सोमवार, जनवरी 21, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 17 : आओ यारों आओ तुमको राह बताऊँ दिल्ली की...

हिंदी सिनेमा में बाल फिल्मों का दायरा बड़ा सीमित रहा है। हर साल रिलीज़ होने वाली फिल्मों में उनका हिस्सा पाँच फीसदी से भी कम रहता है और उसमें भी कई फिल्में बनने के बाद भी उन बच्चों की पहुँच के बाहर रहती हैं जिनके लिए वो बनाई गयी हैं। कार्टून चरित्रों को टीवी पर देखने के लिए बच्चे कितना लालायित रहते हैं ये तो जगज़ाहिर है और यही वज़ह है कि आज डिस्नी चरित्र हों या जापानी डोरेमोन या शिंगचाँग, बच्चों की पहली पसंद बने हुए हैं। हिंदी चरित्रों में 'छोटा भीम' ने विदेशी चरित्रों के बच्चों के मन पर किए गए एकाधिकार को तोड़ा जरूर है पर जातक कथाओं, पंचतंत्र और तमाम राजा रानियों की कहानियों से भरी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के लिए इस क्षेत्र में हिंदी फिल्मों और टेलीविजन को कुछ नया करने की गुंजाइश बहुत है। 

पिछले साल जंगल के चरित्रों को लेकर एक फिल्म बनी नाम था दिल्ली सफ़ारी । संयोग से पिछले महिने जब इसे टीवी पर दिखाया गया तो मैंने भी इस फिल्म को देखा और पर्यावरण को बचाने का संदेश देता हुआ इसी फिल्म का एक गीत आज विराजमान है वार्षिक संगीतमाला की सत्रहवीं पॉयदान पर।

विकास के नाम पर जंगलों की अंधाधु्ध कटाई को विषय को लेकर बनाई गयी इस फिल्म में ये गीत तब आता है जब जंगल के जानवर अपने घटते रिहाइशी इलाके के ख़िलाफ़ दिल्ली की संसद में अपनी आवाज़ बुलंद करने का फ़ैसला लेते हैं। दिल्ली की इस लंबी राह पर चलते चलते वो भटक जाते हैं पर रास्ते में पूछताछ करते हुए जो उन्हें बताया जाता है वो व्यक्त होता है इस गीत के माध्यम से।

इस गीत को लिखा है समीर ने और धुन बनाई है शंकर अहसान लॉय ने। हम किस तरह अपने आस पास की प्रकृति को नष्ट कर रहे हैं इसे गीत के हर अंतरे में बड़ी खूबी से चित्रित किया गया है। गीत को आगे बढ़ाने का ढंग मज़ेदार है। पहले गायक उस स्थिति का बयान करते हैं जिस हालत में हमारी ये भारत भूमि पहले थी। फिर एक कोरस उभरता है नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं, नहीं भाई नहीं। फिर आज की स्थिति बताई जाती है। बच्चों को अपने आस पास के वातावरण को बचाए रखने के प्रति सजग रखने के लिए ये सुरीला अंदाज़ बेहद प्रभावशाली बन पड़ा है।

इस गीत को गाया है मँहगाई डायन खावत जात है.. को गाने वाले रघुवीर यादव ने। जिस तरह किसी नाटक में कोई सूत्रधार गा गा कर कहानी को आगे बढ़ाता है वैसे ही रघुवीर यहाँ दिल्ली के रास्ते का बखान करते जंगली जानवारों को आगे का रास्ता दिखाते हैं। इंसानों पर समीर के मारक व्यंग्यों के साथ रघुवीर की आवाज़ खूब फबती है। गीत की शुरुआत से अंत तक शंकर अहसॉन लाय घड़े जैसे ताल वाद्यों के साथ एक द्रुत लय रचते हैं जिसे सुनते सुनते रघुवीर के साथ सुर में सुर मिलानी की इच्छा बलवती हो जाती है।

तो आइए गीत के बोलों को पढ़ते हुए सुनिए ये शानदार गीत
धड़क धड़क धड़क धड़क..,धड़क धड़क धड़क धड़क..
आओ यारों आओ तुमको राह बताऊँ दिल्ली की
जाओ यहाँ से सीधा जाओ, हिम्मत रखो मत घबराओ
हरियाली का डेरा होगा, जंगल यहाँ घनेरा होगा

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं.....
हरे भरे इस जंगल की इंसानों ने मारी रेड़
काट दिया सारे जंगल को छोड़ दिया इक सूखा पेड़

वहाँ से फिर तुम आगे जाना, हुआ जो उसपे ना पछताना
बहती हुई लहरों का जहाँ, मिलेगी तुमको नदी वहाँ

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं
अरे नदी जहाँ पर कल बहती थी आज वहाँ पर नाला है
मत पूछो इंसानों ने हाल उसका क्या कर डाला है

थोड़ी दूरी तुम तय करना, बस इंसानों से तुम डरना
खेतों की दुनिया सुनसान वहाँ पे होगा रेगिस्तान

नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं नहीं भाई नहीं
खो गई बंजारों की टोली रहे ना वो मस्ताने हीर
खेतों की वो सुंदर हील गई हाइवे में तब्दील

सबकी दुआ रंग लाएगी संसद वहाँ से दिख जाएगी
संसद में खामोश ना रहना, इंसानों से बस ये कहना

सुनो सुनो वहशी इंसानों सुनो सुनो वहशी इंसानों
अब तो इसका कहना मानो
क़ुदरत ये कहती है हर दम, हमसे तुम हो और तुमसे हम
हमको अगर मिटाओगे तो ख़ुद भी मिट जाओगे।



तो आपसे ये गुजारिश है कि इस गीत को ख़ुद तो सुने ही पर अपने बच्चों को जरूर सुनवाएँ । बहुत बार हमारी और आपकी कही बात से ज्यादा असर ये गीत डाल सकते हैं ...

शुक्रवार, जनवरी 18, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 18 : ख़्वाहिशों का चेहरा क्यूँ धुंधला सा लगता है ?

वार्षिक संगीतमाला की 18 वीं पॉयदान पर इस गीतमाला में आखिरी बार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है सलीम सुलेमान की जोड़ी। जोड़ी ब्रेकर और हीरोइन के अधिकांश गीतों में वो कोई नया कमाल नहीं दिखा सके। उनके कई गीतों में उनकी पुरानी धुनों की झलक भी मिलती रही। अगर हीरोइन का ये दूसरा गीत इस गीतमाला में दाखिला ले रहा है तो इसकी वज़ह सलीम सुलेमान का संगीत नहीं बल्कि गीतकार और पटकथा लेखक निरंजन अयंगार के बोल हैं।

फैशन या कुर्बान के गीतों को याद करें तो आपको पियानों पर  इन दोनों भाइयों की पकड़ का अंदाजा हो जाएगा।  हीरोइन फिल्म का ये गीत भी पियानों की मधुर धुन से शुरु होता है। पर जैसे ही पौने दो मिनटों बाद इंटरल्यूड में संगीत सॉफ्ट रॉक का स्वरूप ले लेता है गीत का आनंद आधा रह जाता है।

पर सलीम सुलेमान जहाँ चूकते हैं उसके बाद भी निरंजन अयंगार के शब्द अपनी मजबूती बनाए रखते हैं। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में शामिल होने वाला निरंजन का ये तीसरा गीत है। वार्षिक संगीतमाला 2010 में My Name is Khan के दो गीत सजदा.... और नूर ए ख़ुदा... शामिल हुए थे और तभी मैंने इस तमिल मूल के लेखक की गीतकार बनने की कहानी आपसे बाँटी थी। हीरोइन फिल्म के इस गीत में कमाल की काव्यात्मकता है।इसलिए गीत के बोल पढ़ते हुए भी गीतकार की लेखनी को दाद देने को जी चाहता है। अपनी तारीफ़ पर वो कुछ ऐसी प्रतिक्रिया देते हैं
मुझे अच्छा लगता है जब लोग मेरा काम सराहते हैं। पर एक मँजा हुआ गीतकार समझे जाने के लिए मुझे अभी ढेर सारा काम करना है। जब हम गुलज़ार साहब के कृतित्व पर टिप्पणी करते हैं तो हमारे ज़ेहन में उनका वर्षों से किया गया अच्छा काम रहता है। मैं अपनी एक सफलता से खुश नहीं होना चाहता और ना ही किसी एक विफलता से निराश।
निरंजन का ये गीत हमारी उस मानसिकता की पड़ताल करता है जो हमें अपनी इच्छाओ का दास बना देती है। एक चाह पूरी हुई कि दूसरी ने डेरा डाल दिया। उनको पूरा करने की सनक कब हमारी छोटी छोटी खुशियों , हमारे बने बनाए रिश्तों को डस लेती हैं इसका हमें पता ही नहीं चलता। इसलिए निरंजन गीत में कहते हैं

ख़्वाहिशों का चेहरा क्यूँ धुंधला सा लगता है
क्यूँ अनगिनत ख़्वाहिशें हैं
ख़्वाहिशों का पहरा क्यूँ, ठहरा सा लगता है
क्यूँ ये गलत ख़्वाहिशें हैं

हर मोड़ पर, फिर से मुड़ जाती हैं
खिलते हुए, पल में मुरझाती हैं
हैं बेशरम, फिर भी शर्माती हैं ख़्वाहिशें

ज़िंदगी को धीरे धीरे डसती हैं ख़्वाहिशें
आँसू को पीते पीते हँसती हैं ख़्वाहिशें
उलझी हुई कशमकश में उमर कट जाती है


निरंजन हमें आगाह करते हैं कि ख़्वाहिशों के इस भँवर में फँसे इंसान की नियति उसी भँवर में डूबने की होती है। खुशियों की चकाचौंध में आँखें मिचमिचाने से क्या ये अच्छा नहीं कि उसकी एक हल्की किरण की गुनगुनाहट का हम आनंद लें ?

आँखें मिच जाएँ जो उजालों में
किस काम की ऐसी रोशनी
भटका के ना लाए जो किनारों पे
किस काम की ऐसी कश्ती

आँधी है, धीरे से हिलाती है
वादा कर धोखा दे जाती है
मुँह फेर के, हँस के चिढ़ाती हैं ख़्वाहिशें

ज़िंदगी को धीरे धीरे डसती हैं ख़्वाहिशें


इस गीत को  गाया है श्रेया घोषाल ने। इस में कोई दो राय नहीं कि नीचे और ऊँचे सुरों में भी वो गीत के शब्दों की गरिमा के साथ पूरी तरह न्याय करती हैं। तो आइए श्रेया की आवाज़ के साथ डूबते हैं हम ख़्वाहिशों के इस समर में...

रविवार, जनवरी 13, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 19 : बरगद के पेड़ों पे शाखें पुरानी पत्ते नये थे हाँ...

वार्षिक संगीतमालाओं में पीयूष मिश्रा की अद्भुत सांगीतिक प्रतिभा से मेरा सबसे पहले परिचय हुआ था गुलाल में उनके लिखे और संगीतबद्ध गीतों से। पर चुनिंदा फिल्मों में काम करने वाले पीयूष की झोली से पिछले साल संगीतप्रेमियों को कुछ हाथ नहीं लगा था। पर इस साल सबसे पहले GOW में दिखने वाले पीयूष ने बाल फिल्म जलपरी में भी एक गीत लिखा, गाया और संगीतबद्ध किया था। अब इस फिल्म का नाम आपने सुना होगा इसकी उम्मीद कम ही है क्यूँकि साल में बहुत सी फिल्में बिना किसी मार्केटिंग के कब आती और कब चली जाती हैं ये पता ही नहीं लगता। I am Kalam से चर्चा में आए इस फिल्म के निर्देशक नील माधव पंडा की भ्रूण हत्या पर आधारित ये फिल्म  पिछले साल अगस्त में प्रदर्शित हुई थी। 


पीयूष मिश्रा के लिखे गीतों की विशेषता है कि वो अपनी ठहरी हुई गंभीर आवाज़ और अर्थपूर्ण शब्दों से आपको एक अलग मूड में ले जाते हैं।  गीत ख़त्म होने के बाद भी गीत में व्यक्त भावनाएँ जल्दी से आपका पीछा नहीं छोड़तीं।  इस गीत में पीयूष हमें अपने बचपन में ले जाते हैं। बचपन की बातों से ख़ुद को जोड़ते गीतों के बारे में जब सोचता हूँ तो एक गीत और एक नज़्म तुरंत दिमाग में आती है। याद है ना आशा जी का गाया वो गीत बचपन के दिन भी क्या दिन थे उड़ते फिरते तितली बन के और फिर जगजीत व चित्रा सिंह की गाई उस कालजयी नज़्म  को कौन भूल सकता है...

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन
वो काग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी


पीयूष जी का ये गीत भी जगजीत की उस नज़्म और बहुत कुछ उन्हीं भावनाओं को पुनर्जीवित करता है। आपको याद होगा कि कितनी खूबसूरती से उस नज़्म में कहानी सुनाने वाली बूढ़ी नानी और बचपन में खेले जाने वाले खेलों चिड़िया, तितली पकड़ना, झूले झूलना, गुड़िया की शादी आदि का जिक्र हुआ है। इस गीत में भी पीयूष बीते समय की छोटी सुनहरी यादों को हमसे बाँटते हुए उसी अंदाज़ में युवावस्था से वापस अपने बचपन में लौट जाने की बात करते हैं

बरगद के पेड़ों पे शाखें पुरानी पत्ते नये थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ
लाओ बचपन दोबारा, नदिया का बहता किनारा
मक्के की रोटी, गुड़ की सेवैयाँ,
अम्मा का चूल्हा, पीपल की छैयाँ
दे दूँ कसम से पूरी जवानी, पूरी जवानी हाँ

पनघट पे कैसे इशारे, खेतों की मड़िया किनारे
ताऊ की उठती गिरती चिलम को, हैरत से देखे थे सारे
हाए..गुल्ली के डंडे की बाते, गाँव में धंधे की बातें
बस यूँ गुटर गूँ इक मैं कि इक तू
यूँ ही गुजरती थी रातें
...

ग्रामीण पृष्ठभूमि में लिखा ये गीत गाँव की उन छोटी छोटी खुशियाँ को क़ैद करता है जिनसे आज का शहरी बचपन महरूम है। बरगद का पेड़ हो या पीपल की छैयाँ, अम्मा का चूल्हा हो या खेतों की मड़िया, बेमकसद की गुटरगूँ में गुजरते वो इफ़रात फुर्सत के लमहे हों या फिरताऊ की चिलम से उठता धुआँ,  इन सारे बिम्बों से पीयूष एक माहौल रचते चले जाते हैं। जिन श्रोताओं का बचपन गाँव - कस्बों में गुजरा हो उन्हें इस गीत से जुड़ने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। गीत के आखिरी अंतरे में बचपन के अनायास ही खो जाने का दर्द फूट पड़ता है। पीयूष अपने इस गीत के बारे में कहते हैं "बरगद के बोल मेरे दिल की आवाज़ हैं जो मुझे अपनी पुरानी यादों तक खींच ले जाते हैं।"

देखो इन्ही गलियों में वो खोया था हमने
यादों के सीने में थोड़े पिघल के जम से गए थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ

यादों में है कैसा कभी आया था बचपन
कैसे कहूँ मेरा कभी साया था बचपन
इनके कदम खिल खिल हँसी लाया था बचपन
जाने को था फिर भी मुझे भाया था बचपन
भोली जुबाँ के नग्मे, भोले से मन के सपने 
लोरी बने थे...
रुकने की ख़्वाहिश बड़ी थी लेकिन गुजर से गए थे हाँ
वो दिन तो चलते हुए थे मगर फिर थम से गए थे हाँ
लाओ बचपन दोबारा, नदिया का बहता किनारा...

बरगद के पेड़ों पे...

ये एक ऐसा गीत है जो धीरे धीरे आपके दिल में जगह बनाता है तो आइए सुनते हैं इस संवेदनशील नग्मे को..


गीत का वीडिओ देखना चाहें तो ये रहा... 

गुरुवार, जनवरी 10, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 20 : कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ...

वार्षिक संगीतमाला की पॉयदान संख्या 20 पर पहली बार इस साल दाखिल हो रही है संगीतकार सलीम सुलेमान और इरशाद कामिल की जोड़ी, फिल्म जोड़ी ब्रेकर के इस गीत के साथ। इरशाद कामिल रूमानी गीतों में हमेशा से अपना हुनर दिखाते आए हैं और ये गीत भी उसकी एक मिसाल है। प्रेमानुभूति की गहनता कवि हृदयों को नए नए तरीके से अपनी बात कहने का अवसर देती रही है। यही वज़ह है कि दशकों से ऍसे गीतों को सुनते रहने के बावज़ूद भी हर साल हमें कुछ ऐसे गीत सुनने को मिल ही जाते हैं जिनकी काव्यात्मकता दिल को छू जाती है। 


प्रेम में रिश्ते बनते हैं, पलते हैं, प्रगाढ़ होते हैं और फिर टूट भी जाते हैं। पर रिश्तों को तोड़ना किसी के लिए आसान नहीं होता। बरसों लगते हैं उन साझी यादों को मिटाने के लिए। जो मंजिलें साथ साथ चल कर सामने दिखती थीं वो एकदम से आँखों से ओझल हो जाती हैं और हम भटकने लगते हैं मन के बियावान जंगलों में निरुद्देश्य..... दिशाविहीन.....

इरशाद क़ामिल इन्ही भावनाओं को अपने बोलों में खूबसूरती से उतारते हैं।.सलीम सुलेमान का संगीत तो मधुर है पर एक Déjà vu का सा आभास देता है। गीत के पार्श्व में गिटार और तबले की संगत अंत तक चलती है। प्रीतम और विशाल शेखर की हिंदी अंग्रेजी मिश्रित शैली को यहाँ सलीम सुलेमान भी कुशलता से अपनाते नज़र आते हैं। तो आइए सुनें शफक़त अमानत अली खाँ की आवाज़ में ये गीत..



लफ़्ज़ों से जो था परे
खालीपन को जो भरे
कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ
रिश्ते को क्या मोड़ दूँ
नाता यह अब तोड दूँ
या फिर यूँ ही छोड़ दूँ ,
दरमियाँ
बेनाम रिश्ता वो ..बेनाम रिश्ता वो ,
बेचैन करता जो हो ना .. सके जो बयान , दरमियाँ दरमियाँ
दरमियाँ दरमियाँ दरमियाँ दरमियाँ कुछ तो था तेरे मेरे दरमियाँ

Oh its a special feeling
These moments between us
How will I live without you

आँखों में तेरे साये चाहूँ तो हो न पाए
यादों से तेरी फासला हाय
जा के भी तू ना जाए
ठहरी तू दिल में हाए
हसरत सी बन के क्यूँ भला
क्यूँ याद करता हूँ मिटता हूँ बनता हूँ
मुझको तू लाई यह कहाँ
बेनाम  रिश्ता  वो..दरमियाँ

Hard for us to say
It was so hard for us to say
Can't close a day by day
But Then the world's got me in way

चलते थे जिन पे हम तुम
रास्ते वो सारे हैं गुम
अब  ढूँढें कैसे  मंजिलें
रातें हैं जैसे मातम
आते हैं दिन भी गुमसुम
रूठी हैं सारी महफ़िलें
इतना सताओ ना, यूँ याद आओ ना
बन जाएँ आँसू ही जुबाँ
बेनाम  रिश्ता  वो..दरमियाँ

इस गीत के एक अंतरे को श्रेया घोषाल ने भी गाया है। श्रेया से ये गीत धीमे टेम्पो में गवाया गया है। गिटार की बीट्स की जगह पियानो की टनटनाहट के बीच से आती श्रेया की मधुर आवाज़ दिल पर सीधे चोट करती है।


मंगलवार, जनवरी 08, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 21 : आला आला मतवाला बर्फी !

वार्षिक संगीतमाला की पिछली तीन सीढ़ियों को चढ़कर हम आ पहुँचे हैं बाइसवीं पॉयदान पर जहाँ पर इस साल की सफलतम फिल्मों से एक फिल्म 'बर्फी' का गीत है। वैसे जिन्होंने बर्फी फिल्म के सारे गीत सुने हैं उन्हें ये अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि इस संगीतमाला में बर्फी के गीत कई बार बजेंगे।  आज जिस गीत की चर्चा हो रही है वो है बर्फी का शीर्षक गीत। वैसे तो इस गीत के दो वर्सन हैं एक खुद गीतकार स्वानंद किरकिरे का गाया हुआ और दूसरा मोहित चौहान की आवाज़ में।



स्वानंद को इस गीत के ज़रिये फिल्म की शुरुआत में ही बर्फी का चरित्र बयाँ कर देना था। हम अक्सर किसी गूँगे बहरे के बारे में सोचते हैं तो मन में दया की भावना उपजती है। पर इस फिल्म में इस तरह के चरित्र को इतने खुशनुमा तरीके से दिखाया गया है कि अब किसी मूक बधिर की बात होने पर अपने ज़ेहन में हमें बर्फी का हँसता मुस्कुराता ज़िदादिल चेहरा उभरेगा ना कि करुणा के कोई भाव।

पिछली पोस्ट में संगीतकार स्नेहा खानवलकर की एक बात मैंने उद्धृत की थी कि  अगर निर्देशक एक फिल्म में कहानी के परिवेश और चरित्र को अपनी सूझबूझ से गढ़ सकता है तो मैं भी अपने संगीत के साथ वही करने का प्रयास करती हूँ। और यही बात इस गीत में बर्फी का चरित्र गढ़ते स्वानंद बखूबी करते दिखाई पड़ते हैं। मुखड़े में बर्फी से हमारा परिचय वो कुछ यूँ कराते हैं..

आँखों ही आँखो करे बातें
गुपचुप गुपचुप गुपचुप गुप
खुस फुस खुस फुस खुस
आँखों ही आँखों में करे बातें
गुपचुप गुपचुप गुपचुप गुप
खुस फुस खुस फुस खुस
ओ ओ ये..
ख़्वाबों की नदी में खाए गोते
गुड गुड गुड गुड गुड गुड होए
बुड बुड बुड बुड बुड बुड.
आला आला मतवाला बर्फी
पाँव पड़ा मोटा छाला बर्फी
रातों का है यह उजाला बर्फी
गुमसुम गुमसुम ही मचाये यह तो उत्पात
खुर खुर खुर खुर ख़ुराफ़ातें करे नॉन-स्टॉप

आपको इससे पता चल जाता है कि जिस शख़्स की बात हो रही है भले ही वो बोल सुन नहीं सकता पर है बला का शरारती। पर ये तो बर्फी की शख़्सियत का मात्र एक पहलू है। गीत के दूसरे अंतरे में स्वानंद हमें बर्फी के चरित्र के दूसरे पहलुओं से रूबरू कराते हैं। धनात्मक उर्जा से भरपूर बर्फी दूसरों के दुखों के प्रति संवेदनशील है। आत्मविश्वास से भरा वो किसी से भी खुद को कमतर नहीं मानता। उसके लिए ज़िंदगी एक नग्मा है जिसे वो अपनी धड़कनों की तान के साथ गुनगुनाता चाहता है। पर जहाँ बर्फी मासूम है वहीं इतना नासमझ भी नहीं कि इस टेढ़ी दुनिया की चालें ना समझ सके।

कभी न रुकता रे, कभी न थमता रे
ग़म जो दिखा उसे खुशियों की ठोकर मारे
पलकों की हरमुनिया, नैनो की गा रे सारे
धड़कन की रिदम पे ये गाता जाए गाने प्यारे
भोला न समझो यह चालू खिलाडी है बड़ा बड़ा हे.. हे
सूरज ये बुझा देगा, मारेगा फूँक ऐसी
टॉप तलैया, पीपल छैय्या
हर कूचे की ऐसी तैसी हे..

स्वानंद ने गीत के मूड को हल्का फुल्का बनाए रखने के लिए खुस फुस ,खुर खुर, गुड गुड, बुड बुड जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। हँसी हँसी में वो मरफी मुन्ने की कहानी कहते हुए उसके जीवन की त्रासदी भी बयाँ कर देते हैं।

बर्फी जब अम्मा जी की कोख में था सोया
अम्माँ ने मर्फी का रेडियो मँगाया
मर्फी मुन्ना जैसा लल्ला अम्मा का था सपना
मुन्ना जब हौले-हौले दुनिया में आया
बाबा ने चेलों वाला स्टेशन
रेडियो आन हुआ अम्मा ऑफ हुई
टूटा हर सपना...
ओह ओ ये..
मुन्ना म्यूट ही आंसू बहाए ओ..
ओ ओ ये मुन्ना झुनझुना सुन भी न पाए
झुन झुन झुन झुन....

कहना ना होगा कि प्रीतम द्वारा संगीबद्ध और मोहित द्वारा गाए इस गीत के असली हीरो स्वानंद हैं । जब जब ये गीत हमारे कानों से गुजरेगा बर्फी के व्यक्तित्व के अलग अलग बिंब हमारी आँखों के सामने होंगे। तो आइए सुनें ये हँसता मुस्कुराता गीत...


सोमवार, जनवरी 07, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 22 : मेरे साइयाँ रे, साचा बोले ना झूठा माहिया रे...

वार्षिक संगीतमाला की अगली पॉयदान पर के गीत को लिखा है अमिताभ भट्टाचार्य ने। बेवफाई से व्यथित हृदय की वेदना को व्यक्त करते इस गीत को गाया है राहत फतेह अली खाँ ने। गीत साइयाँ के कोरस से शुरु होता है और जैसे ही  राहत के स्वर में मेरे साइयाँ रे की करुण तान आपके कानों में पड़ती हैं आपको गीत का मूड समझने में देर नहीं लगती। फिल्म 'हीरोइन' के इस गीत की धुन बनाई है सलीम सुलेमान ने। दर्द की अभिव्यक्ति के लिए इंटरल्यूड्स में वॉयलिन का प्रयोग संगीतकार बखूबी करते हैं।


प्रेम की सबसे बड़ी शर्त है आपसी विश्वास और एक दूसरे के प्रति सम्माऩ। पर जो आपका सबसे प्रिय हो वही आपके भरोसे की धज्जियाँ उड़ा दे तो..पैरों तले ज़मीन खिसकने सी लगती है। सच्चा प्यार कुछ होता भी है इस पर भी मन में संशय उत्पन्न होने लगता है। अपने आस पास के लोग, सारी दुनिया  बेमानी लगने लगती है। 

अमिताभ के बोल इसी टूटे दिल की भावनाओं को टटोलते हैं इस गीत में। पर अमिताभ भट्टाचार्य के शब्दों से ज्यादा राहत की गायिकी और गीत की लय श्रोताओं को अपनी ओर खींचती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को।

साइयाँ रे, मेरे साइयाँ रे
साचा बोले ना झूठा माहिया रे हो
मेरे साइयाँ रे, साइयाँ रे
झूठी माया का झूठा है जिया रे हो
अब किस दिशा जाओ, कित मैं बसेरा पाऊँ
तू जो था मैं सँभल जाऊँ
साइयाँ रे
मेरे साइयाँ रे
दामन में समेटे, अँधेरा लाई है
बहुरूपिया रौशनी
हो...लोरियाँ गाए तो
नींदे जल जाती हैं
लागे कलसुरी चाँदनी
दिल शीशे का टूटा आशियाँ रे
साइयाँ रे, मेरे साइयाँ रे

रविवार, जनवरी 06, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 23 : मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर..

वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं सीढ़ी पर जो गाना है वो एक सामान्य हिंदी फिल्म गीतों से थोड़ा हट कर है। पहली बार सुनने पर ये आपके कानों को अटपटा लग सकता है पर यही इसका मजबूत पहलू भी है। इस गीत की संगीतकार  हैं स्नेहा खानवलकर। इंदौर में पली बढ़ी तीस वर्षीय स्नेहा की माँ का परिवार शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर घराने से ताल्लुक रखता है। पहले एनीमेशन और फिर कला निर्देशिका का काम करने वाली स्नेहा को पहली बार 2005 में फिल्म 'कल: Yesterday and Tomorrow' के शीर्षक गीत को संगीतबद्ध का मौका मिला पर  हिंदी फिल्मो में पहला बड़ा ब्रेक उन्हें राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'Go' में मिला। वर्ष 2008 में स्नेहा ओए लक्की लक्की ओए से संगीत जगत में चर्चा में आयीं। स्नेहा खानवलकर की खासियत ये है वे अपनी फिल्मों में कहानी की पृष्ठभूमि के हिसाब से गीतों में आंचलिक गायकों और वहाँ की ध्वनियों को स्थान देती हैं। स्नेहा का मानना है कि..

हर शहर हर कस्बे की अपनी एक खूबी होती है। वहाँ के लोगों का सोचने का नज़रिया या बोलने का तरीका, बड़े शहरों से सर्वथा भिन्न होता है। इसलिए मेरे लिए ये जानना जरूरी है कि वहाँ के लोग किस तरह गाते हैं? कैसे संगीत रचते हैं? किसी जगह की संस्कृति से जुड़ी इन बारीकियों को जानकर ही हम उनकों गीतों में ढाल सकते हैं। अगर निर्देशक एक फिल्म में कहानी के परिवेश और चरित्र को अपनी सूझबूझ से गढ़ सकता है तो मैं भी अपने संगीत के साथ वही करने का प्रयास करती हूँ।

ओए लक्की.. के संगीत के लिए जहाँ स्नेहा पंजाब और हरियाणा के गाँवों में घूमी वहीं 'Gangs of वासेपुर' के लिए बिहार के संगीत को उन्होंने वहाँ जाकर करीब से सुना। मजे की बात ये है कि GOW में अधिकांश गायक गायिकाओं को भी उन्होंने फिल्म के परिवेश के हिसाब से बिहार और यूपी से चुना पर ठेठ उत्तर भारतीय आवाज़ की तलाश उन्हें एक ऐसी गायिका तक ले गई जिसकी मातृभाषा हिंदी ना हो कर तेलगु है। जी हाँ ये गायिका थीं आंध्र प्रदेश की दुर्गा ! 12 वर्षीय दुर्गा मुंबई की ट्रेनों में गाती थीं। आपने अक्सर देखा होगा कि ट्रेनों में गाने वाले बच्चे ज्यादातर ऊँचे सुरों और बुलंद आवाज़ में गाते हैं। दुर्गा की इसी खासियत को आनंद सुरापुर ने देखा और उन्हें एक एलबम में गाने का न्योता दिया। उनका एलबम तो अभी बाजार में नहीं आया पर इसी बीच स्नेहा को उन्हें सुनने का मौका मिला और अनुराग कश्यप की इस छीछालेदर के लिए उन्होंने उनकी आवाज़ को उपयुक्त पाया।




इस गीत की संगीतकार और गायिका के बारे में तो आपने जान लिया अब ये मजेदार गीत  कैसे बना ये जानना भी आपके लिए रोचक होगा। फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप बताते हैं
छीछालेदर शब्द बहुत समय से मेरे दिमाग में था। वो डॉयलाग में भी इस्तेमाल हुआ था Dev D में। इमोशनल अत्याचार के बाद एक छीछालेदर करना था।  बस इतनी लाइन थी मेरे दिमाग में मेरा जूता वाइट लेदर (अभी तो फेक हो गया) दिल है छीछालेदर वो हमसे पूछी Whether I like the weather ? Whether I like the weather हमारा बनारस का बहुत पुराना joke है weather  के ऊपर। वो टीचर क्लॉस में आकर बोलते हैं Open the window let the climate come in.:)
तो अनुराग के रचित मुखड़े को इस गीत में ढाला गीतकार वरुण ग्रोवर ने। जैसा कि आपको पता है GOW-II की कहानी धनबाद के कोल माफिया के बीच वर्चस्व की लड़ाई पर आधारित है। फिल्म में ये गीत पार्श्व में बजता हुआ हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच जान बचाने की क़वायद में एक आपराधिक ज़िदगी की छीछालेदर को चित्रित करता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को

मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
वो हमसे पूछा whether I like the weather
चमचम वाली गॉगल भूल के सर मुँह भागे
मखमल वाला मफलर छोड़ के सर मुँह भागे
तेरे नाम के राधे भइया
नज़र कटीली लेजर

मेरा जूता फेक लेदर, दिल छीछालेदर
हेदर बेदर हेदर बेदर दिल छीछालेदर



वैसे ऊपर गाने में जिन राधे भइया का जिक्र हुआ है वो इस फिल्म के नहीं बल्कि इंडस्ट्री के सबसे बड़े भैया सल्लू भइया के फिल्म तेरे नाम के निभाए हुए किरदार के लिए है। अगर आपकी दिलचस्पी इस गीत की किशोर गायिका के बारे में और जानने की है तो ये वीडिओ देख लीजिए..


शुक्रवार, जनवरी 04, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 24 : पानी दा रंग दिखा रहें हैं आयुष्मान खुराना...

वार्षिक संगीतमाला की 24 वीं पॉयदान पर गीत है फिल्म विकी डोनर का। ऐसा बहुत कम ही होता है कि किसी फिल्म का हीरो अपने ऊपर फिल्माए जाने वाले गीत का गीतकार,संगीतकार और गायक भी खुद ही हो। ये अजूबा कर दिखाया है चंडीगढ़ से ताल्लुक रखने वाले आयुष्मान खुराना ने। 

आयुष्मान ने संगीत की विधिवत शिक्षा तो नहीं ली पर अनौपचारिक रूप से ही सही संगीत सीखा जरूर। उनके संगीतप्रेमी पिता ख़ुद एक बाँसुरी वादक थे।  चंडीगढ़ के डी ए वी कॉलेज में पढ़ते हुए आयुष्मान को संगीत के साथ थिएटर करने का चस्का भी लग गया। आयुष्मान ने पानी दा रंग.... कॉलेज में रहते हुए ही वर्ष 2003 में लिखा और संगीतबद्ध कर लिया था। वो जानते थे कि जो कुछ उन्होंने रचा है वो बेहतरीन है। पर उसे सबके सामने लाने के पहले उन्हें उचित अवसर की तलाश थी।

उनकी ये तलाश खत्म हुई दस साल बाद जब निर्देशक शूजित सिरकार ने विकी डोनर के नायक के किरदार में उन्हें चुना। आयुष्मान अपने साक्षात्कारों में इस गीत के विकी डोनर में समावेश के बारे में कहा था

मैं विकी डोनर के सेट पर एक बार साथ में अपना गिटार ले कर पहुँचा था। फिल्म के निर्देशक से कुछ विचार विनिमय हो ही रहा था कि मैंने शूजित दा से कहा कि मैंने एक गीत संगीतबद्ध किया है। क्या आप उसे सुनना चाहेंगे? शूजित पहले तो अचरज में पड़ गए पर उन्होंने कहा बिल्कुल सुनूँगा। और इस तरह ये गीत इस फिल्म का हिस्सा बना। वैसे तो पंजाबी लोग अपने अक्खड़पन के लिए जाने जाते हैं पर यह उनकी छवि से उलट एक मुलायमियत भरा  प्रेम गीत है।
पानी दा रंग के बोल भले पंजाबी में हों पर इसकी मन को सुकून देने वाली धुन  इस गीत की लोकप्रियता का मुख्य कारण हैं। वैसे गीत के मुखड़े में जिस तरह पानी के रंग को आयुष्मान ने एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है वो सुधी श्रोताओं का ध्यान अपनी ओर खींचता है। 

पानी दा रंग वेख के
पानी का रंग वेख के
अँखियाँ जो अंजू रुल दे
माहिया ना आया मेरा
राँझना ना आया
आँखो दा नूर वेख के
अँखियाँ जो अंजू रुल दे

पानी का रंग या यूँ कहें की उसकी रंगविहीनता को देखकर मुझे लगा कि मेरा जीवन भी तो तुम्हारे बिना बेरंग है और ये ख़्याल आते ही मेरी आँखों से आँसू बह निकले। यूँ तो 2003 में बने इस गीत का मूल रूप वही रहा पर फिल्म में डाले जाने पर इसमें एक अंतरा कोठे उत्ते..अँखियाँ मिलौंदे...और जुड़ा।  

नायक और गायक के बहुमुखी किरदार की किशोर दा की परंपरा को आयुष्मान कितना आगे ले जाते हैं ये तो वक़्त ही बताएगा पर फिलहाल सुनते हैं विकी डोनर के इस प्यारे से गीत को...


बुधवार, जनवरी 02, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 25 : दिल ये बेक़रार क्यूँ है ?

नए साल का स्वागत तो आपने इन झूमने झुमाने वाले गीतों से कर लिया होगा। तो मेहरबान और कद्रदान, वर्ष 2012 की वार्षिक संगीतमाला को लेकर आपका ये संगीत मित्र उपस्थित है। वर्ष 2005 से आरंभ होने वाली ये संगीतमाला अपने आठवें साल में है। हर साल ये मौका होता है साल भर में रिलीज हुई फिल्मों में से कुछ सुने अनसुने मोतियों को छाँट कर उनसे जुड़े कलाकारों को आपसे रूबरू कराने का। एक साल में लगभग सौ के करीब फिल्में के करीब पाँच सौ गानों में पच्चीस बेहतरीन गीतों को चुनना और उन्हें अपनी पसंद के क्रम में क्रमबद्ध करना मेरे लिए साल के अंत में एक बड़ी चुनौती बन जाता है। दिसंबर के सारे रविवार और छुट्टियाँ इसी क़वायद में चली जाती हैं पर इसी बहाने जो नया चुनने और गुनने को मिलता है उसे आपके सम्मुख लाने की खुशी इस मेहनत को सार्थक कर देती है।


तो चलिए आरंभ करते हैं ये सिलसिला। वार्षिक संगीतमाला 2012 की 25 वीं पॉयदान पर  गीत है फिल्म Players का जो पिछले साल जनवरी महिने में रिलीज हुई थी। इस गीत को गाया था मोहित चौहान और श्रेया घोषाल ने। अब जहाँ मोहित और श्रेया एक साथ हों गीत का मूड तो रोमानियत से भरा होगा ना। वैसे भी संगीतकार प्रीतम अपने गीतों में मेलोडी का खासा ध्यान रखते हैं और इसीलिए उनके गीत जल्द ही श्रोताओं की गुनगुनाहट में शामिल हो जाते हैं।

इस गीत को लिखा है देहदादून से ताल्लुक रखने वाले आशीष पंडित ने। भातखंडे संगीत विश्व विद्यालय से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाले आशीष ने कुछ दिनों अविकल नाम के थियेटर में काम किया। दस साल पहले यानि 2003 में मुंबई आए। शुरुआती जद्दोहत के बाद वो संगीतकार प्रीतम के सानिध्य में आए। गायक, नाटककार से गीतकार बनाने का श्रेय आशीष प्रीतम को ही देते हैं। वैसे तो आशीष को प्रीतम का फिल्मों में इक्का दुक्का गीत मिलते रहे हैं पर फिल्म अजब प्रेम की गजब कहानी के गीत तेरा होने लगा हूँ ने उन्हें फिल्म जगत में पहचान दिलाने में बहुत मदद की।

प्लेयर्स फिल्म के इस गीत में भी आशीष ने वही सवाल पूछे हैं जो आशिकों के मन में जन्म जन्मांतर से आते रहे हैं। कुछ पंक्तियाँ मुलाहिजा फरमाइए

क्यूँ रातों को मैं अब चैन से सो ना सकूँ
क्यूँ आता नहीं मुझे दिन में भी चैन ओ सुकूँ
क्यूँ ऐसा होता है मैं ख़ुद से ही बातें करूँ

दिल ये बेक़रार क्यूँ है
इसपे धुन सवार क्यूँ है
क्यूँ है ये ख़ुमार क्यूँ है तू बता
तेरा इंतज़ार क्यूँ है
क्यूँ है ये ख़ुमार क्यूँ है तू बता

प्रीतम गीत का टेम्पो धीरे धीरे बढ़ाते हैं और दिल ये बेकरार क्यूँ है आते आते श्रोता गीत की लय में पूरी तरह आ चुका होता है । और हाँ गीत में करीब ढाई मिनट बाद आने वाला गिटार का इंटरल्यूड भी बेहद कर्णप्रिय बन पड़ा है।

तो आइए सुनते हैं ये नग्मा...

सोमवार, दिसंबर 31, 2012

साल 2012 के दस सबसे ज्यादा झुमाने वाले गीत Top 10 dancing nos. 2012 !

'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमाला 2012 अगले जनवरी के पहले हफ्ते से शुरु हो जाएगी। पर गुजरे साल को एक मुस्कान के साथ विदा करने के लिए साल के अंतिम दिन एक नज़र उन गीतों पर जिन पर हमारा देश साल भर थिरकता रहा।

 #10. राधा....

विशाल शेखर युवाओं की नज़्ब को पकड़ने वाले संगीतकर रहे हैं खासकर हिप हॉप वाले संगीत में। वैसे इस साल उन्होंने संगीतप्रेमियों को प्रेम के एक अद्भुत रूप से परिचय करवाया। जी हाँ मै उनके इश्क़ वाले love की बात कर रहा हूँ। धन्य हैं अन्विता दत्त की लेखनी अगर यही हाल रहा तो हमें उर्दू से अंग्रेजी की डिक्शनरी खरीदने के बजाय उनके लिखे गीतों की किताब भर खरीद के रखनी होगी। इसी फिल्म यानि Student of the Year में विशाल शेखर हमें 'आज की राधा' से मिलवा रहे हैं। गीत के बोल सुनने के बाद तो यही लगता है कि अगर भगवान कृष्ण इस युग में पैदा हुए होते तो राधा के नाज़ नखरों को उठाते उठाते वो सीधे ब्रह्मा की शरण में चले गए होते।



 #09. आंटी जी..आंटी जी Get up and dance

ऍसा नहीं कि सारे नचनिया इसी युग की पैदाइश हैं। नाचने वाले हर ज़माने में थे पर वो हर महफिल में चिन्हित हुआ करते थे। ज्यादा संख्या उन लोगों की हुआ करती थी जो पीछे से बैठकर ताली बजाया करते थे। पर आज के समय में आपको ये सुख नसीब नहीं होगा। आज चाहे आप कितने भी जतन से किसी पार्टी की पिछली कुर्सी पर पैरों में फेविकोल लगाए दुबके हों नचनिया पार्टी आपकी भद्द पिटाने में पीछे नहीं रहेगी और अब तो बकायदा अमित त्रिवेदी का संगीतबद्ध  ये गाना ही उनकी कमान में आ गया है। इसकी मार से अब कहाँ बच पाइएगा।  तो आज के युग के अंकल आँटियों थोड़ा हाथ पैर हिलाना सीख लीजिए..



#08. माशाअल्लाह !

लटके झटके हों और सल्लू भाई पीछे रहें ये कैसे हो सकता है? पिछले साल की मुन्नी को बदनाम करने वाले सलमान इस बार शीला के चक्कर में ऐसे फँसे कि उनके साथ एक फिल्म ही कर डाली। अब शीला के रूप में उनकी प्रेमिका ही पर्दे पर हों तो उनकी on screen chemistry तो माशाअल्लाह होनी ही थी।

chinta da chita

 #07.  चिंता ता चिता चिता..

इस गीत पर थिरकने की महारत हासिल करनी हो तो पैरों से नहीं हाथों से काम लेना होगा। नहीं समझे तो गीत का आरंभ देखिए। वैसे हम तो यही कहेंगे कि इन झटकों मटकों से भगवान बचाए..


 #6. किकली कलेर दी

लव शव ते चिकेन खुराना के इस गीत को शायद आपने पहले ना सुना हो। अगर हल्के फुल्के मूड में हों तो एक बार जरूर सुनिए।  प्रयोगधर्मिता अमित त्रिवेदी के संगीत की पहचान है और इस गीत का संगीत संयोजन भी उसकी एक मिसाल है। पर आप पूछेंगे कि संगीत तो ठीक है पर ये किकली कलेर दी क्या बला है ? वाज़िब सवाल है आपका। दरअसल ये पंजाब में बच्चियों द्वारा खेला जाने वाला खेल है जिसमें लड़कियाँ एक दूसरे का हाथ पकड़ गोल गोल घूमती हैं। बाकी इस खेल में गाई जाने वाली आगे की पंक्तियों को बदलकर हीर की मुश्किलें बयानात की गयी हैं कि कैसे उसका रांझा उसे चीट कर रहा है :)

किकली कलेर दी, हट गयी हीर दी
रांझा करे चीट जी, करे ना परवाह





#5.पापा तो बैंड बजाए

भाई बच्चों के लिए अक़्सर पापा ही बैंड बजाने का काम करते हैं इसलिए Houseful-2 ये गीत तो युवाओं की जुबाँ पे चढ़ना ही था। आख़िर ये सब हम सभी ने कभी ना कभी तो अपने जीवन में सुना ही हुआ है ना..

Idiot  हो तुम गधे हो अभी तुम्हें knowledge नहीं है
हमसे पंगा लेने वाली अभी तुम्हारी age नहीं है

वैसे एक बात और इस गीत में अभिनेताओं के कपड़ों का रंग संयोजन कमाल का है।





#4.तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो..

स्कूल के दिनों में सबसे ज्यादा जो प्रार्थना दोहरायी है वो थी त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव। अब क्या जानते थे कि इतने दशकों बाद इस प्रार्थना की दूसरी पंक्ति को एक डान्स नम्बर की तरह गुनगुनाएँगे। वैसे वेक अप सिड के इकतारा के बाद नीरज श्रीधर के साथ कविता सेठ की गायिकी इस रूप में भी सामने आएगी ये किसने सोचा था ?



#3.चिकनी चमेली..

Item Songs से अब तक श्रेया घोषाल दूर दूर ही रहती थीं। ये उनकी मीठी आवाज़ के दायरे में नहीं आते थे। पर इस साल उन्होंने दिखा दिया कि ऐसे गीतों में जिस शोखी और चंचलता की जरूरत होती है वो उनमें है। अग्निपथ के इस गीत में कैटरीना के ठुमके तो आपने अपने टीवी सेटों पर बारहा देखे होंगे पर अगर ये नृत्य हमारे ये नन्हे मुन्हे Chipmunk करें तो कैसा रहे..




 #2. प्यार की पुंगी..

लो आ गए एक बार फिर प्यार की पुंगी बजाने मीका सिंह ! क्या कहा पुंगी बजाना नहीं मालूम!अरे भई पुंगी मतलब सपेरे वाली बीन से है। अब सीधे सीधे कहते कि प्यार की बीन बजा दो तो क्या आप ध्यान देते।



#1. Dreamum Wakeupum..

Dreamum wakeupum critical conditionam
Earthum quakepum hil dool sab shake upam



दस गीतों की इस फेरहिस्त में सबसे आगे रखा है मेंने अइया फिल्म के इस गीत को। अमित त्रिवेदी का संगीत सुनकर सच में हिल डुल सब शेकअपम हो जाता है। गीत का वीडिओ तो मुझे नहीं रुचता पर दक्षिण की दूसरे दर्जे की फिल्मों पर किया गया ये व्यंग्य कई जगहों पर मुस्कुराने पर मजबूर करता है। 

वैसे गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य  का जवाब नहीं ! शायद ये मुंबई की मायावी दुनिया में आज के गीतकार की बाजार में बने रहने की मजबूरी ही है कि इक लौ ज़िंदगी की बुझी कैसे मौला जैसे संवेदनशील गीतों को भी बड़ी सलाहियत से लिखने वाले अमिताभ आज धड़ल्ले से डान्स नम्बर, आइटम नम्बर और यहाँ तक कि द्विअर्थी गीतों पर भी अपनी कलम चला रहे हैं। इस साल अमिताभ के गीतों की गूँज आपको वार्षिक संगीतमाला में भी सुनाई देगी। वैसे ऊपर के दस गीतों में आधे से ज्यादा में अमिताभ की लेखनी चली है। 

तो चलते चलते आप सबको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!उम्मीद करता हूँ कि झूमते झुमाते गीतों का ये सिलसिला आपको पसंद आया होगा। वैसे वार्षिक संगीतमाला 2012 अगले हफ्ते शुरु हो रही है जिसमें मैं बाते करूँगा साल के पच्चीस बेहतरीन गीतों के बारे में। आशा है आप उस सफ़र में मेरे साथ होंगे.. Bollywood Top 10 dancing nos. of  2012

सोमवार, दिसंबर 17, 2012

जसप्रीत शर्मा (Jazim Sharma)..जिनकी ग़ज़ल गायिकी से मिलता है रूह को सुकून !

सा रे गा मा पा 2012 से जुड़े प्रतिभागियों से जुड़ी बातचीत में पिछले हफ्ते आपने सुना था शास्त्रीय संगीत के महारथी मोहम्मद अमन को। आज उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते है जसप्रीत यानि जाज़िम शर्मा (Jazim Sharma) की ग़जल गायिकी से।

आज की तारीख़ में सा रे गा मा पा ही एकमात्र ऐसा कार्यक्रम है जो फिल्म संगीत के इतर हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और ग़ज़लों को देशव्यापी मंच प्रदान कर रहा है।  जगजीत जी ख़ुद चाहते थे कि ग़ज़ल गायकों को बढ़ावा देने के लिए खास ग़ज़लों से जुड़ा ऐसा कोई कार्यक्रम टीवी के पर्दे पर हो। पर अपनी इस ख़्वाहिश को वो जीते जी अंजाम नहीं दे सके। जगजीत जी ग़ज़लों के प्रति युवाओं की उदासीनता के पीछे इलेक्ट्रानिक मीडिया को दोषी मानते थे। पिछले साल उनकी मृत्यु के बाद लिखे अपने आलेख जगजीत सिंह :  क्या उनके जाने के बाद ग़जलों का दौर वापस आएगा ? में मैंने इस बारे में उनकी राय को आपके समझ रखा था। एक बार फिर उसे यहाँ आपके समक्ष रख रहा हूँ..
"कैसा भी गायक हो निर्माता पैसे लगाकर एक आकर्षक वीडिओ लगा देते हैं और संगीत चैनल उसे मुफ्त में दिखा देते हैं। इससे गैर फिल्मी ग़ज़लों का टीवी के पर्दे तक पहुँचना मुश्किल हो गया है। रेडिओ की भी वही हालत है। प्राइवेट एफ एम चैनलों के मालिकों और उद्घोषकों को ग़जलों में ना कोई रुचि है ना उसको समझने का कोई तजुर्बा है। मैं तो कई बार ऐसे चैनल के साथ साक्षात्कार करने से साफ़ मना कर देता हूँ क्यूँकि वे ग़ज़लों को अपने कार्यक्रमों मे शामिल नही करते।"
आपको याद होगा कि ग़ज़लों को सा रे गा मा पा के मंच पर सुनने का सिलसिला दो साल पहले राजस्थान के गायक रंजीत रजवाड़ा से शुरु हुआ था। इस साल इस सिलसिले को ज़ारी रखा है पंजाब के भटिंडा से ताल्लुक रखने वाले जसप्रीत शर्मा ने। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि रंजीत रजवाड़ा और जसप्रीत शर्मा की गायिकी और व्यक्तित्व के कई पहलुओं में साम्यता है।

रंजीत दमे की बीमारी से लड़ते हुए सा रे गा मा पा के मंच तक पहुँचे थे वहीं जसप्रीत अपनी ज़ुबान की हकलाहट की वज़ह से रियालटी शो में भाग लेने की कई साल तक हिम्मत नहीं जुटा सके थे। रंजीत और जसप्रीत दोनों ही गुलाम अली खाँ साहब के शैदाई हैं और सा रे गा मा पा में दोनों को ही अपने प्रेरणास्रोत के सामने अपना हुनर दिखलाने का मौका मिला। इतना ही नहीं रंजीत की तरह ही जसप्रीत की उँगलियाँ जब हारमोनियम पर चलती हैं तो समझिए कमाल ही हो जाता है। पर एक जगह है जहाँ शायद उम्र के अंतर की वज़ह से जसप्रीत बाजी मार ले जाते हैं। रंजीत जब सा रे गा मा पा पर आए थे तो वे 18 साल के थे जबकि जाज़िम की उम्र 22 साल है। जाज़िम की गायिकी में एक ठहराव है जो कि एक ग़ज़ल गायक के लिए बेहद जरूरी है। तो आइए आज की इस महफिल का आग़ाज़ करते हैं उनकी गाई रंजिश ही सही से...


मुंबई में संगीत की विधिवत शिक्षा ले रहे जसप्रीत की आवाज़ ग़ज़ल के स्वरूप के हिसाब से मुनासिब है। वे उसमें बड़े सलीके से अपनी भिन्नताएँ डालते हैं। बड़े बड़े गायकों के समक्ष भी अपनी गायिकी पर उनका आत्मविश्वास मुझे अब तक डगमगाता नहीं दिखा।  अब तक जाज़िम ने गुलाम अली साहब व अन्य गायकों  की बेहद मशहूर ग़ज़लों चुपके चुपके रात दिन, हंगामा है क्यूँ बरपा, आवारगी, इतनी मुद्दत बाद मिले हो, कल चौदहवीं की रात थी, आज जाने की ज़िद ना करो, रंजिश ही सही  ...को अपनी आवाज़ दी है । ये लगभग वही ग़ज़लें हैं जिन्हें पिछले साल रंजीत ने भी गाया था। ये ग़ज़लें अपने आप में एक कहानी एक लीजेंड (legend) हैं जिन्हें सुनते ही उसके गाने वाले का चेहरा और अदाएगी सामने घूम जाती है।

पर मुझे लगता है कि सा रे गा मा पा के  मंच पर अगर जाज़िम को और आगे बढ़ना है तो उन्हें कुछ जोख़िम उठाने पड़ेंगे वर्ना वो रंजीत रजवाड़ा की तरह ही चौथे पाँचवे या उससे नीचे फिसल जाएँगे। जाज़िम शर्मा को चाहिए को वो आगे ऐसी ग़ज़लों का चुनाव करें जो ज्यादा सुनी ना गई हों या अगर मशहूर हों भी तो वो पूरी तरह अपने अंदाज़ से गाएँ ताकि अगली बार उस  ग़ज़ल को सुन कर लोग कह सकें कि ये जाज़िम की गाई ग़ज़ल है। मुझे याद आता है कि सा रे गा मा के पूर्व विजेता अभिजीत सावंत ने एक बार गुलाम अली की ग़ज़ल रुक गया आँख से बहता हुआ दरिया कैसे को इस खूबी से गुनगुनाया था कि आरिजनल वर्जन उसके सामने फीका पड़ गया था। मुझे पूरी आशा है कि जसप्रीत भी सा रे गा मा पा की अपनी इस यात्रा में ऐसा कुछ कर सकेंगे ताकि जसराज जोशी, शाहनाज, अमन, विश्वजीत जैसे कमाल के गायकों को कड़ी टक्कर दे सकें।

तो चलते चलते एक बार फिर देखते हैं जसप्रीत और हिमांशु द्वारा गुलाम अली साहब की ग़ज़ल आवारगी पर उन्हीं के  सामने की गई अनूठी जुगलबंदी, जिसे देख के गुलाम अली साहब भी गदगद हुए बिना नहीं रह सके..

सोमवार, दिसंबर 10, 2012

सा रे गा मा पा पर शास्त्रीय संगीत की अद्भुत बयार लाए हैं मोहम्मद अमन !

आज एक शाम मेरे नाम में महफिल सजी है राग बागेश्री की। काफी थाट से उत्पन्न ये राग यूँ तो रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाता है पर राजस्थान के शास्त्रीय संगीत गायक मोहम्मद अमन की वजह से इस राग से जुड़ी कुछ बंदिशों को पिछले हफ्ते से क्या सुबह क्या शाम बस समझिए लगातार ही सुन रहा हूँ।

अगर आप टीवी पर सा रे गा मा पा 2012 देख रहे हों तो मोहम्मद अमन की बेमिसाल गायिकी से आप अब तक परिचित हो चुके होंगे। पिछले हफ्ते  विचित्र वीणा के जादूगर पंडित विश्व मोहन भट्ट के सम्मुख अमन ने बागेश्री की दो बंदिशों को जिस सुरीले अंदाज़ में तानों पर अपनी महारत दिखाते हुए प्रस्तुत किया कि मन बाग बाग हो गया और आँखों में इस बेजोड़ शास्त्रीय गायक की दिल लुभाने वाली गायिकी सुनकर खुशी के आँसू निकल आए।


शास्त्रीय संगीत के बारे में आम जनता यही समझती रही है कि ये बेहद उबाऊ होता है। वहीं अगर संगीत के सच्चे रसिया से पूछें तो वे बिल्कुल उलट ये कहेंगे कि संगीत सुनने का असली सुख यही है। पर शास्त्रीय संगीत की समझ रखने वालों और आम संगीत प्रेमी जनता के बीच शास्त्रीय संगीत की सोच से जुड़ी दूरी को पाटने में  सा रे गा मा पा जैसे रियालटी शो ने एक अद्भुत काम किया है।

वैसे तो घंटों चलने वाले शास्त्रीय संगीत की महफिलों में डूबने के लिए सब्र और संगीत की समझ दोनों होनी चाहिए। संगीत की समझ तो रुचि होने से धीरे धीरे आ ही जाती है। पर उसके लिए वक़्त चाहिए जो आजकल के युवाओं के पास होता ही कहाँ है? संगीत के इन कार्यक्रमों में समय सीमा की वज़ह से प्रतिभागी तीन से पाँच मिनट में रागों की कठिन से कठिन लयकारी को इस क़रीने से निभाते हैं कि क्या आम क्या खास सभी मंत्रमुग्ध से हो जाते हैं। आज युवाओं में शास्त्रीय संगीत और ग़ज़लों के प्रति उदासीनता इस विधा से जुड़े लोगों के लिए चिंता का विषय है। इन हालातों में ग़ज़लों की तरह शास्त्रीय संगीत को सा रे गा मा पा का मंच मिलना एक बेहद सार्थक कदम है जिसकी जितनी भी सराहना की जाए कम है।

मोहम्मद अमन ने भी अपनी हर प्रस्तुति में जो तानें ली है उन्हें सुनकर दाँतो तले अँगुली दबानी पड़ती है। मोहम्मद अमन का संगीतमय परिवार पटियाला घराने से ताल्लुक रखता है। उनके दादा आमिर मोहम्मद खाँ और पिता जफ़र मोहम्मद दोनों तबला वादक हैं और AIR जयपुर से जुड़े रह चुके हैं। इस कार्यक्रम के दौरान विश्व मोहन भट्ट ने  अमन के बारे में कहा कि 
"अभी भले ही वो बीस वर्ष के हैं पर दस साल की आयु में जब उन्होंने अमन को पहली बार सुना तो तब भी उनकी तैयार तानें उनकी आज की गायिकी से बीस नहीं तो उन्नीस ही रही होंगी।निश्चय ही इनकी प्रतिभा से भारतीय शास्त्रीय संगीत और समृद्ध होगा।"
तो आइए सुनते हैं मोहम्मद अमन द्वारा राग बागेश्री में गाई दो बंदिशें पहले अपने गरज पकड़ लीनी बैयाँ मोरी और फिर ए री ऐ मैं कैसे घर जाऊँ..


मोहम्मद अमन को अगर आपने अब तक नहीं सुना तो अवश्य सुनें और उनके पक्ष में वोट करें। जितनी देर तक वो इस कार्यक्रम में बने रहेंगे, संगीत की इस विधा को चुनने की इच्छा रखने वालों के लिए वे एक प्रेरणास्रोत साबित होंगे।

गुरुवार, नवंबर 29, 2012

रातों के साये घने जब बोझ दिल पर बने..चोपिन से प्रेरित सलिल दा की यादगार धुन

सलिल दा संगीत निर्देशित और योगेश द्वारा लिखे दार्शनिकता लिए (यानि फिलासफिकल) गीतों की श्रृंखला का तीसरा नग्मा है फिल्म अन्नदाता का। सलिल दा के संगीत निर्देशित गीतों में इसे जटिलतम गीतों में से एक माना जाता है। अगर सलिल दा की धुनों को जलेबी की तरह घुमावदार माना जाता था तो ये गीत उस परिभाषा में सहज ही शामिल हो जाता है। पर इस गीत की बात करने के पहले सलिल दा को इस गीत की प्रेरणा देने वाले शख़्स के बारे में बताना जरूरी है।

सलिल दा ने ये धुन पोलैंड के संगीतकार फ्रेडेरिक चोपिन (Frédéric Chopin) की धुन से प्रेरित होकर बनाई थी। चोपिन एक माहिर पियानो वादक थे। बीस साल तक पोलैंड में रहने के बाद वो फ्रांस चले गए। यूरोप के विभिन्न देशों में किए उनके कॉन्सर्ट लोकप्रिय हुए। उनकी ज्यादातर धुनें सोलो पियानों पर हैं। आज भी पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के रसिया उनकी रोमांटिक धुनों को चाव से सुनते हैं।



सलिल दा ने चोपिन की धुन पर जो गीत रचा उसे गाने के लिए एक क़ाबिल गायिका की जरूरत थी। अगर इस गीत को गुनगुनाएँ तो आप तुरंत समझ जाएँगे कि इसे ढंग से गाना कितना कठिन है। मुखड़े के आखिर तक आते आते सुरों का चढ़ाव एक तरफ़ और उसके ठीक बाद बदली हुई लय में अंतरे की शुरुआत की बारीकियाँ दूसरी तरफ़। पर लता जी जब इसे गाती हैं तो सुनने पर लगता ही नहीं कि उन्हें इसे निभाने में कोई दिक्कत हुई होगी। ये बात उनकी महानता की परिचायक है। सलिल दा उनकी इस महानता से भली भांति वाक़िफ़ थे। उनकी पुत्री अंतरा ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था

"बाबा के लिए लता माँ सरस्वती का दूसरा रूप थीं। उनके लिए संगीत रचते समय वो इस चिंता से दूर रहते थे कि गीत किस सुर तक या कैसी ताल में चलेगा क्यूँकि उन्हें पूरा विश्वास था कि उसे लता बखूबी निभा लेंगी। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि अन्नदाता के गीत रातों के साये.. में जो खूबसूरत संगीत संयोजन था उसके साथ लता जी ने पूरा न्याय किया है। बाबा ने लता जी की आवाज़ का अपने गीतों में जिस तरह इस्तेमाल किया वो क़ाबिलेतारीफ़ है।"

 योगेश का लिखा ये गीत हमें ज़िदगी में आने वाली मायूसियों से जूझने की प्रेरणा देता है। योगेश ने गीत के हर अंतरे में विकट परिस्थितियों में मन में आशा का दीपक जलाए रखने का जो संदेश दिया है वो किसी भी बुझे मन को जागृत करने का माद्दा रखता है। अंतरे की लय गीत की खूबसूरती में चार चाँद लगाती दिखती है। मिसाल के तौर पर एक अंतरे की लय के स्वरूप पर ज़रा गौर कीजिए
जब ज़िन्दगी.. किसी.. तरह.. बहलती नहीं..खामोशियों से भरी.. जब रात ढलती नहीं...तब मुस्कुराऊँ मैं..यह गीत गाऊँ मैं.. फिर भी ना डर..अगर.. बुझें.. दीये....सहर.. तो है.. तेरे.. लिये
है ना कमाल  ! तो चलिए सुनते हैं अन्नदाता फिल्म का ये गीत जिसे जया भादुड़ी पर फिल्माया गया था।

रातों के साये घने जब बोझ दिल पर बने
ना तो जले बाती, ना हो कोई साथी
फिर भी ना डर अगर बुझें दीये....सहर तो है तेरे लिये

जब भी मुझे कभी कोई जो ग़म घेरे
लगता है होंगे नहीं, सपने ये पूरे मेरे
कहता है दिल मुझको, माना हैं ग़म तुझको
फिर भी ना डर ... तेरे लिये

जब ना चमन खिले मेरा बहारों में
जब डूबने मैं लगूँ , रातों के मझधारों में
मायूस मन डोले, पर ये गगन बोले
फिर भी ना डर ... तेरे लिये

जब ज़िन्दगी किसी तरह बहलती नहीं
खामोशियों से भरी, जब रात ढलती नहीं
तब मुस्कुराऊँ मैं, यह गीत गाऊँ मैं
फिर भी ना डर ... तेरे लिये
रातों के साये घने ...



सलिल दा से जुड़ी इस श्रृंखला में यहीं विराम लेते हैं। वैसे सलिल योगेश की जोड़ी के दार्शनिकता लिए गीतों में उन गीतों की चर्चा रह ही गई जिसमें सलिल दा के पसंदीदा गायक मुकेश ने अपनी आवाज़ दी थी। पर वो सिलसिला फिर कभी ..पर चलते चलते क्या आप नहीं जानना चाहेंगे कि सलिल दा अपने संगीत को किस तरह आँकते थे? प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार राजू भारतन से हुई बातचीत में एक बार उन्होंने कहा था

 "फुटबॉल के खेल को ही देखिए। सारे नियम हैं वहाँ! फ्री किक, थ्रो इन, आफ साइड, पेनाल्टी... पर फिर भी एक खिलाड़ी है पेले जो इन नियमों के भीतर रहते हुए कुछ ऐसा कर दिखाता है कि लगता है वो कुछ ऐसा कर गया जो इस खेल में होना एक अनूठी बात है। मैं भी संगीत का वही पेले हूँ।"

सलिल दा और योगेश इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

रविवार, नवंबर 25, 2012

जब स्वानंद, सुनिधि ने एक टीवी विज्ञापन के लिए छेड़ी सुरीली सरगम..

रविवार की शाम है। यूँ तो एक शाम मेरे नाम पर आजकल सलिल दा और योगेश से जुड़े गीतों की श्रृंखला चल रही है पर आज आपको कुछ नया ताज़ा सुनाने के लिए वो सिलसिला तोड़ना पड़ रहा है। बात ये है कि कल मुझे अपने Idiot Box पर एक सरगम का टुकड़ा दूर से सुनाई दिया। टीवी के पास जाकर देखा तो पता चला कि ये तो एक विज्ञापन है पर इतना सुरीला कि जिसे बार बार सुनने को दिल चाहे।

वैसे भी जिस सरगम में स्वानंद, सुनिधि और विजय प्रकाश जैसे धुरंधर गायक हों वो सरगम तो सुरीली होगी ही। साथ में हैं शान्तनु मोइत्रा और दो खूबसूरत बालाएँ। पहचान सकते हैं तो पहचानिए नहीं तो इस एक मिनट की विशुद्ध मेलोडी का आनंद उठाइए।


वैसे इस धुन को रचा है चक दे इंडिया के निर्देशक शिमित अमीन ने और ये विज्ञापन है निशान की नई कार का। अब आप सोचेंगे एक कार का संगीत की स्वर लहरी से क्या ताल्लुक? यही तो बात है ! दरअसल Nissan Evalia की पंचलाइन है Evalia Moves like Music’


मुझे तो ये सरगम बेहद पसंद आई और आपको...

शुक्रवार, नवंबर 23, 2012

सलिल, योगेश व मन्ना डे : ज़िंदगी कैसी है पहेली, हाए...

सलिल दा और योगेश रचित फिलासफिकल गीतों की इस श्रृंखला में पिछली पोस्ट में बात हो रही थी गीत ना जाने क्यूँ होता है ये ज़िंदगी के साथ....... की। और हाँ इस गीत को गाते वक़्त इसके पहले अंतरे के बाद भटक कर मैं जा पहुँचा था एक दूसरे गीत की इस पंक्ति कभी देखो मन नहीं जागे पीछे पीछे सपनों के भागे पर। शायद दोनों गीतों की कुछ पंक्तियाँ एक जैसे मीटर में हों। ख़ैर आनंद का ये गीत ज़िदगी की इस पहेली के सच को चंद शब्दों में इस खूबसूरती से उभारता है कि मन इस गीत को सुनकर अंदर तक भींग जाता है। सलिल दा की मेलोडी, मन्ना डे की दिल तक पहुँचती आवाज़ और योगेश के सहज पर मन को चोट करते शब्द इस गीत का जादू हृदय से कभी उतरने नहीं देते। 

पिछली पोस्ट में आपको बताया था कि किस तरह सलिल दा पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से प्रभावित थे। आनंद के इस गीत का आरंभ ऐसे ही संगीत संयोजन से होता है। साथ ही मन्ना डे की आवाज़ के पीछे वही कोरस पार्श्व में लहराता हुआ चलता है जो सलिल दा के गीतों का एक ट्रेडमार्क था। पर उस कोरस पर सलिल दा ने जिस तरह भारतीय मेलोडी की परत चढ़ाई है वो काबिले तारीफ़ है। सलिल दा अक्सर कहा करते थे..
"Music will always be dismantling and recreating itself, and assuming new forms in reaction to the times. To fail to do so would be to become fossilized. But in my push to go forward I must never forget that my heritage is also my inspiration.
"यानि संगीत हमेशा अपने आप को बँधे बँधाए ढांचे से तोड़ता और पुनर्जीवित करता चलेगा। इस प्रक्रिया में उसका स्वरूप समय की माँग के अनुरूप बदलेगा। अगर वक़्त की ये आहट कोई नहीं समझ सकेगा तो वो अतीत की गर्द में समा जाएगा। पर वक़्त के साथ आगे चलते वक़्त हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारी विरासत भी हमारी प्रेरणास्रोत है।"
सलिल दा के गीतों में मेहनतकशों का लोक संगीत है तो दूसरी ओर मोजार्ट की सिम्फोनी भी। सलिल मोजार्ट के संगीत से इस क़दर प्रभावित थे कि वो अपने आपको रिबार्न मोजार्ट (Reborn Mozart) कहा करते। पर उनकी सफलता का राज ये रहा कि इस सिम्फोनी को उन्होंने भारतीय रंग में ढाला।  हाल ही में सलिल दा की पुत्री अंतरा चौधरी ने विविधभारती में दिये अपने साक्षात्कार में कहा था
"बाबा प्रील्यूड और इंटरल्यूड को गीत के बोलों के साथ जोड़ कर अपने संगीत की रचना करते थे। जब भी कोई बाबा का गाना गाता है तो वो प्रील्यूड और इंटरल्यूड को गुनगुनाए बिना मुखड़े व अंतरे तक पहुँच ही नहीं पाएगा।"
कहने का मतलब ये कि सलिल दा के लिए प्रील्यूड और इंटरल्यूड गीत के अतरंग हिस्से हुआ करते थे। अंतरा की बात को मन्ना डे के गाए इस गीत को सुनकर बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। पर इस गीत में सपनों के पीछे भागते मन का चित्र अंकित करने वाले गीतकार योगेश के योगदान को भी हमें भूलना नहीं चाहिए। अच्छे कवि को अपनी बात कहने के लिए शब्दों का महाजाल रचने की आवश्यकता नहीं होती। योगेश कितनी खूबसूरती से जीवन के यथार्थ को एक पंक्ति में यूँ समेट लेते हैं ...एक दिन सपनों का राही चला जाए सपनों के आगे कहाँ. भई वाह।

वैसे आनंद के पहले योगेश बतौर गीतकार बहुत जानामाना नाम नहीं थे। उनकी माली हालत ऐसी थी कि अपने खुद के लिखे गीतों को सुनने के लिए उन्हें सविता चौधरी के पास जाना पड़ता था। योगेश सविता जी को तब से जानते थे जब उनकी शादी सलिल दा से नहीं हुई थी। सविता ने ही गीतकार के लिए योगेश का नाम सलिल दा को सुझाया था। सलिल दा तब तक अपना ज्यादातर काम शैलेंद्र के साथ किया करते थे। शैलेंद्र की मृत्यु के बाद उन्हें एक नए गीतकार की तलाश थी। जब पहली बार सलिल दा ने योगेश को आधे घंटे में एक गीत लिखने को दिया तो योगेश से कुछ लिखा ही नहीं गया। निराश मन से योगेश घर के बाहर निकल आए। मजे की बात ये रही कि बस स्टॉप तक पहुँचते ही उनके मन में एक गीत शक्ल लेने लगा। जब वापस आ कर उन्होंने सलिल दा का वो गीत सुनाया तो सलिल दा ने तुरंत अपनी पत्नी को बुलाकर कहा कि इसने तो बहुत अच्छा लिखा है।

गीत सुनते वक़्त आपने ध्यान दिया होगा कि किस तरह मन्ना डे ऊँचे सुरों में  एक दिन सपनों का राही तक पहुँचते हैं और उस के बाद  नीचे के सुरों में  चला जाए.... सपनों के.... आगे कहाँ गाते हुए हमारे दिल को वास्तविकता के बिल्कुल करीब ले आते हैं। ये प्रतिभा होती है एक अच्छे संगीतकार की जो शब्दों की लय को इस तरह रचता है कि सुनने वाले पर उसका अधिकतम असर हो। तो आइए सुनते हैं इस गीत को सलिल दा के अनूठे संगीत संयोजन के साथ


ज़िंदगी कैसी है पहेली, हाए
कभी तो हँसाए
कभी ये रुलाए
ज़िंदगी ...

कभी देखो मन नहीं जागे
पीछे पीछे सपनों के भागे
एक दिन सपनों का राही
चला जाए सपनों के आगे कहाँ
ज़िंदगी ...

जिन्होने सजाए यहाँ मेले
सुख-दुख संग-संग झेले
वही चुनकर ख़ामोशी
यूँ चले जाए अकेले कहाँ
ज़िंदगी ...

चलते चलते इस गीत से जुड़ा एक और किस्सा आपसे बाँटता चलूँ । आनंद के गीतों को लिखने के लिए लिए हृषिकेश दा ने गुलज़ार और सलिल दा ने योगेश को कह रखा था। पर दोनों ने ये बात एक दूसरे को नहीं बताई थी। लिहाजा एक ही परिस्थिति के लिए गुलज़ार ने ना जिया लागे ना लिखा और योगेश ने ना ना रो अखियाँ  लिखा। गीत तो गुलज़ार का ही रखा गया पर हृषिकेश दा ने योगेश की मेहनत को ध्यान में रखकर पारिश्रमिक के रूप में एक चेक दिया। योगेश ने कहा जब उनका गीत फिल्म में है ही नहीं तो फिर काहे के पैसे। इस समस्या के सुलझाव के लिए ज़िंदगी कैसी है पहेली को ..मूल स्क्रिप्ट में जोड़ा गया। वैसे आनंद के लिए योगेश ने मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने बुने भी लिखा।

सलिल दा से जुड़ी श्रृंखला का अगला गीत जीवन में आए दुखों से लड़ने की प्रेरणा देता है। इस बेहद कठिन गीत को एक बार फिर आवाज़ दी थी लता जी ने। बताइए तो कौन से गीत की बात मैं कर रहा हूँ?

सलिल दा और योगेश इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

सोमवार, नवंबर 19, 2012

सलिल चौधरी,योगेश व लता : न जाने क्यूँ, होता है ये ज़िंदगी के साथ ...

आज सलिल चौधरी यानि सलिल दा का जन्मदिन है। पर यकीन मानिए ये इत्तिफ़ाक़ ही है कि उनके जन्मदिन पर उनसे जुड़ी ये श्रृंखला शुरु कर रहा हूँ। दरअसल हुआ यूँ कि बहुत दिनों से मैं सलिल दा द्वारा संगीत निर्देशित इस गीत के बारे में लिखना चाह रहा था। कल जब ये गीत गुनगुना रहा था तो अंतरे तक पहुँचने के बाद उसी लय में एक दूसरे गीत की पंक्तियाँ जुबाँ पर आ गयीं। मुझे लगा हो ना हो वो भी सलिल दा का गीत रहा होगा और वास्तव में वो उनका ही गीत निकला। इसी खोजबीन में ये भी नज़र में आ गया कि आज से करीब अस्सी साल पहले यह विलक्षण प्रतिभा वाला संगीत निर्देशक जो बहुमुखी प्रतिभा का धनी था, इस धरती पर आया था।

मेरी इस श्रृंखला का उद्देश्य सलिल दा के उन गीतों को आपके समक्ष रखना है जिसमें उन्होंने गीतकार योगेश गौड़ के साथ मिलकर जीवन की फिलॉसफी को इस तरह उतारा कि उनके बोल और धुनें समय के थपेड़ों के बीच रह रह कर ज़ेहन में आती रहीं और शायद जीवन पर्यन्त आती रहेंगी। यही तो खूबी है इन नग्मों कि ये वक़्त के साथ आपके दिल में अपना एक अलग वज़ूद बना लेते हैं। गीत का ख्याल आते वक़्त उस फिल्म से कहीं ज्यादा वो भावनाएँ आपके इर्द गिर्द घूम रही होती हैं जो गीत के बोलों में अंतरनिहित हैं।

अब फिल्म छोटी सी बात के इस गीत को ही देखिए। इस गीत के मुखड़े के सच को ना जाने कितने लोगों ने जीवन में महसूस किया होगा...

न जाने क्यूँ, होता है ये ज़िंदगी के साथ
अचानक ये मन
किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद
छोटी छोटी सी बात, न जाने क्यूँ

कितनी सहजता से लिख गए ये सब योगेश ! पर मुंबई में आने से पहले तो योगेश को ये भी नहीं पता था कि उन्हें एक गीतकार बनना है पर जो काम उन्होंने सलिल दा के साथ किया वो उन्हें आज भी देश के अव्वल गीतकारों में स्थान दिलाने के लिए काफी है। पिता की मृत्यु के बाद योगेश नौकरी की तलाश में लखनऊ से मुंबई आए। पर वो ये सोचकर नहीं आए थे कि काम फिल्म जगत में करना है। उनके चचेरे भाई व्रजेंद्र गौड़ (जो एक पटकथा लेखक थे) ने उन्हें फिल्मों में काम करने की सलाह तो दी पर काम दिलवाने में कोई मदद नहीं की। नाराज़ योगेश ने अपने नाम के आगे से गौड़ टाइटल हटा लिया ताकि लोग ये ना समझें कि उन्हें फिल्म उद्योग में अपने भाई की वज़ह से काम मिला है। बचपन से ही उन्हें कोई भी पढ़ी गई कविता जल्द ही याद हो जाया करती थी इसलिए उन्होंने सोचा कि क्यूँ ना अब कविता लिखने का भी प्रयास किया जाए और इस तरह वो गीतकार बन गए।

योगेश सलिल के सानिध्य में कैसे आए ये किस्सा तो आगे की कड़ियों में आप से बाँटूगा पर योगेश सलिल चौधरी के बारे में क्या राय रखते हैं ये यहाँ बताना आवश्यक है। कुछ वर्षों पहले दिए गए अपने साक्षात्कर में उन्होंने कहा था
"सलिल दा मेरे प्रिय संगीतकार थे। पहली मुलाकात में वे मुझे अंतरमुखी से लगे, पर धीरे धीरे जब वे खुलने लगे तब उनके साथ काम करने का आनंद बढ़ गया। वो शायद एकमात्र ऐसे बंगाली संगीतकार थे जिन्हें हिंदी के बोलों की अच्छी समझ थी। ऐसा संभवतः इसलिए था कि सलिल दा खुद एक लेखक और कवि थे। पढ़ने लिखने का उनका शौक़ इस क़दर था कि उन्हें लगभग हर विषय के बारे में अच्छी जानकारी थी। सब लोग कहते थे कि उनकी धुनें जलेबी की तरह घुमावदार और जटिल हुआ करती थीं पर मुझे उनके साथ गीत लिखने में कभी ऐसी दिक्कत नहीं हुई।"
वहीं स्वर साम्राज्ञी लता जी ने अपनी एक CD में सलिल दा के बारे में कहा था कि
" मैंने ऐसे तो करीब सौ संगीत निर्देशकों से ज्यादा के साथ काम किया है। पर उनमें से दस ही ऐसे रहें होंगे जिन्हें संगीत और सिनेमा दोनों की समझ थी और उन दसों में सलिल दा सबसे अग्रणी थे। उनकी मेलोडी कुछ अलग तरह की होती थी जिसे गाना कठिन होता था। कई बार वो अपनी धुन को सही ढंग से विकसित करने के लिए कई दिनों तक ना खाते थे और ना सोते थे। "
सलिल के संगीत निर्देशित गीतों की एक खास बात ये थी कि वो गीत के इंटरल्यूड्स में कोरस का इस्तेमाल काफी करते थे। इंटरल्यूड्स में संगीत संयोजन पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का असर लिए होता था। इसकी भी एक वज़ह थी। सलिल दा का बचपन आसाम के चाय बागानों में बीता था। उनके पिता डॉक्टर थे और उन्हें अपने पूर्ववर्ती आयरिश मूल के डॉक्टर से पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के तमाम ग्रामोफोन रिकार्ड मिले थे। सलिल ने तभी से मोजार्ट, बीथोवन और चोपिन जैसे संगीतज्ञों को सुनना शुरु कर दिया था और उनसे बेहद प्रभावित हुए थे। बाद में अपनी धुनों में भी वे पश्चिमी सिम्फोनी का प्रयोग करते रहे।

इस गीत में भी ये बातें देखने को मिलती हैं। सलिल दा ने जिस अनूठे तरीके से इस गीत की लय को बुना था उसके साथ न्याय करने के लिए लता से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था। 

योगेश गीत के दोनों अंतरों में एक बार फिर किसी अज़ीज के साथ बिताए पलों को बेकली से याद करते हैं। वैसे भी पुरानी बातें, किसी के साथ बिताए वो हसीं लमहे किसी की यादों से दूर जा सकते हैं क्या..तो आइए आनंद उठाते हैं इस गीत का जिसे फिल्माया गया था विद्या सिन्हा व अमोल पालेकर पर 

 
वो अनजान पल
ढल गये कल, आज वो
रंग बदल बदल, मन को मचल मचल
रहें हैं छल न जाने क्यूँ, वो अनजान पल
तेरे बिना मेरे नैनों मे
टूटे रे हाय रे सपनों के महल
न जाने क्यूँ, होता है ये ज़िंदगी के साथ ...

वही है डगर
वही है सफ़र, है नहीं
साथ मेरे मगर,अब मेरा हमसफ़र
ढूँढे नज़र न जाने क्यूँ, वही है डगर
कहाँ गईं शामें मदभरी
वो मेरे, मेरे वो दिन गये किधर
न जाने क्यूँ, होता है ये ज़िंदगी के साथ ...

जैसा कि मैंने शुरुआत में कहा था कि इस गीत का अंतरा गुनगुनाते एक दूसरे गीत के अंतरे में भटक गया। जिंदगी की ऊँच नीच को परिभाषित करता वो गीत सलिल दा और योगेश की जोड़ी द्वारा बनाया एक बेहद संजीदा गीत है। तो आप भी सोचिए मैं किस गीत की बातें कर रहा हूँ। अगली पोस्ट में सलिल दा और योगेश से जुड़ी कुछ और दिलचस्प बातों के साथ चर्चा होगी उस गीत की..

सलिल दा और योगेश इस श्रृंखला की सारी कड़ियाँ

बुधवार, नवंबर 07, 2012

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो : जगजीत, मजाज़ और कहकशाँ

पहले दक्षिणी महाराष्ट्र और फिर कानाताल की दस बारह दिनों की यात्रा की वज़ह से दूरदर्शन के पुराने धारावाहिक कहकशाँ में अलग अलग शायरों के साथ जगजीत की सुरीली आवाज़ के सफ़र में विराम लग गया था। आज कहकशाँ से जुड़ी इस श्रृंखला की आखिरी कड़ी में बात करते हैं मजाज़ लखनवी की लिखी नज़्म एतराफ़ की। मजाज़ की इस नज़्म को आम जनों तक पहुँचाने में जगजीत की दर्द में डूबी आवाज़ का बहुत बड़ा हाथ रहा है। कहकशाँ में शामिल ग़ज़लों और नज़्मों में अरबी फ़ारसी शब्दों की बहुतायत होने की वज़ह से उन्हें पूरी तरह समझना हर ग़ज़ल प्रेमी के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है। पर  इस नज़्म में तो मजाज़ ने ऐसे ऐसे रूपकों का इस्तेमाल किया है कि सामान्य उर्दू जानने वाले भी चकरा जाएँ।

जगजीत जी की इस बात के लिए तारीफ़ करनी होगी कि उन्होंने इतनी कठिन भाषा के बावज़ूद भी अपनी गायिकी से इस नज़्म के मर्म को श्रोताओं तक भली भांति पहुँचा दिया।  एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए दीपावली की सौगात के रूप में पेश है मजाज़ की पूरी नज़्म उसके अनुवाद की एक कोशिश के साथ ताकि अगली बार जब भी आप ये नज़्म पढ़ें, सुनें या गुनगुनाएँ उसकी भावनाएँ आपके दिलो दिमाग पर और गहरी उतर सकें।

हिंदी में एतराफ़ का अर्थ होता है स्वीकारोक्ति। पर मजाज़ इस नज़्म के माध्यम से आख़िर क्या स्वीकार करना चाहते थे? मजाज़ किस तरह एक शादी शुदा रईसजादी के इश्क़ में गिरफ्तार हुए और किस तरह उनकी मोहब्बत उन्हें पागलपन की कगार पर ले गई, ये किस्सा मैं आपको उनकी मशहूर नज़्म आवारा के बारे में लिखते हुए सुना चुका हूँ।  बस इतना कहना चाहूँगा कि मजाज़ के इस दर्द में आप अगर पूर्णतः शरीक होना चाहते हैं तो आवारा से जुड़ी उन प्रविष्टियों को जरूर पढ़ें।

अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

मैने माना कि तुम इक पैकर-ए-रानाई हो
चमन-ए-दहर में रूह-ए-चमन आराई हो
तिलअत-ए-मेहर हो फ़िरदौस की बरनाई हो
बिन्त-ए-महताब हो गर्दूं से उतर आई हो

मुझसे मिलने में अब अंदेशा-ए-रुसवाई है
मैने खुद अपने किये की ये सज़ा पाई है


एतराफ़ की शुरुआत मजाज़ अपनी नायिका की सुंदरता के बखान से करते हैं।  मजाज़ कहते हैं कि मैं जानता हूँ कि तुम सौन्दर्य की एक प्रतिमा हो। अगर ये संसार एक खूबसूरत वाटिका है तो तुम उस फुलवारी की सुंदरता का केंद्रबिंदु हो। तुम्हारे यौवन में दहकते सूर्य की छवि है। तुम्हारा रूप स्वर्ग की अप्सरा का सा है। कभी कभी तो लगता है कि तुम उस हसीं चाँद की बेटी हो जो आकाश से उतर कर इस धरा पर आ गई है । पर आज तुम्हारे इस सौन्दर्य का मैं क्या करूँ? सच तो ये है कि आज के हालातों में बदनामी के डर से शायद ही तुम मुझसे मिलने की कोशिश करो। मैंने अपनी ज़िदगी को अब तक जिस तरह जिया है उसी की सज़ा मैं भोग रहा हूँ।


अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?

ख़ाक में आह मिलाई है जवानी मैने
शोलाज़ारों में जलाई है जवानी मैने
शहर-ए-ख़ूबां में गँवाई है जवानी मैने
ख़्वाबगाहों में गँवाई है जवानी मैने

हुस्न ने जब भी इनायत की नज़र ड़ाली है
मेरे पैमान-ए-मोहब्बत ने सिपर ड़ाली है


क्या कहूँ अब सोचता हूँ तो लगता है कि मैंने अपनी जवानी व्यर्थ ही बर्बाद कर ली। सुंदरियों के नगर में, ख़्वाबों को जन्म देने वाले उन शयनागारों में , हुस्न के उन शोलों के बीच आखिर मुझे क्या मिला ? जब जब किसी शोख़ नज़र ने अपनी चाहत का दामन मेरी तरफ़ फैलाया अपने पहले प्रेम के संकल्प की ढाल से मैंने उसे दूर ढकेल दिया।

उन दिनों मुझ पे क़यामत का जुनूँ तारी था
सर पे सरशारि-ए-इशरत का जुनूँ तारी था
माहपारों से मोहब्बत का जुनूँ तारी था
शहरयारों से रक़ाबत का जुनूँ तारी था

बिस्तर-ए-मखमल-ओ-संजाब थी दुनिया मेरी
एक रंगीन-ओ-हसीं ख्वाब थी दुनिया मेरी

जन्नते शौक़ थी बेगान ए आफ़ाते समूम
दर्द जब दर्द ना हो काविशे दरमाँ मालूम
खाक़ थे दीद ए बेबाक में गरदूँ के नजूम
बज़्मे परवीन भी निगाहों में कनीज़ों का हुजूम

लैल ए नाज़ बरअफ़गंदा नक़ाब आती थी
अपनी आँखों में लिए दावत ए ख़्वाब आती थी


उन दिनों दिलो दिमाग पर मौज मस्ती का नशा छाया हुआ था। चाँद के उन हसीन टुकड़ों को मैं अपनी मोहब्बत का हासिल समझने लगा था। मेरे गुरूर की इंतहा इस हद तक थी कि हुस्न के मैदान में मैं बादशाहों से भी मुकाबला करने को तैयार था। मखमल के बिस्तर में सिमटा मेरा वो संसार एक हसीन सपने की तरह था। गर्म हवा की आफ़तों से अपरिचित वो दुनिया मेरे लिए प्रेम का स्वर्ग के समान दिखती थी। मेरा पास उस वक़्त हर दर्द की दवा थी। तब मुझे ऐसा लगता था कि मेरी बेबाक नज़रे आसमान के तारों तक को खाक़ में मिला सकती हैं। सुन्दरियों की महफिल मुझे दासियों का हुजूम लगती थी।

वैसे ये जुनूँ बेवज़ह तो नहीं था। वो भी क्या दिन थे ! नाज़ नखरों में पली बढ़ी सुंदरियाँ तक नक़ाब उठा कर मुझे आँखों ही आँखों में अपनी ख़्वाबगाह में आने का निमंत्रण दे डालती थी।

संग को गौहरे नायाबों गिराँ जाना था
दश्ते पुरख़ार को फ़िरदौसे जवाँ जाना था
रेग को सिलसिल ए आबे रवाँ जाना था
आह ये राज अभी मैंने कहाँ जाना था

मेरी हर फतह में है एक हज़ीमत पिनहाँ
हर मुसर्रत में है राज़े ग़मो हसरत पिनहाँ


क्या सुनोगी मेरी मजरूह जवानी की पुकार
मेरी फ़रियाद-ए-जिगरदोज़ मेरा नाला-ए-ज़ार
शिद्दत-ए-कर्ब में ड़ूबी हुई मेरी गुफ़्तार
मै के खुद अपने मज़ाक़-ए-तरब आगीं का शिकार

वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहाँ से लाऊँ
अब मै वो जज़्बा-ए-मासूम कहाँ से लाऊँ
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?


पर शायद वो मेरा बचपना था। दुनिया के तौर तरीकों से मैं वाकिफ़ नहीं था।

मैं क्या जानता था कि एक पत्थर भी दुर्लभ मोती जवाहरात बनने की लालसा रखता है!
काँटेदार जंगल भी खिलती बगिया का रूप रखने की आस रखता है!
रेत के कण भी बहती धारा के साथ सागर को चूमने की ख्वाहिश रखते हैं!

वो भी अपने सुनहरे भविष्य की आस में मुझे छोड़ कर चली गई। गर्व और अहंकार में डूबी मेरी उस ज़िदगी की हर जीत अब शिकस्त में तब्दील हुई लगती है। ध्यान से देखो तो पाओगी कि मेरे हर खुशी के पीछे कई ग़म चेहरा छुपाए बैठे हैं। अपने इस घायल हृदय की हालत को तुम से अब क्या बयाँ करूँ?  कौन समझेगा मेरी हृदय को चीरनेवाली इस फ़रियाद को, आँसू भरे गीतों को व दर्द में डूबी मेरी बातों को। हालात ये हैं कि मैं  ख़ुद अपने तौर तरीकों की वज़ह से सबके बीच मजाक़ का पात्र बन गया हूँ। तुमने आने में अब बहुत देर कर दी है। तुम्हीं कहो अब इस मरे हुए दिल में वो कोमलता कहाँ से लाऊँ? अपनी भावनाओं में वो पहली वाली मासूमियत कहाँ से लाऊँ?

मेरे साये से डरो, तुम मेरी कुरबत से डरो
अपनी जुरअत की कसम , तुम मेरी जुरअत से डरो
तुम लताफ़त हो अगर, मेरी लताफ़त से डरो
मेरे वादों से डरो, मेरी मोहब्बत से डरो

अब में अल्ताफ़ो इनायत का सज़ावार नही
मैं वफ़ादार नहीं, हाँ मैं वफ़ादार नहीं
अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या आई हो?


नज़्म का ये आख़िरी हिस्सा मजाज़ के दिल मैं फैले नैराश्य को सामने लाता है। मजाज़ को अपनी ज़िदगी अपने साये तक से नफ़रत हो गई है। इसलिए वो नायिका को अपने से दूर रहने की सलाह देते हैं। जिस वफ़ा, कोमलता, रूमानियत समाज से लड़ने के जज़्बे को वो अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना कर चले थे उन पर उनका खुद का विश्वास डगमगा गया था। मजाज़ ने ये नज़्म 1945 में लिखी थी यानि अपनी मृत्यु के ग्यारह साल पहले। जीवन के अंतिम सालों में वे अपने मानसिक संतुलन खो बैठे थे। इलाज से उनकी हालत में सुधार जरूर हुआ पर एकाकी जीवन और शराब पीने की लत ने उन्हें इस दुनिया को छोड़ने पर मजबूर कर दिया। तो आइए एक बार फिर सुनें इस नज़्म में छुपी शायर की पीड़ा को जगजीत की आवाज़ में...

एक शाम मेरे नाम पर जगजीत सिंह और कहकशाँ 

 

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