Wednesday, April 17, 2019

क्या कमाल थी ताजमहल में रोशन और साहिर की जुगलबंदी ! : जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं ...

संगीतकार रोशन और गीतकार साहिर लुधयानवी ने यूँ तो कई फिल्मों में साथ साथ काम किया पर 1963 में प्रदर्शित ताजमहल उनके साझा सांगीतिक सफ़र का अनमोल सितारा थी। दोनों को उस साल ताजमहल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। रोशन को सबसे अच्छे फिल्म संगीत के लिए और साहिर को जो वादा किया है निभाना पड़ेगा गीत लिखने के लिए। बतौर संगीतकार यूँ तो रोशन की गीत, ग़ज़ल और कव्वाली रचने में माहिरी थी पर उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी इसलिए अपने गीतों की असफलता का डर उन्हें हमेशा सताता था। वो अक्सर अपने संगीतोबद्ध गीतों पर दूसरों की राय से बहुत प्रभावित हो जाया करते थे। ऐसी मनोस्थिति में फिल्मफेयर का ये पहला पुरस्कार उनके लिए कितना मायने रखता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।



ताजमहल में जो गीत सबसे मकबूल हुआ वो था जो वादा किया है निभाना पड़ेगा। मेरी नज़र में गीत के बोलों के ख्याल से साहिर का सबसे अच्छा काम जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं में था पर फिल्मफेयर हमेशा से गुणवत्ता से ज्यादा लोकप्रियता पर विश्वास करता आया है इसलिए इस गीत को कोई पुरस्कार तब नहीं मिला। अपनी प्रेयसी के किन खूबसूरत पहलुओं को उसकी तस्वीर उभार नहीं पाती इसे साहिर ने कितने प्यार से गूँथा था गीत के इन अंतरों में।  

रंगों में तेरा अक्स ढाला, तू ना ढल सकी
साँसों की आँच, जिस्म की खुशबू ना ढल सकी
तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नहीं


बेजान हुस्न में कहाँ, रफ़्तार की अदा
इन्कार की अदा है ना इकरार की अदा
कोई लचक भी जुल्फ-ए-गिरहगीर में नहीं

जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं


गीतों में ऐसी कविता आजकल भूले भटके ही मिलती है। ऐसी पंक्तियाँ कोई साहिर जैसा शायर ही लिख सकता था जिसने प्रेम को बेहद करीब से महसूस किया हो। रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी मुलायमियत से था।


रोशन ने मैहर के अताउल्लाह खान से जो सारंगी सीखी थी उसका अपने गीतों में उन्होंने बारहा प्रयोग किया। इस गीत में भी तबले के साथ सारंगी की मोहक  तान को आप जगह जगह सुन सकते हैं।

इसी फिल्म का  सवाल जवाब वाले अंदाज़ में रचा एक युगल गीत भी तब काफी लोकप्रिय हुआ था। साहिर की कलम यहाँ भी क्या खूब चली थी..  दो मचलते प्रेमियों की मीठी तकरार कितनी सहजता से उभरी थी उनकी लेखनी  में ..

पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी 
दिल की बेचैन उमंगों पे करम फ़रमाओ 
इतना रुक रुक के चलोगी तो क़यामत होगी 

शर्म रोके है इधरशौक़ उधर खींचे है 
क्या खबर थी कभी इस दिल की ये हालत होगी



वैसे तो हिंदी फिल्म संगीतकारों में मदनमोहन को फिल्मी ग़ज़लों का बेताज बादशाह माना गया है पर अगर संगीतकार रोशन द्वारा संगीतबद्ध ग़ज़लों को आँका जाए तो लगेगा कि उनकी ग़ज़लों और नज़्मों को वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वे हक़दार थीं। लता मंगेशकर मदनमोहन की तरह रोशन की भी प्रिय गायिका थीं। रोशन ने उनकी आवाज़ में दुनिया करे सवाल तो, दिल जो ना कह सका, रहते थे कभी जिनके दिल में जैसी प्यारी ग़ज़लें रचीं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में उनके द्वारा संगीतबद्ध नज़्म शराबी शराबी ये सावन का मौसम भी मुझे बेहद प्रिय है।

ताजमहल के लिए भी उन्होंने साहिर से एक ग़ज़ल लिखवाई जुर्म ए उल्फत पे हमें लोग सज़ा देते हैं। बिल्कुल नाममात्र के संगीत पर भी इस ग़ज़ल की धुन का कमाल ऐसा है कि दशकों बाद भी इसका मुखड़ा हमेशा होठों पर आ जाया करता है। साहिर की शायरी का तिलिस्म लता की आवाज़ में क्या खूब निखरा है। राग अल्हैया बिलावल पर आधारित इस धुन में मुझे बस एक कमी यही लगती है कि अशआरों के बीच संगीत के माध्यम से कोई अंतराल नहीं रखा गया।


जुर्म--उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं 
कैसे नादान हैंशोलों को हवा देते हैं 

हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं 
जान जाये कि  रहे, बात निभा देते हैं 

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 


तख़्त क्या चीज़ है और लाल--जवाहर क्या है 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं 

हमने दिल दे भी दिया अहद---वफ़ा ले भी लिया 
आप अब शौक़ से  दे दें, जो सज़ा देते हैं 


(उल्फ़त : प्रेम ,  तर्क-ए-वफ़ा : बेवफ़ाई,  सिला :प्रतिकार,  लाल--जवाहर : माणिक, अहद---वफ़ा :वफ़ा का वादा )


ग़ज़ल लता के मधुर से आलाप से शुरु होती है। आलाप खत्म होते ही आती है सारंगी की आहट। फिर तो साहिर के शब्द और लता की मधुर आवाज़ के साथ इश्क का जुनूनी रूप बड़े रूमानी अंदाज़ में ग़ज़ल का हर शेर उभारता चला जाता है। रोशन की धुन में उदासी है जिसे आप इस गीत को गुनगुनाते हुए महसूस कर सकते हैं। तो आइए सुनते हैं लता की आवाज़ में ये ग़ज़ल

Sunday, March 24, 2019

जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है Jane kyun tumse milne ki...

होली की पर्व तो बीत गया है। आशा है आपने रंगों का ये त्योहार सोल्लास मनाया होगा। अब देखिए ना होली बीतने के बाद भी मैं आपसे रंग की ही बात करने वाला हूँ। नहीं नहीं ये वो वाला रंग नहीं बल्कि तीस के दशक के लोकप्रिय कवि बलबीर सिंह 'रंग' की लेखनी का रंग है। 

यूँ तो बलबीर जी, गोपाल सिंह नेपाली और हरिवंश राय बच्चन जैसे कवियों के समकालीन थे पर उनके या उनकी कविताओं के बारे में वैसी चर्चा मैंने कम से कम स्कूल और कॉलेज के दिनों में होती नहीं सुनी। हिंदी की पाट्य पुस्तकों में भी उनका जिक्र नहीं आया था। नेट के इस युग में उनकी कुछ कविताओं को अनायास पढ़ने का मौका मिला तो ऐसा लगा कि बच्चन जी की ही कोई कविता पढ़ रहा हूँ क्यूँकि उनकी कविता में भी उसी किस्म की गेयता महसूस हुई। बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि बलबीर सिंह रंग अपने ज़माने के गीत लिखने वाले कवियों में अग्रणी स्थान रखते थे।  


बलबीर सिंह रंग पेशे से एक किसान थे पर खेतिहर परिवार के इस सपूत को कविताई करने का चस्का बचपन से लग गया था। 'रंग' जी का जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गाँव नगला कटीला में 14 नवंबर 1911 को हुआ था। उन्होंने ने गीतों के आलावा ग़ज़लों को भी लिखा। अपने काव्य संकलन सिंहासन में अपने किसानी परिवेश के बारे में उन्होंने लिखा है
"मैं परंपरागत किसान हूँ, धरती के प्रति असीम मोह और पूज्य-भावना किसान का जन्मजात गुण है, यही उसकी शक्ति है और यही उसकी निर्बलता। मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझमें भी यही संस्कार सबसे प्रबलतम रूप में रहा है, आज भी है । ग्रामीण जीवन की वेदनाएँ, विषमताएँ और हास-विलास दोनों ही मेरी कविता की प्रेरणा और पूँजी है।'
रंग जी के बारे में मशहूर है कि किस तरह मथुरा में आयोजित एक कवि सम्मेलन में मंच संचालक ने अपनी कविता पाठ को आतुर एक नवोदित कवि को नहीं बुलाया तो उस युवा की बेचैनी देखकर रंग जी ने संचालक को उसे मंच पर न्योता देने को कहा। उस नवयुवक की कविताओं को श्रोताओं से भरपूर सराहना मिली और आगे जाकर वो कवि गीतकार शैलेंद्र के नाम से मशहूर हुआ जिसके बारे में हम सब जानते हैं। शैलेंद्र जी भी इस बात को नहीं भूले और वे जब भी मुंबई आए उनका उचित सत्कार किया।

रंग जी का एक लोकप्रिय गीत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है। जब भी मैं इस कविता को सुनता था मुझे आशा कम, विश्वास बहुत होने की बात थोड़ी विचित्र लगती थी। ये जो जुमला है उसे  क्रिकेट कमेंट्री करने वाले बारहा इस्तेमाल करते हैं पर उलट कर। गेंदबाज ने अपील जरूर की पर उसमें आशा और उत्साह ज्यादा था पर विश्वास कम। उत्साह तो ख़ैर अपील के साथ होता ही है पर आशा इसलिए कि कहीं अंपायर उँगली उठा ही दे। अब रंग जी की बात करूँ तो अगर किसी से मिलने का विश्वास हो तो आशा तो जगेगी ही कम क्यूँ होगी? 

इन पंक्तियों की दुविधा तो मैं आज तक सुलझा नहीं पाया हूँ अगर आपकी कोई अलग सोच हो तो जरूर बाँटिएगा। इस संशय के बावज़ूद भी ये कविता जब भी मैं पढ़ता हूँ तो इसकी लय और इसके हर छंद में अपने प्रिय से कवि के मिलने की प्रबल होती इच्छा मन को छू जाती है। अपने एकतरफा प्रेम का प्रदर्शन कितने प्यारे और सहज बिंबों से किया है रंग जी ने..वहीं कविता के अंत में वे अतीत को बिसार कर नए भविष्य की रचना करने का भाव जगा ही जाते हैं।



जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है 

सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है
विरह-ताप भी मधुर मिलन के सोये मेघ जगा जाती है,
मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है 

धन्य-धन्य मेरी लघुता को, जिसने तुम्हें महान बनाया,
धन्य तुम्हारी स्नेह-कृपणता, जिसने मुझे उदार बनाया,
मेरी अन्धभक्ति को केवल इतना मन्द प्रकाश बहुत है 
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है 

अगणित शलभों के दल  एक ज्योति पर जल-जल मरते
एक बूँद की अभिलाषा में कोटि-कोटि चातक तप करते,
शशि के पास सुधा थोड़ी है पर चकोर की प्यास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है 

(चातक, Pied Cuckoo के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह वर्षा की पहली बूंदों को ही पीता है वहीं चकोर French Partridge के बारे में ये काल्पनिक मान्यता रही है कि ये पक्षी रात भर चाँद की ओर देखा करता है और चंद्रकिरणों का रस पीकर ही जीवित रहता है। )
 
मैंने आँखें खोल देख ली हैं नादानी उन्मादों की 
मैंने सुनी और समझी हैं कठिन कहानी अवसादों की,
फिर भी जीवन के पृष्ठों में पढ़ने को इतिहास बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है 

ओ ! जीवन के थके पखेरू, बढ़े चलो हिम्मत मत हारो,
पंखों में भविष्य बंदी है मत अतीत की ओर निहारो,
क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है

(शब्दार्थ : शशि - चंद्रमा, सुधा - अमृत, उर - हृदय, मेघ - बादल, स्नेह कृपणता - प्रेम का उचित प्रतिकार ना देना, उसमें भी कंजूसी करना, शलभ - कीट पतंगा, पखेरू - पक्षी, अतीत - बीता हुआ)

Monday, February 18, 2019

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता ....

देश में ग़म का माहौल है। एक साथ इतने सारे परिवारों पर दर्द का तूफान उमड़ पड़ा है। आख़िर कौन हैं ये लोग जिनके घर की रौनक चली गई है? छोटे मोटे मेहनतकश परिवारों के सुपूत जिन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी, उनकी आशाओं और सपनों का भार था। इन लोगों को देश की राजनीति से मतलब नहीं पर उनके सामने दो सवाल जरूर हैं। 

एक तो ये कि क्या उनके बेटों की शहादत बिना किसी ठोस प्रतिकार के ही चली जाएगी और दूसरे ये कि क्या जवानों को लाने ले जाने में जो सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई गयी थी वो पर्याप्त थी या उसमें अगर चूकें हुईं तो उसकी जवाबदेही किसकी है और आगे उसे सुधारने के लिए कितनी तत्परता दिखाई जाएगी? सनद रहे कि सी आर पी एफ की टुकड़ियों के साथ ऐसे हादसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में पहले भी हो चुके हैं। 


चित्र सौजन्य PTI
जिन परिवारों के घर का चिराग असमय बुझ गया है उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि अपने हुक्मरानों पर लोकतांत्रिक तरीके से पूरा दबाव बना कर रखें कि शहीद परिवारों की इन दोनों जायज़ अपेक्षाओं पर समुचित कार्यवाही की जाए।

सोशल मीडिया में लोगों की प्रतिक्रियाएँ ज्यादातर ऐसी हैं जिनका सरोकार इन परिवारों द्वारा सही जा रही पीड़ा से कम और अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने से ज्यादा है। उचित प्रतिकार की माँग करने के साथ साथ कुछ लोग सच्चे देशभक्त के तमगे को चमकाने के नाम पर अपने मन की घृणात्मक भड़ाँस की उल्टी करने में लगे हैं तो दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्हें इस घटना के दर्द से ज्यादा ये चिंता खाए जा रही है कि कहीं इस मुद्दे से सरकार राजनीतिक फायदा ना उठा ले और वो इस संवेदनशील घड़ी में सरकार के हर कृत्य में मीन मेख निकालते हुए विषवमन कर रहे हैं।

मुझे लगता है कि हमें इन दोनों तरह के लोगों से दूरी बनाए रखने की जरूरत हैं। दुख की इस घड़ी में स्वविवेक और संयम का इस्तेमाल करते हुए वो करें जो आपकी समझ से देशहित में हो बाकी तो सेना व सरकार पर छोड़ दें क्यूँकि कई चीजें आपके वश में नहीं हैं। 


चित्र सौजन्य ANI
ये जो कड़ा वक्त है गुजर ही जाएगा पर जितनी जल्दी ये पीड़ा कम हो उतना ही अच्छा।  निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल का एक शेर था जो मेरे आपके दिल के हालातों को बहुत कुछ बयाँ कर रहा है 

बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता

मराठी गायिका प्रियंका बार्वे ने इस शेर में छुपे दर्द को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अपनी आवाज़ में उभारा था। इसे सुनते हुए आप उन परिवारों के कष्ट को महसूस कर पाएँगे ऐसी मेरी उम्मीद है..

Saturday, February 02, 2019

एक शाम मेरे नाम के संगीत सितारे 2018 Musical Stars of 2018

वार्षिक संगीतमाला की ये समापन कड़ी है 2018 के संगीत सितारों के नाम। पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्मों के  पच्चीस बेहतरीन गीतों से तो मैंने आपका परिचय पिछले  महीने  कराया ही पर गीत लिखने से लेकर संगीत रचने तक और गाने से लेकर बजाने तक हर विधा में किस किस ने उल्लेखनीय काम किया यही चिन्हित करने का ये प्रयास है मेरी ये पोस्ट।  तो आइए मिलते हैं एक शाम मेरे नाम के इन संगीत सितारों से।

एक शाम मेरे नाम के संगीत सितारे 2018
साल के बेहतरीन गीत
ढेर सारे रिमिक्स और पुराने गीतों को मुखड़ों का इस्तेमाल कर बनाए गीतों की लंबी फेरहिस्त के बावज़ूद 2017 की अपेक्षा 2018 का संगीत मुझे बेहतर लगा। कई नए युवा संगीतकारों, गायक और गीतकारों ने मिलकर सुरीले रंग बिखेरे। जैसे मैंने पिछली पोस्ट में बताया था मेर लिए इस साल का सरताज गीत तो लैला मजनूँ का मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता रहा। वार्षिक संगीतमाला में शामिल सारे गीतों की सूची एक बार फिर ये रही।
 
साल का सर्वश्रेष्ठ गीत

साल के बेहतरीन एलबम
सबसे आसान निर्णय जो रहा मेरे लिए इस साल का वो था सबसे बेहतरीन एलबम के चुनाव का। वैसे भी ये साल कुछ नामी संगीतकारों जैसे प्रीतम और विशाल शेखर के लिए छुट्टी का साल रहा। रहमान ज्यादा फिल्में आजकल करते नहीं। हीमेश रेशमिया भी एक ही फिल्म में नज़र आए। पूरी संपूर्णता में अगर देखा जाए तो 2017 में लैला मजनूँ के दस गानों के संगीतमय एलबम के सामने दूर दूर तक कोई नहीं टिक सका। हाँलांकि इसमें कई संगीत निर्देशक थे पर नीलाद्रि कुमार ने एक अलग समां ही रच दिया अपने संगीत से। 

वैसे कुछ और प्रयास भी सराहनीय रहे। राज़ी, पद्मावत और सुई धागा ने भी कुछ मधुर गीत दिए इस साल के। रचिता अरोड़ा का एलबम मुक्काबाज़ भी एक नई बयार की तरह था जिसमें भांति भांति की संगीत रचनाएँ सुनने को मिलीं। रोचक कोहली ने कई कर्णप्रिय धुनें बनाई पर ज्यादातर ऐसी फिल्मों के लिए जिसमें एक से अधिक संगीतकार थे।

  • मुक्काबाज़ , रचिता अरोड़ा 
  • सुई धागा , अनु मलिक  
  • लैला मजनूँ  नीलाद्रि कुमार , जोय बरुआ 
  • धड़क, अजय अतुल 
  • राज़ी , शंकर एहसान लॉय 
  • पद्मावत, संजय लीला भंसाली  
साल का सर्वश्रेष्ठ एलबम      :  लैला मजनूँ  


साल के कुछ खूबसूरत बोलों से सजे सँवरे गीत
इस साल कुछ नए और कुछ पुराने गीतकारों के बेहद अर्थपूर्ण गीत सुनने को मिले। नए लिखने वालों में नीरज राजावत ने हिचकी की नायिका का विदाई का जो गीत लिखा था वो कमाल था। गौरव सोलंकी ने भी एक गहरी सोच को दास देव के गीत आज़ाद कर में ढाला। स्वानंद किरकिरे ने अक्टूबर के गीत में रुआँसे मन की अंतहीन प्रतीक्षा को कविता सरीखे शब्द दिए। वरुण ग्रोवर का सुई धागा का भजन गीतों में नए शब्दों के चयन से खिल उठा। कौसर मुनीर ने पैडमेन के नायक के प्रेम प्रदर्शन के लिए सहज पर दिल को छूता गीत लिखा। इरशाद कामिल तो लैला मजनूँ और ज़ीरों के गीतों से दिलो दिमाग पर छाए रहे पर किसी एक गीत के लिए अगर सबसे बेहतरीन लिखे गए तो वो थे हुसैन हैदरी की कलम से मुक्काबाज के गीत बहुत दुखा मन में..
  • नीरज राजावत   :      इतनी सुहानी बना, हो न पुरानी तेरी दास्तां….  
  • गौरव सोलंकी    :      खोल दे ना मुझे, आजाद कर...  
  • हुसैन हैदरी       :      बहुत दुखा मन :
  • वरुण ग्रोवर,      :      तू ही अहम, तू ही वहम... 
  • स्वानंद किरकिरे :     मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा...
  • इरशाद कामिल :      मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता...
  •  कौसर मुनीर     :     आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी..
  • मनोज मुंतशिर   :      देखते देखते    
साल के सर्वश्रेष्ठ बोल              : बहुत दुखा  मन, हुसैन हैदरी 

साल के बेहतरीन गायक
आतिफ असलम भी कई गीतों में नज़र आए पर वो निचली पॉयदानों पर बजे । सिर्फ एक गीत गाकर शिवम पाठक और अभय जोधपुरकर ने दिल जीत लिया। मोहित चौहान ने भी मजनूँ के किरदार को जिस जुनून से अपने गीत हाफ़िज़ हाफ़िज़ में निभाया वो काबिलेतारीफ़ था। इस साल एक बार फिर अरिजीत सिंह का गायकों के बीच दबदबा रहा। उन्होंने राज़ी, लैला मजनूँ और पैडमैन के लिए कई सुरीले गीत गाए। अरिजीत ने जिस तरह ऐ वतन को निभाया कि रोंगटे खड़े हो गए और उसी गीत के लिए इस साल के बेहतरीन गायक का खिताब उनकी झोली में जा गिरा।
  • अरिजीत सिंह        :  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
  • अभय जोधपुरकर  :  मेरे नाम तू 
  • शिवम पाठक        :  एक दिल है, एक जान है 
  • मोहित चौहान        : हाफ़िज़  हाफ़िज़ 
  • स्वानंद किरकिरे     : खोल दे ना मुझे, आजाद कर 
  • आतिफ असलम    : पानियों सा
साल के सर्वश्रेष्ठ गायक          :  ऐ वतन , अरिजीत सिंह 

साल की बेहतरीन गायिका
अगर सबसे कठिन चुनाव मेरे लिए रहा तो वो साल की सबसे बेहतरीन गायिका का। सुनिधि चौहान ने अक्टूबर, राज़ी और अय्यारी में अपनी गायिकी के विविध रंग प्रस्तुत किए। पिछले साल की विजेता रोंकिनी की गायिकी सुई धागा के गीतों की जान रही । हर्षदीप ने भी बड़ी खूबसूरती से दिलबरो को निभाया पर इनसे थोड़ी ऊपर रहीं श्रेया घोषाल, लैला मजनूँ के गीत सरफिरी में। एक मुश्किल गीत को उन्होंने मानो जी लिया अपनी अदायगी से।
  • रोंकिनी गुप्ता     : तू ही अहम, तू ही वहम.
  • श्रेया घोषाल       : सरफिरी सी बात है तेरी 
  • सुनिधि चौहान    : मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा,
  • सुनिधि चौहान    : मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा
  • हर्षदीप कौर      : दिलबरो 
साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका     :  सरफिरी , श्रेया घोषाल  

साल के गीतों की कुछ बेहद जानदार पंक्तियाँ 

जब आप पूरा गीत सुनते हैं तो कुछ पंक्तियाँ कई दिनों तक आपके होठों पर रहती हैं और उन्हें गुनगुनाते वक़्त आप एक अलग खुशी महसूस करते हैं। पिछले  साल के गीतों  की वो  बेहतरीन पंक्तियों जिनका चाव मुझे लग गया है आपके लिए हाज़िर हैं। 😃
  • मैं अपने ही मन का हौसला हूँ, है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ
  • फसलें जो काटी जाएँ उगती नहीं हैं, बेटियाँ जो ब्याही जाएँ मुड़ती नहीं हैं
  • टुकड़े कर चाहे ख़्वाबों के तू मेरे ... टूटेंगे भी तू रहने हैं वो तेरे
  • मैंने बात, ये तुमसे कहनी है,तेरा प्यार, खुशी की टहनी है। .. मैं शाम सहर अब हँसता हूँ ..मैंने याद तुम्हारी पहनी है 
  • सोयी सोयी एक कहानी...रूठी ख्वाब से, जागी जागी आस सयानी..लड़ी साँस से
  • तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
  • कि संग तेरे पानियों सा पानियों सा..पानियों सा बहता रहूँ .तू सुनती रहे मैं कहानियाँ सी कहता रहूँ
  • तन ये भोग का आदी, मन ये कीट पतंगा..मुक्ति जो ये चाहे, तो मारे मोह अड़ंगा
  • मोरे हाथ में तोरे हाथ की..छुवन पड़ी थी बिखरी बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
  • आते जाते थे जो साँस बन के कभी...वो हवा हो गए देखते देखते 
  • तू बारिश में अगर कह दे... जा मेरे लिए तू धूप खिला, तो मैं सूरज को झटक दूँगा...तो मैं सावन को गटक लूँगा
  • जो मेरी मंजिलों को जाती है तेरे नाम की कोई सड़क है ना....जो मेरे दिल को दिल बनाती है तेरे नाम की कोई धड़क है ना
गीत में प्रयुक्त हुए संगीत के कुछ बेहतरीन टुकड़े

संगीत जिस रूप में हमारे सामने आता है उसमें संगीतकार की तो बड़ी भूमिका रहती है पर संगीतकार की धुन हमारे कानों तक पहुँचाने का काम हुनरमंद वादक करते हैं जिनके बारे में हम शायद ही जान पाते हैं। इसलिए मैंने पिछले साल से मैंने संगीत सितारों में इन प्रतिभावान वादकों का नाम भी शामिल करना शुरु कर दिया है। पिछले साल के कई गीतों में गिटार पर अंकुर मुखर्जी और रबाब और मेंडोलिन पर तापस दा की बजाई धुनें कानों में मिश्री घोलती रहीं। अशरद खाँ का इसराज और वसंय कथापुरकर का बाँसुरी वादन भी शानदार रहा पर जब एक वादक ही संगीतकार बन जाए तो उसकी वादिकी का एक अलग ही असर होता है। नीलाद्रि कुमार का ज़िटार तो लैला मजनूँ के कई गानों में बजा पर हाफिज़ हाफिज़ के प्रील्यूड की बात ही कुछ और थी।

  • हाफ़िज़ हाफ़िज प्रील्यूड ज़िटार नीलाद्रि कुमार
  • दिलबरो मुखड़े और अंतरे के बीच बजता इसराज, अरशद खाँ
  • मनवा प्रील्यूड, गिटार अंकुर मुखर्जी
  • साँसें प्रील्यूड गिटार, पियानो,  प्रतीक कुहाड़
  • मेरे नाम तू प्रील्यूड बाँसुरी वसंत कथापुरकर
  • रुबाब, मेंडोलिन तापस राय  विभिन्न  गीत 
संगीत की सबसे कर्णप्रिय मधुर तान  : हाफ़िज़ हाफ़िज प्रील्यूड ज़िटार नीलाद्रि कुमार


संगीतमाला के समापन मैं आपने सारे पाठकों का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने समय समय पर अपने दिल के उद्गारों से मुझे आगाह किया। आपकी टिप्पणियाँ इस बात की गवाह थीं कि आप सब का हिंदी फिल्म संगीत से कितना लगाव है। इस साल गीतमाला शुरु होने के पहले मैंने आप सबसे अपनी पसंद के गीतों का चुनाव करने को कहा था और साथ में ये बात भी कही थी कि जिन लोगों की पसंद सबसे ज्यादा इस गीतमाला के गीतों से मिलेगी उन्हें एक छोटा सा तोहफा दिया जाएगा मेरे यात्रा ब्लॉग मुसाफ़िर हूँ यारों की तरफ से। विजेताओं ने जो अपनी मुस्कुराती तस्वीरें मुझे भेजी हैं तोहफे के साथ उससे मुझे यही लगा कि आप सबको ये पसंद आया। 



एक बार फिर आप सभी का दिल से शुक्रिया इस सफ़र में साथ बने रहने के लिए। 

Wednesday, January 30, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 सरताज गीत : मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता Aahista

पूरे एक महीने की संगीत यात्रा की अलग अलग सीढ़ियों को चढ़ते हुए वक़्त आ गया है एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला की चोटी पर स्थित पायदान यानी साल के सरताज गीत के खुलासे का। सच तो ये है कि इस साल के प्रथम दस गीत सभी एक से बढ़कर एक थे। सब का एक अपना अलग रंग था। कहीं पारिवारिक विछोह था, कहीं किसी के आने की अंतहीन प्रतीक्षा थी, कहीं आर्केस्ट्रा का जादू था, कहीं देशभक्ति की पुकार थी, कहीं शास्त्रीयता की बहार थी, कहीं एक अजीब सा पागलपन था तो कहीं प्रेम से रससिक्त सुरीली तान थी। 

मैंने इस साल के सरताज गीत के लिए जो रंग चुना है वो है प्रेम में अनिश्चितता का, बेचैनी का, दूरियों का, और इन तकलीफों के बीच भी आपसी अनुराग का। ये रंग समाया है लैला मजनूँ के गीत आहिस्ता में। इस गीत की धुन बनाई नीलाद्रि कुमार ने, लिखा इरशाद कामिल ने और गाया अरिजीत सिंह और जोनिता गाँधी की जोड़ी ने। 


फिल्म लैला मजनूँ के लिए नीलाद्रि ने चार गीतों को संगीतबद्ध किया। पिछले साल के इस सबसे शानदार एलबम के कुछ  गीतों तुम, ओ मेरी लैला ,सरफिरी और हाफिज़ हाफिज़ से आप मिल ही चुके हैं। इससे पहले कि आपको इस गीत से मिलवाऊँ क्या आप ये नहीं जानना चाहेंगे कि इम्तियाज़ अली ने सितार/ जिटार वादक नीलाद्रि को इस संगीतमय फिल्म की आधी जिम्मेदारी भी क्यूँ सौंपी? इससे पहले नीलाद्रि ने सिर्फ एक बार हिंदी फिल्मों के एक गीत में संगीत दिया था। दरअसल इम्तियाज़ अली के एक मित्र जो अक्सर अपने नाटकों में उन्हें बुलाया करते थे ने उनको नीलाद्रि के बारे में बताया था। नीलाद्रि के व्यक्तित्व को परिभाषित करने का उनका अंदाज़ निराला था   
"एक म्यूजिकल उस्ताद है जो यंग है और क्रिकेट भी खेलता है और अपने जैसा कूल है तू मिल उससे"।
इम्तियाज़ उनसे मिले तो उन्होंने नीलाद्रि को वैसा ही पाया सिवाय इस बात के कि वो सिर्फ क्रिकेट नहीं बल्कि फुटबाल भी खेलते हैं। तब तक लैला मजनूँ के कुछ गीतों की कमान दूसरे संगीतकारों को मिल चुकी थी। नीलाद्रि एक फिल्म में एक संगीतकार वाली शैली के हिमायती हैं पर कश्मीर घाटी में पनपती एक प्रेम कहानी में संगीत देना उन्हें एक आकर्षक चुनौती की तरह लगा जिसमें वो अपने संगीत के विविध रंग भर सकते थे।

नीलाद्रि ने लैला मजनूँ के संगीत में गीतों की सामान्य शैली से हटकर संगीत दिया और उनके अनुसार ये सब स्वाभाविक रूप से होता चला गया। उनकी कही बात एक बार फिर आपसे बाँटना चाहूँगा..
"मैं अपनी रचनाओं में किसी खास तरह की आवाज़ पैदा करने का प्रयत्न नहीं करता। मेरे लिए संगीत ऐसा होना चाहिए जो एक दृश्य आँखों के सामने ला दे, बिना कहानी सामने हुए भी उसके अंदर की भावना जाग्रत कर दे। चूँकि मैं एक वादक हूँ मेरे पास बोलों की सहूलियत नहीं होती अपना संदेश श्रोताओं तक पहुँचाने के लिए। शब्दों का ना होना हमारे काम को कठिन बनाता है पर कभी कभी उनकी उपस्थिति एक मनोभाव को धुन के ज़रिए प्रकट करने में मुश्किलें पैदा करती है। ऐसी ही परिस्थितियों में इरशाद कामिल जैसे गीतकार मदद करते हैं। 
मैंने अपने कैरियर में कई धुनें बनाई है अपने गीतों और वाद्य वादन के लिए। अगर मुझसे 10-15 साल बाद कहा जाए कि उन्हें फिर से बनाओ तो मैं उनमें बदलाव लाऊँगा पर आहिस्ता के लिए मैं ऐसा नहीं कह सकता।"  
नीलाद्रि कुमार  और इरशाद कामिल 

आहिस्ता  एक ऐसा गीत है जो प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं की बात करता है। पहला दौर वो जिस में प्रेम पनप रहा होता है। नायिका आहिस्ता आहिस्ता अपने प्रेमी को दिल में जगह देना चाहती है। वहीं नायक के मन में अपने दिल की बात को उस तक पहुँचाने की उत्कंठा है। फिर उसकी बात के मर्म को ठीक ठीक ना समझे जाने का भय भी है। सबसे बड़ा संकट है पूर्ण अस्वीकृति  की हर समय लटकती तलवार का। अब ऐसे में नायक का दिल परेशां ना हो तो क्या हो और इसीलिए कामिल साहब लिखते हैं कि पूछे दिल तो, कहूँ मै क्या भला...दिल सवालों से ही ना, दे रुला

तुम मिलो रोज ही 
मगर है ये बात भी 
मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता

तुम, मेरे हो रहे 
या हो गये, या है फासला
पूछे दिल तो, कहूँ मै क्या भला 
दिल सवालों से ही ना, दे रुला 
होता क्या है, आहिस्ता आहिस्ता 
होना क्या है, आहिस्ता आहिस्ता

चलिए प्रेम हो भी गया पर सामाजिक हालातों  ने आपको अपने प्रेमी से दूर कर दिया।अब सहिए वेदना। लोग तो शायद दिलासा देंगे कि वक़्त के साथ सब ठीक हो जाएगा पर नायक नायिका जानते हैं कि ये दुनिया कितनी झूठी हैं और ये वक़्त  किस तरह प्रेमियों को छलता रहा है। इरशाद कामिल इन भावों को कुछ यूँ शब्द देते हैं

दूरी, ये कम ही ना हो 
मै नींदों में भी चल रहा 
होता, है कल बेवफा 
ये आता नहीं, छल रहा

लाख वादे जहां के झूठे हैं  
लोग आधे जहां के झूठे हैं  
मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता

फिर भी देखिए ना इतनी तकलीफ के बाद भी मन में अपने प्रेमी के लिए जो अनुराग हैं ना वो खत्म नहीं होता और इस बात को इरशाद कामिल इतनी खूबसूरती से कहते हैं कि

मैंने बात, ये तुमसे कहनी है 
तेरा प्यार, खुशी की टहनी है 
मैं शाम सहर अब हँसता हूँ 
मैंने याद तुम्हारी पहनी है 
मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
होता क्या है आहिस्ता आहिस्ता 
होता क्या है आहिस्ता आहिस्ता

खुशी की टहनी और यादों को पहनने का भाव मन को रोमांचित कर जाता है। आप गीत में खो चुके होते हैं कि नीलाद्रि जिटार पर अपनी मधुरता बिखेरते सुनाई पड़ते हैं। 

अरिजीत और जोनिता 
अरिजीत और जोनिता इस गीत में जगह पाकर बहुत खुश थे और दोनों ने ही बखूबी इस गीत को अपनी आवाजें  दी हैं।। अरिजीत ने तो ये भी कहा कि गीत के बोलों से वो एक ही बार में जुड़ गए।  अरिजीत का हिस्सा थोड़ा कठिन था पर जिस कोटि के वे गायक हैं उन्होंने उसे भी पूरे भाव के साथ निभाया। 

वो कहते हैं ना कि किसी गाने में एक मीठा सा दर्द है तो ये वैसा ही गाना है़ और ऐसे गीत मुझे हमेशा से मुतासिर करते रहे हैं। आज जब रीमिक्स और रैप के ज़माने में भी नीलाद्रि और इम्तियाज अली जैसे लोग संगीत की आत्मा को अपनी फिल्मों में इस तरह सँजों के रखते हैं तो बेहद खुशी होती है और दिल में आशा बँधती है हिंदी फिल्म संगीत के सुनहरे भविष्य की। तो आइए आहिस्ता आहिस्ता महसूस कीजिए इस गीत की मधुर पीड़ा को..




इस साल की संगीतमाला का अगला और अंतिम आलेख होगा एक शाम मेरे नाम के पिछले साल के संगीत सितारों के नाम जिसमें बात होगी  कलाकारों के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत प्रदर्शन की :)

वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

Monday, January 28, 2019

वार्षिक संगीतमााला 2018 पायदान # 2 : जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू Mere Naam Tu

हिंदी फिल्म संगीत में शंकर जयकिशन की जोड़ी को ये श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने फिल्मी गानों में आर्केस्ट्रा का वृहत पैमाने पर इस्तेमाल सिर्फ फिलर की तरह नहीं बल्कि गीत के भावों का श्रोताओं तक संप्रेषण करने मे भी किया। उनके गीतों में संगीत संयोजन की एक शैली होती थी जिसे आप सुन के पहचान सकते थे कि ये गीत शंकर जयकिशन का है। मराठी फिल्मों से अब हिंदी फिल्मों में पाँव पसारने वाले अजय अतुल नए ज़माने के संगीतकारों में एक ऐसे संगीतकार हैं जिनकी धुनों को आप उनके आर्केस्ट्रा आधारित संगीत से ही पकड़ सकते हैं। 


अजय अतुल के संगीत में दो चीजें बड़ी प्रमुखता से आती हैं एक तो पश्चिमी वाद्यों वॉयलिन का कोरस और पियानो के स्वर और दूसरे हिंदुस्तानी ताल वाद्यों की धमक के साथ बाँसुरी की सुरीली तान। इस साल उनका संगीत धड़क, ठग आफ हिंदुस्तान, तुम्बाड और ज़ीरो में सुनाई पड़ा। धड़क के गीत तो इस गीतमाला में बज ही चुके हैं। आज वार्षिक संगीतमाला की दूसरी पॉयदान पर बज रहा है उनकी फिल्म ज़ीरो का गीत।

अजय व  अतुल 
इस गीत के पीछे की जो चौकड़ी है, मुझे नहीं लगता कि पहले कभी साथ आई है। अजय अतुल ज्यादातर अमिताभ भट्टाचार्य के साथ काम करते थे पर यहाँ गीत लिखने का जिम्मा मिला इरशाद कामिल को। अभय जोधपुरकर का तो ये हिंदी फिल्मों का पहला गीत था। शाहरुख भी अक़्सर विशाल शेखर या प्रीतम जैसे बड़े नामों के साथ ज्यादा दिखे हैं पर इस बार उन्होंने अजय अतुल को चुना। इस गीत की सफलता में संगीत संयोजन, बोल और गायिकी तीनों का हाथ रहा है और यही  वज़ह है कि ये गीत मेरी गीतमाला का रनर्स अप गीत बन पाया है। 

अभय जोधपुरकर

सबसे पहले तो आपकी उत्सुकता  इस नयी आवाज़ अभय जोधपुरकर के बारे में जानने की होगी। अभय संगीत की नगरी इंदौर में पले बढ़े। चेन्नई में बॉयोटेक्नॉलजी का कोर्स करने गए और वहीं शौकिया तौर पर ए आर रहमान के संगीत विद्यालय में सीखने लगे। रहमान ने दक्षिण भारतीय भाषाओं की फिल्मों में उन्हें गाने का मौका दिया। उनका पहला सबसे सफल गीत मणिरत्नम की फिल्म कदाल से था। 27 वर्षीय अभय ने कुछ साल पहले अजय अतुल की फिल्म का एक कवर गाया जिस पर अतुल की नज़र पड़ी। उन्हें उनकी आवाज़ पसंद आई और फिर ब्रदर के गीत सपना जहाँ को गाने के लिए उन्होंने अभय को बुलाया। अभय तब तो मुंबई नहीं जा पाए पर पिछले अक्टूबर में जब अतुल ने उन्हें एक बार फिर  ज़ीरो के लिए संपर्क तो वो अगले ही दिन मुंबई जा पहुँचे।

स्टूडियो में अजय  के आलावा, इरशाद कामिल और निर्देशक आनंद एल राय पहले से ही मौज़ूद थे। अभय से कुछ पंक्तियाँ अलग अलग तरह से गवाई गयीं और फिर पूरा गीत  रिकार्ड हुआ। गीत की आधी रिकार्डिंग हो चुकी थी जब अभय और निर्देशक आनंद राय को भूख लग आई पर अजय ने विराम लेने से ये कह कर मना कर दिया  कि अभी तुम्हारी आवाज़ में जो चमक है वो खाने के बाद रहे ना रहे। नतीजा ये हुआ कि अभय को इस गीत का एक हिस्सा खाली पेट ही रिकार्ड करना पड़ा जिसमेंके ऊँचे सुरों वाला दूसरा अंतरा भी था। ये गीत जितना मधुर बना पड़ा है उससे तो अब यही कहा जा सकता है कि उन्होंने "भूखे भजन ना होए गोपाला" वाली उक्ति को गलत साबित कर दिया।😀

गीत की शुरुआत वरद कथापुरकर द्वारा बजाई बाँसुरी की मोहक धुन से होती है। उसके बाद बारी बारी से पियानो और वायलिन का आगमन होता है। इरशाद कामिल के लिखे प्यारे मुखड़े के बीच भी वॉयलिन का कोरस सिर उठाता रहता है। मेरा नाम तू आते आते ताल वाद्य भी अपनी गड़गड़ाहट से अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। अजय अतुल के आर्केस्ट्रा में संगीत का बरबस उतार चढ़ाव दृश्य की नाटकीयता बढ़ाने में सहायक होता है। यहाँ भी इंटरल्यूड्स में वैसे ही टुकड़े हैं। खास बात ये कि गीत का दूसरा अंतरा पहले अंतरे की तरह शुरु नहीं होता और अभय की आवाज़ को ऊँचे सुरों पर जाना पड़ता है। 

गीत की रूमानियत अंतरों में भी बरक़रार रहती है। वैसे तो गीत के पूरे बोल ही मुझे पसंद हैं पर ये पंक्ति खास अच्छी लगती है जब कामिल कहते हैं टुकड़े कर चाहे ख़्वाबों के तू मेरे ..टूटेंगे भी तू रहने हैं वो तेरे। अभय की आवाज़ में येसूदास की आवाज़ का एक अक्स दिखाई पड़ा। बड़े दिल ने उन्होंने इस गीत को निभाया है। तो चलिए इसे एक बार और सुन लें अगर आपने इसे पहले ना सुना हो।

वो रंग भी क्या रंग है
मिलता ना जो तेरे होठ के रंग से हूबहू
वो खुशबू क्या खुशबू
ठहरे ना जो तेरी साँवरी जुल्फ के रूबरू
तेरे आगे ये दुनिया है फीकी सी
मेरे बिन तू ना होगी किसी की भी
अब ये ज़ाहिर सरेआम है, ऐलान है
जब तक जहां में सुबह शाम है
तब तक मेरे नाम तू
जब तक जहान में मेरा नाम है
तब तक मेरे नाम तू  

उलझन भी हूँ तेरी, उलझन का हल भी हूँ मैं
थोड़ा सा जिद्दी हूँ, थोड़ा पागल भी हूँ मैं
बरखा बिजली बादल झूठे
झूठी फूलों की सौगातें
सच्ची तू है सच्चा मैं हूँ
सच्ची अपने दिल की बातें
दस्तख़त हाथों से हाथों पे कर दे तू
ना कर आँखों पे पलकों के परदे तू
क्या ये इतना बड़ा काम है, ऐलान है
जब तक जहान ... मेरे नाम तू

मेरे ही घेरे में घूमेगी हर पल तू ऐसे
सूरज के घेरे में रहती है धरती ये जैसे
पाएगी तू खुदको ना मुझसे जुदा
तू है मेरा आधा सा हिस्सा सदा
टुकड़े कर चाहे ख़्वाबों के तू मेरे
टूटेंगे भी तू रहने हैं वो तेरे
तुझको भी तो ये इल्हाम है, ऐलान है  



वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

Sunday, January 27, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 3 : ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू Ae Watan

राज़ी के संगीत के बारे में कुछ बातें संगीतमाला में इसी फिल्म के गीत दिलबरो की चर्चा करते हुए पहले भी हुई थी । राज़ी के प्रोमो के समय अरिजीत की आवाज़ में पहली बार ये गीत सुनाई दिया और कुछ दिनों में ही ये हम सब की जुबाँ पर था। फिल्म में देखते हुए भी इसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शंकर एहसान लॉय की मधुर धुन, गुलज़ार के सहज पर दिल को छूते शब्द और अरिजीत की जबरदस्त गायिकी, इन सबका सम्मिलित प्रभाव आम जनमानस पर ऐसा पड़ा कि ये गीत इतनी जल्दी मकबूलियत की सीढ़ियाँ चढ़ता गया। 

इसके पक्ष में एक बात ये भी रही कि बहुत सालों से हिंदी फिल्म उद्योग ने देशभक्ति का ऐसा सुरीला गान नहीं रचा था इसलिए लोगों ने इसे हाथों हाथ लिया।


संगीतकार तिकड़ी शंकर एहसान लॉय ने फिल्म के लिए इस गीत के दो वर्सन बनाए। अरिजीत की आवाज़ वाला गीत फिल्म के प्रचार के लिए इस्तेमाल हुआ जबकि सुनिधि चौहान की आवाज़ का प्रयोग फिल्म की कहानी में किया गया। यूँ तो अरिजीत और सुनिधि दोनों ने ही इस गीत को बखूबी निभाया है पर इस गीत को गाते हुए अरिजीत इसलिए बेहतर लगे क्यूँकि उन्होंने इस नग्मे के ऊँचे सुरों को सुनिधि की अपेक्षा बड़ी सहजता से साधा।

संगीतकार तिकड़ी ने गीत के दोनों रूपों में संगीत भी बदल दिया। जहाँ अरिजीत सिंह वाला वर्सन पश्चिमी आर्केस्ट्रा, ड्रम्स और पुरुष कोरस के साथ आगे बढ़ता है वहीं फिल्म में इस्तेमाल गीत में लोकसंगीत वाला तड़का है और इसी वज़ह से इंटरल्यूड्स में तापस दा एक बार फिर रबाब और मेंडोलिन की मधुर तान के साथ सुनाई पड़ते हैं। 

शंकर एहसान लॉय 
इस गीत के बारे में गुलज़ार कहते हैं कि जब वे बचपन मे् स्कूल में पढ़ते थे तो उन्हें प्रार्थना के रूप में इकबाल की ये कविता सुनाई जाती थी। बरसों बाद जब उन्हें देशप्रेम से जुड़ा गीत लिखने का मौका मिला तो उन्होंने इसकी शुरुआत इकबाल की इन पंक्तियों से शुरु करने का सुझाव दिया। 

लब पे आती है दुआ बन के तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शम्मा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी

सुझाव अच्छा था क्यूँकि गीत पाकिस्तान के स्कूल में प्रार्थना की तरह आता है। रही इकबाल साहब की बात तो ये वही मशहूर कवि इकबाल हैं जिन्होंने एक ज़माने में सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा  लिखा था। ये बात अलग है कि वो बाद में अलग देश बनाने के हिमायती हो गए।

एक व्यक्ति के लिए देशप्रेम क्या है गुलज़ार ने यही दिमाग में रखते हुए गीत के बोल लिखे हैं  इसलिए हम सभी इस गीत से अपने आप को बड़ी आसानी से जोड़ लेते हैं। उनका एक ही पंक्ति में जहाँ के साथ जहां (विश्व) का इस्तेमाल अच्छा लगता है। गीत की धुन बोल लिखने के बाद बनाई गयी और आपको जानकर अचरज होगा कि इसे बनाने में संगीतकार तिकड़ी ने सिर्फ पाँच मिनट का वक़्त लिया। शंकर एहसान लॉय कहते हैं कि ये एक ऐसा गीत है जो आपको अपने मुल्क की याद विश्व के किसी भी कोने में दिलाता रहेगा। 

इस गीत के दोनों ही रूपों में कोरस की भी अच्छी भूमिका रही है। शंकर महादेवन संगीत की एकाडमी चलाते हैं और वहीं के बच्चों ने सुनिधि के साथ कोरस में साथ निभाया। तो चलिए बारी बारी से सुनते हैं इन गीतों के दोनों रूप.. पहले अरिजीत और फिर सुनिधि व साथियों की आवाज़ों में


ऐ वतन.मेरे वतन. आबाद रहे तू आबाद रहे तू.. आबाद रहे तू
ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
मैं जहाँ रहूँ जहां में याद रहे तू 
ऐ वतन.. मेरे वतन ऐ वतन.. मेरे वतन

तू ही मेरी मंजिल है, पहचान तुझी से
तू ही मेरी मंजिल है, पहचान तुझी से
पहुँचूँ मैं जहाँ भी मेरी बुनियाद रहे तू
पहुँचूँ मैं जहाँ भी मेरी बुनियाद रहे तू
ऐ वतन.. मेरे वतन.. आबाद रहे तू..

तुझपे कोई गम की आँच आने नहीं दूँ
तुझपे कोई गम की आँच आने नहीं दूँ
कुर्बान मेरी जान तुझपे शाद रहे तू ..
ऐ वतन.. मेरे वतन.. आबाद रहे तू..



वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां
 

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