oh My God के लिए कुछ ऐसे संवेदनशील नग्मे लिखे जिसने आँखों को नम कर दिया। इस साल उभरने वाले नए गीतकारों में वरुण ग्रोवर का नाम लिया जाना आवश्यक है। GOW की स्क्रिप्ट से जुड़कर जिस तरह उन्होंने काला रे और छीछालेदर की रचना की वो वाकई क़ाबिलेतारीफ़ है। काला रे में उनकी व्यंग्यात्मक लहजे में की गई छींटाकशी काली मिट्टी कुत्ता काला काला बिल्कुल सुरमेवाला, काला झंडा, डंडा काला, काला बटुआ पैसा काला....गीतकारों के लिए शब्द रचना के नए आयाम खोलती प्रतीत होती है। शब्दों के जादूगर गुलज़ार ने इस साल अपने प्रशंसकों को निराश ही किया वहीं जावेद साहब को तलाश के आलावा इस साल की उपलब्धियों में दिखाने के लिए शायद ही कुछ रहा।

    तो ये था पिछले साल के संगीत का लेखा जोखा.. अगली प्रविष्टि में होगा वार्षिक संगीतमाला 2012 का समापन सरताज गीत के बिगुल के साथ..

     वार्षिक संगीतमाला 2012 

     

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    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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